पैरा 129 से 146 अध्याय 12 UP पुलिस रेगुलेशन

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अध्याय 12

पंचायतनामा, शव परीक्षा और घायल व्यक्तियों का उपचार

129. दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 40 के अधीन किसी गाँव के चौकीदार से उसके गाँव या उसके निकट किसी अचानक या अप्राकृतिक मृत्यु या संदिग्ध परिस्थितियों के अधीन किसी मृत्यु की या गाँव में या उसके निकट ऐसी परिस्थितियों में, जो इस बात की युक्तियुक्त संदिग्धता प्रकट करे कि ऐसी मृत्यु कर कारित हुई है, किसी शब या शव के किसी भाग का पता चलने पर थाने में उसकी सूचना करने की अपेक्षा की जाती है।

जब ऐसी रिपोर्ट की जावे, तो दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 174 के अधीन अन्वेषण करने के लिये सशक्त पुलिस अधिकारी को इस धारा में उपदर्शित कार्यवाही तत्काल करना चाहिये।

130. [विलुप्त]

131. समस्त उपनिरीक्षक और ऐसे प्रधान कान्सटेबिल, और पुलिस अधीक्षक द्वारा विशेषतया चयन किये जावें, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 174 के अधीन जाँच करने के लिये स्थानीय सरकार द्वारा सशक्त किए गये हैं।

132. दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 174 के अधीन, अन्वेषक पुलिस द्वारा यदि संभव हो, शरीर को छुये जाने या हटाये जाने से पूर्व ही किया जाना चाहिये। मृत्यु समोक्षा रिपोर्ट प्रारूप क्र० 211 में होना चाहिये। उन मामलों में जिनमें यह संदेह न हो कि मृत्यु दुर्घटना या आत्महत्या के कारण हुई थी और जिनमें जाँच एक दिन में समाप्त हो गई हो, इस प्रारूप का दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 174 के अधीन मृत्यु समीक्षा रिपोर्ट और धारा 172 के अधीन विहित केस डायरी दोनों के रूप में प्रयोग किया जा सकेगा।

133. [विलुप्त]

134. जब मृत्यु किसी संज्ञेय अपराध के करने के कारण होना प्रतीत हो या संदेहित हो या जब किसी अन्य कारण से अन्वेषणकर्ता अधिकारी ऐसा करना इष्टकर समझे, वह शव को मृत्यु उपरांत परीक्षण के लिये भेजेगा, यदि मौसम की स्थिति और अन्तर बिता सड़क पर ऐसी सड़न का जोखिम उठाये जो परीक्षण की अनुपयोगी बना दे, उसके अग्रेषित करने की अनुज्ञा देते हैं।

135. सभी अशनाख्त शवों के उंगली चिह्न तलाशी चिट प्रारूपों में लिये जाना और फिंगर प्रिन्ट ब्यूरो की खोज के लिये भेज देना चाहिये; वैसे ही जहाँ मृत्यु किसी संज्ञेय अपराध करने के कारण होना प्रतीत हो या संदेहित हो और जहाँ सम्भाव्यता हो कि उंगली चिह्न तत्पश्चात् अपराध के स्थल पर पर पाये जाने पर, अन्वेषण में सारवान हो सकते हों, अशनाख्त (न पहचाने गये) शव के उंगली चिह्न तलाशी चिट पर लिये जाना चाहिये ताकि उनकी अपराध स्थल पर पाये जाने वाले चिह्नों से इसके पूर्व कि उनका उपयोग अपराधी की तलाश में समय नष्ट हो, तुलना की जा सके।

(1. 4 सु०को० केसेज 153.

2. 4 सु०फी० के० 122 सन् 1975

3. 1975 सु०को०के० 769.

4. 1977 क्रि००ज० ०12 सु०को० )

साधारणतया किसी शव को उँगलियों से चिह्न लेना बहुत कठिन नहीं है, लेकिन कभी-कभी उँगलियों की खाल इतनी संकुचित और झुर्रियाँयुक्त हो जाती हैं कि आशय निकलने योग्य छापे प्राप्त नहीं की जा सकती हैं। ऐसे मामले में मृत्यु उपरान्त परीक्षण कर रहे चिकित्सा अधिकारी से उँगलियों पर से खाल उतार लेने को कहना चाहिये। प्रत्येक टुकड़े को अलग मोहर बंद लिफाफे में उसके ऊपर उसमें होने वाली उँगली के चिह्न को अंकित करते हुये, स्थित करना चाहिये। वे लिफाफे जब फिंगर प्रिन्ट ब्यूरो को अभिमत के लिये भेज दिये जायें।

