
477. इस अध्याय के अधीन नियम पुलिस एक्ट (1861 का पाँचवाँ) की धारा 7 के अधीन बनाए गये हैं और पुलिस एक्ट (1861 का पाँचवाँ) की धारा 2 के अधीन नियुक्त किये गये पुलिस अधिकारियों पर ही लागू होते हैं। उस धारा के अधीन नियुक्त किया गया कोई अधिकारी, किसी कार्यपालिका आदेश द्वारा दण्डित नहीं किया जावेगा।
राजपत्रित अधिकारियों को दिये जाने वाले दण्ड सेक्रेट्री आफ स्टेट से हुये उनके करार गवर्नमेन्ट आफ इंडिया एक्ट, 1919 की धारा 96-ख को उपधारा (2) के अधीन परिषद् सहित सेक्रेट्री आफ स्टेट के द्वारा बनाए गये नियमों के द्वारा विनिधमित किए जाते हैं। लिपिकीय कर्मचारी मण्डल को दण्डित करने के नियम आफिस मैन्युअल में और ग्राम के चौकीदारों के बारे में इन विनियमों के नवें अध्याय में दिये गए हैं।
478. पुलिस एक्ट की धारा 2 के अधीन नियुक्त किये गये सभी अधिकारी निम्नलिखित विभागीय दण्डों के दायित्वाधीन रहते हैं-
(क) पैरा 481 में यथापरिभाषित बल से पदच्युति या निकाल दिया जाना,
(ख) पैस 482 में यथापरिभाषित पदावनति,
(खक) पदोन्नतियों का रोक लिया जाना,
(खख) दक्षता अवरोध पर रोक दिये जाने को सम्मिलित करते हुये वेतन वृद्धि का रोक लिया जाना,
(खग) चरित्र नामावली में दुराचरण की प्रविष्टि (दिनांक 6 अप्रैल, 1968 का उ० प्र० गजट), प्रधान कान्सटेबिल और कान्सटेबिलों को-
(ग) पन्द्र दिवस से अधिक की न होने वाली समयी अवधि के लिए निवेष (क्वार्टरी में अवरोध) (इस परिभाषा में क्वार्टर गार्ड भी सम्मिलित है,
(घ) दाण्डिक व्यायाम (ड्रिल),
(ङ) अतिरिक्त प्रहरी कर्त्तव्य, से भी दण्डित किये जा सकेंगे।
कान्सटेबिलों को -
(च) थका देने वाला कर्तव्य जो निम्नलिखित कार्यों तक ही निर्बन्धित होना चाहिये-
(1) डेरा गांड़ना,
(2) नाली खोदना,
(3) घास काटना, जंगल और परेड के स्थल से पत्थर बीनना,
(4) झोपड़ियों और बन्दूक के कुन्दों की मरम्मत तथा लाइन में इसके समान अन्य कार्य करना,
(5) आयुधों को साफ करना।
से भी दण्डित किया जा सकेगा।
478-ए. पैरा 478 में अंकित दण्ड (क) और (ख) केवल विभागीय कार्यवाही के पश्चात् ही दिया जा सकता है, देखिए पैरा 490 से 494। (खक) से सम्बन्धित ओदेश अध्याय तीस के अधीन पारित किये जा सकते हैं और (खख) से सम्बन्धित, यथास्थिति पैरा 463 या पैरा 482-क में यथाउपबन्धित रूप से पारित किए जा सकते हैं। (खग) में अंकित दण्ड, सम्बन्धित अधिकारी को यह कारण बताने का युक्तियुक्त अवसर दिये आने के पश्चात् कि क्यों न प्रस्तावित दुराचरण की प्रविष्टि उनकी चरित्र नामावली में की जावे, दिया जा सकेगा। (खग) में अंकित दण्ड तब दिया जा सकता है जब पैरा 490 से 494 के अनुसार विभागीय कार्यवाही (क), (ख), (खक) और (खख) में अंकित दण्डों में से एक दिये जाने के लिये मूलतः प्रारम्भ की गई हो और दण्ड देने वाला प्राधिकारी अन्ततः प्रथम को ही कम गम्भीर दण्ड के रूप में देना पर्याप्त समझे।
(1. महेन्द्र सिंह बनाम राज्य, ए. आई. आर. 1956 इला. 96: 1955 ए.एल.जे. 643.
2. दिनांक 6 अप्रैल, 1968 का उ.प्र. गजटः)
अधिकारियों की शक्तियाँ
479. (क) गवर्नर के पास सभी अधिकारियों के निर्देश में दण्ड देने की शक्ति सुरक्षित है।
(ख) महानिरीक्षक, निरीक्षकों और उससे निम्नतर पंक्ति के सभी अधिकारियों को दण्डित कर सकता है।
(ग) उप-महानिरीक्षक उसके अधीन अस्थाई या स्थाई रूप से होने वाले निरीक्षक की या उससे निम्नतर पंक्ति के सभी अधिकारियों को दण्डित कर सकता है।
(घ) पुलिस अधीक्षक अपने अधीनस्थ अस्थाई या स्थाई निरीक्षकों और उप-निरीक्षकों को पदच्युत करने या निकाल देने के सिवाय दण्ड दे सकता हैं। ऐसे किसी मामले में, जिसमें बल की किसी शाखा के किसी निरीक्षक या उप-निरीक्षक को पदच्युत करना या निकाल देना वह प्रस्तावित करे, पुलिस उप-महानिरीक्षक को नीचे दिये गए पैरा 490 के उप-पैरा 8 अन्तर्विष्ट अनुदेश के अनुसार अग्रेषित कर दिया जाना चाहिये।
(ङ) अपने अधीनस्थ अस्थाई और स्थाई सभी प्रधान कान्सटेबिलों को अधीक्षक दण्डित कर सकता है।
(च) पैरा 491 के उपबन्धों के अधीन रहते हुये (क) सभी ऐसे स्थाई सहायक पुलिस अधीक्षक जिन्होंने 4 वर्ष की सेवा पूरी कर ली जो और सभी ऐसी स्थाई पुलिस उप-अधीक्षक जिन्होंने प्रथम दक्षता अवरोध वेतन-मान में जो उन पर लागू हैं, पर कर लिया है, और (2) पुलिस उप-महानिरीक्षक द्वारा, जहाँ तक कि उसकी रेन्ज से सम्बन्धित है, विशेष रूप से प्राधिकृत किये गये अन्य सभी सहायक पुलिस अधीक्षक और उप-पुलिस अधीक्षक, पुलिस निरीक्षक के दण्ड से सम्बंधित शक्तियों और मूल नियम 24 और 25 के अधीन शक्तियों के अतिरिक्त जैसी कि वे इस पैरा के उप-पैरा (घ) और (ङ) में वर्णित हैं, पुलिस अधीक्षक की सभी शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे।
