
508. राजपत्रित अधिकारियों द्वारा की जाने वाली अपील को विनियमित करने के नियमों के लिये गवर्नमेन्ट आफ इण्डिया एक्ट की धारा 96-क की उपधारा 9 के अधीन परिषद् सहित सेक्रेटरी आफ स्टेट द्वारा बनाये गये नियम देखिये, जो सभी श्रेणियों के सिविल अधिकारियों को लागू होते हैं। उपरोक्त पर आधारित निम्नलिखित नियम, अधीनस्थ पुलिस सेवा के अधिकारियों अर्थात् पुलिस एक्ट की धारा 2 के अधीन भर्ती किये गये पुलिस अधिकारियों के द्वारा की जाने वाली अपीलों को विनियमित करते हैं।
(1) प्रत्येक पुलिस अधिकारी जिसके विरुद्ध तीसवें अध्याय के अधीन वेतन वृद्धि या पदोन्नति रोक लिये जाने का आदेश पारित किया जावे या (पैरा 478-ए से 478-बीसी तक में अंकित दण्ड के दिये जाने का आदेश दिया जावे) निम्न विहित प्राधिकारी को ऐसे आदेश के विरुद्ध एक अपील प्रस्तुत करने का अधिकार होगा।
(1. शा.आ. सं. 8511/आठ-ए-109/69 दिनांक 2-2-70 पुलिस गजट में छपे दिनांक, 18-2-70 से। )
(क) यदि आदेश पुलिस महानिरीक्षक का मूल आदेश हो तो स्थानीय सरकार को;
(ख) यदि मूल आदेश उप-महानिरीक्षक का हो या उप-महानिरीक्षक का, या पैरा 479 (च) के अधीन सशक्त किये गये पुलिस अधीक्षक, सहायक या उप-पुलिस अधीक्षक के द्वारा पारित मूल आदेश के सम्बन्ध में, जिसमें नियम के अनुसार उप-महानिरीक्षक की सहमति अपेक्षित हो, आदेश उप-महानिरीक्षक का हो पुलिस महानिरीक्षक कोः
परन्तु यह कि यदि यह पुलिस उप-महानिरीक्षक, जिसका आदेश अपील की विषयवस्तु हो, तदुपरान्स पुलिस महानिरीक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया जावे तो अपील स्थानीय सरकार को होगी और उसके द्वारा निर्णीत की जावेगी।
(ग) यदि मूल आदेश पुलिस अधीक्षक का ऐसा आदेश हो, जिसके साथ उप-महानिरीक्षक की सहमति, नियम के द्वारा अपेक्षित न हो तो उप-महानिरीक्षक को;
(घ) यदि आदेश पैरा 479 (च) में गिनाये गये किसी अधिकारी का वह मूल आदेश हो, जिसके साथ नियम के द्वारा उप-महानिरीक्षक की सहमति अपेक्षित न हो, उप-महानिरीक्षक कोः
(2) पैरा 478 (ग), (घ), (ङ) और (च) में गिनाये गये तुच्छ दण्ड आरोपित करने के आदेश के विरुद्ध या पुलिस एक्ट की धारा 2 के अधीन नियुक्त किये गये पुलिस अधिकारी की सेवा मुक्त करने यदि उसकी पदमुक्ति परिवीक्षा की समाप्ति के पूर्व आदेशित किया गया हो, या उस धारा के अधीन अस्थायी रूप से नियुक्त किये गये किसी अधिकारी की पदच्युति या निकाल देने के आदेश के विरुद्ध, तो अपील नहीं होगी और न कोई अपील अधीनस्थ पुलिस के सदस्य द्वारा, उसे राजपत्रित अधिकारी की पंक्ति पर परिवीक्षा पर चयन किये जाने से निषेध करने का निरीक्षक की पंक्ति पर पदोन्नत किये जाने से चयन करने से निषेध कर दिये जाने पर उप-निरीक्षक की ओर से, हो सकती।
(3) प्रत्येक अधिकारी जो अपील करने की इच्छा करे, पृथक रूप से ऐसा कर सकता है।
