
अध्याय 11
अनुसंधान
104. जब किसी संज्ञेय अपराध की इत्तिला प्राप्त हुई हो, जब थाने के भारसाधक अधिकारी को यह विनिश्चय करना चाहिए कि क्या अन्वेषण वांछनीय है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 (1) (ख) के द्वारा दिए गए विवेक का प्रयोग करने में, उसे उस पर विचार करना चाहिए कि क्या मामला आपराधिक न्यायालय की अपेक्षा सिविल का और क्या प्रशासन के हित से पुलिस द्वारा कार्यवाही आवश्यक यां कानून और व्यवस्था बनाये रखने के लिए इष्टकर है।
कोई अन्वेषण नहीं किया जाना चाहिए, यदि परिवाद की विषयवस्तु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 95 की परिधि में जाने वाली प्रतीत हो या परिवादी द्वारा कोई तकनीकी अपराध खड़ा किया जाना या किसी विवाद का अभियोजन करने में पुलिस सहायता प्राप्त करने के लिए किसी क्षुद्र झगड़े को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाना प्रतीत हो।
किसी विशिष्ट मामले में पुलिस अधीक्षक के आदेश या किसी विशिष्ट क्षेत्र में अपराध के किसी विशिष्ट वर्ग के लिये उप महानिरीक्षक की सहमति के सिवाय, निम्नलिखित परिस्थितियों में कोई अन्वेषण नहीं किया जाना चाहिये:-
(1) नगण्य चोरी और सेंध लगाने के मामले में; जब तक कि यह विश्वास करने का कारण न हो कि उससे कोई पेशेवर अपराधी सम्बन्धित है या अपराधी पकड़ न लिया गया हो, जिसके अभियोजन के लिए परिवादी इच्छुक हो।
(2) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 और 325 के मामलों में।
(3) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 147 के अधीन मामले में घोर उपहति (गम्भीर चोट) म पहुँची हो या और आगे प्रशान्ति भंग किए जाने का खतरा न हो।
(4) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 341 से 344 (जब तक कि अवरोध उस समय तक जारी न रहे, जबकि रिपोर्ट की जावे), 354, 447 और 448 के अधीन मामलों में।
(5) भारतीय दण्ड संहिता की धारा 406 और 420 के अधीन मामलों में, जहाँ इस बात की प्रथम दृष्ट्या साक्ष्य है कि मामला सिविल स्वरूप का है।
नोट-घातक आयुध से पहुँचाई गई उपहति के मामलों में, थाने के भारसाधक अधिकारी को पह विचार करना चाहिए कि क्या परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 और 308 के अधीन मामले के रजिस्ट्रीकरण को उचित ठहराती है। इन दोनों धाराओं के अधीन रजिस्ट्रीकृत मामलों के अनुक्रम में ही तत्परता से, पुलिस अधीक्षक के आदेशों या चिकित्सा अधिकारी की रिपोर्ट की प्रतीक्षा किये बिना, अन्वेषण किया जाना चाहिए।
105. जब कभी थाने का भारसाधक अधिकारी यह निर्णय करे कि किसी अज्ञेय अपराध का अन्वेषण नहीं किया जायेगा, उसे दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 के उपबन्धों की पालना करने के लिए, प्रथम सूचना रिपोर्ट की मूल और तीसरी पर्त पर मामले का अन्वेषण न करने के कारणों का प्रविष्टि करना चाहिये। उसे दूसरी पर्त पर, जो रिपोर्ट करने वाले को दी जायेगी, यह तथ्य अंकित करना चाहिये कि कोई अन्वेषण नहीं किया जावेगा। जब वह, पैरा 104 (3) वर्ग में गिनाए गए किसी अपराध का, अधीक्षक की आज्ञा से अन्यथा, अन्वेषण करे या न करने का आदेश दे, उसे जनरल डायरी में ऐसा करने के कारण अभिलिखित करना चाहिए।
106. दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 (1) (2) के अन्तर्गत आने वाले मामलों के सिवाय अन्वेषण को साधारणतया स्थल पर ही किया और पूर्ण किया जाना चाहिए। यदि घटना का स्थल, जैसा कस्बों में होता है, थानों के निकट हो और मामला 157 के (1) (क) के अधीन न आता हो, अन्वेषणकर्ता अधिकारी स्थल का परिदर्शन करने और थाने में लौट आने के पश्चात् पूर्ण कर सकेगा।
किसी संगीन मामले का अन्वेषण करने के लिए प्रस्थान कर रहे किसी पुलिस अधिकारी को प्रथम उपलब्ध ट्रेन द्वारा, चाहे वह यात्री गाड़ी हो या मालगाड़ी, से यात्रा करने की रेलवे प्राधिकारियों द्वारा अनुज्ञा दी जावेगी, किन्तु वह उसे प्रक्रम के बाहर रोक नहीं सकेगा।
(1. ए०आई०आर० 1955 सु०को० 196.
