पैरा 25 से  39 अध्याय  3  UP पुलिस रेगुलेशन

पैरा 25 से 39 अध्याय 3 UP पुलिस रेगुलेशन

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अध्याय 3

लोक अभियोजक और उनके अधीनस्थ

25. लोक अभियोजकों का मुख्य कर्त्तव्य बादों के अभियोजन को देखना है। महत्वपूर्ण मामले में वह पुलिस डायरी को पढ़ेगा जिससे कि वाद की प्रथम सुनवायी से. पूर्व तथ्यों से यथाशीघ्र अवगत हो सके और यथासम्भव वाद के न्यायालय में आने से पूर्व उसे जाँचकर्ता अधिकारी से परामर्श करना चाहिए। वह विचार करेगा कि क्या चार्जशीट में नामित सभी साक्षियों को मामले को सिद्ध करना है और क्या अतिरिक्त साक्ष्य आवश्यक है?

26. मुख्यालय भेजे गये अभियुक्त को, प्रथम चरण में लोक अभियोजक के समक्ष लाया जाना चाहिए, जो पुलिस पत्रावली का निरीक्षण करेगा और उनको किसी सुझाव, जो आवश्यक हों, के साथ न्यायालय से जुड़े पुलिस अधिकारी को भेजेगा।

अभियुक्त के साथ भेजी गयी पुलिस पत्रावली का निरीक्षण कर वह विचार करेगा कि क्या अभियुक्त के पूर्ववर्ती कार्यों के बारे में पर्याप्त रूप से सुनिश्चित किया गया है और क्या अग्रेतर जाँच आवश्यक है।

27. प्रत्येक न्यायालय में सुनवायी हेतु अपेक्षित वादों को अधिकारियों के नामों, यदि कोई हों, जिन्हें उन वादों में अभियोजन चलाने हेतु प्रत्तिनियुक्त किया गया है, के साथ दर्शाते हुए हुए वाद सूची प्रतिदिन मुख्यालय के अधीक्षक या प्रभारी अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत की जायेगी। प्रत्येक अभियोजन अधिकारी एक नियमित डायरी रखेगा जिसमें वह उन वादों को प्रविष्ट करेगा जिनमें उसे प्रतिदिन उपस्थित होना है। प्रत्येक वाद के आगे निम्नलिखित उल्लिखित किया जायेगा-

(1) न्यायालय का नाम, और

(ii) दिनांक, जिसके लिए वाद को स्थगित किया गया है।

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 492 के अन्तर्गत सभी लोक अभियोजकों और सहायक लोक अभियोजकों को उनकी नियुक्ति के जिले में, पुलिस द्वारा जाँच के पश्चात मजिस्ट्रेट द्वारा विचारित या जाँच किये जाने वाले वादों के लिए, लोक अभियोजक नियुक्त किया गया है। लोक अभियोजक को मजिस्ट्रेट के समक्ष महत्त्वपूर्ण वादों में अभियोजन चलाना चाहिए और सहायक लोक अभियोजकों को उसके दिशानिर्देशों के अधीन नियोजित किया जाना चाहिए। बाद के न्यायालय में लिये जाने से पूर्व अभियोजन अधिकारी पैरा 25 और 26 में विहित प्रक्रिया को पूरा करेगा और तथ्यों का पूर्णतः अध्ययन करेगा। उसे पुलिस डायरी से विस्तृत रूप से अवगत होना चाहिए। जब प्रतिरक्षा हेतु साक्ष्य लाया जाता है, तो उसे साक्षियों के परीक्षण के लिए निर्धारित तिथि से पूर्व, उनके पूर्व आचरण और अभियुक्त व्यक्ति के साथ उनके सम्बन्धों के बारे में पुलिस द्वारा अन्यथा सूचना प्राप्त करनी चाहिए, जिसका उपयोग प्रतिपरीक्षण में किया जा सकेगा।

