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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 (THE PROVINCIAL SMALL CAUSE COURTS ACT, 1887) |
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(1887 का अधिनियम संख्यांक 9) (ACT NO. 9 OF 1887) |
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इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम क्या है? |
प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 (The Provincial Small Cause Courts Act, 1887) |
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इस अधिनियम का अधिनियम संख्यांक क्या है? |
1887 का अधिनियम संख्यांक 9 (Act No. 9 Of 1887) |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की प्रस्तावना का विषय क्या है? |
प्रेसिडेंसी नगरों के बाहर स्थापित लघुवाद न्यायालयों के संबंध में विधि का समेकन और संशोधन। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 का अधिनियम संख्यांक क्या है? |
1887 का अधिनियम संख्यांक 9। |
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इस अधिनियम को कब पारित किया गया? |
24 फरवरी, 1887। |
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यह अधिनियम किन न्यायालयों से संबंधित है? |
प्रेसिडेंसी नगरों के बाहर स्थापित लघुवाद न्यायालयों से। |
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प्रस्तावना के अनुसार यह अधिनियम किस उद्देश्य से बनाया गया है? |
लघुवाद न्यायालयों के संबंध में विधि को समेकित और संशोधित करने के लिए। |
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यह अधिनियम किन उच्च न्यायालयों की स्थानीय सीमाओं के बाहर लागू होता है? |
बंगाल में फोर्ट विलियम तथा मद्रास और मुंबई के उच्च न्यायालयों की मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के बाहर। |
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अध्याय-1 (CHAPTER-I) |
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प्रारम्भिक (PRELIMINARY) |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 1 का विषय क्या है? |
नाम, विस्तार और प्रारम्भ (Title, extent and commencement) |
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इस अधिनियम का विस्तार कहाँ तक है? |
उन राज्यक्षेत्रों के सिवाय संपूर्ण भारत पर, जो 1 नवम्बर, 1956 से ठीक पहले भाग ख राज्यों में समाविष्ट थे। |
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यह अधिनियम किन क्षेत्रों पर लागू नहीं होता? |
वे राज्यक्षेत्र जो 1 नवम्बर, 1956 से ठीक पहले भाग ख राज्यों में समाविष्ट थे। |
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इस अधिनियम के प्रवृत्त होने की तिथि क्या है? |
सन् 1887 की जुलाई के प्रथम दिन। |
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धारा 2 को आंशिक रूप से किस अधिनियम द्वारा निरसित किया गया? |
संशोधन अधिनियम, 1891 (1891 का 12) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 3 का विषय क्या है? |
व्यावृत्तियां (Savings) |
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धारा 3 के अनुसार इस अधिनियम की व्याख्या किस प्रकार नहीं की जाएगी? |
इस प्रकार नहीं कि वह निर्दिष्ट मामलों को प्रभावित करे। |
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क्या यह अधिनियम प्रारम्भ से पूर्व संस्थित वादों की कार्यवाही को प्रभावित करता है? |
नहीं। |
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धारा 3(क) के अनुसार किन कार्यवाहियों पर इस अधिनियम का प्रभाव नहीं पड़ेगा? |
इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व संस्थित किसी वाद में डिक्री के पूर्व या पश्चात् की कोई कार्यवाही। |
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धारा 3(ख) के अनुसार मजिस्ट्रेट की अधिकारिता किस संबंध में अप्रभावित रहती है? |
ऋणों या सिविल प्रकृति के अन्य दावों के संबंध में तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन। |
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मद्रास संहिता के अधीन किसकी अधिका रिता अप्रभावित रहती है? |
ग्राम पंचायत या ग्राम मुन्सिफ की। |
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दक्खन कृषक राहत अधिनियम, 1879 के अधीन किसकी अधिकारिता अप्रभावित रहती है? |
ग्राम मुन्सिफ की। |
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धारा 3(ग) के अनुसार किन विधियों पर इस अधिनियम का प्रभाव नहीं पड़ेगा? |
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1882 से भिन्न कोई स्थानीय विधि या विशेष विधि। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 4 का विषय क्या है? |
परिभाषा (Definition) |
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धारा 4 के अनुसार परिभाषाएं कब लागू होंगी? |
जब तक कि कोई बात विषय या संदर्भ में विरुद्ध न हो। |
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"लघुवाद न्यायालय" (Court of Small Causes) से क्या अभिप्रेत है? |
इस अधिनियम के अधीन गठित लघुवाद न्यायालय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसे न्यायालय में इस अधिनियम के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने वाला व्यक्ति भी है। |