(4) इन नियमों के अधीन की गयी किसी अपील में अपील करने वाले अधिकारी द्वारा आधार बनाये गये सभी महत्वपूर्ण तथ्यों और तर्कों का समावेश होगा, उसमें किसी असम्मानजनक या अनुचित भाषा का समावेश नहीं होगा और वह अपने आप में पूर्ण होगी। प्रत्येक अपील के साथ उस अन्तिम आदेश की एक प्रति रहेगी, जो अपील का विषय हो। सरकारी सेवकों द्वारा फाइल किये जाने वाले अपील के आवेदन और उन अन्तिम आदेशों की प्रतियाँ, जिनके विरुद्ध अपील पेश की गई हो, स्टाम्प शुल्क से प्रभारित होने योग्य न होगी। अपील के साथ पेश की गई अन्य दस्तावेजों की प्रतियाँ कोर्ट फीस एक्ट की धारा 6 (देखिये अनुसूची 1 का अनुच्छेद 9) के अधीन स्टाम्प युक्त की जावे जब तक कि वे स्टाम्प एक्ट की अनुसूची 1 अनुच्छेद 28 के अधीन स्टाम्प लगाये जाने योग्य न हों। (उत्तर प्रदेश स्टाम्प मैन्युअल के पेज 104, 105, 186 और 187 में देखिये।)
(5) प्रत्येक अपील, उस समय चाहे अपीलान्ट सरकारी सेवा में हो या न हो, जिले के पुलिस अधीक्षक के या उन अधिकारियों की दशा में, जो जिले के कार्यों में नियोजित न हों, उस कार्यालय के, जिससे अपीलान्ट सम्बन्धित हो या सम्बन्धित रहा हो, प्रमुख के माध्यम से प्रस्तुत की जानी चाहिए।
(6) प्रत्येक अपील, उस आदेश की जिसके विरुद्ध अपील करने वाले अधिकारी को उसकी सूचना प्राप्ति के पश्चात् तीन मास के भीतर की जावेगी :
परन्तु यह कि अपीलीय अधिकारी अपने विवेक से, अच्छा कारण दर्शाये जाने पर समयावधि में छः मास तक का विस्तारण कर सकता है।
(7) पुलिस महानिरीक्षक सरकार को की गई अपील को रोक सकता है।
(1) जो कि ऐसे मामले की अपील हो, जिसमें इन नियमों के अधीन कोई अपील न होती हो,
(2) जो नियम छः के उपबन्धों का पालन न करती हो,
(3) जो इन नियमों द्वारा विहित अपीलीय प्राधिकारी के द्वारा निर्णय की ओर आगे अपील हो और जिसमें कोई नवीन तथ्य या नवीन परिस्थिति न बताई गई हो, जो मामले के पुनर्विचार के लिए आधार उत्पन्न कर सके, पुलिस अधीक्षक या उच्चतर पंक्ति का कोई अधिकारी किसी अपील को रोक सकेगा।
(4) जो नियम चार या पाँच के किसी एक या अधिक उपबन्धों की पालन नहीं करतीः परन्तु यह कि प्रत्येक उस मामले में जिसमें अपील रोक ली गई हो, अपील करने वाले अधिकारी को इस तथ्य और उसके कारणों से सूचित किया जावेगा।
(8) किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा अपील रोक दिये जाने के विरुद्ध कोई अपील न होगी। परन्तु यह कि नियम चार या पाँच में वर्णित की गई शर्तों के पालन में विफल रहने के कारण रोकी गई अपील, रोकी नहीं रखी जावेगी, यदि वह अपील की मूल समयावधि के भीतर इन नियमों का पालन करते हुए रूप में पुनः प्रस्तुत कर दी जावे।