(छ) रिजर्व निरीक्षक लाइन में पदस्थ किये गये किसी कान्सटेबिल को अधिकतम तीन दिनों के लिये व्यायाम और थका देने वाले कर्तव्यों का दण्ड दे सकता है, परन्तु उसके आदेश रिजर्व लाइन्स के कार्यालय से चौबीस घन्टे के भीतर पुलिस अधीक्षक को सम्पुष्टि के लिए प्रेषित कर दिये जायेंगे।
480. ये दण्ड तभी आरोपित किये जायेंगे जबकि अनुशासन के हित में नितान्त आवश्यक हो। दण्ड आरोपित या प्रस्तावित करने के पहले अधीक्षक सहायक या उप-अधीक्षक या रिजर्व निरीक्षक को यह विचार करना चाहिए कि क्या डॉट-फटकार पर्याप्त न होगी। यह सुनिश्चित करने के लिए डॉट-फटकार की शक्ति का रिजर्व निरीक्षक द्वारा समुचित रूप से प्रयोग किया जाता है, त्रुटि करने वाले की पुस्तक (पुलिस प्ररूप क्रमांक 277) रिजर्व लाइन में बनाये रखी जावेगी। प्रथम और द्वितीय अपराध की दशा में तुच्छ दुराचार इस पुस्तक में प्रविष्ट किये जावेंगे और त्रुटिकर्ता के अंगूठे चिन्ह या हस्ताक्षर लिये जायेंगे। केवल सुधार के अयोग्य ही रजिस्टर के साथ पुलिस अधीक्षक को दण्ड के लिए भेजे जावें।
पदच्युति और निकाला जाना
481. पदच्युति का आदेश केवल तब ही पारित किया जावेगा, जब किसी अधिकारी को आचरण उसका बल में रखा जाना अवांछनीय बना देता हो। कठोर कारावास की दण्डाज्ञा के अनुसरण मैं आवश्यक रूप से ही पदच्युति होना चाहिए और नियम के तौर पर वह अभिरक्षा से किसी बन्दी को सआशय या असावधानी से बचकर भाग निकलने की अनुज्ञा के लिए दोषसिद्धि के अनुसरण में भी होना चाहिए, चाहे अभियुक्त को जुर्माने का ही दण्ड दिया गया हो। यदि बाद वाले मामले में अधीक्षक पदच्युति का आदेश न दे, उसे रेन्ज के उप-महानिरीक्षक को अपनी कार्यवाही, निर्णय की प्रतिलिपि, सभी विभागीय कागज और सम्बन्धित अधिकारी की चरित्र नामावली के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। पदच्युति, पदच्युत अधिकारी को सरकारी सेवा में पुनः नियोजित किये जाने से विवर्जित कर देती है, जबकि बल से निकाल देने से यह विवक्षा होती है कि, यद्यति निकाला गया अधिकारी पुलिस के कर्त्तव्यों के लिए अनुपयुक्त है, किन्तु यह आवश्यक नहीं होगा कि उसे किसी सरकार के अधीन अन्य ऐसे पद पर, जिसके लिए वह उपयुक्त हो पुनः नियोजित होने से रोक दिया जावे।
पदावनति
482. निम्नलिखित नियम पदावनति को शासित करते हैं
(1) किसी अधिकारी को उस पंक्ति से निम्नतर पर अवनत नहीं किया जा सकेगा, जिस पर वह प्रथम बार सेवा में नियुक्त हुआ हो।
(2) किसी अधिकारी को, इस भावना से कि उसकी सेवायें चाहे कितनी ही गुण सम्पन्न हों, वह पुनः पदोन्नति के अर्ह न होगा, स्थायी रूप से पदावनत नहीं किया जा सकता।
(3) किसी अधिकारी को एक पंक्ति से दूसरी पर या समयमान के एक प्रक्रम से उसी समयमान के निम्नतर प्रक्रम में पदावनत किया जा सकेगा। कान्सटेबिलों को भी जैसा उप-पैरा 5 में विहित किया गया है, पदावनत किया जा सकेगा।
(4) (क) जब किसी अवनत किये गये अधिकारी का वेतन पदावनति के बाद समयमान द्वारा विनियमित होता हो, पदावनति का आदेश समयमान में प्रक्रम को विनिर्दिष्ट करेगा, अधिकारी को समनुदेशित किया जावेगा और पदावनति की समयावधि निश्चित हैं या अनिश्चित।
(ख) यदि पदावनति निम्नतर पंक्ति पर हो और समयावधि अनिश्चित हो, उस पंक्ति के जिस पर वह अवनत किया गया है, समयमान का प्रक्रम उससे निरन्तर नहीं होगा, जिस पर वह अधिकारी पहुँच गया होता यदि वह उस पद पर, जिससे उसे अवनत किया हो, पदोन्नति न किया गया होता। यदि अवनति निम्नतर पंक्ति पर हो और समयावधि निश्चित हो, निम्नतर पंक्ति में कोई भी प्रक्रम विनिर्दिष्ट किया जा सकता है।
(ग) यदि अवनति की समयावधि अनिश्चित हो, तो अधिकारी को स्वतः ही अपनी मूल स्थिति पुनः प्राप्त नहीं हो जावेगी।
यदि अवनति की समय, अवधि निश्चित हो, अवनति के आदेश में वह समयावधि विनिर्दिष्ट की जावेगी और वह तीन वर्ष से अधिक लम्बा न होगा। विनिर्दिष्ट निश्चित समयावधि की समाप्ति पर अधिकारी अपने आप अपना अन्तिम स्थान पुनः प्राप्त कर लेगा, किन्तु वह किसी पंक्ति की ऐसी पदोन्नति के लिए अधिकारी न होगा, जिसे उसने अवनति के समय भारसाधक के रूप में प्राप्त किया हो या जिसे वह प्राप्त कर लेता, यदि वह अवनत न हुआ होता।
(5) (क) कान्सटेबिल समयमान में रहते हैं तो जो नियत पदां के चयन वर्ग तक पहुँचता है। कान्सटेबिलों को चयन वर्ग से समयमान पर या समयमान में उच्चतर से निम्नतर प्रक्रम पर पदावनत किया जाता है, जब कोई कान्सटेबिल चयन वर्ग से समयमान पर अवनत किया जावे, उसका समानुदेशित प्रक्रम उससे निम्नतर न होगा, जिसके लिए सेवा की लम्बाई उसे समयमान में अधिकारी बनाती हो और अवनति की कोई समयावधि विनिर्दिष्ट नहीं की जावेगी। कान्सटेबिल चयन वर्ग में पुनः चयन किये जाने के लिए अर्ह होंगे यदि उसका आचरण चयन के लिए गुणयुक्त हो, समयमान में एक प्रक्रम से, निम्नतर प्रक्रम पर अवनति के मामले में अवनति की समयावधि विनिर्दिष्ट समयावधि की समाप्ति पर कान्सटेबिल समयमान का वह प्रक्रम पुनः प्राप्त कर लेगा, जिस पर वह पहुँच गया होता, यदि अवनत न हुआ होता।
