भारतीय वन अधिनियम वन-लाइनर नोट्स

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

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भारतीय वन अधिनियम, 1927

(Indian Forest Act, 1927)

अधिनियम संख्यांक 16, 1927

(Act 16 of 1927)

 

इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम क्या है?

भारतीय वन अधिनियम, 1927

(Indian Forest Act, 1927)

भारतीय वन अधिनियम, 1927 का अधिनियम संख्यांक क्या है?

अधिनियम संख्यांक 16, 1927

(Act 16 of 1927)

भारतीय वन अधिनियम, 1927 को राष्ट्रपति की स्वीकृति कब प्राप्त हुई?

21 सितम्बर, 1927

भारतीय वन अधिनियम, 1927 को अधिनियमित करने का उद्देश्य क्या है?

वनों, वन-उपज के अभिवहन तथा इमारती लकड़ी एवं अन्य वन-उपज पर उग्रहणीय शुल्क से सम्बद्ध विधि का समेकन करना।

प्रस्तावना के अनुसार किन विषयों से सम्बद्ध विधि का समेकन किया गया है?

वनों, वन-उपज के अभिवहन तथा इमारती लकड़ी एवं अन्य वन-उपज पर उग्रहणीय शुल्क से सम्बद्ध विधि का।

प्रस्तावना के अनुसार विधि का समेकन करना क्यों आवश्यक माना गया?

क्योंकि ऐसा करना समीचीन समझा गया।

प्रस्तावना के अनुसार यह अधिनियम किस उद्देश्य से अधिनियमित किया गया है?

वनों, वन-उपज के अभिवहन तथा इमारती लकड़ी एवं अन्य वन-उपज पर उग्रहणीय शुल्क से सम्बद्ध विधि का समेकन करने के उद्देश्य से।

 

अध्याय-1

(Chapter-I)

प्रारम्भिक

(Preliminary)

धारा 1 का विषय क्या है?

संक्षिप्त नाम और विस्तार।

(Short title and extent)

इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम क्या है?

भारतीय वन अधिनियम, 1927

भारतीय वन अधिनियम, 1927 का विस्तार किन क्षेत्रों पर है?

उन राज्यक्षेत्रों को छोड़कर, जो प्रथम नवम्बर, 1956 से ठीक पूर्व भाग राज्यों में समाविष्ट थे, संपूर्ण भारत पर।

भारतीय वन अधिनियम, 1927 किन राज्यक्षेत्रों को लागू है?

उन राज्यक्षेत्रों को जो प्रथम नवम्बर, 1956 से ठीक पूर्व बिहार, मुम्बई, कुर्ग, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बंगाल में समाविष्ट थे।

राज्य सरकार भारतीय वन अधिनियम, 1927 को कहाँ प्रवर्तन में ला सकती है?

उस पूर्ण राज्य में या उसके किसी विनिर्दिष्ट भाग में, जिस पर इसका विस्तार है और जहाँ यह प्रवर्तन में नहीं है।

राज्य सरकार भारतीय वन अधिनियम, 1927 को प्रवर्तन में किस माध्यम से ला सकती है?

राजपत्र में अधिसूचना द्वारा।

राज्य सरकार किन क्षेत्रों में भारतीय वन अधिनियम, 1927 को प्रवर्तन में ला सकती है?

जिस पर भारतीय वन अधिनियम, 1927 का विस्तार है, किन्तु जहाँ यह प्रवर्तन में नहीं है।

धारा 2 का विषय क्या है?

निर्वचन खण्ड।

(Interpretation clause)

धारा 2(1)  का विषय क्या है?

"पशु" (cattle) की परिभाषा।

धारा 2 के अनुसार "पशु" के अंतर्गत कौन-कौन से जीव सम्मिलित हैं?

हाथी, ऊंट, भैंसे, घोड़े, घोड़ियां, खस्सी, पशु, टट्टू, बछेड़े, बछेड़िया, खच्चर, गधे, सुअर, मेढ़े, मेढ़िया, भेड़ें, मेमने, बकरियां तथा बकरियों के मेमने।

धारा 2(2) का विषय क्या है?

"वन अधिकारी" (Forest Officer) की परिभाषा।

धारा 2(2) के अनुसार "वन अधिकारी" से क्या अभिप्रेत है?

ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे राज्य सरकार या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त कोई अधिकारी भारतीय वन अधिनियम, 1927 के सब या किसी प्रयोजन को पूरा करने के लिए अथवा भारतीय वन अधिनियम, 1927 या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन वन अधिकारी द्वारा की जाने के लिए अपेक्षित कोई बात करने के लिए नियुक्त करे |

धारा 2(3) का विषय क्या है?

"वन अपराध" (forest-offence) की परिभाषा।

धारा 2(3) के अनुसार "वन अपराध" से क्या अभिप्रेत है?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन दण्डनीय कोई अपराध।

धारा 2(4) का विषय क्या है?

"वन-उपज" (forest-produce) की परिभाषा।

धारा 2(4)() के अनुसार कौन-सी वस्तुएँ वन-उपज हैं, चाहे वे वन में पाई गई हों या वन से लाई गई हों अथवा नहीं?

इमारती लकड़ी, लकड़ी का कोयला, कुचुक, खैर, लकड़ी का तेल, राल, प्राकृतिक वार्निश, छाल, लाख, महुआ के फूल, महुआ के बीज, कुथ तथा हरड़।

धारा 2(4)() के अनुसार वहाँ वर्णित वस्तुएँ कब वन-उपज मानी जाएँगी?

जब वे वन में पाई जाती हैं या वन से लाई जाती हैं।

धारा 2(4)() के अनुसार कौन-कौन-सी श्रेणियों की वस्तुएँ वन-उपज हैं?

(i) वृक्ष और पत्ते, फूल और फल और वृक्षों के इसमें इसके पूर्व अवर्णित सब अन्य भाग

(ii) (घास, बेलें, नरकुल और काई सहित) वे पौधे जो वृक्ष नहीं हैं और ऐसे पौधों के सब भाग और उपज, और उपज

(iii) वन्य पशु और खालें, हाथी दांत, सींग, हड्डियां, रेशम, रेशम के कोए, शहद और मोम तथा पशुओं के सब अन्य भाग या उत्पाद,

(iv) पीट, सतही मिट्टी, चट्टान और (चूना पत्थर, लेटराइट, खनिज तेल और खानों और खदानों की सब पैदावार सहित) खनिज;

धारा 2(4) का विषय क्या है?

"स्वामी" (owner) की परिभाषा।

धारा 2(4) के अनुसार "स्वामी" के अंतर्गत कौन आता है?

ऐसी सम्पत्ति के संबंध में प्रतिपाल्य अधिकरण, जो उसके अधीक्षण या भार-साधन में है।

धारा 2(4) के अनुसार प्रतिपाल्य अधिकरण कब "स्वामी" माना जाएगा?

जब सम्पत्ति उसके अधीक्षण या भार-साधन में हो।

धारा 2(5) का विषय क्या है?

"नदी" (river) की परिभाषा।

धारा 2(5) के अनुसार "नदी" के अंतर्गत क्या-क्या सम्मिलित है?

सरिता, नहर, सकरी खाड़ी तथा अन्य प्राकृतिक या कृत्रिम जल सरणी।

क्या धारा 2(5) के अनुसार कृत्रिम जल सरणी भी "नदी" के अंतर्गत आती है?

हाँ।

धारा 2(6) का विषय क्या है?

"इमारती लकड़ी" (timber) की परिभाषा।

धारा 2(6) के अनुसार "इमारती लकड़ी" के अंतर्गत वृक्ष कब आते हैं?

जब वे गिर गए हों या गिराए गए हों।

धारा 2(6) के अनुसार "इमारती लकड़ी" में किस प्रकार की लकड़ी सम्मिलित है?

सब प्रकार की लकड़ी।

धारा 2(6) के अनुसार क्या किसी प्रयोजन के लिए काटी, गढ़ी या खोखली की गई लकड़ी भी "इमारती लकड़ी" है?

हाँ, चाहे वह किसी प्रयोजन के लिए काटी, गढ़ी या खोखली की गई हो या नहीं।

धारा 2(7) का विषय क्या है?

"वृक्ष" (tree) की परिभाषा।

धारा 2(7) के अनुसार "वृक्ष" के अंतर्गत क्या-क्या आता है?

ताड़, बांस, ठूंठ, झाड़-झांखड़ तथा बेंत।

 

अध्याय-2

(Chapter-II)

आरक्षित वनों के सम्बन्ध में

(Of Reserved Forests)

धारा 3 का विषय क्या है?

वनों को आरक्षित करने की शक्ति।

Power to reserve forests

धारा 3 के अनुसार आरक्षित वन घोषित करने की शक्ति किसके पास है?

राज्य सरकार के पास।

धारा 3 के अनुसार राज्य सरकार किन भूमियों को आरक्षित वन बना सकती है?

ऐसी वन भूमि या बंजर भूमि, जो सरकार की सम्पत्ति है, या जिस पर सरकार के साम्पत्तिक अधिकार हैं, या जिसकी पूरी वन-उपज अथवा उसके किसी भाग की सरकार हकदार है।

धारा 3 के अनुसार राज्य सरकार आरक्षित वन किस प्रकार बना सकेगी?

इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित रीति से।

धारा 4 का विषय क्या है?

राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना।

(Notification by State Government)

धारा 4(1) के अनुसार राज्य सरकार अधिसूचना कब जारी करेगी?

जब किसी भूमि को आरक्षित वन बनाने का विनिश्चय कर लिया गया हो।

धारा 4(1) के अनुसार अधिसूचना में किन बातों की घोषणा की जाएगी?

() यह घोषणा करने वाली कि यह विनिश्चित किया गया है कि ऐसी भूमि को आरक्षित वन बनाया जाए,

() ऐसी भूमि की स्थिति, और सीमाओं को यथासंभव विनिर्दिष्ट करने वाली, तथा

() ऐसी सीमाओं के अन्दर समाविष्ट किसी भूमि में या उस भूमि पर या किसी वन-उपज में या उस उपज पर उन किन्हीं अधिकारों की, जिनकी बाबत यह अभिकथित है कि वे किसी व्यक्ति के पक्ष में विद्यमान हैं, विद्यमानता, स्वरूप और विस्तार की जांच और अवधारण करने के लिए और उसके सम्बन्ध में ऐसी कार्यवाही करने के लिए, जैसी इस अध्याय में उपबन्धित है, अधिकारी (जिसे इसमें इसके पश्चात् वन व्यवस्थापन अधिकारी कहा गया है) नियुक्त करने वाली, अधिसूचना राजपत्र में निकालेगी

धारा 4(1)() के अनुसार वन व्यवस्थापन अधिकारी की नियुक्ति किस उद्देश्य से की जाती है?

भूमि या वन-उपज पर व्यक्तियों के अभिकथित अधिकारों की विद्यमानता, स्वरूप और विस्तार की जाँच एवं अवधारण तथा इस अध्याय के अनुसार कार्यवाही करने के लिए।

धारा 4(1) के अनुसार अधिसूचना कहाँ प्रकाशित की जाएगी?

राजपत्र में।

धारा 4 के स्पष्टीकरण के अनुसार वन की सीमाओं का वर्णन किस प्रकार करना पर्याप्त होगा?

पथों, नदियों, टीलों या अन्य सुविदित अथवा सहज समझी जाने वाली सीमाओं द्वारा।

धारा 4(2) के अनुसार उपधारा (1)() के अधीन नियुक्त अधिकारी सामान्यतः कौन होगा?

ऐसा व्यक्ति जिसने वन व्यवस्थापन अधिकारी के पद के सिवाय कोई वन पद धारण नहीं कर रखा है।

धारा 4(3) के अनुसार राज्य सरकार वन व्यवस्थापन अधिकारी के कर्तव्यों के पालन हेतु कितने अधिकारियों को नियुक्त कर सकती है?

तीन से अनधिक अधिकारियों को, जिनमें से एक से अनधिक ऐसा व्यक्ति होगा जो वन व्यवस्थापन अधिकारी के पद के अतिरिक्त कोई वन पद धारण करता है।

धारा 5 का विषय क्या है?

वन अधिकारों के प्रोद्भूत होने का वर्जन।

(Bar of accrual of forest rights)

धारा 5 के अनुसार धारा 4 की अधिसूचना के पश्चात् भूमि में या उस पर नया अधिकार कब अर्जित किया जा सकता है?

केवल उत्तराधिकार के जरिए या सरकार अथवा ऐसे व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से, जिसमें अधिसूचना के समय ऐसा अधिकार निहित था, लिखित अनुदान या संविदा के अधीन।

धारा 5 के अनुसार धारा 4 की अधिसूचना के पश्चात् भूमि में नई कटाई-सफाई कब की जा सकती है?

राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार।

धारा 5 के अनुसार नई कटाई-सफाई किन प्रयोजनों के लिए प्रतिबंधित है?

खेती या किसी अन्य प्रयोजन के लिए, जब तक वह राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार की जाए।

धारा 6 का विषय क्या है?

वन व्यवस्थापन अधिकारी द्वारा उद्घोषणा।

(Proclamation by Forest Settlement Officer)

धारा 6 के अनुसार धारा 4 की अधिसूचना के पश्चात् वन व्यवस्थापन अधिकारी उद्घोषणा में किन बातों का उल्लेख करेगा?

प्रस्थापित वन की स्थिति एवं सीमाएँ, वन के आरक्षण के परिणाम तथा अधिकारों के दावे प्रस्तुत करने हेतु कालावधि।

धारा 6() के अनुसार अधिकार का दावा करने वाले व्यक्ति को कितनी न्यूनतम अवधि दी जाएगी?

उद्घोषणा की तारीख से तीन मास से अन्यून कालावधि।

धारा 6() के अनुसार अधिकार का दावा करने वाला व्यक्ति वन व्यवस्थापन अधिकारी के समक्ष क्या प्रस्तुत करेगा?

अधिकार के स्वरूप तथा दावाकृत प्रतिकर (यदि कोई हो) के परिमाण एवं विशिष्टियों की लिखित सूचना या उपस्थित होकर कथन करेगा।

धारा 6 के अनुसार उद्घोषणा कहाँ और किस भाषा में प्रकाशित की जाएगी?

उद्घोषणा में समाविष्ट भूमि के पड़ोस के प्रत्येक नगर एवं ग्राम में स्थानीय जनभाषा में।

धारा 7 का विषय क्या है?

वन व्यवस्थापन अधिकारी द्वारा जांच।

(Inquiry by Forest Settlement Officer)

धारा 7 के अनुसार वन व्यवस्थापन अधिकारी धारा 6 के अधीन दिए गए कथनों के संबंध में क्या करेगा?

सभी कथनों को लिखेगा।

धारा 7 के अनुसार वन व्यवस्थापन अधिकारी किन दावों एवं अधिकारों की जांच करेगा?

धारा 6 के अधीन सम्यक् रूप से किए गए सभी दावों तथा धारा 4 या धारा 5 में वर्णित ऐसे अधिकारों की, जिनके लिए धारा 6 के अधीन दावा नहीं किया गया है।

धारा 7 के अनुसार अधिकारों की जांच किस आधार पर की जाएगी?

सरकार के अभिलेखों तथा ऐसे व्यक्तियों के साक्ष्य के आधार पर, जिनके उनसे परिचित होने की संभाव्यता हो।

धारा 7 के अनुसार जांच कहाँ की जाएगी?

किसी सुविधाजनक स्थान पर।

धारा 8 का विषय क्या है?

वन व्यवस्थापन अधिकारी की शक्तियां।

(Powers of Forest Settlement Officer)

धारा 8 के अनुसार जांच के प्रयोजन के लिए वन व्यवस्थापन अधिकारी को कौन-सी भूमि संबंधी शक्ति प्राप्त है?

किसी भूमि पर स्वयं या अपने द्वारा प्राधिकृत अधिकारी के माध्यम से प्रवेश करने, उसका सर्वेक्षण करने, उसे अभ्यंकित करने तथा उसका नक्शा बनाने की शक्ति।

धारा 8() के अनुसार भूमि पर प्रवेश एवं सर्वेक्षण कौन कर सकता है?

वन व्यवस्थापन अधिकारी स्वयं या उसके द्वारा इस प्रयोजन के लिए प्राधिकृत अधिकारी।

धारा 8() के अनुसार वन व्यवस्थापन अधिकारी को कौन-सी न्यायिक शक्ति प्राप्त है?

वादों के विचारण में सिविल न्यायालय की शक्तियां।

धारा 9 का विषय क्या है?

अधिकारों का निर्वापन।

(Extinction of rights)

धारा 9 के अनुसार कौन-से अधिकार निर्वापित हो जाएंगे?

जिनका दावा धारा 6 के अधीन नहीं किया गया है और जिनके अस्तित्व की जानकारी धारा 7 की जांच से नहीं मिली है।

धारा 9 के अनुसार अधिकारों का निर्वापन कब नहीं होगा?

जब अधिकार का दावा करने वाला व्यक्ति धारा 20 की अधिसूचना के प्रकाशित होने से पूर्व वन व्यवस्थापन अधिकारी को यह समाधान कर दे कि धारा 6 के अधीन नियत अवधि में दावा करने के लिए उसके पास पर्याप्त कारण था।

धारा 9 के अनुसार पर्याप्त कारण के संबंध में वन व्यवस्थापन अधिकारी को कब तक संतुष्ट किया जा सकता है?

धारा 20 के अधीन अधिसूचना के प्रकाशित होने से पूर्व।

धारा 10 का विषय क्या है?