(9) पुलिस महानिरीक्षक या पुलिस उप-महानिरीक्षक, अपने कारणों को लेखीय में अभिलिखित करते हुए स्वप्रेरणा से या अपील सुनने को सशक्त अधिकारी के निवेदन पर समान रूप से पंक्ति के किसी अन्य अधिकारी को अपील अन्तरित कर सकता है।
इस नियम की कोई बात, किसी अपीलान्ट की अपील को अन्तरित करने के लिए आवेदन करने का अधिकारी नहीं बनायेगी और इस उप-पैरा के अधीन पुलिस महानिरीक्षक या पुलिस उप-महानिरीक्षक के द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी।
509. जब अपीलीय अधिकारी अपील को ग्रहण करने और अभिलेख बुलाये, वे सभी कागज दण्डित अधिकारी के द्वारा जिसके आदेश के विरुद्ध अपील की गई है, विचार किया गया हो।
अपील में पारित किये गये आदेशों की प्रतियाँ, जो अपीलीय प्राधिकारी द्वारा पुलिस अधीक्षक को प्रदान की जाती है, विभागीय जाँच की फाइल के साथ सदैव ही अभिलेख में रखी जायें और जब अभिलेख बुलाये जायें तो उसके साथ प्रेषित की जायें।
510. पदच्युति के आदेश के विरुद्ध सफल अपील की दशा में यह घोषित करना चाहिए कि कर्तव्य से प्रवृत्त की गई अनुपस्थिति की समयावधि को क्या पेन्शन के लिए गिना जावेगा।
पुनरीक्षण
511. (क) उन सभी आदेशों की दशा में जिनके विरुद्ध पैरा 508 (क) के अधीन अपील की जा सके, पुनरीक्षण की शक्ति का स्वप्रेरणा से उस प्राधिकारी के द्वारा प्रयोग किया जा सकेगा जिसको अपील की जा सकती हो।
(ख) पद (क) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, पुलिस महानिरीक्षक, किसी अधीनस्थ प्राधिकारी के अपील के अयोग्य या दोषमुक्ति के मामले के किसी आदेश में उलट फेर कर सकेगा।
(ग) किसी अधीनस्थ प्राधिकारी द्वारा निर्णय किये गये किसी मामले का अभिलेख, साधारणतया, उलटफेर चाहे जाने वाले आदेश के दिनांक से छः मास के पश्चात् नहीं मंगाया जावेगा।
(घ) सरकारी सेवक पर विपरीत प्रभाव डालने वाला कोई आदेश साधारणतया अभिलेख प्राप्ति से छः मास के पश्चात् पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग करते हुए, लेखीय में अभिलिखित किये जाने वाले अत्यन्त विशेष कारणों के सिवाय पारित किया जावेगा।
(ङ) कोई प्राधिकारी स्वप्रेरणा से किसी मामले में एक से अधिक बार पुनरीक्षण का प्रयोग नहीं करेगा।
नोट- विनिमय में पैरा 1-ए के बढ़ने के बाद इस प्रावधान में भी अतिरिक्त महानिरीक्षक पुलिस के पद के समावेश पर विचार करने योग्य है। यह भी विचार योग्य होगा कि क्या उनके द्वारा पारित आदेश पुलिस महानिरीक्षक द्वारा पारित आदेश माने जायेंगे और उनके विरुद्ध पुनरीक्षण/याचिका शासन द्वारा विचारणीय होंगे।
512. कोई अधिकारी, जिसकी अपील स्थानीय सरकार के अधीनस्थ किसी प्राधिकारी द्वारा अस्वीकार कर दी गई हो, उस अधिकारी, जिसके द्वारा उसकी अपील अस्वीकार कर दी गई हो, से आगामी उच्चतर पंक्ति के प्राधिकारी को पुनरीक्षण के लिए आवेदन प्रस्तुत करने का अधिकारी होगा। ऐसे आवेदन पर पुनरीक्षण की शक्ति का केवल तभी प्रयोग किया जा सकेगा, जब किसी जघन्य अनियमितता के परिणामस्वरूप गम्भीर अन्याय या न्यायालय में विफलता प्रतीत हो।
