माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम वन लाइनर नोट्स

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

 

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माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996

(THE ARBITRATION AND CONCILIATION ACT, 1996)

(1996 का अधिनियम संख्यांक 26)

(ACT No. 26 OF 1996)

 

इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम क्या है?

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996

(The Arbitration and Conciliation Act, 1996)

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम 1996 का अधिनियम संख्यांक क्या है?

1996 का अधिनियम संख्यांक 26

(Act No. 26 Of 1996)

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 का उद्देश्य क्या है?

देसी माध्यस्थम्, अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम्, विदेशी पंचाटों के प्रवर्तन तथा सुलह से संबंधित विधि का समेकन और संशोधन।

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 किन विषयों से संबंधित है?

माध्यस्थम्, अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम्, विदेशी पंचाटों के प्रवर्तन तथा सुलह।

उद्देशिका के अनुसार 1985 में किस संस्था ने आदर्श विधि को अंगीकार किया?

संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार विधि आयोग ने।

1985 की आदर्श विधि किस विषय से संबंधित है?

अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम्।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने किस विषय में देशों को सिफारिश की?

माध्यस्थम् प्रक्रियाओं की एकरूपता और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए आदर्श विधि पर विचार करने की।

संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार विधि आयोग ने 1980 में क्या अंगीकार किया?

सुलह नियम।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सुलह नियमों के संबंध में क्या सिफारिश की?

अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक विवादों के सौहार्द्रपूर्ण निपटारे हेतु सुलह नियमों के उपयोग की।

सुलह नियम किन परिस्थितियों में लागू करने की सिफारिश की गई है?

जब अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक संबंधों में विवाद उत्पन्न हो और पक्षकार सुलह द्वारा समाधान चाहते हों।

आदर्श विधि और नियमों का मुख्य योगदान क्या है?

अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक विवादों के उचित और दक्ष निपटारे के लिए एकीकृत विधिक संरचना की स्थापना।

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 को बनाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

आदर्श विधि और नियमों को ध्यान में रखते हुए माध्यस्थम् और सुलह संबंधी विधि बनाने के लिए।

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 किस वर्ष में अधिनियमित किया गया?

भारत गणराज्य के सैंतालीसवें वर्ष में।

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 किसके द्वारा अधिनियमित किया गया?

संसद द्वारा।

 

प्रारंभिक

(PRELIMINARY)

धारा 1 का विषय क्या है?

संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ

(Short title, extent and commencement)

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 अधिनियम का विस्तार कहाँ तक है?

संपूर्ण भारत पर

धारा 1(2) में क्या संशोधन किया गया है?

2019 संशोधन द्वारापरंतुशब्द हटाया गया

धारा 1(2) स्पष्टीकरण में क्या बताया गया है?

अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक सुलहका अर्थ धारा 2(1)() के अनुसार होगा, जहाँमाध्यस्थम्के स्थान परसुलहशब्द प्रयुक्त होगा

यह अधिनियम कब लागू होता है?

केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना की तिथि से

 

भाग-

Part-I

माध्यस्थम्

(ARBITRATION)

अध्याय-1

(CHAPTER-I)

साधारण उपबंध

(General provisions)

भाग-I का विषय क्या है?

माध्यस्थम्

(Arbitration)

अध्याय-1 किससे सम्बंधित है?

साधारण उपबंध

धारा-2 का विषय क्या है?

परिभाषाएं (निर्वाचन खंड)

(Definitions (Electoral Blocks))

माध्यस्थम्(Arbitration) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)()

धारा 2(1)(क) में “माध्यस्थम्” का क्या अर्थ है?

कोई भी माध्यस्थम्, चाहे स्थायी संस्था द्वारा किया गया हो या नहीं

माध्यस्थम् करार” (Arbitration Agreement) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)()

धारा 2(1)(ख) में “माध्यस्थम् करार” का क्या अर्थ है?

धारा 7 में निर्दिष्ट करार

माध्यस्थम् पंचाट(Arbitral Award) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)()

धारा 2(1)(ग) में “माध्यस्थम् पंचाट” का क्या अर्थ है?

इसमें अंतरिम पंचाट भी शामिल है

माध्यस्थम् संस्था (Arbitral Institution) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)(गक)

धारा 2(1)(गक) में “माध्यस्थम् संस्था” का क्या अर्थ है?

उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा पदाभिहित माध्यस्थम् संस्था

माध्यस्थम् अधिकरण (Arbitral Tribunal) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)()

धारा 2(1)(घ) में “माध्यस्थम् अधिकरण” का क्या अर्थ है?

एक मात्र मध्यस्थ या मध्यस्थों का पैनल

न्यायालय(Court) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)()

धारा 2(1)(ङ) में “न्यायालय” का क्या अर्थ है?

सामान्य मामलों में जिला का प्रधान सिविल न्यायालय या अधिकारयुक्त उच्च न्यायालय,

अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में उच्च न्यायालय

सामान्य (गैर-अंतरराष्ट्रीय) माध्यस्थम् में “न्यायालय” कौन है?

जिले का प्रधान सिविल न्यायालय या ऐसा उच्च न्यायालय जिसे मूल सिविल अधिकारिता प्राप्त हो

अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में “न्यायालय” कौन है?

ऐसा उच्च न्यायालय जिसे मूल सिविल अधिकारिता प्राप्त हो

अन्य मामलों में उच्च न्यायालय की भूमिका क्या है?

वह उच्च न्यायालय जो अधीनस्थ न्यायालयों की डिक्रियों के विरुद्ध अपील सुनने की अधिकारिता रखता है

अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् (international commercial arbitration) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)()

धारा 2(1)(च) में “अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम्” क्या है?

ऐसे वाणिज्यिक विवादों का माध्यस्थम् जो विधिक संबंधों से उत्पन्न हों और जिनमें कम से कम एक पक्ष विदेशी हो

अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में विदेशी पक्ष कौन हो सकता है?

विदेशी नागरिक, विदेशी निगम, विदेश से नियंत्रित निकाय या विदेशी सरकार

यह किन प्रकार के संबंधों पर लागू होता है?

संविदात्मक या गैर-संविदात्मक, जो भारतीय विधि के तहत वाणिज्यिक माने जाते हैं

कौन-सा व्यक्ति विदेशी पक्ष माना जाएगा?

जो भारत से भिन्न देश का नागरिक हो या वहां का निवासी हो

कौन-सा निगम विदेशी माना जाएगा?

जो भारत के बाहर किसी देश में निगमित हो

किस प्रकार का संगम/निकाय विदेशी माना जाएगा?

जिसका केन्द्रीय प्रबंधन और नियंत्रण भारत के बाहर हो

क्या विदेशी सरकार भी पक्षकार हो सकती है?

हाँ, विदेशी सरकार भी अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् का पक्षकार हो सकती है

विधिक प्रतिनिधि(Legal Representative) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)()

धारा 2(1)(छ) में “विधिक प्रतिनिधि” का क्या अर्थ है?

मृत व्यक्ति की सम्पदा का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति

पक्षकार (Party) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)()

धारा 2(1)(ज) में “पक्षकार” का क्या अर्थ है?

माध्यस्थम् करार का पक्षकार

विहित (Pescribed) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)()

धारा 2(1)(झ) में “विहित” का क्या अर्थ है?

अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा निर्धारित

विनियम (Regulation) कहाँ परिभाषित है?

धारा 2(1)()

धारा 2(1)(ञ) में “विनियम” का क्या अर्थ है?

इस अधिनियम के अधीन परिषद द्वारा बनाए गए विनियम

धारा 2(2) का विषय क्या है?

परिधि

(Scope)

यह भाग कहाँ लागू होता है?

जहाँ माध्यस्थम् का स्थान भारत में हो

क्या यह भाग भारत के बाहर होने वाले माध्यस्थम् पर भी लागू हो सकता है?

हाँ, कुछ विशेष धाराएँ अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् पर लागू होती हैं

भारत के बाहर होने वाले माध्यस्थम् पर कौन-कौन सी धाराएँ लागू होती हैं?

धारा 9, धारा 27 और धारा 37(1)() तथा धारा 37(3)

यह प्रावधान किन शर्तों पर लागू होता है?

जब पक्षकारों के बीच कोई विपरीत करार हो

क्या विदेश में किया गया पंचाट मान्य होता है?

हाँ, यदि वह भाग 2 के अंतर्गत प्रवर्तनीय और मान्य है

धारा 2(2) का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भारत के बाहर होने वाले अंतरराष्ट्रीय माध्यस्थम् में भी कुछ भारतीय कानूनी सहायता उपलब्ध कराना

धारा 2(3) का क्या प्रावधान है?

यह भाग उन विधियों को प्रभावित नहीं करेगा जिनमें कुछ विवाद माध्यस्थम् के लिए योग्य नहीं हैं

धारा 2(4) का क्या अर्थ है?

यह भाग अन्य अधिनियमों के अधीन होने वाले माध्यस्थम् पर भी लागू होगा, मानो वह माध्यस्थम् करार के अनुसार हो

धारा 2(4) में कौन-सी धाराएँ अपवाद हैं?

धारा 40(1), धारा 41 और धारा 43

धारा 2(4) में असंगति की स्थिति में क्या होगा?

जहाँ यह भाग अन्य अधिनियम या नियमों से असंगत होगा, वहाँ यह लागू नहीं होगा

धारा 2(5) का क्या प्रावधान है?

यह भाग सभी माध्यस्थम् और उनसे संबंधित कार्यवाहियों पर लागू होगा

धारा 2(5) में अपवाद क्या है?

जहाँ किसी अन्य विधि या अंतरराष्ट्रीय करार में भिन्न प्रावधान हो

धारा 2(6) का विषय क्या है?

निर्देशों का अर्थान्वयन

धारा 2(6) का क्या प्रावधान है?

पक्षकार विवाद के निर्णय हेतु किसी व्यक्ति या संस्था को अधिकृत कर सकते हैं

धारा 2(7) का क्या अर्थ है?

इस भाग के अधीन किया गया पंचाट देशी पंचाट माना जाएगा

धारा 2(8)(क) का क्या प्रावधान है?

जहां पक्षकारों के करार का उल्लेख है, वह करार माना जाएगा

धारा 2(8)(ख) का क्या प्रावधान है?

करार में निर्दिष्ट माध्यस्थम् नियम भी करार का भाग होंगे

धारा 2(9) का क्या प्रावधान है?

दावे में प्रतिदावा भी शामिल होगा और प्रतिरक्षा में प्रतिदावे की प्रतिरक्षा भी शामिल होगी

धारा 3 का विषय क्या है?

लिखित संसूचनाओं की प्राप्ति

(Receipt of written Communications)

धारा 3(1)(क) के अनुसार संसूचना कब प्राप्त मानी जाएगी?

जब वह व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से या उसके व्यवसाय/निवास/डाक पते पर दी जाए

धारा 3(1)(ख) के अनुसार संसूचना कब प्राप्त मानी जाएगी?

जब वह अंतिम ज्ञात पते पर रजिस्ट्रीकृत पत्र या अन्य माध्यम से भेजी जाए

धारा 3(1) की मुख्य शर्त क्या है?

जब तक पक्षकारों ने अन्यथा करार किया हो

धारा 3(2) के अनुसार संसूचना कब प्राप्त मानी जाती है?

जिस दिन वह परिदत्त की जाती है

धारा 3(3) कार्यवाहियों पर लागू नहीं होती-

न्यायिक कार्यवाहियों

धारा 4 का विषय क्या है?

आपत्ति करने के अधिकार का अधित्यजन

(Waiver of right to object)

कोई पक्षकार, जो यह जानता है कि, इस भाग के ऐसे किसी उपबंध का, जिसे पक्षकार अल्पीकृत कर सकते हैं, या माध्यस्थम् करार के अधीन किसी अपेक्षा का, अनुपालन नहीं किया गया है और फिर भी असम्यक् विलंब के बिना या यदि आपत्ति का कथन करने के लिए किसी कालावधि का उपबंध किया गया है तो-

उस कालावधि के भीतर ऐसे अननुपालन के लिए अपनी आपत्ति का कथन किए बिना माध्यस्थम् के लिए अग्रसर होता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने इस प्रकार आपत्ति करने के अपने अधिकार का अधित्यजन कर दिया है।

आपत्ति कब करनी आवश्यक है?

बिना असम्यक विलंब के या निर्धारित समय सीमा के भीतर

यदि पक्षकार आपत्ति नहीं करता तो क्या होगा?

माना जाएगा कि उसने आपत्ति का अधिकार छोड़ दिया है

धारा 5 का विषय क्या है?

न्यायिक मध्यक्षेप का विस्तार

(Extent of judicial intervention)

धारा 5 का मुख्य सिद्धांत क्या है?

न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित रहेगा

धारा 5 के अनुसार न्यायालय कब हस्तक्षेप कर सकता है?

केवल उन्हीं स्थितियों में जहाँ इस भाग में स्पष्ट प्रावधान हो

धारा 6 का विषय क्या है?

प्रशासनिक सहायता

(Administrative assistance)

धारा 6 का मुख्य प्रावधान क्या है?

माध्यस्थम् कार्यवाही को सुचारु बनाने हेतु प्रशासनिक सहायता ली जा सकती है

कौन प्रशासनिक सहायता की व्यवस्था कर सकता है?

पक्षकार या उनकी सहमति से माध्यस्थम् अधिकरण

प्रशासनिक सहायता किससे ली जा सकती है?

किसी उपयुक्त संस्था या व्यक्ति से

 

अध्याय 2

(CHAPTER-II)

माध्यस्थम् करार

(Arbitration agreement)

अध्याय 2 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् करार

धारा 7 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् करार

(Arbitration agreement)

धारा 7(1) में माध्यस्थम् करार क्या है?

पक्षकारों के बीच विवादों को माध्यस्थम् के लिए भेजने का करार

धारा 7(1) में विवाद किन संबंधों से उत्पन्न हो सकते हैं?

संविदात्मक या गैर-संविदात्मक विधिक संबंधों से

धारा 7(2) के अनुसार करार किस रूप में हो सकता है?

संविदा में माध्यस्थम् खंड या पृथक करार

धारा 7(3) के अनुसार माध्यस्थम् करार कैसा होना चाहिए?

लिखित रूप में

धारा 7(4)(क) के अनुसार लिखित करार कब माना जाएगा?

जब वह हस्ताक्षरित दस्तावेज में हो

धारा 7(4)(ख) के अनुसार लिखित करार कब माना जाएगा?

पत्र, टेलेक्स, तार या इलेक्ट्रॉनिक संचार के माध्यम से

धारा 7(4)(ग) के अनुसार लिखित करार कब माना जाएगा?

दावे और प्रतिरक्षा के कथनों में, जहाँ करार का इंकार किया गया हो

धारा 7(5) का क्या प्रावधान है?

किसी दस्तावेज के संदर्भ से भी माध्यस्थम् करार बन सकता है

धारा 8 का विषय क्या है?

न्यायालय द्वारा माध्यस्थम् के लिए पक्षकारों को निर्दिष्ट करना

(Power to refer parties to arbitration where there is an arbitration agreement)

धारा 8(1) का मुख्य प्रावधान क्या है?

न्यायालय पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए भेजेगा

न्यायालय पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए कब भेजेगा?

जब विवाद माध्यस्थम् करार के अंतर्गत हो और पक्षकार आवेदन करे

धारा 8(1) में आवेदन कब तक किया जा सकता है?

विवाद के सार पर प्रथम कथन प्रस्तुत करने से पहले

धारा 8(1) में न्यायालय कब माध्यस्थम् के लिए नहीं भेजेगा?

जब प्रथमदृष्ट्या कोई वैध माध्यस्थम् करार नहीं हो

धारा 8(1) किस संशोधन द्वारा प्रतिस्थापित हुआ?

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 4 द्वारा प्रतिस्थापित

धारा 8(2) का क्या प्रावधान है?

आवेदन के साथ मूल या प्रमाणित माध्यस्थम् करार होना आवश्यक है

धारा 8(2) में यदि करार उपलब्ध न हो तो क्या होगा?

न्यायालय से दूसरे पक्षकार से करार प्रस्तुत कराने की प्रार्थना की जाएगी

धारा 8(2) का परन्तुक किस संशोधन द्वारा जोड़ा गया?

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित

धारा 8(3) का क्या प्रावधान है?

न्यायालय में मामला लंबित होने पर भी माध्यस्थम् जारी रह सकता है

धारा 9 का विषय क्या है?

न्यायालय द्वारा अंतरिम उपाय

(Interim measures, etc., by Court)

धारा 9(1) के अंतर्गत कब आवेदन किया जा सकता है?

माध्यस्थम् से पहले, दौरान या पंचाट के बाद (धारा 36 से पहले)

धारा 9(1)(i) के अंतर्गत क्या प्रावधान है?

अप्राप्तवय या विकृतचित्त व्यक्ति के लिए संरक्षक की नियुक्ति

धारा 9(1)(ii)(क) के अंतर्गत क्या प्रावधान है?

विवादित माल का परिरक्षण, अभिरक्षा या विक्रय

धारा 9(1)(ii)(ख) के अंतर्गत विषयों में से किसी के संबंध में संरक्षण के किसी अंतरिम अध्युपाय के लिए आवेदन कर सकेगा-

 

किसी माल का, जो माध्यस्थम् करार की विषय-वस्तु है, परिरक्षण, अंतरिम अभिरक्षा या विक्रय ;

माध्यस्थम् में विवादग्रस्त रकम सुरक्षित करने;

किसी संपत्ति या वस्तु का, जो माध्यस्थम् में विषय-वस्तु या विवाद है या जिसके बारे में कोई प्रश्न उसमें उद्भूत हो सकता है, निरोध, परिरक्षण या निरीक्षण और पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी के लिए किसी पक्षकार के कब्जे में किसी भूमि पर या भवन में किसी व्यक्ति को प्रवेश करने देने के लिए प्राधिकृत करने, या कोई ऐसा नमूना लेने के लिए या कोई ऐसा संप्रेक्षण या प्रयोग कराए जाने के लिए जो पूर्ण जानकारी या साक्ष्य प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन हो, प्राधिकृत करने;

अंतरिम व्यादेश या किसी रिसीवर की नियुक्ति करने ;

संरक्षण का ऐसा अन्य अंतरिम उपाय करने के लिए जो न्यायालय को न्यायोचित और सुविधाजनक प्रतीत हो,

धारा 9(2) जहां, माध्यस्थम् कार्यवाहियां प्रारंभ होने के पूर्व न्यायालय उपधारा (1) के अधीन संरक्षा के किसी अंतरिम उपाय का आदेशपारित करता है, वहां माध्यस्थम् कार्यवाहियां ऐसे आदेश की तारीख से -

नब्बे दिन की अवधि के भीतर या ऐसे अतिरिक्त समय के भीतर, जो न्यायालय अवधारित करे, प्रारंभ की जाएंगी

धारा 9(3) माध्यस्थम् अधिकरण का एक बार गठन हो जाने पर, न्यायालय उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन तब तक ग्रहण नहीं करेगा जब तक कि-

न्यायालय का यह निष्कर्ष हो कि ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण धारा 17 के अधीन उपबंधित उपचार संभवतः प्रभावकारी हो पाए

धारा 9(2)(3) किस संशोधन द्वारा जोड़ा गया?

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 5 द्वारा अंतःस्थापित

 

अध्याय-3

(CHAPTER-III)

माध्यस्थम् अधिकरण की संरचना

(Composition of arbitral tribunal)

अध्याय 3 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् अधिकरण की संरचना

(Composition of arbitral tribunal)

धारा 10 का विषय क्या है?

मध्यस्थों की संख्या

(Number of arbitrators)

मध्यस्थों की संख्या कौन तय करता है?

पक्षकार

मध्यस्थों की संख्या कैसी नहीं हो सकती?

सम संख्या

(even)

संख्या तय न होने पर क्या होगा?

एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त होगा

धारा 11 का विषय क्या है?

मध्यस्थों की नियुक्ति

(Appointment of arbitrator)

कौन मध्यस्थ बन सकता है?