(ख) इसके अतिरिक्त कान्सटेबिलों को निम्न प्रकार से भी अवनत किया जा सकता
(1) "क" श्रेणी से "ख" श्रेणी में।
(2) पदोअति के लिए अहं कान्सटेबिलों की सूची में विनिर्दिष्ट किसी निम्नतर में, और
(3) (एक) और (दो) का संयोग।
(ग) पदोन्नति के लिए अर्ह कान्सटेबिलों की सूची में निम्नतर स्थिति में अवनत किया गया कोई कान्सटेबल अध्याय तीन के उपबन्धों के अध्याधीन रहते हुए, जब उसकी दुबारा बारी आये पदोन्नति के लिए विचार किये जाने को अर्ह होगा।
(6) जब कान्सटेबिल की पंक्ति से ऊपर का कोई अधिकारी कान्सटेबिल की पंक्ति पर अवनत किया जावे, उसकी अवनति का आदेश देने वाला प्राधिकारी कान्सटेबिल के उस समयमान को बतायेगा, जिस पर उसे समानुदेशित किया गया है और यह वर्णन भी करेगा कि उसे "क" या "ख" श्रेणी में दी गई है। प्राधिकारी को यह बताना चाहिए कि उसे पदोन्नति के लिए अर्ह सिपाहियों की सूची में कौन-सा स्थान आवंटित किया जावेगा।
(7) विनिर्दिष्ट समयावधि के लिए अवनति के परिणामस्वरूप होने वाली रिक्तियाँ केवल प्रभारी रूप से ही भरी जायेंगी। अन्य रिक्तियाँ स्थायी रूप से भरी जायेंगी।
482-ए. दण्ड के रूप में वेतन वृद्धि रोक लेने का प्रत्येक आदेश उस समयावधि का कथन करेगा जिसके लिए वह रोकी गई हो, ऐसी समय अवधि एक वर्ष से अधिक न होगी और केवल वर्णित समय अवधि के लिए वृद्धि को स्थगित करने का प्रभाव रखेगी।
एक उप-निरीक्षक वेतनमान 65-2-95 दक्षतावरोध 2-2 1/2, 120 रु. में 67 रु. प्राप्त करता है और उसकी आगामी वेतन वृद्धि 1 जनवरी, 1947 को देय होता है। एक आदेश उसकी वेतन वृद्धि एक वर्ष के लिए रोके जाने का एक दिसम्बर, 1946 को पारित किया जाता है। पूरे वर्ष 1947 में, वह केवल 67 रुपये प्राप्त करेगा, किन्तु 1 जनवरी, 1948 से वह 71 रुपये प्राप्त करेगा।
एक कान्सटेबिल 20 रुपये प्राप्त करता है और 1 जनवरी, 1949 से 21 रुपये और 1 जनवरी, 1952 से 22 रुपये उसे देय होते हैं। 1 दिसम्बर, 1949 को उसकी वृद्धि एक वर्ष के लिए रोकने का आदेश पारित किया जाता है। वह 1 जनवरी, 1950 तक 20 रुपये प्राप्त करना जारी रखेगा और उस दिनांक से वह 21 रुपये प्राप्त करेगा। वह 1 जनवरी, 1952 से 22 रुपये प्राप्त करेगा।
वेतन वृद्धि रोक लेने की प्रक्रिया, विभागीय कार्यवाही के पश्चात् दण्ड स्वरूप के अतिरिक्त पैरा 463 में उपबन्धित की गई है।
483. पैरा 500 में अन्तर्विष्ट विशेष उपबन्धों और गवर्नर के द्वारा किसी विशिष्ट मामले में, पारित किये किन्हीं विशेष आदेशों के अध्याधीन रहते हुए, किसी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही में-
(क) मजिस्ट्रेट या पुलिस द्वारा जाँच जिसके अनुसरण में आगे कार्यवाही किये जाने की आवश्यकता दर्शायी जावे,
(ख) न्यायिक विचारण, या
(ग) विभागीय जाँच या निरन्तर दोनों, का समावेश होगा।
484. किसी विशिष्ट मामले में जाँच की प्रकृति में अपराध की प्रकृति के अनुसार भिन्नता होगी। यदि दण्ड प्रक्रिया संहिता की द्वितीय अनुसूची के अनुसार अपराध संज्ञेय या असंज्ञेय हो और उसकी सूचना जिला मजिस्ट्रेट द्वारा प्राप्त की जावे, यह दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए
(1) मजिस्ट्रेट द्वारा की जाने वाली जाँच कर सकता है या उसके लिये आदेश दे सकता है, या
(2) पुलिस के द्वारा अन्वेषण किये जाने का आदेश दे सकता है।
यदि जिला मजिस्ट्रेट के अतिरिक्त अन्य मजिस्ट्रेट द्वारा सूचना प्राप्त की जावे, और वह अपराध का संज्ञान ले लें, उसे उस मामले की रिपोर्ट तत्काल जिला मजिस्ट्रेट को करना चाहिए, जो उस मामले को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 408 से 412 के अधीन अपने न्यायालय में वापस ले लेगा। जिला मजिस्ट्रेट तब उस प्रकार कार्य कर सकता है मानो कि मूलतः परिवाद उसी को किया गया था।
इस शक्ति का विस्तार पुलिस एक्ट की धारा 29 के अधीन मामलों पर होता है, परन्तु इस धारा के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच का प्रत्येक अत्यन्त असाधारण परिस्थितियों में आदेश दिया जावेगा।
485. जब मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच का आदेश दिया जावे वह दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुसार की जावेगी और जबकि न्यायिक कार्यवाहियों की समाप्ति तक या जब तक कि मामला आगामी निपटारे के लिए उसे न सौंप दिया जावे, पुलिस अधीक्षक का उससे कोई सीधा सम्बन्ध नहीं रहेगा, किन्तु उसे जाँच करने वाले मजिस्ट्रेट को ऐसी कोई भी सहायता देना चाहिए, जो उससे विधिपूर्वक माँगी जा सकती हो और यदि पैरा 496 के अधीन यह आवश्यक हो जावे तो उसे अभियुक्त को निलम्बित कर देना चाहिए।