शव के उँगलियों को छापे सदैव उपनिरीक्षक की पंक्ति से कम न होने वाले अधिकारी के पर्यवेक्षण के अधीन ली जानी चाहिए और पर्यवेक्षणकर्ता अधिकारी तलाशी चिट अपने हस्ताक्षर द्वारा प्रमाणित करेगा कि चिह्न सही रूप से उसकी उपस्थिति में लिये हैं। पर्यवेक्षणकर्ता अधिकारी, सड़न की सभी पूर्व स्थितियों में या अन्यथा शरीर की दशाएँ, तलाशी चिट के अभियुक्तियों के खाने में अंकित करेगा।

135-. जब कोई शव पुलिस द्वारा प्राप्त किया जावे जिस पर न तो कोई दावा करता हो और न जिसे पहचाना जा सके, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 174 के अधीन अन्वेषण करने वाला पुलिस * अधिकारी उसके पता लगने का अधिक से अधिक व्यापक प्रचार इस दृष्टिकोण से कि शव को पहचान लिया जाये और मृतक के सम्बन्धियों, मित्रों, परिचितों का पता लगाने के लिये, जिनको शय के संस्कार के लिये सौंपा जा सके, करेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा प्रचार ढोल बजाकर किया जावेगा और नगरीय क्षेत्रों में पुलिस स्थानीय प्रेसर, यदि कोई हो तो प्रसारण केन्द्र और स्वयंसेवी संगठनों यथा सेवा समिति, की सहायता भी ले सकती है।

जाँच कर रहा कोई पुलिस अधिकारी, जहाँ तक सम्भव हो, उस धर्म का सही रूप से सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा जिसका अनुयायी मृतक हो ताकि शव का निपटारा (संस्कार), यदि अन्ततः वह आवश्यक हो, उस धर्म की रूड़ियों और रीतियों के अनुसार किया जा सके, जिसका मृतक अनुयायी रहा हो। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सम्बन्धित अधिकारी, अन्य जाँच करने के अतिरिक्त, शव को यह देखने की सावधानीपूर्वक परीक्षा करेगा कि क्या उस पर ऐसे कोई विशिष्ट लक्षण हैं जो उसकी पहचान की स्थापित करने में सहायक सिद्ध हों और जनरल डायरी तथा मृत्यु समीक्षा रिपोर्ट में इस आशय की प्रविष्टि करेगा।

यदि सम्यक् प्रचार के बाद भी शव पर किसी का दावा न किया जावे, जिले का पुलिस अधीक्षक उसे मेडिकल कालेज को उसी के व्यय से किये जाने वाले शरीर रचना की परीक्षा और चीर-फाड़ के प्रयोजन के लिये संपि देगा। ऐसे महाविद्यालय का भारसाधक अधिकारी पुलिस अधीक्षक को इस आशय का प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करेगा कि परीक्षण और चीर-फाड़ के पश्चात् शव का संस्कार उस धर्म की रूड़ियों और रीतियों के अनुसार कर दिया गया है, जिसका अनुयायी मृतक था।

136. अन्वेषणकर्ता अधिकारी द्वारा मृत शरीर या आहत व्यक्तियों की परीक्षा करने में चिकित्सा अधिकारी की सहायता करने के लिये निम्न पग उठाये जायेंगे-

(1) विष देने के संदिग्ध मामले में:-

() निम्नलिखित पदार्थ और वस्तुएँ इकट्ठी की जायें और पैरा 139 में यथाविहित रीति से उनसे व्यवहार किया जावे:-

(1) कोई ऐसा खाद्य या पेय जिसे व्यक्ति ने लिया हो, जिसे विष दिया जाना माना जा रहा हो।

(2) उल्टी किया हुआ कोई पदार्थ जो शरीर पर या बिस्तर में पाय जावे, जिसे चिथड़े की सहायता से सावधानी से पोंछ कर इकट्ठा किया जाये।

(3) कोई ऐसा कपड़ा, बिछावन, लकड़ी या कीचड़ या अन्य पदार्थ जिसमें की गई वस्तु सोख ली गई हो।

(4) किसी बर्तन में उल्टी किया गया पदार्थ अन्तर्विष्ट वस्तु इसे सावधानीपूर्वक बोतल में रख लिया जावे।