लोक अभियोजक या उसके सहायक द्वारा अभियोजित किये जाने वाले प्रत्येक महत्वपूर्ण वाद का संक्षिप्त विवरण तैयार किया जायेगा जिसमें साक्षियों का नाम, जिन्हें प्रस्तुत किया जाना प्रस्थापित है, प्रत्येक से अपेक्षित साक्ष्य के सारांश के साथ दर्शित किया गया हो। यह संक्षिप्त विवरण पैरा 25 और 26 में वर्णित प्रक्रिया पूरी होने के पश्चात और बाद के न्यायालय में आने के पूर्व, मुख्यालय के अधीक्षक या प्रभारी अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा। इसके साथ जाँच अधिकारी से प्राप्त प्रतिरक्षा सुाक्षी से सम्बन्धित नोट्स बाद से सम्बन्धित सभी पत्रावली सिवाय केस डायरी के, संलग्न की जायेगी और किसी साक्षी जिसके सम्बन्ध में लोक अभियोजक संदेह की स्थिति में हो, को प्रस्तुत करने की आवश्यकता के सम्बन्ध में एवं किसी अन्य महत्वपूर्ण विन्दु पर जो उत्पन्न हो सके, आदेश प्राप्त किया जाना चाहिए। संक्षिप्त विवरण एक वर्ष तक रखा जायेगा और तब विनष्ट किया जायेगा। जहाँ किसी वाद में अनेक अभियुक्त हैं और उनमें से कुछ उपस्थित हैं और अन्य फरार हो चुके हैं,

तो यह उचित होगा कि लापता अभियुक्त का सन्दर्भ देते हुए उनके फरार होने के बारे में साक्ष्य प्रस्तुत किया जाये जिससे कि बाद में दर्ज साक्ष्य दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 512 के अन्तर्गत उनके विरुद्ध उसी प्रकार से सुसंगत हो जैसे कि न्यायालय में उपस्थित अभियुक्तों के विरुद्ध होता है। लोक अभियोजक जब कभी यह समझे कि मजिस्ट्रेट के समक्ष कोई वाद इतना महत्वपूर्ण और कठिन है कि किसी विधिक पेशेवर (Legal Practitioner) को नियोजित किया जाना आवश्यक है तो उसे मुख्यालय के प्रभारी अधिकारी को सूचित करना चाहिए।

उन वादों में जिनमें इनाम की रकम अधिरोपित जुर्माने की रकम पर निर्भर है, तो उनमें इस विषय पर विधिक उपबन्धों की तरफ न्यायालय का ध्यान आकृष्ट किया जाना चाहिए।

28. सेशन वादों और दण्ड अपीलों में लोक अभियोजक को शासकीय प्लीडर को इसे समुचित रूप से करने का अनुदेश देना चाहिए। उसे तथ्यों से उसी प्रकार से विस्तृत रूप से अवगत होता चाहिए जिस प्रकार से वह होता, यदि उसे अभियोजन मजिस्ट्रेट के न्यायालय में चलाना होता। इन दोनों प्रकार के वार्दी में उसे केस डायरी सेशन न्यायालय के समक्ष लाना या भेज देना चाहिए।

यदि न्यायाधीश का मुख्यालय किसी अन्य जिले में है, तो लोक अभियोजक के लिए मात्र महत्वपूर्ण या कठिन अपीलों की सुनवायी के समय उपस्थित होने की आवश्यकता है। किसी सामान्य वाद में वह न्यायाधीश के मुख्यालय के लोक अभियोजक को अनुदेशों के साथ डायरी भेज सकेगा जो अपीलों को उसी प्रकार देखेगा मानो वे उसी के जिले की हों।

उच्च न्यायालय या अवध के मुख्य न्यायालय के समक्ष महत्वपूर्ण वादों में लोक अभियोजक को शासकीय अधिवक्ता को अनुदेश देने चाहिए, बशर्ते कि पुलिस अधीक्षक किसी अन्य पुलिस अधिकारी को लोक अभियोजक की अपेक्षा वाद को अधिक अच्छी तरह से जानता हो, को न भेजना चाहे या जिलाधिकारी किसी शासकीय प्लीडर या किसी अन्य व्यक्ति को इस. प्रयोजन के लिए प्रतिनियुक्त करना उचित न समझे।

