
215. जब कभी थाने का भारसाधक अधिकारी या दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय बारहवें के अधीन अन्वेषण कर रहा कोई अधिकारी संतुष्ट हो जावे कि कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे वह दण्ड प्रक्रिया संहिता को धारा 41 के अधीन गिरफ्तार करने को सशक्त है, फरार हो गया है या अपने को छुपा रहा है जिससे कि उसकी गिरफ्तारी न की जा सकें, उसे अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट से एक के पश्चात् एक, गिरफ्तारी का वारन्ट जारी करने, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 82 के अधीन घोषणा जारी करने और धारा 83 के अधीन कुर्की का आदेश देने के लिए निवेदन करना चाहिये। ऐसे सभी आवेदन किन्हीं विशिष्ट मामलों में जितनी शीघ्रता से वांछनीय हो' किये जाना चाहिये, अन्वेषण के निष्कर्ष के लिये उन्हें विलम्बित करने की आवश्यकता नहीं है, और गिरफ्तारी वारन्ट उद्घोषणा और कुर्की का कोई विधिक रूप से एक के बाद दूसरा उनके उचित क्रम में उसी दिन, जारी किया जा सकेगा। किसी अधिकारी को जो न्यायालय से उद्घोषणा जारी करने को कहता है, यह सिद्ध करने के लिए कि जिस व्यक्ति की गिरफ्तारी वांछनीय है, वह फरार हो गया है, विधिक साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिये, तैयार रहना चाहिये और किसी अधिकारी के के न्यायालय को सन्तुष्ट करने के लिये, लिये, फरार व्यक्ति के सम्बन्ध में व्यक्तिगत कगत जानकारी न रखता हो, केवल अभिकथन रिपोर्ट को स्वीकार नहीं करना चाहिये। जब कुर्की का आदेश जारी हो गया हो तो उसे अपना संतोष करना चाहिये कि यह पर्याप्त रूप से निष्पादित किया गया है।
216. कोई व्यक्ति, जिसको उपसंजाति के लिए दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 82 के अधीन उद्घोषणा जारी की गई हो, इस अध्याय के आशयों के लिये 'फरार अपराधी' होगा।
217. फरार अपराधी क और ख, दो वर्गों में बांटें जावेंगे। वर्ग क में वह सभी फरारों, जिनके नाम, जाति, निवास और पूर्व इतिहास, सभी शंका सम्भावनाओं से परे सत्यापित हो चुका हो. सम्मिलित होंगे। वर्ग ख. में, केवल उन्हीं व्यक्तियों का समावेश होगा जिनके वास्तविक नाम, पता और पूर्व इतिहास विनिश्चित न हुये हों।
टीप- सभी देशान्तरगामी फरार दोषसिद्धि के स्वमेव वर्ग 'क' के फरार अपराधी के रूप में रजिस्ट्रोकृत किये जायेंगे।
218. हरेक थाने में रजिस्टर प्रारूप क्रमांक 214 में रखा जावेगा, जिनमें संज्ञेय और असंज्ञेय दोनों मामलों के सभी फरार अपराधियों के नाम और पूरी विशिष्टियां प्रविष्ट की जायेंगी, वर्ग क और ख के अधीन आने वाले व्यक्ति पृथक से दर्शाये जायेंगे। वर्ग क का हर एक फरार अपराधी उसे हर एक थाने के रजिस्टर में जिसमें उसकी पत्नी, पिता, माता, पुत्र, पुत्रियां, भाई या बहिनें रहती हों तथा उस थाने के रजिस्टर में (1) जिसमें वह स्वयं रहता हो, और (2) जिसमें वह अपराध जिसके लिये उसकी जरूरत है. किया गया हो, दर्शाया जावेगा। उस जिले के जिसमें अपराध किया गया है, अधीक्षक का यह कर्तव्य होगा कि उन अन्य जिलों के अधीक्षकों को जिनमें रहने यी सम्बन्धों के कारण उसे पंजीबद्ध होना चाहिये, सूचित करे, और ऐसी सूचना प्राप्त होने पर उन अधीक्षकों को अपने जिलों में फरारियों के नाम पंजोबद्ध करने का कर्तव्य होगा। वर्ग ख के फरार को केवल उन थानों में पंजीबद्ध होना आवश्यक होगा जिसमें फरार ने, जिसके लिये वे सम्बन्धित थे, अपराध किया हो। रजिस्टर या स्तम्भ 17 अध्यानत रखा जाना चाहिये और जब कभी किसी फरार अपराधी के रिश्तेदार या साथी अपना पता बदले, थानेदार, अधीक्षक को सूचित करेगा। यदि वह अपराध जिसके लिए फरार व्यक्ति की आवश्यकता है, उसके जिले में किया गया हो तो वह अधीक्षक अन्य सभी सम्बन्धित जिलों और थानों तक सूचना पहुंचायेगा, अन्यथा यह उस जिले के अधीक्षक को जिसमें अपराध किया गया था, को सूचित करेगा और बाद वाला अधिकारी तब सभी सम्बन्धियों को सूचित करेगा।