486. जब किसी पुलिस अधिकारी पर आरोपित कोई अपराध केवल एक्ट की धारा 7 के अधीन ही अपराध होता हो, दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा कोई जाँच नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में, अन्य मामलों में जब तक कि मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच का आदेश न हो जावे, जाँच निम्नलिखित नियमों के अनुसार पुलिस अधीक्षक के निर्देशन के अधीन होगी-
(एक) पुलिस अधिकारी द्वारा किसी संज्ञेय अपराध किये जाने के सम्बन्ध में पुलिस द्वारा प्राप्त की गई प्रत्येक सूचना में प्रथम दशा में दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय बारहवें के अधीन, व्यवहार किया जावेगा, विधि के अनुसार सम्बन्धित थाने में उपयुक्त धारा के अधीन मामला रजिस्ट्रीकृत किया जावेगा, परन्तु यह कि
(1) यदि प्रथम बार, मजिस्ट्रेट द्वारा सूचना प्राप्त की गई और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस को अग्रेषित की गई हो, पुलिस द्वारा कोई मामला रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जावेगा।
(2) यदि सूचना प्रथम बार पुलिस द्वारा प्राप्त की जावे, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 के द्वारा अपेक्षित रिपोर्ट जिला मजिस्ट्रेट को अग्रेषित कर दी जावेगी और उसको अग्रेषित करते समय पुलिस अधीक्षक अपने स्वयं के हाथ से अन्वेषण के बारे में क्या पग उठाये जा रहे हैं, या उससे बचने के लिए कारणों को अंकित करेगा।
(3) जब तक कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 (1) (ख) के अधीन पुलिस अधीक्षक द्वारा अन्वेषण करना अस्वीकार न कर दिया जावे और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 159 के अधीन उसका आदेश न दिया जावे या जब तक जिला मजिस्ट्रेट धारा 159 के अधीन मजिस्ट्रेट के द्वारा जाँच का आदेश न दे, अन्वेषण दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 के अधीन पुलिस अधीक्षक द्वारा चुने गये और आरोपित अधिकारी से उच्चतर पुलिस अधिकारी द्वारा किया जावेगा।
(4) अन्वेषण, की समाप्ति पर और इसके पूर्व कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 173-क द्वारा अपेक्षित रिपोर्ट तैयार की जावे, यह प्रश्न कि आरोपित अधिकारी को विचारण के लिए दिया जावे या नहीं, पुलिस अधीक्षक द्वारा निर्णीत किया जावेगा, परन्तु इसके पूर्व कि उस अधिकारी को, जिसकी पदच्युति के लिए पैरा 479 के अधीन उप-महानिरीक्षक का सहमति अपेक्षित होता है, पुलिस अधीक्षक के द्वारा विचारण के लिए भेजा जावे, उप-महानिरीक्षक की सहमति प्राप्त कर ली जानी चाहिए।
(5) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 या धारा 169 के अधीन आरोप-पत्र या अन्तिम रिपोर्ट, जैसी कि स्थिति हो, जिला मजिस्ट्रेट को भेजी जावेगी, यदि पुलिस अधीक्षक या उप-महानिरीक्षक के अभियोजन के विरुद्ध निर्णय लिया हो, ऐसे निर्णय के कारणों की एक टीप पुलिस अधीक्षक द्वारा अन्तिम रिपोर्ट पर पृष्ठांकित या उसमें संलग्न की जावेगी।
(6) जब अभियोजन संस्थापित न करने का कारण यह हो कि आरोप के निराधार होने का विश्वास किया जाता है, कोई आगामी कार्यवाही आवश्यक न होगी। यदि आरोप के सत्य होने का विश्वास किया जावे, और साक्ष्य के अपर्याप्त समझे जाने के कारण या अन्य किसी कारण से अभियोजन न किया जावे, जब दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 173 के अधीन जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अन्तिम रिपोर्ट स्वीकार कर ली जावे, पुलिस अधीक्षक पैरा 490 में यथानिर्धारित विभागीय कार्यवाही कर सकता है।
(दो) जब किसी पुलिस अधिकारी द्वारा असंज्ञेय अपराध की (पुलिस एक्ट की धारा 29 के अधीन अपराध को सम्मिलित करते हुए) सूचना प्रथम अवस्था में पुलिस को दी जावे, पुलिस अधीक्षक, यदि वह कार्यवाही करने के लिए कारण देखे या तो (क) इस पैरा के शीर्ष तृतीय और पैरा 490 में यथानिर्धारित विभागीय कार्यवाही कर सकता है, या (ख) उसके विकल्प के रूप में या विभागीय कार्यवाही के किसी प्रक्रम में, जिला मजिस्ट्रेट को एक रिपोर्ट इस निवेदन के साथ कि वह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 190(1) (ख) के अधीन संज्ञान ले, अग्रेषित कर सकता है, परन्तु यह कि पुलिस अधिकारियों द्वारा असंज्ञेय अपराध किये जाने की रिपोर्ट की (जब पुलिस को की जावे, और जब तक कि संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा औपचारिक पुलिस अन्वेषण की इच्छा करने के विशेष कारण न हों) साधारणतया विभागीय रूप से जाँच की जावेगी और जब तक कि विभागीय जाँच पूरी जाँच न हुई हो, केवल तभी और साधारणतया नहीं, जिला मजिस्ट्रेट को निर्देशित किये जायेंगे जब तक कि आपराधिक अभियोजन वांछनीय न हो। और या तो ऊपर निर्धारित रीति से पुलिस अधीक्षक द्वारा या प्रक्रिया संहिता की धारा 190(1) (क) और (ग) के अधीन निर्धारित रूप से सूचना प्राप्त होने पर, जिला मजिस्ट्रेट दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय चौदह के सामान्य उपबन्धों के अध्याधीन रहते हुए-
