धारा 1 से 47 UP पुलिस अधिनियम, 1861

धारा 1 से 47 UP पुलिस अधिनियम, 1861

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पुलिस अधिनियम, 1861

(1861 का अधिनियम सं० 5)1

(1. 22 मार्च, 1861 को गवर्नर जनरल की अनुमति प्राप्त।)

[जैसा कि उत्तर प्रदेश राज्य में लागू है।

 

पुलिस के विनियमन के लिए अधिनियम

उद्देशिका-

चूँकि पुलिस को पुनर्गठित करना और अपराधों को निवारित करने तथा उनका पता लगाने के लिए उसे और अधिक दक्ष उपकरण बनाना समीचीन है; अतः निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है-

1. निर्वचन खण्ड-

जब तक कि कोई बात विषय या सन्दर्भ में ऐसे अर्थान्वयन के विरुद्ध हो, इस अधिनियम में निम्नलिखित शब्दों और पदों का वही अर्थ होगा जो उन्हें दिया गया है,

अर्थात् -

'जिले का मजिस्ट्रेट' से वह मुख्य अधिकारी अभिप्रेत है जिस पर जिले के कार्यपालिका प्रशासन का भार है और जो मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग करता है चाहे ऐसे कार्यपालिका प्रशासन से भारित मुख्य अधिकारी किसी भी अभिधान से ज्ञात हो;

'मजिस्ट्रेट' शब्द के अन्तर्गत मजिस्ट्रेट की सब या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने वाले साधारण पुलिस जिले के सब व्यक्ति आते हैं;

'पुलिस' शब्द के अन्तर्गत वे सब व्यक्ति आते हैं जो इस अधिनियम के अधीन भर्ती किये गये

'साधारण पुलिस जिला' में कोई प्रेसिडेंसी, राज्य या स्थान या किसी प्रेसिडेंसी, राज्य या स्थान का कोई भाग आता है, जिसमें इस अधिनियम को प्रभावी करने के लिए आदेश दिया गया है;

(2. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।) ['जिला अधीक्षक' और 'जिला पुलिस अधीक्षक'] शब्दों के अन्तर्गत अपर जिला अधीक्षक अथवा संयुक्त जिला अधीक्षक अथवा अन्य व्यक्ति आता है जिसे किसी जिले में जिला पुलिस अधीक्षक के सब कर्तव्यों, अथवा उनमें से किसी का पालन करने के लिए उस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार के साधारण अथवा विशेष आदेश द्वारा नियुक्त किया गया है;]

'सम्पत्ति' शब्द के अन्तर्गत कोई जंगम सम्पत्ति, धन या मूल्यवान प्रतिभूति आती है;

(3. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 33 सन् 2001 द्वारा अन्तः स्थापित।) [पद 'नागरिक उड्डयन कार्मिक' का तात्पर्य, पुलिस (उत्तर प्रदेश संशोधन) अधिनयम, 2001 के प्रारम्भ के ठीक पूर्व, नागरिक निदेशालय, उत्तर प्रदेश के अनुरक्षण, सुरक्षा और सामान्य प्रशासन विंग में तैनात नागरिक उड्डयन विभाग के ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों से है जिन्हें राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे और इसके अन्तर्ग ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् नागरिक उड्डयन कार्मिक के रूप में नियुक्त कोई व्यक्ति भी होगा;]

'व्यक्ति' शब्द के अन्तर्गत कम्पनी या निगम आता है;

'मास' शब्द से कलेंडर मास अभिप्रेत है;

‘ढोर' शब्द के अन्तर्गत सींगों वाले ढोरों के अतिरिक्त हाथी, ऊंट, गधे, खच्चर, भेड़ें, बकरियाँ और सूअर आते हैं।

पुलिस-बल की अधीनस्थ पंक्तियों के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे निर्देश उस बल के उप-अधीक्षक की पंक्ति के नीचे वाले सदस्यों के प्रति हैं।

2. बल का गठन-

इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ राज्य सरकार के अधीन समस्त पुलिस स्थापन एक पुलिस बल समझा जायगा और रीतितः भर्ती किया जायगा और वह अधिकारियों और पुलिसजन की ऐसी ऐसी संख्या से मिलकर बनेगा और ऐसी रीति से गठित होगा जैसा राज्य सरकार समय-समय पर आदेश करे।

इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, किसी पुलिस बल की अधीनस्थ पंक्ति के सदस्यों का वेतन और सेवा की अन्य सब शर्तें वे होंगी जो राज्य सरकार अवधारित करे।

(1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 33 सन् 2001 द्वारा जोड़ा गया।) 2-. नागरिक उड्यन कार्मिक पुलिस बल होगा

(1) इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबन्धों में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी इस धारा के उपबन्ध प्रभावी होंगे।

(2) ऐसे दिनाँक को और जिसे राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा इस निमित्त नियत करे, ऐसे समस्त नागरिक उड्डयन कार्मिक जो उस दिनांक के ठीक पूर्व नियोजित थे, इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ पुलिस बल के सदस्य हो जायेंगे और धारा 8- के उपबन्धों के अनुसार औपचारिक रूप से भर्ती किये जायेंगे और तत्पश्चात् कोई भी ऐसा नया सदस्य ऐसी रोति से नियुक्त किया जाएगा जैसी राज्य सरकार समय-समय पर आदेशित करे :

परन्तु उक्त दिनाँक के पूर्व नियोजित कोई नागरिक उड्डयन कार्मिक, महानिदेशक, नागरिक उड्डयन, उत्तर प्रदेश को सम्बोधित और उक्त दिनाँक से तीस दिन की अवधि के भीतर दी गयी सूचन द्वारा उक्त पुलिस बल का सदस्य बनने के अपने विकल्प की सूचना दे सकता है, और ऐसी सूचना की प्राप्ति पर नागरिक उड्डयन विभाग में उस समय तक उसके द्वारा धारित पद समाप्त हो जाएगी और उसकी सेवायें समाप्त हो जायेंगी और उसे प्रतिपूर्ति के रूप में उसके तीन माह के वेतन के बराबर धनराशि का भुगतान कर दिया जाएगा।

(3) नागरिक उड्डयन कार्मिकों को देय वेतन और भत्ते उनकी सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें ऐसी होंगी जैसी कि राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित ही जाय।

(4) नागरिक उड्डयन कार्मिक, राज्य सरकार के, या उसके द्वारा किराये पर लिये गये, वायुयान के अनुरक्षण, लखनऊ के हवाई अड्डे की, या राज्य सरकार के सामान्य या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट किसी अन्य हवाई अड्डे की, सुरक्षा से सम्बन्धित ऐसे कर्तव्यों का जैसा कि राज्य सरकार के सामान्य और विशेष आदेश द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किये जायें और उनसे सम्बन्धित या आनुषंगिक अन्य कर्तव्यों का, निर्वहन करेगा।

(5) नागरिक उड्डयन कार्मिकों को उक्त कर्तव्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक ऐसे विशेषाधिकार होंगे और वे ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेंगे जैसा कि राज्य सरकार के सामान्य या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाय।

(6) नगारिक उड्डयन कार्मिकों का प्रशासन, महानिदेशक, नगारिक उड्डयन, उत्तर प्रदेश में निहित होगा, जिसकी सहायता अपर निदेशक (प्रशासन) नगारिक उड्डयन, उत्तर प्रदेश और ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा की जायगी जिन्हें राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किया जाय।]

3. राज्य सरकार में अधीक्षण निहित होना-

साधारण पुलिस जिले में सर्वत्र, पुलिस का अधीक्षण उस राज्य सरकार में, जिसके अधीन ऐसा जिला हो, निहित होगा और उसके द्वारा प्रयोग किया जायगा, और इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन जैसा प्राधिकृत हो उसके सिवाय कोई व्यक्ति, अधिकृत, या न्यायालय द्वारा किसी पुलिस कर्मचारी को अतिष्ठित या नियंत्रित करने के लिये सशक्त नहीं किया जायेगा।