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अध्याय-2 (CHAPTER-II) |
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लघुवाद न्यायालयों का गठन (CONSTITUTION OF COURTS OF SMALL CAUSES) |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 5 का विषय क्या है? |
लघुवाद न्यायालयों की स्थापना (Establishment of Courts of Small Causes) |
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लघुवाद न्यायालय स्थापित करने का अधिकार किसे है? |
राज्य सरकार को। |
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राज्य सरकार लघुवाद न्यायालय किस माध्यम से स्थापित करती है? |
लिखित आदेश द्वारा, किसी प्रेसिडेंसी नगर में स्थापित उच्च न्यायालय की तत्समय की मामूली आरम्भिक सिविल अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के बाहर उसके प्रशासन के अधीन राज्यक्षेत्रों में किसी स्थान पर लघुवाद न्यायालय स्थापित कर सकती है। |
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धारा 5(2) के अनुसार लघुवाद न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता कौन निर्धारित करता है? |
राज्य सरकार। |
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लघुवाद न्यायालय कहाँ बैठ सकता है? |
उन स्थानों पर जो राज्य सरकार द्वारा नियत किए जाएं। |
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क्या लघुवाद न्यायालय एक से अधिक स्थानों पर बैठ सकता है? |
हाँ, राज्य सरकार द्वारा नियत स्थानों पर। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 6 का विषय क्या है? |
न्यायाधीश (Judge) |
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लघुवाद न्यायालय के लिए न्यायाधीश की नियुक्ति कब की जाती है? |
जब लघुवाद न्यायालय स्थापित किया जा चुका हो। |
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न्यायाधीश की नियुक्ति किस माध्यम से की जाती है? |
लिखित आदेश द्वारा। |
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किस स्थिति में एक व्यक्ति एक से अधिक न्यायालयों का न्यायाधीश हो सकता है? |
जब राज्य सरकार इस प्रकार निर्देश दे। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 7 का विषय क्या है? |
कतिपय परिस्थितियों में बैठने का समय नियत करना (Appointment of times of sitting in certain circumstances) |
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धारा 7(1) किस पर लागू होती है? |
ऐसे न्यायाधीश पर जो दो या अधिक न्यायालयों का न्यायाधीश है। |
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न्यायाधीश पर जो दो या अधिक न्यायालयों का न्यायाधीश है, बैठने का समय किसकी मंजूरी से नियत करेगा? |
जिला न्यायालय की मंजूरी से। |
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न्यायाधीश किन न्यायालयों में बैठने का समय नियत करेगा? |
उन सभी न्यायालयों में जिनका वह न्यायाधीश है। |
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धारा 7(2) के अनुसार समय की सूचना कैसे प्रकाशित की जाएगी? |
ऐसी रीति में जो उच्च न्यायालय समय-समय पर निदेशित करे। |
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समय की सूचना प्रकाशित करने का निर्देश कौन देता है? |
उच्च न्यायालय। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 8 का विषय क्या है? |
अपर न्यायाधीश (Additional Judges) |
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अपर न्यायाधीश की नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है? |
राज्य सरकार द्वारा। |
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अपर न्यायाधीश की नियुक्ति किस माध्यम से की जाती है? |
लिखित आदेश द्वारा। |
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अपर न्यायाधीश किन न्यायालयों के लिए नियुक्त किए जा सकते हैं? |
लघुवाद न्यायालयों के या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों के लिए। |
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अपर न्यायाधीश किन कृत्यों का निर्वहन करेगा? |
वे कृत्य जो न्यायाधीश उसे समनुदेशित करे। |
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अपर न्यायाधीश कृत्यों का निर्वहन करते समय किन शक्तियों का प्रयोग करेगा? |
न्यायाधीश की ही शक्तियों का। |
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धारा 8(3) के अनुसार लंबित कार्य को वापस लेने का अधिकार किसे है? |
न्यायाधीश को। |
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न्यायाधीश की अनुपस्थिति में कौन उसके कृत्यों का निर्वहन कर सकता है? |
ज्येष्ठ अपर न्यायाधीश। |
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न्यायाधीश की अनुपस्थिति में अपर न्यायाधीश किन कृत्यों का निर्वहन कर सकता है? |
न्यायाधीश के सभी या किन्हीं कृत्यों का। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 9 का विषय क्या है? |
न्यायाधीशों का निलंबन और हटाया जाना (Suspension and removal of Judges) |
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धारा 9 को किसके द्वारा निरसित किया गया? |
भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 10 का विषय क्या है? |