(क) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 56 के अधीन आगे बढ़ा सकेगा।
(ख) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 202 के अधीन मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच या पुलिस के द्वारा अन्वेषण के लिए या धारा 155 के अधीन पुलिस के द्वारा अन्वेषण के लिए आदेश देगा।
(ग) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 203 के अधीन आगे कार्यवाही करने से निषेध करेगा।
यदि पुलिस के द्वारा अन्वेषण किये जाने का आदेश दिया जावे, वह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 155 (3) के अधीन आरोपित अधिकारी से उच्चतर पंक्ति के पुलिस अधीक्षक के द्वारा चुने गये अधिकारी से कराये जाने का होगा और आगे की सभी कार्यवाहियाँ ठीक वैसी ही होंगी जैसी कि संज्ञेय मामलों के बारे में उपरोक्त पैरा 486 (1), (4), (5) और (6) में निर्धारित की गई है।
यदि पुलिस के द्वारा अन्वेषण के लिए जाने का कोई आदेश न दिया जावे, और जिला मजिस्ट्रेट, मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच के पूर्व या पश्चात् मामले में आपराधिक रूप से आगे कार्यवाही करने से निषेध कर दें, पुलिस अधीक्षक उपरोक्त पैरा 486-एक (6) में वर्णित किये गये सिद्धान्त के अनुसार और पैरा 494 में समाविष्ट आदेशों के अध्याधीन रहते हुए, वह निर्णय करेगा कि क्या पैरा 490 के अधीन विभागीय कार्यवाहियाँ अपेक्षित हैं।
(तीन) उसको दी गई सूचना पर या अपने स्वयं ज्ञान या शंका पर कि उसके अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी ने पुलिस एक्ट की धारा 7 के अधीन या कोई ऐसा असंज्ञेय अपराध (पुलिस एक्ट की धारा 29 के अधीन अपराध को सम्मिलित करते हुए) किया है, जिसकी रिपोर्ट उपरोक्त नियम दो के अधीन लिखित रूप से जिला मजिस्ट्रेट को उस प्रक्रम पर अग्रेषित करना वह अनावश्यक समझे, पुलिस अधीक्षक कार्यवाही करने के कारण देखे, तो वह आरोप की सत्यता की परीक्षा करने के लिए पर्याप्त होने वाली विभागीय जाँच करेगा या आरोपित अधिकारी से पंक्ति में ज्येष्ठ होने वाले अधिकारी से करवायेगा। इस जाँच की समाप्ति पर वह यह निर्णय करेगा कि क्या कोई आगामी कार्यवाही आवश्यक है और यदि ऐसा हो, तो क्या आरोपित अधिकारी का विभागीय विचारण किया जाना चाहिए या क्या दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन संज्ञान लेने के लिए जिला मजिस्ट्रेट को संचारित कर देना चाहिए, परन्तु यह कि किसी निरीक्षक या उप-निरीक्षक के विरुद्ध पुलिस एक्ट की धारा 29 या किसी विधि को असंज्ञेय धारा के अधीन अपराध के लिए आपराधिक रूप से अग्रसर होने के लिए पुलिस अधीक्षक द्वारा जिला मजिस्ट्रेट को संचारित किये जाने के पूर्व, उप-महानिरीक्षक की सहमति प्राप्त कर ली जानी चाहिए। धारा 29 के अधीन अभियोजन यदा-कदा हो और केवल तभी किया जावे जब कि उसके साथ धारा 7 के अधीन समुचित रूप से व्यवहार न किया जा सकता हो।
487. यदि कोई पुलिस अधिकारी असावधानी से या स्वेच्छापूर्वक किसी बन्दी को बच कर भाग जाने दे, पुलिस एक्ट की धारा 7 के अधीन विभागीय कार्यवाहियाँ सदैव की जानी चाहिए। जब तक कि कोई असाधारण गजट कम करने वाली परिस्थिति न हो, दिया जाने वाला दण्ड पदच्युति होगा। इसके पूर्व किसी विभागीय कार्यवाही में अन्तिम दण्डादेश पारित किया जावे, पुलिस अधीक्षक को प्रत्येक मामले में रेन्ज के उप-महानिरीक्षक को निर्देशित करना चाहिए कि क्या मौनानुकूलता या आपराधिक असावधानी को प्रकट करने वाला पर्याप्त न हो।
488. प्रधान कान्सटेबिल से वरिष्ठ पंक्ति से पुलिस अधिकारी के विरुद्ध कोई आपराधिक आरोप का किसी विभाजित जिलों में न्यायिक अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट द्वारा विचारण किया जाना चाहिए। अन्यत्र ऐसे मामले का विचारण न्यायिक कार्य का कम से कम चार वर्ष का अनुभव रखने वाले न्यायिक अधिकारी द्वारा किया जावेगा। उस दशा में जबकि अपेक्षित अनुभव वाला न्यायिक अधिकारी उपलब्ध न हो, जिला मजिस्ट्रेट उस मामले को अपनी फाइल में रखेगा या कार्यपालिका अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट को अन्तरित कर देगा।