4. [ पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक और ऐसे महानिरीक्षक), आदि- (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

साधारण पुलिस जिले में सर्वत्र पुलिस का प्रशासन एक अधिकारी में जो [ पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक और ऐसे महानिरीक्षक], उप- [पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक और ऐसे महानिरीक्षक और सहायक [पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक और ऐसे महानिरीक्षक) में, जिन्हें राज्य सरकार ठीक समझे, निहित होगा।

जिले के मजिस्ट्रेट की स्थानीय अधिकारिता में सर्वत्र पुलिस का प्रशासन, ऐसे मजिस्ट्रेट के साधारण नियन्त्रण और निर्देशन के अधीन एक जिला अधीक्षक और ऐसे [ अपर जिला अधीक्षकों, संयुक्त जिला अधीक्षकों और सहायक जिला अधीक्षकों] में, जिन्हें राज्य सरकार आवश्यक समझे, निहित होगा। (1,2. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

5. पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक की शक्तियाँ-

साधारण पुलिस जिले में सर्वत्र [ पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक को मजिस्ट्रेट की सम्पूर्ण शक्तियाँ प्राप्त होंगी किन्तु वह उन शक्तियों का प्रयोग राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर अधिरोपित मर्यादाओं के अधीन करेगा।(1,2. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

6. [निरस्त

7. अवर अधिकारियों की नियुक्ति और पदच्युति इत्यादि -

संविधान के अनुच्छेद 311 के उपबन्धों के और ऐसे नियमों के, जो राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएँ, अधीन रहते हुए पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक), उप- पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक, सहायक 10 [ पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक और जिला अधीक्षकगण, किसी समय अधीनस्थ पंक्तियों के ऐसे किसी अधिकारी को पदच्युत, निलम्बित या अवनत कर सकेंगे जिसे वे अपने कर्त्तव्य के निर्वहन में शिथिल या उपेक्षावान पाएं या जो उस पद के लिए अयोग्य समझे जाएँ, या अधीनस्थ पंक्तियों के ऐसे किसी पुलिस अधिकारी को, जो अपने कर्त्तव्य का अनवधानता या उपेक्षापूर्ण रीति से निर्वहन करता है या जो स्वकार्येण अपने कर्तव्य के निवर्हन के लिए स्वतः को अयोग्य कर लेता है, निम्न दण्डों में से कोई एक या अधिक दे सकेगा, अर्थात् (1,2. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

() एक मास के वेतन से अनधिक किसी राशि का जुर्माना;

() दण्ड रूप डिल, अतिरिक्त पहरा, अतिश्रम या अन्य कार्य के सहित या रहित पन्द्रह दिनों से अनधिक कालावधि के लिये क्वार्टर परिरोध,

() सदाचरण वेतन से वंचित करना,

() विशिष्ट या विशेष उपलब्धि के किसी पद से हटाना, 1

[() अवरोध पर रोक को शास्ति करके, वार्षिक वेतन वृद्धि या पदोन्नति को रोकना ] (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 2 सन् 1944 द्वारा जोड़ा गया।)

टिप्पणी

पुलिस अधीक्षक पुलिस उपनिरीक्षक को सेवामुक्त कर सकता है। (2. ए० आई० आर० 1970 एस० सी० 122.)

8. पुलिस अधिकारियों को प्रमाण-पत्र

धारा 4 में वर्णित अधिकारी से भिन्न प्रत्येक पुलिस अधिकारी को पुलिस बल में नियुक्ति पर, [महानिदेशक एवं महानिरीक्षक] या ऐसे अन्य अधिकारी की, जिसे [महानिदेशक एवं महानिरीक्षक] नियुक्त करे, मुद्रांकित, इस अधिनियम से उपाबद्ध प्ररूप में एक प्रमाणपत्र मिलेगा जिसके फलस्वरूप ऐसे प्रमाणपत्र को धारण करने वाले व्यक्ति में पुलिस अधिकारी की शक्तियाँ, कृत्य और विशेषाधिकार निहित होंगे।(1,2. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

प्रमाणपत्र का अभ्यर्पण

जब कभी प्रमाणपत्र में नामित व्यक्ति किसी कारण से पुलिस अधिकारी नहीं रहता है तब ऐसा प्रमाणपत्र प्रभावहीन हो जायगा और उसके अधिकारी रहने पर उसके द्वारा प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिये सशक्त अधिकारी को तुरन्त अभ्यर्पित किया जायगा।

पुलिस अधिकारी अपने पद से निलम्बित होने के कारण पुलिस अधिकारी बने रहने से परिविरत नहीं हो जायगा, ऐसे निलम्बन की अवधि में वे शक्तियाँ, कृत्य और विशेषाधिकार, जो पुलिस अधिकारी के रूप में उसमें निहित हैं, प्रास्थगित रहेंगे, किन्तु वह उन्हीं उत्तरदायित्वों, अनुशासन और शास्तियों और उन्हीं प्राधिकारियों के अधीन रहेगा, मानो वह निलम्बित नहीं हुआ है।

8-. नागरिक उड्डयन कार्मिकों को प्रमाणपत्र-

प्रत्येक नागरिक उड्डयन कार्मिक को, जो इस अधिनियम के आधार पर पुलिस बल का सदस्य हुआ हो, पुलिस (उत्तर प्रदेश संशोधन) अधिनियम, 2001 के प्रारम्भ पर, और ऐसे प्रारम्भ' के पश्चात् ऐसे सदस्य के रूप में नियुक्त किये गये प्रत्येक कार्मिक को उसकी नियुक्ति पर, महानिदेश नागरिक उड्डयन, उत्तर प्रदेश या ऐसे अन्य अधिकारी जैसे कि राज्य सरकार इस निमित्त नियुक्त करे, की मुद्रांकित, नीचे दिये गये प्ररूप पर एक प्रमाणपत्र मिलेगा। (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 33 सन् 2001 द्वारा अन्तःस्थापित।)

प्रमाणपत्र का प्रारूप

प्रमाणित किया जाता है कि श्री.....को नागरिक उड्डयन कार्मिक के रूप में नियुक्त किया गया है, जो पुलिस अधिनियम, 1861 के अधीन एक पुलिस बल है।]

9. पुलिस अधिकारी बिना इजाजत या दो मास की सूचना के पद त्याग नहीं करेंगे-

जब तक जिला अधीक्षक या ऐसी अनुमति देने के लिये प्राधिकृत कोई अन्य अधिकारी अभिव्यक्ततः अनुज्ञा दे दे, कोई पुलिस अधिकारी अपने पद के कर्त्तव्यों से अपने को प्रत्याहृत करने के लिये या जब तक वह अपने वरिष्ठ अधिकारियों को त्यागपत्र देने के आशय की लिखित सूचना दो मास से अन्यून अवधि के लिए दे दे, बिना जिला अधीक्षक की इजाजत के त्यागपत्र देने के लिए स्वतन्त्र होगा।

10. पुलिस अधिकारी अन्य नियोजन में नहीं लगेंगे

अब तक [महानिदेशक एवं महानिरीक्षक] ऐसा करने के लिए अभिव्यक्तलिखित रूप में अनुज्ञान दे दे, कोई पुलिस अधिकारी इस अधिनियम के अधीन वाले अपने कर्तव्यों से भिन्न कियों निधीजन या पद में नहीं लगेंगे। (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

11. [निरस्त]