कोई भी व्यक्ति, किसी भी राष्ट्रीयता का

मध्यस्थ नियुक्त करने की प्रक्रिया कौन तय करता है?

पक्षकार

यदि प्रक्रिया तय न हो तो क्या होगा?

प्रत्येक पक्ष एक मध्यस्थ नियुक्त करेगा

तीसरा मध्यस्थ कौन नियुक्त करेगा?

दोनों नियुक्त मध्यस्थ मिलकर

तीसरे मध्यस्थ की क्या भूमिका होती है?

वह पीठासीन मध्यस्थ होता है

उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय की क्या शक्ति है?

माध्यस्थम् संस्थाओं को पदाभिहित करना

यदि संस्था उपलब्ध न हो तो क्या होगा?

मुख्य न्यायमूर्ति मध्यस्थों का पैनल बनाएगा

यदि पक्षकार 30 दिन में मध्यस्थ नियुक्त न करे तो क्या होगा?

न्यायालय द्वारा पदाभिहित संस्था नियुक्ति करेगी

यदि दो मध्यस्थ तीसरे पर सहमत न हों तो क्या होगा?

पदाभिहित संस्था तीसरा मध्यस्थ नियुक्त करेगी

एकमात्र मध्यस्थ पर सहमति न होने पर क्या होगा?

पदाभिहित संस्था द्वारा नियुक्ति होगी

किसी मध्यस्थ की नियुक्ति प्रक्रिया विफल होने पर क्या उपाय है?

न्यायालय/पदाभिहित संस्था आवश्यक कदम उठाएगी

नियुक्ति प्रक्रिया कब विफल मानी जाती है?

जब पक्षकार या मध्यस्थ अपेक्षित कार्य नहीं करते

धारा 11(6)(क) के अंतर्गत क्या स्थिति है?

पक्षकार प्रक्रिया के अनुसार कार्य करने में असफल रहता है

धारा 11(6)(ख) के अंतर्गत क्या स्थिति है?

पक्षकार या मध्यस्थ आपसी सहमति पर नहीं पहुँचते

धारा 11(6)(ग) के अंतर्गत क्या स्थिति है?

नियुक्त व्यक्ति/संस्था अपना कार्य नहीं करती

ऐसी स्थिति में क्या उपाय है?

न्यायालय द्वारा पदाभिहित माध्यस्थम् संस्था नियुक्ति करेगी

यह प्रावधान कब लागू होगा?

जब करार में अन्य उपाय का प्रावधान हो

धारा 11(6ख) का क्या प्रावधान है?

संस्था का पदाभिधान न्यायिक शक्तियों का प्रत्यायोजन नहीं माना जाएगा

किसी मध्यस्थ की नियुक्ति से पहले क्या देखा जाता है?

निष्पक्षता, स्वतंत्रता और आवश्यक योग्यताएँ

धारा 11(9) का विषय क्या है?

अंतरराष्ट्रीय मामलों में नियुक्ति

अंतरराष्ट्रीय मामले में तीसरा मध्यस्थ कैसा होगा?

पक्षकारों से भिन्न राष्ट्रीयता का हो सकता है

धारा 11(11) का विषय क्या है?

एकाधिक अनुरोध

एकाधिक अनुरोध होने पर कौन सक्षम होगा?

जिसे पहले अनुरोध किया गया हो

धारा 11(13) का विषय क्या है?

समय सीमा

नियुक्ति आवेदन कब तक निपटाया जाएगा?

नोटिस के 30 दिनों के भीतर

धारा 11(14) का विषय क्या है?

फीस निर्धारण

मध्यस्थ की फीस कौन तय करेगा?

माध्यस्थम् संस्था (चौथी अनुसूची के अनुसार)

धारा 11- का विषय क्या है?

चौथी अनुसूची का संशोधन करने की केंद्रीय सरकार की शक्ति

(Power of Central Government to amend Fourth Schedule)

चौथी अनुसूची में संशोधन की शक्ति किसके पास है?

केंद्रीय सरकार

संशोधन कैसे किया जाता है?

राजपत्र में अधिसूचना द्वारा

संशोधन कब किया जाता है?

जब सरकार इसे आवश्यक या समीचीन समझे

अधिसूचना कितने समय तक रखी जाती है?

कुल 30 दिन

यदि संसद असहमति जताए तो क्या होगा?

अधिसूचना जारी नहीं होगी

यदि संसद संशोधन करे तो क्या होगा?

संशोधित रूप में ही लागू होगी

धारा 12 का विषय क्या है?

आक्षेप के लिए आधार

(Grounds for challenge)

मध्यस्थ को क्या प्रकटन करना होता है?

अपने संबंध, हित और निष्पक्षता को प्रभावित करने वाली परिस्थितियाँ

मध्यस्थ को प्रकटन कब करना होता है?

नियुक्ति के समय और कार्यवाही के दौरान

आक्षेप कब किया जा सकता है?

जब निष्पक्षता पर संदेह हो या योग्यता हो

धारा 12(4) क्या कहती है?

नियुक्त मध्यस्थ पर बाद में ज्ञात कारणों से ही आक्षेप होगा

धारा 12(5) का क्या प्रावधान है?

सातवीं अनुसूची वाले व्यक्ति मध्यस्थ बनने के लिए अपात्र हैं

धारा 13 का विषय क्या है?

आक्षेप की प्रक्रिया

(Challenge procedure)

आक्षेप की प्रक्रिया कौन तय करता है?

पक्षकार

यदि करार न हो तो क्या प्रक्रिया है?

15 दिनों में लिखित आपत्ति देना

आक्षेप पर निर्णय कौन करता है?

माध्यस्थम् अधिकरण

आक्षेप असफल होने पर क्या होगा?

कार्यवाही जारी रहेगी और पंचाट दिया जाएगा

आक्षेप के बाद उपाय क्या है?

धारा 34 के तहत पंचाट को चुनौती दी जा सकती है

धारा 14 का विषय क्या है?

मध्यस्थ का कार्य करने में असफलता या असंभवता और आदेश की समाप्ति

(Failure or impossibility to act)

धारा 14(1) के अनुसार मध्यस्थ का आदेश कब पर्यवसित होगा?

जब वह अपने कृत्यों का पालन करने में असफल हो जाए या असम्यक विलम्ब करे तथा पद से हट जाए या पक्षकार समाप्ति पर सहमत हों।

धारा 14(1)(क) के अंतर्गत मध्यस्थ कब असफल माना जाएगा?

जब वह विधितः या वस्तुतः अपने कृत्यों का पालन करने में असफल हो या अन्य कारणों से असम्यक विलम्ब करे।

धारा 14(1)(ख) के अंतर्गत मध्यस्थ का आदेश कब समाप्त होगा?

जब वह अपने पद से हट जाए या पक्षकार उसके आदेश की समाप्ति पर सहमत हो जाएं।

धारा 14(1) के अनुसार आदेश समाप्त होने पर क्या होगा?

मध्यस्थ के स्थान पर दूसरे मध्यस्थ को नियुक्त किया जाएगा।

धारा 14(2) के अनुसार विवाद होने पर कौन आवेदन कर सकता है?

कोई भी पक्षकार न्यायालय में आवेदन कर सकता है।

धारा 14(2) के अनुसार आवेदन कब किया जा सकता है?

जब उपधारा (1)() में निर्दिष्ट आधारों से संबंधित विवाद शेष हो।

धारा 14(2) के अनुसार न्यायालय किस पर निर्णय करेगा?

मध्यस्थ के आदेश की समाप्ति पर।

धारा 14(2) में आवेदन का अधिकार कब सीमित हो सकता है?

जब पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार किया गया हो।

धारा 14(3) के अनुसार मध्यस्थ के पद से हटने का क्या प्रभाव होगा?

इससे धारा 12(3) या धारा 14 में निर्दिष्ट आधारों की विधिमान्यता की स्वीकृति नहीं मानी जाएगी।

धारा 14(3) के अनुसार पक्षकार द्वारा समाप्ति पर सहमति का क्या प्रभाव होगा?

इससे संबंधित आधारों की विधिमान्यता की स्वीकृति अंतर्हित नहीं होगी।

धारा 14(3) में किन धाराओं का उल्लेख है?

धारा 13(3) और धारा 12(3)

धारा 14 में प्रतिस्थापन किस अधिनियम द्वारा किया गया?

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 9 द्वारा।

धारा 15 का विषय क्या है?

मध्यस्थ के आदेश की समाप्ति और उसका प्रतिस्थापन

(Termination of mandate and substitution of arbitrator)

धारा 15(1) के अनुसार मध्यस्थ का आदेश किन परिस्थितियों में समाप्त होगा?

धारा 13 या धारा 14 में निर्दिष्ट परिस्थितियों के अतिरिक्त उपधारा (1)() और () में वर्णित स्थितियों में।

धारा 15(1)(क) के अनुसार आदेश कब समाप्त होगा?

जब मध्यस्थ किसी कारण से अपने पद से हट जाता है।

धारा 15(1)(ख) के अनुसार आदेश कब समाप्त होगा?

जब पक्षकारों के करार द्वारा या उसके अनुसरण में आदेश समाप्त हो जाता है।

धारा 15(2) के अनुसार प्रतिस्थानी मध्यस्थ की नियुक्ति कैसे होगी?

उन नियमों के अनुसार जो प्रतिस्थापित होने वाले मध्यस्थ की नियुक्ति पर लागू थे।

धारा 15(2) कब लागू होती है?

जब किसी मध्यस्थ का आदेश समाप्त हो जाता है।

धारा 15(3) के अनुसार पुनः सुनवाई कब की जा सकती है?

जब प्रतिस्थानी मध्यस्थ नियुक्त किया गया हो और पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार किया गया हो।

धारा 15(3) के अनुसार पुनः सुनवाई का निर्णय कौन करेगा?

माध्यस्थम् अधिकरण अपने विवेकानुसार करेगा।

धारा 15(3) में पक्षकारों के करार का क्या महत्व है?

यदि पक्षकार अन्यथा करार करें तो पुनः सुनवाई आवश्यक नहीं होगी।

धारा 15(4) के अनुसार पूर्व आदेश या विनिर्णय कब अविधिमान्य नहीं होंगे?

केवल इस कारण कि माध्यस्थम् अधिकरण की संरचना में परिवर्तन हुआ है।

धारा 15(4) कब लागू होती है?

जब मध्यस्थ का प्रतिस्थापन किया गया हो और पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार किया गया हो।

धारा 15(4) में पक्षकारों के करार का क्या प्रभाव है?

पक्षकार अन्यथा करार कर सकते हैं जिससे प्रावधान लागू हो।

 

अध्याय-4

(CHAPTER-IV)

माध्यस्थम् अधिकरणों की अधिकारिता

(Jurisdiction of arbitral tribunals)

अध्याय 4 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् अधिकरणों की अधिकारिता

(Jurisdiction of arbitral tribunals)

धारा 16 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् अधिकरण की अपनी अधिकारिता के बारे में विनिर्णय करने की सक्षमता।

(Competence of arbitral tribunal to rule on its jurisdiction)

धारा 16(1) के अनुसार माध्यस्थम् अधिकरण की क्या सक्षमता है?

वह अपनी अधिकारिता के बारे में स्वयं विनिर्णय कर सकता है।

धारा 16(1) के अंतर्गत किन विषयों पर विनिर्णय किया जा सकता है?

माध्यस्थम् करार की विद्यमानता या विधिमान्यता से संबंधित आक्षेपों पर।

धारा 16(1)(क) के अनुसार माध्यस्थम् खंड की क्या स्थिति है?

वह संविदा के अन्य निबंधनों से स्वतंत्र एक पृथक करार माना जाएगा।

धारा 16(1)(ख) के अनुसार संविदा के शून्य होने का क्या प्रभाव होगा?

इससे माध्यस्थम् खंड स्वतः अविधिमान्य नहीं होगा।

धारा 16(2) के अनुसार अधिकारिता पर अभिवाक् कब नहीं किया जाएगा?

प्रतिरक्षा का कथन प्रस्तुत किए जाने के पश्चात्।

धारा 16(2) में नियुक्ति में भाग लेने का क्या प्रभाव है?

इससे पक्षकार अधिकारिता पर अभिवाक् करने से वंचित नहीं होगा।

धारा 16(3) के अनुसार प्राधिकरण के अतिक्रमण का अभिवाक् कब किया जाएगा?

यथाशीघ्र, जब मामला प्राधिकार की परिधि से परे उठाया जाता है।

धारा 16(4) के अनुसार परवर्ती अभिवाक् कब स्वीकार किया जा सकता है?

जब माध्यस्थम् अधिकरण विलम्ब को न्यायोचित समझे।

धारा 16(5) के अनुसार अभिवाक् पर कौन निर्णय करेगा?

माध्यस्थम् अधिकरण।

धारा 16(5) के अनुसार अभिवाक् नामंजूर होने पर क्या होगा?

कार्यवाही जारी रहेगी और माध्यस्थम् पंचाट दिया जाएगा।

धारा 16(6) के अनुसार व्यथित पक्षकार का उपाय क्या है?

वह धारा 34 के अंतर्गत पंचाट को अपास्त करने के लिए आवेदन कर सकता है।

धारा 17 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा आदिष्ट अंतरिम उपाय।

(Interim measures ordered by arbitral tribunal)

धारा 17(1) के अनुसार आवेदन कौन कर सकता है?

कोई पक्षकार माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान आवेदन कर सकता है।

धारा 17(1)(i) के अंतर्गत किसके लिए संरक्षक नियुक्त किया जा सकता है?

किसी अवस्यक या विकृत चित्त व्यक्ति के लिए।

धारा 17(1)(ii) का संबंध किससे है?

संरक्षा के अंतरिम उपायों से।

धारा 17(1)(ii) संरक्षा के अंतरिम उपायों के अंतर्गत क्या प्रावधान है?

ऐसे किसी माल के, जो माध्यस्थम् करार की विषय-वस्तु है, परिरक्षण, अंतरिम अभिरक्षा या विक्रय के लिए;

माध्यस्थम् में विवादित रकम को प्रतिभूत करने के लिए;

ऐसी किसी संपत्ति या वस्तु को, जो माध्यस्थम् में विवाद की विषय-वस्तु है, या जिसके बारे में उसमें कोई प्रश्न उद्भूत हो सकता है, निरोध, परिरक्षण या निरीक्षण के लिए और पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी के लिए किसी व्यक्ति को किसी पक्षकार में के कब्जे में की किसी भूमि या भवन में प्रवेश करने हेतु प्राधिकृत करने के लिए अथवा ऐसे कोई नमूने लेने याकोई संप्रेक्षण या किसी परीक्षण का प्रयोग करने हेतु, जो संपूर्ण जानकारी या साक्ष्य अभिप्राप्त करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन हो, प्राधिकृत करने के लिए;

अंतरिम व्यादेश या रिसीवर की नियुक्ति के लिए;

संरक्षा के ऐसे अन्य अंतरिम उपाय के लिए, जो माध्यस्थम् अधिकरण को न्यायोचित और सुगम प्रतीत हो, आवेदन कर सकेगा और माध्यस्थम् अधिकरण को आदेश करने की वहीं शक्तियां प्राप्त होंगी जो न्यायालय को उसके समक्ष की किन्ही कार्यवाहीयों के प्रयोजन के लिए या उनके संबंध में प्राप्त हैं।

धारा 17(1) के अनुसार माध्यस्थम् अधिकरण की क्या शक्तियां हैं?

वही शक्तियां जो न्यायालय को उसकी कार्यवाहियों के संबंध में प्राप्त हैं।

धारा 17(2) के अनुसार आदेश की क्या स्थिति होगी?

उसे न्यायालय का आदेश माना जाएगा।

धारा 17(2) के अनुसार आदेश कब प्रवर्तनीय होगा?

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन न्यायालय के आदेश की भांति।

धारा 17(2) किन आदेशों के अधीन है?

धारा 37 के अधीन अपील में पारित आदेशों के अधीन।

धारा 17 को किस अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित किया गया?

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 10 द्वारा।

धारा 17 (1) में किस संशोधन द्वारा शब्दों का लोप किया गया?

2019 के अधिनियम सं० 33 की धारा 4 द्वारा।

 

अध्याय-5

(CHAPTER-V)

माध्यस्थम् कार्यवाहियों का संचालन

(Conduct of arbitral proceedings)

अध्याय 5 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् कार्यवाहियों का संचालन

(Conduct of arbitral proceedings)

धारा 18 का विषय क्या है?

पक्षकारों से समान बर्ताव।

(Conduct of arbitral proceedings)

धारा 18 के अनुसार पक्षकारों के साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा?

समानता का बर्ताव किया जाएगा।

धारा 18 के अनुसार प्रत्येक पक्षकार को क्या अधिकार है?

अपना मामला प्रस्तुत करने का पूर्ण अवसर।

धारा 19 का विषय क्या है?

प्रक्रिया के नियमों का अवधारण।

(Determination of rules of procedure)

धारा 19(1) के अनुसार माध्यस्थम् अधिकरण किन कानूनों से आबद्ध नहीं होगा?

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 से।

धारा 19(2) के अनुसार पक्षकार किस पर करार करने के लिए स्वतंत्र हैं?

कार्यवाहियों के संचालन हेतु अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पर।

धारा 19(3) के अनुसार करार के अभाव में कार्यवाही कैसे संचालित होगी?

माध्यस्थम् अधिकरण अपनी समुचित समझ के अनुसार कार्यवाही संचालित करेगा।

धारा 19(4) के अनुसार माध्यस्थम् अधिकरण की शक्ति में क्या सम्मिलित है?

साक्ष्य की ग्राह्यता, सुसंगता, तात्विकता और महत्व का अवधारण।

धारा 20 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् का स्थान

(Place of arbitration)

धारा 20(1) के अनुसार माध्यस्थम् के स्थान के लिए कौन करार कर सकते हैं?

पक्षकार।

धारा 20(1) के अनुसार पक्षकार किसके लिए स्वतंत्र हैं?

माध्यस्थम् के स्थान के निर्धारण हेतु करार करने के लिए।

धारा 20(2) के अनुसार करार के अभाव में स्थान का निर्धारण कौन करेगा?

माध्यस्थम् अधिकरण।

धारा 20(2) के अनुसार स्थान निर्धारण में किन बातों का ध्यान रखा जाएगा?

मामले की परिस्थितियाँ और पक्षकारों की सुविधा।

धारा 20(3) के अनुसार अधिकरण कहाँ बैठक कर सकता है?

ऐसे किसी स्थान पर जिसे वह समुचित समझे।

धारा 20(3) किन प्रयोजनों के लिए लागू होती है?

परामर्श, साक्षियों/विशेषज्ञों/पक्षकारों को सुनने या निरीक्षण के लिए।

धारा 20(3) में पक्षकारों के करार का क्या प्रभाव है?

यदि पक्षकार अन्यथा करार करें तो यह प्रावधान लागू नहीं होगा।

धारा 21 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् कार्यवाहियों का प्रारम्भ।

(Commencement of arbitral proceedings)

धारा 21 के अनुसार माध्यस्थम् कार्यवाहियां कब प्रारम्भ होती हैं?

जब विवाद को माध्यस्थम् को निर्देशित करने का अनुरोध प्रत्यर्थी द्वारा प्राप्त किया जाता है।

धारा 21 किस स्थिति में लागू होती है?

जब पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार किया गया हो।

धारा 21 के अनुसार प्रारम्भ की तारीख क्या मानी जाएगी?

अनुरोध प्राप्ति की तारीख।

धारा 22 का विषय क्या है?

भाषा

(Language)

धारा 22(1) के अनुसार भाषा पर करार करने के लिए कौन स्वतंत्र हैं?

पक्षकार।

धारा 22(1) के अनुसार करार किस विषय में किया जाता है?

माध्यस्थम् कार्यवाहियों में प्रयोग की जाने वाली भाषा या भाषाओं पर।

धारा 22(2) के अनुसार करार के अभाव में भाषा का निर्धारण कौन करेगा?

माध्यस्थम् अधिकरण।

धारा 22(3) के अनुसार करार या अवधारण किन पर लागू होगा?