दो न्यायाधीशों से पीठ के रूप में बैठने की अपेक्षा करने की शक्ति (Power to require two Judges to sit as a bench.) |
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दो न्यायाधीशों की पीठ के रूप में बैठने का निर्देश देने की शक्ति किसके पास है? |
राज्य सरकार के पास। |
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राज्य सरकार यह निर्देश किसके परामर्श से देती है? |
उच्च न्यायालय के परामर्श से। |
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यह निर्देश किस माध्यम से दिया जाता है? |
लिखित आदेश द्वारा। |
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किन व्यक्तियों को एक साथ बैठने का निर्देश दिया जा सकता है? |
दो न्यायाधीश या एक न्यायाधीश और एक अपर न्यायाधीश। |
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दो न्यायाधीशों की पीठ किन मामलों के लिए बैठ सकती है? |
वादों के ऐसे वर्ग या वर्गों के विचारण के लिए। |
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किन आवेदनों के लिए पीठ बैठ सकती है? |
लघुवाद न्यायालय द्वारा संज्ञेय ऐसे आवेदनों के लिए जिनका आदेश में वर्णन किया जाए। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 11 का विषय क्या है? |
पीठ द्वारा सुने गए मामले में विनिश्चय (Decision in case heard by a bench) |
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धारा 11(1) किन स्थितियों पर लागू होती है? |
जब दो न्यायाधीश या एक न्यायाधीश और एक अपर न्यायाधीश किसी विधिक प्रश्न, विधि का बल रखने वाली प्रथा या दस्तावेज के अर्थान्वयन पर मतभेद रखते हैं। |
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मतभेद की स्थिति में न्यायाधीश क्या करेंगे? |
मामले के तथ्यों का कथन और मतभेद का बिंदु लेखबद्ध करेंगे। |
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मतभेद की स्थिति में मामला किसके पास भेजा जाएगा? |
उच्च न्यायालय के विनिश्चय के लिए निदेश करेंगे | |
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उच्च न्यायालय के विनिश्चय के लिए निदेश करेंगे ऐसे निर्देश पर कौन-से प्रावधान लागू होंगे? |
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1882 के अध्याय 46 के उपबंध। |
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धारा 11(2) के अनुसार धारा 11 (1) में विनिर्दिष्ट मामलों से भिन्न मामलों पर। मामलों में मतभेद होने पर किसकी राय अभिभावी होगी? |
लघुवाद न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति की तारीख से जो ज्येष्ठ है उसकी राय। |
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यदि एक सदस्य अपर न्यायाधीश हो तो किसकी राय अभिभावी होगी? |
उसके साथ बैठने वाले न्यायाधीश की राय। |
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धारा 11(3) के अनुसार ज्येष्ठता का निर्धारण कैसे होगा? |
स्थायी न्यायाधीश को स्थानापन्न न्यायाधीश से ज्येष्ठ माना जाएगा। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 12 का विषय क्या है? |
रजिस्ट्रार (Registrar) |
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धारा 12(1) के अनुसार रजिस्ट्रार की नियुक्ति का प्रावधान क्या है? |
लघुवाद न्यायालय में रजिस्ट्रार नियुक्त किया जा सकता है। |
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रजिस्ट्रार नियुक्त होने पर उसकी स्थिति क्या होगी? |
वह न्यायालय का मुख्य अनुसचिवीय अधिकारी होगा। |
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धारा 12(3) के अनुसार रजिस्ट्रार को अधिकारिता कौन प्रदान करता है? |
राज्य सरकार, लिखित आदेश द्वारा। । |
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रजिस्ट्रार को किस प्रकार के वादों के विचारण की अधिकारिता दी जा सकती है? |
बीस रुपए से अनधिक मूल्य के वादों की। |
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रजिस्ट्रार की अधिकारिता किन सीमाओं के भीतर होती है? |
न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अंदर। |
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धारा 12(4) के अनुसार रजिस्ट्रार किन वादों का विचारण कर सकता है? |
वे वाद जो न्यायाधीश साधारण या विशेष आदेश द्वारा निदेश करे। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 13 का विषय क्या है? |
अन्य अनुसचिवीय अधिकारी (Other ministerial officers) |
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धारा 13 को किसके द्वारा निरसित किया गया? |
भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 14 का विषय क्या है? |
अनुसचिवीय अधिकारियों के कर्तव्य (Duties of ministerial officers) |
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अनुसचिवीय अधिकारी किन कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे? |
इस अधिनियम या अन्य अधिनियमिति में अधिरोपित कर्तव्यों के अतिरिक्त, न्यायाधीश द्वारा निदेशित अनुसचिवीय कर्तव्यों का। |
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अनुसचिवीय अधिकारियों पर शक्तियां और कर्तव्य कौन अधिरोपित कर सकता है? |
उच्च न्यायालय। |
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उच्च न्यायालय किस उद्देश्य से नियम बनाता है? |
