
174. डकैतों या गिरोह द्वारा लूट की घटना होने के बाद, यथासम्भव शीघ्र थाने का भारसाधक अधिकारी अतिशीघ्र गति वाली रीति से पड़ोसी थानों को सूचना भेजेगा और उस दिशा में जिसमें अपराधियों का जाना अनुमानित हो, नहर, घाटों और रेलवे पुलों, रेलवे स्टेशनों, सरायों और ऐसे अन्य स्थानों की देख-भाल करने को सिपाहियों को रवाना करेगा। संदेहित्त व्यक्ति रोके जाना चाहिये, और धाने में लाए जाना चाहिये, यदि आवश्यक हो तो ये गिरफ्तार किये जा सकेंगे। यही पग अन्य थानों के भारसाधक अधिकारियों, जिनकी सूचना भेजी गई हो, द्वारा उठाये जाने चाहिये।
उस जिले के अधीक्षक को, जिसमें डकैतों या गिरोह द्वारा लूट की घटना हुई ही, पड़ोसी जिलों को तत्काल सूचना भेजना चाहिये।
यदि उपलब्ध हो सके. तो अपराधियों की विचारणात्मक नामवलियां, अन्वेषणकर्ता अधिकारी द्वारा पड़ोसी थानों को तथा अधीक्षक द्वारा अन्य थानों और जिले के मुख्यालयों को भेजी जानी चाहिये।
किसी अन्य जिले में हुई डकैती की सूबना प्राप्त होने पर अधीक्षक को अपने जिले की पुलिस को सावधान होने के आदेश देना चाहिये और उस धाने को अनुदेश भेजना चाहिये जहाँ विशेष पूर्व विधानियों आवश्यक हों।
जब डकैती किसी घूमने वाले गिरोह के द्वारा की जावे, उसका समाचार जितने व्यापक रूप से सम्भव हो सके फैलाना महत्वूर्ण है।
देशी राज्यों में की जा सकने वाली कार्यवाही के लिये चौबीसवां अध्याय देखें।
175. व्यबसायिक विषदान के मामले पटित हों तो पूर्वगामी पैरा के अनुसार कार्यवाही की जावे, किन्तु अपेक्षाकृत छोटे मन से। अधीक्षक और थाने के भारसाधक अधिकारियों को उन स्थानों के बारे में जहां सूचना भेजी जाना हो या जिनकी निगरानी की जाना हो, अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिये।
अपराधों की विवरणात्मक नामावली को अभिलिखित करने में अधिक सावधानी बर्ती जावे । उसके हुलिया के पूरे विवरण सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिये क्योंकि विष देने वाला अपने शिकार के साथ कुछ समय अवश्य खर्च करता है।
विष देने वाले की गिरफ्तारी की पूर्व आशा में समर्थक साक्ष्य उपलब्ध करने के लिए यह कभी-कभी उपयोगी होता है कि परिवादी को उस स्थान पर ले जाया जावे जहां के बारे में वह यह बताता हो कि यह विष देने वाले को संगति में रहा था और उसका सामना, किन्हीं व्यक्तियों से उदाहरणार्थ सराय के रखवाले, अनाज विक्रेता या अन्य ऐसे व्यक्तियों से, जिन्होंने उन्हें साथ-साथ यात्रा करते देखा हो, कराया जाये। विष देने वाले की लौटने की आशा में परिवादी को पुलिस के साथ रहने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिये।