29. राजकीय रेलवे पुलिस के लोक अभियोजक और सहायक लोक अभियोजक रेलवे लाइनों से सभी जिलों के अनुभागों में जहाँ वे नियुक्त हैं, राजकीय रेलवे पुलिस द्वारा जाँच के पश्चात मजिस्ट्रेट द्वारा विचारित या जाँच किये जाने वाले मामलों के लिए लोक अभियोजक नियुक्त किये गये हैं। किसी राजकीय रेलवे पुलिस के सम्बन्ध वाद में जिसमें सुरक्षाबल की उस शाखा के अभियोजक द्वारा कार्यवाही नहीं की जाती है, जिला लोक अभियोजक के वही कर्तव्य हैं जो कि जिला बादों में होते हैं और उसके द्वारा पैरा 30 में उल्लिखित रीति से अनुभाग अधिकारी को परिणाम से निश्चित रूप से अवगत कराया जाना चाहिए।

इसी प्रकार से क्रिमिनल इनवेस्टीगेशन डिपार्टमेंट (C. I. D.) के लोक अभियोजकों और उपाधीक्षक उस विभाग के अधिकारियों द्वारा उत्तर प्रदेश के किसी जिले में जाँच किये जाने के पश्चात मजिस्ट्रेट या किसी सेशन न्यायालय द्वारा विचारित या जाँच किये जाने वाले सभी वादों के लिए लोक अभियोजक नियुक्त किये गये हैं, किन्तु जिला लोक अभियोजक क्रिमिनल इनवेस्टीगेशन डिपार्टमेंट द्वारा जाँच किये गये वाले वादों के अभियोजन के लिए उस समय उत्तरदायी होगा जब उस विभाग का कोई लोक अभियोजक या उपाधीक्षक उपस्थित न हो और ऐसे वादों के परिणाम और सभी महत्वपूर्ण आदेशों को समुचित रूप से क्रिमिनल इनवेस्टीगेशन डिपार्टमेंट के जाँच शाखा के पुलिस अधीक्षक को संसूचित करेगा।

30. वह दोषसिद्धों और दोषमुक्तों की अपनी दैनिक रिपोर्ट (प्रपत्र सं० 107) या किसी अन्य माध्यम से अभियोजन में सभी महत्वपूर्ण असफलताओं की रिपोर्ट, यदि आवश्यक हो तो अपने संधिप्त विवरण के साथ अधोक्षक को करेगा और वह वे सभी बातें विशेष रूप से पुलिस के अच्छे कार्य या अकुशलता या दुर्व्यवहार जो उन वादों में प्रकाश में आये हैं, भी उसके ध्यान में लायेगा।

31. उसे मुख्यालय पर अभियुक्त व्यक्तियों की पहचान के लिए की जाने वाली सभी कार्यवाहियों पर निश्चित रूप से सावधानीपूर्वक ध्यान देना चाहिए और यह आवश्यक रूप से देखना चाहिए कि वे उस रीति से सम्पन्न की जा रही है जिसमें कि पुलिस के सद्भाव पर आपत्ति नहीं की जा सकती है। जब कैदियों को जिन्हें पहचान के लिए साक्षियों को देखाना है, जेल बन्दीगृह में बन्द किया जाता है, तो लोक अभियोजक को जेलर को कैदी की बन्दी के समय या तदुपरान्त यथाशक्य शीघ्र यह सूचित करना चाहिए कि पहचान कार्यवाही अपेक्षित होगी। जेल पहचान कार्यवाही किये। जाने या कैदी के मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश के न्यायालय में विचारण के लिए प्रस्तुत किये जाने से पूर्व लोक अभियोजक को अपना समाधान कर लेना चाहिए कि "जेल मैनुअल के पैरा 443 और शासनादेश के मैनुअल के पैरा 849" के उपबन्धों का पूर्णतः अनुपालन किया गया है और किसी मामले में याद विचाराधीन कैदी को अपने बाल बढ़ाने या दाढ़ी बढ़ाने या अन्यथा अपना रूप परिवर्तित करने की अनुमति दी गयी है, तो उसे सम्बन्धित पुलिस अधीक्षक या मजिस्ट्रेट या न्यायालय के द्वारा जेल अधीक्षक के ध्यान में लाना चाहिए। उसे यह भी देखना चाहिए कि इस सुझाव के लिए कि मामला मुख्यालय पर आने के पश्चात परिवर्तित या समाप्त हो गया है, कोई आधार अभी तक नहीं दिया गया है।

32. [निरसित]