(5) शव दाह हो जाने की दशा में, चिता को भस्म ।

() निम्नलिखित आठ बिन्दुओं पर यथासम्भव शीघ्र जानकारी निकाली जावे और उसे क्रमबद्ध रूप से डायरी में प्रविष्ट किया जावे :-

(1) वह अन्तर जिसमें उस व्यक्ति को जिसे विष दिया जाना माना जा रहा हो, कोई वस्तु खाई या पी या कोई औषधि ली तथा विष दाम के लक्षण पहली बार प्रकट हुए।

(2) उन समयों के बीच का अन्तर जब उस व्यक्ति द्वारा कोई वस्तु अन्तिम बार खाई या औषधि पाई गई जब उसकी मृत्यु घटित हुई (यदि मृत्यु हो गई हो तो)

(3) क्या वह व्यक्ति उस स्थान से चला था, जहाँ प्रथम बार लक्षण प्रकट हुये थे, यदि हाँ, तो वह कितनी दूर गया?

(4) विषदान के प्रारम्भिक लक्षण क्या थे?

(5) क्या उल्टी या दस्त हुये थे?

(6) क्या व्यक्ति सो गया था उनींदा हो गया था?

(7) क्या वहाँ उल्टी हुई थी?

(8) ध्यान में आये अन्य कोई लक्षण।

जब पदार्थ विश्लेषण के लिये भेजे जावें तो रासायनिक परीक्षक के मार्ग दर्शन के लिये निम्न प्रारूप में मामले के तथ्यों का संक्षिप्त विवरण, मनुष्य को दिये गये विष के संदेहित मामलों में, दिये जायें:

(1) रोगी का नाम, लिंग और आयु।

(2) अंतिम बार लिये गये भोजन की प्रकृति ।

(3) इस भोजन के कितने समय के पश्चात् विषदान के लक्षण प्रारम्भ हुए?

(4) क्या वह व्यक्ति उस स्थान से, जहाँ वह अस्वस्थ हुआ, चलकर गया? यदि हाँ, तो कितनी दूर?

(5) क्या रोगी ने दर्द या बेचैनी की कोई शिकायत की थी?

(6) क्या उसे दस्त लगे थे?

(7) क्या उसे उल्टी हुई थी?

(8) क्या रोगी बेसुध हो गया था? यदि हाँ, तो लक्षण प्रकट होने के किर्तनी देर बाद ऐसा हुआ?

(9) क्या दोगी का सिर चकरा रहा था तो यह मुरझाया हुआ था?

(10) क्या मांसपेशियों में ऐंठन या चटक हुई थी?

(11) क्या रोगी ने खाल या गले में सनसनी होने की शिकायत की थी?

(12) क्या रोगी होश हवास में या मूर्खतापूर्ण रूप से बातें कर रहा था?

(13) क्या रोगी ने भूमि या बिस्तर पर से कोई वस्तु उठाई

(14) क्या कोई उपचार अपनाया गया? यदि, हाँ तो उसका स्वरूप क्या था?

(15) क्या मृत्यु घटित हुई, यदि हाँ तो अस्वस्थता प्रारम्भ होने के कितनें देर बाद?

(16) कौन सा विष उपयोग किया गया माना जाता है?

उपरोक्त बिन्दुओं पर सूचना जिला मजिस्ट्रेट को, पश्चात्वर्ती अधिकारी द्वारा पदार्थ की रासायनिक विश्लेषक के पास भेजने के पूर्व, दी जाये।

137. इन विनियमों के परिशिष्ट पाँच में गिनाये गये स्थानों के सिवाय वे सभी शव जिले के मुख्यालय को भेजे जायेंगे, जिनका परीक्षण अपेक्षित हो।

138. सरकारी रेलवे पुलिस द्वारा जिले के मुख्यालय को परीक्षण के लिवे भेजे गये शरीर की दशा में, यह सम्बन्धित जिले के पुलिस अधीक्षक पर निर्भर रहेगा कि वह यह निर्णय करे कि क्या मृत्यु उपरान्त परीक्षण वास्तव में आवश्यक है।

139. जब शव उपरान्त परीक्षण के लिये भेजा जावे, निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाएंगी :-

(1) शरीर की खोल के भीतर उसी अवस्था में लिटाया जावेगा जिसमें वह पाई गई थी। सड़न को विलम्बित करने की आशा से उस पर कोई पदार्थ न लगाया जाये।