2. ए०आई० आर० 1963 कलकत्ता 191.
3. ए०आई०आर० 1959 इलाहाबाद 337.
4. ए०आई०आर० 1961 मु०को० 1117.
5. 1961 (2) क्रि०ला०ज० 161. )
107. अन्वेषण अधिकारी को अपने को साक्ष्य अभिलिखित करने वाला लिपिक मात्र नहीं मानना चाहिए। यह उसका कर्तव्य है कि वह देखे और अनुमान करे। हर मामले में अपराध के घटना स्थल और सामान्य परिस्थितियों को अपने विशेष ज्ञान से साक्षियों की साक्ष्य की जाँच करने में उपयोग करेगा और वह हर मामले में जिसमें अपराधी अज्ञात हो, वह उस दिशा को विनिश्चित करेगा जिसमें वह उसको खोजेगा। उसे, उनके हाथ के कार्यों को पहचानने की दृष्टि से स्थानीय अपराधियों की कार्य-रीतियों को जो स्थानीय पुलिस के ज्ञात रहती हैं, अध्ययन करना चाहिए और साक्षियों और परिवादी के उन सन्देहों को मानने के विरुद्ध सतर्क रहना चाहिए, जो तथ्यों से निकलने वाले प्रकट अनुमानों के विपरीत हो। उसे स्मरण रखना चाहिए कि सत्यता का पता चलाना उसका कर्तव्य है, केवल दोषसिद्धि प्राप्त करना नहीं। उनमें, उसे किसी व्यक्ति के पक्ष में या उसके विरुद्ध तथ्यों के बारे में कोई दृष्टिकोण नहीं बना लेना चाहिए और यद्यपि उसे ऐसे मामले में जिसमें उसे यह विश्वास करने के समाधानकारक कारण हो कि अभियुक्त दोषी हैं, मार्ग से हटकर, बचाव पक्ष के लिए साक्ष्य नहीं खोजना चाहिए, किन्तु उसे अपने समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए अभियुक्त को सदैव ही अवसर, देना चाहिए और यदि प्रस्तुत की जावे तो ऐसी साक्ष्य पर सावधानी से विचार करना चाहिए। सेन्ध लगाने के मामलों में उक्त विषय पर दिये गये विशेष आदेशों के अनुसार अन्वेषण किया जावे।
108. अन्वेषणकर्ता अधिकारी का पहला पग, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 172 के द्वारा विहित की गई, केस डायरी में उस प्रथम सूचना रिपोर्ट, जिस पर वह कार्य करे, प्राप्त करने का समय और स्थान अभिलिखित करना है तथा उसमें प्रथम इत्तिला रिपोर्ट की प्रतिलिपि करना चाहिए। अन्वेषण करते समय उसे डायरी में वे स्थान और समय, जब और जहां से उसने अन्वेषण प्रारम्भ किया हो, अंकित करना चाहिए। तब इसे आरोपित अपराध के स्थान का निरीक्षण करना चाहिए और परिवादी तथा अन्य व्यक्तियों से जो परिस्थितियों पर प्रकाश डालने में समर्थ हों, प्रश्न करना चाहिए। अन्वेषण के प्रारम्भिक प्रक्रम में उस ग्राम अपराध की नोट बुक को, उसमें अभिलिखित किसी ऐसे विषय को. जानने के लिए जो मामले पर कोई प्रभाव डाल सकता हो, देखना चाहिए।