अनुसचिवीय अधिकारियों पर शक्तियां और कर्तव्य प्रदान व अधिरोपित करने तथा उनके प्रयोग और पालन को विनियमित करने के लिए। |
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अनुसचिवीय अधिकारियों के कर्तव्यों के पालन का ढंग कौन विनियमित करता है? |
उच्च न्यायालय। |
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अध्याय-3 (CHAPTER-III) |
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लघुवाद न्यायालयों की अधिकारिता (JURISDICTION OF COURTS OF SMALL CAUSES) |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 15 का विषय क्या है? |
लघुवाद न्यायालयों द्वारा वादों का संज्ञान (Cognizance of suits by Courts of Small Causes) |
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धारा 15(1) के अनुसार लघुवाद न्यायालय किन वादों का संज्ञान नहीं करेगा? |
द्वितीय अनुसूची में अपवादित वादों का। |
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धारा 15(2) किन शर्तों के अधीन लागू होती है? |
द्वितीय अनुसूची के अपवादों और तत्समय प्रवृत्त अधिनियमिति के उपबंधों के अधीन। |
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धारा 15(1) के अनुसार लघुवाद न्यायालय किन वादों का संज्ञान करेगा? |
सिविल प्रकृति के सभी वाद जिनका मूल्य पांच सौ रुपए से अधिक नहीं है। |
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क्या सभी सिविल वाद लघुवाद न्यायालय द्वारा संज्ञेय हैं? |
नहीं, केवल वे जिनका मूल्य निर्धारित सीमा के भीतर है। |
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धारा 15(3) के अनुसार राज्य सरकार को क्या शक्ति प्राप्त है? |
राज्य सरकार, लिखित आदेश द्वारा, यह निदेश दे सकती है कि सिविल प्रकृति के सभी वाद जिनका मूल्य एक हजार रुपए से अधिक नहीं है आदेश में उल्लिखित लघुवाद न्यायालय द्वारा संज्ञेय होंगे ।
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राज्य सरकार अधिकतम कितनी मूल्य सीमा तक वादों को संज्ञेय बना सकती है? |
एक हजार रुपए तक। |
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धारा 15(3) के अनुसार किन न्यायालयों को यह लागू किया जा सकता है? |
आदेश में उल्लिखित लघुवाद न्यायालयों को। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 16 का विषय क्या है? |
लघुवाद न्यायालयों की अनन्य अधिकारिता (Exclusive jurisdiction of Courts of Small Causes) |
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धारा 16 के अनुसार अनन्य अधिकारिता का सामान्य नियम क्या है? |
लघुवाद न्यायालय द्वारा संज्ञेय वाद अन्य न्यायालय द्वारा विचारित नहीं किया जाएगा। जब वे लघुवाद न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता की सीमा के भीतर हों। |
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धारा 16 के अनुसार किस न्यायालय को प्राथमिक अधिकार है? |
उस लघुवाद न्यायालय को जिसके द्वारा वाद विचारणीय है। |
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अध्याय-4 (CHAPTER-IV) |
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पद्धति और प्रक्रिया (PRACTICE AND PROCEDURE) |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 17 का विषय क्या है? |
सिविल प्रक्रिया संहिता का लागू होना (Application of the Code of Civil Procedure) |
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धारा 17(1) के अनुसार लघुवाद न्यायालय में कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाएगी? |
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में विहित प्रक्रिया। |
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धारा 17(1) के अनुसार अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया होगी-
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लघुवाद न्यायालय द्वारा संज्ञेय सभी वादों और उनसे उद्भूत कार्यवाहियों में। |
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धारा 17 के परंतुक के अनुसार आवेदक को क्या करना होगा? |
आवेदक एकपक्षीय पारित की गई डिक्री को अपास्त करने के आदेश के लिए या निर्णय के पुनर्विलोकन के लिए अपना आवेदन प्रस्तुत करने के समय, या तो डिक्री के अधीन अथवा निर्णय के अनुसरण में उससे शोध्य रकम न्यायालय में जमा करेगा, या 6 [ डिक्री के पालन के लिए या निर्णय के अनुपालन के लिए ऐसी प्रतिभूति देगा जो न्यायालय ने, उसके द्वारा इस निमित्त दिए गए पूर्ववर्ती आवेदन पर, निर्दिष्ट की हो।।
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धारा 17(2) किन परिस्थितियों पर लागू होती है? |
जब कोई व्यक्ति उपधारा (1) के परंतुक के अधीन प्रतिभूति के रूप में दायी हो जाता है। |
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धारा 17 (2) के अनुसार प्रतिभूति का आपन किस प्रकार किया जाएगा? |
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 145 द्वारा उपबंधित रीति में |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 18 का विषय क्या है? |
रजिस्ट्रार द्वारा वादों का विचारण (Trial of suits by Registrar) |
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धारा 18(1) किन उपबंधों के अधीन है? |
धारा 12 की उपधारा (3) और (4) के अधीन। |