12. [महानिदेशक एवं महानिरीक्षक] की नियम बनाने की शक्ति -

पुलिस [ महानिदेशक एवं महानिरीक्षक] पुलिस बल के संगठन, वर्गीकरण और वितरण से, उन स्थानों से जिनमें बल के सदस्य निवास करेंगे, और बल के सदस्यों द्वारा की जाने वाली विशिष्ट सेवाओं में, उनके निरीक्षण, उन्हें दिए जाने वाले आयुधों, साज-सज्जा और अन्य आवश्यक प्रस्तुओं के वर्णन से उनके द्वारा गुष्ठ वार्ता और जानकारी के संग्रहण और संसूचना से सम्बद्ध ऐसे आदेश और नियम, जिन्हें वह समीचीन समझे, और पुलिस बल से सम्बद्ध ऐसे सब अन्य आदेश और नियम जिन्हें [महानिदेशक एवं महानिरीक्षक कर्तव्य को दुरुपयोग या उपेक्षा के निवारण के लिए, और ऐिसे बल को अपने कर्त्तव्यों के परिवहन में दक्ष बनाने के लिए समय-समय पर समीचीन समझे, राज्य सरकार के पूर्वानुमोदन के अधीन समय-समय पर बना सकता है।(1,2. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

13. व्यक्तिगत खर्च पर नियोजित अतिरिक्त पुलिस अधिकारी-

पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक] या किसी उप महानिदेशक एवं महानिरीक्षक या सहायक महानिदेशक एवं महानिरीक्षक] या जिला अधीक्षक के लिए जिले के मजिस्ट्रेट के साधारण निर्देशन के अधीन राहते हुए यह विधिपूर्ण होगा कि यह उसकी आवश्यकता दर्शित करर्षे वाले किसी व्यक्ति के आवेदन पर साधारण पुलिस जिले के अन्दर किसी स्थान पर शान्ति बनाए रखने के लिए और ऐसे समय के लिए, जो उचित समझा जाए, पुलिस अधिकारियों की कोई अतिरिक्त संख्या प्रतिनियुक्त कर दे। ऐसा बल अनन्यतः जिला अधीक्षक के आदेशों के अधीन होगा और उसका भार आवेदन करने वाले व्यक्ति पर होगा: (1,2,3. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

परन्तु उस व्यक्ति के लिए, जिसके आवेदन पर ऐसा प्रतिनियोजन किया गया है, यह विधिपूर्ण होगा कि यह महानिदेशक एवं महानिरीक्षक], उप-महानिदेशक एवं महानिरीक्षक] या सहायक महानिदेशक एवं महानिरीक्षक या जिला अधीक्षक को एक मास की लिखित सूचना देकर यह अपेक्षा करे कि इस प्रकार प्रतिनियुक्त पुलिस अधिकारी प्रत्याहृत किये जायें और ऐसा व्यक्ति ऐसे अतिरिक्त बल के भार से ऐसी सूचना के अवसान पर अवमुक्त हो जायेगा।(1,2,3. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

14. रेल और अन्य कर्मों के आस-पास अतिरिक्त बल की नियुक्ति-

जच कभी कोई रेल, नहर या अन्य लोक कर्म या कोई विनिर्माणशाला या वाणिज्यिक समुत्थान देश के किसी भाग में चलाया जाय या क्रियाशील हो और [महानिदेशक एवं महातिरीश्चक्र] को यह प्रतीत हो कि ऐसे कार्य विविधर में नियोजित व्यक्तियों के आचरण या ऐसे आचरण की पुक्तियुक्त आशंका के कारण ऐसे स्थान में अतिरिक्त पुलिस बल का नियोजन आवश्यक है, तब [महानिदेशक एवं महानिरीक्षक] के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह राज्य सरकार की सहमति से ऐसे स्थान में अतिरिका बल प्रतिनियुक्त कर दे और जब तक ऐसी आवश्यकता बनी रहे तक एक उसे वहाँ नियोजित रखे और ऐसे कर्म, विनिर्माणशाला या समुत्थान को चलाने में प्रयुक्त विधियों का नियंत्रण या अभिरक्षा जिस व्यक्ति के हाथ में है उसे अतिरिक्त बल के लिए जो इस प्रकार आवश्यक हो गया है, संदाय करने के लिए समय-समय पर आदेश दे, और उदुपरि ऐसा व्यक्ति तदनुसार अंदाय कराएगा। (1,2. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

15. विक्षुब्ध या संकटपूर्ण जिलों में अतिरिक्त पुलिस रखना

(1) राज्य सरकार के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि यह राजपत्र में अधिसूचित की जाने वाली उ‌द्घोषणा द्वारा और ऐसी अन्य रीति में, जिसे राज्य सरकार निर्दिष्ट करे, यह घोषित कर दे कि उसके प्राधिकार के अधीन कोई क्षेत्र विक्षुब्ध या संकटमय अवस्था में पाया गया है या ऐसे क्षेत्र के निवासियों या उनके किसी वर्ग या अनुभाग के आचरण से यह समीचीन हो, गया है, कि पुलिस की संख्या बढ़ाई जाए।

(2) तदुपरि पुलिस [महानिदेशक एवं महानिरीक्षक] या इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत अन्य प्राधिकारी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह यथापूर्वोक्त घोषणा में विनिर्दिष्ट क्षेत्रों में रखे जाने के लिए उस नियत सामान्य संख्या के अतिरिक्त, पुलिस बल राज्य सरकार की मंजूरी से नियोजित करे। (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

(3) इस धारा की उपधारा (6) के उपबन्धों के अधीन, ऐसे अतिरिक्त पुलिस बल का खर्च उद्घोषणा में वर्णित क्षेत्र के निवासियों द्वारा वहन किया जाएगा।

(4) जिले का मजिस्ट्रेट ऐसी जाँच के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, ऐसे खर्च का प्रभाजन उन निवासियों के बीच करेगा जो यथापूर्वोक्त, उसे वहन करने के दायित्वाधीन हैं, और उन्हें ठीक उत्तरवर्ती उपधारा के अधीन छूट नहीं दी गई है। ऐसा प्रभाजन ऐसे निवासियों के ऐसे क्षेत्र में उनके साधनों की बाबत मजिस्ट्रेट के निर्णय के अनुसार किया जाएगा।

(5) राज्य सरकार के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह आदेश द्वारा ऐसे खर्च के किसी भाग को वहन करने के दायित्व से किन्हीं व्यक्तियों या ऐसे निवासियों के किसी वर्ग या अनुभाग को छूट दे।

(6) इस धारा की उपधारा (1) के अधीन जारी की गई प्रत्येक उद्घोषणा में वह कालावधि कथित होगी जिसमें वह प्रवृत्त रहेगी किन्तु वह किसी भी समय प्रत्याहृत की जा सकेगी या ऐसी और कालावधियों के लिए समय-समय पर चालू रखी जा सकेंगी, जिन्हें राज्य सरकार प्रत्येक मामले में निर्दिष्ट करना ठीक समझे।

स्पष्टीकरण

इस धारा के प्रयोजन के लिए 'निवासियों' के अन्तर्गत वे व्यक्ति हैं, जो ऐसे क्षेत्र के अन्दर भूमि या अन्य स्थावर सम्पत्ति स्वयं या अपने अभिकर्त्ताओं या सेवकों द्वारा अधिभोग में रखते हैं या धारण करते हैं और वे भू-धारक हैं जो ऐसे क्षेत्र में सीधे रैय्यतों या अधिभोगियों से स्वयं या अपने अभिकर्ताओं या सेवकों द्वारा भाटक संग्रहीत करते हैं, इस बात के होते हुए भी कि वे वस्तुतः वहाँ निवास नहीं करते हैं।

15-. निवासियों या भूमि में हितबद्ध व्यक्तियों के दुराचरण से पीड़ितों को प्रतिकर अधिनिणींत करना

(1) यदि ऐसे किसी क्षेत्र में, जिसकी बाबत ठीक पूर्ववर्ती धारा के अधीन अधिसूचित कोई उद्‌घोषणा प्रदत है, ऐसे क्षेत्र के निवासियों या उनके किसी वर्ग या अनुभाग के दुराचरण के कारण या से कोई मृत्यु या घोर उपहति या सम्पत्ति की हानि या नुकसान उद्‌भूत हुई, या हुआ है तो ऐसे क्षेत्र के निवासी ऐसे किसी व्यक्ति के लिए, जो यह दावा करता है कि उसे दुराचरण से क्षति उठानी पड़ी है क्षति की तारीख से [तीन मास], या ऐसी न्यूनतर कालावधि के अन्दर, जो विहित की जाय, उस जिले या जिले के उपखण्ड के, जिसके अन्दर ऐसा क्षेत्र स्थित है, मजिस्ट्रेट से प्रतिकर के लिए आवेदन करना विधिपूर्ण होगा। (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

[ परन्तु अप्रैल, 1939 के प्रथम दिन के पूर्व कारित मृत्यु या घोर उपहति या सम्पत्ति को क्षति के सम्बन्ध में प्रतिकर के ऐसे आवेदन की परिमामा अवधि 4 मास होगी (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

(2) तदुपरि जिले के मजिस्ट्रेट के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसी जाँच के पश्चात्, जी वह आवश्यक समझे और चाहे ऐसे क्षेत्र में ठीक पूर्ववर्ती धारा के अधीन कोई अतिरिक्त पुलिस बल रखा गया हो या नहीं, राज्य सरकार की मंजूरी से-

() उन व्यक्तियों को घोषित कर दे, जिन्हें ऐसे दुराचरण से उद्भूत, या उसके कारण, क्षति हुई है.