(2) शरीर के साथ एक पुलिस कान्सटेबिल और चौकीदार रहेगा। यदि थाना चिकित्सा अधिकारी से 20 मील से अधिक के अन्तर पर हो, चौकीदार और कान्सटेबिल को एक या अधिक थानों पर मुक्त कर दिया जावे; किन्तु सहायताओं की संख्या जितनी कम सम्भव हो सके, उतनी लेना चाहिये।

(3) पुलिस प्रारूप क्र० 13 33 में कान्सटेबिल और चौकीदार के तथा मुक्त करने वाले कान्सटेबिल और चौकीदार के, यदि कोई हो, नाम सदैव ही प्रविष्ट किये जायेंगे।

(4) शरीर के साथ जा रहे कान्सटेबिल और थाने के स्थायी अग्रिम से, कुलियों आदि तथा अन्य आवश्यक व्ययों की पूर्ति के लिये पर्याप्त धनराशि और मुख्यालय पर उस धन को प्राप्ति के लिए प्रारूप क्र० 13 में एक चेक दिया जाना चाहिये, यदि शरीर वहाँ भेजा गया हो।

(5) भेजने वाले अधिकारी द्वारा कान्सटेबिल को अनुदेशित किया जावे कि वह सामान्य अपेक्षा के सहित शरीर को चिकित्सा अधिकारी को सौंप दे, वह तब तक शरीर के प्रभार में रहेगा, जब तक कि चिकित्सा अधिकारी द्वारा परीक्षण पूर्ण न कर लिया जावे और किसी रिश्तेदार के न होने की दशा में मृतक के अवशेषों का निपटारा न ही जावे।

(6) अन्वेषक अधिकारी दो प्रतियों में शरीर की वर्णनात्मक नामावली अभिज्ञान (पहचान) के चोटों से निम्न विशिष्ट लक्षणों को अन्तर्विष्ट करते हुये, जो शरीर प्रकट हों, तैयार करेगा। यह इस नामावली की एक प्रति शरीर के साथ जाने वाले कान्सटेबिल को दे देगा और दूसरी प्रति मुख्यालय के भारसाधक अधिकारी को डाक द्वारा भेजेगा।

(7) इस विवरणात्मक नामावली के साथ ही शरीर के साथ प्रारूप क्रमांक 13 में एक विवरण भी भेजा जायेगा जिसे अधिकतम सतर्कता से तैयार करेगा। जहाँ से शरीर मुख्यालय को, या किसी अन्य स्थान को जहाँ अंग्रेजी पुलिस कार्यालय हो, प्रारूप 13 में अंग्रेजों में भी एक विवरण कार्यालय द्वारा प्रारूप 33 में मृत्यु उपरान्त परीक्षण किये जाने की अपेक्षा के साथ चिकित्सा अधिकारी को अग्रेषित किया जावेगा और अन्वेषक अधिकारी को शरीर की प्रकट स्थिति और मृत्यु के कारण पर, जहाँ तक अन्वेषक अधिकारों उसे सुनिश्चित करन में समर्थ हुआ हो, रिपोर्ट का संविस्तार अनुबाद भी भेजा जावेगा।

140. जब कोई पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को चिकित्सा अधिकारी द्वारा परीक्षण करने के लिये भेजे, उसे ऐसे परीक्षण के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से व्याख्या किया जाना विशेष कारणों से वांछनीय न हो. पुलिस अधीक्षकों को यथासम्भव चिकित्सा अधिकारी के पास अनावश्यक रूप से भेजे जाने वाले मामलों को रोकने के लिए पग उठाना पड़ेगा।

141. जब सिविल सर्जन को कोई वस्तु या पदार्थ परीक्षण के लिये भेजा जाये, लोक अभियोजक उससे सीधे पत्र व्यवहार करेगा।

142. (1) अपराध से सम्बद्ध वे सभी वस्तुयें और पदार्थ जो विचारण के लिए अपेक्षित हो अन्वेषक अधिकारी द्वारा लोक अभियोजक को बीजक के साथ भेजना चाहिये, जो पार्सल की प्राप्ति के बीजक पर हस्ताक्षर करेगा और अपने रजिस्टर में इसको प्रविष्टि करेगा। बोजक को उस कान्सटेबिल का नाम दर्शाना चाहिये जो मोहरबन्द लिफाफा (या गठरी) लाया हो। प्रदर्श करने वाली वस्तुओं के संलग्न लेबिल जिन्हें बाद में रक विश्लेषण के लिए भेजा जाना हो, प्रदर्श वस्तुओं के साथ आटे को लेई से चिपकाई जावे, गोंद से नहीं।