109. केस डायरी में, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 172 द्वारा विशिष्टियाँ इतने पर्याप्त विस्तार से होना चाहिए जिससे पर्ववेक्षण प्राधिकारी तथ्यों को समझ सके। परिवादी के प्रथम इत्तिला रिपोर्ट से कचन की भिन्नता और पूरक कथनों के सार, यदि कोई हों, अभिलिखित किये जावें। अन्वेषणकर्ता अधिकारी इस बात के लिये आबद्ध नहीं है कि वह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अधीन अपने सक्षम साक्षियों के परीक्षण के प्रक्रम में किसी कथन को लिखे, परन्तु वह ऐसा करे, वह हर उस व्यक्ति के कथन का अलग अभिलेख तैयार करेगा जिसका कथन वह अभिलिखित करे, कथन प्रथम प्रारूप के रूप में लिखे जावेंगे और उसमें ऐसे विवरण रहेंगे जिनका मामले के अभियोजन में लाभदायक होना सम्भाव्य हो।
विधि का यह विचार है कि कथन, यदि अभिलिखित किए जायें तो पृथक ही लिखे जावें । अतः यह विधि की पर्याप्त पालना नहीं होगी कि केवल इतना लिखा जावे कि किसी साक्षी ने परिवादी का या दूसरे साक्षी का सारवान रूप से समर्थन किया है और इस प्रकार के वाक्यांशों से बचा जावे।
तथापि अभियुक्त का कथन पूरा-पूरा अभिलिखित किया जाना चाहिए। अब उस दिन के लिए अन्वेषण बन्द कर दिया जावे, बन्द करने का समय और स्थान लिखा जाना चाहिये और पूरे अन्वेषण के दौरान, ऐसे दिन के लिए जब कोई कार्यवाही की जावे, अधीक्षक को प्रति दिन डायरी भेजना चाहिए। यदि अन्वेषक अधिकारी स्वयं थाने का भारसाधक अधिकारी न हो, सिवाय तब के जब उससे विलम्ब हो, डायरी भारसाधक अधिकारी के माध्यम से भेजी जावे। यदि एक से अधिक अधिकारी एक ही मामले का एक समय में स्वतन्त्र रूप से अन्वेषण कर रहे हों तो हर एक को पृथक डायरी रखना चाहिए। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 172 और 173 का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जावे। नगण्य मामलों में साधारण तया बहुत छोटी डायरी पर्याप्त होगी।
110. कार्यवाही का वह प्रक्रम उसी के विवेक पर छोड़ दिया गया है जिस पर अन्वेषक अधिकारी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 4 के अधीन संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार करे। वह संदिग्ध व्यक्ति पर दृष्टि रख सकता है, परन्तु न तो बिना गिरफ्तार किए वह उसके चलने-फिरने पर कोई निबन्ध लगा सकता है और न उसे साक्षी के रूप में हाजिर रहने के लिए विवश कर सकता है।
111. वह पुलिस अधिकारी जो दण्ड प्रक्रिया संहिता या अन्य किसी विधि के अधीन, तलाशी संचालित करने वाला हो, उस स्थान के, जिसमें तलाशी ली जानी है, प्रवेश करने से पहले, अधिशासी या अधिभोगी का और दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के अधीन बुलाए गए साक्षियों का यह समाधान कर देगा कि उसके या तलाशी दल के किसी सदस्य के पास सूचना देने वाले को, यदि उपस्थित हो, सम्मिलित करते हुए, शरीर पर छुपी हुई फैसा सकने वाला कोई वस्तु नहीं है। किसी सूचना देने वाले व्यक्ति को तलाशी ली जाने वाले स्थान में जाने को अनुमति नहीं दी जायेगी, जब तक कि उसकी सहायता को छोड़ सकना असंभव न हो। आयुध अधिनियम, आबकारी अधिनियम, अफीम अनिनियम (1878 का पहला) की धारा 19 तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन तलाशियाँ दिन या रात में की जा सकती हैं। (साल्ट एक्ट 1882 का बारहवाँ) तथा अफीम अधिनियम (1878 का पहला) की धारा 14 के अधीन तलाशियाँ केवल दिन में ही ली जायेंगी।
