पैरा 147 से 164 अध्याय 13 UP पुलिस रेगुलेशन

पैरा 147 से 164 अध्याय 13 UP पुलिस रेगुलेशन

अध्याय 13

गिरफ्तारी, जमानत और अभिरक्षा

147. कोई व्यक्ति, किसी ऐसे व्यक्ति को जिसे वह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 41 (1) के अधीन गिरफ्तार करने की सशक्त हो, पुलिस अधिनियम (1961 को पाँचवाँ) के अधीन नामांकित किसी सिपाही को ऐसी सूचना देकर जिससे यह औचित्य प्रकट हो जावे कि वह अधिकारी उस धारा के अधीन अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुये गिरफ्तार करने को सशक्त है, गिरफ्तार करवा सकता है। धारा 41 (1) के प्रयोजन के लिये, किसी तार के बारे में किसी व्यक्ति के संज्ञेय अपराध से सम्बन्धित होने की विश्वसनीय सूचना होना समझा जा सकता है। थाने का भारसाधक अधिकारी या दण्ड प्रक्रिया संहिता के बारहवें अध्याय के अधीन अन्वेषण कर रहा कोई अधिकारी उस व्यक्ति को जिसे वह धारा 41 के अधीन गिरफ्तार करने को सशक्त अपने अधीन किसी अधिकारी को धारा 55 के अधीन लिखित आज्ञा देकर गिरफ्तार करवा सकता है। थाने का भारसाधक अधिकारी सदैव ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध धारा 55 के अधीन आदेश जारी कर सकेगा जिसे वह धारा 41 के अधीन गिरफ्तार करने के लिये सशक्त हो।

147-. (1) लोकसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियमों और उत्तर प्रदेश विधानसभा को प्रक्रिया और कार्य सभालन के नियमों के अनुसार लोकसभा और विधानसभा का कोई सदस्य जब कभी किसी आपराधिक आरोप या अपराध के लिए गिरफ्तार किया जावे या न्यायालय द्वारा कारावास से दन्डित किया जावे या किसी कार्यपालिका आदेश के अधीन निरुद्ध किया जावे, सौंपने वाले न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या कार्यपालक प्राधिकारी जैसी कि स्थिति हो, विहित प्रारूप में, उसकी गिरफ्तारी, निरोध यां दोषसिद्ध के कारणों की जैसी कि स्थिति हो, सदस्य के निरोध या कारावास के I स्थान की सूचना स्पीकर को देगा। यही नियम यह उपबन्ध करते हैं कि जब कोई सदस्य गिरफ्तार

(1. आल इ०रि० 1954 त्रावणकोर 300.

2. ए०आई०आर० 1949 इलाहाबाद 291.

3. ए०आई०आर० 1954 मंद्रास 229.

4. ए० आई० आर० 1935 कलकत्ता 861 आई०एल०आर० (1956) 2 कलकत्ता 66. )

किया जावे और दोषसिद्ध ठहराया जावे और अपील के लम्बित रहने तक जमानत पर मुक्त या अन्यथा उन्मोचित कर दिया जावे, ऐसी ही सदृश्य प्रक्रिया राज्य सभा या विधान परिषद के सदस्यों की दशा में अनुसरण किया जाना अपेक्षित है और यही प्रारूप आवश्यक फेरफार के साथ उपयोग किए जावेंगे।

(2) उस थाने के भारसाधक अधिकारी का जिसकी अधिकारिता के भीतर गिरफ्तारी की गई हो या ऐसे सदस्य की गिरफ्तारी करने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि यह गिरफ्तारी के बारे में विस्तृत विवरण और यदि सदस्य जमानत पर उन्मोचित कर दिया गया हो तो उसके बाबत विवरण भी तत्काल उस मजिस्ट्रेट न्यायाधीश वा कार्यपालक प्राधिकारी जिसके आदेश के अधीन गिरफ्तारी की गई हो, सम्बन्धित सदन के स्पीकर या सभापति को अपेक्षित सूचना संसूचित करने के लिये सूचित करें।