स्थानान्तरी खेती की पद्धति सम्बन्धी दावों से बरतना।

(Treatment of claims relating to practice of shifting cultivation)

धारा 10(1) के अनुसार स्थानान्तरी खेती की पद्धति सम्बन्धी दावे पर वन व्यवस्थापन अधिकारी क्या करेगा?

दावे तथा उससे सम्बन्धित स्थानीय नियम या आदेश की विशिष्टियाँ अभिलिखित कर अपनी राय सहित राज्य सरकार को भेजेगा।

धारा 10(2) के अनुसार राज्य सरकार स्थानान्तरी खेती की पद्धति के संबंध में क्या आदेश दे सकती है?

उसे पूर्णतः या भागतः अनुज्ञात अथवा निषिद्ध करने का आदेश।

धारा 10(3) के अनुसार स्थानान्तरी खेती की पद्धति अनुज्ञात होने पर वन व्यवस्थापन अधिकारी उसके प्रयोग का प्रबन्ध कैसे कर सकता है?

भूमि की सीमाएँ बदलकर या बन्दोबस्त वाली भूमि के प्रभाग पृथक अभ्यंकित कर शर्तों सहित दावेदारों को अनुज्ञा देकर।

धारा 10(4) एवं (5) के अनुसार उपधारा (3) के अधीन किए गए इंतजाम किसके अधीन होंगे तथा स्थानान्तरी खेती की पद्धति का स्वरूप क्या माना जाएगा?

राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी के अधीन होंगे तथा यह राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित, निर्बन्धित और उत्सादित किया जाने वाला विशेषाधिकार माना जाएगा।

धारा 11 का विषय क्या है?

ऐसी भूमि को अर्जित करने की शक्ति जिस पर अधिकार का दावा किया गया है।

(Power to acquire land over which right is claimed)

धारा 11(1) के अनुसार वन व्यवस्थापन अधिकारी किन अधिकारों से भिन्न भूमि संबंधी दावे पर आदेश देगा?

मार्ग अधिकार, चरागाह अधिकार, वन-उपज के अधिकार या जलमार्ग के अधिकार से भिन्न किसी अधिकार संबंधी दावे पर।

धारा 11(2) के अनुसार दावा पूर्णतः या भागतः मंजूर होने पर वन व्यवस्थापन अधिकारी क्या कर सकता है?

भूमि को प्रस्थापित वन की सीमाओं से अपवर्जित कर सकता है, अधिकारों के अभ्यर्पण हेतु स्वामी से करार कर सकता है या भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 के अनुसार भूमि अर्जित करने की कार्यवाही कर सकता है।

धारा 11(3) के अनुसार भूमि अर्जन के प्रयोजन के लिए किन विधिक कल्पनाओं (Deeming Provisions) का उपबंध किया गया है?

() वन व्यवस्थापन अधिकारी की बाबत यह समझा जाएगा कि वह भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) के अधीन कार्यवाही करने वाला कलक्टर है;

() दावेदार के बारे में यह समझा जाएगा कि वह हितबद्ध और उस अधिनियम की धारा 9 के अधीन दी गई सूचना के अनुसार उसके समक्ष हाजिर होने वाला व्यक्ति है;

() उस अधनियम की पूर्ववर्ती धाराओं के उपबन्धों के बारे में यह समझा जाएगा कि उनका अनुपालन हो चुका है; और

() कलक्टर, दावेदार की सम्मति से या न्यायालय, दोनों पक्षकारों की सम्मति से, भूमि के रूप में या भागतः भूमि के रूप में और भागतः धन के रूप में प्रतिकर अधिनिर्णीत कर सकेगा।

धारा 12 का विषय क्या है?

चरागाह या वन-उपज पर के अधिकारों के दावों पर आदेश।

(Order on claims to rights of pasture or to forest-produce)

धारा 12 के अनुसार यह धारा किन दावों पर लागू होती है?

चरागाह या वन-उपज पर के अधिकारों से संबंधित दावों पर।

धारा 12 के अनुसार चरागाह या वन-उपज पर के अधिकारों के दावों पर वन व्यवस्थापन अधिकारी क्या आदेश पारित कर सकता है?

दावे को पूर्णतः या भागतः मंजूर या खारिज करने का आदेश।

धारा 13 का विषय क्या है?

वन व्यवस्थापन अधिकारी द्वारा तैयार किए जाने वाले अभिलेख।

(Record to be made by Forest Settlement Officer)

धारा 13 के अनुसार वन व्यवस्थापन अधिकारी अभिलेख कब तैयार करेगा?

धारा 12 के अधीन आदेश पारित करते समय।

धारा 13() के अनुसार अभिलेख में अधिकार का दावा करने वाले व्यक्ति के संबंध में क्या विवरण अंकित किया जाएगा?

उसका नाम, पिता का नाम, जाति, निवास और उपजीविका।

धारा 13() के अनुसार अभिलेख में किन सम्पत्तियों का विवरण अंकित किया जाएगा?

उन सब खेतों या खेतों के समूहों का नाम, स्थिति एवं क्षेत्रफल तथा उन सब भवनों का नाम एवं स्थिति, जिनके संबंध में अधिकारों के प्रयोग का दावा किया गया है।

धारा 14 का विषय क्या है?

जहाँ दावा मंजूर किया जाता है वहाँ अभिलेख।

(Record where he admits claim)

धारा 14 के अनुसार वन व्यवस्थापन अधिकारी अतिरिक्त अभिलेख कब तैयार करेगा?

जब वह धारा 12 के अधीन किसी दावे को पूर्णतः या भागतः मंजूर कर लेता है।

धारा 14 के अनुसार अभिलेख में किन बातों का उल्लेख किया जाएगा?

चराने के हकदार ढोरों की संख्या एवं वर्णन, चराई की ऋतु, इमारती लकड़ी एवं अन्य वन-उपज का परिमाण तथा अन्य आवश्यक विशिष्टियाँ और दावा किस सीमा तक मंजूर किया गया है।

धारा 14 के अनुसार वन व्यवस्थापन अधिकारी और क्या अभिलिखित करेगा?

दावाकृत अधिकारों के प्रयोग से प्राप्त इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज बेची या वस्तु-विनियमित की जा सकेगी या नहीं।

धारा 15 का विषय क्या है?

मंजूर किए गए अधिकारों का प्रयोग।

(Exercise of rights admitted)

धारा 15(1) के अनुसार वन व्यवस्थापन अधिकारी मंजूर किए गए अधिकारों के संबंध में क्या करेगा?

अभिलेख तैयार करने के पश्चात् आरक्षित वन को बनाए रखने का सम्यक् ध्यान रखते हुए ऐसे आदेश पारित करेगा, जिनसे मंजूर किए गए अधिकारों का निरंतर प्रयोग सुनिश्चित हो जाए।

धारा 15(2) के अनुसार मंजूर किए गए अधिकारों के प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए वन व्यवस्थापन अधिकारी क्या कर सकता है?

अन्य वन खण्ड उपवर्णित कर सकता है, प्रस्थापित वन की सीमाएँ बदल सकता है या प्रस्थापित वन में चरागाह अथवा वन-उपज के अधिकार चालू रखने का आदेश दे सकता है।

धारा 15(2)() के अनुसार चरागाह या वन-उपज के अधिकार किनके अधीन चालू रखे जा सकते हैं?

राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए नियमों के अधीन, निर्धारित ऋतु में तथा प्रस्थापित वन के निर्धारित प्रभागों के भीतर।

धारा 16 का विषय क्या है?

अधिकारों का रूपांतरण।

(Commutation of rights)

धारा 16 के अनुसार वन व्यवस्थापन अधिकारी अधिकारों का रूपांतरण कब कर सकता है?

जब आरक्षित वन को बनाए रखने का सम्यक् ध्यान रखते हुए धारा 15 के अधीन अधिकारों का निरंतर प्रयोग सुनिश्चित करना असंभव हो।

धारा 16 के अनुसार अधिकारों का रूपांतरण किन नियमों के अधीन किया जाएगा?

राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए नियमों के अधीन।

धारा 16 के अनुसार अधिकारों का रूपांतरण किन-किन प्रकार से किया जा सकता है?

धनराशि के संदाय द्वारा, भूमि के अनुदान द्वारा या किसी अन्य रीति से जिसे वन व्यवस्थापन अधिकारी उचित समझे।

धारा 17 का विषय क्या है?

धारा 11, धारा 12, धारा 15 या धारा 16 के अधीन पारित आदेश के विरुद्ध अपील।

(Appeal from order passed under section 11, section 12, section 15 or section 16)

धारा 17 के अनुसार धारा 11, 12, 15 या 16 के अधीन पारित आदेश के विरुद्ध अपील कौन कर सकता है?

दावा करने वाला व्यक्ति, कोई वन अधिकारी या राज्य सरकार द्वारा साधारण अथवा विशेष रूप से सशक्त अन्य व्यक्ति।

धारा 17 के अनुसार अपील कितनी अवधि के भीतर प्रस्तुत की जाएगी और किसके समक्ष?

आदेश की तारीख से तीन मास के भीतर, राजस्व विभाग के कलक्टर से अनिम्न पंक्ति के ऐसे अधिकारी के समक्ष जिसे राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त करे।

धारा 17 के परन्तुक के अनुसार वन न्यायालय का गठन कैसे होगा?

राज्य सरकार द्वारा स्थापित न्यायालय, जो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त तीन व्यक्तियों से मिलकर गठित होगा।

धारा 17 के परन्तुक के अनुसार वन न्यायालय स्थापित हो जाने पर अपीलें किसके समक्ष प्रस्तुत की जाएँगी?

वन न्यायालय के समक्ष।

धारा 18 का विषय क्या है?

धारा 17 के अधीन अपील।

(Appeal under section 17)

धारा 18(1) के अनुसार धारा 17 के अधीन अपील किस प्रकार की जाएगी और वन व्यवस्थापन अधिकारी का क्या कर्तव्य होगा?

लिखित अर्जी द्वारा की जाएगी तथा वन व्यवस्थापन अधिकारी उसे अविलम्ब सुनवाई के लिए सक्षम प्राधिकारी को भेज देगा।

धारा 18(2) एवं (3) के अनुसार अपील की सुनवाई किस प्रकार की जाएगी?

नियुक्त अधिकारी के समक्ष भू-राजस्व मामलों की विहित रीति से तथा वन न्यायालय के समक्ष नियत दिन एवं प्रस्थापित वन के निकट सुविधाजनक स्थान पर पक्षकारों को सूचना देकर।

धारा 18(4) के अनुसार अपील पर पारित आदेश का क्या प्रभाव होगा?

वह केवल राज्य सरकार के पुनरीक्षण के अधीन रहते हुए अंतिम होगा।

धारा 19 का विषय क्या है?

प्लीडर।

(Pleaders)

धारा 19 के अनुसार भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन जांच या अपील के दौरान प्रतिनिधि नियुक्त करने का अधिकार किसे है?

राज्य सरकार या कोई व्यक्ति जिसने भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन दावा किया है।

धारा 19 के अनुसार नियुक्त व्यक्ति किन प्राधिकारियों के समक्ष हाजिर होकर अभिवचन एवं कार्य कर सकता है?

वन व्यवस्थापन अधिकारी, अपील अधिकारी या न्यायालय के समक्ष।

धारा 20 का विषय क्या है?

वन को आरक्षित वन घोषित करने की अधिसूचना।

(Notification declaring forest reserved)

धारा 20(1) के अनुसार राज्य सरकार आरक्षित वन घोषित करने की अधिसूचना कब प्रकाशित करेगी?

जब धारा 6 एवं धारा 9 के अधीन सभी दावों का निपटारा हो जाए, धारा 17 के अधीन अपील की अवधि समाप्त हो जाए तथा सभी अपीलों का निपटारा हो जाए और धारा 11 के अंतर्गत अर्जित की जाने वाली भूमि भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 16 के अधीन सरकार में निहित हो जाए।

धारा 20(1) के अनुसार आरक्षित वन घोषित करने वाली अधिसूचना में क्या विनिर्दिष्ट किया जाएगा?

परिनिर्मित सीमा चिह्नों के अनुसार या अन्यथा वन की सीमाओं का परिनिश्चित विनिर्देशन तथा अधिसूचना द्वारा नियत तारीख से उसे आरक्षित वन घोषित किया जाएगा।

धारा 21 का विषय क्या है?

ऐसी अधिसूचना के अनुवाद का वन के आसपास में प्रकाशन।

(Publication of translation of such notification in neighbourhood of forest)

धारा 21 के अनुसार आरक्षित वन घोषित करने वाली अधिसूचना का अनुवाद कौन प्रकाशित कराएगा?

वन अधिकारी।

धारा 21 के अनुसार अधिसूचना का अनुवाद कब प्रकाशित कराया जाएगा?

अधिसूचना द्वारा नियत तारीख से पूर्व।

धारा 21 के अनुसार अधिसूचना का अनुवाद कहाँ और किस भाषा में प्रकाशित कराया जाएगा?

वन के आसपास के प्रत्येक नगर और ग्राम में स्थानीय जन भाषा में।

धारा 22 का विषय क्या है?

धारा 15 या 18 के अधीन किए गए प्रबन्ध का पुनरीक्षण करने की शक्ति।

(Power to revise arrangement made under section 15 or section 18)

धारा 22 के अनुसार राज्य सरकार धारा 15 या 18 के अधीन किए गए प्रबन्ध का पुनरीक्षण कब तक कर सकती है?

धारा 20 के अधीन अधिसूचना के प्रकाशन से पाँच वर्ष के भीतर।

धारा 22 के अनुसार पुनरीक्षण के दौरान राज्य सरकार क्या कर सकती है?

धारा 15 या धारा 18 के अधीन किए गए आदेश को विखण्डित या उपांतरित कर सकती है।

धारा 22 के अनुसार राज्य सरकार पुनरीक्षण में क्या निदेश दे सकती है?

धारा 15 की किसी कार्यवाही के स्थान पर अन्य कार्यवाही करने या धारा 12 के अधीन मंजूर अधिकारों का धारा 16 के अधीन रूपान्तरण करने का।

धारा 23 का विषय क्या है?

आरक्षित वन में अधिकारों का अर्जन।

(No right acquired over reserved forest, except as here provided)

धारा 23 के अनुसार आरक्षित वन में या उस पर अधिकार किन परिस्थितियों में अर्जित किया जा सकता है?

केवल उत्तराधिकार द्वारा, सरकार द्वारा या उसकी ओर से, अथवा ऐसे व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से दिए गए लिखित अनुदान या संविदा के अधीन, जिसमें धारा 20 की अधिसूचना के समय ऐसा अधिकार निहित था।

धारा 23 के अनुसार धारा 20 की अधिसूचना के पश्चात् आरक्षित वन में किसी प्रकार का अधिकार सामान्यतः अर्जित किया जा सकता है या नहीं?

नहीं।

धारा 24 का विषय क्या है?

मंजूरी के बिना अधिकारों का अन्य-संक्रामण।

(Rights not to be alienated without sanction)

धारा 24(1) के अनुसार धारा 15(2)() के अधीन चालू रखे गए अधिकार का अन्य-संक्रामण किसकी मंजूरी के बिना नहीं किया जा सकता?

राज्य सरकार की मंजूरी के बिना।

धारा 24(1) के परन्तुक के अनुसार ऐसा अधिकार कब भूमि या गृह के साथ बेचा या अन्यथा अन्यसंक्रान्त किया जा सकता है?

जब वह अधिकार किसी भूमि या गृह से अनुलग्न हो।

धारा 24(2) के अनुसार ऐसे अधिकार के प्रयोग से प्राप्त इमारती लकड़ी या वन-उपज कब बेची या विनियमित की जा सकती है?

केवल धारा 14 के अधीन अभिलिखित आदेश में मंजूर की गई मात्रा तक।

धारा 25 का विषय क्या है?

आरक्षित वनों में के पथों और जलमार्गों को बन्द करने की शक्ति।

(Power to stop ways and water-courses in reserved forests)

धारा 25 के अनुसार आरक्षित वन में लोक या प्राइवेट पथ अथवा जलमार्ग को कौन बन्द कर सकता है?

वन अधिकारी, राज्य सरकार या उसके सम्यक् रूप से प्राधिकृत अधिकारी की पूर्व मंजूरी से।

धारा 25 के अनुसार पथ या जलमार्ग को बन्द करने की पूर्व शर्त क्या है?

उसके स्थान पर राज्य सरकार द्वारा युक्तियुक्त रूप से सुविधाजनक समझा गया प्रतिस्थानी पथ या जलमार्ग पहले से विद्यमान हो या वन अधिकारी द्वारा उपबंधित या सन्निर्मित किया गया हो।

धारा 25 के अनुसार पथ या जलमार्ग को बन्द करने के लिए पूर्व मंजूरी किसकी आवश्यक है?

राज्य सरकार या इस निमित्त उसके सम्यक् रूप से प्राधिकृत अधिकारी की।

धारा 26 का विषय क्या है?

आरक्षित वनों में प्रतिषिद्ध कार्य।

(Acts prohibited in such forests)

धारा 26(1) के अनुसार आरक्षित वन में कौन-कौन से कार्य प्रतिषिद्ध हैं?

धारा 5 के अधीन प्रतिषिद्ध नई कटाई-सफाई, आग लगाना या नियमों के विरुद्ध आग जलाना, अनधिकृत रूप से आग जलाना, अतिचार या चराई, वृक्षों एवं वन-उपज को क्षति पहुँचाना, पत्थर की खुदाई, वन-उपज का संग्रह या हटाना, भूमि साफ करना, नियमों के विरुद्ध शिकार, मछली पकड़ना, जल विषैला करना, पाश या जाल बिछाना तथा जहाँ हाथी परिरक्षण अधिनियम, 1879 प्रवृत्त नहीं है वहाँ नियमों के विरुद्ध हाथियों का वध या पकड़ना।

धारा 26(1) के अनुसार प्रतिषिद्ध कार्य करने पर क्या दण्ड है?

