पैरा 65 से 72 अध्याय 6 UP पुलिस रेगुलेशन

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 6

सशस्त्र पुलिस

65. सशस्त्र पुलिस, कोषालयों, तहसीलों और हवालातों के संरक्षण के लिये, कोष, बंदियों और सरकारी सम्पत्तियों के मार्गरक्षण के लिये बारूद खाने और सैनिक आवास की गारद (क्वार्टर गार्ड) पर सेवाओं अशान्ति और बल प्रयोग के अपराधों के दमन और निवारण के लिये और खतरनाक अपराधियों का पीछा करने और पकड़ने के लिये आशयित होती है। बल की यह विशेष शाखा, उपमहानिरीक्षक के प्रभार में रहती है, जो इस बात के लिये उत्तरदायी है कि अधीक्षक अनुशासन और दक्षता बनाये रखते हैं।

66. सशस्त्र पुलिस के उपनिरीक्षक महत्वपूर्ण गारदों और मार्ग रक्षकों पर कमान्ड करेगा, पुलिस लाइन में अनुशासन और व्यवस्था बनाये रखेगा, व्यायाम, बन्दूक चलाने और गारदों के कर्त्तव्यों के अनुदेश देगा, गारदों और सन्तरियों का दिन और रात में परिदर्शन करेगा, लाइन के सिपाहियों की नामावली पुकारेगा और रिजर्व निरीक्षक के आदेश के अधीन सामान्यतया कार्य करेगा।

67. सशस्त्र पुलिस के प्रधान कान्सटेबिल गारद और मार्ग रक्षकों को कमान्ड करने, व्यायाम में अनुदेश देने और ऐसे कर्तव्यों के जो सेना के बिना कमीशन प्राप्त अधिकारियों के जुम्मे आ जाती है, का मालन करने के लिये नियोजित किये जाते हैं। जब चौकियों के भारसाधक हों, वे पैरा 58 में दिये गये अनुदेशों का अनुसरण करेंगे।

68. मजिस्ट्रेट जिसे किसी बलवे के या दंगे के मामले में निर्देश देने का अवसर प्राप्त हो, अपने आदेश को कमान्ड करने वाले पुलिस अधिकारी के माध्यम से संसूचित करना चाहिये।

69. (1) महत्वपूर्ण जुलूसों और धार्मिक उत्सवों के अवसर पर जब मुख्यालय पर सशस्त्र पुलिस की प्रतिनियुक्ति की जावे, पुलिस अधीक्षक पुलिस व्यवस्था के लिये उत्तरदायी होगा और कोई राजपत्रित अधिकारी या निरीक्षक जब सम्भव हो सके, नियोजित सशस्त्र पुलिस के कमान्ड में रहेगा जब तक कि तत्प्रतिकूल कोई अच्छे कारण न हों। ग्रामीण क्षेत्र में भी, राजपत्रित अधिकारी या निरीक्षक का ही प्रभार रहना चाहिये जब किसी कष्ट की आशंका करने के लिये कारण हों।

अधीक्षक का सदैव ही यह कर्तव्य है कि वह यह समाधान कर ले कि वे अधिकारी जो सशस्त्र पुलिस पर नियन्त्रण या उस पर कमान्ड करेंगे, पर्याप्त उत्तरदायी और सक्षम है।

(2) आग्नेय आयुधों से सुसज्जित पुलिस को साधारणतया जुलूसों और अन्य उत्सवो  के अवसर पर, सिवाय किसी विक्षोम से निपटने के, रिजर्व बल का उपयोग नहीं किया जाना चाहियौ यह स्थिति जो ऐसी रिजर्व पुलिस को लेना चाहिये, विशेष परिस्थितियों और नीचे गये अनुदेशों से शासित होगी।

(3) सशस्त्र पुलिस के दलों को कभी जुलूसों का मार्गरक्षण नहीं करना चाहिये। उन्हें ऐसे बिन्दु पर रहना चाहिये जहाँ किसी विक्षोम का खतरा हो या उन्हें जुलूस के सामने या पिछले भाग में चलते-फिरते प्रवेशरोधी के रूप में रहना चाहिये जहाँ वे भीड़ के द्वारा किसी श्रम में डाले जाने की न्यूनतम स्थिति में हों, और कमान्ड में रहने वाले अधिकारी या उनके अवर अधिकारियों के नियन्त्रण में रखे जा सकें। जहाँ तक सम्भव हो सके, समस्त दुकड़ी हिन्दू और मुस्लिम दोनों के सामान्य अनुपात से मिलकर बनाई जानी चाहिये और सिपाहियों में अवर अधिकारियों का अनुपात जहाँ तक सम्भव हो अधिक होना चाहिये। ऐसे अवसरों पर गोला-बारूद के रूप में केवल गोलियां ही बाँटी जानी चाहिये।