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धारा 18(1) के अंतर्गत रजिस्ट्रार किन वादों का विचारण करेगा? |
रजिस्ट्रार द्वारा संज्ञेय वादों का। |
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धारा 18(1) के अंतर्गत रजिस्ट्रार द्वारा पारित डिक्रियों का निष्पादन कैसे किया जाएगा? |
उसी रीति में जैसे न्यायाधीश डिक्रियों का निष्पादन करता है। |
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धारा 18(1) के अंतर्गत क्या रजिस्ट्रार न्यायाधीश के समान कार्य करता है? |
हाँ, वादों के विचारण और डिक्रियों के निष्पादन में। |
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धारा 18(2) के अनुसार न्यायाधीश को क्या शक्ति है? |
रजिस्ट्रार की फाइल पर लंबित वाद या कार्यवाही को अंतरित करने की। |
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धारा 18(2) के अंतर्गत न्यायाधीश वादों को कहाँ अंतरित कर सकता है? |
अपनी फाइल पर या अपर न्यायाधीश की फाइल पर। |
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धारा 18(2) के अंतर्गत अपर न्यायाधीश की फाइल पर वाद कब अंतरित किए जा सकते हैं? |
जब अपर न्यायाधीश नियुक्त किया गया हो। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 19 का विषय क्या है? |
रजिस्ट्रार का वादपत्रों को ग्रहण करना, वापस करना और नामंजूर करना (Admission, return and rejection of plaints by Registrar) |
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धारा 19(1) किन परिस्थितियों में लागू होती है? |
जब न्यायाधीश अनुपस्थित हो और अपर न्यायाधीश नियुक्त न हो या नियुक्त होकर भी अनुपस्थित हो। |
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जब न्यायाधीश अनुपस्थित हो और अपर न्यायाधीश नियुक्त न हो या नियुक्त होकर भी अनुपस्थित हो, ऐसी स्थिति में रजिस्ट्रार क्या कर सकता है? |
वादपत्र को ग्रहण, वापस या नामंजूर कर सकता है। |
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धारा 19(1) के अनुसार रजिस्ट्रार किन आधारों पर वादपत्र को वापस या नामंजूर कर सकता है? |
उन्हीं कारणों पर जिन पर न्यायाधीश कर सकता है। |
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धारा 19(2) के अनुसार न्यायाधीश को क्या शक्ति है? |
रजिस्ट्रार द्वारा ग्रहण किए गए वादपत्र को वापस या नामंजूर करने तथा वापस या नामंजूर किए गए वादपत्र को ग्रहण करने की। |
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धारा 19(2) के परंतुक के अनुसार अनुसार आवेदन कब किया जाना चाहिए? |
रजिस्ट्रार के कार्य के पश्चात् न्यायाधीश की प्रथम बैठक पर। |
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धारा 19(2) के परंतुक के अनुसार कब आवेदन स्वीकार किया जा सकता है? |
जब आवेदक पर्याप्त कारण सिद्ध कर दे कि प्रथम बैठक पर आवेदन न करने का उचित कारण था। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 20 का विषय क्या है? |
रजिस्ट्रार का संस्वीकृति पर डिक्रियां पारित करना (Passing of decrees by Registrar on confession) |
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धारा 20(1) किन परिस्थितियों में लागू होती है? |
जब सुनवाई के पूर्व प्रतिवादी या उसका प्राधिकृत अभिकर्ता उपस्थित होकर दावा स्वीकार करता है। |
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जब सुनवाई के पूर्व प्रतिवादी या उसका प्राधिकृत अभिकर्ता उपस्थित होकर दावा स्वीकार करता है, ऐसी स्थिति में रजिस्ट्रार क्या कर सकता है? |
प्रतिवादी के विरुद्ध संस्वीकृति पर डिक्री पारित कर सकता है। |
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धारा 20(1) के अनुसार रजिस्ट्रार कब डिक्री पारित कर सकता है? |
जब न्यायाधीश अनुपस्थित हो और अपर न्यायाधीश नियुक्त न हो या नियुक्त होकर भी अनुपस्थित हो। |
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धारा 20(1) के अनुसार संस्वीकृति पर पारित डिक्री का क्या प्रभाव होगा? |
वही प्रभाव जो न्यायाधीश द्वारा पारित डिक्री का होता है। |
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धारा 20(2) किन परिस्थितियों पर लागू होती है? |
जब रजिस्ट्रार द्वारा डिक्री पारित की गई हो। |
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धारा 20(2) के अनुसार जब रजिस्ट्रार द्वारा डिक्री पारित की गई हो, ऐसी स्थिति में न्यायाधीश को क्या शक्ति है? |
निर्णय के पुनर्विलोकन हेतु आवेदन मंजूर करने और वाद की पुनः सुनवाई करने की। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 21 का विषय क्या है? |
रजिस्ट्रार द्वारा डिक्रियों का निष्पादन (Execution of decrees by Registrar) |
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धारा 21(1) किन परिस्थितियों में लागू होती है? |
जब न्यायाधीश अनुपस्थित हो और अपर न्यायाधीश नियुक्त न हो या नियुक्त होकर भी अनुपस्थित हो। |
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धारा 21(1) के अनुसार ऐसी स्थिति में रजिस्ट्रार को क्या शक्ति है? |
डिक्रियों और आदेशों के निष्पादन के संबंध में आदेश देने की। |
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जब न्यायाधीश अनुपस्थित हो और अपर न्यायाधीश नियुक्त न हो या नियुक्त होकर भी अनुपस्थित हो, रजिस्ट्रार किन आदेशों के अधीन कार्य करेगा? |