112. उन व्यक्तियों को जिनसे पुलिस पूछ-ताछ करे अनावश्यक रूप से तंग या निरुद्ध न किया जावे। यदि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 100 या 160 के अधीन समन किया गया व्यक्ति यह निवेदन करे कि उसकी हाजिरी का समय अभिलेख पर लाया जावे, तो आवेषक अधिकारी उसकी पूर्ति आर्डर फार्म नंबर 7 के पर्ण और प्रति पर्ण (पर्त और प्रतिपर्त पर प्रविष्ट करके करेगा)।
113. वे जाँचे, जिसमें लोक सेवक या रेल कर्मचारी, अभियुक्त या साक्षी के रूप में संबंधित हो, इस प्रकार संचालित की जावें कि उनके कार्यालयीन कर्तव्य में न्यूनतम हस्तक्षेप हों। यद्यपि, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 66 पुलिस अधिकारी को बाध्य नहीं करती कि वह धारा 107 के अधीन जब साक्षी के रूप में न्यायालय में उसकी उपस्थिति की या धारा 162 के अधीन पुलिस के समक्ष परीक्षण के लिए हाजिर होने की अपेक्षा करे, उसके वरिष्ठ अधिकारी को नोटिस दे, ऐसा नोटिस, जब संभव हो दिया जाना चाहिए और रेलवे या किसी लोक सेवक से, अन्वेषण के प्रयोजन के लिए अपने कर्तव्यों को छोड़ देने की अपेक्षा नहीं करना चाहिए जब तक कि उसको मुक्त करने की व्यवस्था के लिए दूसरे वरिष्ठ अधिकारी को युक्तियुक्त अवसर न प्रदान कर दिया गया हो।
पुलिस अधिकारियों को उनकी हाजिरी के लिये नियत किये गये दिन को, न्यायालय में हाजिर रहना चाहिये। न्यायालय से अनुपस्थिति को सरलता से न लिया जावे। न्यायालय में हाजिर होने के लिये अपने अधीनस्थों को अनुमति देने वाले नियंत्रक अधिकारियों को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिये कि समन्स सुनवाई की तारीख से काफी समय पहले लौटा दिये जावें। पुलिस अधीक्षक एक रजिस्टर बनाये रखेगा, जिसमें वह उन अधिकारियों के नाम प्रविष्ट करेगा, जो सुनवाई के लिये नियत की गई तारीखों पर हाजिर न हुए हों। यह नाम न्यायालय से प्राप्त की गई रिपोर्ट के आधार पर लिखे जायेंगे। पुलिस अधीक्षक तत्काल त्रुटिकर्ता अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगेगा और ऐसी शिकायत की प्राप्ति से 15 दिन के भीतर प्राप्त स्पष्टीकरण की एक प्रति सम्बन्धित न्यायालय को देगा। यदि इस अवधि में स्पष्टीकरण न भेजा जावे, वह न्यायालय इस विषय की रिपोर्ट आवश्यक कार्यवाही के लिये जिला मजिस्ट्रेट को भेजेगा। वार्षिक अभ्युक्तियाँ (रिमार्क) अभिलिखित करते समय इस रजिस्टर को प्रविष्टियों को ध्यान में रखा जावे। अपने निरीक्षण के समय इस रजिस्टर का परीक्षण करना पुलिस उप-महानिरीक्षक का कर्तव्य होगा।