(4) ऐसे सभी अवसरों पर जब दोनों अर्थात् सशस्त्र और सिविल प्रतिनियुक्त की जायें, यह पुलिस अधीक्षक का कत्र्तव्य होगा कि वह उन कर्तव्यों का समानुदेशन करे जिन्हें अधिकारियों और सिपाहियों को पालन करना होगा। पुलिस को प्रत्येक टुकड़ी को ठीक-ठीक स्थिति और उनके द्वारा पालनीय कर्तष्यों को दशति हुये स्पष्ट सामान्य और विशेष आदेश लिखे और संसूचित किया जाना चाहिये। ऐसे आदेश उन सभी अवसरों के लिए, अब पुलिस नियोजित की जावे और भारी मार्ग दर्शन के लिये अभिलेख में रखे जावें। जब किसी कारण से पुलिस पहली बार प्रतिनियुक्त किया जाना. आवश्यक पाया जावे, या साधारणतया नियोजित शक्ति को बढ़ाया जावे, यह आदेशात्मक है कि इन निर्देशों पर विशेष आदेश तैयार और जारी किया जावें।

70. भीड़ के विरुद्ध पुलिस बल द्वारा बल का प्रयोग किये जाने के बारे में अनुदेश निम्नानुसार

खण्ड -विधिक प्राधिकर

पुलिस के द्वारा बल के उपयोग को विनियमित करने के उपबन्ध दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय पांच (विशेषकर धारा 46 व 49) तथा अध्याय दस की धारा 129 उपधारा (1) व (2) में अन्तर्विष्ट "हैं। ये विधिक उपबन्ध किसी विधि विरुद्ध जमाव को बिखेरने के लिये और पाँच या अधिक व्यक्तियों के ऐसे जमाव पर भी, जो चाहे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 141 के आशय के लिये विधि विरुद्ध जमाव न हो, किन्तु ऐसा हो कि जो लोक प्रशान्ति के भंग की संभाव्य बनाता हो, लागू होंगे।

थाना का कोई भारसाधक अधिकारी या उससे अधिक ऊँची पंक्ति का कोई अधिकारी, मजिस्ट्रेट के प्राधिकार से स्वाधीन यह शक्ति रखता है कि वह ऊपर विनिर्दिष्ट किए गए जमाव से बिखर जाने को कहे और उसे बिखरने के लिए बल को उपयोग करे। (देखिये धारा 129 उपधारा (1) दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973) टिप्पणी- इस पैरा के खण्ड 'ख', 'ग' तथा 'घ' में, 'मजिस्ट्रेट' से अभिप्रेत

(क) यदि कोई राजपत्रित अधिकारी उपस्थिति हो, "प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट"।

(ख) यदि कोई राजपत्रित पुलिस अधिकारी उपस्थित न हो।

"मानसेवी या विशेष मजिस्ट्रेट को छोड़कर कोई अन्य मजिस्ट्रेट"।

खण्ड -कार्यवाही जब मजिस्ट्रेट की उपस्थिति उपलब्ध की जा सकती/ की जा सकती हो

जब कोई मजिस्ट्रेट उपस्थित हो या उसे संसूचना ऐसे विलम्ब के बिना जिसका स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, दी जा सकती हो बिना ऐसे मजिस्ट्रेट की आज्ञा के, जमाव के लिए न तो विखरने के लिए कहा जायेगा और न उसे बिखरने के लिये बल का उपयोग किया जायेगा। यदि मजिस्ट्रेट की हाजिरी स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उपलब्ध न की जा सकती हो, थाने के भारसाधक अधिकारी को या उससे अधिक ऊँची शक्ति धारण करने वाला उपस्थित ज्येष्ठ अधिकारी अपने दायित्व पर कार्य करेगा, यथासम्भव शीघ्र अपने कार्य की रिपोर्ट निकटतम मजिस्ट्रेट और अधीक्षक कौ देना।