न्यायाधीश या अपर न्यायाधीश द्वारा दिए गए अनुदेशों के अधीन। |
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धारा 21(1) के अनुसार रजिस्ट्रार किन डिक्रियों/आदेशों के निष्पादन के लिए आदेश दे सकता है? |
न्यायालय द्वारा दी गई या निष्पादन हेतु भेजी गई डिक्रियों और आदेशों के। |
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धारा 21(2) के अनुसार आदेश को उलटने या उपान्तरित करने की शक्ति किसके पास है? |
न्यायाधीश या अपर न्यायाधीश के पास। |
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धारा 21(2) के अनुसार पक्षकार को आवेदन कब तक करना होगा? |
आदेश या उसके निष्पादन की तारीख से 15 दिन के भीतर। |
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धारा 21(2) के अनुसार अपर न्यायाधीश कब आदेश को उलट या उपान्तरित कर सकता है? |
जब डिक्री या आदेश उसने स्वयं दिया हो और न्यायाधीश ने कार्यवाही न की हो। |
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धारा 21(3) के अनुसार 15 दिन की अवधि कैसे गणना की जाएगी? |
इंडियन लिमिटेशन एक्ट, 1877 के अनुसार मानो आवेदन पुनर्विलोकन का हो। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 22 का विषय क्या है? |
मुख्य अनुसचिवीय अधिकारी द्वारा मामलों का स्थगन (Adjournment of cases by chief ministerial office) |
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धारा 22 किन परिस्थितियों में लागू होती है? |
जब न्यायाधीश अनुपस्थित हो और अपर न्यायाधीश नियुक्त न हो या नियुक्त होकर भी अनुपस्थित हो। |
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जब न्यायाधीश अनुपस्थित हो और अपर न्यायाधीश नियुक्त न हो या नियुक्त होकर भी अनुपस्थित हो, स्थिति में कौन स्थगन की शक्ति का प्रयोग कर सकता है? |
रजिस्ट्रार या न्यायालय का अन्य मुख्य अनुसचिवीय अधिकारी। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 23 का विषय क्या है? |
हक के प्रश्नों को अन्तर्वलित करने वाले वादों में वादपत्र का वापस किया जाना (Return of plaints in suits involving questions of title) |
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धारा 23(1) किन परिस्थितियों में लागू होती है? |
जब वादी के अधिकार और लघुवाद न्यायालय में उसके द्वारा दावा किया गया अनुतोष स्थावर सम्पत्ति के हक या किसी अन्य हक के, जो ऐसा न्यायालय अन्तिमतः अवधारित नहीं कर सकता है, साबित या नासाबित किए जाने पर आधारित है| तब, न्यायालय कार्यवाहियों के किसी भी अनुक्रम पर वादपत्र को हक का अवधारण करने की अधिकारिता रखने वाले न्यायालय को प्रस्तुत करने के लिए वापस कर सकता है। |
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धारा 23(2) के अनुसार वादपत्र वापस करते समय न्यायालय क्या करेगा? |
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1882 की धारा 57 के दूसरे पैरा के उपबंधों का अनुपालन करेगा। |
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धारा 23(2) के अनुसार वादपत्र वापस करते समय खर्चे के बारे में कौन निर्णय करेगा? |
न्यायालय, जैसा वह न्यायोचित समझे। |
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धारा 23(2) के अनुसार लिमिटेशन के प्रयोजन हेतु न्यायालय की स्थिति क्या मानी जाएगी? |
अधिकारिता की त्रुटि के कारण वाद ग्रहण करने में असमर्थ। |
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धारा 23(2) के अनुसार यह असमर्थता किस अधिनियम के प्रयोजन हेतु मानी जाएगी? |
इंडियन लिमिटेशन एक्ट, 1877 के प्रयोजनों के लिए। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 24 का विषय क्या है? |
लघुवाद न्यायालयों के कतिपय आदेशों से अपील (Appeal from certain orders of Courts of Small Causes) |
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धारा 24 किन आदेशों पर लागू होती है? |
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 104(1) के खंड (चच) या खंड (ज) में विनिर्दिष्ट आदेशों पर। |
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धारा 24 के अनुसार आदेश किसके द्वारा दिए जाने चाहिए? |
लघुवाद न्यायालय द्वारा। |
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धारा 24 के अनुसार आदेशों के विरुद्ध अपील कहाँ होगी? |
जिला न्यायालय में। |
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धारा 24 के अनुसार अपील किन आधारों पर की जा सकती है? |
उन्हीं आधारों पर जिन पर धारा 104 के अधीन अपील की जा सकती है। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 25 का विषय क्या है? |
लघुवाद न्यायालयों के आदेशों और डिक्रियों का पुनरीक्षण (Revision of decrees and orders of Courts of Small Causes) |
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धारा 25 के अनुसार पुनरीक्षण की शक्ति किसके पास है? |
उच्च न्यायालय के पास। |
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धारा 25 के अनुसार उच्च न्यायालय किस उद्देश्य से मामला मंगा सकता है? |
यह समाधान करने के लिए कि डिक्री या आदेश विधि के अनुसार था। |
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धारा 25 के अनुसार पुनरीक्षण किन मामलों में किया जा सकता है? |