114. वध, डकैती या महत्वपूर्ण सेंध लगाने के मामले और ऐसे अन्य मामले में, जहाँ नक्शे द्वारा न्यायालय या पर्यवेक्षक पुलिस अधिकारी को तथ्यों के समझने में सहायता प्राप्त हो सकती हो, अन्वेषक अधिकारी द्वारा घटना स्थल का एक नक्शा तैयार किया जावेगा। यदि अन्वेषक अधिकारी नक्शे को आवश्यक शुद्धता से तैयार करने में असमर्थ हो, तो बदि संभव हो, उसे वह पटवारी से बनवा लेना चाहिए। नक्शे को सदैव उसके बनाने वाले द्वारा हस्ताक्षरित किया जाना चाहिये।
115: ऐसे मामले के अवपक अधिकारी को जिसमें कोई व्यक्ति इतने गम्भीर रूप से घायल हुआ हो कि चिकित्सालय पहुँचने के पूर्व ही उसकी मृत्यु सम्भाव्य हो, जहाँ मरणासन्न घोषणा अधिलिखित की जा सके, उसे तत्काल स्वयं उसकी घोषणा दो सम्मानित साक्षियों की उपस्थिति में, और घोषणा के नीचे घोषणा करने वाले और साक्षियों के हस्ताक्षर या अंगूठे का चिह्न प्राप्त करते हुए अभिलिखित कर लेना चाहिए।
116. उन सभी मामलों में, जिनमें यह संभावना हो कि किसी भी प्रक्रम में संदिग्ध व्यक्ति की साक्षियों के द्वारा अभिज्ञान (शिनाख्त) के लिये परेड अपेक्षित होगी, जो प्रारम्भ से अन्वेषण अधिकारी को यह सुनिश्चित करने के लिए पग उठाना चाहिये कि अभिज्ञान की कार्यवाही होने के पहले संदिग्ध व्यक्ति को साक्षियों द्वारा देख लिए जाने का कोई अवसर प्राप्त नहीं होता। ऐसी कार्यवाहियाँ, जब संभव हो सकें, तब तक स्थगित रखी जानी चाहिये जब तक कि वे जेल में गवर्नमेन्ट आर्डर और इन बिनियमों के पैरा 31 में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन हो सकें, जिनके सम्यक् अनुपालन के लिए जहाँ तक पुलिस का सम्बन्ध है, लोक अभियोजक तब उत्तरदायी रहेगा, जब अभिज्ञान की कार्यवाही जेल में, संदिग्ध व्यक्ति के विरुद्ध गिरफ्तारी के योग साक्ष्य के अभाव या अन्य किसी कारण से न हो सके, तो जहाँ तक लागू हो सके ऊपर निर्देशित अनुदेशों का अन्वेषण अधिकारी द्वारा अनुसरण किया जावेगा। ऐसे मामलों में कार्यवाही मजिस्ट्रेट के सामने की जानी चाहिये जैसे कि वह जेल में की जाने की स्थिति में होती या यदि मजिस्ट्रेट उपलब्ध न हो, सम्मानीय और निष्पक्ष व्यक्तियों के सामने की जानी चाहिये, जिनसे अपना यह समाधान करने को कहा जाये कि कार्यवाही, साक्षियों और अभियुक्त दोनों के लिए न्यायिक हो। महत्व के किसी मामले में, जब अभिज्ञान की जेल में न हुई कार्यबाहों के लिए कोई मजिस्ट्रेट उपलब्ध न हो, राजपत्रित पुलिस अधिकारी को हाजिर रखने की व्यवस्था की जाती है।
(1. बालक राम बनाम राज्य, ए०आई०आर० 1974 सु०को० 2165.