अपीलों के लिए विहित की गई प्रक्रिया पुनरीक्षण के आवेदन पर भी लागू होती है। अपील के अस्वीकार कर देने के आदेश के विरुद्ध पुनरीक्षण के लिए आवेदन के साथ मूल और अपीलीय आदेश की प्रतिलिपियाँ रखना चाहिए।
513. दिया गया दण्ड इनके द्वारा बढ़ाया जा सकता है।
(क) अपील किये जाने पर अपीलीय प्राधिकारी द्वारा, या
(ख) पुनरीक्षण की शक्तियों के प्रयोग में उस प्राधिकारी के द्वारा जिसकी अपील होती हो, दण्ड में वृद्धि की जा सकेगी।
परन्तु यह कि दोनों ही दशाओं में दण्ड की आज्ञा में वृद्धि करने के पूर्व सक्षम प्राधिकारी, दण्डित अधिकारी को यह कारण दर्शाने के लिए बुलायेगा कि उसके दण्ड में इस प्रकार क्यों न वृद्धि की जावे और इस प्रकार दण्ड में इस प्रकार वृद्धि करने वाले अपीलीय प्राधिकारी का आदेश, अपील के प्रयोजन के लिए, दण्ड का मूल आदेश माना जावेगा।
याचिकायें
514. अपीलों और पुनरीक्षण के आवेदनों से सम्बन्धित उपरोक्त नियमों के अन्तर्गत न आने वाली किसी शिकायत को रखने वाला कोई पुलिस अधिकारी, निम्नलिखित नियमों के अधीन याचिका प्रस्तुत कर सकता है-
(क) प्रथम अवस्था में याचिका निम्नतर पंक्ति के उस अधिकारी को सम्बोधित की जाना चाहिए, जो वांछित आदेश पारित करने की सशक्त हो। नियम के उल्लंघन में उच्चतर अधिकारी को सम्बोधित की गई याचिका संक्षिप्ततः अस्वीकार कर दी जावेगी। उसे उस दिनांक से तीन मास के भीतर प्रस्तुत कर देना चाहिए, जिस दिन याचिका देने वाले अधिकारी को उस आदेश से, जिसके विरुद्ध वह याचना कर रहा हो, सूचित किया गया हो, परन्तु यह कि वह प्राधिकारी, जिसकी याचिका प्रस्तुत की गई हो, उस समयावधि में छः मास तक का विस्तार कर सकता है, यदि उसको यह समाधान हो जावे कि उसके नियन्त्रण के परे होने वाली निवारण के अयोग्य परिस्थितियों के कारण याचिका करने वाले तीन मास की विहित समयावधि के याचना करने से वारित हो गया था।
(ख) अधीक्षक के अधीन पुलिस अधिकारी, चाहे वे अवकाश पर हों, अधीक्षक से वरिष्ठ अधिकारी को सीधे याचिका पेश नहीं कर सकते, उन्हें अपनी याचिकायें अधीक्षक के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहिए। अधीक्षक ऐसी याचिकाओं को अग्रेषित करने के लिए बाध्य है, परन्तु यह कि वे संयमित और सम्मानित पदावली में लिखी गई हो, और यदि वह उसे अनुसूचित रूप से लिखे जाने के कारण अस्वीकार कर दे, उसे उस पर इस आशय का आदेश पृष्ठांकित करते हुए याचिका देने वाले को लौटा देना चाहिए। यदि उसे विषयवस्तु का कोई ज्ञान हो, तो उसे चाहिए कि वह याचिका को अग्रेषित करते समय अपने कार्य का स्पष्टीकरण करते हुए रिपोर्ट करे या अपना अभिमत व्यक्त करें।