148. कोई पुलिस अधिकारी ब्रिटिश इण्डिया में कहीं भी उस अधिकारी का पीछा कर सकता है, जिसे गिरफ्तार करने को वह सशक्त हो। जहाँ देशी राज्यों से संबंध हो, पालन की जाने वाली प्रक्रिया के लिए चौबीसवाँ अध्याय देखें।

149. जब कोई ऐसा रेल सेवक, जिसको कर्तव्य पर से हटाये जाने से रेलवे के कार्यकलाप असंगठित हो जावे, गिरफ्तार किया जाना हो, उसकी गिरफ्तारी को तब तक के लिए टाल देना चाहिये जब तक कि वह कर्त्तव्य मुक्त न हो जावे, किन्तु यदि उसे तत्काल अवरोध में रखा जाना परामर्श योग्य हो तो उसे गिरफ्तार किया जा सकता है तथा रक्षा के अधीन उसे कत्र्तव्य करने दिया जा सकता है।

150. अधिनियम क्रमांक 5 सन् 1861 की धारा 34 के द्वारा पुलिस अधिकारियों को प्रदत्त गिरफ्तारी की शक्ति उस व्यक्ति के बारे में प्रयोग नहीं की जानी चाहिये, जिसका नाम और पता ज्ञात हो। ऐसे व्यक्ति से अपेक्षित किये जाने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होने के लिए एक बन्धपत्र निष्पादित करने के लिये कहना चाहिए।

151. जब कोई अभियुक्त किसी प्राइवेट व्यक्ति द्वारा गिरफ्तार किया जा कर थाने में लाया जावे, तो उसे थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा पुनः गिरफ्तार किया जाना चाहिए या दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 43 के उपबन्धों के अनुसार उन्मुक्त कर देना चाहिए।

152. दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 57 167 के द्वारा उस अवधि के सम्बन्ध में जिसमें बिना वारण्ट गिरफ्तार किया गया कोई व्यक्ति पुलिस अभिरक्षा में निरुद्ध किया जा सकता है, आरोपित निबन्धनों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। जैसा सबसे अधिक सुविधाजनक हो, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 58 द्वारा अपेक्षित गिरफ्तारी की रिपोर्ट आरोप-पत्र या अंतिम रिपोर्ट या पृथक रिपोर्ट द्वारा की जानी चाहिये।

153. जब कोई व्यक्ति अन्वेषण के दौरान गिरफ्तार किया जावे, अन्वेषणकर्ता अधिकारी, गिरफ्तारी के पश्चात् और अन्वेषण के प्रथम पग के रूप में उससे यह पूछेगा कि उसे पुलिस से दुर्व्यवहार की क्या कोई शिकायत है, और केस डायरी में प्रश्न और उत्तर दोनों को ही अभिलिखित करेगा। वह तथीं और वही, बन्दी की सहमति के अध्याधीन बन्दी के शरीर को, यह देखने के लिए कि क्या उस पर दुर्व्यवहार किये जाने के कोई चिह्न हैं, परीक्षण करेगा और अपने अन्वेषण की डायरी में यह प्रमाणित करते हुए कि उससे सर्वोत्तम ज्ञान और विश्वास में कि बन्दी दुर्व्यवहार से पीड़ित हुआ है या नहीं और क्या उसके शरीर पर दुव्र्व्यवहार के चिह्न हैं, अपने परीक्षण का परिणाम अभिलिखित करेगा। यदि बन्दों अपने शरीर का परीक्षण किये जाने से इन्कार कर दे तो इन्कारी और उसके बताये गये कारणों की अभिलिखित किया जावेगा। यदि दुर्व्यवहार का कोई आरोप लगाया जावे या दुर्व्यवहार के चिह्न बन्दी के शरीर पर पाये जावे, अन्वेषणकर्ता अधिकारी उस अन्वेषण को जिसके अधीन बन्दी को गिरफ्तार किया गया है, स्थगित कर देगा ताकि वह बन्दी को उसकी शिकायत, शारीरिक परीक्षा के अभिलेख, अन्य कोई उपलब्ध साक्ष्य और यदि संभव हो तो बन्दी की शिकायत के द्वारा फंसाये गये पुलिस अधिकारी, के साथ उस मजिस्ट्रेट को भेज सकेगा जिसे मामले की जाँच करने की अधिकारिता हो। जब-जब कभी ऐसी कार्यवाही की जावे, पुलिस अधीक्षक को तत्काल