वन को हुए नुकसान के प्रतिकर के अतिरिक्त छह माह तक का कारावास या पाँच सौ रुपये तक का जुर्माना या दोनों।

धारा 26(2) के अनुसार यह धारा किन कार्यों या अधिकारों पर लागू नहीं होती?

वन अधिकारी की लिखित अनुज्ञा या राज्य सरकार के नियमों के अधीन किए गए कार्य तथा धारा 15(2)() या धारा 23 के अधीन सृजित अधिकारों के प्रयोग पर।

धारा 26(3) के अनुसार आरक्षित वन में जानबूझकर या घोर उपेक्षा से आग लगाए जाने पर राज्य सरकार क्या आदेश दे सकती है?

वन या उसके किसी प्रभाग में चरागाह एवं वन-उपज के सभी अधिकारों के प्रयोग को उचित समझी गई अवधि के लिए निलम्बित कर सकती है।

धारा 27 का विषय क्या है?

यह घोषित करने की शक्ति कि वन आरक्षित वन नहीं रहा है।

(Power to declare forest no longer reserved)

धारा 27(1) के अनुसार किसी आरक्षित वन या उसके प्रभाग को आरक्षित वन रहने का निदेश कौन और किस माध्यम से दे सकता है?

राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा।

धारा 27(2) के अनुसार अधिसूचना में नियत तारीख से क्या प्रभाव होगा?

वन या उसका प्रभाग आरक्षित वन नहीं रहेगा।

धारा 27(2) के अनुसार आरक्षित वन रहने पर क्या निर्वापित अधिकार पुनर्जीवित हो जाते हैं?

नहीं, निर्वापित अधिकार पुनरुज्जीवित नहीं होते।

 

अध्याय 3

(Chapter-III)

ग्राम वनों के सम्बन्ध में

(Of Village-Forests)

धारा 28 का विषय क्या है?

ग्राम वनों का निर्माण।

(Formation of village-forests)

धारा 28(1) के अनुसार राज्य सरकार ग्राम वन का निर्माण कैसे कर सकती है?

आरक्षित वन की किसी भूमि के अधिकार किसी ग्राम समुदाय को समनुदिष्ट करके तथा ऐसे समनुदेशन को रद्द भी कर सकती है।

धारा 28(2) के अनुसार राज्य सरकार ग्राम वनों के संबंध में किस उद्देश्य से नियम बना सकती है?

इमारती लकड़ी, अन्य वन-उपज या चरागाह के उपबन्ध तथा वन के संरक्षण, सुधार एवं प्रबन्ध को विनियमित करने के लिए।

धारा 28(3) के अनुसार ग्राम वनों भारतीय वन अधिनियम, 1927 के कौन-से उपबंध लागू होंगे?

आरक्षित वनों से संबंधित सभी उपबंध, जहाँ तक वे ग्राम वनों के लिए बनाए गए नियमों से असंगत हों।

 

अध्याय 4

(Chapter-IV)

संरक्षित वनों के सम्बन्ध में

(Of Protected Forests)

धारा 29 का विषय क्या है?

संरक्षित वन।

(Protected forests)

धारा 29(1) के अनुसार राज्य सरकार किन भूमियों को संरक्षित वन घोषित कर सकती है?

ऐसी वन भूमि या बंजर भूमि, जो आरक्षित वन में सम्मिलित नहीं है तथा सरकार की संपत्ति है, या जिस पर सरकार का साम्पत्तिक अधिकार है, या जिसकी संपूर्ण वन-उपज अथवा उसके किसी भाग की सरकार हकदार है।

धारा 29(2) के अनुसार अधिसूचना में समाविष्ट वन भूमि और बंजर भूमि क्या कहलाती है?

संरक्षित वन।

धारा 29(3) के अनुसार संरक्षित वन घोषित करने से पूर्व सामान्यतः क्या आवश्यक है?

सरकार एवं निजी व्यक्तियों के अधिकारों के स्वरूप और विस्तार की जांच तथा उनका सर्वेक्षण/बन्दोबस्त अभिलेख या अन्य पर्याप्त रीति से अभिलेखन।

धारा 29(3) के परन्तुक के अनुसार जांच एवं अभिलेख लंबित रहने पर भी राज्य सरकार कब संरक्षित वन घोषित कर सकती है?

जब जांच में विलम्ब से सरकार के अधिकार खतरे में पड़ने की संभावना हो; किन्तु इससे व्यक्तियों या समुदायों के विद्यमान अधिकार कम या प्रभावित नहीं होंगे।

धारा 30 का विषय क्या है?

वृक्ष आदि को आरक्षित करने की अधिसूचना निकालने की शक्ति।

(Power to issue notification reserving trees, etc.)

धारा 30 के अनुसार राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा क्या-क्या घोषित कर सकती है?

संरक्षित वन के वृक्षों या वृक्षों के वर्ग को आरक्षित घोषित कर सकती है, वन के किसी प्रभाग को अधिकतम 30 वर्ष तक बन्द घोषित कर सकती है तथा वन-उपज के संग्रहण, पत्थर की खुदाई, चूना या लकड़ी का कोयला फूंकने, विनिर्माण, हटाने तथा भूमि तोड़ने या साफ करने जैसे कार्य प्रतिषिद्ध कर सकती है।

धारा 30() के अनुसार संरक्षित वन का कोई प्रभाग कितनी अवधि तक बन्द घोषित किया जा सकता है?

तीस वर्ष से अनधिक अवधि के लिए।

धारा 30() के अनुसार वन के किसी प्रभाग को बन्द घोषित करने की शर्त क्या है?

वन का शेष भाग निलम्बित अधिकारों के सम्यक् प्रयोग के लिए पर्याप्त एवं युक्तियुक्त रूप से सुविधाजनक स्थान में हो।

धारा 30() के अनुसार संरक्षित वन में कौन-कौन से कार्य प्रतिषिद्ध किए जा सकते हैं?

पत्थर की खुदाई, चूना या लकड़ी का कोयला फूंकना, वन-उपज का संग्रहण, विनिर्माण, हटाना तथा खेती, भवन निर्माण, पशुओं के गोल रखने या अन्य प्रयोजन हेतु भूमि तोड़ना या साफ करना।

धारा 31 का विषय क्या है?

ऐसी अधिसूचना के अनुवाद का आसपास में प्रकाशन।

(Publication of translation of such notification in neighbourhood)

धारा 31 के अनुसार धारा 30 के अधीन निकाली गई अधिसूचना का अनुवाद कौन प्रकाशित कराएगा?

कलक्टर।

धारा 31 के अनुसार अधिसूचना का अनुवाद किस भाषा में प्रकाशित कराया जाएगा?

स्थानीय जनभाषा में।

धारा 31 के अनुसार अधिसूचना का अनुवाद कहाँ प्रकाशित कराया जाएगा?

अधिसूचना में समाविष्ट वन के आसपास के प्रत्येक नगर और ग्राम में सहजदृश्य स्थान पर।

धारा 32 का विषय क्या है?

संरक्षित वनों के बारे में नियम बनाने की शक्ति।

(Power to make rules for protected forests)

धारा 32 के अनुसार राज्य सरकार संरक्षित वनों के संबंध में किन विषयों के विनियमन हेतु नियम बना सकती है?

() वृक्षों और इमारती लकड़ी की कटाई, चिराई, संपरिवर्तित करना और हटाना, तथा संरक्षित वनों की वन-उपज का संग्रहण करना, विनिर्माण करना तथा उसका हटाना,

() संरक्षित वनों के सामीप्य के नगरों और ग्रामों के निवासियों को अपने प्रयोग के लिए वृक्ष, इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज लेने के हेतु अनुज्ञप्तियां अनुदत्त करना और ऐसे व्यक्तियों द्वारा ऐसी अनुज्ञप्तियों का पेश और वापस किया जाना,

() व्यापार के प्रयोजनों के लिए ऐसे वनों में से वृक्षों या इमारती लकड़ी या वन-उपज को गिराने या हटाने वाले व्यक्तियों को अनुज्ञप्तियां प्रदान करना और ऐसे व्यक्तियों द्वारा ऐसी अनुज्ञप्तियां पेश और वापस किया जाना,

() खण्ड () और () में वर्णित व्यक्तियों द्वारा ऐसे वृक्षों को काटने या ऐसी इमारती लकड़ी या वन-उपज को संगृहीत करने और हटाने की अनुज्ञा के लिए किए जाने वाले संदाय, यदि कोई हों,

() ऐसे वृक्षों, इमारती लकड़ी और उपज के बारे में उनके द्वारा किए जाने वाले अन्य संदाय, यदि कोई हों और वे स्थान जहां ऐसा संदाय किया जाएगा,

() ऐसे वनों में से होकर जाने वाली वन-उपज की परीक्षा,

() ऐसे वनों में खेती या अन्य प्रयोजनों के लिए भूमि की कटाई-सफाई और भूमि तोड़ना,

() ऐसे वनों में पड़ी इमारती लकड़ी और धारा 30 के अधीन आरक्षित वृक्षों का आग से संरक्षण,

() ऐसे वनों में घास काटना और ढोर चराना,

() ऐसे वनों में शिकार खेलना, गोली चलाना, मछली पकड़ना, जल विषैला करना और पाश या जाल बिछाना और ऐसे वनों के उन क्षेत्रों में जिनमें हाथी परिरक्षण अधिनियम, 1879 (1879 का 6) प्रवृत्त नहीं है, हाथियों का वध करना या पकड़ना,

() धारा 30 के अधीन वन के किसी बंद प्रभाग का संरक्षण और प्रबन्ध, और

() धारा 29 में निर्देशित अधिकारों का प्रयोग

धारा 33 का विषय क्या है?

धारा 30 के अधीन अधिसूचना या धारा 32 के अधीन बनाए गए नियमों के उल्लंघन में किए गए कार्यों के लिए शास्तियां।

(Penalties for acts in contravention of notification under section 30 or of rules under section 32)

धारा 33(1) के अनुसार कौन-से कार्य दण्डनीय हैं?

() धारा 30 के अधीन आरक्षित किसी वृक्ष को गिराएगा, परितक्षण करेगा, छोंटेगा, छेवेगा या जलाएगा या ऐसे किसी वृक्ष की छाल उतार डालेगा या पत्तियां तोड़ डालेगा या उसे अन्यथा नुकसान पहुंचाएगा,

() धारा 30 के अधीन वाले किसी प्रतिषेध के प्रतिकूल पत्थर की खुदाई करेगा या चूने या लकड़ी का कोयला फूंकेगा, या किसी वन-उपज का संग्रहण करेगा, उससे कोई विनिर्माण प्रक्रिया चलाएगा, या उसे हटाएगा,

() किसी संरक्षित वन में, धारा 30 के अधीन वाले किसी प्रतिषेष के प्रतिकूल, किसी भूमि को खेती या किसी अन्य प्रयोजन के लिए तोड़ेगा या साफ करेगा,

() ऐसे वन को आग लगाएगा, या धारा 30 के अधीन आरक्षित किसी वृक्ष तक, चाहे वह खड़ा हो, गिर गया हो, या गिराया गया हो, या ऐसे वन के बन्द किए गए किसी प्रभाग तक फैल जाने से रोकने के लिए युक्तियुक्त-पूर्ण पूर्वावधानी बरते बिना आग जताएगा,

() ऐसे किसी वृक्ष या बन्द प्रभाग के सामीप्य में अपने द्वारा जलाई गई किसी आग को जलता छोड़ देगा,

() किसी वृक्ष को इस प्रकार गिराएगा या किसी इमारती लकड़ी को इस प्रकार खींचेगा कि यथापूर्वोक्त रूप में आरक्षित किसी वृक्ष को नुकसान पहुंचाता है,

() पशुओं को ऐसे किसी वृक्ष को नुकसान पहुंचाने देगा,

() धारा 32 के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों का अतिलंघन करेगा,

धारा 33(1) के अनुसार अपराध करने पर क्या दण्ड है?

छह माह तक का कारावास या पाँच सौ रुपये तक का जुर्माना या दोनों।

धारा 33(2) के अनुसार संरक्षित वन में जानबूझकर या घोर उपेक्षा से आग लगाए जाने पर राज्य सरकार क्या आदेश दे सकती है?

वन या उसके किसी प्रभाग में चरागाह या वन-उपज के किसी अधिकार के प्रयोग को उचित समझी गई अवधि के लिए निलम्बित कर सकती है।

धारा 34 का विषय क्या है?

अध्याय 4 की कोई बात कतिपय मामलों में किए गए कार्यों का प्रतिषेध नहीं करेगी।

(Nothing in this Chapter to prohibit acts done in certain cases)

धारा 34 के अनुसार अध्याय 4 के उपबंध किन कार्यों का प्रतिषेध नहीं करते?

वन अधिकारी की लिखित अनुज्ञा से या धारा 32 के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार किए गए कार्यों का।

धारा 34 के अनुसार धारा 29 के अधीन अभिलिखित अधिकारों का प्रयोग कब संरक्षित रहेगा?

जब वह धारा 30 के अधीन बन्द किए गए वन के प्रभाग या धारा 33 के अधीन निलम्बित अधिकारों से संबंधित हो।

 

अध्याय-5

(Chapter-V)

जो वन और भूमियां सरकार की सम्पत्ति नहीं हैं उन पर नियन्त्रण के सम्बन्ध में

(Of the Control over Forests and Lands not being the Property of Government)

धारा 35 का विषय क्या है?

विशेष प्रयोजनों के लिए वनों का संरक्षण।

(Protection of forests for special purposes)

धारा 35(1) के अनुसार राज्य सरकार किन कार्यों को विनियमित या प्रतिषिद्ध कर सकती है और किन प्रयोजनों के लिए?

() खेती के लिए भूमि तोड़ना या साफ करना,

() ढोर चराना, या

() वनस्पति को जलाना या उसे साफ करना,

उस सूरत में विनियमित या प्रतिषिद्ध कर सकेगी जिसमें कि ऐसा विनियमन या प्रतिषेध निम्नलिखित प्रयोजनों में से किसी के लिए आवश्यक प्रतीत होता है, अर्थात्ः -

(i) आंधी, तेज वायु, लुढ़कते पत्थरों, बाढ़ और हिमानी से संरक्षण,

(ii) पहाड़ी भू-भागों की शिखरों और ढलानों और घाटियों पर मृदा का परिरक्षण, भूमि-स्खलन या खादर और वेगधारा के बनने को रोकना, या कटाव या उस पर बालू, पत्थर या बजरी के जमाव से भूमि का संरक्षण,

(iii) झरनों, नदियों और तलाबों में जलपूर्ति बनाए रखना,

(iv) पथों, पुलों, रेलों और संचार के अन्य मार्गों का संरक्षण,

(v) लोक स्वास्थ्य का परिरक्षण

धारा 35(2) के अनुसार राज्य सरकार विशेष प्रयोजनों के लिए क्या कर सकती है?

अपने व्यय पर किसी वन या बंजर भूमि में आवश्यक संकर्म बनवा सकती है।

धारा 35(3) के अनुसार अधिसूचना निकालने या संकर्म आरंभ करने से पूर्व किन प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है?

स्वामी को कारण बताने की सूचना देना, उसके आक्षेप एवं साक्ष्य की सुनवाई करना तथा उन पर राज्य सरकार द्वारा विचार करना।

धारा 36 का विषय क्या है?

वनों का प्रबन्ध संभालने की शक्ति।

(Power to assume management of forests)

धारा 36(1) के अनुसार राज्य सरकार किसी वन या भूमि को वन अधिकारी के नियंत्रण में कब कर सकती है?

धारा 35 के अधीन विनियम या प्रतिषेध की उपेक्षा या जानबूझकर अवज्ञा होने पर अथवा धारा 35 के अधीन संकर्म के प्रयोजनार्थ आवश्यक होने पर, स्वामी को लिखित सूचना देकर एवं उसके आक्षेपों पर विचार करने के पश्चात्।

धारा 36(1) के अनुसार वन या भूमि को वन अधिकारी के नियंत्रण में करने पर राज्य सरकार क्या घोषित कर सकती है?

कि आरक्षित वनों से संबंधित भारतीय वन अधिनियम, 1927 के सभी या कोई उपबंध ऐसे वन या भूमि पर लागू होंगे।

धारा 36(2) के अनुसार ऐसे वन या भूमि के प्रबन्ध से होने वाला शुद्ध लाभ किसे दिया जाएगा?

ऐसे वन या भूमि के स्वामी को।

धारा 37 का विषय क्या है?

कुछ अवस्थाओं में वनों का स्वत्वहरण।

(Expropriation of forests in certain cases)

धारा 37(1) के अनुसार राज्य सरकार वन या भूमि का अर्जन कब कर सकती है?

जब वह यह समझती है कि वन या भूमि को वन अधिकारी के नियंत्रण में रखने के बजाय लोक प्रयोजन के लिए अर्जित करना उचित है।

धारा 37(1) के अनुसार वन या भूमि का अर्जन किस अधिनियम के अनुसार किया जाएगा?

भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 द्वारा उपबन्धित रीति से।

धारा 37(2) के अनुसार धारा 35 की अधिसूचना में समाविष्ट वन या भूमि का स्वामी अर्जन की अपेक्षा कब कर सकता है?