लिखित कथन, सुनवाई, पंचाट, विनिश्चय और अन्य संसूचना पर।

धारा 22(3) कब लागू नहीं होगा?

जब अन्यथा विनिर्दिष्ट किया गया हो।

धारा 22(4) के अनुसार माध्यस्थम् अधिकरण क्या आदेश दे सकता है?

दस्तावेजी साक्ष्य के साथ निर्धारित भाषा में अनुवाद प्रस्तुत करने का।

धारा 22(4) के अनुसार अनुवाद किस भाषा में होगा?

पक्षकारों द्वारा करार की गई या माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा अवधारित भाषा में।

धारा 23 का विषय क्या है?

दावा और प्रतिरक्षा के कथन

(Statements of claim and defence)

धारा 23(1) के अनुसार दावेदार क्या प्रस्तुत करेगा?

अपने दावे के समर्थन में तथ्य, विवाद्यक मुद्दे और मांगे गए अनुतोष या उपचार का कथन।

धारा 23(1) के अनुसार प्रत्यर्थी क्या प्रस्तुत करेगा?

दावेदार के कथनों के संबंध में अपनी प्रतिरक्षा का कथन।

धारा 23(1) के अनुसार कथन कब प्रस्तुत किए जाएंगे?

पक्षकारों द्वारा करार की गई या अधिकरण द्वारा अवधारित कालावधि के भीतर।

धारा 23(1) में कथनों के तत्वों के संबंध में अपवाद क्या है?

जब पक्षकारों ने अन्यथा करार किया हो।

धारा 23(2) के अनुसार पक्षकार क्या प्रस्तुत कर सकते हैं?

सुसंगत दस्तावेज या दस्तावेजों/अन्य साक्ष्य का संदर्भ।

धारा 23(2क) के अनुसार प्रत्यर्थी क्या कर सकता है?

प्रतिदावा प्रस्तुत कर सकता है या मुजराई का अभिवाक् कर सकता है।

धारा 23(2क) के अनुसार प्रतिदावा या मुजराई का निर्णय कौन करेगा?

माध्यस्थम् अधिकरण।

धारा 23(2क) किस शर्त पर लागू होती है?

जब प्रतिदावा या मुजराई माध्यस्थम् करार की परिधि में हो।

धारा 23(3) के अनुसार दावे या प्रतिरक्षा में संशोधन कब किया जा सकता है?

माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान।

धारा 23(3) में संशोधन/अनुपूर्ति पर प्रतिबंध क्या है?

जब अधिकरण विलंब को देखते हुए इसे अनुज्ञात करना उचित समझे।

धारा 23(3) में पक्षकारों के करार का क्या प्रभाव है?

यदि अन्यथा करार हो तो प्रावधान लागू नहीं होगा।

धारा 23(4) के अनुसार दावे और प्रतिरक्षा का विवरण कब तक पूरा किया जाएगा?

नियुक्ति के लिखित नोटिस की प्राप्ति से छह माह के भीतर।

धारा 23(4) में नोटिस किसे प्राप्त होना चाहिए?

यथास्थिति मध्यस्थ या सभी मध्यस्थों को।

धारा 23(2क) किस अधिनियम द्वारा अंतःस्थापित की गई?

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 11 द्वारा।

धारा 23(4) किस अधिनियम द्वारा अंतःस्थापित की गई?

2019 के अधिनियम सं० 33 की धारा 4 द्वारा।

धारा 24 का विषय क्या है?

सुनवाई और लिखित कार्यवाहियां

(Hearings and written proceedings)

धारा 24(1) के अनुसार सुनवाई का निर्णय कौन करेगा?

माध्यस्थम् अधिकरण।

धारा 24(1) के अनुसार अधिकरण किन बातों पर निर्णय करेगा?

मौखिक सुनवाई, मौखिक बहस या दस्तावेजों के आधार पर कार्यवाही।

धारा 24(1) के प्रथम परंतुक (प्रोवाइजो) के अनुसार मौखिक सुनवाई कब अनिवार्य है?

जब कोई पक्षकार अनुरोध करे, जब तक कि पक्षकारों ने मौखिक सुनवाई करने का करार किया हो।

धारा 24(1) के द्वितीय परंतुक के अनुसार सुनवाई कैसे की जाएगी?

यथासंभव दिन-प्रतिदिन के आधार पर।

धारा 24(1) के द्वितीय परंतुक के अनुसार स्थगन कब नहीं दिया जाएगा?

बिना पर्याप्त हेतुक के।

धारा 24(1) के द्वितीय परंतुक के अनुसार स्थगन मांगने पर क्या परिणाम हो सकता है?

पक्षकार पर खर्चे, जिसमें निदर्श खर्च भी शामिल है, अधिरोपित किए जा सकते हैं।

धारा 24(2) के अनुसार पक्षकारों को क्या सूचना दी जाएगी?

सुनवाई या निरीक्षण हेतु बैठक की पर्याप्त अग्रिम सूचना।

धारा 24(2) में सूचना किन प्रयोजनों के लिए है?

सुनवाई या दस्तावेजों, माल या संपत्ति के निरीक्षण के लिए।

धारा 24(3) के अनुसार एक पक्ष द्वारा दिए गए कथनों का क्या होगा?

दूसरे पक्षकार को संसूचित किया जाएगा।

धारा 24(3) के अनुसार किन सामग्रियों को संसूचित करना आवश्यक है?

कथन, दस्तावेज, अन्य जानकारी, आवेदन, विशेषज्ञ रिपोर्ट और साक्ष्यिक दस्तावेज।

धारा 24 में द्वितीय परंतुक किस अधिनियम द्वारा जोड़ा गया?

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 12 द्वारा।

धारा 25 का विषय क्या है?

किसी पक्षकार का व्यतिक्रम

(Default of a party)

धारा 25 कब लागू होती है?

जब पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार किया गया हो।

धारा 25 के अनुसार व्यतिक्रम किन स्थितियों में माना जाएगा?

जब पर्याप्त हेतुक दर्शित किए बिना दायित्वों का पालन किया जाए।

धारा 25(क) के अनुसार दावेदार की असफलता का क्या परिणाम होगा?

माध्यस्थम् अधिकरण कार्यवाहियों को समाप्त कर देगा।

धारा 25(क) में दावेदार किसमें असफल होता है?

धारा 23(1) के अनुसार दावे का कथन संसूचित करने में।

धारा 25(ख) के अनुसार प्रत्यर्थी की असफलता का क्या परिणाम होगा?

अधिकरण कार्यवाहियों को जारी रखेगा।

धारा 25(ख) में प्रत्यर्थी किसमें असफल होता है?

धारा 23(1) के अनुसार प्रतिरक्षा का कथन संसूचित करने में।

धारा 25(ख) के अनुसार क्या प्रत्यर्थी की असफलता को स्वीकृति माना जाएगा?

नहीं, इसे दावेदार के अभिकथन की स्वीकृति नहीं माना जाएगा।

धारा 25(ख) के अनुसार अधिकरण का क्या विवेकाधिकार है?

प्रत्यर्थी के प्रतिरक्षा कथन को फाइल करने के अधिकार को समपहृत मान सकता है।

धारा 25(ग) के अनुसार किस स्थिति में कार्यवाही जारी रखी जा सकती है?

जब कोई पक्षकार सुनवाई में उपस्थित होने या साक्ष्य प्रस्तुत करने में असफल हो।

धारा 25(ग) के अनुसार अधिकरण क्या कर सकता है?

उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर माध्यस्थम् पंचाट दे सकता है।

धारा 25 में प्रत्यर्थी के अधिकार के समपहृत होने का प्रावधान किस अधिनियम द्वारा जोड़ा गया?

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 13 द्वारा।

धारा 26 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ

(Expert appointed by arbitral tribunal)

धारा 26(1) के अनुसार जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, माध्यस्थम् अधिकरण—

 

माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा अवधारित किए जाने वाले विनिर्दिष्ट विवाद्यकों पर उसे रिपोर्ट करने के लिए एक या अधिक विशेषज्ञ नियुक्त कर सकेगा; और

किसी पक्षकार से विशेषज्ञ को कोई सुसंगत जानकारी देने या किसी सुसंगत दस्तावेज, माल या अन्य संपत्ति को उसके निरीक्षण के लिए प्रस्तुत करने या उसकी उस तक पहुंच की व्यवस्था करने की अपेक्षा कर सकेगा।

धारा 26(2) के अनुसार विशेषज्ञ कब मौखिक सुनवाई में भाग ले सकता है?

रिपोर्ट देने के पश्चात, यदि पक्षकार अनुरोध करे या अधिकरण आवश्यक समझे।

धारा 26(2) के अनुसार पक्षकारों को क्या अवसर मिलेगा?

विशेषज्ञ से प्रश्न पूछने और विशेषज्ञ साक्ष्य प्रस्तुत करने का।

धारा 26(3) के अनुसार विशेषज्ञ क्या उपलब्ध कराएगा?

अपने कब्जे के दस्तावेज, माल या संपत्ति परीक्षा हेतु।

धारा 26(3) में यह अधिकार किसे है?

किसी पक्षकार के अनुरोध पर।

धारा 27 का विषय क्या है?

साक्ष्य लेने में न्यायालय की सहायता

(Court assistance in taking evidence)

धारा 27(1) के अनुसार माध्यस्थम् अधिकरण या माध्यस्थम् अधिकरण के अनुमोदन से कोई पक्षकार, साक्ष्य लेने में सहायता के लिए आवेदन कर सकेगा-

न्यायालय को

धारा 27(1) के अनुसार आवेदन में विनिर्दिष्ट होगा—

 

पक्षकारों और मध्यस्थों के नाम और पते;

दावे की साधारण प्रकृति और मांगा गया अनुतोष;

अभिप्राप्त किया जाने वाला साक्ष्य, विशिष्टत: -

(i) साक्षी या विशेषज्ञ साक्षी के रूप में सुने जाने वाले किसी व्यक्ति का नाम और पता और अपेक्षित परिसाक्ष्य की विषय-वस्तु का कथन;

(ii) प्रस्तुत किए जाने वाले किसी दस्तावेज और निरीक्षण की जाने वाली संपत्ति का वर्णन

धारा 27(3) के अनुसार न्यायालय क्या कर सकता है?

अनुरोध का निष्पादन कर साक्ष्य सीधे अधिकरण को देने का आदेश।

धारा 27(3) किन सीमाओं के अधीन है?

न्यायालय की सक्षमता और उसके साक्ष्य संबंधी नियमों के अधीन।

धारा 27(4) के अनुसार न्यायालय क्या जारी कर सकता है?

साक्षियों के लिए वैसी ही आदेशिकाएं जो वादों में जारी करता है।

धारा 27(5) के अनुसार आदेशिका का उल्लंघन करने पर क्या परिणाम होगा?

न्यायालय के आदेश द्वारा दण्ड, शास्ति और अलाभों के अधीन।

धारा 27(5) किन स्थितियों में लागू होती है?

हाजिर होने, व्यतिक्रम, साक्ष्य देने से इन्कार या अवमान के मामलों में।

धारा 27(6) के अनुसार “आदेशिका” में क्या सम्मिलित है?

समन, कमीशन और दस्तावेज पेश करने के लिए समन।

 

अध्याय-6

(CHAPTER-VI)

माध्यस्थम् पंचाट का दिया जाना और कार्यवाहियों का समापन

(Making of arbitral award and termination of proceedings)

धारा 28 का विषय क्या है?

विवाद के सार को लागू नियम

(Rules applicable to substance of dispute)

धारा 28(1) कब लागू होती है?

जब माध्यस्थम् का स्थान भारत में स्थित हो।

धारा 28(1)(क) के अनुसार किस प्रकार के माध्यस्थम् में कौन सी विधि लागू होगी?

अन्तरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् से भिन्न मामलों में भारत की मूल विधि।

धारा 28(1)(क) के अनुसार विवाद का विनिश्चय किसके अनुसार होगा?

भारत में तत्समय प्रवृत्त मूल विधि के अनुसार।

धारा 28(1)(ख) किन मामलों पर लागू होता है?

अन्तरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् पर।

धारा 28(1)(ख) अन्तरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में,—

माध्यस्थम् अधिकरण, विवाद का विनिश्चय विवाद के सार को लागू, पक्षकारों द्वारा अभिहित विधि के नियमों के अनुसार करेगा;

पक्षकारों द्वारा किसी देश विशेष की विधि या विधिक प्रणाली के किसी अभिद्यान का, जब तक कि अन्यथा अभिव्यक्त हो, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह प्रत्यक्षतः उस देश की मौलिक विधि के प्रति कि उसके विधि-संघर्ष नियमों के प्रति निर्देश है;

पक्षकारों द्वारा खंड () के अधीन विधि का कोई अभिधान करने पर माध्यस्थम् अधिकरण, उस विधि के नियमों को लागू करेगा जिसे वह विवाद की सभी विद्यमान परिवर्ती परिस्थितियों में समुचित समझे।

धारा 28(2) के अनुसार न्यायसंगत आधार पर निर्णय कब किया जाएगा?

जब पक्षकारों द्वारा स्पष्ट रूप से प्राधिकृत किया गया हो।

धारा 28(2) के अनुसार अधिकरण किस रूप में कार्य कर सकता है?

सुलहकर्ता के रूप में।

धारा 28(3) के अनुसार निर्णय करते समय क्या ध्यान रखा जाएगा?

संविदा के निबंधन और लागू व्यापार प्रथाएं।

धारा 28(3) किस अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित की गई?

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 14 द्वारा।

धारा 29 का विषय क्या है?

मध्यस्थों के पैनल द्वारा विनिश्चय किया जाना

(Decision making by panel of arbitrators)

धारा 29(1) किन कार्यवाहियों पर लागू होती है?

जिनमें एक से अधिक मध्यस्थ हों।

धारा 29(1) के अनुसार विनिश्चय कैसे किया जाएगा?

माध्यस्थम् अधिकरण के सभी सदस्यों के बहुमत से।

धारा 29(2) के अनुसार प्रक्रिया संबंधी प्रश्न कौन विनिश्चित कर सकता है?

पीठासीन मध्यस्थ।

धारा 29(2) के अनुसार पीठासीन मध्यस्थ को प्राधिकरण कौन दे सकता है?

पक्षकार या माध्यस्थम् अधिकरण के सभी सदस्य।

धारा 29 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् पंचाट की समय-सीमा

(Time limit for arbitral award)

धारा 29क(1) कब लागू होती है?

अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् से भिन्न मामलों में।

धारा 29क(1) के अनुसार पंचाट कब किया जाएगा?

धारा 23(4) के अधीन अभिवाकों के पूरा होने की तारीख से 12 मास के भीतर।

धारा 29क(1) का प्रावधान अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में क्या है?

पंचाट यथाशीघ्र किया जाएगा और 12 मास में निपटाने का प्रयास होगा।

धारा 29क(1) का स्पष्टीकरण क्या है?

निर्देश ग्रहण की तारीख वह है जब मध्यस्थ/मध्यस्थों को नियुक्ति की लिखित सूचना प्राप्त हो।

धारा 29क(2) के अनुसार अतिरिक्त फीस कब देय होगी?

जब पंचाट निर्देश ग्रहण की तारीख से 6 मास के भीतर किया जाए।

धारा 29क(2) के अनुसार अतिरिक्त फीस कितनी होगी?

जितनी पक्षकारों के बीच करार पाई जाए।

धारा 29क(3) के अनुसार समय-सीमा का विस्तार कौन कर सकता है?

पक्षकार आपसी सम्मति से।

धारा 29क(3) के अनुसार विस्तार की अवधि कितनी हो सकती है?

6 मास से अनधिक।

धारा 29क(4) के अनुसार समय-सीमा में पंचाट न होने पर क्या होगा?

मध्यस्थ का अधिदेश पर्यवसित हो जाएगा।

धारा 29क(4) के अनुसार विलंब अधिकरण के कारण होने पर क्या होगा?

फीस में प्रति मास 5% तक की कटौती की जा सकती है।

धारा 29क(4) के अनुसार लंबित आवेदन का क्या प्रभाव होगा?

आवेदन के निपटारे तक अधिदेश जारी रहेगा।

धारा 29क(4) के अनुसार फीस कटौती से पूर्व क्या आवश्यक है?

मध्यस्थ को सुनवाई का अवसर।

धारा 29क(5) के अनुसार अवधि का विस्तार कौन करेगा?

न्यायालय।

धारा 29क(5) के अनुसार विस्तार कब किया जाएगा?

पर्याप्त कारण होने पर और शर्तों के अधीन।

धारा 29क(6) के अनुसार न्यायालय क्या कर सकता है?

एक या सभी मध्यस्थों को प्रतिस्थापित कर सकता है।

धारा 29क(6) के अनुसार प्रतिस्थापन पर कार्यवाही कैसे चलेगी?

उसी प्रक्रम से और पूर्व साक्ष्य के आधार पर।

धारा 29क(6) में नए मध्यस्थ के बारे में क्या माना जाएगा?

उसे पूर्व साक्ष्य और सामग्री प्राप्त हो गई है।

धारा 29क(7) के अनुसार पुनर्गठित अधिकरण की कार्यवाही क्या मानी जाएगी?

पूर्व अधिकरण की क्रमागत कार्यवाही।

धारा 29क(8) के अनुसार न्यायालय क्या अधिरोपित कर सकता है?

वास्तविक या निदर्श खर्च।

धारा 29क(9) के अनुसार आवेदन का निपटारा कब तक करने का प्रयास होगा?

सूचना की तामील से 60 दिन के भीतर।

धारा 29क को किस अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित किया गया?

2019 के अधिनियम सं० 33 की धारा 6 द्वारा।

धारा 29क(1) को किस अधिनियम द्वारा अंतःस्थापित किया गया?

2016 के अधिनियम सं० 33 की धारा 15 द्वारा।

धारा 29क(4) के दूसरे परन्तुक को किस संशोधन द्वारा जोड़ा गया?

2019 के अधिनियम सं0 33 की धारा 6 द्वारा अंतःस्थापित

 

धारा 29 का विषय क्या है?

त्वरित प्रक्रिया

(Fast Track Procedure)

इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी पक्षकार क्या कर सकते हैं?

त्वरित प्रक्रिया द्वारा विवाद समाधान हेतु लिखित करार कर सकते हैं।

पक्षकार त्वरित प्रक्रिया हेतु कब करार कर सकते हैं?

माध्यस्थम् अधिकरण की नियुक्ति के पूर्व या के समय या किसी भी प्रक्रम पर।

त्वरित प्रक्रिया अपनाने के लिए करार का स्वरूप क्या होना चाहिए?

लिखित में होना चाहिए।

त्वरित प्रक्रिया के अंतर्गत पक्षकार अधिकरण की संरचना के बारे में क्या सहमति कर सकते हैं?

अधिकरण में एकल मध्यस्थ होगा।

धारा 29ख (1) के अधीन कार्यवाही में अधिकरण किस प्रक्रिया का पालन करेगा?

धारा 29 (3) में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया का।

त्वरित प्रक्रिया में विवाद का निर्णय किस आधार पर किया जाएगा?

लिखित अभिवाकों, दस्तावेजों और निवेदनों के आधार पर।

क्या त्वरित प्रक्रिया में मौखिक सुनवाई आवश्यक है?

नहीं, बिना मौखिक सुनवाई के निर्णय किया जाएगा।

मौखिक सुनवाई कब की जा सकती है?

जब सभी पक्षकार अनुरोध करें या अधिकरण आवश्यक समझे।

मौखिक सुनवाई होने पर अधिकरण को क्या छूट है?

तकनीकी औपचारिकताओं से अभिमुक्ति देने की।

मौखिक सुनवाई में अधिकरण कैसी प्रक्रिया अपनाएगा?

शीघ्र निपटारे के लिए उपयुक्त प्रक्रिया।

धारा 29 के अधीन पंचाट कब तक किया जाना चाहिए?

छह मास के भीतर।

यदि छह मास में पंचाट नहीं होता तो क्या होगा?

धारा 29 की उपधारा (3) से (9) के उपबंध लागू होंगे।

मध्यस्थ की फीस कैसे निर्धारित होगी?