176. जब 14 वर्ष के आयु के बालक या 16 वर्ष से कम आयु की बालिका के गायब हो जाने की रिपोर्ट प्राप्त हो, और परिस्थितियाँ व्यपहरण के अपराध की ओर संकेत करती हों, कार्यवाही के भारसाधक अधिकारी को पड़ोसी थानों और पुलिस अधीक्षक को सूचित और पुलिस अधीक्षक की अवस्यक की विवरणात्मक नामावली, उस दिशा के बारे में, जिसमें सम्भवतया बालक बालिका गया 'होगा/गई होगी, संग्रह की गई सूचना और बालक बालिका को ले भागने के लिए संदेहित किसी व्यक्ति की विवरणात्मक नामावली के साथ, अग्रेषित करना चाहिये। अधीक्षक आवश्यक को पुनर्प्राप्ति के लिए कार्यवाही करेगा जैसी वह सर्वश्रेष्ठ समझे।
ग्राम पुलिस के सिपाहियों को अनुदेशित किया जावे कि वे किसी अवयस्क के गायब होने या किसी अपरिचित अवश्यक के आगमन की रिपोर्ट करें।
177. पशुओं को विष देने का पता लगाने के लिये पशुओं की मृत्यु दर पर निगरानी रखी जानी चाहिये तथा जब पशुओं की बड़ी संख्या में मृत्यु हो, विशेप कर जब चमड़े का मूल्य ऊँचा हो गया हो, पूछताछ की जाये। ग्राम पुलिस के सिपाहियों को असाधारण मृत्यु दर की रिपोर्ट करना चाहिये। जय बीमारी होने के कारण के बिना पशुओं को मृत्यु दर अत्यधिक हो. वो खालों को खरीदने वाले ठेकेदारों की गतिविधियों का पता लगाना महत्वूर्ण होगा। अनेक बार यह ध्यान में आया है कि ठेकेदार गांव में आता है, इसके प्रस्थान के कुछ समय पश्चात् पशु मर जाते हैं और थोड़े समय पश्चात् यह खालों, को खरीदने के लिए लौट आता है।
जमींदारों से यह अर्ज की जावे कि वे उन सभी पशुओं की खालें नष्ट कर दें जो संदिग्ध परिस्थितियों में मरे हों।
जब रासायनिक विश्लेषण वांछनीय हो मृत पशु के गुर्दे, जिगर और पेड़ के भाग तथा पेट में अन्तर्विष्ट वस्तुओं को नमक और पानी में डुबोकर मजिस्ट्रेट के आदेशों के लिए मुख्यालयों को भेज दिवा जाये।
पशुओं की विष दिए जाने से संदेहित मामलों में, जब पदार्थ विश्लेषण के लिए भेजी जावें रासायनिक परीक्षक के मार्गदर्शन के लिए निम्नलिखित प्रारूप में संक्षिप्त विवरण दिये जावें-
(1) पशु की विशिष्ट जाति और स्वामी का नाम।
(2) अंतिम बार लिये गये आहार की प्रकृति।
(3) इस आहार के लेने के बाद कितने शीघ्र रोग के लक्षण प्रकट हुये?
(4) क्या पशु का पीड़ा में होना प्रकट हुआ था?
(5) क्या दस्त हुए थे?
(6) क्या मुँह और नथनों से कोई स्राव निकला था?
(7) क्या ऐंठन देखी गई थी?
(8) क्या पशु अचेत देखा गया था? यदि हाँ, तो लक्षणों की उत्पत्ति के बाद कितने लक्षण प्रकट हुए।
(9) क्या यह सन्देहित है कि विष मुँह, गुदा या अधस्त्वचीय (खाल में सुई लगाकर विष दान) दिया गया था?
(10) क्या गुदा में कोई बाहरी पदार्थ विद्यमान था?
(11) क्या मृत्यु घटित हुई?