(2) यदि वस्तु का कोई चिकित्सकीय या रासायनिक परीक्षण अपेक्षित न हो, लोक अभियोजक को उसे अपने पास रखना चाहिये।

(3) यदि सिविल सर्जन या रासायनिक परीक्षक द्वारा परीक्षण करना आवश्यक हो, तो लोफ अभियोजक सिविल सर्जन को, उससे परीक्षण करने का निवेदन करते हुये उसको अपने पत्र के साथ भेजेगा। सिविल सर्जन को मामले के पूरे विवरण से सूचित किया जावे, क्योंकि रासायनिक परीक्षक य सरकारी रक्त विशेषज्ञ को भेजे जाने वाली वस्तुओं के साथ पूरे चिकित्सकीय और वैधानिक वृत्तान्त भेजे जाना चाहिये। उसे यह भी सूचित किया जावे कि क्या रक्त समूह परीक्षा (ग्रुप-टेस्ट) अपेक्षित है।

लोक अभियोजक द्वारा उससे ऐसा करने को तब तक न कहा जाये, जब तक कि मामले के लिए वह वास्तव में अति आवश्यक न हो। लोक अभियोजक उसे अभिकर्ता (एजेन्सी) का नाम अंकित करेगा जिसके द्वारा पार्सल भेजी जाये और उसके लिए सिविल सर्जन को रसीद प्राप्त करेगा।

(4) पार्सल की प्राप्ति पर सिविल सर्जन उसे खोलेगा और उसमें अन्तर्विष्ट वस्तुओं का निरीक्षण करेगा। यदि वह पाये कि उनका परीक्षण कर सकता है, ऐसा करेगा और जब तक कि उसमें संतापकारी वस्तुओं यथा पेट से निकले हुये पदार्थ, उल्टी या चिपचिपी वस्तुओं का समावेश न हो यह उन्हें अपनी परीक्षा रिपोर्ट के साथ लोक अभियोजक कौ लौटा देगा, जो रिपोर्ट और यदि लौटाई गई हो तो पार्सल में समाविष्ट वस्तुाएँ ऱ्यायालय द्वारा ऐसा किये जाने की अपेक्षा किए जाने पर प्रस्तुत करेगा। यदि अन्तर्विष्ट वस्तुओं की प्रकृति ऐसी हो कि रासायनिक विश्लेषण वांछनीय हो, सिविल सर्जन न्यायालय को इस आशय की सूचना देगा और जब तक न्यायालय से आदेश प्राप्त न हों, अन्तर्विष्ट वस्तुओं को नहीं लौटा देगा।

(5) न्यायालय से अन्तर्विष्ट वस्तुओं को रासायनिक परीक्षक को भेजे जाने की अपेक्षा करते हुये आदेश प्राप्त हो जाने पर सिविल सर्जन मेडिकल मैनुअल के पन्द्रहवें अध्ययन में निर्धारित रीति से अग्रसर होगा।

(6) यदि न्यायालय का यह विचार हो कि यह रासायनिक परीक्षक द्वारा परीक्षण किया जाना आवश्यक नहीं है, सिविल सर्जन पार्सल को न्यायालय को निपटारे के लिए, न्यायालय से उसकी रसीद प्राप्त करते हुये, भेज देगा।

जब तक चिकित्सा विश्लेषण विचाराधीन रहे, संतापकारी वस्तुओं का अभिरक्षक सिविल सर्जन होगा। जब एक बार विश्लेषण हो जायें तथा रिपोर्ट और पदार्थ न्यायालय में प्रस्तुत कर दिये जावें, पुलिस को प्रदर्श वस्तुओं का प्रभार ले लेना चाहिये, जिन्हें मालखाने में रखा जावे।

143. यदि उनकी चोटें बहुत गम्भीर और खतरनाक हों तथा वे यात्रा सहन करने में समर्थ हों, आहत व्यक्तियों को मुख्यालय में या कुछ जिलों के परिशिष्ट 5 में दर्शाये गये स्थानों पर, अन्यथा जिन्हें, यदि कोई निकटतर हो मुफ्फसिल के औषधालय में ले जाया जावे। यदि आहत व्यक्ति को जिले के मुख्यालय पर या किसी ऐसे स्थान पर, जहाँ पुलिस का अंग्रेजी कार्यालय हो ले जाया जावे तो प्रारूप क्र० 34 वहाँ तैयार किया जावेगा अन्यथा थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा प्रारूप 34-ए तैयार किया जावेगा।