मध्यस्थ और पक्षकारों के बीच करार से।

धारा 30 का विषय क्या है?

समझौता

(Settlement)

माध्यस्थम् अधिकरण कब समझौता प्रोत्साहित कर सकता है?

कार्यवाहियों के दौरान किसी भी समय।

समझौता प्रोत्साहित करने के लिए अधिकरण किन प्रक्रियाओं का प्रयोग कर सकता है?

मध्यस्थता, सुलह या अन्य प्रक्रियाएं।

यदि कार्यवाहियों के दौरान पक्षकार विवाद तय कर लेते हैं तो अधिकरण क्या करेगा?

कार्यवाहियों का समापन करेगा।

समझौते के बाद अधिकरण कब उसे पंचाट के रूप में अभिलिखित करेगा?

जब पक्षकार अनुरोध करें और अधिकरण को कोई आक्षेप हो।

समझौते को किस आधार पर अभिलिखित किया जाएगा?

करार पाए गए निबंधनों पर।

करार पाए गए निबंधनों पर पंचाट किस धारा के अनुसार दिया जाएगा?

धारा 31 के अनुसार।

करार पाए गए निबंधनों पर पंचाट की प्रास्थिति क्या होगी?

वही जो विवाद के सार पर अन्य पंचाट की होती है।

धारा 31 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् पंचाट का प्ररूप और उसकी विषय-वस्तु

(Form and contents of arbitral award)

माध्यस्थम् पंचाट किस रूप में दिया जाएगा?

लिखित में।

माध्यस्थम् पंचाट पर किसके हस्ताक्षर होंगे?

माध्यस्थम् अधिकरण के सदस्यों के।

एक से अधिक मध्यस्थ होने पर कितने हस्ताक्षर पर्याप्त होंगे?

बहुमत के हस्ताक्षर।

माध्यस्थम् पंचाट में क्या अभिकथित होना चाहिए?

वे कारण जिन पर पंचाट आधारित है।

किस स्थिति में कारण देना आवश्यक नहीं है?

जब पक्षकार सहमत हों कि कारण नहीं दिए जाएंगे।

जब पंचाट धारा 30 के अधीन समझौते पर आधारित हो।

माध्यस्थम् पंचाट में कौन-सी तारीख और स्थान अभिकथित होगी?

धारा 20 के अनुसार अवधारित उसकी तारीख और माध्यस्थम् का स्थान अभिकथित होगा और पंचाट उस स्थान पर दिया गया समझा जाएगा।

पंचाट दिए जाने के बाद क्या किया जाएगा?

प्रत्येक पक्षकार को हस्ताक्षरित प्रति दी जाएगी।

अधिकरण अंतरिम पंचाट कब दे सकता है?

माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान किसी भी समय, ऐसे किसी विषय पर जिस पर कि वह अंतिम माध्यस्थम् पंचाट दे सकता है, अंतरिम पंचाट दे सकेगा।

धन संबंधी पंचाट में ब्याज कब जोड़ा जा सकता है?

पंचाट की तारीख तक की अवधि के लिए।

ब्याज किस पर लगाया जा सकता है?

संपूर्ण धन या उसके किसी भाग पर।

ब्याज की दर कौन निर्धारित करेगा?

माध्यस्थम् अधिकरण जैसा उचित समझे।

पंचाट द्वारा निर्देशित राशि पर पश्चात ब्याज की दर क्या होगी?

वर्तमान दर से 2% अधिक।

पश्चात ब्याज किस अवधि के लिए लागू होगा?

पंचाट की तारीख से भुगतान की तारीख तक।

"ब्याज की वर्तमान दर" का अर्थ क्या है?

ब्याज अधिनियम, 1978 की धारा 2() के अनुसार।

माध्यस्थम् का खर्च कौन निर्धारित करेगा?

माध्यस्थम् अधिकरण।

माध्यस्थम् का खर्च किस धारा के अनुसार निर्धारित होगा?

धारा 31 के अनुसार।

धारा 31क का विषय क्या है?

खर्चों के लिए शासनतंत्र

(Regime for Costs)

किसके पास खर्चों के निर्धारण का विवेकाधिकार है?

न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण।

किसी माध्यस्थम् कार्यवाही या इस अधिनियम के उपबंधों में से किसी उपबंध के अधीन माध्यस्थम् से तात्पर्यित किसी कार्यवाही के संबंध में, न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किन बातो का अवधारण करने का विवेकाधिकार होगा?

क्या एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार को खर्च संदेय हैं,

ऐसे खर्चों की रकम, और

ऐसे खर्चों का संदाय कब किया जा जाना है।

 

स्पष्टीकरण के अनुसार “खर्चों” में क्या शामिल है?

मध्यस्थों, न्यायालयों और साक्षियों की फीस और व्यय;

विधिक फीस और व्ययः

माध्यस्थम् का पर्यवेक्षण करने वाली संस्था की कोई प्रशासनिक फीस; और

माध्यस्थम् या न्यायालय की कार्यवाहियों और माध्यस्थम् पंचाट के संबंध में उपगत कोई अन्य व्यय

यदि न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण खर्चों के संदाय के बारे में कोई आदेश करने का विनिश्चय करता है तो —

 

साधारण नियम यह है कि असफल पक्षकार को खर्चों का संदाय सफल पक्षकार को करने का आदेश दिया जाएगा; या

न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से कोई भिन्न आदेश किया जा सकेगा

न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण, खर्चों का अवधारण करने में सभी परिस्थितियों का ध्यान रखेगा, जिनके अंतर्गत हैं -

 

सभी पक्षकारों का आचरण;

क्या पक्षकार मामले में भागतः सफल हुआ है;

क्या ऐसा कोई तुच्छ प्रतिदावा किया गया था जिसके कारण माध्यस्थम् की कार्यवाहियां में विलंब हुआ है; और

क्या विवाद का निपटारा करने के लिए कोई युक्तियुक्त प्रस्ताव एक पक्षकार द्वारा किया गया है और दूसरे पक्षकार द्वारा उससे इंकार कर दिया गया है।

न्यायालय या माध्यस्थम् अधिकरण इस धारा के अधीन कोई आदेश कर सकेगा जिसके अंतर्गत ऐसा आदेश भी है कि पक्षकार संदाय करेगा: -

 

दूसरे पक्षकार के कोई आनुपातिक खर्चे;

दूसरे पक्षकार के खर्चों के संबंध में कथित कोई रकम;

केवल एक निश्चित तारीख से या एक निश्चित तारीख तक के खर्चे;

कार्यवाहियों के आरंभ होने के पूर्व उपगत खर्चे;

कार्यवाहियों में किए गए विशिष्ट उपायों से संबंधित खर्चे

कार्यवाहियों के केवल किसी सुभिन्न भाग से संबंधित खर्चे; और

एक निश्चित तारीख से या एक निश्चित तारीख तक के खर्चों पर ब्याज

 

ऐसा करार, जिसका प्रभाव यह है कि पक्षकार को माध्यस्थम् के संपूर्ण खर्चा या उसके भाग का किसी भी दशा में संदाय करना होगा केवल तभी विधिमान्य होगा-

यदि ऐसा करार प्रश्नगत विवाद के उद्भूत होने के पश्चात् किया जाता है

धारा 32 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् कार्यवाहियों का समापन।

(Termination of proceedings)

माध्यस्थम् कार्यवाहियों का समापन कैसे होता है?

अंतिम माध्यस्थम् पंचाट या धारा 32(2) के अधीन  अधिकरण के आदेश द्वारा।

माध्यस्थम् अधिकरण, माध्यस्थम् कार्यवाहियों के समापन का वहां आदेश देगा, जहां—

दावेदार अपने दावे को, जब तक कि प्रत्यर्थी आदेश पर आक्षेप नहीं करता है और विवाद का अंतिम परिनिर्धारण अभिप्राप्त करने में माध्यस्थम् अधिकरण उसके विधिसम्मत हितों को मान्यता नहीं देता है, प्रत्याहृत कर लेता है;

पक्षकार कार्यवाहियों के समापन के लिए सहमत हो जाते हैं; या

माध्यस्थम् अधिकरण का यह निष्कर्ष है कि कार्यवाहियों का जारी रखना, अन्य किसी कारण से अनावश्यक या असंभव हो गया है।

कार्यवाहियों को अनावश्यक या असंभव कौन घोषित करता है?

माध्यस्थम् अधिकरण।

अधिकरण की समाज्ञा कब समाप्त होती है?

कार्यवाहियों के समापन के साथ।

समाज्ञा के अंत पर कौन-सी धाराएं अपवाद हैं?

धारा 33 और धारा 34(4)

धारा 33 का विषय क्या है?

पंचाट का सुधार, निर्वचन और अतिरिक्त पंचाट।

(Correction and interpretation of award; additional award)

पंचाट के सुधार या निर्वचन हेतु आवेदन की समय सीमा क्या है?

पंचाट की प्राप्ति से 30 दिन के भीतर।

जब तक कि पक्षकार अन्य समयाविधि के लिए सहमत न हुए हों, माध्यस्थम् पंचाट की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर-

कोई पक्षकार, दूसरे पक्षकार को सूचना देकर माध्यस्थम् पंचाट में हुई किसी संगणना की गलती, किसी लिपिकीय या टंकण संबंधी या उसी प्रकृति की किसी अन्य गलती का सुधार करने के लिए माध्यस्थम् अधिकरण से अनुरोध कर सकेगा, और

यदि पक्षकार इसके लिए सहमत हों तो कोई पक्षकार, दूसरे पक्षकार को सूचना देकर, पंचाट की किसी विनिर्दिष्ट बात या भाग का निर्वचन करने के लिए, माध्यस्थम् अधिकरण से अनुरोध कर सकेगा

अधिकरण सुधार या निर्वचन कब करेगा?

अनुरोध की प्राप्ति से 30 दिन के भीतर।

निर्वचन का क्या प्रभाव होगा?

वह पंचाट का भाग होगा।

क्या अधिकरण स्वयं त्रुटि सुधार सकता है?

हाँ, स्वप्रेरणा से।

स्वप्रेरणा से सुधार की समय सीमा क्या है?

पंचाट की तारीख से 30 दिन के भीतर।

अतिरिक्त पंचाट हेतु आवेदन कब किया जा सकता है?

पंचाट की प्राप्ति से 30 दिन के भीतर।

अतिरिक्त पंचाट किन मामलों में मांगा जा सकता है?

उन दावों के लिए जिन पर पंचाट में निर्णय नहीं हुआ।

अतिरिक्त पंचाट हेतु आवेदन कैसे किया जाएगा?

दूसरे पक्षकार को सूचना देकर।

अधिकरण अतिरिक्त पंचाट कब देगा?

अनुरोध की प्राप्ति से 60 दिन के भीतर।

क्या अधिकरण समयावधि बढ़ा सकता है?

हाँ, आवश्यक होने पर।

समयावधि किन उपधाराओं के लिए बढ़ाई जा सकती है?

धारा 33 (2) और (5) के लिए।

धारा 31 का प्रयोग किन पर होगा?

सुधार, निर्वचन और अतिरिक्त पंचाट पर।

 

अध्याय-7

(CHAPTER-VII)

माध्यस्थम् पंचाट के विरुद्ध उपाय

(Recourse against arbitral award)

धारा 34 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् पंचाट को अपास्त करने के लिए आवेदन।

(Application for setting aside arbitral award)

माध्यस्थम् पंचाट के विरुद्ध न्यायालय का आश्रय कैसे लिया जा सकता है?

केवल अपास्त करने के लिए आवेदन द्वारा।

अपास्त करने का आवेदन किन उपधाराओं के अनुसार होगा?

उपधारा (2) या (3) के अनुसार।

कोई माध्यस्थम् पंचाट न्यायालय द्वारा तभी अपास्त किया जा सकेगा, यदि आवेदन करने वाला पक्षकार मध्यस्थ अधिकरण के अभिलेख के आधार पर यह सिद्ध करता है कि —

कोई पक्षकार किसी असमर्थता से ग्रस्त था, या

माध्यस्थम् करार उस विधि के, जिसके अधीन पक्षकारों ने उसे किया है या इस बारे में कोई संकेत होने पर, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन विधिमान्य नहीं है; या

आवेदन करने वाले पक्षकार को, मध्यस्थ की नियुक्ति की या माध्यस्थम् कार्यवाहियों की उचित सूचना नहीं दी गई थी, या वह अपना मामला प्रस्तुत करने में अन्यथा असमर्थ था; या

माध्यस्थम् पंचाट ऐसे विवाद से संबंधित है जो अनुध्यात नहीं किया गया है या माध्यस्थम् के लिए निवेदन करने के लिए रख गए निबंधनों के भीतर नहीं आता है या उसमें ऐसी बातों के बारे में विनिश्चय है जो माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत विषयक्षेत्र से बाहर है:

परन्तु यदि, माध्यस्थम् के लिए निवेदित किए गए विषयों पर विनिश्चयों को उन विषयों के बारे में किए गए विनिश्चयों से पृथक् किया जा सकता है, जिन्हें निवेदित नहीं किया गया है, तो माध्यस्थम् पंचाट के केवल उस भाग को, जिसमें माध्यस्थम् के लिए निवेदित किए गए विषयों पर विनिश्चय है, अपास्त किया जा सकेगा; या

माध्यस्थम् अधिकरण की संरचना या माध्यस्थम् प्रक्रिया, पक्षकारों के करार के अनुसार नहीं थी, जब तक कि ऐसा करार इस भाग के उपबंधों के विरोध में हो और जिससे पक्षकार नहीं हट सकते थे, या ऐसे करार के अभाव में, इस भाग के अनुसार नहीं थी |

कोई माध्यस्थम् पंचाट न्यायालय द्वारा तभी अपास्त किया जा सकेगा, यदि न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि

विवाद के विषय-वस्तु, तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा निपटाए जाने योग्य नहीं हैं ; या

माध्यस्थम् पंचाट भारत की लोक नीति के विरुद्ध है।

किसी शंका को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि कोई भी पंचाट भारत की लोक नीति के विरुद्ध केवल तभी होगा, यदि—

पंचाट का किया जाना कपट या भ्रष्टाचार द्वारा उत्प्रेरित है या प्रभावित किया गया है अथवा वह धारा 75 या धारा 81 के अतिक्रमण में है; या

वह नैतिकता या न्याय की अत्यंत आधारभूत धारणा के विरोध में है।

धारा 34 का स्पष्टीकरण – 1 प्रतिस्थापित किया गया-

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 18 द्वारा प्रतिस्थापित।

क्या मूलभूत नीति के उल्लंघन की जांच में पुनर्विलोकन आवश्यक है?

नहीं।

अपास्त करने के लिए कोई आवेदन, उस तारीख से, जिसको आवेदन करने वाले पक्षकार ने माध्यस्थम् पंचाट प्राप्त किया था, या यदि अनुरोध धारा 33 के अधीन किया गया है तो उस तारीख से, जिसको माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा अनुरोध का निपटारा किया गया था,-

तीन मास के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा

धारा 33 के अनुरोध के बाद समय सीमा कब से गिनी जाएगी?

अनुरोध के निपटारे की तारीख से।

जहां न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक उक्त तीन मास की अवधि के भीतर आवेदन करने से पर्याप्त कारणों से निवारित किया गया था तो क्या वह की अतिरिक्त अवधि में आवेदन ग्रहण कर सकेगा ?

हाँ, 30 दिन तक,

किन्तु इसके पश्चात् नहीं

धारा 34 में आवेदन का निपटारा कब तक होगा?

एक वर्ष के भीतर।

 

अध्याय-8

(CHAPTER VII)

माध्यस्थम् पंचाटों को अंतिमता और उनका प्रवर्तन

(Finality and enforcement of arbitral awards)

धारा 35 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् पंचाटों की अंतिमता

(Finality of arbitral awards)

भाग के अधीन माध्यस्थम् पंचाट की स्थिति क्या है?

अंतिम होगा।

माध्यस्थम् पंचाट किन पर बाध्यकारी होगा?

पक्षकारों पर।

क्या पंचाट पक्षकारो के आलावा अन्य व्यक्तियों पर भी बाध्यकारी होता है?

हाँ, उनके अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों पर।

धारा 36 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् पंचाट का प्रवर्तन

(Enforcement)

पंचाट कब प्रवर्तनीय होगा?

जब धारा 34 के अधीन आवेदन का समय समाप्त हो जाए।

पंचाट का प्रवर्तन किस प्रकार होगा?

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अनुसार।

पंचाट को किसके समान प्रवर्तित किया जाएगा?

न्यायालय की डिक्री के समान।

क्या धारा 34 के अंतर्गत आवेदन दाखिल होने मात्र से पंचाट अप्रवर्तनीय हो जाता है?

नहीं।

पंचाट कब अप्रवर्तनीय होगा?

जब न्यायालय प्रवर्तन पर रोकादेश दे।

धारा 36 में न्यायालय कब रोकादेश दे सकता है?

धारा 36 (3) के अनुसार और कारण लेखबद्ध कर।

रोकादेश किन शर्तों पर दिया जा सकता है?

न्यायालय द्वारा उपयुक्त समझी गई शर्तों पर।

धन संबंधी पंचाट में रोक देते समय न्यायालय क्या ध्यान रखेगा?

सिविल प्रक्रिया संहिता के डिक्री संबंधी प्रावधानों का।

किस स्थिति में न्यायालय बिना शर्त रोक लगाएगा?

जब प्रथमदृष्टया कपट या भ्रष्टाचार का मामला हो।

कपट या भ्रष्टाचार किनसे संबंधित हो सकता है?

माध्यस्थम् करार/संविदा या पंचाट का दिया जाना।

धारा 36 में रोक कब तक लागू रहेगी?

धारा 34 के आवेदन के निपटान तक।

धारा 36 में स्पष्टीकरण के अनुसार , माध्यमस्थम् कार्यवाहियों से उद्भूत या उसके संबंध में इस बात का विचार किए बिना कि माध्यमस्थम् या न्यायालय कार्यवाहियां, माध्यस्थम् और सुलह (संशोधन) अधिनयम, 2015 (2016 का 3 ) के प्रारंभ होने से पहले या उसके पश्चात् प्रारंभ हुई थी, यह प्रावधान किन मामलों पर लागू होगा?

सभी न्यायालय मामलों पर।

 

अध्याय-9

(CHAPTER-IX)

अपीलें

(Appeals)

धारा 37 का विषय क्या है?

अपीलनीय आदेश

(Appealable orders)

क्या अन्य विधियों के बावजूद इस धारा का प्रभाव लागू होता है?

हाँ।

किस प्रकार के आदेशों से अपील की जा सकती है?

केवल इस धारा में निर्दिष्ट आदेशों से।

धारा 8 के अधीन माध्यस्थम् के लिए पक्षकारों को निर्दिष्ट करने से इंकार करना, धारा 9 के अधीन किसी उपाय को मंजूर करना या मंजूर करने से इंकार करना, धारा 34 के अधीन माध्यस्थम् पंचाट को अपास्त करना या अपास्त करने से इंकार करना, आदेशों] से कोई अपील उस न्यायालय में होगी जो

उस न्यायालय में जो मूल डिक्री से अपील सुनने के लिए प्राधिकृत है।

 

माध्यस्थम् अधिकरण के किन आदेशों से अपील होगी?

धारा 16(2)/(3) और धारा 17 के आदेशों से।

क्या इस धारा के अधीन द्वितीय अपील संभव है?

नहीं।

क्या उच्चतम न्यायालय में अपील का अधिकार प्रभावित होता है?

नहीं।

 

अध्याय-10

(CHAPTER-X)

प्रकीर्ण

(Miscellaneous)

धारा 38 का विषय क्या है?

निक्षेप (Deposit) से संबंधित प्रावधान।

माध्यस्थम् अधिकरण निक्षेप किस लिए निर्धारित करता है?

धारा 31(8) के अंतर्गत खर्च के अग्रिम हेतु।

निक्षेप की राशि किस आधार पर तय होती है?