(ग) जब पुलिस अधीक्षक ने ऐसे मामले में किसी याचिका को अस्वीकार कर दिया हो, जो उसकी क्षमता के भीतर हो, याचिकाकार और आगे एक याचिका उप-महानिरीक्षक को प्रस्तुत कर सकता है, जिस दशा में उसे अधीक्षक के आदेश की एक प्रति अपनी याचिका के साथ संलग्न करना चाहिए। यदि द्वितीय याचिका उप-महानिरीक्षक द्वारा अस्वीकार कर दी जावे, उप-महानिरीक्षक के आदेश के विरुद्ध महानिरीक्षक को आवेदन केवल पुनरीक्षण के लिए होगा। ऐसे मामलों में महानिरीक्षक केवल तभी हस्तक्षेप करेगा, जब किसी जघन्य अनियमितता के परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण अन्याय किया जाना प्रतीत हो।
(घ) मजिस्ट्रेट को की जाने वाली याचिकायें आठ आने के कोर्ट फीस स्टाम्प से स्टाम्प युक्त होना चाहिए। अन्य याचिकाओं पर स्टाम्प लगाने की आवश्यकता नहीं है।
(ङ) सरकार को याचिकायें स्मृति लेख के रूप में होना चाहिए और गवर्नर या उत्तर प्रदेश सरकार को प्रस्तुत की जाने वाली याचिकाओं की प्रस्तुति को शासित करने वाले नियमों के अनुसार तैयार किये जाना चाहिए। पुलिस महानिरीक्षक को अपने विवेक से यह शक्ति प्राप्त है कि वह इन नियमों में विनिर्दिष्ट परिस्थितियों में याचिका रोक ले और विशेषतया उसे ऐसी याचिका को रोक लेने की शक्ति प्राप्त है, जब वह ऐसे व्यक्ति के द्वारा किया गया कोई अभ्यावेदन हो, जो पुलिस बल का सदस्य हो या रह चुका हो, जब
(1) पदच्युति या अन्य दण्ड को सम्पुष्ट करते हुए अपीलीय आदेश के विरुद्ध पुनरीक्षण में पारित किये गये आदेश से उत्पन्न, या
(2) पदच्युति या अन्य दण्ड को सम्पुष्ट करते हुए, किसी अपीलीय आदेश से उत्पन्न, इस दशा के सिवाय जिसमें सरकार को पुनरीक्षण के लिए याचिका प्रस्तुत करने का अधिकार किसी विधि या नियम के द्वारा प्रदत्त किया गया हो, या
(3) सरकार के द्वारा पारित दण्डादेश के अतिरिक्त अभिव्यक्त रूप से नियम, आदेश या उसकी सेवा की शर्तों और निबन्धों को विनियमित करने वाली संविदा के द्वारा पारित की गई अपील वाले आदेश, से उत्पन्न याचिका हो।
परन्तु यह कि किसी अपीलीय या पुनरीक्षण में पारित आदेश से जिसका परिणाम पदच्युति या सेवा से निकाला जाना हुआ हो, से उत्पन्न कोई अभ्यावेदन जो विवादित तथ्य या आदेश के औचित्य को प्रश्नगत व करते हुए, केवल दया या क्षतिपूरक के लिए ही सीमित हो, नहीं रोकी जावेगी।
परिषद् सहित सेक्रेट्री और परिषद् सहित गवर्नर प्रतिस्मरण लेखों के अनुदेशों के लिए गवर्नमेंन्ट आर्डस पुस्तिका, जिल्द तीन के परिशिष्ट 8 और परिशिष्ट 8-ख में गवर्नमेन्ट आफ इण्डिया गृह विभाग की अधिसूचना के एफ-6/7/33-दो, दिनांक 19 जून, 1933 देंखें। उन परिस्थितियों के लिए जिनमें सरकार को सम्बोधित याचिकाओं को रोक लेने के लिए महानिरीक्षक सशक्त हैं, गवर्नमेंट आर्डर्स पुस्तिका देखिये।