() ऐसे व्यक्तियों को दी जाने वाली प्रतिकर की राशि, और वह रीति जिसमें उसका उनमें वितरण किया जाएगा, नियत कर दे; और

() वह अनुपात निर्धारित कर दे जिसमें वह राशि आवेदक से भिन्न ऐसे क्षेत्र के उन निवासियों द्वारा दी जाएगी जिन्हें संदाय करने के दायित्व से छूट टीक पश्चात्वर्ती उपधारा के अधीन नहीं दी गई है।

परन्तु मजिस्ट्रेट इस उपधारा के अधीन कोई घोषणा या निर्धारण नहीं करेगा जब तक कि उसकी यह राय हो कि यथापूर्वोक्त क्षति ऐसे क्षेत्र के अन्दर बलवे या विधिविरुद्ध जमाव से उत्पन्न हुई थी और जिन घटनाओं से ऐसी क्षति हुई थी उन घटनाओं के विषय में वह व्यक्ति, जिसे क्षति उठानी पड़ी है, दोषरहित था।

(3) राज्य सरकार के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह आदेश द्वारा ऐसे प्रतिकर के किसी भाग के संदाय के दायित्व से किन्हीं व्यक्तियों या ऐसे निवासियों के किसी वर्ग या अनुभाग को छूट दे दे।

(4) जिले के मजिस्ट्रेट द्वारा उपधारा (2) के अधीन की गई प्रत्येक घोषणा या निर्धारण या दिया गया आदेश उस खण्ड के आयुक्त या राज्य सरकार के पुनरीक्षण के अध्यधीन होगा किन्तु यथापूर्वोक्त के सिवाय वह अन्तिम होगा।

(5) ऐसी किसी क्षति के लिए जिसके लिए, इस धारा के अधीन प्रतिकर अधिनिर्णीत हुआ है, सिविल वाद नहीं चलेगा।

स्पष्टीकरण-

इस धारा में 'निवासियों' शब्द का वही अर्थ है जो ठीक पूर्ववर्ती धारा में है।

16. धारा 13, 14, 15 और 15- के अधीन संदेय धनों की वसूली और वसूली होने पर उनका व्ययन

(1) धारा 13, 14, 15 और 15- के अधीन देय सब घन जिले के मजिस्ट्रेट द्वारा उस रीति में जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1882 (1882 का 10) की धारा 386 और 387 द्वारा जुर्माना की वसूली के लिए उपबन्धित है, या किसी सक्षम न्यायालय में वाद द्वारा वसूल किए जा सकेंगे। (1. अब दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 421 एवं 422 को देखिए।)

(2) [विशत]

(3) धारा 15- के अधीन संदस या वसूल किए गए सब धन, जिले के मजिस्ट्रेट द्वारा उन व्यक्तियों को, जिनको और उन अनुपातों में, जिनमें में इस धारा के अधीन संदेय हैं, दिए जाएंगे।

17. विशेष पुलिस अधिकारी-

जब यह प्रतीत हो कि कोई विधिविरुद्ध जमाव या बलवा या शान्ति भंग हुई है या युक्तियुक्त रूप से होने की आशंका है और शान्ति के परिरक्षण के लिए सामान्यतया नियोजित पुलिस बल उस स्थान में, जहाँ ऐसा विधिविरुद्ध जमाव या बलवा या शान्ति भंग हुई है, या होने की आशंका है, शान्ति के परिरक्षण के लिए और निवासियों के संरक्षण और सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है तब निरीक्षक की पंक्ति से अनिम्न पंक्ति के किसी पुलिस अधिकारी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह निकटतम मजिस्ट्रेट से यह आवेदन करे कि आस-पास के इतने निवासी, जितने पुलिस अधिकारी अपेक्षा करे, ऐसे समय के लिए और ऐसी सीमाओं के अन्दर जैसा कि वह आवश्यक समझे, विशेष पुलिस अधिकारियों के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त कर दिए जाएँ और जिस मजिस्ट्रेट से ऐसा आवेदन किया जाता है वह, जब तक कि इसके प्रतिकूल कारण दिखाई पड़े, आवेदन का अनुवर्तन करेगा।

18. विशेष पुलिस अधिकारियों की शक्तियाँ

इस प्रकार नियुक्त प्रत्येक पुलिस अधिकारी की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और परित्राण पुलिस के सामान्य अधिकारी के समान होंगे और वह पुलिस के खामान्य अधिकारी के समान वैसे ही कर्त्तव्यों का पालन करने के दायित्वधीन होगा और वैसे ही शास्तियों और वैसे ही अधिकारियों के अधीनस्थ होगा।

19. विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में सेवा करने से इन्कार-

यदि कोई व्यक्ति यथापूर्वोक्त विशेष पुलिस अधिकारी नियुक्त किए जाने पर पर्याप्त प्रतिहेतु के बिना ऐसी सेवा करने में या ऐसी विधिपूर्ण आज्ञा या निदेश का, जो उसे, उसके कर्त्तव्यों के पालन के लिए किया जाय, अनुवर्तन करने में उपेक्षा या इन्कार करता है तो वह किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष दोषसिद्धि पर ऐसी

प्रत्येक उपेक्षा, इन्कार या अवज्ञा करने के लिए पचास रुपये से अनधिक जुर्माने से दण्डनीय होगा।

20. पुलिस अधिकारियों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला प्राधिकार-

इस अधिनियम के अधीन भर्ती किए गए पुलिस अधिकारी इस अधिनियम और दण्ड प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए इसके पश्चात् पारित किसी अधिनियम के अधीन पुलिस अधिकारी के उपबन्धित प्राधिकार के सिवाय किसी प्राधिकार का प्रयोग नहीं करेंगे।

21. ग्राम पुलिस अधिकारी-

इस अधिनियम में कोई बात किसी आनुवंशिक या अन्य ग्राम पुलिस अधिकारी को प्रभावित नहीं करेगी जब तक कि वह अधिकारी इस अधिनियम के अधीन पुलिस अधिकारी के रूप में भर्ती नहीं किया जाए। इस प्रकार भर्ती किए जाने पर ऐसा अधिकारी ठीक पूर्ववर्ती धारा के उपबन्धों से आबद्ध होगा। कोई आनुवंशिक या अन्य ग्राम पुलिस अधिकारी बिना अपनी सम्मति के और बिना उनकी सम्मति के, जिन्हें नाम निर्देशन का अधिकार है, भर्ती नहीं किया जाएगा।

फोर्ट विलियम की प्रेसिडेन्सी में पुलिस चौकीदार-

1856 के अधिनियम 20 के अधीन (बंगाल में फोर्ट विलियम की प्रेसिडेन्सी में नगरों, शहरों, स्टेशनों, नगरांचलों और बाजारों में पुलिस चौकीदार को नियुक्त करने और बनाए रखने के लिए अधिक अच्छा उपबन्ध करने के लिए) नियुक्त कोई पुलिस अधिकारी उस जिले के बाहर नियोजित किया जाता है, जिसके लिए वह उस अधिनियम के अधीन नियुक्त किया गया है तो उसको उस जिले के लिए उक्त अधिनियम के अधीन उद्‌गृहीत स्थानीय करों से संदाय नहीं किया जाएगा।