खण्ड -बल के उपयोग को शासित करने वाले मुख्य सिद्धान्त

किसी भी प्रकार के बल का उपयोग करने के मुख्य सिद्धान्त हैं-

(1)   यदि मजिस्ट्रेट उपस्थित हो तो ज्येष्ठ अधिकारी को पूरे सहयोग से कार्य करना चाहिये।

(2) इसके पूर्व कि उसे बिखर जाने का आदेश दिया जावे, जमाव की चेतावनी और प्रबोधन द्वारा बिखरने के प्रत्येक प्रयत्न किये जावें।

(3) एक बार जबकि बिखर जाने के आदेश की उपेक्षा कर दी जावे या आदेश के दिये जाने के बाद भी जमाव की प्रवृति उद्धत बनी रहे, वल का उपयोग किया जायेंगा।

(4) यदि कोई मजिस्ट्रेट उपस्थित हो, बल उपयोग करने का दायित्व उस पर रहेगा और यह उसके लिए होगा कि वह ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी को बल उपयोग करने के लिये निर्देशित करे। यदि कोई मजिस्ट्रेट उपस्थित न हो तो उत्तरदायित्त्व ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी पर रहेगा।

(5) यदि मजिस्ट्रेट उपस्थित हो या मजिस्ट्रेट उस्थित न हो, ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी यह देखने के लिये जिम्मेदार होगा कि जमाव को प्रभावपूर्ण ढंग से बिखेरने और गिरफ्तारियाँ करने के लिए न्यूनतम बल का उपयोग किया जाता है।

(6) उपयोग किये गये बल का प्रकार और समयावधि का, पद 7 के अधीन सुरक्षा के अध्यावधीन रहते हुये, ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी द्वारा निर्णय किया जावेगा और कम से कम घातक शस्त्र प्रयोग किये जायेंगे जिनकी परिस्थतियाँ अनुज्ञा दें। किसी अन्तरस्थ हेतु यथा दन्डात्मक अथवा दमनात्मक प्रभाव को विचार में नहीं लाया जायेगा।

(7) बल का उपयोग त्यों ही बन्द कर देना चाहिये ज्यों ही हेतु पूरा हो जावे। उपस्थित मजिस्ट्रेट को निर्णय करने की शक्ति है कि कब पर्याप्त बल का उपयोग किया गया है। उसे ऐसा निर्णय ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी के परामर्श करने के पश्चात् लेना चाहिए।

खण्ड - आग्नेयास्त्रों के प्रयोग को नियमित करने वाले नियम

(1) गोली तभी चलाई जायेगी जब यदि कोई मजिस्ट्रेट या जहाँ मजिस्ट्रेट न हो भारसाधक पुलिस अधिकारी, जीवन या सम्पत्ति के संरक्षण के लिए गोली चलाना नितान्त आवश्यक समझे।

(2) यदि मजिस्ट्रेट उपस्थित हो तो आग्नेय आयुधों का उपयोग करने का उत्तरदायित्व उसी पर रहेगा और वह उपस्थित ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी को गोली चालन प्रारम्भ करने के लिए निर्देशित करेगा।

(3) जब मजिस्ट्रेट ने ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी को गोलो चालन प्रारम्भ करने का आदेश दिया हो तो वह चलाये जाने वाले चक्रों की संख्या नियत कर उसके विवेक को बन्धन में नहीं डालेगा। ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी ही सदैव गोली चलाने की आज्ञा देगा और गोली चालन पर नियन्त्रण रखने के लिए उत्तरदायी होगा।

(4) ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी गोली चलाना बन्द करने की आज्ञा दे देगा ज्यों ही जमाव निवृत्त होने या बिखर जाने की प्रवृत्ति दर्शाने लगे।।

मजिस्ट्रेट, यदि उपस्थित हो, ज्येष्ठ पुलिस अधिकाई को गोली चालन बन्द करने का आदेश देने की शक्ति रखता है। ऐसा आदेश, ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी से परामर्श करने के उपरान्त किया जायेगा।