219. मुख्यालय पर लोक अभियोजक पूरे जिले के लिए थाना रजिस्टर के प्रारूप में ही एक रजिस्टर अंग्रेजी में बनाये रखेगा, प्रत्येक वर्ग क और ख के लिए प्रत्येक भाग आवन्टित किये जायें। उसका रजिस्टर केवल उन्हीं फरार अपराधियों के नामों को समावेश करेगा, जो उस जिले में विचारण के योग्य हों, सरकारी रेलवे पुलिस की आवश्यकता होने वालों के सिवाय जिनके लिए रेलवे पुलिस का लोक अभियोजक रजिस्टर बनाये रखता है।
जिले के फरार अपराधियों के वार्षिक प्रविवरण को अभियुक्तियों के शीर्ष में उस जिले में निवास करने वाले फरार व्यक्तियों की संख्या दशांई जावे जो लोक अभियोजन के रजिस्टर में अंकित हों।
220. अधीक्षक, निम्नलिखित में से किसी भी कारण से रजिस्टर से किसी फरार अपराधी का नाम निकाल दिये जाने की आज्ञा दे सकता है।
(1) गिरफ्तारी
(2) सुनिश्चित मृत्यु
(3) जब सभी महत्वपूर्ण साक्षियों की मृत्यु या लापता हो जाने के कारण, और दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा के अभाव में, या अन्य किसी कारण से अपराधी के विरुद्ध सफल अभियोजन के लिए अपराध अपर्याप्त पाई जाने पर,
(4) उस, दिनांक से जब फरार व्यक्ति को अन्तिम बार जीवित सुना गया हो, 'क' वर्ग के, अपराधियों के मामले में 30 वर्ष और 'ख' वर्ग के मामलों में 5 वर्ष व्यपगत हो जाने पर।
221. जिला मजिस्ट्रेट अपने जिले में विचारणीय किसी अपराधी के नाम को अपलोपित करने का आदेश पारित कर सकता है, चाहे पूर्वगामी पैरा में दी गई शर्तों की पूर्ति न हुई हो, जब कभी उसका यह विचार हो कि अपराध के नगण्य होने के कारण फरार की तलाश करना अनावश्यक है, परन्तु यह कि वह इस प्रकार ऐसे अपराध को नहीं मिटा देगा जो एकत्र रूप से सेशन न्यायालय के द्वारा विचार योग्य हो।
जिला मजिस्ट्रेट वर्ष में एक बार या तो धाने के निरीक्षण या फरार अपराधियों की सूची के परीक्षण द्वारा यह विचार करेगा कि क्या कोई नाम हटा दिया जाना चाहिये। जब कभी किसी फरार अपराधी का नाम जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी द्वारा हटा दिया जावे तो उसके विरुद्ध बिना जिला मजिस्ट्रेट की मन्जूरी के, परिवाद के सिवाय अभियोग नहीं चलाया जा सकेगा।
222. हर उस मामले में जिसमें अभियुक्त फरार हो गया हो, अत्यन्त छोटे और नगण्य प्रकृति के मामलों या जहाँ विशेष परिस्थितियाँ विद्यमान हों, जो प्रक्रिया को अनावश्यक या अवांछनीय बना देती हों, के सिवाय, न्यायालय से दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 299 के अधीन साक्ष्य अभिलिखित करने को कहा जाना चाहिये। यद्यपि पुलिस को उनके विरुद्ध धारा 83 या 299 के अधीन कार्यवाही की प्रतीक्षा किये बिना फरार व्यक्तियों के नाम पंजीकृत कर लेना चाहिये। सभी मामले में विशेष कारणों से धारा 299 के अधीन साक्ष्य अभिलिखित न की गई हो, उप-महानिरीक्षक के सामने उसके निरीक्षण के समय प्रस्तुत किये जावें।
भावी विचारण के समय धारा 299 के अधीन अभिलिखित साक्ष्य ग्रहण किये जाने के योग्य हो सकें, इसके लिए यह सिद्ध किया जाये और अभिलेख पर लाया जावे कि अपराधी फरार हो गया है और उसके गिरफ्तार किया जाने की कोई तात्कालिक आशा नहीं है। धारा 299 के उपबन्धों की सावधानीपूर्वक अध्ययन किया आवे।
टीप- कोई व्यक्ति कोई अपराध करने के पश्चात फरार हो जाता है तो उस व्यक्ति की सम्पत्ति की कुकी का प्रावधान दण्ड प्रक्रिया संहिता 83 में दिया गया यह धारा निम्नव्रत है-
83. फरार व्यक्ति की सम्पत्ति की कुर्की (1) धारा 82 के अधीन उद्घोषणा जारी करने वाला न्यायालय उद्घोपित व्यक्ति की किसी जंगम या स्थावर या दोनों प्रकार की सम्पत्ति की कुर्की का आदेश घोषणा के आरी किये जाने के पश्चात् लेखबद्ध किये जाने वाले कारणों के आधार पर किसी समय भी दे सकेगा।