33. वह दण्ड प्रक्रिण संहिता की धारा 167 के अन्तर्गत रिमाण्ड के लिए आवेदन पत्र तैयार करेगा और उसे स्वपत्र व्यक्तिगत रूप से या अपने किसी अधीनस्थ के माध्यम से न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगा।

किसी अभियुक्त द्वारा दण्डः प्रक्रिया संहिता की धारा 162 के अन्तर्गत साक्षियों के बयानों की मांगी गयी प्रतिलिपियों को लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक द्वारा सत्य प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित करना चाहिए।

34. लोक अभियोजक विचाराधीन कैदियों के नियत तिथि पर न्यायालय के समक्ष उपस्थित करने और उन्हें न्यायालय ले जाने और वहाँ से ले आने में सुरक्षा का प्रबन्ध करेगा। जब विचाराधीन कैदियों की उपस्थिति न्यायालयों में अपेक्षित हो, तो वह जेलर की कैदियों की एक सूची प्रेषित करेगा। यह निर्धारित करना कि ऐसे कैदियों को हथकड़ी, बेड़ी लगायी जाये या नहीं, पुलिस का कार्य है, किन्तु वह सूची में यह स्पष्ट निर्देश देगा कि कौन से कैदियों की हथकड़ी या बेड़ी या दोनों लगायो जायेगी और किसी मामले में अवरोधक आवश्यक है या नहीं। हथकड़ी और बेड़ी को नियंत्रित करने वाले अनुदेशों का सावधानीपूर्वक अनुसरण किया जाना चाहिए। इन बिन्दुओं पर निर्णय करने का दायित्व लोक अभियोजक का होगा, किन्तु यह सभी मामलों में पुलिस अधीक्षक के नियन्त्रणाधीन होगा, जिसका आदेश सन्देहास्पद मामलों और अति महत्वपूर्ण कैदियों के मामलों में लिया जाना चाहिए। लोक अभियोजक गार्ड एवं अभिरक्षक नियमावली की परिशिष्ट II में दिये गये न्यूनतम मापदण्ड एवं कैदियों के चरित्र तथा न्यायालयों की संख्या जिनमें उन्हें प्रस्तुत किया जाना है, को ध्यान में रखते हुए अभिरक्षकों की संख्या निर्धारित करेगा। बिना हथंकड़ी वाले और पैदल या पुलिस कैदी वाहन के सिवाय किसी अन्य वाहन से यात्रा करने वाले विचाराधीन कैदियों की स्थिति में गार्ड एवं अभिरक्षक नियमावली की परिशिष्टि II की टिप्पणी के अनुसार अभियोजकों की संख्या अधिक होनी चाहिए। लोक अभियोजक को आवश्यक संख्या में पुलिस के लिए रिजर्व इन्स्पेक्टर से आवेदन करना चाहिए। यदि लोक अभियोजक के विचार में अभिरक्षकों को पूर्णतः या अंशतः बन्दूकों से सुसज्जित होना चाहिए, तो उसे पुलिस अधीक्षक या किसी राजपत्रित अधिकारी से इस हेतु आदेश प्राप्त करना चाहिए। राजपत्रित अधिकारी की अनुपस्थिति में रिजर्व इन्स्पेक्टर द्वारा उसके विवेकाधिकार का प्रयोग किया जाना चाहिए।

लोक अभियोजक प्रपत्र संख्या 27 में कैदियों की सूची को दो प्रतिलिपियाँ अभिरक्षक कमाण्डर को सुपुर्द करेगा या यदि सम्भव हो तो उसकी एक प्रतिलिपि जेलर को उस दिन की पूर्ववर्ती शाम को जिस दिन कैदी अपेक्षित हो, भेज देगा। अभिरक्षक कमाण्डर नियमावली में उल्लिखित तलाशी करने के पश्चात अपना समाधान कर कि बेड़ी के बारे में निर्देशों का अनुपालन पूरा हो गया है और हथकड़ी के बारे में निर्देशों का व्यक्तिगत रूप से अनुपालन कर सूची की एक प्रतिलिपि पर हस्ताक्षर करेगा जो जेलर द्वारा अपने पास रख ली जायेगी।