अधिसूचना की तारीख से अन्यून तीन वर्ष तथा अनधिक बारह वर्ष के भीतर।

धारा 37(2) के अनुसार स्वामी की अपेक्षा पर राज्य सरकार क्या करेगी?

वन या भूमि को लोक प्रयोजन के लिए अर्जित करेगी।

धारा 38 का विषय क्या है?

स्वामियों की प्रार्थना पर वनों का संरक्षण।

(Protection of forests at request of owners)

धारा 38(1) के अनुसार भूमि के संबंध में लिखित अभ्यावेदन कौन कर सकता है?

भूमि का स्वामी या एक से अधिक स्वामी होने पर कुल मिलाकर कम से कम दो-तिहाई अंशों के स्वामी।

धारा 38(1) के अनुसार अभ्यावेदन में क्या प्रार्थना की जा सकती है?

भूमि का प्रबन्ध वन अधिकारी द्वारा आरक्षित या संरक्षित वन के रूप में किया जाए अथवा भारतीय वन अधिनियम, 1927 के सभी या कुछ उपबंध भूमि पर लागू किए जाएँ।

धारा 38(2) के अनुसार राज्य सरकार ऐसी भूमि पर क्या कर सकती है?

राजपत्र में अधिसूचना द्वारा भारतीय वन अधिनियम, 1927 के ऐसे उपबंध लागू कर सकती है जिन्हें वह परिस्थितियों में उचित तथा आवेदकों द्वारा वांछित समझे।

 

अध्याय-6

(Chapter-VI)

इमारती लकड़ी और अन्य वन-उपज पर शुल्क के सम्बन्ध में

(Of the Duty on Timber and other Forest-produce)

धारा 39 का विषय क्या है?

इमारती लकड़ी और अन्य वन-उपज पर शुल्क अधिरोपित करने की शक्ति।

(Power to impose duty on timber and other forest-produce)

धारा 39(1) के अनुसार इमारती लकड़ी या वन-उपज पर शुल्क अधिरोपित करने की शक्ति किसके पास है?

केन्द्रीय सरकार के पास।

धारा 39(1) के अनुसार केन्द्रीय सरकार शुल्क किस प्रकार अधिरोपित करेगी?

राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषित रीति, स्थानों और दरों पर।

धारा 39(1) के अनुसार शुल्क किन इमारती लकड़ी या वन-उपज पर उद्गृहीत किया जा सकता है?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 के विस्तार वाले राज्यक्षेत्रों में उत्पन्न तथा जिसके विषय में सरकार को अधिकार प्राप्त है, या उन राज्यक्षेत्रों के बाहर से लाई गई इमारती लकड़ी या वन-उपज पर।

धारा 39(2) के अनुसार मूल्यानुसार उद्गृहीत किए जाने वाले शुल्क का मूल्य कौन और किस माध्यम से निर्धारित करेगा?

केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा।

धारा 39(3) के अनुसार भारतीय वन अधिनियम, 1927 के प्रवृत्त होने के समय राज्य सरकार द्वारा उद्गृहीत शुल्कों की क्या स्थिति होगी?

वे भारतीय वन अधिनियम, 1927 के उपबंधों के अधीन तथा सम्यक् रूप से उद्गृहीत माने जाएंगे।

धारा 39(4) के अनुसार राज्य सरकार पूर्व से विधिपूर्ण रूप से उद्गृहीत शुल्क कब तक लगातार उद्गृहीत कर सकती है?

जब तक संसद द्वारा प्रतिकूल उपबंध किया जाए।

धारा 39(4) के परन्तुक के अनुसार राज्य सरकार किन प्रकार के विभेदकारी शुल्क का उग्रहण नहीं कर सकती?

ऐसा शुल्क जो राज्य की और राज्य के बाहर की समरूप इमारती लकड़ी या वन-उपज में, अथवा राज्य के बाहर विभिन्न स्थानों की समरूप इमारती लकड़ी या वन-उपज में भेदभाव करता हो।

धारा 40 का विषय क्या है?

सीमा सम्बन्धी उपबन्ध क्रय-धन या स्वामिस्व के सम्बन्ध में लागू नहीं होगा।

(Limit not to apply to purchase-money or royalty)

धारा 40 के अनुसार इस अध्याय की कोई बात किस राशि को सीमित नहीं करती?

इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज पर क्रय-धन या स्वामिस्व के रूप में प्रभार्य राशि को।

क्या धारा 40 के अनुसार अभिवहन के दौरान उद्गृहीत क्रय-धन या स्वामिस्व भी इस सीमा से अप्रभावित रहेगा?

हाँ, भले ही वह शुल्क की भाँति अभिवहन के दौरान उद्गृहीत किया जाता हो।

 

अध्याय-7

(Chapter-VII)

अभिवहन के दौरान इमारती लकड़ी और वन-उपज के नियंत्रण के सम्बन्ध में

(Of the Control of Timber and Other Forest-produce in Transit)

धारा 41 का विषय क्या है?

वन-उपज के अभिवहन को विनियमित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति।

(Power to make rules to regulate transit of forest-produce)

धारा 41(1) के अनुसार इमारती लकड़ी के बहाने के विषय में सब नदियों और उनके तटों का नियंत्रण किसमें निहित है?

राज्य सरकार में।

धारा 41(1) के अनुसार थल या जल द्वारा अभिवहन में की इमारती लकड़ी और अन्य वन-उपज का नियंत्रण किसमें निहित है?

राज्य सरकार में।

धारा 41(1) के अनुसार राज्य सरकार किस उद्देश्य से नियम बना सकेगी?

इमारती लकड़ी और अन्य वन-उपज के अभिवहन को विनियमित करने के लिए।

धारा 41(2) के अनुसार उपधारा (1) की शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना नियम किन विषयों के लिए बनाए जा सकते हैं?

उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट विषयों के लिए।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम किन मार्गों को विहित कर सकते हैं?

उन मार्गों को जिनके द्वारा ही इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज का आयात, निर्यात या राज्य के भीतर स्थानांतरण किया जा सकेगा।

धारा 41(2)() के अनुसार किसके बिना इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज का आयात, निर्यात या स्थानांतरण प्रतिषिद्ध किया जा सकता है?

सम्यक् रूप से प्राधिकृत अधिकारी द्वारा दिए गए पास के बिना या पास की शर्तों के अनुसार अन्यथा।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम किन बातों के लिए उपबंध कर सकते हैं?

पासों के दिए जाने, पेश करने, वापस करने तथा उनके लिए फीस के भुगतान के लिए।

धारा 41(2)() के अनुसार किन परिस्थितियों में अभिवहन में की इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज को रोका जा सकता है?

जब यह विश्वास करने का कारण हो कि उसकी कीमत, शुल्क, फीस, स्वामिस्व या प्रभार के कारण सरकार को धन देय है अथवा उस पर चिह्न लगाना वांछनीय है।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम अभिवहन में की इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज के संबंध में किन कार्यों के लिए उपबंध कर सकते हैं?

रोक लेने, रिपोर्ट देने, परीक्षा करने या चिह्नित करने के लिए।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम किन डिपुओं की स्थापना और विनियमन के लिए उपबंध कर सकते हैं?

ऐसे डिपुओं की, जहाँ इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज परीक्षा, धन के भुगतान या चिह्न लगाने हेतु लाई जाएगी।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम डिपुओं से संबंधित किन शर्तों के लिए उपबंध कर सकते हैं?

इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज को डिपुओं में लाने, संगृहीत करने और हटाने की शर्तों के लिए।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम किन कार्यों को प्रतिषिद्ध कर सकते हैं?

इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज के अभिवहन हेतु प्रयुक्त नदी की धारा या तटों को बंद या बाधित करना तथा नदी में घास, झाड़-झंखाड़, शाखाएँ, पत्तियाँ फेंकना या ऐसा अन्य कार्य जिससे नदी बंद या बाधित हो जाए।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम किसके लिए उपबंध कर सकते हैं?

नदी की धारा या किनारों की बाधा के निवारण या हटाने तथा उसके खर्च की वसूली के लिए।

धारा 41(2)() के अनुसार बाधा हटाने का खर्च किससे वसूल किया जा सकता है?

उस व्यक्ति से जिसके कार्यों या उपेक्षा के कारण बाधा उत्पन्न हुई है।

धारा 41(2)() के अनुसार विनिर्दिष्ट स्थानीय सीमाओं के भीतर किन कार्यों को पूर्णतः या शर्तों सहित प्रतिषिद्ध किया जा सकता है?

लकड़ी की चिराई के लिए गड्ढा बनाना, इमारती लकड़ी का संपरिवर्तन, काटना, जलाना, छिपाना, चिह्न लगाना, चिह्न बदलना या मिटाना तथा चिह्न लगाने वाले हथौड़े या अन्य उपकरण को कब्जे में रखना या साथ ले जाना।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम इमारती लकड़ी के लिए किसके प्रयोग को विनियमित कर सकते हैं?

सम्पत्ति संबंधी चिह्नों के प्रयोग को।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम किसके रजिस्ट्रीकरण को विनियमित कर सकते हैं?

सम्पत्ति संबंधी चिह्नों के रजिस्ट्रीकरण को।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम रजिस्ट्रीकरण की प्रभावशीलता के संबंध में क्या विहित कर सकते हैं?

वह अवधि जिसके लिए रजिस्ट्रीकरण प्रभावी रहेगा।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम किसी व्यक्ति द्वारा रजिस्ट्रीकृत किए जाने वाले चिह्नों के संबंध में क्या कर सकते हैं?

उनकी संख्या सीमित कर सकते हैं।

धारा 41(2)() के अनुसार नियम रजिस्ट्रीकरण के संबंध में किसके लिए उपबंध कर सकते हैं?

रजिस्ट्रीकरण के लिए फीसों के उद्ग्रहण के लिए।

धारा 41(3) के अनुसार राज्य सरकार क्या निदेश दे सकती है?

धारा 41 के अधीन बनाया गया कोई नियम इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज के किसी विनिर्दिष्ट वर्ग या किसी विनिर्दिष्ट स्थानीय क्षेत्र को लागू नहीं होगा।

धारा 41(3) के अनुसार राज्य सरकार किन पर नियमों की अनुप्रयोगिता समाप्त कर सकती है?

इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज के किसी विनिर्दिष्ट वर्ग अथवा किसी विनिर्दिष्ट स्थानीय क्षेत्र पर।

धारा 41() का विषय क्या है?

सीमाशुल्क सीमान्तों के पार इमारती लकड़ी के स्थानान्तरण विषयक केन्द्रीय सरकार की शक्तियां।

(Powers of Central Government as to movements of timber across customs frontiers)

धारा 41() के अनुसार धारा 41 में किसी बात के होते हुए भी नियम बनाने की शक्ति किसके पास है?

केन्द्रीय सरकार के पास।

धारा 41() के अनुसार केन्द्रीय सरकार किस उद्देश्य से नियम बना सकेगी?

उस मार्ग को विहित करने के लिए जिसके द्वारा ही इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज का आयात, निर्यात या स्थानान्तरण किया जा सके।

धारा 41() के अनुसार नियम किन सीमाशुल्क सीमान्तों के संबंध में बनाए जा सकते हैं?

ऐसे सीमाशुल्क सीमान्तों के संबंध में जो केन्द्रीय सरकार द्वारा परिनिश्चित हैं।

धारा 41() के अनुसार नियम किन राज्यक्षेत्रों के संबंध में लागू होंगे?

उन राज्यक्षेत्रों के संबंध में जिन पर भारतीय वन अधिनियम, 1927 का विस्तार है।

धारा 41() के अनुसार केन्द्रीय सरकार किन कार्यों के लिए मार्ग विहित कर सकती है?

इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज के आयात, निर्यात या स्थानान्तरण के लिए।

धारा 41() के अनुसार धारा 41 के अधीन बनाए गए नियम किसके अधीन प्रभावी होंगे?

धारा 41 के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन।

धारा 42 का विषय क्या है?

धारा 41 के अधीन बनाए गए नियमों के भंग के लिए शास्ति।

(Penalty for breach of rules made under section 41)

धारा 42(1) के अनुसार धारा 41 के अधीन बनाए गए नियमों के उल्लंघन के लिए शास्ति विहित करने की शक्ति किसके पास है?

राज्य सरकार के पास।

धारा 42(1) के अनुसार नियमों के उल्लंघन के लिए अधिकतम कारावास कितना हो सकता है?

छह मास तक का।

धारा 42(1) के अनुसार नियमों के उल्लंघन के लिए अधिकतम जुर्माना कितना हो सकता है?

पाँच सौ रुपए तक का।

धारा 42(2) के अनुसार किन परिस्थितियों में उपधारा (1) में वर्णित शास्तियों से दुगुनी शास्तियां लगाई जा सकती हैं?

जब अपराध सूर्यास्त के पश्चात् और सूर्योदय के पूर्व किया गया हो, या विधिपूर्ण प्राधिकारी का प्रतिरोध करने के लिए तैयार करने के पश्चात् किया गया हो, या अपराधी उसी प्रकार के अपराध के लिए पहले सिद्धदोष हो चुका हो।

धारा 42(2) के अनुसार यदि अपराध सूर्यास्त के पश्चात् और सूर्योदय के पूर्व किया गया हो तो क्या उपबंध किया जा सकता है?

धारा 42(1) में वर्णित शास्तियों से दुगुनी शास्तियां लगाई जा सकती हैं।

धारा 42(2) के अनुसार यदि अपराध विधिपूर्ण प्राधिकारी का प्रतिरोध करने के लिए तैयार करने के पश्चात् किया गया हो तो क्या उपबंध किया जा सकता है?

धारा 42(1) में वर्णित शास्तियों से दुगुनी शास्तियां लगाई जा सकती हैं।

धारा 42(2) के अनुसार यदि अपराधी उसी प्रकार के अपराध के लिए पूर्व में सिद्धदोष हो चुका हो तो क्या उपबंध किया जा सकता है?

धारा 42(1) में वर्णित शास्तियों से दुगुनी शास्तियां लगाई जा सकती हैं।

धारा 43 का विषय क्या है?

डिपो में रखी वन-उपज को हुए नुकसान के लिए सरकार या वन अधिकारी उत्तरदायी नहीं होंगे।

(Government and Forest Officers not liable for damage to forest-produce at depot)

धारा 43 के अनुसार धारा 41 के अधीन स्थापित डिपो में रखी इमारती लकड़ी या वन-उपज को हुई हानि या नुकसान के लिए कौन उत्तरदायी नहीं होगी?

सरकार।

धारा 43 के अनुसार भारतीय वन अधिनियम, 1927 के प्रयोजनों के लिए अन्यत्र रोक रखी गई इमारती लकड़ी या वन-उपज को हुई हानि या नुकसान के लिए कौन उत्तरदायी नहीं होगी?

सरकार।

धारा 43 के अनुसार वन अधिकारी सामान्यतः किसके लिए उत्तरदायी नहीं होगा?

डिपो में रखी या भारतीय वन अधिनियम, 1927 के प्रयोजनों के लिए अन्यत्र रोक रखी गई इमारती लकड़ी या वन-उपज को हुई हानि या नुकसान के लिए।

धारा 43 के अनुसार वन अधिकारी कब हानि या नुकसान के लिए उत्तरदायी होगा?

जब वह हानि या नुकसान उपेक्षा, विद्वेष या कपट से करता है।

धारा 43 के अनुसार वन अधिकारी की उत्तरदायित्व-मुक्ति का अपवाद क्या है?

उपेक्षा, विद्वेष या कपट से की गई हानि या नुकसान।

धारा 44 का विषय क्या है?

डिपो पर दुर्घटना की अवस्था में सब व्यक्ति सहायता करने के लिए आबद्ध होंगे।

(All persons bound to aid in case of accident at depot)

धारा 44 के अनुसार सहायता देने का दायित्व कब उत्पन्न होता है?

जब किसी डिपो में सम्पत्ति को संकटापन्न करने वाली दुर्घटना या आपात की दशा हो।

धारा 44 के अनुसार सहायता देने के लिए कौन आबद्ध होगा?

ऐसे डिपो में सरकार या किसी प्राइवेट व्यक्ति द्वारा नियोजित प्रत्येक व्यक्ति।

धारा 44 के अनुसार सहायता किसे दी जाएगी?

सहायता मांगने वाले किसी वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी को।

धारा 44 के अनुसार सहायता किस उद्देश्य से दी जाएगी?

संकट टालने या सम्पत्ति को नुकसान या हानि से बचाने के लिए।

धारा 44 के अनुसार सहायता देने का दायित्व किनके द्वारा नियोजित व्यक्तियों पर लागू होता है?

सरकार या किसी प्राइवेट व्यक्ति द्वारा नियोजित व्यक्तियों पर।

 

अध्याय-8

(Chapter-VIII)

बहती हुई और अटकी हुई इमारती लकड़ी के संग्रहण के सम्बन्ध में
(Of the Collection of Drift and Stranded Timber)

धारा 45 का विषय क्या है?

कतिपय प्रकार की इमारती लकड़ी, जब तक कि उसके बारे में हक साबित नहीं कर दिया जाता, सरकार की सम्पत्ति समझी जाएगी और तदनुसार संगृहीत की जा सकेगी।

(Certain kinds of timber to be deemed property of Government until title thereto proved, and may be collected accordingly)

धारा 45(1) के अनुसार कौन-सी बहती हुई इमारती लकड़ी सरकार की सम्पत्ति समझी जाएगी?

बहती हुई, किनारे से लगी हुई, अटकी हुई या डूबी हुई इमारती लकड़ी, जब तक उस पर अधिकार और हक सिद्ध कर दिया जाए।

धारा 45(1) के अनुसार किन काष्ठ और इमारती लकड़ी को सरकार की सम्पत्ति समझा जाएगा?