2. 1976 क्रि०ला०३० 1715 तु०को०,
3. सूरत सिंह बत्तम राज्य, 1977 क्रि०ला०ज० 347 सु०को०,
4. ए०आई०आर० 1979 मुल्को० (1) 190
5. राज्य ए०आई० आर० 1980 सु०को० 1270 1980 क्रि०००1००२ सु०को०
6. 1980 क्रि०ला०ज० 408 सु०को०,
7. राज्य बतास कृष्णमूर्ति लक्ष्मीपति, 1981 क्रि०ला०२० सु०को०, )
117. महत्वूर्ण मामलों में संदिग्ध व्यक्तियों से या चोरी गई संदिग्ध पुनः प्राप्त सम्पति की वस्तुओं को, उसी प्रकार की वस्तुओं में मिलाना और तब परिवादियों को अभिज्ञान के लिए दिखाये जाने के अभ्यास का अनुसरण, बहुधा लाभकारी होता है। ऐसे मामलों में उन्हीं सतर्कताओं का पालन किया जाना चाहिये जो अभियुक्तों की अभिज्ञान की कार्यवाही के लिये पालन किये जाने को निर्धारित की गई है। वह व्यक्ति जिसके समक्ष अभिज्ञान हुआ हो, संहेह के ऊपर होना चादिये और यह सिद्ध करना भी आवश्यक होगा कि संदिग्ध वस्तु और उसके साथ मिलाई गई वस्तुएँ, समय से पहले साक्षियों द्वारा देखी नहीं जा सकती थी।
118. जब वह स्थापित कर दिया जावे कि किसी व्यक्ति ने ऐसा कार्य कर दिया है जो किसी स्वस्थ चित्त के व्यक्ति द्वारा किए जाने की दशा में संज्ञेय अपराध होता हो तो यह अवधारित करना पुलिस का कर्तव्य नहीं है कि उन्मत्तता के आधार पर बचाव का मामला खड़ा किया जा सकता है। यह प्रश्न न्यायालय द्वारा अवधारित किया जाएगा। अभियुक्त की विवेचना के लिये भेजा जायें और उसकी मानसिक दशा डायरी में लिखी जावें।
119. जब दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अधीन संस्वीकृति अभिलिखित को जाना हो, मजिस्ट्रेट को कहा जाना चाहिये कि वह उसको करने वाले व्यक्ति से, मामले के बारे में विस्तार जानने के लिए अधिक से अधिक प्रश्न पूछें, जिससे उसकी सत्यता सत्यापित हो सके। जब तक कि महत्वपूर्ण विशिष्टियों में उसकी सत्यता के बारे में स्वतन्त्र समर्थक साक्ष्य प्राप्त न हो जावें, वह न्यायालय अत्यन्त अल्प महत्व की होगी। एक सत्य संस्वीकृति का प्रारम्भिक उपयोग अन्वेषण के लिये आगे की पंक्तियों का अवधारण करना है।
120. पुलिस अभिरक्षा में संस्वीकृति करने की इच्छा करने वाले व्यक्ति को संस्वीकृति जिला मजिस्ट्रेट के सिवाय, युक्तियुक्त समय में पहुँचे जा सकने वाले उच्चतम मजिस्ट्रेट द्वारा अभिलिखित कराई जानी चाहिये। केवल प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट और इस सम्बन्ध में स्थानीय सरकार द्वारा विशेष रूप से प्राधिकृत द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट ही संस्वीकृतियाँ अभिलिखित करने के लिए सक्षम है। डकैतों के महत्वपूर्ण मामलों और अन्य संगीन मामलों में जब सम्भव हो सके, संस्वीकृति जिला मजिस्ट्रेट,' या ज्वाइन्ट मजिस्ट्रेट को वरीयता देते हुये किसी स्थायी मजिस्ट्रेट जिले के उस भाग पर ध्यान दिये * बिना जहाँ मामला घटित हुआ हो, अभिलिखित कराई जावे।
(1. ए०आई०आर० 1972 सु०को० 3: 1972 क्रि०ला०ज० 1.
2. ए०आई०आर० 1979 सु०को० 1127.