अपेक्षित खर्च के आधार पर।

क्या अधिकरण अनुपूरक निक्षेप भी निर्धारित कर सकता है?

हाँ।

दावे और प्रतिदावे की स्थिति में क्या किया जा सकता है?

पृथक् निक्षेप निर्धारित किया जा सकता है।

धारा 38 (1) में निर्दिष्ट निक्षेप का भुगतान कौन करेगा?

पक्षकारों द्वारा बराबर हिस्सों में संदेय होगा

यदि कोई पक्षकार अपना हिस्सा नहीं देता तो क्या होगा?

दूसरा पक्षकार उसका भुगतान कर सकता है।

यदि दूसरा पक्षकार भी भुगतान नहीं करता तो क्या होगा?

कार्यवाही निलंबित या समाप्त की जा सकती है।

 कार्यवाहियों के समापन पर माध्यस्थम् अधिकरण प्राप्त निक्षेपों का पक्षकारों को हिसाब देगा और किसी व्यय न किए गए अतिशेष को, यथास्थिति, पक्षकार या पक्षकारों को वापस करेगा-

माध्यस्थम्

धारा 39 का विषय क्या है?

खर्च की बाबत माध्यस्थम् पंचाट और निक्षेप पर धारणाधिकार।

(Lien on arbitral award and deposits as to costs)

माध्यस्थम् अधिकरण को किस पर धारणाधिकार होता है?

माध्यस्थम् पंचाट पर।

यदि अधिकरण खर्च के बिना पंचाट देने से इंकार करता है तो क्या उपाय है?

न्यायालय में आवेदन।

न्यायालय जमा राशि के संबंध में क्या कर सकता है?

उचित राशि अधिकरण को और शेष आवेदक को लौटाने का आदेश।

धारा 39 (2) के अधीन आवेदन कौन कर सकता है?

कोई पक्षकार।

क्या अधिकरण को सुनवाई का अधिकार है?

हाँ।

धारा 39 (2) का आवेदन कब किया जा सकता है?

जब फीस लिखित करार से निर्धारित हो।

यदि पंचाट में खर्च का पर्याप्त प्रावधान नहीं है तो क्या होगा?

न्यायालय आदेश देगा।

धारा 40 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् करार का पक्षकार की मृत्यु के कारण प्रभाव।

(Arbitration agreement not to be discharged by death of party thereto)

क्या माध्यस्थम् करार पक्षकार की मृत्यु से समाप्त होता है?

नहीं।

मृत्यु के बाद करार किसके विरुद्ध या द्वारा प्रवर्तनीय होगा?

विधिक प्रतिनिधि के द्वारा या उसके विरुद्ध।

क्या मध्यस्थ का आदेश पक्षकार की मृत्यु से समाप्त होता है?

नहीं।

किसकी मृत्यु से मध्यस्थ का आदेश प्रभावित नहीं होता?

जिस पक्षकार ने उसे नियुक्त किया था।

किस स्थिति में कार्रवाई का अधिकार समाप्त हो सकता है?

जब अन्य विधि के अनुसार मृत्यु से अधिकार समाप्त हो।

धारा 41 का विषय क्या है?

दिवाले की दशा में उपबंध

(Provisions in case of insolvency)

धारा 41(1) कब लागू होती है?

जब किसी संविदा का कोई पक्षकार दिवालिया हो और संविदा में माध्यस्थम् का निबंधन हो।

धारा 41(1) के अंतर्गत जहां किसी संविदा में, जिसका कोई पक्षकार दिवालिया हो, किसी निबंधन द्वारा यह उपबंधित हो कि उससे या उसके संबंध में पैदा होने वाला कोई विवाद माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत किया जाएगा वहां-

यदि रिसीवर संविदा अंगीकृत कर ले तो उक्त निबंधन जहां तक वह ऐसे किसी विवाद से संबंधित हो, रिसीवर के द्वारा या उसके विरुद्ध प्रवर्तनीय होगा

 

धारा 41(2) कब लागू होती है?

जब दिवालिया व्यक्ति दिवाले की कार्यवाही प्रारम्भ होने से पूर्व माध्यस्थम् करार का पक्षकार हो।

धारा 41(2) के अंतर्गत अतिरिक्त आवश्यक शर्त क्या है?

ऐसे विषय का अवधारण आवश्यक हो जो करार के अधीन हो और दिवाले की कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित हो।

धारा 41(2) कब लागू नहीं होती?

जब मामला धारा 41 उपधारा (1) के अंतर्गत आता हो।

धारा 41(2) के अंतर्गत आवेदन कौन कर सकता है?

कोई अन्य पक्षकार या रिसीवर।

धारा 41(2) के अंतर्गत आवेदन किसके समक्ष किया जाता है?

दिवाले की कार्यवाही में अधिकारिता रखने वाले न्यायिक प्राधिकारी के समक्ष।

धारा 41(2) के अंतर्गत न्यायिक प्राधिकारी कब आदेश देगा?

जब वह सभी परिस्थितियों को देखते हुए यह राय बनाए कि मामला माध्यस्थम् द्वारा अवधारित किया जाना चाहिए।

धारा 41(3) के अनुसार "रिसीवर" में क्या सम्मिलित है?

शासकीय समनुदेशिती।

धारा 42 का विषय क्या है?

अधिकारिता

(Jurisdiction)

धारा 42 किस पर लागू होती है?

इस भाग के अधीन माध्यस्थम् करार से संबंधित आवेदनों पर।

धारा 42 का प्रभाव अन्य विधियों पर क्या है?

तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या इस भाग में अन्यत्र निहित बातों के होते हुए भी लागू होती है।

धारा 42 के अनुसार अधिकारिता कब निर्धारित होती है?

जब किसी माध्यस्थम् करार की बाबत इस भाग के अधीन कोई आवेदन किसी न्यायालय में किया जाता है।

धारा 42 के अनुसार क्या अन्य न्यायालयों में कार्यवाही की जा सकती है?

नहीं, अन्य किसी न्यायालय में नहीं।

धारा 42 का विषय क्या है?

सूचना की गोपनीयता

(Confidentiality of information)

धारा 42क का प्रभाव अन्य विधियों पर क्या है?

तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी लागू होती है।

धारा 42क के अंतर्गत किन पर गोपनीयता बनाए रखने का दायित्व है?

मध्यस्थ, माध्यस्थम् संस्था और पक्षकार।

धारा 42क के अंतर्गत किसकी गोपनीयता बनाए रखी जाएगी?

सभी माध्यस्थम् कार्यवाहियों की।

धारा 42क के अनुसार गोपनीयता कब तक बनाए रखी जाएगी?

पंचाट के समय तक।

धारा 42क के अंतर्गत गोपनीयता के अपवाद क्या हैं?

जब प्रकटन पंचाट के कार्यान्वयन और प्रवर्तन के प्रयोजन के लिए आवश्यक हो।

धारा 42क कब अधिनियम में जोड़ी गई?

2019 के अधिनियम सं० 33 की धारा 9 द्वारा।

धारा 42 का विषय क्या है?

सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई का संरक्षण।

(Protection of action taken in good faith)

धारा 42ख किस अधिनियम या नियमों के अंतर्गत लागू होती है?

इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन।

धारा 42ख के अंतर्गत किस प्रकार की कार्रवाई को संरक्षण प्राप्त है?

सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित कार्रवाई।

धारा 42ख के अंतर्गत किसके विरुद्ध वाद या विधिक कार्यवाही नहीं होगी?

मध्यस्थ के विरुद्ध।

धारा 43 का विषय क्या है?

परिसीमाएं

(Limitations)

धारा 43(1) के अनुसार परिसीमा अधिनियम, 1963 किस पर लागू होता है?

माध्यस्थमों पर वैसे ही जैसे न्यायालय की कार्यवाहियों पर लागू होता है।

धारा 43(2) के अनुसार माध्यस्थम् कब प्रारम्भ हुआ समझा जाएगा?

धारा 21 में निर्दिष्ट तारीख को।

धारा 43(2) का प्रयोजन किनके लिए है?

इस धारा और परिसीमा अधिनियम, 1963 के प्रयोजनों के लिए।

धारा 43(3) कब लागू होती है?

जब माध्यस्थम् करार में यह उपबंध हो कि नियत समय में कार्यवाही प्रारम्भ होने पर दावा वर्जित होगा।

धारा 43(3) के अंतर्गत न्यायालय को किस स्थिति में हस्तक्षेप का अधिकार है?

जब मामले की परिस्थितियों में अन्यथा असम्यक् कठिनाई होगी।

धारा 43(3) के अंतर्गत न्यायालय क्या कर सकता है?

समय को ऐसी अवधि के लिए विस्तारित कर सकता है जितनी वह उचित समझे।

धारा 43(3) के अंतर्गत न्यायालय समय विस्तार किन शर्तों पर कर सकता है?

न्याय के लिए अपेक्षित निबंधनों पर।

धारा 43(4) कब लागू होती है?

जब न्यायालय माध्यस्थम् पंचाट को अपास्त करने का आदेश दे।

धारा 43(4) के अनुसार किस अवधि को अपवर्जित किया जाएगा?

माध्यस्थम् के प्रारम्भ और न्यायालय के आदेश की तारीख के बीच की अवधि।

धारा 43(4) के अनुसार यह अपवर्जन किसके लिए किया जाता है?

परिसीमा अधिनियम, 1963 के अंतर्गत कार्यवाही प्रारम्भ करने के लिए समय की गणना में।

धारा 43(4) में "कार्यवाही" में क्या सम्मिलित है?

माध्यस्थम् भी।

 

भाग-1

(PART-IA)

भारतीय माध्यस्थम् परिषद्

(ARBITRATION COUNCIL OF INDIA)

भारतीय माध्यस्थम् परिषद् किस भाग से संबंधित है?

भाग-1

भाग-1 (भारतीय माध्यस्थम् परिषद्) अधिनियम में कब जोड़ी गई?

2019 के अधिनियम सं० 33 की धारा 10 द्वारा।

धारा 43 का विषय क्या है?

परिभाषाएं

(Definitions)

अध्यक्ष (Chairperson) परिभाषित है-

धारा 43()

“अध्यक्ष” से क्या अभिप्रेत है?

धारा 43 की उपधारा (1) के खंड () के अधीन नियुक्त भारतीय माध्यस्थम् परिषद् का अध्यक्ष।

परिषद् (Council) परिभाषित है-

धारा 43()

“परिषद्” से क्या अभिप्रेत है?

धारा 43 के अधीन स्थापित भारतीय माध्यस्थम् परिषद्।

सदस्य (Member) परिभाषित है-

धारा 43()

“सदस्य” से क्या अभिप्रेत है?

परिषद् के सदस्य, जिसमें अध्यक्ष भी सम्मिलित है।

धारा 43 का विषय क्या है?

भारतीय माध्यस्थम् परिषद् की स्थापना और उसका निगमन।

(Establishment and incorporation of Arbitration Council of India)

धारा 43ख(1) के अनुसार परिषद् की स्थापना कौन करेगा?

केन्द्रीय सरकार।

धारा 43ख(1) के अनुसार परिषद् का नाम क्या होगा?

भारतीय माध्यस्थम् परिषद्।

धारा 43ख(1) के अनुसार परिषद् का उद्देश्य क्या है?

इस अधिनियम के अधीन कर्तव्यों का पालन और कृत्यों का निर्वहन करना।

धारा 43ख(2) के अनुसार परिषद् का स्वरूप क्या है?

शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाली एक निगमित निकाय।

धारा 43ख(2) के अनुसार परिषद् को क्या शक्तियां प्राप्त हैं?

चल और अचल सम्पत्ति का अर्जन, धारण, व्ययन और संविदा करना।

धारा 43ख(2) के अनुसार परिषद् किस नाम से वाद ला सकती है?

अपने नाम से।

धारा 43ख(3) के अनुसार परिषद् का प्रधान कार्यालय कहां होगा?

दिल्ली में।

धारा 43ख(4) के अनुसार परिषद् अन्य कार्यालय कहां स्थापित कर सकती है?

भारत में अन्य स्थानों पर।

धारा 43ख(4) के अनुसार अन्य कार्यालय स्थापित करने की शर्त क्या है?

केन्द्रीय सरकार का पूर्व अनुमोदन।

धारा 43 का विषय क्या है?

परिषद् की संरचना

(Composition of Council)

धारा 43ग(1) के अनुसार परिषद् किनसे मिलकर बनेगी?

कोई व्यक्ति, जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रहा है या किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति रहा है या किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा है या वह कोई ऐसा विख्यात व्यक्ति है, जिसके पास माध्यस्थम् के संचालन या प्रशासन का विशेष ज्ञान या अनुभव है, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से नियुक्त किया जाएअध्यक्ष;

कोई विख्यात माध्यस्थम् व्यवसायी, जिसके पास घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों प्रकार के संस्थागत माध्यस्थम् सारवान् में ज्ञान और अनुभव है, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएसदस्य;

कोई विख्यात शिक्षाविद्, जिसके पास माध्यस्थम् और वैकल्पिक विवाद समाधान विधियों के क्षेत्र में अनुसंधान और अध्यापन का अनुभव है, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अध्यक्ष के परामर्श से नियुक्त किया जाएसदस्य;

भारत सरकार के विधि और न्याय मंत्रालय के विधि कार्य विभाग का सचिव या संयुक्त सचिव से अन्यून पंक्ति का उसका कोई प्रतिनिधिसदस्य, पदेन;

भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग का सचिव या संयुक्त सचिव से अन्यून पंक्ति का उसका कोई प्रतिनिधिसदस्य, पदेन

केन्द्रीय सरकार द्वारा चक्रानुक्रम के आधार पर चुना गया किसी मान्यताप्राप्त वाणिज्य और उद्योग निकाय का एक प्रतिनिधिअंशकालिक सदस्य ; और

मुख्य कार्यकारी अधिकारी - सदस्य सचिव, पदेन

धारा 43ग(2) के अनुसार अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल क्या है?

पद ग्रहण की तारीख से तीन वर्ष।

धारा 43ग(2) के अनुसार यह कार्यकाल किन पर लागू नहीं होता?

पदेन सदस्यों पर नहीं।

धारा 43ग(2) के अनुसार अध्यक्ष के लिए अधिकतम आयु क्या है?

सत्तर वर्ष।

धारा 43ग(2) के अनुसार सदस्य के लिए अधिकतम आयु क्या है?

सड़सठ वर्ष।

धारा 43ग(3) के अनुसार उपधारा (1)(ख) और (ग) में निर्दिष्ट अध्यक्ष और सदस्यों के वेतन और सेवा शर्तें कौन निर्धारित करेगा?

केन्द्रीय सरकार।

धारा 43ग(4) के अनुसार अंशकालिक सदस्य किन भत्तों का हकदार होगा?

यात्रा और अन्य भत्ते।

धारा 43ग(4) के अनुसार ये भत्ते कौन निर्धारित करेगा?

केन्द्रीय सरकार।

धारा 43 का विषय क्या है?

परिषद् के कर्तव्य और कृत्य

(Duties and functions of Council)

धारा 43घ(1) के अनुसार परिषद् का मुख्य कर्तव्य क्या है?

माध्यस्थम्, मध्यकता, सुलह या किसी अन्य वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र का संवर्धन और उसका प्रोत्साहन करने के लिए ऐसे सभी उपाय करे, जो आवश्यक हों और उस प्रयोजन के लिए नीति की विरचना तथा स्थापन, प्रचालन और माध्यस्थम् से संबंधित सभी विषयों के संबंध में एकसमान वृत्तिक मानक बनाए रखने के लिए दिशानिर्देशों की विरचना करे

धारा 43घ(2) इस अधिनियम के अधीन अपने कर्तव्यों के निष्पादन और कृत्यों के निर्वहन के प्रयोजनों के लिए परिषद्,—

 

माध्यस्थम् संस्थाओं के श्रेणीकरण को शासित करने के लिए नीति की विरचना कर सकेगी;

मध्यस्थों को प्रत्यायन उपलब्ध कराने वाली वृत्तिक संस्थानों को मान्यता प्रदान कर सकेगी;

माध्यस्थम् संस्थाओं और मध्यस्थों के श्रेणीकरण का पुनर्विलोकन कर सकेगी;

विधि फर्मों, विधि विश्वविद्यालयों और माध्यस्थम् संस्थाओं के सहयोग से माध्यस्थम् के क्षेत्र में प्रशिक्षण, कार्यशालाओं और पाठ्यक्रमों का आयोजन कर सकेगी;

माध्यस्थम् और सुलह के समाधानप्रद स्तर को सुनिश्चित करने के लिए सन्नियमों की विरचना, उनका पुनर्विलोकन और उन्हें अद्यतन कर सकेगी;

भारत को घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय माध्यस्थम् और सुलह का एक उत्तम केन्द्र बनाने हेतु एक मंच का सृजन करने के लिए अपनाए जाने वाले अभिमतों और तकनीकों के आदान-प्रदान के लिए एक मंच के रूप में कार्य कर सकेगी;

केन्द्रीय सरकार को, वाणिज्यिक विवादों के सुगम समाधान के लिए उपबंध करने के लिए अपनाए जाने वाले विभिन्न उपायों के संबंध में सिफारिश कर सकेगी;

माध्यस्थम् संस्थाओं को सुदृढ़ बनाकर संस्थागत माध्यस्थम् का संवर्धन कर सकेगी;

माध्यस्थम् और सुलह से संबंधित विभिन्न विषयों पर परीक्षा और प्रशिक्षण का संचालन कर सकेगी और उनसे संबंधित प्रमाणपत्रों को प्रदान कर सकेगी;

भारत में किए गए माध्यस्थम् पंचाटों के निक्षेपागार की स्थापना कर सकेगी और उसे बनाए रखेगी;

माध्यस्थम् संस्थाओं के कार्मिकों, प्रशिक्षण और अवसंरचना के संबंध में सिफारिशें कर सकेगी; और

ऐसे अन्य कृत्य कर सकेगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिश्चित किए जाएं।

धारा 43ड का विषय क्या है?

रिक्तियों आदि से परिषद् की कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना।

(Vacancies, etc., not to invalidate proceedings of Council)

धारा 43ड के अनुसार परिषद् की कार्यवाही कब अविधिमान्य नहीं होगी?

परिषद् में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है;

परिषद् के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या

परिषद् की प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है, जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं डालती है।

धारा 43 का विषय क्या है?

सदस्यों का त्यागपत्र

(Resignation of Members)

धारा 43च के अंतर्गत कौन त्यागपत्र दे सकता है?

अध्यक्ष या पूर्णकालिक या अंशकालिक सदस्य।

धारा 43च के अंतर्गत अध्यक्ष या पूर्णकालिक या अंशकालिक सदस्य द्वारा त्यागपत्र दिया जाता है?-

केन्द्रीय सरकार को संबोधित लिखित और हस्ताक्षरित सूचना देकर।

क्या धारा 43च के अंतर्गत अध्यक्ष या पूर्णकालिक सदस्य का त्यागपत्र तत्काल प्रभावी होता है?

नहीं, उपबंध के अधीन।

धारा 43च के उपबंध के अनुसार अध्यक्ष या पूर्णकालिक सदस्य कब तक पद धारण करेगा?

जब तक केन्द्रीय सरकार अनुमति दे या अन्य शर्तें पूरी हों।

केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमति मिलने पर क्या प्रभाव होगा?

अध्यक्ष या पूर्णकालिक सदस्य पद त्याग सकता है।

अध्यक्ष या पूर्णकालिक सदस्य, त्यागपत्र की सूचना प्राप्त होने के बाद कब तक अपना पद धारण करता रहेगा? 

जब तक उसको केन्द्रीय सरकार द्वारा पहले ही अपना पद त्याग करने के लिए अनुज्ञात नहीं कर दिया जाता है, ऐसी सूचना के प्राप्त होने की तारीख से तीन मास के अवसान तक या जब तक उसके उत्तरवर्ती के रूप में सम्यक्तः नियुक्त व्यक्ति अपना पदभार ग्रहण नहीं कर लेता है या अपनी पदावधि समाप्त होने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो

धारा 43 का विषय क्या है?