सूचना दी जाये। यह प्रकिया तब अपनाई जावेगी जब कोई व्यक्ति अन्वेषण के दौरान के अतिरिक्त अन्यथा थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा गिरफ्तारी किया गया हो। ऐसे मामलों में प्रश्न और उत्तर थाने की सामान्य डायरियों में अभिलिखित किये जायेंगे।

टीप- इस पैरा द्वारा अपेक्षित, जब बन्दी महिला हो, किसी दूसरी महिला द्वारा शिष्टता का कठोरता से पालन करते हुए किया जावेगा।

154. दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 51 (1) के अधीन गिरफ्तार किये गये व्यक्ति की तलाशी जब ऐसे साक्षी उपलब्ध हों, पुलिस से असंबंधित दो साक्षियों के सामने ली जानी चाहिए। उस समस्त सम्पत्ति पर जो पुलिस द्वारा विनिग्रहीत की आवे, चिह्न डाले जावे, और एक सूची में प्रविष्ट की जावे। तलाशियाँ विचारपूर्वक और ऐसी गोपनीयता से जैसी हर मामले में संभव हो, ली जानी चाहिए। व्यक्ति को असम्यक रूप से अभिदर्शित किए जाने से बचना चाहिए।

155. गिरफ्तार किये गये किसी व्यक्ति को अनावश्यक कठिनाई या अपमान के अध्याधीन न किया जाये, गारद और मार्ग लक्षण के नियमों में अन्तर्विष्ट दोषसिद्ध और विचाराधीन बन्दियों को हथकडियाँ और बेड़ियाँ लगाने के अनुदेश जहाँ तक सम्भव हो सके, सभी गिरफ्तार बन्दियों को थाने के उनके रास्ते तक और बाहरी थानों से मुख्यालय तक ले जाने के लिये लागू होंगे।

मित्रों और विधिक सलाहकारों का परिदर्शन ऐसी पूर्वा विधानियों के अध्याधीन जो बन्दी को बचकर भाग निकलने या अन्यथा न्याय के आशयों को विफल करने से रोकने के लिए आवश्यक हो. अनुज्ञा दी जावेगी। यदि हथकडियाँ लगाई जाना हो तो ऐसी जोड़ी छाँटी जावे जो बन्दी की कलाई में फिट आ जावे और उसकी चाबी बन्दों के भारसाधक पुलिस अधिकारी की सीने की जेब से रहना चाहिए।

सड़क द्वारा यात्रा के लिये, यदि बन्दी या गिरफ्तार किया गया व्यक्ति किसी भाड़े के वाहन में यात्रा करने की इच्छा करे ही उसे ऐसा करने की अनुमति दी जानी चाहिए, बशर्ते कि वह अपना और मार्ग रक्षी का भाड़ा भुगताने को तैयार हो।

जब रेल से यात्रा कर रहे हो बन्दी या गिरफ्तार किया गया व्यक्ति साधारणतया तृतीय श्रेणी के डिब्बे में यात्रा करेंगे, किन्तु बन्दी या गिरफ्तार किया गया व्यक्ति पुलिस मार्ग रक्षक को सम्मिलित करते हुए उच्चतर श्रेणी का भाड़ा देने से तत्पर हो, तो उसे उसकी पसन्द की श्रेणी में यात्रा करने को अनुमति दी जानी चाहिए।