3. ए०आई०आर० 1979 सु०को० 1188. )
121. पुलिस अभिरक्षा का रिमाण्ड न तो मांगा जावे या दिया जावे जब तक कि आवेदन करने वाला अधिकारी निश्चित और पर्याप्त कारण, आधार बताने में समर्थ न हो। एक सामान्य अभिकथन कि अभियुक्त आगे और सूचना देने में समर्थ हो सकता है, स्वीकार नहीं किया जायेगा। पुलिस अभिरक्षा के रिमान्ड के लिये आवेदन पुलिस अधीक्षक या सब डिवीजन के भारसाधक किसी राजपत्रित अधिकारी के माध्यम से किया जावे और दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के द्वारा अपेक्षित पद के मजिस्ट्रेट को ही सम्बन्धित किया जावे। संदिग्ध व्यक्तियों को जमींदारों या अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों को उन्हें संस्वीकृतियाँ देने को प्रेरित करने के लिए नहीं सौंपना चाहिये।
122. (1) जितने शीघ्र संभव हो सके अन्वेषणपूर्ण कर लिया जावे और जब पूर्ण हो जावे तो अन्वेषक अधिकारी को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 161-171 तथा 173 का पालन करना चाहिये। धारा 173 के द्वारा विहित रिपोर्ट उस धारा के अधीन थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा पुलिस अधीक्षक की सूचना के अधीन जार्चशीट के प्रारूप (पुलिस प्रारूप क्र० 339) में, यदि मामला विचारण के लिये भेजा जावे और (पुलिस प्रारूप क्र० 340) में अन्तिम रिपोर्ट के प्रारूप में यदि मामला विचारक के लिए न भेजा जाना हो, भेजी जावेगी। मामलों में आरोप पत्र चार्जशीट और अंतिम डावरी न्यायालय' को मण्डल अधिकारी तथा लोक अभियोजक के माध्यम से भेजी जावेगी और वह न्यायालय में प्रथम इत्तिला रिपोर्ट किये जाने के दिन से सम्मन और वारन्ट मामलों में चार सप्ताहों और सेशन मामलों में आठ सत्ताहों के भीतर प्रस्तुत कर दी जावेंगी। किसी मण्डल अधिकारी या लोक अभियोजक को आरोप-पत्र को एक सप्ताह से अधिक अपने पास रोक कर नहीं रखना चाहिये और लोक अभियोजक को उसे न्यायालय में विहित काल-सीमा के भीतर कर देना चाहिये। अत्यन्त विशेष कारणों के सिवाय विहित काल-सीमा से अधिक बढ़ने की अनुज्ञा नहीं दी जानी चाहिये।
(2) यथासंभव शीघ्र और प्रत्येक तिमाही की समाप्ति पर किसी भी दशा में एक मास के पश्चात् नहीं, पुलिस अधीक्षक जिला मजिस्ट्रेट को विहित प्रारूप में और दो प्रतियों में भेजेगा। उन मामलों की एक त्रैमासिक सूची भेजेगा जिनमें 43 सप्ताहों की विहित काल सीमा में आरोप-पत्र प्रस्तुत न किए जा सके हों। जिला मजिस्ट्रेट उसे रेंज के पुलिस उपमहानिरीक्षक को अग्रेषित करेगा और दूसरी प्रति का अपनी टिप्पणियों सहित डिवीजन के आयुक्त को पृष्ठांकन करेगा। रेन्ज का पुलिस उप-महानिरीक्षक तत्पश्चात् विहित्त प्रारूप में विलंब हुये मामलों की एक विवरणी संकलित करेगा और उसे पुलिस के महानिरीक्षक को भेज देगा जो अपनी टिप्पणियों के साथ सरकार के गृह विभाग (पुलिस-ए) को अग्रेषित कर देगा।
(3) सभी मामलों में अन्तिम रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक के माध्यम से भेजी जावे।
(4) अन्वेषण के परिणामस्वरूप दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 (1) (ख) के द्वारा परिवादी को, यदि कोई हो, थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा पुलिस प्रारूप क्र० 47 में, यथा स्थिति आरोप पत्र या अन्तिम रिपोर्ट प्रस्तुत करते समय सूचना भेजी जावेगी।
123. किसी अभियुक्त की पूर्व दोषसिद्ध की विशिष्टियाँ आरोप-पत्र के खाना 7 में प्रविष्ट की जावें। यदि अभियुक्त उसी जिले के अन्य पुलिस थाने में रहता हो, उस थाने के भारसाधक अधिकारी से उसकी पूर्व दोषसिद्धियों के विवरण भेजने या यदि समय कम हो तो सीधे लोक अभियोजक को भेज देने के लिए कहा जावे।