(5) जब कभी गोली चालन किया जावे ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी, जब तक कि यह कर्तव्य मजिस्ट्रेट द्वारा न ले लिया गया हो, उस घटना की जिसके कारण गोली चालन हुआ हो, सविस्तार सूचना, वे कारण जिनसे गोली चालन आवश्यक समझा गया, गोली चालन के परिणाम, मृत और आहत व्यक्तियों के विवरणों और अन्य संयत विवरणों के साथ अभिलिखित करेगा।

खण्ड - आग्नेयास्त्रों का प्रयोग आवश्यक होने की दशा में पुलिस अधिकारियों के पथ प्रदर्शन के लिये विस्तृत अनुदेश

इस हेतु कि, बिना किसी भ्रम या नियन्त्रण को क्षति पहुँचाये, गोली चलाने का निर्णय कार्यान्वित किया जा सके, ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी, ज्यों उसे यह सम्भाव्य हो कि आग्नेय आयुधों का उपयोग आवश्यक होगा, सशस्त्र पुलिस की टुकड़ी को तैयार रहने को कहेगा। जब गोली चलाना प्रारम्भकिया जाना हो, ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी उस न्यूनतम प्रभावकारी घनफल का निर्णय लेगा जो परिस्थितियों में आवश्यक हो और उसी के अनुसार ठीक-ठीक आदेश देगा कि किस व्यक्ति और जन पंक्ति पर गोली चलाई जाना है और क्या गोलियों की बौछार, लक्ष्य या निशाने पर अधीन रहे बिना की जाना है और वह निश्चित करेगा कि उसके आदेशों के आगे कोई कार्य नहीं किया जाता और बिना आदेश के या उसके उल्लंघन से कोई गोली नहीं चलाई जाती, जब तक कि अवर अधिकारी और सिपाही अपने को गोली चलाने के लिए निजी सुरक्षा के अधिकार को प्रयोग करते हुए, वाध्य नहीं पाते। सिवाय अत्यधिक तत्कालीनता के, एक बार में गोलियों को केवल एक ही बौछार का आदेश दिया जावे और उसी क्षण गोली चालन बन्द कर दिया जावे जब और आगे आवश्यक न रहे। उ‌द्देश्य स्पष्टतः प्रदर्शित होना चाहिये और गोली चालन का जितना घनफल आदेशित किया जावे वह अधिकतम प्रभावकारी रीति से लागू किया जावे। लक्ष्य नीचे की ओर तथा जमाव के सबसे अधिक धमकी दे रहे भाग की ओर रखा जावे, क्योंकि ऐसा करने से जमाव और आगे बल प्रयोग के लिए कदाचित ही प्रोत्साहित होगा। इसी कारण जमाव के विरुद्ध नियोजित की गई या नियोजित की जाने के लिए संभाव्य टुकड़ी में खाली कारतूस नहीं बाँटे जाना चाहिए। इस आदेश के बाद "किलो चलान बन्द करो और निकाल लो" चलाये गये और लापता कारतूसों की सावधानी से जाँच की जावे और चक्रों की संख्या तथा परिणामों को अंकित किया जावे। यह हर एक अवर अधिकारी द्वारा तत्काल अपने खण्ड के लिये किया जाना चाहिए और उसे यह भी सुनिश्चित कर लेना चाहिये कि गोली चलाना बन्द होते ही सभी सिपाही उपस्थिति हैं, उपस्थित ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी को स्वयं का यह समाधान कर लेना चाहिए कि यह कर लिया गया है। प्रत्येक अवर अधिकारी को अपने सिपाहियों अंधाधुंध गोली चालन या स्वाधीन कार्य के लिए उत्तरदायी बनाना चाहिए, "साधारणतया परिस्थितियों में उनके साथ चाहे पृथक् व्यवहार हो।

इन सिद्धान्तों पर समुचित नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए, पुलिस लाइन में निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है और इस विषय पर उपमहानिरीक्षक द्वारा उनके निरीक्षण में ध्यान दिया जायेगा।

किसी ऐसे उपद्रव के पश्चात जिसमें पुलिस द्वारा गोली चालन आवश्यक हो गया हो, ज्योंही शान्ति पुनर्स्थापित हो जावे, तत्काल-

(क) धरनों की पद स्थापना और गश्तों का संगठन कर शान्ति व्यवस्था बनाये रखने की उपलब्धि के लिये, और