156. जब कभी कोई अभियुक्त गिरफ्तार किया जावे, अन्वेषक अधिकारी या थाने का भारसाधक अधिकारी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 169 और तैंतीसवें अध्याय के निर्देश में यह विचार करेगा कि क्या जमानत स्वीकार की जाये। जमानत तब तक अस्वीकार नहीं की जावेगी तब तक कि यह विश्वास करने के युक्तियुक्त कारण न हो कि अभियुक्त न अजमागतीय अपराध किया है और ऐसी परिस्थितियों में भी थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा जमानत मंजूर करना तब तक निषिद्ध (मना) नहीं है जब तक कि अपराध मृत्यु या आजीवन निर्वासन से दण्डनीय न हो। वह अन्वेषणकर्ता अधिकारी जो थाने का भारसाधक अधिकारी न हो, दण्ड संहिता की धारा 169 के अधीन रहने और जब अभियुक्त को अग्रेषित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य या युक्ति-युक्त कारण न होने के सिवाय, I जमानत पर नहीं छोड़ सकता। दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 436 437 के अन्तर्गत आने वाले मामलों में उसे अभियुक्त को अपनी सिफारिश के साथ थाने के भारसाधक अधिकारी के पास भेज देना चाहिए। उन मामलों में जहाँ यह विश्वास करने के युक्तियुक्त कारण हो कि अभियुक्त अजमानतीय अपराध करने का दोषी है, थाने के भारसाधक अधिकारी को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 के विशेष उपबन्धों के अधीन जमानत पर छोड़ने के पूर्व उसके पूर्व इतिहास पर यदि ज्ञात हो, और उसके भाग जाने की संभावनाओं पर विचार करके ही उसे उन्मोथित करना चाहिये।

157. थाने के भारसाधक अधिकारी उत्तरदायी हैं कि न्यायालयों को लाने ले जाने के मार्ग में या धारे की हवालात में निरुद्ध बन्दियों की उचित सुरक्षा रखी जाती है, उपलब्ध अनुदान से पुलिस अधीक्षक द्वारा प्रत्येक थाने की हवालात को कम्बल, लोटे और सफाई के बर्तन प्रदान किये जाते हैं।

पुलिस ठेका अनुदान के बंदियों को मौसम की कठोरता से बचाने के लिए टाट पर्दे या अन्य साधन उपलब्ध कराये जावे।

158. पुलिस अधीक्षक हर थाना हवालात (पुरुष और स्वी) के बारे में एक बार में एक साथ रखे जा सकने वाले बन्दियों को संख्या अवधारित करेगा, यह संख्या हवालात के बाहरी और किसी सहज गोचर भाग पर चिह्नित को जावेगी। गणना का आधार फर्श पर छत्तीस वर्ग फीट और हर व्यक्ति के लिये कुल 540 घन फीट स्थान होगा।

उसको विनिर्दिष्ट क्षमता से अधिक क्षमता में बन्दियों को हवालात में न रखा जावे। जब किसी थाने में गिरफ्तार किये गये व्यक्तियों की संख्या हवालात में रखे जा सकने वाली क्षमता से अधिक हो जाबे, अधिक संख्या को या तो किसी पड़ोस की जेल में या यदि संभव हो तो पड़ोस के किसी सुरक्षित और उपयुक्त मकान में, जिसे यदि आवश्यक हो तो अस्थायी रूप से किराये पर लिया जा सकता है, निवास कराया जावे या यदि ऐसा कोई आवास उपलब्ध न हो तो उन्हें उस निकटतम हवालात में भेज दिया जावे जहाँ स्थान हो। प्रत्येक थाने के लिए पुलिस अधीक्षक यह निर्धारित करेगा कि हवालात में बन्द किये जा सकने वाले व्यक्तियों से अधिक को कहाँ निवास कराया जावे या भेज दिया जावे, साथ ही वह हवालात के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर बन्दियों की गारद के लिए आदेश पारित करेगा।

159. स्वस्थ बन्दियों को दैनिक भोजन और रोगी बन्दियों को भोजन के, जो यातायात के या मजिस्ट्रेट के न्यायालय में विचाराधीन बन्दियों को जो शिविर में हों, मान में विस्तृत अनुदेश गारद और मार्ग रक्षक के नियमों में पाये जायेंगे।