लघुवाद न्यायालय द्वारा विनिश्चित मामलों में। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 26 का विषय क्या है? |
सिविल प्रक्रिया संहिता की दूसरी अनुसूची का संशोधन (Amendment of the Second Schedule to the Code of Civil Procedure) |
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धारा 26 को किस अधिनियम द्वारा निरसित किया गया? |
प्रेसिडेंसी लघुवाद न्यायालय विधि संशोधन अधिनियम, 1888 (1888 का 10) की धारा 4 द्वारा। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 27 का विषय क्या है? |
डिक्रियों और आदेशों की अन्तिमता (Finality of decrees and orders |
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धारा 27 के अनुसार डिक्रियों और आदेशों की स्थिति क्या है? |
वे अन्तिम होंगे। |
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अध्याय-5 (CHAPTER-V) |
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अनुपूरक उपबन्ध (SUPPLEMENTAL PROVISIONS) |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 28 का विषय क्या है? |
लघुवाद न्यायालयों का अधीनस्थ होना (Subordination of Courts of Small Causes) |
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धारा 28(1) के अनुसार लघुवाद न्यायालय किसके अधीन होगा? |
जिला न्यायालय के प्रशासनिक नियंत्रण और उच्च न्यायालय के अधीक्षण के अधीन। |
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लघुवाद न्यायालय को कौन-से अभिलेख रखने होते हैं? |
ऐसे रजिस्टर, बहियां और लेखे जो उच्च न्यायालय समय-समय पर विहित करे। |
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रजिस्टर, बहियां और लेखे कौन विहित करता है? |
उच्च न्यायालय। |
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धारा 28(1)(ख) के अनुसार लघुवाद न्यायालय को किनकी अपेक्षाओं का पालन करना होता है? |
जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय या राज्य सरकार की अपेक्षाओं का। |
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धारा 28(2) के अनुसार जिला न्यायालय का लघुवाद न्यायालय से क्या संबंध है? |
जो जिला न्यायालय का राज्य सरकार द्वारा प्रशासित राज्यक्षेत्र के उस भाग में जिसमें लघुवाद न्यायालय स्थापित है. निम्नतम श्रेणी के पांच हजार रुपए मूल्य के आरंभिक वाद को विचारण करने में सक्षम सिविल न्यायालय के साथ है। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 29 का विषय क्या है? |
मुद्रा (Seal) |
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लघुवाद न्यायालय किस प्रकार की मुद्रा का उपयोग करेगा? |
ऐसे प्ररूप और लम्बाई-चौड़ाई की मुद्रा जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए। |
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मुद्रा का प्ररूप और आकार कौन निर्धारित करता है? |
राज्य सरकार। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 30 का विषय क्या है? |
न्यायालयों का उत्सादन (Abolition of Courts of Small Causes) |
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लघुवाद न्यायालयों को उत्सादित करने की शक्ति किसके पास है? |
राज्य सरकार के पास। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 31 का विषय क्या है? |
लघुवाद न्यायालय के न्यायाधीश को अन्य पद पर नियुक्त करने की शक्ति की व्यावृत्ति (Saving of power to appoint Judge of Court of Small Causes to other office) |
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धारा 31(1) का मुख्य आशय क्या है? |
न्यायाधीश या अपर न्यायाधीश को अन्य पद पर नियुक्त होने से निवारित नहीं किया जाएगा। |
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धारा 31(1) के अंतर्गत क्या लघुवाद न्यायालय का न्यायाधीश अन्य सिविल न्यायालय का न्यायाधीश बन सकता है? |
हाँ। |
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धारा 31(1) के अंतर्गत क्या वह किसी वर्ग का मजिस्ट्रेट नियुक्त हो सकता है? |
हाँ। |
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धारा 31(1) के अंतर्गत क्या न्यायाधीश अन्य लोक पद धारण कर सकता है? |
हाँ। |
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धारा 31(2) किन परिस्थितियों में लागू होती है? |
जब न्यायाधीश या अपर न्यायाधीश अन्य पद पर नियुक्त किया जाता है। |
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धारा 31(2) के अंतर्गत अनुसचिवीय अधिकारी किन नियमों के अधीन कार्य करेंगे? |
राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 32 का विषय क्या है? |
अधिनियम का उन न्यायालयों को लागू होना जिनमें लघुवाद न्यायालय की अधिकारिता विनिहित की गई है (Application of Act to Courts invested with jurisdiction of Court of Small Causes) |
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धारा 32(1) किन अध्यायों से संबंधित प्रावधानों को लागू करती है? |
अध्याय 3 और 4 के निर्दिष्ट भागों को। |
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धारा 32(1) के अनुसार अध्याय 3 और 4 का कितना भाग तत्समय प्रवृत्त किसी अधिनियमिति द्वारा या उसके अधीन लघुवाद न्यायालय की अधिकारिता से विनिहित न्यायालयों को उन न्यायालयों द्वारा उस अधिकारिता के प्रयोग के बारे में लागू होता है? |