सदस्य का हटाया जाना।

(Removal of Member)

धारा 43छ के अंतर्गत सदस्य को पद से हटाने की शक्ति किसके पास है?

केन्द्रीय सरकार के पास।

केन्द्रीय सरकार, किसी सदस्य को उसके पद से हटा सकेगी, यदि

वह कोई अननुन्मोचित दिवालिया है; या

वह अपनी पदावधि के दौरान किसी भी समय (अंशकालिक सदस्य को छोड़ कर) किसी सवेतन नियोजन में नियोजित हुआ है; या

वह किसी ऐसे अपराध में सिद्धदोष ठहराया गया है, जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अन्तर्बलित है; या

उसने ऐसे वित्तीय और अन्य हित अर्जित कर लिए हैं, जिनके कारण सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या

सदस्य के रूप में उसने अपने पद का ऐसा दुरुपयोग किया है जिसके कारण उसका पद पर बने रहना लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है; या

वह सदस्य के रूप में कार्य करने के लिए शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो गया है।

उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी भी सदस्य को उस उपधारा के खंड (घ) और खंड (ङ) में विनिर्दिष्ट आधारों पर उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा, जब तक-

उच्चतम न्यायालय ने केन्द्रीय सरकार द्वारा उसको इस निमित्त प्रतिनिर्देश किए जाने पर, उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसी प्रक्रिया के अनुसार जो इस निमित्त विहित की जाए उसके द्वारा की गई जांच के आधार पर यह रिपोर्ट की गई हो कि सदस्य को ऐसे आधार या आधारों पर हटाया जाना चाहिए

धारा 43 का विषय क्या है?

विशेषज्ञों की नियुक्ति और उनकी समितियों का गठन।

(Appointment of experts and constitution of Committees thereof)

धारा 43ज के अंतर्गत विशेषज्ञों की नियुक्ति और विशेषज्ञों की ऐसी समितियों का गठन कौन कर सकता है?

परिषद्।

विशेषज्ञों की नियुक्ति किन शर्तों पर की जाएगी?

विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट निबंधनों और शर्तों पर।

परिषद् नियुक्ति और विशेषज्ञों की समितियों का गठन कब कर सकती है?

जब वह अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक समझे।

धारा 43 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् संस्थाओं के श्रेणीकरण के लिए साधारण सन्नियम।

(General norms for grading of arbitral institutions)

धारा 43झ के अंतर्गत माध्यस्थम् संस्थाओं का श्रेणीकरण कौन करेगा?

परिषद् ऐसी रीति में, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, अवसंरचना, मध्यस्थों की गुणवत्ता और सक्षमता, घरेलू या अंतरराष्ट्रीय माध्यस्थम् के लिए कार्यपालन और समय-सीमा के अनुपालन से संबंधित मानदंडों के आधार पर माध्यस्थम् संस्थाओं का श्रेणीकरण करेगी।

धारा 43 का विषय क्या है?

मध्यस्थों के लिए प्रत्ययन के लिए सन्नियम।

(Norms for accreditation of arbitrators)

मध्यस्थों के प्रत्यायन के लिए अर्हताएं, अनुभव और सन्नियम वे होंगे,-

जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं |

धारा 43 प्रतिस्थापित की गयी-

2021 के अधिनियम सं० 3 की धारा 3 द्वारा प्रतिस्थापित।

धारा 43 का विषय क्या है?

पंचाटों का निक्षेपागार

(Depository of awards)

भारत में किए गए माध्यस्थम् पंचाटों का इलैक्ट्रानिक निक्षेपागार कौन बनाए रखेगा?

परिषद्।

इलैक्ट्रानिक निक्षेपागार में क्या शामिल होगा?

माध्यस्थम् पंचाटों और उनसे संबंधित अन्य अभिलेख।

इलैक्ट्रानिक निक्षेपागार किस रीति में बनाए रखा जाएगा?

विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट रीति में।

धारा 43 का विषय क्या है?

परिषद् की विनियम बनाने की शक्ति

(Power to make regulations by Council)

धारा 43ठ के अंतर्गत विनियम बनाने की शक्ति किसके पास है?

परिषद् इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन और कर्तव्यों के पालन हेतु, केन्द्रीय सरकार के परामर्श से|

परिषद् विनियम किस उद्देश्य से बना सकती है?

अपने कृत्यों के निर्वहन और कर्तव्यों के पालन हेतु।

धारा 43 का विषय क्या है?

मुख्य कार्यपालक अधिकारी।

(Chief Executive Office)

धारा 43ड(1) के अनुसार मुख्य कार्यपालक अधिकारी किसके लिए उत्तरदायी होगा?

परिषद् के दिन-प्रतिदिन के प्रशासन के लिए।

धारा 43ड(2) के अनुसार मुख्य कार्यपालक अधिकारी की नियुक्ति सेवा के निबंधन और शर्तें किसके द्वारा विहित की जाएगी?

केन्द्रीय सरकार द्वारा।

धारा 43ड(3) के अनुसार मुख्य कार्यपालक अधिकारी किन कृत्यों का निर्वहन करेगा?

जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं।

धारा 43ड(4) के अनुसार सचिवालय किनसे मिलकर बनेगा?

अधिकारियों और कर्मचारियों से।

धारा 43ड(5) के अनुसार कर्मचारियों और अधिकारियों की अर्हताएं, नियुक्ति, सेवा के निबंधन और शर्तें किसके द्वारा विहित की जाएंगी?

केन्द्रीय सरकार द्वारा।

 

भाग-2

(PART-II)

कतिपय विदेशी पंचाटों का प्रवर्तन

(ENFORCEMENT OF CERTAIN FOREIGN AWARDS)

अध्याय-1

(CHAPTER-I)

न्यूयार्क अभिसमय पंचाट

(New York Convention Awards)

कतिपय विदेशी पंचाटों का प्रवर्तन (Enforcement of Certain Foreign Awards) किस भाग से संबंधित है?

भाग-2

धारा 44 न्यूयार्क अभिसमय पंचाट किस अध्याय से संबंधित है?

भाग 2 अध्याय 1

धारा 44 का विषय क्या है?

विदेशी पंचाट की परिभाषा

(Definition)

“विदेशी पंचाट” से क्या अभिप्रेत है?

ऐसा माध्यस्थम् पंचाट, जो व्यक्तियों के बीच उन विधिक संबंधों से, चाहे वे संविदात्मक हों या हों, जिन्हें भारत में प्रवृत्त विधि के अधीन वाणिज्यिक समझा गया है, उत्पन्न होने वाले मतभेदों के बारे में है; और जो 11 अक्तूबर, 1960 को या उसके पश्चात्

ऐसे माध्यस्थम् के, जिसको पहली अनुसूची में दिया गया अभिसमय लागू होता है, किसी लिखित करार के अनुसरण में किया गया है; और

ऐसे राज्यक्षेत्रों में से किसी में किया गया है जिन्हें केन्द्रीय सरकार, यह सामाधान हो जाने पर कि व्यतिकारी उपबंध किए गए हैं राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसा राज्यक्षेत्र घोषित करे, जिनको उक्त अभिसमय लागू होता है।

धारा 45 का विषय क्या है?

पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्दिष्ट करने की न्यायिक प्राधिकारी की शक्ति।

(Power of judicial authority to refer parties to arbitration)

धारा 45 किन उपबंधों के होते हुए भी लागू होती है?

भाग 1 या सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के होते हुए भी।

धारा 45 कब लागू होती है?

जब किसी न्यायिक प्राधिकारी के समक्ष ऐसा मामला हो जिसके संबंध में धारा 44 के पक्षकारों ने करार किया है।

धारा 45 के अंतर्गत आवेदन कौन कर सकता है?

कोई पक्षकार या उसकी मार्फत या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाला व्यक्ति।

धारा 45 के अंतर्गत न्यायिक प्राधिकारी क्या कर सकता है?

पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्देशित कर सकता है।

न्यायिक प्राधिकारी किस शर्त पर पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्देशित करेगा?

जब उसका प्रथमदृष्ट्या निष्कर्ष हो कि करार अकृत, शून्य, अप्रवर्तनशील या पालन योग्य नहीं है।

धारा 45 में "निष्कर्ष" शब्द के स्थान पर कौन-सा शब्द प्रतिस्थापित किया गया है?

"प्रथमदृष्ट्या निष्कर्ष"

धारा 45 में उसका वह निष्कर्ष होता है कि" शब्दों के स्थान पर उसका प्रथमदृष्ट्या यह निष्कर्ष होता है कि” किस अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है?

2019 के अधिनियम सं० 33 द्वारा।

धारा 46 का विषय क्या है?

विदेशी पंचाट कब आबद्धकर होंगे

(When foreign award binding)

धारा 46 में किस प्रकार का विदेशी पंचाट आबद्धकर माना जाएगा?

जो भाग 2 अध्याय 1के अधीन प्रवर्तनीय हो।

विदेशी पंचाट किन व्यक्तियों पर आबद्धकर होता है?

उन व्यक्तियों पर जिनके बीच यह किया गया था।

विदेशी पंचाट के आधार पर कौन व्यक्ति निर्भर कर सकता है?

उन व्यक्तियों में से कोई भी व्यक्ति।

विदेशी पंचाट पर निर्भरता किन रूपों में की जा सकती है?

प्रतिरक्षा के रूप में, मुजराई के तौर पर या अन्यथा।

विदेशी पंचाट पर निर्भरता कहाँ की जा सकती है?

भारत में किन्हीं विधिक कार्यवाहियों में।

इस अध्याय में विदेशी पंचाट को प्रवृत्त करने संबंधी निर्देशों का क्या अर्थ है?

इसमें पंचाट पर निर्भर करने के प्रतिनिर्देश भी सम्मिलित हैं।

धारा 47 का विषय क्या है?

विदेशी पंचाट के प्रवर्तन हेतु साक्ष्य

(Evidence)

विदेशी पंचाट के प्रवर्तन के लिए आवेदन कौन करता है?

वह पक्षकार जो प्रवर्तन चाहता है।

आवेदन के समय साक्ष्य किसके समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं?

न्यायालय के समक्ष।

विदेशी पंचाट के प्रवर्तन हेतु कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए जाते हैं?

मूल पंचाट या सम्यक्तः अधिप्रमाणित प्रति।

मूल पंचाट या उसकी प्रति किस प्रकार अधिप्रमाणित होनी चाहिए?

उस देश की विधि के अनुसार जिसमें पंचाट किया गया था।

माध्यस्थम् के लिए कौन-सा दस्तावेज प्रस्तुत किया जाता है?

मूल करार या उसकी सम्यक्तः प्रमाणित प्रति।

विदेशी पंचाट सिद्ध करने हेतु क्या प्रस्तुत किया जाता है?

ऐसा साक्ष्य जिससे सिद्ध हो कि पंचाट विदेशी है।

यदि पंचाट विदेशी भाषा में है तो क्या करना होगा?

अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद प्रस्तुत करना होगा।

विदेशी भाषा के पंचाट या करार के अनुवाद का प्रमाणीकरण कौन करेगा?

उस देश के राजनयिक या कौंसलीय अभिकर्ता द्वारा।

धारा 47 में “न्यायालय” से क्या अभिप्रेत है?

ऐसा उच्च न्यायालय जिसे विषय-वस्तु पर आरंभिक सिविल अधिकारिता प्राप्त हो।

धारा 47 का स्पष्टीकरण किस अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित किया गया?

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 21 द्वारा।

धारा 48 का विषय क्या है?

विदेशी पंचाट के प्रवर्तन के लिए शर्तें

(Conditions for enforcement of foreign awards)

उस पक्षकार के निवेदन पर जिसके विरुद्ध किसी विदेशी पंचाट का अवलंब लिया जा रहा है, विदेशी पंचाट को प्रवृत्त करने से इंकार केवल उस दशा में किया जा सकेगा जब कि वह पक्षकार, न्यायालय को यह सबूत दे देता है कि-

धारा 44 में निर्दिष्ट करार के पक्षकार, उनको लागू होने वाली विधि के अधीन किसी असमर्थता से ग्रस्त थे या उक्त करार उस विधि के अधीन, जिसके अधीन पक्षकारों ने उसे किया है या उसके बारे में कोई संकेत होने पर, उस देश की विधि के अधीन, जहां पंचाट किया गया था विधिमान्य नहीं हैं; या

उस पक्षकार को, जिसके विरुद्ध पंचाट का अवलंब लिया जा रहा है मध्यस्थ की नियुक्ति की या माध्यस्थम् कार्यवाहियों की उचित सूचना नहीं दी गई थी, या वह अन्यथा अपना पक्ष कवन प्रस्तुत करने में असमर्थ था ; या

पंचाट में ऐसे मतभेद पर विचार किया गया है जो माध्यस्थम् के लिए निवेदन के निवन्धनों द्वारा अनुध्यात नहीं है या उनके अंतर्गत नहीं आता है या इसमें माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत करने के विषय क्षेत्र से बाहर के विषयों पर विनिश्चय अंतर्विष्ट है:

परन्तु यदि माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत विषयों संबंधी विनिश्चयों को उन विषयों से संबंधित विनिश्चयों से पृथक् किया जा सकता है, जो इस प्रकार माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत नहीं किए गए हैं तो पंचाट के उस भाग को, जिसमें माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत विषयों के बारे में विनिश्चय अंतर्विष्ट है, प्रवर्तित किया जा सकेगा ; या

माध्यस्थम् प्राधिकरण का गठन या माध्यस्थम् की प्रक्रिया पक्षकारों के करार के अनुसार नहीं थी या ऐसे करार के अभाव में, उस देश की जहां माध्यस्थम् किया गया था, विधि के अनुसार नहीं थी; या

पंचाट अभी पक्षकारों पर आवद्धकर नहीं हुआ है, या उस देश के जिसमें या जिसकी विधि के अधीन, उस पंचाट को किया गया था सक्षम प्राधिकारी द्वारा इसे अपास्त या निलंबित किया गया है।

किसी माध्यस्थम् पंचाट का प्रवर्तन करने से उस दशा में भी इंकार किया जा सकेगा जबकि न्यायालय यह निष्कर्ष निकालता है कि-

 

मतभेद की विषय-वस्तु का निपटारा भारत की विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा नहीं किया जा सकता है; या

पंचाट का प्रवर्तन भारत की लोक नीति के विरुद्ध होगा।

धारा 48 का स्पष्टीकरण 1 के अनुसार किसी शंका को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि कोई पंचाट भारत की लोक नीति विरुद्ध केवल तभी होगा यदि-

पंचाट का किया जाना कपट या भ्रष्टाचार द्वारा उत्प्रेरित है या प्रभावित किया गया है अथवा वह धारा 75 या धारा 81 के अतिक्रमण में है; या

वह भारतीय विधि की मूलभूत नीति के उल्लंघन में है; या

वह नैतिकता या न्याय की अत्यंत आधारभूत धारणा के विरोध में है।

धारा 48 का स्पष्टीकरण 2 के अनुसार शंका को दूर करने के लिए, इस बात की जांच कि भारतीय विधि की मूलभूत नीति का उल्लंघन हुआ है अथवा नहीं, विवाद के गुणागुण के पुनर्विलोकन को -

आवश्यक नहीं बनाएगी|

यदि धारा 48 उपधारा (1) के खंड (ङ) में निर्दिष्ट सक्षम प्राधिकारी को पंचाट को अपास्त करने या निलंबित करने के लिए कोई आवेदन किया गया है तो न्यायालय, यदि ऐसा करना उचित समझता है-

पंचाट के प्रवर्तन पर विनिश्चय देना स्थगित कर सकेगा और पंचाट के प्रवर्तन का दावा करने वाले पक्षकार के आवेदन पर दूसरे पक्षकार को उचित प्रतिभूति देने के लिए आदेश भी कर सकेगा।

धारा 49 का विषय क्या है?

विदेशी पंचाटों को प्रवर्तित करना।

(Enforcement of foreign awards)

विदेशी पंचाट को डिक्री कब माना जाता है?

जब न्यायालय को यह समाधान हो जाए कि पंचाट भाग 2 अध्याय 1के अधीन प्रवर्तनीय है।

प्रवर्तनीय विदेशी पंचाट का क्या प्रभाव होता है?

वह उस न्यायालय की डिक्री समझा जाएगा।

धारा 50 का विषय क्या है?

अपीलीय आदेश

(Appealable orders)

धारा 50(1) के अधीन किन आदेशों से अपील की जा सकती है?

धारा 45 के अधीन पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्देशित करने से इंकार करने, तथा

धारा 48 के अधीन विदेशी पंचाट को प्रवर्तित करने से इंकार करने वाले आदेश।

धारा 50(1) के अधीन अपील किस न्यायालय में होगी?

उस न्यायालय में जो ऐसे आदेश की अपील सुनने के लिए विधि द्वारा प्राधिकृत हो।

धारा 50(2) के अधीन अपील में पारित आदेश के विरुद्ध क्या द्वितीय अपील होगी?

नहीं, कोई द्वितीय अपील नहीं होगी।

धारा 50(2) का उच्चतम न्यायालय पर क्या प्रभाव है?

यह उच्चतम न्यायालय में अपील करने के अधिकार को प्रभावित नहीं करता और उसे लेता है।

2019 के अधिनियम की धारा 13 द्वारा क्या प्रतिस्थापित किया गया?

"ऐसे किसी आदेश" शब्दों के स्थान पर तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे किसी आदेशप्रतिस्थापन किया गया।

धारा 51 का विषय क्या है?

व्यावृत्ति।

(Saving)

धारा 51 के अनुसार इस अध्याय की कोई बात किस पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी?

उन अधिकारों पर जो भाग 2 अध्याय 1 के अधिनियमित होने पर किसी व्यक्ति को प्राप्त होते।

यदि भाग 2 अध्याय 1 अधिनियमित न किया गया होता तो किन अधिकारों पर प्रभाव नहीं पड़ता?

भारत में किसी पंचाट को प्रवर्तित कराने या उसका लाभ उठाने के संबंध में प्राप्त अधिकारों पर।

धारा 51 के अनुसार अधिकार किससे संबंधित हैं?

भारत में पंचाट के प्रवर्तन या उसके लाभ उठाने से संबंधित।

धारा 51 के अनुसार यह अध्याय किन अधिकारों को सुरक्षित रखता है?

उन अधिकारों को जो भाग 2 अध्याय 1 के अभाव में भी व्यक्ति को प्राप्त होते।

धारा 52 का विषय क्या है?

अध्याय 2 का लागू होना।

धारा 52 के अनुसार अध्याय 2 किन पंचाटों पर लागू नहीं होगा?

ऐसे विदेशी पंचाटों पर, जिनको यह अध्याय लागू होता है।

 

अध्याय-2

(CHAPTER-II)

जेनेवा अभिसमय पंचाट

(Geneva Convention Awards)

अध्याय 2 का विषय क्या है?

जेनेवा अभिसमय पंचाट।

(Geneva Convention Awards)

धारा 53 का विषय क्या है?

निर्वचन

(Interpretation)

धारा 53 में “विदेशी पंचाट” से क्या अभिप्रेत है?

ऐसा माध्यस्थम् पंचाट जो वाणिज्यिक मतभेदों पर 28 जुलाई, 1924 के पश्चात् दिया गया हो।

विदेशी पंचाट किन मतभेदों से संबंधित होना चाहिए?

ऐसे मतभेदों से जिन्हें भारत में प्रवृत्त विधि के अधीन वाणिज्यिक समझा जाता है।

विदेशी पंचाट किस तिथि के पश्चात् दिया गया होना चाहिए?

28 जुलाई, 1924 के पश्चात्।

धारा 53(क) के अनुसार विदेशी पंचाट किसके अनुसरण में दिया गया होना चाहिए?

ऐसे माध्यस्थम् करार के अनुसरण में जिसे दूसरी अनुसूची में उपवर्णित प्रोटोकोल लागू होता है।

धारा 53(ख) के अनुसार विदेशी पंचाट किन व्यक्तियों के बीच दिया गया होना चाहिए?