कैदियों की सुपुर्दगी के पश्चात उनके जेल वापस लौटने तक और जेलर द्वारा सूची पर इस आशय का पृष्ठांकन करने तक कि कैदी कैदीगण जेल में सुरिक्षत वापस आ गये हैं या अच्छे और पर्याप्त कारणों में वापस नहीं आये हैं, उनकी सुरक्षित अभिरक्षा का दायित्व अभिरक्षक कमाण्डर पर होगा। लोक अभियोजक कैदियों के जेल वापस आने से पूर्व सूची में आवश्यक परिवर्द्धन या परिवर्तन कर सकेगा।

35. जब कोई दोषसिद्ध या विचाराधीन कैदी किसी न्यायालय की अध्युपेक्षा के अनुसरण में किसरी अन्य जिले में भेजा जाता है, तो उस जेल के अधीक्षक जिसमें कैदी निरुद्ध है, द्वारा हस्ताक्षरित आदेश उस कैदी को इस निर्देश के साथ भेजा जायेगा कि जव न्यायालय जिसमें उसे भेजा जा रहा है. द्वारा अपेक्षित नहीं रह जायेगा, उसे वापस लाया जायेगा। (देखें जेल मैनुअल का पैरा 164 और 450) उस जिले जहाँ कैदी को भेजा जा रहा है, के लोक अभियोजक का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे आदेश की न्यायालय, जिसके समक्ष कैदी को प्रस्तुत किया जाता है, के ध्यान में आये और कैदी को वापस करने के आवश्यक निर्देश प्राप्त करे।

लोक अभियोजक को यह देखने में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए कि हर कालापानी के सजायाफ्ता कैदी के वारण्ट के साथ नाम पंजिका (जेल प्रपत्र सं० 44) भरी गयी है और संलग्न की गयों है। किसी मामले में अदि दोषसिद्ध व्यक्ति को कालापानी की सजा दी गयी है, किन्तु जिसकी नाम पंजिका जेल अधीक्षक से प्राप्त नहीं हुई है, तो उसे इसके भरे जाने हेतु जिलाधिकारी के माध्यम से पुलिस अधीक्षक का ध्यान आकृष्ट करना चाहिए।

जब कभी किसी अभियुक्त को पुलिस द्वारा की गयी जाँच वाले किसी संज्ञेय मामले में दोषसिद्ध ठहराये जाने पर कारवास की सजा दी जाती है तो लोक अभियोजक जाँचकर्ता अधिकारी द्वारा दी गयी सूचना के आधार पर अभियुक्त के पूर्ववर्ती दोषसिद्धि और पूर्व आचरण को दशति हुए एक विवरण तैयार करेगा और उसे न्यायालय के भारसाधक अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करेगा जिससे कि वह जेल प्रयोजनार्थ कैदी को 'अभ्यस्त' या ' अनभ्यस्त' श्रेणी में रख सके।।

36. सम्पत्ति जो पुलिस के कब्जे में आती है, के सम्बन्ध में लोक अभियोजक के दायित्व के लिए अध्याय XIII देखें। अंगुली निशान के सम्बन्ध में उसके दायित्व के लिए अलग मैनुअल देखें। अन्य दायित्वों के लिए पुस्तक के लिए इस पुस्तक की विषय सूची को देखा जा सकता है।

वह निम्नलिखित रजिस्टर रखेगा-

(1) फरार अपराधियों का रजिस्टर (देखें: अध्याय XIX)

(2) सम्पत्ति रजिस्टर चार भागों में (देखें अध्याय XIII)

(3) अस्त्र, गोला, बारूद और सैन्य भण्डार रजिस्टर (देखें पैरा 171 और 173)

(4) बन्दीगृह रजिस्टर (प्रपत्र सं० 32)

बन्दीगृह रजिस्टर में मुख्यालय पर बन्दीगृह में रखे गये सभी कैदियों या मुख्यालय पर गार्ड की अभिरक्षा में निरुद्ध विचाराधीन कैदियों का नाम समाविष्ट होगा। कैदी जिनका मुख्यालय पर विचारण न किया जाता हो और बन्दीगृह में न रखे गये हों, का नाम रजिस्टर में दर्ज किया जाना आवश्यक नहीं है, बशर्ते कि उन्हें कारावास का दण्ड न दिया गया हो और उस दशा में उनका नाम उसमें प्रविष्ट किया जायेग जब वे जेल में बन्द किये जाने हेतु वारण्ट सहित भेज जाते हैं।