(च) हिन्दुस्तानी में याचिकाओं के साथ सदैव ही अंग्रेजी अनुवाद रहना चाहिए।
(छ) कोई अधिकारी किसी ऐसे मामले के बारे में आवेदन प्रस्तुत नहीं कर सकेगा जो उसके पद की स्थिति से जुड़ा हुआ हो, जब तक कि उसका उस मामले में व्यक्तिगत हित न हो।
(छछ) पुलिस विनियम के पैरा 478 के उप-पैरा (ग) से (च) में वर्णित दण्डा के बारे में कोई याचिका नहीं लाई जावेगी।
ज) किसी अधिकारी के पद की संभावनाओं या स्थिति से जुड़े किसी मामले से सम्बन्धित याचिका पर कोई ध्यान नहीं दिया जावेगा, जब तक कि वह स्वयं उस अधिकारी द्वारा प्रस्तुत न की गई हो।
(झ) मान्यता प्राप्त सेवा संगमों के अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, किसी प्राधिकारी को याचिका देने की इच्छा करने वाला प्रत्येक अधिकारी पृथक-पृथक रूप से ऐसा करेगा।
515. सभी पंक्तियों के पुलिस अधिकारियों को अन्य विभाग के अधिकारियों, विधान मण्डल के सदस्यों या प्राइवेट व्यक्तियों के पास, चाहे विधान मण्डल में प्रश्नों के द्वारा या उनके वरिष्ठ अधिकारियों को सम्बोधित सिफारिशों पत्रों के द्वारा या अन्यथा रूप से अपने दावों के लिए समर्थन पाने को पहुँच करने से वर्जित किया जाता है।
516. नियम के द्वारा उपबन्धित किये गए के सिवाय, सभी पंक्तियों के पुलिस अधिकारियों को पदोन्नति के लिए याचना करने से वर्जित किया जाता है तथा वरिष्ठ अधिकारियों को अपने अधीनस्थों के किसी विशेष पद के लिये सिफारिश करने से वर्जित किया जाता है, जब तक कि उसे ऐसा करने को पद की पूर्ति करने के लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा आदेशित न किया जावे।
517. कोई अधिकारी, बिना किसी मूल्य के, उस आदेश की एक प्रति पाने का अधिकारी है, जिसके विरुद्ध इस अध्याय के अधीन कोई पुनरीक्षण का आवेदन या याचिका लाई जा सकती है। इस प्रकार उन मामलों में, जिनमें किसी अपीलीय आदेश के विरुद्ध पुनरीक्षण आवेदन लाया जा सकता हो, उस आदेश की एक प्रति निर्मूल्य दी जावेगी, परंतु मूल आदेश की नवीन प्रतिलिपि के लिए जो भी आवेदन के साथ संलग्न की जानी चाहिए, सामान्य दर पर भुगतान किया जावे।
टीप - (इस पैरा के प्रयोजन के लिए किन्तु पैरा 508 चार के प्रयोजन के लिए नहीं) शब्द "आदेश" में आरोप या वह आरोप जो जाँच के विषय हों और दण्ड देने वाले अधिकारी के अधीनस्थ किसी अधिकारी के निष्कर्ष (यदि कोई हो) दण्ड देने वाले अधिकारी के और उस अधिकारी के निष्कर्ष जिसकी सहमति दण्ड के आदेश के लिए अपेक्षित हो (ऐसे निष्कर्षों के सिवाय जिनकी प्रतियाँ अधिकारी को पूर्व में ही पैरा 490 या 491 के अधीन दी जा चुकी हो) सम्मिलित होंगे। अन्तिम आदेश की प्रतिलिपि के लिए आवेदन और स्वयं प्रतिलिपि को उ.