489. पुलिस एक्ट की धारा 7 के अधीन किसी पुलिस अधिकारी का विभागीय विचारण हो सकता है
(1) उसका न्यायिक विवरण चाहे हुआ हो या न हुआ हो;
(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट के द्वारा जाँच के पश्चात्ः
(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन पुलिस अन्वेषण या उपरोक्त पैरा 486 (तीन) के अधीन विभागीय जाँच के पश्चात्।
489-अ. कोई राजपत्रित अधिकारी, जो किसी मामले में अभियोजन साक्षी हो या जिसने उस मामले में पूर्व में प्रारम्भिक जाँच की हो, उस मामले में पुलिस एक्ट की धारा 7 के अधीन कार्यवाही संचालित नहीं करेगा। उस दशा में जबकि वह राजपत्रित अधिकारी स्वयं पुलिस अधीक्षक हो और उस जिले में कोई अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक न हो, सम्बन्धित उप-महानिरीक्षक को संचारित किया जावेमा कि वह उस मामले को किसी अन्य जिले में अन्तरित कर दे।
490. न्यायिक विचारण या मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच के परिणामस्वरूप पुलिस अधिकारियों के विभागीय रूप से व्यवहार किये जाने वाले मामलों के बारे में विशेष उपबन्ध पैरा 493 और 494, तुच्छ दण्ड वाले मामलों के बारे में पैरा 495 में दिये गये हैं। उन उपबन्धों के अध्याधीन रहते हुए, पुलिस अधिकारियों के विभागीय विचारण निम्नलिखित नियमों के अनुसार संचारित किया जाना चाहिए-
(1) प्रारम्भिक जाँच के पश्चात् आरोप का सारांश आरोप-पत्र में लेखबद्ध किया जाना चाहिए जो उतना यथार्थ हो जितना हो सके। आरोप को आरोपित अधिकारी को पढ़कर सुनाया और समझाया जावे, और आरोप-पत्र की एक प्रति उसे दी जानी चाहिए।
(2) तब आरोपित अधिकारी से यह पूछा जावे कि क्या वह उसके विरुद्ध बनाये गये आरोप को स्वीकार करता है या उससे इंकार करता है। उसका उत्तर मौखिक या लिखित हो सकता है, ऐसी नियत के भीतर जिसे पुलिस अधीक्षक युक्तियुक्त समझे और जो लिखित उत्तर की दशा में 48 घन्टे से कम की न हो, पुलिस अधीक्षक के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस प्रक्रम पर आरोपित अधिकारी से कोई विस्तृत स्पष्टीकरण अपेक्षित नहीं है। यदि अधिकारी आरोप स्वीकार कर ले, उसके विरुद्ध किसी अभियोजन साक्ष्य को अभिलिखित करना आवश्यक न होगा। तथापि यदि वह आरोप से मना करे, तो उसकी साक्ष्य अभिलेख पर लाई जानी चाहिए। जितनी की पुलिस एक्ट की धारा 7 के अधीन आरोप को संस्थापित करने के लिए पुलिस अधीक्षक आवश्यक समझे। साक्ष्य या तो मौखिक या लिखित हो सकता है और आरोप के लिए अत्यावश्यक होना चाहिए। यदि, मौखिक हो तो -
(क) यह प्रत्यक्ष हो अर्थात् यदि वह ऐसे तथ्य की हो, जो देखा या अन्य प्रकार से जाना जा सकता हो, तो उस व्यक्ति को जो यह कहे कि उसने उसे देखा या जाना है।
(ख) वह पुलिस अधीक्षक द्वारा आरोपित पक्ष की उपस्थिति में अभिलिखित की जानी चाहिए, जिसे साक्षियों से प्रतिपरीक्षण करने की अनुमति दी जावेगी। आरोपित पक्ष के, आचरण की प्रारम्भिक जाँच में राजपत्रित पुलिस अधिकारियों द्वारा अभिलिखित कथन या मजिस्ट्रेट द्वारा अभिलिखित कथन ग्राह्य होंगे और उनके पुनः अभिलिखित किये जाने की आवश्यकता नहीं है यदि वे आरोपित पक्ष की उपस्थिति में साक्षियों को पढ़कर सुनाये और उनके द्वारा स्वीकार कर लिये जायें तथा आरोपित पक्ष को साक्षियों से प्रतिपरीक्षण करने का अवसर प्रदान कर दिया जावे।
(3) (क) जब आरोप के समर्थन में किसी दस्तावेज पर विश्वास किया जावे, वे प्रादर्श के रूप में साक्ष्य में लाये जायेंगे, और आरोपित अधिकारी को इसके पूर्व कि उससे अपना बचाव करने को कहा जावे, ऐसे दस्तावेजों का निरीक्षण करने की अनुमति और बिना मूल्य उनकी प्रतियाँ दी जानी चाहिए। दस्तावेजों को तब प्रदर्श के रूप में नहीं रखा जाना चाहिए, जबकि उनकी विषय-वस्तु उपरोक्त नियम 2 (क) और (ख) के अधीन साक्ष्य में अग्राह्य हों, उदाहरणार्थ, अधीनस्थ अधिकारियों को दिये गये साक्षियों के कथन, निष्कर्ष के बारे में रिपोर्ट और ऐसे अधिकारियों के अभिमत साक्ष्य नहीं हैं, और ऐसे कथन और निष्कर्ष प्रदर्शित नहीं किये जायेंगे। तथापि अधीनस्थ अधिकारियों को दिये गये थानों का उपयोग पुलिस अधीक्षक द्वारा साक्षियों को सत्यता की परीक्षा करने के लिए किया जा सकता है, परन्तु ऐसा करते समय, कथनों की प्रतियाँ प्रादर्श के रूप में रखी जावेगी।
यदि कोई सरकारी सेवक उपरोक्त वर्णित किये गये के अतिरिक्त किसी दस्तावेज या दस्तावेजों की प्रतियों की इच्छा करे, और जाँच करने वाले अधिकारी द्वारा यह दस्तावेजें संगत मानी जायें, उनकी प्रतियाँ उसे प्रतिलिपि का व्यय भुगतान किये जाने पर, दी जा सकेंगी। यदि जाँच करने वाला अधिकारी आरोपित पक्ष के द्वारा अपेक्षित की गई दस्तावेजों को असंगत या कार्यवाहियों के लिए संगत न होने वाली, समझे वह अस्वीकृति के कारणों को लेखीय रूप में अभिलिखित करते हुए, उनकी प्रतियाँ देना अस्वीकार कर सकेगा।