अध्याय 3 और 4 का उतना भाग जो- लघुवाद न्यायालयों द्वारा संज्ञेय वादों की प्रकृतिः उन वादों में अन्य न्यायालयों की अधिकारिता का अपवर्जनः लघुवाद न्यायालयों की पद्धति और प्रक्रियाः उन न्यायालयों के कतिपय आदेशों से अपील और उनके द्वारा विनिश्चित मामले का पुनरीक्षण, और इस अधिनियम द्वारा यथा उपबन्धित अपील और पुनरीक्षण के अधीन रहते हुए उनकी डिक्रियों और आदेशोंकी अन्तिमता, से संबंधित है| |
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धारा 32(2) किन मामलों पर लागू नहीं होती? |
उन वादों या कार्यवाहियों पर जो अधिकारिता विनिहित होने की तिथि से पूर्व संस्थित या प्रारंभ किए गए हों। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 33 का विषय क्या है? |
इस अधिनियम और संहिता का विनिहित न्यायालय को दो न्यायालयों के रूप में लागू होना (Application of Act to Courts invested with jurisdiction of Court of Small Causes) |
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धारा 33 के अनुसार किस स्थिति में एक ही न्यायालय को दो भिन्न न्यायालयों के रूप में माना जाएगा? |
लघुवाद न्यायालय की अधिकारिता के प्रयोग और अन्य सिविल वादों की अधिकारिता के प्रयोग में। |
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धारा 33 के अनुसार प्रावधान किन प्रयोजनों के लिए लागू होता है? |
इस अधिनियम और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1882 के प्रयोजनों के लिए। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 34 का विषय क्या है? |
इस प्रकार लागू की गई संहिता का उपान्तरण (Modification of Code as so applied) |
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धारा 34 किन धाराओं के होते हुए भी लागू होती है? |
अन्तिम दो पूर्वगामी (धारा 32, 33) धाराओं के होते हुए भी। |
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धारा 34(क) किस स्थिति से संबंधित है? |
जब न्यायालय लघुवाद न्यायालय की अधिकारिता में डिक्री स्वयं को अन्य सिविल अधिकारिता वाले न्यायालय के रूप में निष्पादन हेतु भेजता है। |
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धारा 34(ख) किस स्थिति से संबंधित है? |
जब न्यायालय अपनी अन्य सिविल अधिकारिता में डिक्री स्वयं को लघुवाद न्यायालय की अधिकारिता में निष्पादन हेतु भेजता है। |
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धारा 34 के अनुसार कौन-से दस्तावेज नहीं भेजे जाएंगे? |
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1882 की धारा 224 में उल्लिखित दस्तावेज। |
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धारा 34 के अनुसार किन परिस्थितियों में दस्तावेज भेजे जाएंगे? |
जब न्यायालय लिखित आदेश द्वारा उन्हें भेजने की अपेक्षा करे। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 35 का विषय क्या है? |
उत्सादित न्यायालयों की कार्यवाहियों का चालू रहना (Continuance of proceedings of abolished Courts) |
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धारा 35(1) किन परिस्थितियों में लागू होती है? |
जब लघुवाद न्यायालय या विनिहित अधिकारिता वाला न्यायालय किसी कारण से अधिकारिता खो देता है। |
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धारा 35(1) की स्थिति में कार्यवाहियां कहाँ चलेंगी? |
उस न्यायालय में जिसे वाद विचारण की अधिकारिता होती। |
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क्या धारा 35(1) का प्रावधान डिक्री से पूर्व और पश्चात् दोनों पर लागू होता है? |
हाँ। |
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धारा 35(1) में किस आधार पर नया न्यायालय निर्धारित किया जाएगा? |
जिस न्यायालय को वाद विचारण की अधिकारिता होती यदि वाद संस्थित किया जाता। |
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धारा 35(2) किन मामलों को अपवर्जित करती है? |
वे मामले जिनके लिए विशेष उपबंध किए गए हैं। |
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धारा 35(2) के विशेष उपबंध किन अधिनियमों में हो सकते हैं? |
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1882 या अन्य तत्समय प्रवृत्त अधिनियमिति में। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 36 का विषय क्या है? |
भारतीय परिसीमा अधिनियम का संशोधन (Amendment of Indian Limitation Act) |
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धारा 36 को किसके द्वारा निरसित किया गया? |
भारतीय परिसीमा अधिनियम, 1908 (1908 का 9) द्वारा। |
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प्रान्तीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 37 का विषय क्या है? |
कतिपय आदेशों का प्रकाशन (Publication of certain orders) |
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धारा 37 के अनुसार किन आदेशों का प्रकाशन आवश्यक है? |
इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा लिखित रूप में किए गए सभी आदेशों का। |
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धारा 37 के अनुसार आदेश कहाँ प्रकाशित किए जाएंगे? |
राजपत्र में। |
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