उपरोक्त बिन्दुओं पर जिला मजिस्ट्रेट को, उसके द्वारा रासायनिक परीक्षक के पास पदार्थ को भेजने * के पूर्व सूचना दी जायें।
178. पशुओं को नष्ट करने के लिए दिया गया विष बहुधा संखिया होता है और कभी-कभी एकोनाइट होता है। किसी पशु को संखिया खिलाने की सामान्य विधि यह है कि सफेद संखिये को खुरदुरे चूर्ण के रूप में गीले आटे में मिला दिया जाये और तब विषयुक्त गीले आटे को मिला दिया जावे और तब विषयुक्त गीले आटे को ताजी घास में या चने, पौधे के डन्ठलों के साथ लपेट दिया जावे।
कभी साँप के जहर से मरा हुआ चिथड़ा पशु के गुदा द्वार के बीच घुसा दिया जाता है। जब इस प्रकार के किसी घामले का पता चले, तो चिथड़े को रासायनिक परीक्षण के लिए भेज दिया जाना चाहिए। ऐसे मामले में, विष के बारे में यह आशा की जा सकती है कि वह चिकने सफेद रंग का होगा जैसे गहने आदि चमकाने की सिलमिट होती है।
विप देने का एक सामान्य रूप यह है कि धतूरे, अफीम, गुंची के बीच और प्याज के अंगों को लेई के रूप में बनाकर स्प्रिटयुक्त कर लोहे के कांटे में डालकर उसे धूप में सुखाकर और कठोर बनाकर लोहे के काटे को पशु के शरीर में सामान्यतया पीठ में ठोक दिया जावे। इस कांटे के चुभा दिये जाने, के कुछ घन्टों पश्चात् सूजन दिखना प्रारम्भ हो जाती है और शरीर के एक भाग पर फैल जाती है। किन्तु जब तक कि पशु गिर न पड़े और चलने योग्य न रहे, जो कि सूजन प्रकट होने के तीन चार दिन बाद होती है, तब तक सूजन, खाने से बचना और बैठने से अरुचि के अतिरिक्त अन्य कोई लक्षण प्रकट नहीं होते। सूजन को छेदने का चिन्ह देखने के लिए भली प्रकार परीक्षण करना चाहिए। क्योंकि वह इतना छोटा होता है कि दिखाई नहीं पड़ सकता। ऐसे मामले भी अभिलेख पर हैं कि इस पद्धति से मानव प्राणियों को भी विप दिया गया है।
179. सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बुलन्दशहर, अलीगढ़, आगरा, फर्रुखाबाद, मुरादाबाद, बदायूँ और शाहजहाँपुर जिलों के भीतर आबादी वाले स्थलों, पशु शालाओं से पशुओं के चले जाने को रिपोर्ट को तत्काल चोरी की रिपोर्ट के रूप में अभिलिखित और अन्वेषित किया जावे, अन्य आबारा होने के मामलों को इस प्रकार अभिलिखित या अन्वेषित नहीं किया जाना चाहिए; जब तक कि आवारा ही जाने को रिपोर्ट करने वाले स्वामी द्वारा संदेह व्यक्त करते हुए अन्वेषण की प्रार्थना न की गई हो या जब तक कि मामले की विशेष परिस्थितियों से, धाने के भारसाधक अधिकारी को यह विश्वास करने का कारण (जिन्हें अभिलिखित किया जावे) न हो कि चोरी की घटना हुई है।
180. पशुओं को बोरी के प्रत्येक मामले में अन्वेषण किया जावेगा बाहे चोरी गए, पशु का मूल्य कुछ भी न हो, चाहे स्वामी अन्वेषण के लिए किए जाने की इच्छा व्यक्त न करे।
181- निम्नलिखित निर्देश सभी जिलों को लागू होंगे:-
(1) थाने का भारसाधक अधिकारी, चोरी गए पशुओं की विवरणात्मक नामावली के साथ पशु चोरी का शीघ्र रिपोर्ट अपने और अन्य जिलों के सभी पड़ोसी थानों को भेजेगा। वह अपने धाने की अधिकारिता के भीतर काँजी हाउस के रखवालों को यदि कोई हो, आवारा हो जाने की रिपोर्ट की सूचना देगा, और अपने थाने के नोटिस बोर्ड पर आवारा होने की सूचना चिपकायेगा।