बड़े कस्बे में पुलिस अधीक्षक वह मार्ग विहित करेगा, जिसका अनुसरण मुर्दाघर को शव ले जाने में किया जाना हो, जिले के सभी पुलिस थानों में इन आदेशों की एक प्रति रखी जावे।

143-. जब कोई चिकित्सकीय विधिक मामला किसी दूरस्थ औषधालय में लाया जावे, उस औषधालय के चिकित्सा अधिकारी का प्रारिम्भक सहायता उपलब्ध कराना चाहिये और यह निर्णय करना चाहिये कि क्या यह मामला सदर अस्पताल को अन्तरित किये जाने योग्य है या उस दूरस्थ औषधालय में अपेक्षित इलाज उपलब्ध है। पहली दशा में, चिकित्सा अधिकारी मार्ग रक्षी भारसाधक पुलिस अधिकारी को परिवहन के सबसे तेज उपलब्ध साधन के द्वारा सदर चिकित्सालय को ले जाने का परामर्श देगा और रोगी को यहाँ आवश्यक इलाज किया जावेगा।

144. (1) चिकित्सा अधिकारी तीन प्रतियों में चोटों की अथवा मृत्यु उपरान्त परीक्षा की रिपोर्ट तैयार करेगा। रिपोर्ट की मूल प्रति साधारण माध्यम से पुलिस अधीक्षक को अग्रेषित कर दी जावेगी, दूसरी प्रति आहत या मृतक के साथ आने वाले कान्सटेबिल को मोहरबन्द लिफाफे में दे दी जावेगी और तीसरी प्रति चिकित्सा अधिकारी द्वारा कार्यालयीन प्रति के रूप में अपने पास रख ली जावेगी

(2) यदि अन्वेषण वे मध्य, चोटों की या मरणोपरान्त परीक्षा की रिपोर्ट से सम्बन्धित किन्हीं बिन्दुओं पर सूचना प्राप्त करना आवश्यक हो जावे, पुलिस अधीक्षक के उपनिरीक्षक से कम की पंक्ति के न होने वाले किसी अधिकारी को लिखित आवेदन-पत्र के साथ चिकित्सा अधिकारी के पास आने और ऐसी सूचना प्राप्त करने के लिये प्रतिनियुक्त कर सकता है। चिकित्सा अधिकारी ऐसी सूचना देगा और ऐसे उत्तरों का अभिलेख रखेगा।

145. शव को ले जाने के लिये एक खोल और आहत व्यक्ति को ले जाने के लिये एक बन्द स्ट्रेचर प्रत्येक थाने में रेलवे के पुलिस थानों सहित, उपलब्ध कराया गया है। शवों के लिये काम में आने वाले खोलों का उपयोग आहत व्यक्तियों को ले जाने के लिये कभी नहीं किया जाना चाहिये।

ढका हुआ स्ट्रेचर सामान्य रीति से संलग्न दुली खम्भों से युक्त देशी चारपाई ही होता है, और खम्भों के ऊपर छाया के लिये कम्बल डाल दिया जाता है।

146. किसी व्यक्ति को चिकित्सा परीक्षण के लिये उसकी इच्छा के विरुद्ध पुलिस द्वारा न भेजा जा सकेगा। पुलिस के मामले में यदि कोई महिला पुलिस चिकित्सक द्वारा परीक्षण कराने से इन्कार करे तो स्थानीय डफरिन चिकित्सालय की भारसाधक महिला चिकित्सक के पास भेजा जावेगा, जो उसका व्यक्तिशः परीक्षण करेगी और यदि तथा जब ऐसा करने की अपेक्षा की जावे न्यायालय में साक्ष्य देगी। मेडिकल मैनुअल के पैरा 422 के प्रयोजन के लिये यह कार्य उसके नियमित कर्त्तव्यों का अंग होगा और महिला चिकित्सक को इस कार्य के लिये कोई शुल्क प्राप्त करने का हक नहीं होगा, तथापि वह मेडिकल मैनुअल के पैरा 741 के अनुसार स्वीकार्य यात्रा और विश्राम भत्ता, साक्ष्य देने के लिए जाते समय प्राप्त करने की अधिकारी होगी

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