22. पुलिस अधिकारी सदैव कर्त्तव्यारूढ़ होंगे औरराजिले के किसी भी भाग में नियोजित किए जा सकेंगे-

प्रत्येक पुलिस अधिकारी इस अधिनियम में अन्तविष्ट सब प्रयोजनों के लिए, सदैव कर्तव्यारूढ़ माना जाएगा और किसी भी समय साधारण पुलिस जिले के किसी भी भाग में पुलिस अधिकारी के रूप में नियोजित किया जा सकेगा।

23. पुलिस अधिकारियों के कर्त्तव्य-

प्रत्येक पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि यह किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे विधिपूर्णतः जारी किए गये सब आदेशों और वारण्टों का सल्ला पालन और निष्पादन करे, लोक शान्ति को प्रभावित करने वाले गुप्त वार्ता का संग्रहण और संसूचना करे, अपराधों और लोक न्यूसेन्स के किए जाने का निवारण करे, अपराधियों का पता चलाए और न्यायालय के समक्ष लाए गए उन सब व्यक्तियों को पकड़े, जिन्हें पकड़ने के लिए वह वैथतः प्राधिकृत है और जिनको पकड़ने के लिए पर्याप्त आधार विद्यमान हैं, और प्रत्येक पुलिस अधिकारी के लिये इस धारा में वर्णित प्रयोजनों में से किसी के लिए किसी मदिरालय, आंचर, या धष्ट या उच्छृखंल व्यक्तियों के समागम के अन्य स्थान में बिना वारण्ट प्रवेश करना और उसका निरीक्षण करना विधिपूर्ण होगा।

24. पुलिस अधिकारी इत्तिला इत्यादि कर सकेंगे-

किसी पुलिस अधिकारी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह कोई इत्तिला मजिस्ट्रेट को दे, औरं समन, चारण्ट, तलाशी वारण्ट या अन्य ऐसी विधिक आदेशिका के लिये, जो अपराध करने वाले किसी व्यक्ति के विरुद्ध विधि के अनुसार निकाली जा सकती है, आवेदन करे।

25. पुलिस अधिकारी बिना दावे वाले सम्पत्ति को अपने भार-साधन में लेंगे और इसके व्ययन की बाबत मजिस्ट्रेट के आदेशों के अधीन होंगे-

प्रत्येक पुलिस अधिकारी का यह कर्त्तव्य होगा कि वह सब बिना दावाली सम्पत्ति की अपने भार-साधन में ले और उसकी तालिका जिले के मजिस्ट्रेट को ट्रे।

पुलिस अधिकारी ऐसी सम्पत्ति के व्ययन के विषय में ऐसे आदेशों के मार्ग-दर्शन लेकर कार्य करेंगे जो उन्हें जिले के मजिस्ट्रेट से प्राप्त हों।

26. मजिस्ट्रेट सम्पत्ति को निरुद्ध कर सकेगा और उद्घोषणा निकाल सकेगा-

(1) जिले का मजिस्ट्रेट सम्पत्ति को निरुद्ध कर सकेगा, और उन वस्तुओं का जिनके रूप में वह है विनिर्देश करते हुए और यह अपेक्षा करते हुए उद्घोषणा निकाल सकेगा कि कोई व्यक्ति जो उस पर कोई दावा रखता है, ऐसी उदघोषणा की तारीख से छः मास के अन्दर उपसंजात होकर उस पर अपना अधिकार स्थापित करे।

(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1882 (1882 का 10) की धारा 525 के उपबन्ध, इस धारा में निर्दिष्ट सम्पत्ति को लागू होंगे। (1. अब दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 459 को देखिए।)

27. यदि कोई दावेदार उपसंजात नहीं होता तो सम्पत्ति का अधिहरण-

(1) यदि कोई व्यक्ति ऐसी सम्पत्ति पर या यदि वह बेच दी गई है, तो उसके आगमों पर उस कालावधि के अन्दर जो अनुज्ञात की गई है, दावा नहीं करता है, तो यदि वह ठीक पूर्ववर्ती धारा की उपधारा (2) के अधीन पहले ही बेच नहीं दी गई है तो वह जिले के मजिस्ट्रेट के आदेशों के अधीन बेच दी जाएगी

(2) पूर्ववर्ती उपधारा के अधीन बेची गई सम्पत्ति के विक्रय आगम और धारा 26 के अधीन बेची गई सम्पत्ति के आगम जिन पर कोई दावा स्थापित नहीं हुआ है, राज्य सरकार के व्ययनाधी होंगे।

28. पुलिस अधिकारी रहने पर प्रमाणपत्र इत्यादि का परिदान करने से इन्कार करने वाले व्यक्ति-

इस अधिनियम के अधीन भर्ती किया गया पुलिस अधिकारी रहने पर प्रत्येक व्यक्ति, जो अपना प्रामणपुत्र और वस्त्र, साज-सज्जा, नियुक्तियों और अन्य आवश्यक वस्तुओं को, जो उसे उसके कर्तव्य के निष्पादन के लिए प्रदाय की गई थीं, तत्काल परिदान नहीं करता है, मजिस्ट्रेट के समक्ष दोषसिद्धि पर दो सौ रुपये से अनधिक शास्ति या छः मास से अनधिक कालावधि के लिए कठोर श्रम सहित या रहित कारावास से या दोनों से दण्डनीय होगा।

29. कत्र्त्तव्य इत्यादि की उपेक्षा के लिए शास्तियाँ-

प्रत्येक पुलिस अधिकारी जो कर्त्तव्य के किसी अतिक्रमण. या सक्षम अधिकारी द्वारा बनाए गए किसी नियम या विनियम या दिये गये विधिपूर्ण आदेश को जान-बूझ कर भंग या उपेक्षा करने का दोषी है या जो अपने पद के कर्त्तव्य से बिना अनुज्ञा के या बिना दो मास की कालावधि की पूर्व सूचना दिए प्रत्याहरण करता है या जो छुट्टी पर अनुपस्थित होने पर ऐसी छुट्टी के अवसान पर, बिना युक्तियुक्त कारण के कर्त्तव्य पर उपस्थित नहीं होता है या जो बिना प्राधिकार के अपने पुलिस कत्र्तव्य से भिन्न किसी नियोजन में लगता है या जो कायरता का दोषी है या जो अपनी अभिरक्षा में के किसी व्यक्ति के प्रति अवैध शारीरिक हिंसा करता है, मजिस्ट्रेट के समक्ष दोषसिद्धि पर तीन मास के वेतन से अनधिको शास्ति या तीन मास से अनधिक कालावधि के लिए कठोर श्रम सहित या रहित कारावास से या दोनों से दण्डनीय होगा।

टिप्पणी

धारा 29 धारा 7 के प्रवर्तन को सीमित नही करती। (1. ए० आई० आर० 1969 एस० सी० 1020)

30. लोक जमावों और जुलूसों का विनियमन और उनके लिये अनुज्ञप्ति देना -

(1) पुलिस का जिला अधीक्षक या 2 अपर जिला अधीक्षक या संयुक्त जिला अधीक्षक या सहायक जिला अधीक्षक), लोक सड़कों पर या लोक मार्गों पर या आम रास्तों में सब जमाव और जुलूसों के आचरण को अवसर पर यथा अपेक्षित रूप में निर्दिष्ट कर सकेगा और वे मार्ग जिनसे और समय, जिन पर, ऐसे जुलूस जा सकेंगे, विहित कर सकेगा। (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