प्र. स्टाम्प मैन्यूअल के परिशिष्ट 'ग' तीन का संख्यापद 42 और परिशिष्ट 'ग' दो को संख्या पद 59 के अधीन कोर्ट फीस स्टाम्प ड्यूटी से छूट है। यदि कोई दण्डित अधिकारी अन्तिम आदेश की प्रतिलिपि के लिए आवेदन करे और अपील में जाने के लिए अपना आशय अभिव्यक्त करे, उसे स्वतः ही बिना किसी औपचारिक आवेदन के ऊपर वर्णन किए गए दस्तावेज की प्रतिलिपि बिना मूल्य दे दी जावेगी। केवल अन्तिम आदेश की प्रतिलिपि जो अकेली अपील के साथ फाइल की जावेगी, सत्य प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित की जावेगी। यदि अधिकारी अन्य दस्तावेजों की प्रतिलिपियों के लिए आवेदन करे या जब वह पुनरीक्षण के लिए अपीलीय अधिकारी के अन्तिम आदेश के अतिरिक्त किसी अन्य दस्तावेज की प्रतिलिपि के लिए आवेदन करे, उसे आवेदन और प्रतिलिपियों पर कोर्ट फीस भुगताना चाहिए, देखिये कोर्ट फीस एक्ट की अनुसूची एक का अनुच्छेद और अनुसूची दो का अनुच्छेद 1(क)।
518. पैरा 519 में दी गई दरों के भुगताने पर कोई अधिकारी अपील, पुनरीक्षण आवेदन या याचिका के लिए, जो इस अध्याय के अधीन लाई जा सकती हो, महत्वपूर्ण होने वाले सभी कागजों की प्रतिलिपियाँ प्राप्त करने का अधिकारी है, किन्तु उन गोपनीय कागजों की नहीं जिनका प्रकाशन प्रशासन के प्रतिकूल होगा।
टीप - दण्डों के मामले में रिपोर्ट करने वाले अधिकारी को, जहाँ तक सम्भव हो सके, ऐसे सभी विषयों को अपवर्जित कर देना चाहिये, जिनका प्रकाशन प्रशासन के लिए प्रतिकूल हो सकता हो।
519. विधि या विनियमों के द्वारा अपेक्षित किए गए के सिवाय, शासकीय पत्र-व्यवहार और अभिलेखों की प्रतियाँ प्राइवेट व्यक्तियों या निकायों को यदाकदा ही हो जाना चाहिये। उदाहारण के लिये यह अनुचित होगा कि पुलिस के प्रयोजन के लिये एकत्रित सूचना त सूचना व्यापारिक फर्मों को विज्ञापन के प्रयोजन के लिये उपयोग करने हेतु संसूचित की जावे। (गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका भी देखिये)।
जब पुलिस अधीक्षक, विधि या नियम के द्वारा अपेक्षित के सिवाय, शासकीय दस्तावेजों की प्रतिलिपियाँ दिये जाने के बारे में संदेह में हो, उसे आदेश के लिये महानिरीक्षक के पास निर्देशित करना चाहिये। जब प्रतिलिपियाँ प्राइवेट व्यक्तियों या निकायों को दी जावें, उनके लिये निम्नलिखित दरों से भुगतान किया जावे
(1) 1500 से अधिक शब्दों का समावेश न करने वाली प्रतिलिपि के लिये (एक रूपया)।
(2) 1500 शब्दों से अधिक होने वाले प्रत्येक 300 शब्दों के लिये (12 पैसे) का अतिरिक्त प्रभार।
(3) प्रभार की गणना करने में प्रत्येक कथन, रिपोर्ट इत्यादि एक पृथक् दस्तावेज माना जाना चाहिये और उसके लिये पृथक् से प्रभार लेना चाहिये।
(4) हिन्दी या उर्दू की दस्तावेजों की प्रतिलिपि के लिए दरें, वहीं होंगी जो कि अंग्रेजी की दस्तावेजों के लिये होती हैं।