160. गवर्नमेंट आर्डर की पुस्तिका के अनुसार विचाराधीन बन्दियों को इतने विलम्ब तक न्यायालय में रखा जावे, जिससे हवालात के समय के बाद जेल या हवालात में उनका प्रवेश कराने की आवश्यकता हो जावे। प्रत्येक मजिस्ट्रेट द्वारा सुनिश्चित करने के लिए हर प्रयत्न किया जायेगा कि इन निर्देशों का पालन सभी अधीनस्थ न्यायालय द्वारा किया जाता है। विचाराधीन बन्दियों को जो हवालात के समय तक न आ सकते हों संबंधित मजिस्ट्रेट के विशेष आदेश के सिवाय, जेल में न भेजा जावे। यह अनावश्यक और अव्यवहारिक है कि वे परिस्थितियाँ विनिर्दिष्ट की जावें जिनमें ऐसा आदेश दिया जा सकता हो। हर मामले में विचारणीय प्रश्न यह होगा कि क्या न्याय और सुरक्षा के हित में ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं, जिनसे बन्दी का पुलिस अभिरक्षा में रखा जाना वांछनीय न हो, ऐसी परिस्थितियों के विद्यमान या अन्यथा रहने के लिये, मजिस्ट्रेट को, जिला मजिस्ट्रेट के सामान्ये पर्यवेक्षण और नियंत्रण के अध्याधीन रहते हुए, सुविवेक का प्रयोग करना चाहिए। कारावासों के महानिरीक्षक ने सभी जेल अधीक्षकों को हवालात के समय के पश्चात् विचाराधीन व्यक्तियों की जेल में प्रवेश देने के लिये अनुदेश जारी कर दिये हैं, परन्तु यह कि आवश्यक वारन्ट जेल के फाटक पर प्रस्तुत कर दिया जावे। सरकार ने जिला मजिस्ट्रेट को एक ऐसे मजिस्ट्रेट को नामांकित करने के लिए अनुदेश जारी किए हैं, जिसका कर्त्तव्य रिमान्ड के उन प्रारूपों पर हस्ताक्षर करना होगा जो हवालात के समय के बाद पहली बार आये हों। पुलिस अधीक्षक यह देखेगा कि उनके लोक अभियोजक आदेशों को समझते और उनके प्रवर्तन में सहायता पहुँचाते हैं।

161. थाने का भारसाधक अधिकारी यह देखने के लिए व्यक्तिशः उत्ततरदायी होगा कि कोई पागल या पागल होने के लिये संदेहित कोई व्यक्ति एक ही कोठरी में अन्य लोगों के साथ कभी भी निरुद्ध न किये जायें।

162. नियम के तौर पर अवयस्क लड़कियों के, विशेषकर जिन्हें "भटकी हुई" कहा जाता है. पुलिस की अभिरक्षा में नहीं रखना चाहिए। उन पर मामलों में जहाँ महिलाओं के लिये स्थान सहित किसी औषधालय या चिकित्सालय का अस्तित्व हो. ऐसी लड़कियों को चिकित्सालय प्राधिकारियों को भोजन किए हुए रोगी के रूप में सौंप दिया जावे।

संबंधित जिला बोर्ड की सहमति के सिवाय, वह अवधि जिससे ऐसी लड़कियाँ औषधालय में रखी जा सकती हों, पन्द्रह दिन से अधिक की न होगी।

163. जब गिरफ्तार किये गये किसी व्यक्ति को अभिरक्षा में रखा जाना हो, किन्तु उसके स्वास्थ्य की अवस्था ऐसी हो कि वह स्वयं या अन्य को गम्भीर जोखिम पहुँचाया बिना हिलाया न जा सकता हो, तो गिरफ्तार करने वाला अधिकारी उसे अभिरक्षा में रखने के लिए यथोचित प्रवन्ध करेगा, जहाँ वह हो।

164. किशोर अपराधियों से पुलिस द्वारा व्यवहार किये जाने के नियम गारद और अनुरक्षण नियमों के अधीन पाये जायेंगे।

बरेली किशोर जेल से उन्मोचित किए गये किसी दोषसिद्ध किशोर का उसके घर तक पुलिस द्वारा मार्ग रक्षण नहीं किया. जावेगा। इन विनियमों के पैरा 234 में दिए गये आदेशों के अनुसरण में खोली गई हिस्ट्रीशीट की दशा के सिवाय, पुलिस को किशोर अपराधियों के साथ उनके उन्मोचित किए जाने के पश्चात् कुछ नहीं करना है, अन्य जेलों से उन्मोचित किए गये दोषसिद्ध किशारों का उनके घर तक मार्ग रक्षण जेल मैन्युअल (1941 का पुनरावृत्त संस्करण) के पैरा 336 के अनुसरण में किया

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