परन्तु घोषणा जारी करते समय न्यायालय का शपथ पत्र द्वारा या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि वह व्यक्ति जिसके सम्बन्ध में उद्घोषणा निकाली जानी है-
(क) अपनी समस्त सम्पत्ति या उसके किसी भाग का व्ययन करने वाला है, अथवा
(ख) अपनी समस्त सम्पत्ति या उसके किसी भाग को उस न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता से हटाने वाला है तो वह उद्घोषणा जारी करने के साथ ही साथ कुर्की का आदेश दे सकेगा।
(2) ऐसा अन्देश उस जिले में की, जिसमें यह दिया गया हो, उस व्यक्ति को किसी भी सम्पत्ति की कुकों प्राधिकृत करेगी और जिले के बाहर की उस व्यक्ति की किसी सम्पत्ति की कुर्की तब प्राधिकृत करेगा जह. वह उस जिला मजिस्ट्रेट द्वारा, जिसके जिले में ऐसी सम्पत्ति स्थित हो, पृष्ठांकित कर दिया जाये।
(3) यदि कुर्की की जाने का आदेश दी गई सम्पत्ति, ऋण या अन्य जंगम सम्पत्ति हो, तो इस धारा के अधीन कुर्की-
(क) अभिग्रहण द्वारा, अथवा
(ख) रिसीवर की नियुक्ति द्वारा, अथवा
(ग) उद्घोषित व्यक्ति को या उसके निमित्त किसी को भी उस सम्पत्ति का किराया देने या उस सम्पत्ति का परिदान करने का प्रतिषेध करने वाले लिखित आदेश द्वारा, अथवा
(घ) इन रोजियों में से सब या किन्हों दो से, ऐसा न्यायालय ठीक समझे, की जाएगी।
(4) यदि कुर्क की जाने का आदेश दी गई सम्पत्ति स्थावर हो तो इस धारा के अधीन कुर्की राज्य सरकार को राजस्व देने वाली भूमि की दशा में उस जिले के कलेक्टर के माध्यम से, जिसमें भूमि स्थित हो, और अन्य सब दशाओं में-
(क) कब्जा लेने द्वारा अथवा
(ख) रिसीवर की नियुक्ति द्वारा अथवा
(ग) उद्घोषित व्यक्ति को या उसके निमित्त किसी को भी सम्पत्ति का किराया देने या उस सम्पत्ति का परिदान करने का प्रतिषेध करने वाले लिखित आदेश द्वारा, अथवा
(घ) इन रीतियों में से सब या किन्हों दो से, जैसा न्यायालय ठीक समझे की जाएगी।
(5) यदि कुर्क की जाने का आदेश दी गई सम्पत्ति जीवधन हो या विनिश्चय प्रकृति की हो तो, यदि न्यायालय समीचीन समझे, वह उसके तुरन्त विक्रय का आदेश दे सकेगा और ऐसी दशा में विक्रय के आगम न्यायालय के आदेश के अधीन रहेंगे।
(6) इस धारा के अधीन नियुक्त रिसीवर की शक्तियाँ, कर्तव्य और दायित्व वे ही होंगे जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन नियुक्त रिसीवर के होते हैं।
1-तत्सम्बन्धी पूर्व विधि-दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 को यह धारा पूर्व संहिता की धारा 88 (1) चरण 1 से 6 के अनुरूप है।
फरार व्यक्ति को सम्पत्ति की कुर्की के आदेश के सम्बन्ध में इस धारा में नियम अभिकथित किया गया है। इस धारा की उपधारा (1) के अन्तर्गत उद्घोषणा जारी करने वाले न्यायालय को उद्घोषित व्यक्ति की चल व अचल सम्पत्ति की कुर्की के बारे में आदेश पारित करने हेतु प्राधिकृत किया गया है।
इस धारा की उपधारा (2) और (3) में सम्पत्ति को कुर्क किये जाने की रीति बतलायी गयी है।
इस धारा की उपधारा (2) में यह बतलाया गया है कि कुर्की का आदेश जारी करने वाला मजिस्ट्रेट यदि जिले की स्थानीय सीमा से बाहर स्थित सम्पत्ति की कुर्की के बारे में आदेश जारी करता है तो उस दशा में उस जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जिसकी स्थानीय सीमा के भीतर ऐसी सम्पत्ति स्थिति है, उस मजिस्ट्रेट के द्वारा पृष्ठांकित किया जाना अनिवार्य होगा।
इस धारा को उपधास (3) के अन्तर्गत उस दशा में कुर्की की प्रक्रिया अभिकथित की गई है जबकि कुर्क कराये जाने के लिए आदेशित सम्पत्ति ऋण या अन्य जंगम सम्पत्ति हो।
इस उपधारा के अनुसार ऐसी दशा में कुर्की-
(क) अभिग्रहण द्वारा की जायेगी, अथवा
(ख) रिसीवर की नियुक्ति द्वारा की जायेगी, अथवा
(ग) उद्घोषित व्यक्ति को या उसके निमित्त किसी को भी उस सम्पत्ति का परिदान करने का प्रतिषेध कराने वाले लिखित आदेश द्वारा की जायेगी।