जिन पर ऐसे चिह्न लगे हों जो धारा 41 के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार रजिस्ट्रीकृत नहीं हैं।

धारा 45(1) के अनुसार किन चिह्नों वाली इमारती लकड़ी सरकार की सम्पत्ति समझी जाएगी?

जिस पर चिह्न अग्नि द्वारा या अन्यथा मिटाए, बदले या बिगाड़े गए हों।

धारा 45(1) के अनुसार विनिर्दिष्ट क्षेत्रों में कौन-सी इमारती लकड़ी सरकार की सम्पत्ति समझी जाएगी?

सभी अचिह्नित काष्ठ और इमारती लकड़ी।

धारा 45(1) के अनुसार उपधारा (1) में वर्णित इमारती लकड़ी कब तक सरकार की सम्पत्ति समझी जाएगी?

जब तक कोई व्यक्ति इस अध्याय में यथा उपबन्धित रीति से उस पर अपना अधिकार और हक सिद्ध कर दे।

धारा 45(1) के अनुसार अचिह्नित काष्ठ और इमारती लकड़ी के लिए क्षेत्र कौन विनिर्दिष्ट करता है?

राज्य सरकार।

धारा 45(2) के अनुसार उपधारा (1) में वर्णित इमारती लकड़ी को कौन संगृहीत कर सकता है?

कोई वन अधिकारी या अन्य व्यक्ति, जो धारा 51 के अधीन बनाए गए नियमों के आधार पर उसे संगृहीत करने का हकदार है।

धारा 45(2) के अनुसार संगृहीत इमारती लकड़ी को कहाँ लाया जा सकता है?

ऐसे डिपो में जिसे वन अधिकारी बहती हुई इमारती लकड़ी की प्राप्ति के लिए अधिसूचित करे।

धारा 45(2) के अनुसार बहती हुई इमारती लकड़ी की प्राप्ति के लिए डिपो कौन अधिसूचित करता है?

वन अधिकारी।

धारा 45(3) के अनुसार इमारती लकड़ी के किसी वर्ग को इस धारा के उपबंधों से छूट देने की शक्ति किसके पास है?

राज्य सरकार के पास।

धारा 45(3) के अनुसार इमारती लकड़ी के किसी वर्ग को छूट किस माध्यम से दी जाती है?

राजपत्र में अधिसूचना द्वारा।

धारा 46 का विषय क्या है?

बहती हुई इमारती लकड़ी के दावेदारों को सूचना।

(Notice to claimants of drift timber)

धारा 46 के अनुसार किस धारा के अधीन संगृहीत इमारती लकड़ी की लोक सूचना दी जाती है?

धारा 45 के अधीन संगृहीत इमारती लकड़ी की।

धारा 46 के अनुसार संगृहीत इमारती लकड़ी की लोक सूचना कौन देगा?

वन अधिकारी।

धारा 46 के अनुसार संगृहीत इमारती लकड़ी की लोक सूचना कब दी जाएगी?

समय-समय पर।

धारा 46 के अनुसार लोक सूचना में क्या अन्तर्विष्ट होगा?

इमारती लकड़ी का वर्णन।

धारा 46 के अनुसार लोक सूचना में दावेदार से क्या अपेक्षा की जाएगी?

अपने दावे का लिखित कथन प्रस्तुत करने की।

धारा 46 के अनुसार दावे का लिखित कथन किसके द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा?

इमारती लकड़ी पर दावा करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा।

धारा 46 के अनुसार दावे का लिखित कथन किस अवधि के भीतर प्रस्तुत किया जाएगा?

सूचना की तारीख से दो मास से अन्यून कालावधि के भीतर।

धारा 47 का विषय क्या है?

ऐसी इमारती लकड़ी पर किए गए दावे के बारे में प्रक्रिया।

(Procedure on claim preferred to such timber)

धारा 47(1) के अनुसार दावे का लिखित कथन प्रस्तुत होने पर वन अधिकारी क्या करेगा?

वह उचित समझी जाने वाली जांच करेगा।

धारा 47(1) के अनुसार जांच के पश्चात् वन अधिकारी को अपने कारणों का क्या करना होगा?

उन्हें अभिलिखित करना होगा।

धारा 47(1) के अनुसार कारण अभिलिखित करने के पश्चात् वन अधिकारी क्या कर सकता है?

दावे को खारिज कर सकता है या इमारती लकड़ी का परिदान दावेदार को कर सकता है।

धारा 47(1) के अनुसार वन अधिकारी इमारती लकड़ी का परिदान किसे कर सकता है?

दावेदार को।

धारा 47(2) के अनुसार यदि एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा इमारती लकड़ी पर दावा किया जाए तो वन अधिकारी क्या कर सकता है?

इमारती लकड़ी ऐसे व्यक्ति को परिदत्त कर सकता है जिसे वह उसका हकदार समझता है।

धारा 47(2) के अनुसार यदि एक से अधिक दावेदार हों तो वन अधिकारी दावेदारों को कहाँ निर्देशित कर सकता है?

सिविल न्यायालयों को।

धारा 47(2) के अनुसार सिविल न्यायालय के आदेश की प्राप्ति लंबित रहने तक वन अधिकारी क्या कर सकता है?

इमारती लकड़ी को अपने कब्जे में रख सकता है।

धारा 47(2) के अनुसार सिविल न्यायालय का आदेश किस विषय में होगा?

इमारती लकड़ी के व्ययन के संबंध में।

धारा 47(3) के अनुसार जिसका दावा खारिज कर दिया गया हो वह क्या कर सकता है?

अपने द्वारा दावाकृत इमारती लकड़ी का कब्जा वापस लेने के लिए वाद संस्थित कर सकता है।

धारा 47(3) के अनुसार कब्जा वापस लेने के लिए वाद किस अवधि के भीतर संस्थित किया जा सकता है?

दावे की खारिजी की तारीख से तीन मास के भीतर।

धारा 47(3) के अनुसार कौन सरकार या वन अधिकारी से प्रतिकर या खर्चा वसूल नहीं कर सकता?

वह व्यक्ति जिसका दावा खारिज हुआ हो या जो खारिजी, इमारती लकड़ी के रोके जाने, हटाए जाने या अन्य व्यक्ति को परिदान किए जाने के आधार पर दावा करे।

धारा 47(3) के अनुसार किन कारणों से सरकार या वन अधिकारी से प्रतिकर या खर्चा वसूल नहीं किया जा सकता?

दावे की खारिजी, इमारती लकड़ी के रोक रखे जाने, हटाए जाने या अन्य व्यक्ति को परिदान किए जाने के कारण।

धारा 47(4) के अनुसार कब तक ऐसी इमारती लकड़ी किसी सिविल, दण्ड या राजस्व न्यायालय की आदेशिका के अधीन नहीं होगी?

जब तक इमारती लकड़ी परिदत्त कर दी जाए या 47 धारा के अनुसार कोई वाद संस्थित किया जाए।

धारा 47(4) के अनुसार किन न्यायालयों की आदेशिका ऐसी इमारती लकड़ी पर लागू नहीं होगी?

सिविल, दण्ड या राजस्व न्यायालय की।

धारा 48 का विषय क्या है?

जिसका दावा नहीं किया गया उस इमारती लकड़ी का व्ययन।

(Disposal of unclaimed timber)

धारा 48 के अनुसार यदि दावे का कथन प्रस्तुत नहीं किया जाता तो इमारती लकड़ी का स्वामित्व किसमें निहित होगा?

सरकार में या धारा 47 के अधीन परिदत्त किए जाने की दशा में ऐसे व्यक्ति में।

धारा 48 के अनुसार यदि दावेदार धारा 46 की सूचना द्वारा नियत रीति से या कालावधि के भीतर दावा करने का लोप करता है तो इमारती लकड़ी का स्वामित्व किसमें निहित होगा?

सरकार में या धारा 47 के अधीन परिदत्त किए जाने की दशा में ऐसे व्यक्ति में।

धारा 48 के अनुसार यदि दावे के खारिज होने पर दावेदार धारा 47 द्वारा नियत अवधि के भीतर वाद संस्थित नहीं करता तो इमारती लकड़ी का स्वामित्व किसमें निहित होगा?

सरकार में या धारा 47 के अधीन परिदत्त किए जाने की दशा में ऐसे व्यक्ति में।

धारा 48 के अनुसार धारा 47 द्वारा परिदत्त इमारती लकड़ी का स्वामित्व किसमें निहित होगा?

उस व्यक्ति में जिसे धारा 47 के अधीन इमारती लकड़ी परिदत्त की गई है।

धारा 48 के अनुसार सरकार या परिदत्त व्यक्ति में निहित स्वामित्व किस प्रकार के विल्लंगमों से मुक्त होगा?

उन सब विल्लंगमों से मुक्त होगा जिन्हें उसने सृष्ट नहीं किया है।

धारा 48 के अनुसार दावेदार द्वारा वाद किस धारा द्वारा नियत अपर कालावधि के भीतर संस्थित किया जाना आवश्यक है?

धारा 47 द्वारा नियत अपर कालावधि के भीतर।

धारा 49 का विषय क्या है?

ऐसी इमारती लकड़ी को हुए नुकसान के लिए सरकार और उसके अधिकारी उत्तरदायी नहीं होंगे।

(Government and its officers not liable for damage to such timber)

धारा 49 के अनुसार धारा 45 के अधीन संगृहीत इमारती लकड़ी को हुई हानि या नुकसान के लिए कौन उत्तरदायी नहीं होगा?

सरकार।

धारा 49 के अनुसार धारा 45 के अधीन संगृहीत इमारती लकड़ी को हुई हानि या नुकसान के लिए वन अधिकारी सामान्यतः कब उत्तरदायी नहीं होगा?

जब तक वह हानि या नुकसान उपेक्षा, विद्वेष या कपट से करता हो।

धारा 49 के अनुसार वन अधिकारी कब हानि या नुकसान के लिए उत्तरदायी होगा?

जब वह हानि या नुकसान उपेक्षा, विद्वेष या कपट से करता है।

धारा 49 के अनुसार वन अधिकारी की उत्तरदायित्व-मुक्ति का अपवाद क्या है?

उपेक्षा, विद्वेष या कपट से की गई हानि या नुकसान।

धारा 50 का विषय क्या है?

इमारती लकड़ी के परिदान के पूर्व दावेदार द्वारा की जाने वाली अदायगी।

(Payments to be made by claimant before timber is delivered to him)

धारा 50 के अनुसार दावेदार को इमारती लकड़ी का कब्जा प्राप्त करने से पूर्व क्या करना आवश्यक है?

धारा 51 के अधीन बने नियमों के अधीन देय राशि का भुगतान करना।

धारा 50 के अनुसार देय राशि किस धारा के अधीन बने नियमों के अनुसार देय होती है?

धारा 51 के अधीन बने नियमों के अनुसार।

धारा 50 के अनुसार देय राशि किसे चुकाई जाएगी?

वन अधिकारी या उस अन्य व्यक्ति को जो उसे प्राप्त करने का हकदार है।

धारा 50 के अनुसार दावेदार कब तक संगृहीत या परिदत्त इमारती लकड़ी का कब्जा लेने का हकदार नहीं होगा?

जब तक वह धारा 51 के अधीन देय राशि वन अधिकारी या उसे प्राप्त करने के हकदार अन्य व्यक्ति को अदा नहीं कर देता।

धारा 51 का विषय क्या है?

नियम बनाने और शास्तियां विहित करने की शक्ति।

(Power to make rules and prescribe penalties)

धारा 51(1) के अनुसार इस धारा के अधीन नियम बनाने की शक्ति किसके पास है?

राज्य सरकार के पास।

धारा 51(1) के अनुसार राज्य सरकार नियम किस माध्यम से बनाएगी?

राजपत्र में अधिसूचना द्वारा।

धारा 51(1)() के अनुसार राज्य सरकार किन विषयों का विनियमन करने के लिए नियम बना सकेगी?

धारा 45 में वर्णित सब इमारती लकड़ी के उद्धारण, संग्रहण और व्ययन का।

धारा 51(1)() के अनुसार राज्य सरकार किन नावों के प्रयोग और रजिस्ट्रीकरण का विनियमन करने के लिए नियम बना सकेगी?

इमारती लकड़ी के उद्धारण और संग्रहण के लिए प्रयुक्त नावों का।

धारा 51(1)() के अनुसार राज्य सरकार किन राशियों के संबंध में नियम बना सकेगी?

इमारती लकड़ी के उद्धारण, संग्रहण, स्थानान्तरण, भण्डार में रखने या व्ययन के लिए दी जाने वाली राशियों के संबंध में।

धारा 51(1)() के अनुसार राज्य सरकार किन उपकरणों के प्रयोग और रजिस्ट्रीकरण का विनियमन करने के लिए नियम बना सकेगी?

इमारती लकड़ी को चिह्नित करने के लिए प्रयोग में आने वाले हथौड़े और अन्य उपकरणों का।

धारा 51(1) के अनुसार राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम कब राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा?

बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र।

धारा 51(1) के अनुसार राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम किसके समक्ष रखा जाएगा?

राज्य विधान-मंडल के समक्ष।

धारा 51(2) के अनुसार इस धारा के अधीन बने नियमों के उल्लंघन के लिए शास्तियां विहित करने की शक्ति किसके पास है?

राज्य सरकार के पास।

धारा 51(2) के अनुसार नियमों के उल्लंघन के लिए अधिकतम कारावास कितना हो सकता है?

छह मास तक का।

धारा 51(2) के अनुसार नियमों के उल्लंघन के लिए अधिकतम जुर्माना कितना हो सकता है?

पाँच सौ रुपए तक का।

 

अध्याय-9

(Chapter-IX)

शास्तियां और प्रक्रिया

(Penalties And Procedure)

धारा 52 का विषय क्या है?

अधिहरणीय सम्पत्ति का अभिग्रहण।

(Seizure of property liable to confiscation)

धारा 52(1) के अनुसार वन-उपज का अभिग्रहण कब किया जा सकता है?

जब यह विश्वास करने का कारण हो कि किसी वन-उपज के संबंध में कोई वन विषयक अपराध किया गया है।

धारा 52(1) के अनुसार वन-उपज का अभिग्रहण कौन कर सकता है?

वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी।

धारा 52(1) के अनुसार वन-उपज के साथ किन वस्तुओं का भी अभिग्रहण किया जा सकता है?

सब औजारों, नावों, छकड़ों और पशुओं का, जिनका प्रयोग ऐसे अपराध के करने में हुआ है।

धारा 52(1) के अनुसार किन औजारों, नावों, छकड़ों और पशुओं का अभिग्रहण किया जा सकता है?

जिनका प्रयोग वन विषयक अपराध के करने में हुआ है।

धारा 52(2) के अनुसार अभिग्रहण करने वाला प्रत्येक अधिकारी सम्पत्ति पर क्या करेगा?

ऐसा चिह्न लगाएगा जिससे यह उपदर्शित हो कि सम्पत्ति का अभिग्रहण किया जा चुका है।

धारा 52(2) के अनुसार अभिग्रहण करने वाला अधिकारी अभिग्रहण की रिपोर्ट किसे भेजेगा?

उस अपराध का विचारण करने के लिए अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को।

धारा 52(2) के अनुसार अभिग्रहण की रिपोर्ट कब भेजी जाएगी?

यथाशक्य शीघ्र।

धारा 52(2) के अनुसार अभिग्रहण की रिपोर्ट किस अपराध के संबंध में भेजी जाएगी?

उस अपराध के संबंध में जिसके कारण अभिग्रहण हुआ है।

धारा 52 के परन्तुक के अनुसार मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट भेजने के स्थान पर कब पदीय वरिष्ठ को रिपोर्ट देना पर्याप्त होगा?

जब वन-उपज सरकार की सम्पत्ति हो और अपराधी अज्ञात हो।

धारा 52 के परन्तुक के अनुसार पदीय वरिष्ठ को रिपोर्ट किस विषय में दी जाएगी?

परिस्थितियों के बारे में।

धारा 53 का विषय क्या है?

धारा 52 के अधीन अभिगृहीत सम्पत्ति को निर्मुक्त करने की शक्ति।

(Power to release property seized under section 52)

धारा 53 के अनुसार धारा 52 के अधीन अभिगृहीत औजार, नावें, छकड़े या ढोर को निर्मुक्त करने की शक्ति किसके पास है?

रेंजर से अनिम्न पंक्ति वाले वन अधिकारी के पास।

धारा 53 के अनुसार कौन-सा वन अधिकारी सम्पत्ति को निर्मुक्त कर सकता है?

जिसने या जिसके अधीनस्थ ने धारा 52 के अधीन औजार, नावें, छकड़े या ढोर अभिगृहीत किए हैं।

धारा 53 के अनुसार अभिगृहीत सम्पत्ति किन वस्तुओं से संबंधित है?

औजार, नावें, छकड़े और ढोर।

धारा 53 के अनुसार अभिगृहीत सम्पत्ति किसके द्वारा बन्धपत्र निष्पादित किए जाने पर निर्मुक्त की जा सकती है?

उसके स्वामी द्वारा।

धारा 53 के अनुसार बन्धपत्र में स्वामी क्या वचन देता है?

कि अपेक्षा किए जाने पर वह निर्मुक्त की गई सम्पत्ति उस मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करेगा जिसे अपराध के विचारण की अधिकारिता प्राप्त है।

धारा 53 के अनुसार निर्मुक्त सम्पत्ति किस मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी?