(2) काँजी हाउस के पशुओं की चोरी गयी पशुओं की विवरणात्मक नामावली के साथ सावधानी से तुलना की जावे। पड़ोस के कृपकों के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों के द्वारा पशुओं को अवरुद्ध किए जाने या काँज़ी हाउस से दूर रहने वाले व्यक्तियों द्वारा पाले जाने के मामले में सावधानीपूर्वक जाँच की जावे।
(3) वर्ष के दौरान उनके फेरों की जगह से प्राप्त आवारा होने की रिपोर्ट की सूची कान्सटेबिलों को दी जानी चाहिए और उन्हें गाँव के चौकीदारों, निवासियों से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि क्या आबारा गये पशु पुनः प्राप्त कर लिए गए हैं, यदि हाँ, तो किन परिस्थितियों में। ग्राम चौकीदारों से, जब वे थाने में परिदर्शन के लिए आयें, इन बिन्दुओं पर प्रश्न किया जाना चाहिए।
(4) जब ग्राम चौकीदार थाने का परिदर्शन करें थाने का भारसाधक अधिकारी थाने पर की गई पशुओं की चोरी या आवारा हो जाने की रिपोटों को पढ़वा कर सुनवायेगा और उनकी व्याख्या करेगा।
(5) हर थाने के भारसाधक अधिकारी को पशु ठाँगदारों के नाम और पतों की पूरी जानकारी होनी चाहिए और उसे यह पता लगाने का प्रयत्न करना चाहिए कि क्या अभ्यासित या पशु किसी विशेष दिशा में ले जाये जाते हैं और क्या उसके मण्डल में कोई ऐसे ग्राम हैं जिनके अधिकांश निवासी पशु बोरों से सहानुभूति रखते हैं तथा क्या कोई ऐसे क्षेत्र उदाहरणार्थ डाक के जगल और नदी के खादर हैं, जहाँ चोरी गये पशुओं को अस्थायी रूप से रोका जा सकता है। सहारनुपर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बुलन्दशहर, अलीगढ़, मुरादाबाद, आगरा, फर्रुखाबाद, बदायूँ और शाहजहाँपुर जिलों के हर एक थाने में थानेदार ग्राम अपराध पुस्तक के साथ ठौगदारों के नाम और उन गाँवों को जिसमें वे रहते हैं, दर्शाते हुए एक सूची रखेगा। इन सूचियों पर अन्य कोई विवरण देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ये सभी विवरण ग्राम अपराध पुस्तक में अन्तर्विष्ट होंगे। यदि कोई गाँव ठाँगदारों से इतना भरा हुआ है कि कुछ नामों आगमों का का विनिर्दिष्ट किया जाना महत्वहीन होगा। (उदाहरणार्थ गूजरों के कुछ गांवों की दशा में), तो सूची में केवल गांव का नाम हो लिखना पर्याप्त होगा। सूची ग्राम अपराध पुस्तक को निर्देशिका का कार्य करेगी और थानेदार तथा निरीक्षण करने वाले अधिकारियों को एक अलके में यह बता देगी कि पशु चोरी किस सीमा तक व्याप्त है।
दूसरे जिलों के पुलिस अधीक्षक अपने विवेकानुसार इस आदेश का विस्तार अपने जिले के सभी या किन्हीं थानों में कर सकते हैं।
(6) पारितोषिक न केवल पशुओं के चारों को गिरफ्तार कराने वालों या चोरी गये पशुओं को पुनर्प्राप्ति करने वालों को अपितु पशुओं के चोरों और उनके साथियों के निवास, प्रथाओं और मार्गों के बारे में लाभदायक सूचनायें देने वालों को भी मुक्त रूप से दिये जायें। इस मामले में ग्राम चौकीदारों को सहायता पहुँचाने के लिये, बुद्धिमत्तापूर्वक प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
(7) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 411, 412 और 414 के अन्तर्गत आने वाले पशुओं से सम्बन्धित सभी अपराध उन जिलों और थानों के द्वारा, जिसकी सीसाओं के भीतर चोरी को गई हो, रजिस्ट्रीकृत किये जायेंगे और विचारण के लिये भेजे जायेंगे। वहाँ अपराध चोरी की तरह रजिस्ट्रीकृत होंगे।