(2) वह, यह समाधान होने पर कि किन्हीं व्यक्तियों या किन्हीं व्यक्तियों के वर्ग का किसी ऐसी सड़क, मार्ग या आम रास्ते में ऐसा कोई जमाव बुलाने या एकत्र करने या ऐसा कोई जुलूस बनाने का आशय है, जिनकी बाबत जिले के या जिले के उपखंड के मजिस्ट्रेट का यह विचार है कि यदि वह अनियन्त्रित रहा तो शान्ति भंग होने की सम्भाव्यता है, साधारण या विशेष सूचना द्वारा यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसे सम्मेलन को बुलाने या एकत्र करने वाले या ऐसे जुलूस का निदेशन या सम्प्रवर्तन करने वाले व्यक्ति अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन करें।

(3) ऐसा आवेदन किए जाने पर वह अनुज्ञप्तिधारी के नामों को विनिर्दिष्ट करके और उन शर्तों को परिनिश्चित करके, जिन पर ही ऐसा जमाव करने या ऐसा जुलूस बनाने के लिए अनुज्ञा दी गई है, और इस धारा को अन्यथा प्रभावी करने वाली अनुज्ञप्ति दे सकेगा:

परन्तु ऐसी किसी अनुज्ञप्ति के लिये आवेदन या उसके अनुदान पर कोई फीस नहीं लगाई जाएगी।

(4) मार्गों में संगीत-वह त्यौहारों और समारोहों के अवसर पर मार्गों में कितना संगीत हो, उसको भी विनियमित कर सकेगा।

30-. अनुज्ञप्ति की शर्तों का अतिक्रमण करने वाले जमावों और जुलूसों के सम्बन्ध में शक्तियाँ-

कोई मजिस्ट्रेट या पुलिस का जिला अधीक्षक या पुलिस का [अपर जिला अधीक्षक, या संयुक्त जिला अधीक्षक या सहायक अधीक्षक या पुलिस निरीक्षक या थाने का भारसाधक पुलिस अधिकारी ऐसे किसी जूलूस को, जो अन्तिम पूर्वगामी धारा के अधीन अनुदत्त किसी अनुज्ञप्ति को शतों का अतिक्रमण करता है, रोक सकेगा और उसे या ऐसे किसी जमाव को, जो किन्हीं यथापूर्वोक्त शर्तों का अतिक्रमण करता है, बिखर जाने का आदेश दे सकेगा। (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

(2) जो कोई जुलूस या जमाव अन्तिम पूर्ववर्ती उपधारा के अधीन दिये गये किसी आदेश के पालन करने में उपेक्षा करता है या इन्कार करता है वह विधिविरुद्ध जमाव समझा जायगा।

टिप्पणी

धारा 30- की उपधारा (2) के अन्तर्गत आये शब्द विधिविरुद्ध जमाव का तात्पर्य धारा 141 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत विधिविरुद्ध जमाव से है।

31. पुलिस लोक सड़कों इत्यादि पर व्यवस्था बनाए रखेगी-

पुलिस का यह कर्त्तव्य होगा कि वह सड़कों पर और लोक मागों, आम रास्तों, घाटों और उतरने के स्थानों और लोक समागम के अन्य सब स्थानों में व्यवस्था बनाए रखे और जमावों और जुलूसों के होने के अवसर पर लोक सड़कों और लोक मार्गों में लोक उपासना के समय उपासना स्थानों के आस-पास और किसी भी अवस्था में, जब किसी सड़क मार्ग, आम रास्ता, घाट या उतरने के स्थान पर भीड़ हो या उसमें बाधा होने की सम्भावना हो, बाधाओं का निवारण करे।

32. ठीक पूर्ववर्ती तीन धाराओं के अधीन निकाले गये आदेशों की अवज्ञा के लिए शास्ति-

ठीक पूर्ववर्ती तीन धाराओं के अधीन निकाले गए आदेशों का विरोध या अवज्ञा करने वाला या संगीत के लिए या जमावों और जुलूसों के आचरण के लिए पुलिस के जिला अधीक्षक या [ अपर जिला अधीक्षक या संयुक्त जिला अधीक्षक या सहायक जिला अधीक्षक] द्वारा अनुदत्त किसी अनुज्ञप्ति की शर्तों का अतिक्रमण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति मजिस्ट्रेट के समक्ष दोषसिद्धि पर दो सौ रुपये से अनधिक जुर्माने से दण्डनीय होगा। (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

32-. सामूहिक ड्रिल और सामूहिक प्रशिक्षण आदि को निषिद्ध करने की शक्ति

(1) जिले का मजिस्ट्रेट, जब लोक अथवा लोक सुरक्षा अथवा लोक परिशान्ति रखने के लिए ऐसा करना आवश्यक समझता हो, तो या तो सार्वजनिक सूचना द्वारा अथवा किसी स्थान में निवास करने वाले व्यक्ति को आदेश द्वारा, अपने क्षेत्राधिकार में पड़ने वाले किसी भाग में, अस्त्र ले जाने, अथवा सामूहिक ड्रिल करने अथवा अस्त्र लेकर सामूहिक प्रशिक्षण लेने से रोक सकता है, जहाँ यह युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती है कि ऐसे सामूहिक ड्रिल अथवा सामूहिक प्रशिक्षण में भाग लेने के कारण लोगों के अन्दर अथवा उसके किसी वर्ग के बीच भय उत्पन्न हो सकता है अथवा असुरक्षा की भावना को जगा सकता है। (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 5 सन् 1985 द्वारा अन्तः स्थापित।)

स्पष्टीकरण-

इस धारा के उद्देश्य के लिए "अस्त्र" शब्द का तात्पर्य किसी भी प्रकार के घातक हथियार से है जिसके अन्तर्गत लाठी, डण्डा, छड़ी अथवा बेलचा शामिल है।

(2) इस धारा के अन्तर्गत कोई भी निषेधाज्ञा तीन माह से अधिक समय तक प्रवृत्त रहेगी:

परन्तु यदि राज्य सरकार इसे लोक प्रशान्ति को बढ़ाने हेतु अथवा लोक शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखने के लिए आवश्यक समझती है, तो यह अधिसूचना द्वारा निर्देशित कर सकती है कि जिला के मजिस्ट्रेट द्वारा उपधारा (1) के अमार्गत जारी की गई सार्वजनिक सूचना अथवा आदेश, आगामी अधिधि एक रहेंगे, जितकी अवधि उस तिथि सेधिः भास से अधिक नहीं होगी जिस तिथि को यह ऐसी सूचना अथवा आदेश समाप्त हो जाता है अथवा अधिसूचना द्वारा निर्देशित किया जाता।

(3) जिले का मजिस्ट्रेट, स्वयं अपने आप अथवा किसी व्यधित व्यक्ति के आवेदन पर उपधारा (1) के अन्तर्गत अपने द्वारा पारित किये गये आदेश को विखण्डित अथवा परिवर्तित कर सकता है।

(4) राज्य सरकार या तो रैवत अथवा किसी व्यक्ति के आवेदन पर उपधारा (2) के परन्तुक के अन्तर्गत पारित किये गये अपने आदेश को अथवा जिले के मजिस्ट्रेट द्वारा उपधारा (2) के अन्तर्गत पारित आदेश को विखण्डित अथवा परिवर्तित कर सकती है।

(5) जब उपधारा (3) अथवा उपधारा (4) के अन्तर्गत, कोई प्रार्थनापत्र प्राप्त किया जाए तो जिले का मजिस्ट्रेट अथवा राज्य सरकार जैसा मामला हो, आवदेक को व्यक्तिगत रूप से अथवा किसी अधिवक्ता द्वारा अपने सामने उपस्थित होकर आदेश के विरोध में कारण दिखाने का अवसर प्रदान करेगा, और यदि जिले का मजिस्ट्रेट अथवा राज्य सरकार जैसी स्थिति हो अंशतः या पूर्णतः प्रार्थनापत्र को निरस्त कर देती है तो वह मजिस्ट्रेट अथवा राज्य सरकार ऐसा करने के कारणों को अभिलिखित करेगी।