(ख) मृतकों को मृत्यु उपरान्त परीक्षा और आहतों तथा घायलों को चिकित्सा तथा अन्य ध्यान प्राप्त करने के लिये, कार्य किये जावें, यदि ज्येष्ठ पुलिस अधिकारी पुलिस अधीक्षक न हो, यह तत्काल पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट भेजेगा।

71. जिले के आबंटन से अधिक सशस्त्र पुलिस की माँग, यदि संलग्न हो महानिरीक्षक से उस दिन के 6 सप्ताह पूर्व की जावेगी, जिस दिन अतिरिक्त पुलिस की अपेक्षा हो, और जिला मजिस्ट्रेट तथा आयुक द्वारा भेजी जावेगी, परन्तु यह कि जब ऐसा करने से विलम्ब हो, आवेदन जिला मजिस्ट्रेट से परामर्श करके अर्द्ध सरकारी रूप से भेज दिया जावे। सशस्त्र पुलिस की प्रदर्शन के रूप में नगण्य अवसरों पर परेड नहीं कराना चाहिये, परन्तु उसे तभी उपयोग किया जावे जब सिविल पुलिस स्थिति से निपटने के लिये स्पष्टतः असमर्थ हो। सशस्त्र पुलिस को उनके समुचित कर्त्तव्यों तक ही निर्बन्धित रखना चाहिये और छोटी चौकियों में उसका विसर्जन नहीं कर देना चाहिये, जहाँ वे अल्प उपयोग की होती हैं।

72. राज्यपाल को साइकिल अर्दली के रूप में पुलिस अधीक्षक लखनऊ द्वारा सशस्त्र पुलिस के छः कान्सटेबिल प्रदाय किये जाते हैं। जब राज्यपाल लखनऊ से दूर भ्रमण पर हों, संक्षिप्त अवकाश के तत्कालिक आवेदनों के साथ मिलिट्री द्वारा व्यवहार किया (निपटाया) जायेगा। यदि वह अवकाश मंजूर करे और मुक्ति की अपेक्षा करे, वह स्थानीय पुलिस अधीक्षक को आवेदन करेगा। इसी प्रकार यदि कोई साइ‌किल अर्दली, जब वह भ्रमण पर हो, अस्वस्थ हो जावे, वह उस स्थान के पुलिस चिकित्सालय में भेज दिया जावेगा, जहाँ वह उस समय हो और पुलिस अधीक्षक को उसकी सूचना दी जावेगी और यदि उसके स्थान पर मुक्ति के लिये अपेक्षा हो तो उसके प्राप्त करने के लिये माँग की जावेगी। किसी भी दशा में, स्थानीय पुलिस अधीक्षक को पुलिस अधीक्षक, लखनऊ से तत्काल सहायता भेजने के लिए निवेदन करना चाहिए। जब तक मिलिट्री सेक्रेटी द्वारा लौटा न दिए जावें सहायता पहुँचाने वाले राज्यपाल के शिविर के साथ रहेंगे। भ्रमण की समाप्ति पर, जो राज्यपाल के द्वारा नैनीताल को प्रस्थान करते ही समाप्त हो जाता है, मिलिट्री सेक्रेट्री साइकिल वाले अर्दलियों को उस जिले के, जहाँ भ्रमण समाप्त होता है, मुख्यालय की रिजर्व लाइन में भेज देगा और सम्बन्धित पुलिस अधीक्षक से उन्हें वापस लखनऊ भेज देने के लिए आवेदन करेगा। राज्यपाल द्वारा परिदर्शन किये गये जिले का पुलिस अधीक्षक, मिलिट्री सेकेट्री के निवेदन पर, साइकिल के अर्दलियों के लिये डेरे राज्यपाल के शिविर में गड़वाएगा।

कुछ जिलों में और पुलिस ट्रेनिंग कालेज पर आबंटित मन्जूरी हर मशीन पर दो कान्सटेबिल के हिसाब से साइकिल अर्दली के रूप में सशस्त्र पुलिस के कान्सटेबिलों की नियुक्ति के लिए व्यवस्था है, और जहाँ दो साइकिलें आबंटित की गई हों, एक आरक्षित दल को सम्मिलित करते हुए, पाँच. कान्सटेबिलों के लिए व्यवस्था किया गया है।

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