ऐसे व्यक्तियों के बीच जिनमें से एक निर्दिष्ट शक्तियों की अधिकारिता के अधीन हो और दूसरा किसी अन्य शक्ति की अधिकारिता के अधीन हो।

धारा 53(ख) में किन शक्तियों को मान्यता दी जाती है?

वे शक्तियां जिन्हें भारत सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अभिसमय के पक्षकार घोषित करे।

भारत सरकार कब शक्तियों को अभिसमय के पक्षकार घोषित करती है?

जब उसे यह समाधान हो जाए कि व्यतिकारी उपबंध कर दिए गए हैं।

धारा 53(ग) के अनुसार विदेशी पंचाट कहाँ दिया गया होना चाहिए?

ऐसे राज्यक्षेत्रों में जिन्हें भारत सरकार अधिसूचना द्वारा अभिसमय लागू घोषित करे।

धारा 54 का विषय क्या है?

न्यायिक प्राधिकारी की पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्दिष्ट करने की शक्ति

(Power of judicial authority to refer parties to arbitration)

धारा 54 किसके होते हुए भी लागू होती है?

भाग 1 या सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में किसी बात के होते हुए भी।

धारा 54 के अंतर्गत न्यायिक प्राधिकारी कब कार्य करता है?

जब वह धारा 53 लागू होने वाले व्यक्तियों के बीच संविदा से संबंधित विवाद को हाथ में लेता है।

धारा 54 के अंतर्गत विवाद किस प्रकार की संविदा से संबंधित होना चाहिए?

ऐसी संविदा जिसमें माध्यस्थम् करार सम्मिलित हो।

धारा 54 के अंतर्गत माध्यस्थम् करार कैसा होना चाहिए?

धारा 53 के अधीन विधिमान्य और कार्यान्वित किए जाने योग्य।

धारा 54 के अंतर्गत आवेदन कौन कर सकता है?

पक्षकारों में से कोई एक या उसके द्वारा या उसके अधीन दावा करने वाला कोई व्यक्ति।

धारा 54 के अंतर्गत न्यायिक प्राधिकारी आवेदन प्राप्त होने पर क्या करेगा?

पक्षकारों को मध्यस्थों के विनिश्चय के लिए निर्दिष्ट करेगा।

धारा 54 के अनुसार निर्दिष्ट करने का प्रभाव क्या है?

इससे न्यायिक प्राधिकारी की सक्षमता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

धारा 55 का विषय क्या है?

विदेशी पंचाट कब आबद्धकर होंगे

(Foreign awards when binding)

धारा 55 के अनुसार विदेशी पंचाट कब आबद्धकर माना जाएगा?

जब वह भाग 2 अध्याय 2 के अधीन प्रवर्तनीय हो।

धारा 55 के अनुसार विदेशी पंचाट का उपयोग कैसे किया जा सकता है?

भारत में विधिक कार्यवाहियों में प्रतिरक्षा, मुजराई या अन्यथा उस पर निर्भर किया जा सकता है।

धारा 55 के अनुसार प्रवर्तन संबंधी निर्देशों का क्या अर्थ लगाया जाएगा?

मानो उनमें पंचाट पर निर्भर करने के प्रति भी निर्देश सम्मिलित हैं।

धारा 56 का विषय क्या है?

साक्ष्य

(Evidence)

धारा 56(1) के अनुसार विदेशी पंचाट के प्रवर्तन हेतु आवेदन करते समय क्या प्रस्तुत करना आवश्यक है?

मूल पंचाट या जिस देश में वह दिया गया था, उस देश की विधि द्वारा अपेक्षित रीति से सम्यक् रूप से अधिप्रमाणित उसकी प्रति; तथा

यह साबित करने के लिए साक्ष्य कि पंचाट अंतिम हो गया है, तथा

ऐसा साक्ष्य जो यह साबित करने के लिए आवश्यक हो कि धारा 57 की उपधारा (1) के खंड () और खंड () में वर्णित शर्तों की पूर्ति हो जाती है।

धारा 56(2) कब लागू होती है?

जब धारा 56उपधारा (1) के अधीन प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेज विदेशी भाषा में हों।

विदेशी भाषा के दस्तावेज होने पर क्या प्रस्तुत करना होगा?

अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद।

अनुवाद किसके द्वारा प्रमाणित होना चाहिए?

उस देश के राजनयिक या कौंसलीय अभिकर्ता द्वारा या भारत में प्रवृत्त विधि के अनुसार पर्याप्त रीति से प्रमाणित।

धारा 56 स्पष्टीकरण के अनुसार “न्यायालय” से क्या अभिप्रेत है?

ऐसा उच्च न्यायालय जिसे विषय-वस्तु पर आरंभिक सिविल अधिकारिता या अधीनस्थ न्यायालयों की डिक्रीओं पर अपील सुनने की अधिकारिता प्राप्त हो।

धारा 56 के अनुसार किस स्थिति में उच्च न्यायालय को “न्यायालय” माना जाएगा?

जब वह पंचाट की विषय-वस्तु वाले प्रश्नों का आरंभिक सिविल अधिकारिता में विनिश्चय करने में सक्षम हो।

धारा 56  स्पष्टीकरण का प्रतिस्थापन किया गया-

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 23 द्वारा

धारा 57 का विषय क्या है?

विदेशी पंचाट के प्रवर्तन के लिए शर्तें

(Conditions for enforcement of foreign award)

धारा 57(1) के अनुसार विदेशी पंचाट के प्रवर्तन के लिए क्या आवश्यक है?

पंचाट उस माध्यस्थम् के निवेदन के अनुसरण में किया गया है जो उस विधि के अधीन विधिमान्य हो, जो उसे लागू है;

पंचाट की विषयवस्तु ऐसी है जिसका भारत की विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा निपटारा किया जा सकता हो;

पंचाट उस माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा किया गया हो जिसके बारे में माध्यस्थम् के निवेदन में उपबंध किया गया हो या जिसका गठन पक्षकारों द्वारा करार पाई गई रीति से हुआ है और उस विधि के अनुसार किया गया हो जो माध्यस्थम् प्रक्रिया के संबंध में लागू हो;

पंचाट उस देश में, जिसमें उसे दिया गया है, इस अर्थ में अंतिम हो गया हो कि उस पर इस रूप में विचार नहीं किया जा सके यदि उसका विरोध करने या उसके विरुद्ध अपील करने की स्वतंत्रता है या यह साबित कर दिया जाता है कि पंचाट की विधिमान्यता को चुनौती देने के प्रयोजन के लिए कोई कार्यवाहियां लंबित हैं;

पंचाट का प्रवर्तन, भारत की लोक नीति या विधि के प्रतिकूल नहीं है।

धारा 57 स्पष्टीकरण 1 के अनुसार पंचाट कब लोक नीति के विरुद्ध माना जाएगा?

पंचाट का किया जाना कपट या भ्रष्टाचार द्वारा उत्प्रेरित है या प्रभावित किया गया है अथवा वह धारा 75 या धारा 81 के अतिक्रमण में है; या

वह भारतीय विधि की मूलभूत नीति के उल्लंघन में हैं; या

वह नैतिकता या न्याय की अत्यंत आधारभूत धारणा के विरोध में है

धारा 57 स्पष्टीकरण 2 के अनुसार क्या स्पष्ट किया गया है?

मूलभूत नीति के उल्लंघन की जांच में विवाद के गुणागुण का पुनर्विलोकन आवश्यक नहीं है।

धारा 57 स्पष्टीकरण 1 और 2 प्रतिस्थापित किया गया-

2016 के अधिनियम सं० 3 की धारा 24 द्वारा प्रतिस्थापित

धारा 57(2) के अनुसार उपधारा (1) में अधिकथित शर्तें भी पूरी कर दी जाती हैं तो भी पंचाट के प्रवर्तन से इंकार किया जा सकता है यदि न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि—

पंचाट जिस देश में दिया गया था, वहां उसे बातिल किया जा चुका है, या

जिस पक्षकार के विरुद्ध उस पंचाट को प्रवर्तित कराने का प्रयास है, उसे माध्यस्थम् कार्यवाहियों की सूचना इतने समय पूर्व नहीं दी गई थी कि वह अपना पक्षकथन प्रस्तुत कर सकता अथवा किसी विधिक असमर्थता से ग्रस्त होने से उसका प्रतिनिधित्व उचित प्रकार से नहीं हुआ था, या

पंचाट ऐसे मतभेदों से संबंधित नहीं है जो माध्यस्थम् के लिए निवेदित निबंधनों द्वारा अनुध्यात थे या उसके अन्तर्गत आते थे या उसमें ऐसी बातों के बारे में विनिश्चय है जो माध्यस्थम् के लिए निवेदित विषय क्षेत्र के बाहर है:

परन्तु यदि उस पंचाट में माध्यस्थम् अधिकरण को निवेदित सभी मतभेदों का समावेश नहीं किया गया है तो न्यायालय, यदि उचित समझता है तो वह या तो उसके प्रवर्तन को स्थगित कर सकेगा या ऐसी प्रतिभूति के दिए जाने की शर्त पर जैसा कि न्यायालय निश्चित करे, उसका प्रवर्तन किए जाने की मंजूरी दे सकेगा।

धारा 57(3) के अनुसार यदि वह पक्षकार जिसके विरुद्ध पंचाट किया गया है, यह साबित कर देता है कि माध्यस्थम् प्रक्रिया को शासित करने वाली विधि के अधीन, उपधारा (1) के खंड (क) और (ग) तथा उपधारा (2) के खंड (ख) और (ग) में निर्दिष्ट आधारों से भिन्न ऐसा कोई आधार है, जिससे वह उस पंचाट की विधिमान्यता विवादास्पद करने का हकदार है तो न्यायालय, यदि वह ठीक समझे तो ऐसे पक्षकार को उतना-

युक्तियुक्त समय देते हुए जिसके भीतर कि सक्षम अधिकरण पंचाट को बातिल कर सकेगा, उस पंचाट को प्रवर्तित करने से इंकार कर सकेगा या उस पर विचार करना स्थगित कर सकेगा।

धारा 58 का विषय क्या है?

विदेशी पंचाटों को प्रवर्तित करना।

(Enforcement of foreign award)

धारा 58 के अनुसार विदेशी पंचाट कब प्रवर्तित किया जाएगा?

जब न्यायालय का समाधान हो जाए कि वह भाग 2 अध्याय 2 के अधीन प्रवर्तनीय है।

धारा 58 के अनुसार न्यायालय के समाधान का क्या प्रभाव है?

पंचाट को प्रवर्तनीय माना जाएगा।

धारा 58 के अनुसार प्रवर्तनीय विदेशी पंचाट का क्या दर्जा होगा?

उसे न्यायालय की डिक्री समझा जाएगा।

धारा 59 का विषय क्या है?

अपीलनीय आदेश

(Appealable orders)

धारा 59(1) के अनुसार किन आदेशों से अपील की जा सकती है?

धारा 54 के अधीन पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्दिष्ट करने; और

धारा 57 के अधीन किसी विदेशी पंचाट को प्रदर्शित करने, से इंकार कर दिया गया हो, उस न्यायालय में होगी, जो ऐसे आदेश की अपील सुनने के लिए विधि द्वारा प्राधिकृत हो

 

धारा 59(2) के अनुसार क्या द्वितीय अपील होगी?

नहीं, कोई द्वितीय अपील नहीं होगी।

धारा 59(2) के अनुसार उच्चतम न्यायालय के अधिकार पर क्या प्रभाव है?

यह प्रावधान उच्चतम न्यायालय में अपील के अधिकार को प्रभावित नहीं करता और उसे समाप्त करता है।

धारा 60 का विषय क्या है?

व्यावृत्ति

धारा 60 के अनुसार इस अध्याय की कोई बात किस पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी?

उन अधिकारों पर जो भाग 2 अध्याय 2 के अधिनियमित होने पर किसी व्यक्ति को प्राप्त होते।

यदि भाग 2 अध्याय 2 अधिनियमित न किया गया होता तो किन अधिकारों पर प्रभाव नहीं पड़ता?

भारत में किसी पंचाट को प्रवर्तित कराने या उसका लाभ उठाने के संबंध में प्राप्त अधिकारों पर।

 

भाग-3

(PART-III)

सुलह

(CONCILIATION)

भाग 3 का विषय क्या है?

सुलह

(Conciliation)

धारा 61 का विषय क्या है?

लागू होना और विस्तार

(Application and scope)

धारा 61(1) के अनुसार यह भाग कब लागू होगा?

तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित के सिवाय और जब तक कि पक्षकारों ने अन्यथा करार किया हो, भाग 3 विधिक संबंध से, जो चाहे संविदाजात हो या नहीं, उद्भूत विवादों के सुलह की और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियों को लागू होगा।

धारा 61(2) के अनुसार भाग 3 कब लागू नहीं होगा?

जहां तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के आधार पर कतिपय विवादों को सुलह के लिए प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।

धारा 62 का विषय क्या है?

सुलह कार्यवाहियों का आरंभ

(Commencement of conciliation proceedings)

धारा 62(1) के अनुसार सुलह की शुरुआत कैसे की जाती है?

विवाद का विषय संक्षेप में परिलक्षित करते हुए सुलह के लिए लिखित आमंत्रण भेजकर।

धारा 62(2) के अनुसार सुलह कार्यवाहियां कब प्रारम्भ होती हैं?

जब दूसरा पक्षकार लिखित में आमंत्रण स्वीकार कर ले।

धारा 62(3) के अनुसार आमंत्रण नामंजूर होने पर क्या होगा?

कोई सुलह कार्यवाही नहीं होगी।

धारा 62(4) के अनुसार उत्तर न मिलने पर क्या माना जाएगा?

आमंत्रण को अस्वीकार किया गया माना जा सकता है।

धारा 62(4) के अनुसार उत्तर न मिलने की समयावधि क्या है?

30 दिन या आमंत्रण में विनिर्दिष्ट अन्य समयावधि।

धारा 62(4) के अनुसार अस्वीकार मानने पर क्या करना होगा?

दूसरे पक्षकार को लिखित में सूचित करना होगा।

धारा 63 का विषय क्या है?

सुलहकर्ताओं की संख्या

(Number of conciliators)

धारा 63(1) के अनुसार सुलहकर्ताओं की संख्या क्या होगी?

एक सुलहकर्ता होगा, जब तक कि पक्षकार अन्यथा करार करें।

धारा 63(1) के अनुसार पक्षकार कितने सुलहकर्ताओं पर सहमत हो सकते हैं?

दो या तीन सुलहकर्ता।

धारा 63(2) के अनुसार जहां एक से अधिक सुलहकर्ता हों, वे कैसे कार्य करेंगे?

वे साधारण नियम के रूप में संयुक्त रूप से कार्य करेंगे।

धारा 64 का विषय क्या है?

सुलहकर्ताओं की नियुक्ति

(Appointment of conciliators)

धारा 64(1) के अनुसार सुलहकर्ता की नियुक्ति उपधारा (2) के अधीन रहते हुए-

एक सुलहकर्ता वाली सुलह कार्यवाहियों में पक्षकार एक सुलहकर्ता के नाम पर करार कर सकेंगे,

दो सुलहकर्ताओं वाली सुलह कार्यवाहियों में प्रत्येक पक्षकार एक सुलहकर्ता नियुक्त कर सकेगा,

तीन सुलहकर्ताओं वाली कार्यवाहियों में प्रत्येक पक्षकार एक सुलहकर्ता नियुक्त कर सकेगा और पक्षकार तीसरे सुलहकर्ता के नाम पर करार कर सकेंगे,

जो पीठासीन सुलहकर्ता के रूप में कार्य करेगा।

धारा 64(2) ) पक्षकार, सुलहकर्ताओं की नियुक्ति के संबंध में किसी उचित संस्था या व्यक्ति की सहायता के लिए कह सकेंगे और विशेष रूप से

कोई पक्षकार, ऐसी किसी संस्था या व्यक्ति से सुलहकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए उचित व्यक्तियों के नामों की सिफारिश करने के लिए अनुरोध कर सकेगा , या

पक्षकार, किसी ऐसी संस्था या व्यक्ति द्वारा सीधे ही एक या अधिक सुलहकर्ताओं की नियुक्ति करने के लिए करार कर सकेंगे|

धारा 64 के परन्तु के अनुसार संस्था या व्यक्ति सिफारिश या नियुक्ति करते समय किन बातों का ध्यान रखेगा?

स्वतंत्र और निष्पक्ष सुलहकर्ता की नियुक्ति सुनिश्चित करने वाली बातों का।

धारा 64 के परन्तु के अनुसार एकल या तीसरे सुलहकर्ता की नियुक्ति में क्या विशेष ध्यान रखा जाएगा?

पक्षकारों की राष्ट्रिकताओं से भिन्न राष्ट्रिकता के सुलहकर्ता की नियुक्ति की उपयुक्तता का।

धारा 65 का विषय क्या है?

सुलहकर्ता को कथनों का दिया जाना

(Submission of statements to conciliator)

धारा 65(1) के अनुसार सुलहकर्ता नियुक्ति के पश्चात क्या अनुरोध कर सकता है?

प्रत्येक पक्षकार से विवाद की साधारण प्रकृति और प्रश्नों का वर्णन करते हुए संक्षिप्त लिखित कथन देने का अनुरोध कर सकता है।

धारा 65(1) के अनुसार प्रत्येक पक्षकार को क्या करना होगा?

ऐसे कथन की एक प्रति दूसरे पक्षकार को भेजेगा।

धारा 65(2) के अनुसार सुलहकर्ता क्या अतिरिक्त अनुरोध कर सकता है?

प्रत्येक पक्षकार से अपनी स्थिति तथा उसके समर्थन में तथ्यों और आधारों का एक और लिखित कथन देने का अनुरोध कर सकता है।

धारा 65(2) के अनुसार अतिरिक्त लिखित कथन किससे अनुपूरित होगा?

ऐसे दस्तावेजों और अन्य साक्ष्य से, जिसे पक्षकार समुचित समझे।

धारा 65(2) के अनुसार पक्षकार को क्या भेजना होगा?

ऐसे कथन, दस्तावेजों और अन्य साक्ष्य की एक प्रति दूसरे पक्षकार को भेजेगा।

धारा 65(3) के अनुसार सुलहकर्ता कब अतिरिक्त जानकारी मांग सकता है?

सुलह कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर।

धारा 65(3) के अनुसार सुलहकर्ता क्या मांग सकता है?

कोई ऐसी अतिरिक्त जानकारी, जिसे वह समुचित समझे।

धारा 65 के स्पष्टीकरण के अनुसार "सुलहकर्ता" पद का क्या अर्थ है?

यथास्थिति, एकल सुलहकर्ता, दो या तीन सुलहकर्ताओं को लागू होगा।

धारा 66 का विषय क्या है?

सुलहकर्ता का कतिपय अधिनियमितियों द्वारा बाध्य होना।

(Conciliator not bound by certain enactments)

धारा 66 के अनुसार सुलहकर्ता किन अधिनियमों द्वारा बाध्य नहीं होगा?

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 द्वारा।

धारा 67 का विषय क्या है?

सुलहकर्ता की भूमिका

(Role of conciliator)

धारा 67(1) के अनुसार सुलहकर्ता की मुख्य भूमिका क्या है?

पक्षकारों को उनके विवाद के सोहार्द्रपूर्ण समझौते पर पहुंचने में स्वतंत्र और निष्पक्ष रीति से सहायता करना।

धारा 67(2) के अनुसार सुलहकर्ता किन सिद्धांतों से मार्गदर्शित होगा?

वस्तुनिष्ठा, औचित्य और न्याय के सिद्धांतों से।

धारा 67(2) के अनुसार सुलहकर्ता किन बातों का ध्यान रखेगा?

सुलहकर्ता, वस्तुनिष्ठा, औचित्य और न्याय के सिद्धांतों से मार्गदर्शित होगा जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ, पक्षकारों के अधिकारों और बाध्यताओं, संबंधित व्यापार की प्रथाओं और विवाद की परिवर्ती परिस्थितियों का, जिनमें पक्षकारों के बीच कोई पूर्ववर्ती कारवारी व्यवहार भी है, ध्यान रखा जाएगा।

धारा 67(3) के अनुसार सुलहकर्ता कार्यवाहियों का संचालन कैसे करेगा?