उस मजिस्ट्रेट के समक्ष जिसे उस अपराध के विचारण की अधिकारिता प्राप्त है जिसके कारण अभिग्रहण हुआ है।

धारा 53 के अनुसार निर्मुक्त सम्पत्ति कब प्रस्तुत की जाएगी?

जब और जैसे ही उससे ऐसा करने की अपेक्षा की जाएगी।

धारा 54 का विषय क्या है?

तदुपरि प्रक्रिया।

(Procedure thereupon)

धारा 54 के अनुसार यह धारा किसकी रिपोर्ट की प्राप्ति पर लागू होती है?

धारा 52 के अधीन अभिग्रहण की रिपोर्ट की प्राप्ति पर।

धारा 54 के अनुसार रिपोर्ट की प्राप्ति पर मजिस्ट्रेट क्या करेगा?

सब सुविधापूर्ण शीघ्रता से आवश्यक उपाय करेगा।

धारा 54 के अनुसार मजिस्ट्रेट किन उद्देश्यों के लिए आवश्यक उपाय करेगा?

अपराधी की गिरफ्तारी, विचारण तथा सम्पत्ति के विधि के अनुसार व्ययन के लिए।

धारा 54 के अनुसार मजिस्ट्रेट को उपाय किस गति से करने होंगे?

सब सुविधापूर्ण शीघ्रता से।

धारा 55 का विषय क्या है?

वन-उपज, औजार आदि कब अधिहरणीय होंगे।

(Forest-produce, tools, etc., when liable to confiscation)

धारा 55(1) के अनुसार कौन-सी इमारती लकड़ी अधिहरणीय होगी?

ऐसी इमारती लकड़ी, जो सरकार की सम्पत्ति नहीं है और जिसके विषय में वन अपराध किया गया है।

धारा 55(1) के अनुसार कौन-सी वन-उपज अधिहरणीय होगी?

ऐसी वन-उपज, जो सरकार की सम्पत्ति नहीं है और जिसके विषय में वन अपराध किया गया है।

धारा 55(1) के अनुसार वन विषयक अपराध के करने में प्रयुक्त कौन-कौन सी वस्तुएँ अधिहरणीय होंगी?

सब औजार, नावें, छकड़े और पशु।

धारा 55(1) के अनुसार किन औजारों, नावों, छकड़ों और पशुओं का अधिहरण किया जाएगा?

जिनका प्रयोग वन विषयक अपराध करने में हुआ है।

धारा 55(2) के अनुसार अधिहरण किसके अतिरिक्त हो सकेगा?

ऐसे अपराध के लिए विहित किसी अन्य दण्ड के अतिरिक्त।

धारा 55(2) के अनुसार क्या अधिहरण अन्य दण्ड का स्थान लेता है?

नहीं, अधिहरण ऐसे अपराध के लिए विहित अन्य दण्ड के अतिरिक्त होगा।

धारा 56 का विषय क्या है?

वन-अपराध के लिए हुए विचारण की समाप्ति पर, उस वन-उपज का व्ययन जिसके सम्बन्ध में यह अपराध हुआ है।

(Disposal, on conclusion of trial for forest-offence, of produce in respect of which it was committed)

धारा 56 के अनुसार यह धारा कब लागू होती है?

जब किसी वन विषयक अपराध का विचारण समाप्त हो जाता है।

धारा 56 के अनुसार यदि वह वन-उपज सरकार की सम्पत्ति है तो उसका क्या किया जाएगा?

उसे वन अधिकारी द्वारा अपने भारसाधन में ले लिया जाएगा।

धारा 56 के अनुसार यदि वन-उपज का अधिहरण हो चुका है तो उसका क्या किया जाएगा?

उसे वन अधिकारी द्वारा अपने भारसाधन में ले लिया जाएगा।

धारा 56 के अनुसार सरकार की सम्पत्ति या अधिहृत वन-उपज को अपने भारसाधन में कौन लेगा?

वन अधिकारी।

धारा 56 के अनुसार यदि वन-उपज तो सरकार की सम्पत्ति हो और ही उसका अधिहरण हुआ हो तो उसका व्ययन कैसे किया जाएगा?

न्यायालय द्वारा निर्दिष्ट रीति से।

धारा 56 के अनुसार अन्य दशा में वन-उपज के व्ययन की रीति कौन निर्दिष्ट करेगा?

न्यायालय।

धारा 57 का विषय क्या है?

जब अपराधी अज्ञात है, या पाया जा सके, तब प्रक्रिया।

(Procedure when offender not known, or cannot be found)

धारा 57 के अनुसार यह धारा किन परिस्थितियों में लागू होती है?

जब अपराधी अज्ञात हो या पाया जा सके।

धारा 57 के अनुसार अधिहरण का आदेश देने से पूर्व मजिस्ट्रेट का किस निष्कर्ष पर पहुँचना आवश्यक है?

कि कोई वन विषयक अपराध किया गया है।

धारा 57 के अनुसार मजिस्ट्रेट किस सम्पत्ति के अधिहरण का आदेश दे सकता है?

उस सम्पत्ति का जिसके संबंध में अपराध हुआ है।

धारा 57 के अनुसार अधिहृत सम्पत्ति को अपने भारसाधन में कौन लेगा?

वन अधिकारी।

धारा 57 के अनुसार मजिस्ट्रेट अधिहृत सम्पत्ति किसे दे सकता है?

उस व्यक्ति को जिसे वह उसका हकदार समझता है।

धारा 57 के परन्तुक के अनुसार अधिहरण का आदेश कब तक नहीं दिया जाएगा?

जब तक सम्पत्ति के अभिग्रहण की तारीख से एक मास का अवसान हो जाए या दावेदार एवं उसके साक्ष्य की सुनवाई हो जाए।

धारा 57 के परन्तुक के अनुसार अधिहरण का आदेश देने से पूर्व किसकी सुनवाई आवश्यक है?

सम्पत्ति पर अधिकार का दावा करने वाले व्यक्ति तथा उसके द्वारा दावे के समर्थन में प्रस्तुत साक्ष्य की।

धारा 57 के परन्तुक के अनुसार यदि सम्पत्ति पर किसी अधिकार का दावा किया गया हो तो किसके साक्ष्य की सुनवाई की जाएगी?

दावेदार द्वारा अपने दावे के समर्थन में प्रस्तुत साक्ष्य की।

धारा 57 के परन्तुक के अनुसार अभिग्रहण की तारीख से कितनी अवधि के अवसान से पूर्व अधिहरण का आदेश नहीं दिया जा सकता?

एक मास के अवसान से पूर्व।

धारा 58 का विषय क्या है?

धारा 52 के अधीन अभिगृहीत विनश्वर सम्पत्ति विषयक प्रक्रिया।

(Procedure as to perishable property seized under section 52)

धारा 58 के अनुसार यह धारा किस सम्पत्ति पर लागू होती है?

धारा 52 के अधीन अभिगृहीत और शीघ्र तथा प्रकृत्या क्षयशील सम्पत्ति पर।

धारा 58 के अनुसार विनश्वर सम्पत्ति के विक्रय का निदेश कौन दे सकता है?

मजिस्ट्रेट।

धारा 58 के अनुसार मजिस्ट्रेट विनश्वर सम्पत्ति के विक्रय का निदेश किसके होते हुए भी दे सकता है?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 में इसके पूर्व अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी।

धारा 58 के अनुसार विक्रय के पश्चात् आगमों (विक्रय-राशि) से मजिस्ट्रेट कैसे बरतेगा?

जिस प्रकार वह ऐसी सम्पत्ति से बरतता यदि वह बेची गई होती।

धारा 58 के अनुसार विक्रय-राशि (आगम) का व्यवहार किसके समान किया जाएगा?

मानो सम्पत्ति बेची गई होती।

धारा 59 का विषय क्या है?

धारा 55, धारा 56 या धारा 57 के अधीन आदेशों की अपील।

(Appeal from orders under section 55, section 56 or section 57)

धारा 59 के अनुसार धारा 55, धारा 56 या धारा 57 के अधीन पारित आदेश के विरुद्ध अपील कौन कर सकता है?

धारा 52 के अधीन अभिग्रहण करने वाला अधिकारी, उसका कोई पदीय वरिष्ठ या अभिगृहीत सम्पत्ति में हितबद्ध होने का दावा करने वाला कोई व्यक्ति।

धारा 59 के अनुसार अभिग्रहण करने वाले अधिकारी का कौन-सा वरिष्ठ अपील कर सकता है?

उसका कोई पदीय वरिष्ठ।

धारा 59 के अनुसार अभिगृहीत सम्पत्ति में हितबद्ध होने का दावा करने वाले व्यक्ति को किस अधिकार का प्रयोग प्राप्त है?

अपील करने का अधिकार।

धारा 59 के अनुसार अपील किन आदेशों के विरुद्ध की जा सकती है?

धारा 55, धारा 56 या धारा 57 के अधीन पारित आदेशों के विरुद्ध।

धारा 59 के अनुसार अपील किस अवधि के भीतर की जाएगी?

आदेश की तारीख से एक मास के भीतर।

धारा 59 के अनुसार अपील किस न्यायालय में की जाएगी?

उस न्यायालय में जिसमें ऐसे मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेशों की अपील मामूली तौर से होती है।

धारा 59 के अनुसार अपील में पारित आदेश की प्रकृति क्या होगी?

वह अन्तिम होगा।

धारा 60 का विषय क्या है?

सम्पत्ति कब सरकार में निहित होगी।

(Property when to vest in Government)

धारा 60 के अनुसार सम्पत्ति सरकार में कब निहित होगी?

जब धारा 55 या धारा 57 के अधीन अधिहरण का आदेश पारित हो जाए और धारा 59 के अधीन अपील की अवधि बीत जाए तथा कोई अपील की गई हो, या अपील में आदेश की पुष्टि कर दी गई हो।

धारा 60 के अनुसार अधिहरण का आदेश किन धाराओं के अधीन पारित किया जा सकता है?

धारा 55 या धारा 57 के अधीन।

धारा 60 के अनुसार अपील की अवधि किस धारा द्वारा परिसीमित है?

धारा 59 द्वारा।

धारा 60 के अनुसार यदि अपील की अवधि बीत जाए और कोई अपील की जाए तो सम्पत्ति किसमें निहित होगी?

सरकार में।

धारा 60 के अनुसार यदि अपील न्यायालय अधिहरण के आदेश की पुष्टि कर दे तो सम्पत्ति किसमें निहित होगी?

सरकार में।

धारा 60 के अनुसार अपील न्यायालय सम्पत्ति के किस भाग के संबंध में आदेश की पुष्टि कर सकता है?

सम्पूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी प्रभाग के संबंध में।

धारा 60 के अनुसार सरकार में निहित होने पर सम्पत्ति किस प्रकार निहित होगी?

सब विल्लंगमों से मुक्त होकर।

धारा 60 के अनुसार यदि अपील न्यायालय सम्पत्ति के किसी प्रभाग के संबंध में आदेश की पुष्टि करे तो क्या सरकार में निहित होगा?

सम्पत्ति का वह प्रभाग सब विल्लंगमों से मुक्त होकर सरकार में निहित होगा।

धारा 61 का विषय क्या है?

अभिगृहीत सम्पत्ति को निर्मुक्त करने की शक्ति की व्यावृत्ति।

(Saving of power to release property seized)

धारा 61 के अनुसार यह धारा किस सम्पत्ति पर लागू होती है?

धारा 52 के अधीन अभिगृहीत सम्पत्ति पर।

धारा 61 के अनुसार धारा 52 के अधीन अभिगृहीत सम्पत्ति को तुरन्त निर्मुक्त करने का निदेश देने की शक्ति किसके पास है?

राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त अधिकारी के पास।

धारा 61 के अनुसार भारतीय वन अधिनियम, 1927 में पूर्व अन्तर्विष्ट कोई बात किसे निवारित नहीं करेगी?

राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त अधिकारी को धारा 52 के अधीन अभिगृहीत सम्पत्ति को तुरन्त निर्मुक्त करने का निदेश देने से।

धारा 61 के अनुसार अभिगृहीत सम्पत्ति को कब निर्मुक्त करने का निदेश दिया जा सकता है?

तुरन्त।

धारा 62 का विषय क्या है?

दोषपूर्ण अभिग्रहण के लिए दण्ड।

(Punishment for wrongful seizure)

धारा 62 के अनुसार दोषपूर्ण अभिग्रहण का अपराध कौन कर सकता है?

वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी।

धारा 62 के अनुसार दोषपूर्ण अभिग्रहण कब माना जाएगा?

जब वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी तंग करने के लिए और अनावश्यक रूप से इस बहाने किसी सम्पत्ति का अभिग्रहण करे कि वह भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन अधिहरणीय है।

धारा 62 के अनुसार दोषपूर्ण अभिग्रहण का आधार क्या है?

यह बहाना कि अभिगृहीत सम्पत्ति भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन अधिहरणीय है।

धारा 62 के अनुसार दोषपूर्ण अभिग्रहण के लिए अधिकतम कारावास कितना हो सकता है?

छह मास तक का।

धारा 62 के अनुसार दोषपूर्ण अभिग्रहण के लिए अधिकतम जुर्माना कितना हो सकता है?

पाँच सौ रुपए तक का।

धारा 63 का विषय क्या है?

वृक्षों और इमारती लकड़ी पर चिह्नों के कूटकरण करने और उन्हें विरूपित करने तथा सीमा चिह्नों को बदलने के लिए शास्ति।

(Penalty for counterfeiting or defacing marks on trees and timber and for altering boundary-marks)

धारा 63 के अनुसार यह अपराध किस आशय से किया जाना आवश्यक है?

लोक या किसी व्यक्ति को नुकसान या क्षति पहुँचाने या भारतीय दण्ड संहिता (भारतीय न्याय संहिता 2023) में यथापरिभाषित सदोष लाभ के आशय से।

धारा 63 के अनुसार सदोष लाभ किस अधिनियम में परिभाषित है?

भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (भारतीय न्याय संहिता 2023) में।

धारा 63() के अनुसार कौन-सा चिह्न कूटकरण करना अपराध है?

ऐसा चिह्न जिसे वन अधिकारी यह उपदर्शित करने के लिए प्रयोग करते हैं कि इमारती लकड़ी या वृक्ष सरकार या किसी व्यक्ति की सम्पत्ति है अथवा उसे विधिपूर्वक काटा या हटाया जा सकता है।

धारा 63() के अनुसार चिह्न का कूटकरण किन पर किया जाना अपराध है?

इमारती लकड़ी या खड़े वृक्ष पर।

धारा 63() के अनुसार वन अधिकारी द्वारा प्रयुक्त चिह्न क्या उपदर्शित करता है?

इमारती लकड़ी या वृक्ष सरकार या किसी व्यक्ति की सम्पत्ति है अथवा उसे किसी व्यक्ति द्वारा विधितः काटा या हटाया जा सकेगा।

धारा 63() के अनुसार किसी वन अधिकारी के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन लगाए गए चिह्न के संबंध में कौन-कौन से कार्य अपराध हैं?

चिह्न को बदलना, विरूपित करना या मिटाना।

धारा 63() के अनुसार चिह्न किसके प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन लगाया गया होना चाहिए?

वन अधिकारी के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन।

धारा 63() के अनुसार किस सीमा-चिह्न के संबंध में छेड़छाड़ करना अपराध है?

किसी वन या बंजर भूमि के, जिस पर भारतीय वन अधिनियम, 1927 के उपबंध लागू होते हैं, सीमा-चिह्न के संबंध में।

धारा 63() के अनुसार सीमा-चिह्न के संबंध में कौन-कौन से कार्य अपराध हैं?

सीमा-चिह्न को बदलना, सरकाना, नष्ट करना या विरूपित करना।

धारा 63 के अनुसार इस धारा के अपराध के लिए अधिकतम कारावास कितना हो सकता है?

दो वर्ष तक का।

धारा 64 का विषय क्या है?

वारंट के बिना गिरफ्तार करने की शक्ति।

(Power to arrest without warrant)

धारा 64(1) के अनुसार वारंट के बिना किसे गिरफ्तार किया जा सकता है?

ऐसे व्यक्ति को जिसके विरुद्ध यह युक्तियुक्त संदेह हो कि वह एक मास या उससे अधिक के कारावास से दण्डनीय वन विषयक अपराध से सम्पृक्त है।

धारा 64(1) के अनुसार वारंट के बिना गिरफ्तारी कौन कर सकता है?

वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी।

धारा 64(1) के अनुसार वारंट के बिना गिरफ्तारी किसके आदेश के बिना की जा सकती है?

किसी मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना।

धारा 64(1) के अनुसार वारंट के बिना गिरफ्तारी किन अपराधों के लिए की जा सकती है?

ऐसे वन विषयक अपराध के लिए जो एक मास या उससे अधिक के कारावास से दण्डनीय हो।

धारा 64(2) के अनुसार गिरफ्तारी करने वाला अधिकारी गिरफ्तार व्यक्ति के साथ क्या करेगा?

उसे अनावश्यक विलम्ब के बिना अधिकारिता प्राप्त मजिस्ट्रेट के समक्ष या निकटतम पुलिस स्टेशन के भारसाधक अधिकारी के पास ले जाएगा या भेजेगा।

धारा 64(2) के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को किस मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाया या भेजा जाएगा?

ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष जिसे इस मामले में अधिकारिता प्राप्त है।

धारा 64(2) के अनुसार यदि मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाया जाए तो गिरफ्तार व्यक्ति को कहाँ ले जाया या भेजा जाएगा?

निकटतम पुलिस स्टेशन के भारसाधक अधिकारी के पास।

धारा 64(2) के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को ले जाने या भेजने की प्रक्रिया किसके अधीन होगी?