32-. धारा 32- के अन्तर्गत वर्णित नियमों के उल्लंघन के लिए दण्ड-

(1) जो कोई, धारा 32-, के अन्तर्गत वर्णित निषेधों का उल्लंघन करता है, वह मजिस्ट्रेट के सामने ऐसे कारावास से जिसकी अवधि छः मास तक की हो सकेगी अथवा अर्थदण्ड से दण्डित किया जाएगा जो दो हजार रुपये तक को हो सकेगा अथवा दोनों से दण्डित किया जाएगा।

(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में किसी बात के विषय का होते हुए, इस धारा के अन्तर्गत किये गये अपराध संज्ञेय होंगे।]

33. जिले मजिस्ट्रेट के नियंत्रण की व्यावृत्ति-

ठीक पूर्ववर्ती चारों धाराओं की किसी बात की बाबत यह समझा जायगा कि वह उनमें निर्दिष्ट मामलों पर जिले के मजिस्ट्रेट के साधारण नियंत्रण में हस्तक्षेप है।

34. सड़कों पर कतिपय अपराधों के लिए दण्ड इत्यादि

[(1)] कोई व्यक्ति जो ऐसे किसी शहर की सीमाओं के अन्दर, जिस पर इस [उपधारा] का विस्तार राज्य सरकार ने विशेषतया किया है, किसी सड़क पर या किसी खुले स्थान या मार्ग या आम रास्ते में निम्न अपराधों में से कोई अपराध करता है, जिससे निवासियों, परिदर्शकों] या यात्रियों को बाधा, असुविधा, क्षोभ, जोखिम, संकट या नुकसान पहुँचता है, वह मजिस्ट्रेट के समक्ष दीषसिद्धि पर पचास रुपये में अनधिक जुर्माने या कठोर परिश्रम सहित या रहित आठ दिन से) अनधिक कारावास से दण्डनीय होगा; और किसी पुलिस अधिकारी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उसके सामने ऐसे अपराधों में से कोई अपराध करता है, बिना वारण्ट के अभिरक्षा में ले ले, अर्थात्(1,2,3. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 32 सन् 1952 द्वारा पुनःसंख्यांकित )

प्रथम-डोर वध, बेतहाशा सवारी आदि-

कोई व्यक्ति जो किसी ढोर का वध करता है या

किसी पशु शव को साफ करता है, कोई व्यक्ति जो अन्धाधुन्ध या बेतहाशा किसी ढोर पर सवारी करता है या उसे हाँकता है या किसी घोड़े या अन्य पशुओं को फेरता या निकालता है।

द्वितीय-जीव-जन्तु के साथ निर्दयता-

कोई व्यक्ति जो किसी जीव-जन्तु को स्वैरिता या निर्दयता से मारता है, दुरुपयोग करता है या यातना देता है।

तृतीय- यात्रियों को बाधा पहुँचाना-

कोई व्यक्ति किसी डोर या किसी प्रकार के प्रवहण को उस पर माल लादने या उस पर से माल उतारने या यात्रियों को लाने या उतारने के लिये अपेक्षित समय से अधिक समय के लिये खड़ा करता है या जो किसी प्रवहण को इस तरह छोड़ देता है जिससे जनता को असुविधा होती है या संकट पैदा होता है।

चतुर्थ-विक्रय के लिए वस्तुओं को अभिदर्शित-

करना कोई व्यक्ति जो विक्रय के लिए किन्हीं वस्तुओं को अभिदर्शित करता है।

पंचम-मार्ग पर धूल फेंकना-

कोई व्यक्ति जो किसी कर्कट, गन्दगी, कूड़ा या किन्हीं पत्थरों या इमारती सामग्री को फेंकता या डालता है या जो किसी गोशाला या अश्वशाला या तत्सदृश संनिर्माण करता है या जो किसी गृह, कारखाने, गोबर या पशुओं के मल के ढेर या तत्सदृश से कोई संतापकारी पदार्थ बहाता है।

षष्ठ-मत्त या बलवात्पक पाया जाना-

कोई व्यक्ति जो मत्त या बलवात्मक पाया जाता है या अपनी सम्भाल करने में असमर्थ है।

सप्तम-शरीर का अशिष्ट अभिदर्शन-

कोई व्यक्ति जो जानबूझकर और अशिष्टता से अपने शरीर को या किसी संतापकारी अंग विकार या रोग को अभिदर्शित करता है या किसी तालाब जा जलाशय में, जी उस प्रयोजन के लिए पृथक् नहीं रखा गया है, मल-मूत्र त्याग, स्नान या धोने की क्रिया द्वारा न्यूसेन्स करता है।

अष्टम - संकटपूर्ण स्थानों के संरक्षण में उपेक्षा-

कोई व्यक्ति जो कुएं, तालाब या अन्य संकटपूर्ण स्थान या संरचना को बाड़ लगाने या सम्यरूपेण संरक्षित करने में उपेक्षा करता है।

[(2) राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा किसी ग्रामीण क्षेत्र में, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हो, उपधारा (1) के प्रावधानों को विस्तारित कर सकेगी तथा तदन्तर इसका प्रावधान ऐसे क्षेत्रों, जिसको उक्त उपधारा विशेष रूप से विस्तारित की गई है, को लागू होगी, मानो वह नगर हो। (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 32 सन् 1952 द्वारा बोड़ा गया।)

(3) की उपधारा (2) के अधीन विस्तार विनिर्दिष्ट अवधि के लिए तथा अपराधों में से सभी या किसी के सम्बन्ध में होगा जैसा कि विनिर्दिष्ट किया जाये।]

[34-. धारा 32 तथा 34 के अधीन अपराधों का प्रशमन (समझौता) –

धारा 32 या धारा 34 के अधीन दण्डनीय अपराध का, राज्य सरकार के इस निमित्त किसी साधारण अथवा विशेष आदेश के अध्यधीन, जिला पुलिस अधीक्षक द्वारा या तो अभियोजन को संस्थित किये जाने के पूर्व अथवा पश्चात् प्रशमन ऐसी संहत फीस जैसा कि वह ठीक समझे, की वसूली पर, जो अपराध के लिए नियत जुर्माने की अधिकतम धनराशि से अधिक हो, किया जा सकेगा और जब अपराध का इस प्रकार प्रशमन- (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 35 सन् 1979 द्वारा अन्तः स्थापित।)

(i) अभियोजन को संस्थित किये जाने के पूर्व किया जाता है, तब अपराधी ऐसे अपराध के अभियोजन के लिए दायी नहीं होगा और मुक्त कर दिया जाएगा, यदि अभिरक्षा में हो,

(ii) अभियोजन को संस्थिति किये जाने के बाद किया जाता है तो संहत फीस की वसूली अपराधी की दोषमुक्ति मानी जाएगी।]

35. अधिकारिता

इस अधिनियम के अधीन कांस्टेबल की पंक्ति से ऊपर के पुलिय अधिकारी के विरुद्ध किसी आरोप की जाँच और अवधारण मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग करने बाले अधिकारी द्वारा ही किया जायगा।

36. अन्य विधि के अधीन अभियोजित करने की शक्ति प्रभावित नहीं होगी-

इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह इस अधिनियम द्वारा दण्डनीय किए गए किसी अपराध के लिए किसी अन्य विनियम या अधिनियम के अधीन अभियोजन किए जाने से या किसी अन्य विनियम या अधिनियम के अधीन इस अधिनियम द्वारा ऐसे अपराध के लिए उपबन्धित से भिन्न या उच्चतर शास्ति या दण्ड के लिए दायित्वाधीन होने से किसी व्यक्ति को निवारित करती है:

परन्तु कोई व्यक्ति उसी अपराध के लिए दो बार दण्डित नहीं किया जायगा।

37. मजिस्ट्रेट द्वारा अधिरोपित शास्तियों और जानों की वसुली

भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का 45) की धारा 64 से 70 तक के दोनों धाराओं सहित, और दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1882 (1882 का 10) की धारा 38 से लेकर 389 तक की दोनों धाराओं सहित, जुर्मानों से सम्बंधित उपबंध मजिस्ट्रेट के समक्ष दोषसिद्ध पर इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित शास्तियों और जुर्मानों को लागू होना (1. अब दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 421 से 425 को देखिए।))