टीप- उत्तर प्रदेश के पुलिस अधीक्षक इस नियम का अनुसरण करने के लिए अन्य राज्यों की पुलिस से आग्रह नहीं करेंगे।
(8) उत्तर प्रदेश के थानेदार और मण्डल निरीक्षक, जिनका मण्डल पंजाब पुलिस मण्डल की सीमा पर हो, पंजाब मण्डल के थानागृह अधिकारियों और मण्डल निरीक्षकों से महीने में एक बार पशु चोरी और आपराधिक वर्ग के विशेष संदर्भ में सीमा की समस्याओं पर विचार करने की व्यवस्था करेंगे। हर बैठक में वे विचार किये गये विषय और प्रस्तावित कार्यवाही का एक संक्षिप्त अभिलेख बनायेंगे और इसको अधीक्षक के पास आदेश के लिए अग्रेषित करेंगे।
(9) उत्तर प्रदेश के निम्नलिखित जिलों के अधीक्षकों को पंजाब के निम्नलिखित जिलों के पुलिस अधीक्षकों को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के अधीन रजिस्ट्रीकृत उनके जिले की जन-जातियों के बारे में सूचित करना चाहिये। इसी के साथ ही उन्हें सम्बन्धित पंजाब के जिलों के अधीक्षकों से ऐसी सूचना देने के लिए कहना चाहिये:-
पंजाब उत्तर प्रदेश
गुडगाँव देहरादून
करनाल मेरठ
रोहतक सहारनपुर
अम्बाला मुरादाबाद
बुलन्दशहर
बिजनौर
मुजफ्फरनगर
182. एक दूसरे से टिप्पणियों की तुलना करके और थानों का निरीक्षण करके मण्डल निरीक्षकों की अपना यह समाधान करना चाहिये कि उनके मण्डल के प्रत्येक थाने के पशु चोरों की हिस्ट्री शीट, उस पशु चोर तथा अन्य थानों के पशु चोरों के बारे में सम्बन्ध दशांती है, जहाँ ऐसेः इण्मन्ध का पता लगाया जा सकता है। मण्डल निरीक्षक का यह एक मुख्य कर्तव्य है कि वह पशु चोरी का दमन करने में यह थानों के बीच सहयोग को प्रभावी बनाये।
पशुओं के आवारा हो जाने के सभी मामलों की रिपोर्ट ग्राम की पुलिस द्वारा थाने में की जानी चाहिये।
183. [निकाल दिया गया]
184. एक कान्सटेबिल को, जो यदि सम्भव हो तो साक्षर हो, हर पड़ोसी थाने से महत्वपूर्ण पशु मेलों और बाजरों में हाजिर रहने के लिये, पशुओं की बिक्री का सूक्ष्म परीक्षण करने, किसी पशु की बिक्री के बारे में जांच करने जिस पर वह चोरी किये गये होने का सन्देह करे और सामान्यतया पशु व्यापारियों, कसाइयों और अन्य क्रेताओं और विक्रेओं के चरित्र और ईमानदारी की जाँच करने के प्रयोजन से भेजा जावे। उसे अपने साथ थाने से पिछले 6 मास में चोरी गए पशुओं की एक सूची लाना चाहिये। इस सूची में पशु का जितना विस्तृत विवरण हो सके, सम्मिलित किया जावे और कान्सटेबिल को किसी चोरी गये पशु की बिक्री का पता लगाने की दृष्टि से सावधानीपूर्वक इन सूचियों को बेचे जा रहे पशुओं से तुलना करना चाहिये।
185. थानेदार का कत्र्तव्य होगा कि वह अपनी अधिकारिता के भीतर निजी पशु बाजार के स्वामियों द्वारा नियोजित रजिस्ट्रीकरण लिपिकों द्वारा रखे गये रजिस्टरों की नियतकालिक रूप से या तो स्वयं या हेड कान्सटेबिल से निम्न श्रेणी के न होने वाले किसी अधीनस्थ अधिकारी के द्वारा विशेषतया प्राधिकृत किये गये हेड कान्सटेबिल से निम्न पंक्ति न होने वाले किसी अधिकारी द्वारा भी जाँच की जा सकेगी। इन विनियमों के पैरा 183 के नियम दो (1), (2), (4) और (5) के अधीन नियुक्त रजिस्ट्रीकरण लिपिक का यह कर्तव्य होगा कि वह इस पैरा के द्वारा प्राधिकृत किए गये पुलिस अधिकारी को यह उसे वह अपराध के निवारण के सम्बन्ध में उसे देखना चाहता हो, अपने रजिस्टरों को मुख्य रूप से निरीक्षण करने देगा।