बन्धपत्र पर निर्मुक्त करने संबंधी अधिनियम के उपबंधों के अधीन।

धारा 64(2) के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को कब ले जाया या भेजा जाएगा?

बिना किसी अनावश्यक विलम्ब के।

धारा 64(3) के अनुसार इस धारा के अधीन गिरफ्तारी की शक्ति किन अपराधों पर लागू नहीं होती?

अध्याय 4 के अधीन अपराधों पर।

धारा 64(3) के अनुसार अध्याय 4 के अधीन अपराध के लिए गिरफ्तारी कब की जा सकती है?

जब धारा 30 के खण्ड () के अधीन ऐसा कार्य प्रतिषिद्ध कर दिया गया हो।

धारा 65 का विषय क्या है?

किसी गिरफ्तार व्यक्ति को बन्धपत्र पर निर्मुक्त करने की शक्ति।

(Power to release on a bond a person arrested)

धारा 65 के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को बन्धपत्र पर निर्मुक्त करने की शक्ति किसके पास है?

रेंजर से अनिम्न पंक्ति के वन अधिकारी के पास।

धारा 65 के अनुसार कौन-सा वन अधिकारी गिरफ्तार व्यक्ति को निर्मुक्त कर सकता है?

जिसने या जिसके अधीनस्थ ने धारा 64 के अधीन किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया है।

धारा 65 के अनुसार गिरफ्तारी किस धारा के उपबंधों के अधीन की गई होनी चाहिए?

धारा 64 के उपबंधों के अधीन।

धारा 65 के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को किसके निष्पादित किए जाने पर निर्मुक्त किया जा सकता है?

उसके द्वारा बन्धपत्र निष्पादित किए जाने पर।

धारा 65 के अनुसार बन्धपत्र में गिरफ्तार व्यक्ति क्या वचन देता है?

अपेक्षा किए जाने पर वह मामले के बारे में अधिकारिता प्राप्त मजिस्ट्रेट के समक्ष या निकटतम पुलिस स्टेशन के भारसाधक अधिकारी के समक्ष उपसंजात हो जाएगा।

धारा 65 के अनुसार बन्धपत्र के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति किसके समक्ष उपसंजात होगा?

मामले के बारे में अधिकारिता प्राप्त मजिस्ट्रेट या निकटतम पुलिस स्टेशन के भारसाधक अधिकारी के समक्ष।

धारा 65 के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को बन्धपत्र के अनुसार कब उपसंजात होना होगा?

जब और जैसे ही उससे ऐसा करने की अपेक्षा की जाएगी।

धारा 66 का विषय क्या है?

अपराधों का किया जाना निवारित करने की शक्ति।

(Power to prevent commission of offence)

धारा 66 के अनुसार वन विषयक अपराध का किया जाना निवारित करने का दायित्व किसका है?

प्रत्येक वन अधिकारी और पुलिस अधिकारी का।

धारा 66 के अनुसार वन विषयक अपराध को निवारित करने के लिए कौन हस्तक्षेप कर सकता है?

प्रत्येक वन अधिकारी और पुलिस अधिकारी।

धारा 66 के अनुसार वन अधिकारी और पुलिस अधिकारी किस उद्देश्य से हस्तक्षेप कर सकते हैं?

वन विषयक अपराध के किए जाने को निवारित करने के प्रयोजन से।

धारा 67 का विषय क्या है?

अपराधों का संक्षिप्ततः विचारण करने की शक्ति।

(Power to try offences summarily)

धारा 67 के अनुसार वन विषयक अपराध का संक्षिप्ततः विचारण कौन कर सकता है?

जिला मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट।

धारा 67 के अनुसार प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को संक्षिप्त विचारण की शक्ति कौन प्रदान कर सकता है?

राज्य सरकार।

धारा 67 के अनुसार संक्षिप्त विचारण किस संहिता के अधीन किया जाएगा?

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023) के अधीन।

धारा 67 के अनुसार किन वन विषयक अपराधों का संक्षिप्ततः विचारण किया जा सकता है?

जो छह मास से अनधिक कारावास या पाँच सौ रुपए से अनधिक जुर्माने से, या दोनों से दण्डनीय हों।

धारा 67 के अनुसार संक्षिप्त विचारण के लिए अपराध के कारावास की अधिकतम सीमा क्या है?

छह मास से अनधिक।

धारा 67 के अनुसार संक्षिप्त विचारण के लिए अपराध के जुर्माने की अधिकतम सीमा क्या है?

पाँच सौ रुपए से अनधिक।

धारा 68 का विषय क्या है?

अपराधों का शमन करने की शक्ति।

(Power to compound offences)

धारा 68(1) के अनुसार अपराधों का शमन करने की शक्ति किसके द्वारा प्रदान की जाती है?

राज्य सरकार द्वारा।

धारा 68(1) के अनुसार राज्य सरकार यह शक्ति किस माध्यम से प्रदान करेगी?

राजपत्र में अधिसूचना द्वारा।

धारा 68(1)() के अनुसार वन अधिकारी किससे प्रतिकर के रूप में धनराशि प्रतिगृहीत कर सकता है?

ऐसे व्यक्ति से जिसके विरुद्ध यह युक्तियुक्त संदेह हो कि उसने धारा 62 या धारा 63 से भिन्न कोई वन विषयक अपराध किया है।

धारा 68(1)() के अनुसार किन अपराधों का शमन नहीं किया जा सकता?

धारा 62 या धारा 63 में विनिर्दिष्ट अपराधों का।

धारा 68(1)() के अनुसार प्रतिगृहीत धनराशि किस रूप में होगी?

अपराध के प्रतिकर के रूप में।

धारा 68(1)() के अनुसार अभिगृहीत सम्पत्ति कब निर्मुक्त की जा सकती है?

जब उसके मूल्य का, जैसा अधिकारी द्वारा प्राक्कलित किया गया हो, भुगतान कर दिया जाए।

धारा 68(1)() के अनुसार अभिगृहीत सम्पत्ति का मूल्य कौन प्राक्कलित करेगा?

सशक्त वन अधिकारी।

धारा 68(2) के अनुसार प्रतिकर की धनराशि, मूल्य या दोनों के भुगतान पर अभिरक्षा में रखे गए व्यक्ति के साथ क्या किया जाएगा?

उसे उन्मोचित कर दिया जाएगा।

धारा 68(2) के अनुसार प्रतिकर की धनराशि, मूल्य या दोनों के भुगतान पर अभिगृहीत सम्पत्ति के साथ क्या किया जाएगा?

उसे निर्मुक्त कर दिया जाएगा।

धारा 68(2) के अनुसार प्रतिकर की धनराशि, मूल्य या दोनों के भुगतान के बाद आगे क्या कार्यवाही नहीं की जाएगी?

उस व्यक्ति या उस सम्पत्ति के विरुद्ध कोई आगे की कार्यवाही नहीं की जाएगी।

धारा 68(3) के अनुसार इस धारा के अधीन शक्ति किस वन अधिकारी को प्रदान की जा सकती है?

जो रेंजर से अनिम्न पंक्ति का वन अधिकारी हो और कम से कम सौ रुपए मासिक वेतन पाता हो।

धारा 68(3) के अनुसार इस धारा के अधीन शक्ति प्रदान किए जाने के लिए वन अधिकारी का न्यूनतम मासिक वेतन कितना होना चाहिए?

कम से कम सौ रुपए।

धारा 68(3) के अनुसार उपधारा (1)() के अधीन प्रतिकर के रूप में प्रतिगृहीत धनराशि की अधिकतम सीमा क्या है?

पचास रुपए।

धारा 69 का विषय क्या है?

यह उपधारणा कि वन-उपज सरकार की है।

(Presumption that forest-produce belongs to Government)

धारा 69 के अनुसार वन-उपज के सरकार की सम्पत्ति होने का प्रश्न कब उठता है?

जब भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन की गई किसी कार्यवाही में या भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन किए गए किसी कार्य के परिणामस्वरूप ऐसा प्रश्न उठता है।

धारा 69 के अनुसार वन-उपज के संबंध में कौन-सी उपधारणा की जाएगी?

कि वह सरकार की सम्पत्ति है।

धारा 69 के अनुसार वन-उपज के सरकार की सम्पत्ति होने की उपधारणा कब तक लागू रहेगी?

जब तक कि प्रतिकूल साबित कर दिया जाए।

धारा 69 के अनुसार वन-उपज के सरकार की सम्पत्ति होने की उपधारणा किस प्रकार की है?

प्रतिकूल सिद्ध किए जाने तक की उपधारणा।

 

अध्याय 10

(Chapter-X)

पशु अतिचार

(Cattle-Trespass)

धारा 70 का विषय क्या है?

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 का लागू होना।

(Cattle-trespass Act, 1871, to apply)

धारा 70 के अनुसार किन पशुओं को पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 11 के अर्थ में लोक बागान को नुकसान करने वाला पशु समझा जाएगा?

आरक्षित वन में या चरागाह के लिए विधिपूर्वक बन्द किए गए संरक्षित वन के किसी प्रभाग में अतिचार करने वाले पशुओं को।

धारा 70 के अनुसार संरक्षित वन का कौन-सा प्रभाग इस धारा के अंतर्गत आता है?

जो विधिपूर्वक चरागाह के लिए बन्द किया गया हो।

धारा 70 के अनुसार अतिचार करने वाले पशुओं का अभिग्रहण कौन कर सकता है?

वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी।

धारा 70 के अनुसार अतिचार करने वाले पशुओं को कौन परिबद्ध कर सकता है?

वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी।

धारा 70 के अनुसार इस धारा में किस अधिनियम की धारा 11 का उल्लेख है?

पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 11

धारा 71 का विषय क्या है?

उस नियम के अधीन नियत जुर्मानों को बदलने की शक्ति।

(Power to alter fines fixed under that Act)

धारा 71 के अनुसार पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 12 के अधीन नियत जुर्मानों को बदलने की शक्ति किसके पास है?

राज्य सरकार के पास।

धारा 71 के अनुसार राज्य सरकार यह शक्ति किस माध्यम से प्रयोग करेगी?

राजपत्र में अधिसूचना द्वारा।

धारा 71 के अनुसार राज्य सरकार किसके संबंध में निदेश दे सकती है?

कि पशु अतिचार अधिनियम, 1871 की धारा 12 के अधीन नियत जुर्मानों के स्थान पर धारा 70 के अधीन परिबद्ध प्रत्येक पशु के लिए इस धारा में निर्दिष्ट जुर्माना उद्गृहीत किया जाएगा।

धारा 71 के अनुसार धारा 70 के अधीन परिबद्ध प्रत्येक पशु के लिए जुर्माना कौन निर्धारित करेगा?

राज्य सरकार।

धारा 71 के अनुसार प्रत्येक हाथी के लिए अधिकतम जुर्माना कितना होगा?

दस रुपए।

धारा 71 के अनुसार प्रत्येक भैंस या ऊंट के लिए अधिकतम जुर्माना कितना होगा?

दो रुपए।

धारा 71 के अनुसार प्रत्येक घोड़े, खस्सी, पशु, टट्टू, बछेड़े, खच्चर, सांड, बैल, गाय या बछेड़ी के लिए अधिकतम जुर्माना कितना होगा?

एक रुपया।

धारा 71 के अनुसार प्रत्येक बछड़े, गधे, सूअर, मेढ़े, भेड़, मेमने, बकरी या उसके मेमनों के लिए अधिकतम जुर्माना कितना होगा?

आठ आने।

 

अध्याय-XI

(Chapter-XI)

वन अधिकारियों के सम्बन्ध में

(Of Forest Officers)

धारा 72 का विषय क्या है?

राज्य सरकार वन अधिकारियों में कतिपय शक्तियां विनिहित कर सकेगी।

(State Government may invest Forest Officers with certain powers)

धारा 72(1) के अनुसार वन अधिकारियों में शक्तियां विनिहित करने की शक्ति किसके पास है?

राज्य सरकार के पास।

धारा 72(1) के अनुसार राज्य सरकार वन अधिकारी में क्या विनिहित कर सकेगी?

धारा 72(1) में वर्णित सभी शक्तियां या उनमें से कोई शक्ति।

धारा 72(1)() के अनुसार वन अधिकारी को किस भूमि संबंधी शक्ति से विनिहित किया जा सकता है?

किसी भूमि पर जाने तथा उसका सर्वेक्षण, सीमांकन और नक्शा तैयार करने की शक्ति।

धारा 72(1)() के अनुसार वन अधिकारी को सिविल न्यायालय की कौन-सी शक्तियां दी जा सकती हैं?

साक्षियों को हाजिर होने तथा दस्तावेजों और सारवान् वस्तुओं को पेश करने के लिए विवश करने की शक्तियां।

धारा 72(1)() के अनुसार वन अधिकारी को किस संहिता के अधीन तलाशी वारंट निकालने की शक्ति दी जा सकती है?

दण्ड प्रक्रिया संहिता, (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अधीन।

धारा 72(1)() के अनुसार वन अधिकारी को जांच संबंधी कौन-सी शक्तियां दी जा सकती हैं?

वन विषयक अपराधों की जांच तथा जांच के दौरान साक्ष्य लेने और उसे अभिलिखित करने की शक्ति।

धारा 72(2) के अनुसार उपधारा (1)() के अधीन अभिलिखित साक्ष्य कहाँ ग्राह्य होगा?

मजिस्ट्रेट के समक्ष किसी पश्चात्वर्ती विचारण में।

धारा 72(2) के अनुसार उपधारा (1)() के अधीन अभिलिखित साक्ष्य कब ग्राह्य होगा?

जब वह साक्ष्य अभियुक्त व्यक्ति की उपस्थिति में लिया गया हो।

धारा 72(2) के अनुसार अभिलिखित साक्ष्य की ग्राह्यता की शर्त क्या है?

साक्ष्य अभियुक्त व्यक्ति की उपस्थिति में लिया गया हो।

धारा 73 का विषय क्या है?

वन अधिकारियों को लोक सेवक समझा जाएगा।

Forest Officers deemed public servants

धारा 73 के अनुसार किन व्यक्तियों को लोक सेवक समझा जाएगा?

सभी वन अधिकारियों को।

धारा 73 के अनुसार वन अधिकारियों को किस अधिनियम के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझा जाएगा?

भारतीय दण्ड संहिता (भारतीय न्याय संहिता, 2023) के अर्थान्तर्गत।

धारा 74 का विषय क्या है?

सद्भावपूर्वक किए गए कार्यों के लिए परित्राण।

(Indemnity for acts done in good faith)

धारा 74 के अनुसार किसके विरुद्ध वाद नहीं चलाया जाएगा?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन सद्भावपूर्वक कार्य करने वाले लोक सेवक के विरुद्ध।

धारा 74 के अनुसार लोक सेवक को किस प्रकार के कार्य के लिए परित्राण प्राप्त है?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन सद्भावपूर्वक किए गए कार्य के लिए।

धारा 74 के अनुसार सद्भावपूर्वक किए गए कार्य के लिए लोक सेवक के विरुद्ध क्या नहीं चलाया जाएगा?

कोई वाद।

धारा 75 का विषय क्या है?

वन अधिकारी व्यापार नहीं करेंगे।

(Forest Officers not to trade)

धारा 75 के अनुसार राज्य सरकार की लिखित अनुज्ञा के बिना वन अधिकारी क्या नहीं करेगा?

मालिक या अभिकर्ता के रूप में इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज का व्यापार नहीं करेगा।

धारा 75 के अनुसार वन अधिकारी किस रूप में इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज का व्यापार नहीं कर सकता?

मालिक या अभिकर्ता के रूप में।

धारा 75 के अनुसार वन अधिकारी किसकी लिखित अनुज्ञा के बिना व्यापार नहीं कर सकता?

राज्य सरकार की लिखित अनुज्ञा के बिना।

धारा 75 के अनुसार राज्य सरकार की लिखित अनुज्ञा के बिना वन अधिकारी किसमें हितबद्ध नहीं होगा या नहीं बनेगा?

किसी वन के पट्टे में या किसी वन के ठेके में।

धारा 75 के अनुसार वन के पट्टे या ठेके में हितबद्ध होने का निषेध कहाँ लागू होता है?

उन राज्यक्षेत्रों के भीतर और बाहर, जिन पर भारतीय वन अधिनियम, 1927 विस्तारित होता है।

 

अध्याय-XII
(Chapter-XII)

सहायक नियम
(Subsidiary Rules)

धारा 76 का विषय क्या है?

नियम बनाने की अतिरिक्त शक्तियां।

(Additional powers to make rules)

धारा 76 के अनुसार नियम बनाने की अतिरिक्त शक्ति किसके पास है?

राज्य सरकार के पास।

धारा 76() के अनुसार राज्य सरकार किस उद्देश्य से नियम बना सकेगी?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन किसी वन अधिकारी की शक्तियों और कर्तव्यों को विहित और सीमित करने के लिए।

धारा 76() के अनुसार राज्य सरकार किसके विनियमन के लिए नियम बना सकेगी?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन जुर्माना और अधिहरण के आगमों में से अधिकारियों और भेदियों को दिए जाने वाले पुरस्कारों के विनियमन के लिए।

धारा 76() के अनुसार राज्य सरकार किन वृक्षों और इमारती लकड़ी के संबंध में नियम बना सकेगी?

सरकार के उन वृक्षों और इमारती लकड़ी के संबंध में, जो प्राइवेट व्यक्तियों की भूमियों में उगे हुए हैं या उनके अधिभोग में हैं।

धारा 76() के अनुसार राज्य सरकार सरकार के वृक्षों और इमारती लकड़ी के संबंध में किन उद्देश्यों के लिए नियम बना सकेगी?