परन्तु प्रथम वर्णित संहिता की धारा 65 में किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम की धारा 34 के अधीन जुर्माने से दण्डादिष्ट कोई व्यक्ति, ऐसे जुर्माने के संदाय में व्यतिक्रम करने पर आठ दिन से अनधिक किसी कालावधि के लिए कारावासित किया जा सकेगा।

38-41. [निरस्त]

42. कार्यवाहियों के लिये परिसीमा-

किसी व्यक्ति के विरुद्ध वे सब कार्यवाहियों और अभियोजन, जो इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन की गई या किये जाने के लिए आशायित या एतद्वारा दी गई साधारण पुलिस शक्तियों के अधीन की गई किसी बात के लिए, वैधतः किए जा सकते हैं, परिवादित कार्य के किए जाने के पश्चात् तीन मास के अन्दर कि अन्यथा किए जाएंगे और ऐसे वाद को, और उसके हेतुक की, लिखित सूचना प्रतिवादी को या उस जिले के, जिसमें कार्य किया गया था, जिला अधीक्षक या [अपर जिला अधीक्षक या संयुक्त जिला अधीक्षक या सहायक जिला अधीक्षक को वाद के आरम्भ से कम से कम एक मास पूर्व दी जाएगी। (2. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

अभितुष्टि की निविदा-

ऐसे वाद के चलाए जाने से पूर्व यदि प्रतिवादी के द्वारा या निमित्त पर्याप्त अभितुष्टि की निविदा की गई है या ऐसे वाद के चलाए जाने के पश्चात् धन की पर्याप्त राशि न्यायालय में संदाय कर दी गई है तो कोई परिवादी ऐसे किसी वाद में प्रत्युद्धरणीय राशि नहीं पाएगा और चाहे किसी ऐसे वाद में परिवादी के पक्ष में डिक्री ली गई हो तो भी, जब तक कि वह न्यायाधीश, जिसके समक्ष विचारण हुआ है, वह प्रमाणित कर दे कि कार्यवाही को मेरा अनुमोदन प्राप्त है ऐसे परिवादी को प्रतिवादी के विरुद्ध कोई खर्चा नहीं दिया जाएगा।

परन्तुक-परन्तु सदैव यह कि उस दशा में कोई कार्यवाही होगी जहाँ ऐसे अधिकारियों का उसी कार्य के लिए आपराधिक अभियोजन हो चुवा है।

43. चह अभिवचन कि कार्य वारण्ड के अधीन किया गया था

जब किती पुलिस अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाही या अभियोजन अधिकारी की हैसियत में उसके द्वारा किए गए किसी कार्य के लिए चलाया जाए या कोई कार्यवाहियों की जाएँ तो उसके लिए यह अभिवचन करना विधिपूर्ण होगा कि उसने ऐसा कार्य मजिस्ट्रेट द्वारा निकाले गये वारण्ट के प्राधिकार के अधीन किया था।

ऐसा अभिवचन उस कार्य का निर्देश देने वाला और मजिस्ट्रेट द्वारा जिसका हस्ताक्षरित होना वात्पर्थित है ऐसा वारण्ट पेश करके सिद्ध किया जाएगा और तब प्रतिवादी, ऐसे मजिस्ट्रेट की अधिकारिता में कोई त्रुटि होने पर भी अपने पक्ष में डिक्री पाने का हकदार होगा, जब तक व्यायालय को ऐसे मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर के असली होने पर शंका का कारण हो उसके हस्ताक्षर को सिद्ध करना आवश्यक होगा

परन्तु सदैव यह कि ऐसा वारण्ट निकालने वाले प्राधिकारी के खिलाफ जो कोई उपचार पक्षकार को प्राप्त है, वह इस धारा में अन्तर्विष्ट किसी बात से प्रभावित होगा।

44. पुलिस अधिकारी डायरी रखेंगे-

प्रत्येक पुलिस थाने के भारसाधक पदाधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे प्ररूप में, जो राज्य सरकार, समय-समय पर विहित करे, एक साधारण डायरी रखे और किये गए सब परिवादों और आरोपों को, गिरफ्तार किए गये सब व्यक्तियों के नामों को, परिवादियों के नामों को उनके विरुद्ध आरोपित अपराधों को, उन आयुधों या सम्पत्ति जो उनके कब्जे से अन्यथा दी गई हो, और उन साक्षियों के नामों को, जिनकी परीक्षा की गई है, उसमें अभिलिखित करे

जिले का मजिस्ट्रेट ऐसी डायरी मंगवाने और उसका निरीक्षण करने के लिए स्वतन्त्र होगा।

45. राज्य सरकार विवरणियों का प्ररूप विहित कर सकेगी-

राज्य सरकार यह निदेश दे सकेगी कि [महानिदेशक एवं महानिरीक्षक और अन्य पुलिस अधिकारी ऐसी विवरणियों भेजें, जो राज्य सरकार को उचित प्रतीत हो, और राज्य सरकार वह प्ररूप विहित कर सकेगी जिसमें ऐसी विवरणियाँ दी जाएंगी। (1. उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 10 सन् 1984 द्वारा प्रतिस्थापित।)

46. अधिनियम की परिधि

यह अधिनियम अपने ही प्रवर्तन से किसी प्रेसिडेन्सी, राज्य या स्थान में प्रभावशील नहीं होगा।

किन्तु राज्य सरकार राज्य-पत्र में प्रकाशित किये जाने वाले आदेश द्वारा इस सम्पूर्ण अधिनियम या उसके किसी भाग का विस्तार किसी प्रेसीडेन्सी राज्य या स्थान पर कर सकेगी और यह सम्पूर्ण अधिनियम या इसका उतना भाग, जो ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट हो तदनन्तर ऐसी प्रेसीडेन्सी, राज्य या स्थान में प्रभावशील होगा।

(2) जब यह सम्पूर्ण अधिनियम या इसका कोई भाग इस प्रकार विस्तारित कर दिया जायगा तब राज्य सरकार-

() इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उन पर अधिरोपित किसी कर्त्तव्य के निर्वहन में मजिस्ट्रेटों और पुलिस अधिकारियों द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए;

() समय, रीति और उन शतों को, जिनके अन्दर और जिनके अधीन धारा 15- के अधीन प्रतिकर के लिए दावे किए जाने हैं, ऐसे दावों में कथन की जाने वाली विशिष्टियों को, वे जिस रीति में सत्यापित की जानी हैं उसको और उनके परिणाम-स्वरूप जो कार्यवाहियाँ (जिनके अन्तर्गव, यदि आवश्यक हो तो, स्थानीय जाँच है) की जानी है उन्हें विहित करने के लिए, और

() साधारणतः इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के लिए, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समय-समय पर इस अधिनियम से संगत नियम बना सकेगी।

(3) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए सब नियम समय-समय पर राज्य सरकार द्वारा संशोधित, परिवर्द्धित या रद्द किये जा सकेंगे।

47. पुलिस के जिला अधीक्षक का ग्राम पुलिस पर प्राधिकार-

राज्य सरकार के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसी राज्य सरकार के अधीन राज्यक्षेत्र के किसी भाग में इस अधिनियम को प्रभावशील करने में यह घोषित करे कि जो प्राधिकार जिले का मजिस्ट्रेट पुलिस के प्रयोजनों के लिए किसी ग्राम चौकीदार या अन्य ग्राम पुलिस अधिकारी पर प्रयोग करता है या कर सकता है उसे पुलिस का जिला अधीक्षक जिले के मजिस्ट्रेट के साधारण नियन्त्रण के अधीन, प्रयोग करेगा।-

प्ररूप

(धारा 8 देखिए)

, 1861 के अधिनियम 5 के अधीन पुलिस बल का सदस्य नियुक्त किया गया है और उसमें पुलिस अधिकारी को शक्तियाँ, कृत्य और विशेषाधिकार निहित किए गए हैं।

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