124. जब किसी संज्ञेय या असंज्ञेय अपराध के परिवाद को, जिसका मजिस्ट्रेट ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 190 (क) के अधीन संज्ञान ले लिया हो उसके द्वारा धारा 202 के अधीन पुलिस को अन्वेषण के लिए भेजी जावे, पुलिस के अधीक्षक या सबडिवीजन के भारसाधक, किसी राजपत्रित "अधिकारी को थाने में रिपोर्ट को अग्रेषित करने के पूर्व अपना यह समाधान कर लेना चाहिये कि धारा 200 और 200 के उपबन्धों का पूर्ण रूप से पालन कर लिया गया है। कोई ऐसा मामला, जिसमें मजिस्ट्रेट ने धारा 200 के अधीन परिवादी का शपथ पर कथन न ले लिया हो या धारा 202 के अधीन पुलिस से अन्वेषण कराने के कारणों को अभिलिखित न किया गया हो, पुलिस को अन्वेषण के लिए विधितः नहीं भेजा जा सकता। ऐसे सभी मामले और वे सभी मामले जिनमें अभिलिखित कारण प्रथम दृष्ट्या अवैध हो पुलिस अधीक्षक द्वारा, इससे पूर्व की आगे कोई कार्यवाही की जावे, जिला मजिस्ट्रेट के ध्यान में लाया जाना चाहिये। उन मामलों में, जिनमें पुलिस द्वारा अन्वेषण किये जाने की आज्ञा धारा 202 के अधीन क्रिसी परिवाद के मामले में उचित रूप से दी गई हो, अन्वेषण उतनी तत्परत्ता से किया जाना चाहिए जिसकी परिस्थितियाँ अनुज्ञा देती हों, किन्तु जहाँ तक ऐसे अन्वेषणों के समय को निर्धारित किए जाने का प्रश्न है, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 147 (1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत और अन्वेषणाधीन मामलों को उन मामलों की अपेक्षा वरीयता दी जावेगी, जो परिवाद और मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस को भेजे जायें।
125. उन सभी मामलों में जिनमें किसी भारतीय के किसी ब्रिटिश सैनिक द्वारा मारे या आहत किये जाने का संदेह करने के कारण हों, स्वयं पुलिस अधीक्षक द्वारा अन्वेषण किया जाना चाहिए। जब तक कि उस मामले में जस्टिस ऑफ दी पीस के पद पर कम से कम चार वर्ष स्थित अधिकारी द्वारा न्यायिक जाँच न कर ली गई हो (इन विनियमों के पैरा 357 से भी तुलना करें)।
126. किसी अन्वेषणकर्ता अधिकारी के काम का सांख्यकीय परीक्षा के आधार पर किया गया।
विश्लेषण आक्षेपजनक है और उससे बेईमानी को प्रोत्साहन मिलता है। पुलिस अधीक्षक को चाहिए कि वह सभी पंक्तियों के अपने अधीनस्थ अधिकारियों पर यह छाप अंकित करे कि उनकी दक्षता का निर्णय सांख्यकीय परीक्षा के आँधार पर नहीं, अपितु उस रीति के आधार पर किया जावेगा जिसमें वे अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं।
127. सरकार द्वारा डाक विभाग को निम्न अनुदेश दिये गये हैं। (देखिये 18 मार्च, 1891 का पुलिस गुजट) "पुलिस के समक्ष अभिलेखों का प्रस्तुत किया जाना।"
दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन अन्वेषण कर रहे पुलिस अधिकारी के लिखित आदेश पर डाक विभाग के अभिलेख प्रस्तुत किये जा सकेंगे तथा उपलब्ध सूचना प्रकट की जा सकेगी, किन्तु अभिलेखों की केवल वे ही प्रविष्टियां प्रकट की जावें जो अन्वेषण के अधीन अभियुक्त या अभियुक्तों से सम्बन्धित हों या अपराध से संगत हो। किसी अन्य मामले में पोस्ट मास्टर को बिना किसी विलम्ब के पोस्ट मास्टर जनरल को आदेशों के लिये निर्देशित करना चाहिये, जी यह निर्णय करेगा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (1872 का पहला) की धारा 124 के अधीन चाही गई जानकारी रोक ली जावे या नहीं।
128. किसी ऐसे क्षेत्रफल में जहाँ मालगाड़ियों से वस्तुओं की चोरी की घटनाएँ व्यापक रूप से हो रही हों, सरकारी रेलवे पुलिस का अधीक्षक सम्बन्धित जिले के पुलिस अधीक्षक को सूचित करे और तब सम्मिलित उपाय किये जायेंगे।