37. कोई लोक अभियोजक, अभियोजन शाखा में होने मात्र से उसकी पुलिस अधिकारी की प्रास्थिति नहीं खो देता है। वह पुलिस विभाग को प्रभावित करने वाले लोक हित के मामलों में जन सामान्य की अवधारणा के बारे में सूचना प्राप्त करने हेतु काफी सुविधाजनक स्थिति में होता है। उसे हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि पुलिस अधीक्षक द्वारा माँगे जाने पर ऐसी समस्त सूचना उनके समक्ष प्रस्तुत करने के लिए दायित्वाधीन है।

38. सहायक लोक अभियोजकगण लोक अभियोजक के नियन्त्रणाधीन है और वे इस अध्याय में उल्लिखित या विनिर्दिष्ट किसी भी दायित्व को जो उन्हें उनके द्वारा प्रदत्त किया जाता है, करेंगे।

सहायक लोक अभियोजक नीचे दिये गये प्रारूप में एक रजिस्टर रखेगा जिसमें वह उन साक्षियों के नामों को प्रविष्ट करेगा जो प्रत्येक पेशी पर उपस्थित होते हों, भले ही उनका परीक्षण किया गया हो या नही, जिससे कि वे अपने विधिक यात्राभत्ता और भोजन के लिए रकम से वंचित न हो जावें। सहायक लोक अभियोजक भारसाधक अधिकारी का हस्ताक्षर भी इस रजिस्टर पर प्राप्त करेगा।

प्रत्येक न्यायालय के लिए अभियोजन साक्षी रजिस्टर सहायक लीक अभियोजक द्वारा रखा जायेगा।

क्रम

वाद का विवरण

धारा पेशी उपस्थित

उपस्थित अभियोजन का नाम

यदि परीक्षण किया गया हो, तो साक्षी के आगे परीक्षण किया गया लिखा जायेगा

भारसाधक अधिकारी का नाम

भारसाधक अधिकारी का आद्याक्षर

39. न्यायालय से संलग्र सभी पुलिस लोक अभियोजक के नियन्त्रणाधीन होंगे और जब न्यायालय में नियोजिक न हों, तो कार्यालय में उसकी सहायता करेंगे। वह उन मामलों की ओर अधीक्षक का ध्यान आकृष्ट करेगा जिनमें कोई पुलिस न्यायालय से एक वर्ष से अधिक अवधि से संलग्न है। (देखें पैरा 524) वह यह देखेगा कि वे ड्यूटी पर समुचित वर्दी धारण करते हैं और वह उनके कर्तव्यों के सम्पादन हेतु उत्तरदायी होगा, जो कि निम्नवत् है-

(1) सभी कैदियों जो विचाराधीन हैं, को बिना बिलम्ब किये न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना और प्रथम चारण में एवं जब रिमाण्ड आवश्यक हो, दोनों ही स्थिति में बन्दीगृह में उन्हें निरुद्ध करने हेतु आदेश प्राप्त करना;

(2) यह देखना कि दाण्डिक मामले सुनवायी के लिए तैयार हैं, साक्षी उपस्थित है और प्रदर्शक प्रस्तुत किये गये हैं।

(3) न्यायालय में व्यवस्था बनाये रखना और वहाँ पर कैदी की सुरक्षित अभिरक्षा सुनिश्चिता करना और यह देखना कि न्यायालय में कैदियों की हथकड़ी उतार दी गयी है, बशर्ते कि भारसाधक अधिकारी अन्यथा निर्देशित न करे;

(4) जब मुख्यालय से सुदूर न्यायालय से संलग्न हो, तो लोक अभियोजक के ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करना (सिवाय पैरा 25 से 31 में उल्लिखित कर्तव्यों के) जो मजिस्ट्रेट या अधीक्षक द्वारा निर्देशित किये जायें;

(5) साक्षियों और अभिरक्षा में रखे गये अभियुक्त व्यक्तियों से मुचलका भरवाना,

(6) न्यायालय के आदेश के अधीन अभियुक्त व्यक्तियों को अभिरक्षा में लेना।

अध्याय 3

लोक अभियोजक और उसके अधीनस्थ [ निकाल दिया गया]

[निकाल दिया गया] ये धारायें देखने के लिए अली कबीर की पुलिस रेगुलेशन देखें।

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