उनके संरक्षण, पुनरुत्पादन और व्ययन के लिए।

धारा 76() के अनुसार राज्य सरकार सामान्यतः किस उद्देश्य से नियम बना सकेगी?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 के उपबंधों को क्रियान्वित करने के लिए।

धारा 77 का विषय क्या है?

नियमों के भंग के लिए शास्तियां।

(Penalties for breach of rules)

धारा 77 के अनुसार यह धारा किन नियमों के उल्लंघन पर लागू होती है?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन ऐसे नियमों के उल्लंघन पर, जिनके लिए कोई विशेष शास्ति उपबन्धित नहीं है।

धारा 77 के अनुसार नियमों के भंग के लिए अधिकतम कारावास कितना हो सकता है?

एक मास तक का।

धारा 77 के अनुसार नियमों के भंग के लिए अधिकतम जुर्माना कितना हो सकता है?

पाँच सौ रुपए तक का।

धारा 78 का विषय क्या है?

नियमों को कब विधि का बल प्राप्त होता है।

(Rules when to have force of law)

धारा 78 के अनुसार इस अधिनियम के अधीन बनाए गए सभी नियम कौन बनाएगा?

राज्य सरकार।

धारा 78 के अनुसार राज्य सरकार द्वारा बनाए गए सभी नियम कहाँ प्रकाशित किए जाएंगे?

राजपत्र में।

धारा 78 के अनुसार राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियम कब विधि के समान प्रभावशील होंगे?

राजपत्र में प्रकाशित होने के पश्चात्, जहाँ तक वे भारतीय वन अधिनियम, 1927 से सुसंगत हों।

धारा 78 के अनुसार नियम किस सीमा तक प्रभावशील होंगे?

जहाँ तक वे भारतीय वन अधिनियम, 1927 से सुसंगत हैं।

धारा 78 के अनुसार इस अधिनियम से सुसंगत नियम किस प्रकार प्रभावशील होंगे?

मानो वे भारतीय वन अधिनियम, 1927 में अधिनियमित हुए हों।

 

अध्याय 13

(Chapter-XIII)

प्रकीर्ण

(Miscellaneous)

धारा 79 का विषय क्या है?

वन अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को सहायता देने के लिए आबद्ध व्यक्ति।

(Persons bound to assist Forest Officers and Police Officers)

धारा 79(1) के अनुसार किन व्यक्तियों पर इस धारा के अधीन सहायता देने का दायित्व है?

प्रत्येक व्यक्ति जो आरक्षित या संरक्षित वन में किसी अधिकार का प्रयोग करता है, या वन-उपज लेने, इमारती लकड़ी काटने, हटाने या ढोर चराने के लिए अनुज्ञात है, या ऐसे वन में नियोजित है, अथवा ऐसे वन से समीपस्थ ग्राम का वह व्यक्ति जो सरकार द्वारा नियोजित है या समुदाय के प्रति सेवाओं के लिए सरकार से उपलब्धियां प्राप्त करता है।

धारा 79(1) के अनुसार वन विषयक अपराध के किए जाने या किए जाने के आशय की जानकारी किसे दी जाएगी?

निकटतम वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी को।

धारा 79(1) के अनुसार वन विषयक अपराध की जानकारी कब दी जाएगी?

अनावश्यक विलम्ब के बिना।

धारा 79(1)() के अनुसार किस अग्नि को बुझाने के लिए तुरन्त कार्यवाही करना अनिवार्य है?

ऐसे वन में लगी वन अग्नि, जिसके बारे में ज्ञान या जानकारी हो।

धारा 79(1)() के अनुसार वन के सामीप्य की अग्नि के संबंध में क्या कर्तव्य है?

अपनी शक्ति के अनुसार वैध साधनों द्वारा उसे वन में फैलने से रोकने के लिए तुरन्त कार्यवाही करना।

धारा 79(1) के अनुसार क्या वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी की अपेक्षा के बिना भी कार्यवाही करनी होगी?

हाँ, चाहे उससे ऐसी अपेक्षा की गई हो या नहीं।

धारा 79(1)() के अनुसार किस कार्य में वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी की सहायता करनी होगी?

वन में वन विषयक अपराध को रोकने में।

धारा 79(1)() के अनुसार यदि यह विश्वास करने का कारण हो कि वन में वन विषयक अपराध किया गया है, तो किस कार्य में सहायता करनी होगी?

अपराधी का पता चलाने और उसे गिरफ्तार करने में।

धारा 79(2) के अनुसार विधिपूर्ण प्रतिहेतु सिद्ध करने का भार किस पर होगा?

उस व्यक्ति पर जो विधिपूर्ण प्रतिहेतु का दावा करता है।

धारा 79(2)() के अनुसार कौन-सा कृत्य दण्डनीय है?

उपधारा (1) द्वारा अपेक्षित जानकारी निकटतम वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी को अनावश्यक विलम्ब के बिना देना।

धारा 79(2)() के अनुसार कौन-सा कृत्य दण्डनीय है?

आरक्षित या संरक्षित वन में वन अग्नि को बुझाने के लिए अपेक्षित कार्यवाही करना।

धारा 79(2)() के अनुसार कौन-सा कृत्य दण्डनीय है?

वन के सामीप्य की अग्नि को उपधारा (1) के अनुसार वन में फैलने से रोकना।

धारा 79(2)() के अनुसार कौन-सा कृत्य दण्डनीय है?

वन अपराध को रोकने अथवा अपराधी का पता लगाने और उसे गिरफ्तार करने में सहायता मांगे जाने पर वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी की सहायता करना।

धारा 79(2) के अनुसार इस धारा के उल्लंघन के लिए अधिकतम कारावास कितना हो सकता है?

एक मास तक का।

धारा 79(2) के अनुसार इस धारा के उल्लंघन के लिए अधिकतम जुर्माना कितना हो सकता है?

दो सौ रुपए तक का।

धारा 80 का विषय क्या है?

उन वनों का प्रबन्ध जो सरकार और अन्य व्यक्तियों की संयुक्त सम्पत्ति है।

(Management of forests, the joint property of Government and other persons)

धारा 80(1) के अनुसार यह धारा कब लागू होती है?

जब सरकार और कोई व्यक्ति किसी वन, बंजर भूमि या उसकी पूरी उपज अथवा उसके किसी भाग में संयुक्ततः हितबद्ध हों।

धारा 80(1) के अनुसार संयुक्त हित की स्थिति में राज्य सरकार के पास कौन-कौन से विकल्प हैं?

वन, बंजर भूमि या उपज का प्रबन्ध स्वयं अपने हाथ में लेना या संयुक्त हितबद्ध व्यक्ति द्वारा उसके प्रबन्ध के लिए विनियम बनाना।

धारा 80(1)() के अनुसार राज्य सरकार क्या अपने हाथ में ले सकती है?

वन, बंजर भूमि या उपज का प्रबन्ध।

धारा 80(1)() के अनुसार राज्य सरकार प्रबन्ध अपने हाथ में लेते समय किसके लिए लेखा देती रहेगी?

संयुक्त हितबद्ध व्यक्ति को उसके हित के लिए।

धारा 80(1)() के अनुसार राज्य सरकार किसके लिए विनियम बना सकती है?

संयुक्ततः हितबद्ध व्यक्ति द्वारा वन, बंजर भूमि या उपज के प्रबन्ध के लिए।

धारा 80(1)() के अनुसार राज्य सरकार किस आधार पर विनियम बना सकती है?

जैसा वह वन, बंजर भूमि या उपज के प्रबन्ध तथा उसमें के सभी पक्षकारों के हित में आवश्यक समझे।

धारा 80(2) के अनुसार राज्य सरकार कब घोषणा कर सकती है कि अध्याय 2 और 4 के उपबन्ध लागू होंगे?

जब वह उपधारा (1)() के अधीन वन, बंजर भूमि या उपज का प्रबन्ध अपने हाथ में लेती है।

धारा 80(2) के अनुसार अध्याय 2 और 4 के उपबन्ध लागू करने की घोषणा किस माध्यम से की जाएगी?

राजपत्र में अधिसूचना द्वारा।

धारा 80(2) के अनुसार घोषणा के पश्चात् किन अध्यायों के उपबन्ध लागू होंगे?

अध्याय 2 और अध्याय 4 के उपबन्ध।

धारा 81 का विषय क्या है?

ऐसी सेवा करने में असफलता जिसके लिए सरकारी वन में की उपज के किसी अंश का उपभोग किया जाता है।

(Failure to perform service for which a share in produce of Government forest is enjoyed)

धारा 81 के अनुसार यह धारा किन व्यक्तियों पर लागू होती है?

जो सरकार की सम्पत्ति वाले वन या जिस पर सरकार का साम्पत्तिक अधिकार है ऐसे वन की उपज अथवा वन-उपज के उस भाग के अंश के हकदार हैं जिसकी सरकार हकदार है।

धारा 81 के अनुसार वन-उपज के अंश का अधिकार किस शर्त पर प्राप्त होता है?

इस शर्त पर कि संबंधित वन से सम्बन्धित सेवा सम्यक् रूप से करता रहे।

धारा 81 के अनुसार वन-उपज का अंश कब अधिहरणीय हो जाएगा?

जब राज्य सरकार के समाधानप्रद रूप में यह सिद्ध हो जाए कि संबंधित सेवा अब नहीं की जा रही है।

धारा 81 के अनुसार सेवा किए जाने का तथ्य किसके समाधानप्रद रूप में सिद्ध होना चाहिए?

राज्य सरकार के।

धारा 81 के परन्तुक के अनुसार वन-उपज के अंश का अधिहरण कब तक नहीं किया जाएगा?

जब तक राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से नियुक्त अधिकारी हकदार व्यक्ति और उसके द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य की सुनवाई कर ले।

धारा 81 के परन्तुक के अनुसार सुनवाई कौन करेगा?

राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से नियुक्त अधिकारी।

धारा 81 के परन्तुक के अनुसार सुनवाई में किसे सुना जाएगा?

अंश के हकदार व्यक्ति को।

धारा 81 के परन्तुक के अनुसार सुनवाई में किस साक्ष्य पर विचार किया जाएगा?

ऐसे साक्ष्य पर जिसे हकदार व्यक्ति सेवा के सम्यक् रूप से किए जाने के प्रमाण में प्रस्तुत करे।

धारा 82 का विषय क्या है?

सरकार को शोध्य धन की वसूली।

(Recovery of money due to Government)

धारा 82 के अनुसार सरकार को कौन-कौन से धन शोध्य हो सकते हैं?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन, वन-उपज की कीमत के कारण अथवा वन-उपज के संबंध में भारतीय वन अधिनियम, 1927 के निष्पादन में उपगत व्ययों के कारण देय धन।

धारा 82 के अनुसार यदि सरकार को शोध्य धन देय होने पर दिया जाए तो उसकी वसूली कैसे की जाएगी?

तत्समय प्रवृत्त विधि के अनुसार मानो वह भू-राजस्व की बकाया हो।

धारा 82 के अनुसार वन-उपज की कीमत के कारण सरकार को देय धन की वसूली किस प्रकार की जाएगी?

मानो वह भू-राजस्व की बकाया हो।

धारा 82 के अनुसार इस अधिनियम के निष्पादन में उपगत व्ययों के कारण सरकार को देय धन की वसूली किस प्रकार की जाएगी?

मानो वह भू-राजस्व की बकाया हो।

धारा 82 के अनुसार सरकार को शोध्य धन की वसूली किस विधि के अनुसार की जाएगी?

तत्समय प्रवृत्त विधि के अनुसार।

धारा 83 का विषय क्या है?

ऐसे धन के लिए वन-उपज पर धारणाधिकार।

(Lien of forest-produce for such money)

धारा 83(1) के अनुसार वन-उपज के लिए या उसके संबंध में देय धन की राशि क्या समझी जाएगी?

ऐसी वन-उपज पर प्रथम भार।

धारा 83(1) के अनुसार वन-उपज पर प्रथम भार कब तक रहेगा?

जब तक देय राशि चुका नहीं दी जाती।

धारा 83(1) के अनुसार देय राशि के भुगतान तक वन-उपज के संबंध में वन अधिकारी क्या कर सकता है?

वन-उपज को अपने कब्जे में ले सकता है।

धारा 83(1) के अनुसार वन-उपज को अपने कब्जे में कौन ले सकता है?

वन अधिकारी।

धारा 83(2) के अनुसार यदि शोध्य होने पर राशि का भुगतान नहीं किया जाता तो वन अधिकारी क्या कर सकता है?

वन-उपज का लोक नीलाम द्वारा विक्रय कर सकता है।

धारा 83(2) के अनुसार वन-उपज का विक्रय किस प्रकार किया जाएगा?

लोक नीलाम द्वारा।

धारा 83(2) के अनुसार विक्रय के आगमों का प्रथम उपयोग किसके लिए किया जाएगा?

देय राशि के भुगतान के लिए।

धारा 83(3) के अनुसार विक्रय के पश्चात् यदि कोई अतिशेष बचे तो उसका दावा कितनी अवधि के भीतर किया जाना चाहिए?

विक्रय की तारीख से दो मास के भीतर।

धारा 83(3) के अनुसार यदि अतिशेष का दावा दो मास के भीतर नहीं किया जाता तो उसका क्या होगा?

वह सरकार को समपहृत हो जाएगा।

धारा 84 का विषय क्या है?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 के अधीन अपेक्षित भूमि की बाबत यह समझा जाना कि उसकी आवश्यकता भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 के अधीन लोक प्रयोजन के लिए है।

(Land required under this Act to be deemed to be needed for a public purpose under the Land Acquisition Act, 1894)

धारा 84 के अनुसार यह धारा कब लागू होती है?

जब राज्य सरकार को प्रतीत हो कि भारतीय वन अधिनियम, 1927 के प्रयोजनों में से किसी प्रयोजन के लिए कोई भूमि अपेक्षित है।

धारा 84 के अनुसार भूमि की आवश्यकता का निर्णय किसके प्रतीत होने पर आधारित है?

राज्य सरकार के।

धारा 84 के अनुसार अपेक्षित भूमि के बारे में क्या समझा जाएगा?

उसकी आवश्यकता भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 4 के अर्थ में लोक प्रयोजन के लिए है।

धारा 84 के अनुसार भूमि किस अधिनियम की धारा 4 के अर्थ में लोक प्रयोजन के लिए आवश्यक मानी जाएगी?

भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 की धारा 4 के अर्थ में।

धारा 84 के अनुसार भूमि किस प्रयोजन के लिए अपेक्षित होनी चाहिए?

भारतीय वन अधिनियम, 1927 के प्रयोजनों में से किसी प्रयोजन के लिए।

धारा 85 का विषय क्या है?

बन्धपत्र के अधीन शोध्य शास्तियों की वसूली।

(Recovery of penalties due under bond)

धारा 85 के अनुसार यह धारा कब लागू होती है?

जब कोई व्यक्ति भारतीय वन अधिनियम, 1927 के किसी उपबंध के अनुसार या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुपालन में किसी बन्धपत्र या लिखत द्वारा अपने को आबद्ध करता है।

धारा 85 के अनुसार कोई व्यक्ति बन्धपत्र या लिखत द्वारा किसके पालन के लिए अपने को आबद्ध कर सकता है?

किसी कर्तव्य या कार्य के पालन के लिए।

धारा 85 के अनुसार कोई व्यक्ति बन्धपत्र या लिखत द्वारा किस बात की प्रसंविदा कर सकता है?

वह या वह तथा उसके सेवक और अभिकर्तागण किसी कार्य से प्रविरत रहेंगे।

धारा 85 के अनुसार यह धारा किस अधिनियम की धारा 74 में किसी बात के होते हुए भी लागू होती है?

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 74 में किसी बात के होते हुए भी।

धारा 85 के अनुसार बन्धपत्र या लिखत में वर्णित राशि कब वसूल की जा सकती है?

उसकी शर्तों के भंग होने की दशा में।

धारा 85 के अनुसार शर्तों के भंग होने पर कितनी राशि वसूल की जा सकती है?

बन्धपत्र या लिखत में वर्णित सम्पूर्ण राशि।

धारा 85 के अनुसार बन्धपत्र या लिखत में वर्णित राशि किस प्रकार वसूल की जाएगी?

मानो वह राशि भू-राजस्व की बकाया हो।

धारा 85() का विषय क्या है?

केन्द्रीय सरकार के अधिकारों के लिए व्यावृत्ति।

(Saving for rights of Central Government)

धारा 85() के अनुसार इस अधिनियम की कोई बात राज्य सरकार को किस प्रकार की सम्पत्ति के संबंध में आदेश देने या कार्य करने के लिए प्राधिकृत नहीं करेगी?

ऐसी सम्पत्ति के संबंध में जो उस राज्य में निहित नहीं हुई है।

धारा 85() के अनुसार राज्य सरकार बिना सम्पृक्त सरकार की सम्मति के किनके अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डाल सकती?

केन्द्रीय सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार के अधिकारों पर।

धारा 85() के अनुसार केन्द्रीय सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए क्या आवश्यक है?

सम्पृक्त सरकार की सम्मति।

धारा 85() के अनुसार इस अधिनियम की कोई बात राज्य सरकार को किस कार्य के लिए प्राधिकृत नहीं करेगी?

सम्पृक्त सरकार की सम्मति के बिना केन्द्रीय सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार के अधिकारों पर अन्यथा प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए।

धारा 86 किस प्रावधान द्वारा निरसित की गई है?

निरसन और संशोधन अधिनियम, 1948 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा।

 

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