(5) यदि किसी पुस्तक, रजिस्टर, नक्शा या प्लान की प्रतिलिपि तैयार की जानी हो, कार्यालय प्रमुख द्वारा उपयुक्त प्रभार नियत किया जाना चाहिये।
प्रत्येक दशा में प्रतिलिपि का प्रभार अग्रिम वसूल किया जावे और शीर्ष "रिसीप्ट्स-उन्नीस पुलिस मिस्लेन्युअस" में प्राप्ति के रूप में जमा किया जावे। प्रतिलिपियाँ सम्बन्धित कार्यालय के साधारण कर्मचारी मण्डल द्वारा बिना किसी अतिरिक्त पारिश्रमिक के बनाई जावें, परंतु यदि नितांत आवश्यक हो, कार्य के दबाव के समय अस्थाई आधार पर इस प्रयोजन के लिए किसी प्रतिलिपि करने वाले को नियोजित किया जा सकता है।
प्रतिलिपि के लिये सभी आवेदन, आदेशों की उन प्रतिलिपियों के अतिरिक्त जिन्हें गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका के पैरा 77 के अधीन सरकारी सेवक बिना मूल्य प्राप्त करने के अधिकारी हैं, उत्तर प्रदेश में उसकी प्रभावशीलता के लिये यथासंशोधित कोर्ट फीस एक्ट, 1870 (1870 का सातवाँ अधिनियम) की अनुसूची दो के अनुच्छेद 1 के अधीन विहित कोर्ट फीस के भुगतान के अध्याधीन होंगे। आदेशों की प्रतिलिपियों की दशा के सिवाय, जिन्हें सरकारी सेवक बिना किसी मूल्य के प्राप्त करने के अधिकारी हों, प्रतिलिपियाँ स्वयं आवेदक द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले उत्तर प्रदेश में उसका प्रभावशीलता के लिए यथासंशोधित इण्डियन स्टाम्प एक्ट, 1899, (1899 का द्वितीय अधिनियम) की अनुसूची एक-ख के अनुच्छेद 24 के अधीन विहित किए गए मूल्य के स्टाम्प पर जारी की जावेगी। प्रतिलिपियों को छपे हुए कागज (प्रतिलिपि स्टाम्प) पर लिखे जाने की आवश्यकता नहीं हैं।
'[519-ए. संदर्भ की मान्यता इस अध्याय में जहाँ कहीं 'इन्सपेक्टर जनरल या इन्स्पेक्टर जनरल पुलिस' का संदर्भ आया है, वहाँ –
(. यह नियम राज्यपाल द्वारा स्थापित होकर विज्ञप्ति सं. 2487/आठ-7-175-81 गृह (पुलिस) अनुभाग-7, दिनांक जून 7, 1983 से जारी हुआ जो उ.प्र. गजट, असामान्य दिनांक 7.6.83 में प्रकाशित हुआ.)
(1) प्रादेशिक सशस्त्र कान्सटेबुलरी के सदस्यों के सम्बंध में "इन्सपेक्टर जनरल पुलिस" प्रादेशिक सशस्त्र, कान्सटेबुलरी, उत्तर प्रदेश, का संदर्भ माना जावेगा;
(2) आसूचना (इंटेलीजेंस) विभाग के कार्मिक दल के सम्बन्ध में "इन्सपेक्टर जनरल पुलिस" आसूचना विभाग, उत्तर प्रदेश, का संदर्भ माना जावेगाः
(3) अपराध अनुसंधान विभाग के कार्मिक दल के सम्बन्ध में "इन्सपेक्टर-जनरल पुलिस" अपराध अनुसंधान विभाग, उत्तर प्रदेश का संदर्भ माना जावेगा;
(4) पुलिस प्रशिक्षण संस्थाओं के कार्मिक दल के सम्बन्ध में "इन्सपेक्टर-जनरल पुलिस" प्रशिक्षण, उत्तर प्रदेश, का संदर्भ माना जावेगा; और
(5) राजकीय रेलवे पुलिस के कार्मिक दल के सम्बन्ध में "इन्सपेक्टर-जनरल पुलिस" रेलवेज, उत्तर प्रदेश, का संदर्भ माना जावेगा।