(ख) लोक अभिलेखों की प्रमाणित प्रतिलिपियों को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। (ग) इस तथ्य के बारे में साक्ष्य कि कोई पुलिस अधिकारी अपने साधनों से बढ़ चढ़कर रहता है, इस दृष्टिकोण के लिए कि वह अवैध पारितोषण प्राप्त करता है, एक प्रबल उपधारणा मानी जायेंगी। ऐसे मामलों में सामान्य ख्याति की साक्ष्य, चाहे वह कठोरता से प्रत्यक्ष प्रकार की न हो, ग्रहण की जानी चाहिए।
(घ) औपचारिक प्रकृति की विशेषज्ञ की दस्तावेजी साक्ष्य, दस्तावेज को सिद्ध करने के लिए इन साक्षियों को बुलाये बिना ग्रहण की जा सकेंगी। इसी प्रकार उन प्रादर्शों को, अभियुक्त द्वारा स्वीकार कर लिए जायें, सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है।
(4) यदि, अभियोजन साक्ष्य अभिलिखित करने के पश्चात् पुलिस अधीक्षक आरोप में कोई वृद्धि या परिवर्तन करना आवश्यक समझे, वह आरोपित अधिकार को संशोधित आरोप-पत्र की प्रतिलिपि जारी करेगा और उसे संशोधित आरोप की विवक्षायें समझावेगा। तब आरोपित अधिकारी को अभियोजन साक्षियों से, उन बिन्दुओं पर जो आरोप से संशोधन हो जाने के कारण संगत हो गये हों, अतिरिक्त प्रतिपरीक्षण का एक अवसर दिया जावेगा।
(5) आरोपित अधिकारी को ऐसी नियत समयावधि के भीतर, जो सात दिवस से कम की न हो, जैसी पुलिस अधीक्षक युक्तियुक्त समझे, अपने बचाव का लेखीय कथन फाइल करने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए। इस प्रक्रम पर उससे यह पूछा जाना चाहिए कि क्या वह कोई बचाव साक्षी पेश करेगा या कोई दस्तावेजी प्रादर्श फाइल करना चाहता है। यदि ऐसा हो, तो उसे अपने बचाव के लेखीय कथन के साथ-साथ साक्षियों के नाम और दस्तावेजों का विवरण देना और यह बताना चाहिए कि वह प्रत्येक साक्षी और दस्तावेज से क्या सिद्ध करने की आशा रखता है। यदि पुलिस अधीक्षक यह समझे कि किसी साक्षी की साक्ष्य या दस्तावेज का, जिसे आरोपित अधिकारी अपने बचाव में पेश करने का इच्छुक है, मामले के हेतुक के लिए अत्यावश्यक होना सम्भाव्य नहीं है, वह ऐसे साक्षी को बुलाने से यह ऐसी दस्तावेज को उसकी साक्ष्य में पेश करने की अनुमति देना अस्वीकार कर सकता है, किन्तु ऐसी दशा में, उसे ऐसी अस्वीकृति के अपने कारणों को संक्षेप में अभिलिखित करना चाहिए। उसे तब या तो अवशेष साक्षियों को स्वयं बुलाना चाहिए या आरोपित अधिकारी को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि उसे अपना लेखीय कथन या बचाव साक्षी प्रस्तुत करने में क्लेशकर विलम्ब करने के द्वारा कार्यवाही को लम्बा करने की अनुमति नहीं दी जावेगी और यह कि यदि वह नियत दिनांक पर बिना किसी अच्छे कारण के उन्हें पेश करने में विफल रहता है तो उसके बिना मामला अग्रसर होगा।
(6) बचाव के लिखित स्पष्टीकरण की प्राप्ति पर आरोपित अधिकारी का मौखिक कथन भी पुलिस अधीक्षक द्वारा अभिलिखित किया जाना चाहिए ताकि लेखीय स्पष्टीकरण सम्पुष्ट हो सके या कोई ऐसा बिन्दु स्पष्ट किया जा सके, जैसा आवश्यक समझा जा सके।
(7) तब बचाव साक्षियों के कथन पुलिस अधीक्षक द्वारा अभिलिखित किये जाने चाहिए, जो उनसे किसी भी ऐसे बिन्दु पर, जैसा वह आवश्यक समझे, प्रतिपरीक्षण कर सकता है।
(8) पुलिस अधीक्षक को अपना निष्कर्ष लिखना चाहिए। निष्कर्ष में उसको कड़ाई से अपने आपको आरोप के विषय और अभिलेख पर साक्ष्य तक ही सीमित रखना चाहिए और आरोपित अधिकारी द्वारा प्रतिपादित प्रत्येक पक्ष पर, विवेचना करना चाहिए। विवादित तथ्य के निष्कर्ष पर पहुँचने पर, यदि उसने आरोप को प्रभावित पाया हो, उसे यह निर्णय करने के पूर्व कि कौन सा दण्ड, यदि कोई हो, प्रथम दृष्टि में उपयुक्त होगा, आरोपित व्यक्ति के चरित्र और पूर्व आचरण पर विचार करना चाहिए। यदि पुलिस अधीक्षक का यह विचार हो कि पदच्युत, निकाल दिया जाना या अवनत करना उचित दण्ड है, उसे उन सभी मामलों में, जिनमें उसे ऐसे दण्ड देने की शक्ति प्रापत है, अपने निष्कर्ष की एक प्रति आरोपित अधिकारी को प्रदाय करना चाहिए और उससे उन दण्डों के आरोपित करने विरुद्ध, एक युक्तियुक्त समय (एक सप्ताह से कम का न होगा) के भीतर कारण बताने को कहना चाहिए। आरोपित अधिकारी को यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि इसके पूर्व कोई दण्ड आदेश पारित किया जावे, इस सम्बन्ध में उसके द्वारा किये गये अभ्यावेदन पर विचार किया जावेगा।