सुलहकर्ता, सुलह कार्यवाहियों का संचालन ऐसी रीति से करेगा, जो वह समुचित समझे, जिसमें मामले की परिस्थितियां, वे इच्छाएं जो पक्षकार व्यक्त करे, जिसमें किसी पक्षकार का कोई ऐसा अनुरोध भी है कि सुलहकर्ता मौखिक कथन सुने और विवाद के शीघ्र निपटारे की आवश्यकता का ध्यान रखा जाएगा।

धारा 67(4) के अनुसार सुलहकर्ता क्या कर सकता है?

सुलहकर्ता, सुलह कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर विवाद के निपटारे के लिए प्रस्ताव तैयार कर सकेगा।

धारा 67(4) के अनुसार प्रस्ताव का लिखित होना क्या आवश्यक है?

नहीं, लिखित होना आवश्यक नहीं है।

धारा 67(4) के अनुसार प्रस्ताव के साथ कारणों का कथन क्या आवश्यक है?

नहीं, कारणों का कथन आवश्यक नहीं है।

धारा 68 का विषय क्या है?

प्रशासनिक सहायता

(Administrative assistance)

धारा 68 के अनुसार प्रशासनिक सहायता की व्यवस्था कौन कर सकता है?

पक्षकार या पक्षकारों की सहमति से सुलहकर्ता।

धारा 68 के अनुसार प्रशासनिक सहायता किसके द्वारा कराई जा सकती है?

किसी उपयुक्त संस्था या व्यक्ति द्वारा।

धारा 68 के अनुसार प्रशासनिक सहायता का उद्देश्य क्या है?

सुलह कार्यवाहियों का संचालन सुकर बनाना।

धारा 69 का विषय क्या है?

सुलहकर्ता और पक्षकारों के बीच संपर्क

(Communication between conciliator and parties)

धारा 69(1) के अनुसार सुलहकर्ता क्या कर सकता है?

पक्षकारों को मिलने के लिए आमंत्रित कर सकता है या उनसे मौखिक या लिखित रूप में संपर्क कर सकता है।

धारा 69(1) के अनुसार सुलहकर्ता पक्षकारों से कैसे मिल सकता है?

एक साथ या प्रत्येक के साथ पृथक रूप से मिल सकता है या संपर्क कर सकता है।

धारा 69(2) के अनुसार बैठक के स्थान के संबंध में क्या प्रावधान है?

यदि पक्षकार करार करें तो स्थान सुलहकर्ता द्वारा अवधारित किया जाएगा।

धारा 69(2) के अनुसार सुलहकर्ता स्थान का निर्धारण कैसे करेगा?

सुलह कार्यवाहियों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और पक्षकारों से परामर्श करने के पश्चात्।

धारा 70 का विषय क्या है?

जानकारी का प्रकटीकरण

(Disclosure of information)

धारा 70 के अनुसार सुलहकर्ता को जब किसी पक्षकार से तथ्यपरक जानकारी प्राप्त होती है, तो वह क्या करेगा?

वह दूसरे पक्षकार को उस जानकारी का सार प्रकट करेगा।

धारा 70 के अनुसार जानकारी का सार प्रकट करने का उद्देश्य क्या है?

दूसरे पक्षकार को स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का अवसर देना।

धारा 70 के परन्तु के अनुसार कब सुलहकर्ता जानकारी प्रकट नहीं करेगा?

जब पक्षकार ने शर्त रखी हो कि जानकारी गोपनीय रखी जाए।

धारा 70 के परन्तु के अनुसार गोपनीय जानकारी के साथ सुलहकर्ता का दायित्व क्या है?

वह उक्त जानकारी को दूसरे पक्षकार को प्रकट नहीं करेगा।

धारा 71 का विषय क्या है?

पक्षकारों का सुलहकर्ता से सहयोग।

(Co-operation of parties with conciliator)

धारा 71 के अनुसार पक्षकारों का सामान्य दायित्व क्या है?

वे सद्भावना से सुलहकर्ता से सहयोग करेंगे।

धारा 71 के अनुसार पक्षकार विशेष रूप से किन कार्यों में सहयोग करेंगे?

लिखित सामग्री प्रस्तुत करने, साक्ष्य देने और बैठकों में सम्मिलित होने में।

धारा 71 के अनुसार पक्षकार किसका अनुपालन करने का प्रयास करेंगे?

सुलहकर्ता के अनुरोध का।

धारा 72 का विषय क्या है?

विवादों के निपटारे के लिए पक्षकारों द्वारा सुझाव

(Suggestions by parties for settlement of dispute)

धारा 72 के अनुसार सुझाव कौन प्रस्तुत करेगा?

प्रत्येक पक्षकार।

धारा 72 के अनुसार सुझाव कब प्रस्तुत किए जा सकते हैं?

स्वप्रेरणा से या सुलहकर्ता के आमन्त्रण पर।

धारा 72 के अनुसार सुझाव किसके लिए होंगे?

विवाद के निपटारे के लिए।

धारा 72 के अनुसार सुझाव किसे प्रस्तुत किए जाएंगे?

सुलहकर्ता को।

धारा 73 का विषय क्या है?

समझौता करार

(Settlement agreement)

धारा 73(1) के अनुसार सुलहकर्ता कब निबंधन तैयार करेगा?

जब उसे प्रतीत हो कि समझौते के ऐसे तत्व मौजूद हैं जो पक्षकारों को स्वीकार्य हो सकते हैं।

धारा 73(1) के अनुसार सुलहकर्ता क्या करेगा?

संभावित समझौते के निबंधन तैयार कर पक्षकारों को उनके विचार व्यक्त करने के लिए देगा।

धारा 73(2) के अनुसार यदि पक्षकार समझौते पर करार करते हैं तो क्या करेंगे?

एक लिखित समझौता करार तैयार कर उस पर हस्ताक्षर करेंगे।

धारा 73(2) के अनुसार सुलहकर्ता की क्या भूमिका हो सकती है?

पक्षकारों के अनुरोध पर समझौता करार तैयार कर सकता है या उसमें सहायता कर सकता है।

धारा 73(3) के अनुसार समझौता करार कब अंतिम होगा?

जब पक्षकार उस पर हस्ताक्षर करेंगे।

धारा 73(3) के अनुसार समझौता करार किस पर आबद्धकारी होगा?

पक्षकारों तथा उनके अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों पर।

धारा 73(4) के अनुसार सुलहकर्ता का क्या कर्तव्य है?

समझौता करार को अधिप्रमाणित करेगा और उसकी प्रति प्रत्येक पक्षकार को देगा।

धारा 74 का विषय क्या है?

समझौता करार की प्रास्थिति और प्रभाव

(Status and effect of settlement agreement)

धारा 74 के अनुसार समझौता करार की प्रास्थिति क्या होगी?

वही जो धारा 30 के अधीन माध्यस्थम् पंचाट की होती है।

धारा 74 के अनुसार समझौता करार का प्रभाव क्या होगा?

मानो वह विवाद के सार पर करार पाए गए निबन्धनों पर माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा दिया गया माध्यस्थम् पंचाट हो।

धारा 75 का विषय क्या है?

गोपनीयता

(Confidentiality)

धारा 75 के अनुसार गोपनीयता का दायित्व किन पर है?

सुलहकर्ता और पक्षकारों पर।

धारा 75 के अनुसार किन बातों को गोपनीय रखा जाएगा?

सुलह कार्यवाहियों से संबंधित सभी बातें।

धारा 75 के अनुसार गोपनीयता का विस्तार किस तक होगा?

समझौता करार तक।

धारा 75 के अनुसार गोपनीयता से अपवाद कब होगा?

जब क्रियान्वयन और संप्रवर्तन के प्रयोजनों के लिए प्रकटीकरण आवश्यक हो।

धारा 76 का विषय क्या है?

सुलह कार्यवाहियों का समापन।

(Termination of conciliation proceedings)

धारा 76 के अनुसार सुलह कार्यवाहियों का समापन कब होगा?

करार की तारीख को, पक्षकारों द्वारा समझौता करार पर हस्ताक्षर करके ; या

घोषणा की तारीख को, पक्षकारों के साथ परामर्श करने के पश्चात् सुलहकर्ता की इस प्रभाव की लिखित घोषणा द्वारा कि सुलह के लिए आगे प्रयास अब न्यायसंगत नहीं है; या

घोषणा की तारीख को, पक्षकारों द्वारा सुलहकर्ता को संबोधित इस प्रभाव की लिखित घोषणा द्वारा कि सुलह कार्यवाहियों का समापन किया जाता है; या

घोषणा की तारीख को एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार को और सुलहकर्ता को, यदि नियुक्त किया गया है, इस प्रभाव की लिखित घोषणा द्वारा कि सुलह कार्यवाहियों का समापन किया जाता है, समापन हो जाएगा

धारा 77 का विषय क्या है?

माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाहियों का सहारा लेना

(Resort to arbitral or judicial proceedings)

धारा 77 के अनुसार सुलह कार्यवाहियों के दौरान पक्षकार क्या नहीं करेंगे?

विवाद की बाबत कोई माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाहियां आरंभ नहीं करेंगे।

धारा 77 के अनुसार अपवाद कब लागू होगा?

जब किसी पक्षकार की राय में उसके अधिकारों के संरक्षण के लिए ऐसी कार्यवाहियां आवश्यक हों।

धारा 78 का विषय क्या है?

खर्च

(Cost)

धारा 78(1) के अनुसार सुलहकर्ता खर्च कब नियत करेगा?

सुलह कार्यवाहियों के समापन पर।

धारा 78(1) के अनुसार सुलहकर्ता क्या करेगा?

सुलह का खर्च नियत कर उसकी लिखित सूचना पक्षकारों को देगा।

धारा 78(2) के अनुसार "खर्ची" से क्या अभिप्रेत है?

सुलहकर्ता की और पक्षकारों की सहमति से सुलहकर्ता द्वारा अनुरोध किए गए साक्षियों की फीस और व्यय,

पक्षकारों की सहमति से सुलहकर्ता द्वारा अनुरोध की गई कोई विशेषज्ञ सलाह,

धारा 64 की उपधारा (2) के खंड () और धारा 68 के अनुसरण में उपबंधित कोई सहायता;

सुलह कार्यवाहियों और समझौता करार के संबंध में उपगत कोई अन्य व्यय

धारा 78(3) के अनुसार खर्च का वहन कैसे किया जाएगा?

जब तक अन्यथा उपबंध हो, पक्षकार बराबर-बराबर वहन करेंगे।

धारा 78(3) के अनुसार अन्य व्ययों का वहन कौन करेगा?

जिस पक्षकार द्वारा व्यय उपगत किया गया है, वही करेगा।

धारा 79 का विषय क्या है?

निक्षेप

(Deposits)

धारा 79(1) के अनुसार सुलहकर्ता क्या निर्देश दे सकता है?

प्रत्येक पक्षकार को समान रकम का अग्रिम निक्षेप करने का निर्देश दे सकता है।

धारा 79(1) के अनुसार निक्षेप किन खर्चों के लिए होगा?

धारा 78(2) में निर्दिष्ट अपेक्षित खर्चों के लिए।

धारा 79(2) के अनुसार सुलहकर्ता क्या अतिरिक्त निर्देश दे सकता है?

प्रत्येक पक्षकार को समान रकम का अनुपूरक निक्षेप करने का निर्देश।

धारा 79(3) के अनुसार निक्षेप का संदाय कितने समय में होना चाहिए?

तीस दिन के भीतर।

धारा 79(3) के अनुसार निक्षेप का पूर्ण संदाय न होने पर सुलहकर्ता क्या कर सकता है?

घोषणा की तारीख को कार्यवाहियों को निलंबित कर सकता है या समापन की लिखित घोषणा कर सकता है।

धारा 79(4) के अनुसार सुलहकर्ता का क्या दायित्व है?

प्राप्त निक्षेपों का लेखा पक्षकारों को देगा।

धारा 79(4) के अनुसार अतिशेष राशि का क्या होगा?

व्यय किया गया अतिशेष पक्षकारों को वापस किया जाएगा।

धारा 80 का विषय क्या है?

अन्य कार्यवाहियों में सुलहकर्ता की भूमिका

(Role of conciliator in other proceedings)

धारा 80 के प्रावधान कब लागू होंगे?

जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार किया गया हो।

धारा 80(क) के अनुसार सुलहकर्ता क्या नहीं करेगा?

उसी विवाद में किसी माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाही में माध्यस्थम्, प्रतिनिधि या परामर्शी के रूप में कार्य नहीं करेगा।

धारा 80(क) के अनुसार निषेध किस विवाद पर लागू होता है?

उस विवाद पर जो सुलह कार्यवाही की विषय-वस्तु है।

धारा 80(ख) के अनुसार पक्षकार क्या नहीं करेंगे?

सुलहकर्ता को किसी माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाहियों में साक्षी के रूप में पेश नहीं करेंगे।

धारा 81 का विषय क्या है?

अन्य कार्यवाहियों में साक्ष्य की ग्राह्यता

(Admissibility of evidence in other proceedings)

धारा 81 के अनुसार पक्षकार माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाहियों में, चाहे ऐसी कार्यवाहियां उस विवाद से संबंधित हों या न हों, जो सुलह कार्यवाहियों की विषय-वस्तु हैं किन कार्य बातों पर निर्भर नहीं करेंगे?

विवाद के संभाव्य निपटारे की बाबत दूसरे पक्षकार द्वारा व्यक्त किए गए विचारों या दिए गए सुझावों पर;

सुलह कार्यवाहियों के अनुक्रम में दूसरे पक्षकार द्वारा की गई स्वीकृतियों पर;

सुलहकर्ता द्वारा दिए गए प्रस्तावों पर;

इस तथ्य पर कि दूसरे पक्षकार ने सुलहकर्ता द्वारा निपटारे के लिए दिए गए प्रस्ताव को स्वीकार करने की अपनी रजामंदी उपदर्शित की थी, निर्भर नहीं करेंगे या उन्हें साक्ष्य के रूप में पुरःस्थापित नहीं करेंगे।

 

भाग-4

(PART-IV)

अनुपूरक उपबंध

(SUPPLEMENTARY PROVISIONS)

भाग 4 का विषय क्या है?

अनुपूरक उपबंध

(Supplementary Provisions)

धारा 82 का विषय क्या है?

नियम बनाने की उच्च न्यायालय की शक्ति

(Power of High Court to make rules)

धारा 82 के अनुसार उच्च न्यायालय किस संबंध में नियम बना सकता है?

इस अधिनियम के अधीन न्यायालय के समक्ष सभी कार्यवाहियों के संबंध में।

धारा 83 का विषय क्या है?

कठिनाइयों का दूर किया जाना।

(Removal of difficulties)

धारा 83(1) के अनुसार यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो कौन कार्य करेगा?

केन्द्रीय सरकार,

राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत हो और कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो

धारा 83(1) के परन्तु के अनुसार आदेश कब तक किया जा सकता है?

अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि के भीतर।

धारा 83(2) के अनुसार आदेश का क्या किया जाएगा?

बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।

धारा 84 का विषय क्या है?

नियम बनाने की शक्ति

(Power to make rules)

धारा 84(1) के अनुसार नियम बनाने की शक्ति किसके पास है?

केन्द्रीय सरकार के पास।

धारा 84(2) के अनुसार प्रत्येक नियम को कहाँ रखा जाएगा?

संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष।

धारा 84(2) के अनुसार नियम कितने समय के लिए रखा जाएगा?

कुल तीस दिन की अवधि के लिए।

धारा 84(2) के अनुसार तीस दिन की अवधि कैसे पूरी हो सकती है?

एक सत्र में या दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में।

धारा 84(2) के अनुसार यदि दोनों सदन परिवर्तन के लिए सहमत हों तो क्या होगा?

नियम परिवर्तित रूप में प्रभावी होगा।

धारा 84(2) के अनुसार यदि दोनों सदन नियम को न बनाने के लिए सहमत हों तो क्या होगा?

नियम निष्प्रभाव हो जाएगा।

धारा 84(2) के अनुसार नियम के परिवर्तन या निष्प्रभाव होने का क्या प्रभाव होगा?

पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

धारा 85 का विषय क्या है?

निरसन और व्यावृत्ति।

(Repeal and savings)

धारा 85(1) के अनुसार कौन-कौन से अधिनियम निरसित किए जाते हैं?

माध्यस्थम् (प्रोटोकोल और अभिसमय) अधिनियम, 1937; माध्यस्थम् अधिनियम, 1940; और विदेशी पंचाट (मान्यता और प्रवर्तन) अधिनियम, 1961

धारा 85(2) के अनुसार निरसन के बावजूद क्या प्रभाव रहेगा?

उक्त अधिनियमितियों में के उपबंध, ऐसी माध्यस्थम् कार्यवाहियों के संबंध में, जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व आरंभ हुई थी, तब तक लागू होंगे जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार किया गया हो किन्तु यह अधिनियम ऐसी माध्यस्थम् कार्यवाहियों के संबंध में लागू होगा जो इस अधिनियम के प्रवृत्त होने पर या उसके पश्चात् प्रारंभ हुई है;

उक्त अधिनियमितियों के अधीन बनाए गए सभी नियम और प्रकाशित अधिसूचनाएं उस विस्तार तक जिस तक वे इस अधिनियम के विरुद्ध नहीं हैं, क्रमशः इस अधिनियम के अधीन की गई या जारी की गई समझी जाएंगी।

धारा 86 का विषय क्या है?

निरसन और व्यावृत्ति।

(Repeal and saving)

धारा 86(1) के अनुसार कौन सा अध्यादेश निरसित किया जाता है?

माध्यस्थम् और सुलह (तीसरा) अध्यादेश, 1996

धारा 86(2) के अनुसार निरसन के बावजूद क्या प्रभाव रहेगा?

उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कार्यवाहियां वैध मानी जाएंगी।

धारा 86(2) के अनुसार किन-किन कार्यों को मान्यता दी जाएगी?

आदेश, नियम, अधिसूचना, स्कीम या अन्य कार्रवाई।

धारा 86(2) के अनुसार इन कार्यों को किसके अधीन किया हुआ माना जाएगा?

इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन किया गया माना जाएगा।

धारा 87 का विषय क्या है?

23 अक्तूबर, 2015 से पूर्व आरंभ की गई माध्यस्थम् और संबद्ध न्यायालय कार्यवाहियों का प्रभाव।

(Effect of arbitral and related court proceedings commenced prior to 23rd October, 2015)

धारा 87(क) के अनुसार संशोधन किन पर लागू नहीं होंगे?

23 अक्तूबर, 2015 से पूर्व आरंभ की गई माध्यस्थम् कार्यवाहियों पर।

धारा 87(क) के अनुसार संशोधन किन कार्यवाहियों पर लागू नहीं होंगे?

माध्यस्थम् और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2015 (2016 का 3) से पूर्व आरंभ की गई माध्यस्थम् कार्यवाहियों;

इस बात को ध्यान में रखते हुए कि कोई न्यायालय कार्यवाहियां माध्यस्थम् और सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2015 (2016 का 3) के आरंभ से पूर्व या उसके पश्चात् आरंभ की गई थी, ऐसी माध्यस्थम् कार्यवाहियों से उदभूत होने वाली या उनसे संबंधित न्यायालय कार्यवाहियों;

धारा 87(ख) के अनुसार संशोधन किन पर लागू होंगे?

संशोधन अधिनियम, 2015 के आरंभ पर या उसके पश्चात् आरंभ की गई माध्यस्थम् कार्यवाहियों पर।

धारा 87(ख) के अनुसार संशोधन किन न्यायालय कार्यवाहियों पर लागू होंगे?

ऐसी न्यायालय कार्यवाहियों पर जो इन नई माध्यस्थम् कार्यवाहियों से उद्भूत या संबंधित हैं।

धारा 87 के अंतःस्थापन का स्रोत क्या है?

2019 के अधिनियम सं० 33 की धारा 13 द्वारा।

 

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