(9) उन सभी मामलों में जिनमें पुलिस अधीक्षक निरीक्षकों या उप-निरीक्षकों की पदच्युति या निकाला जाना प्रस्तावित करे, वह इन मामलों की जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से अन्तिम आदेशों के लिए पुलिस उप-महानिरीक्षक के लिए अग्रेषित करेगा।
(10) जब उप-महानिरीक्षक का यह विचार हो कि उपयुक्त दण्ड पदच्युति, निकाला जाना या अवनत किया जाना सम्भाव्य है, वह पुलिस अधीक्षक के निष्कर्ष की एक प्रति आरोपित अधिकारी को प्रदान करवायेगा और उसी के साथ ही साथ उससे इन दण्डों के आरोपित किये जाने के विरुद्ध कारण बताने को कहेगा।
आरोपित अधिकारी से उसका लेखीय अभ्यावेदन यदि कोई हो, एक सप्ताह से कम की न होने वाली ऐसी नियत समयावधि में जो उप-महानिरीक्षक युक्तियुक्त समझे, प्रस्तुत करने को कहा जावेगा। सभी मामलों में उप-महानिरीक्षक को, अपना निष्कर्ष और आदेश लिखने के पूर्व आरोपित अधिकारी का मौखिक कथन अभिलिखित करना चाहिए।
(11) किसी मामले में, जिसमें पुलिस अधीक्षक का यह विचार हो कि इन नियमों से परे हटना विशेष परिस्थितियों के कारण औचित्यपूर्ण है, उसे अपने निर्णय के कारणों को अभिलिखित करना चाहिए और किसी भी मामले में अपने निष्कर्ष में यह दिखाना पुलिस अधीक्षक का कार्य होगा कि साधारण प्रक्रिया से परे हटने से आरोपित अधिकारी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है।
(12) इन नियमों के अधीन संस्थापित की गई किसी कार्यवाही में आरोपित अधिकारों का किसी अभिभावक द्वारा प्रतिनिधित्व नहीं किया जावेगा।
(13) इन नियमों के अधीन पुलिस अधीक्षक द्वारा प्रयोग किये जाने वाले सभी या कोई कर्तव्य किसी पुलिस अधीक्षक से वरिष्ठ किसी अधिकारी द्वारा प्रयोग किये जा सकते हैं।
(14) पुलिस महानिरीक्षक या पुलिस उप-महानिरीक्षक कारणों को अभिलिखित करते हुए, या तो स्वप्प्रेरणा से या पुलिस एक्ट की धारा 7 के अधीन विभागीय विचारण कर रहे अधिकारी के निवेदन पर, किसी मामले को समानुरूप पंक्ति के किसी अन्य अधिकारी को अन्तरित कर सकता है।
491. पैरा 479 (2) में गिनाये गये पदों को धारण करने वाले अधिकारी विभागीय विचारण संचालित करते समय पैरा 490 के द्वारा विहित प्रक्रिया का अनुसरण करेंगे और उनके आदेश, पुलिस अधीक्षक की सहमति से सभी मामलों में, उन मामलों के सिवाय जिनमें कार्यवाही संचालित करने वाला अधिकारी कान्सटेबिल या अवर अधिकारियों की पदच्युति या निकाले जाने की सिफारिश करें, पुलिस अधीक्षक के आदेश के भांति कार्यपालिका बल रखेंगे। ऐसे मामलों में, पुलिस अधीक्षक (यदि ऐसा पूर्व में न किया गया हो) अधिकारी को जाँचकर्ता अधिकारी के निष्कर्ष को एक प्रति देगा और उससे युक्तियुक्त समय के भीतर (जो एक सप्ताह से कम न होगा) यह कारण दर्शाने को पूछेगा कि ऐसे दण्ड क्यों न दिये जायें? अवर अधिकारी या कान्सटेबिल की पदच्युति या निकाले जाने के सभी आदेशों को स्वयं पुलिस अधीक्षक द्वारा पारित किये जाने चाहिए और ऐसा कोई मामला जिसमें पुलिस अधीक्षक पुलिस बल की किसी शाखा के निरीक्षक की पदच्युत या निकाले जाने के प्रस्ताव में सहमत हों, रेन्ज के उप-महानिरीक्षक का आदेशों के लिए अग्रेषित किया जाना चाहिए।
492. जब कभी किसी पुलिस अधिकारी का न्यायिक विचारण हुआ हो, यह निर्णय करने के पूर्व कि क्या कोई आगामी विभागीय कार्यवाही आवश्यक है, पुलिस अधीक्षक को न्यायिक अपील के यदि कोई हो, निर्णय की प्रतीक्षा करना चाहिए।
493. पुलिस अधीक्षक को यह अनुज्ञेय नहीं होगा कि वह किसी ऐसे पुलिस अधिकारी के विरुद्ध विभागीय जाँच में, जिसका न्यायिक विचारण हो चुका हो, उन तथ्यों का परीक्षण करे, जो उसके न्यायिक विचारण में विवादग्रस्त रहे हों और उन तथ्यों पर न्यायालय के निष्कर्षों को अन्तिम माना जाना चाहिए।
इस प्रकार (क) यदि अभियुक्त दोषसिद्ध पाया और कठोर कारावास से दण्डित किया गया हो, कोई विभागीय जाँच आवश्यक न होगी क्योंकि वह तथ्य कि वह कठोर कारावास के लिए पात्र ठहराया गया हो, पुलिस अधिनियम की धारा 7 के अभिप्राय के लिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में उसकी अनुपयुक्ता का निर्णायक प्रमाणपत्र माना जाना चाहिए। ऐसे मामलों में पुलिस अधीक्षक बिना किसी आगामी कार्यवाही के साधारणतया, पैरा 479 (क) के अधीन जब आवश्यक हो, उप-महानिरीक्षक के औपचारिक आदेश प्राप्त करते हुए, पदच्युति का आदेश पारित करेगा। यदि वह अन्यथा करने का इच्छुक हों, उसे मामले को रेन्ज के उप-महानिरीक्षक को आदेशों के लिए निर्देशित करना चाहिए।
(ख) यदि अभियुक्त दोषसिद्ध पाया गया हो, किन्तु कठोर कारावास से अल्पतर दण्ड से दण्डित किया गया हो, विभागीय जाँच आवश्यक होगी, यदि आगामी कार्यवाही के वांछनीय होने का विचार किया जावे, परन्तु इस विचारण में विवादग्रस्त प्रश्न होगा कि (1) क्या वह अपराध, जिसके लिए अभियुक्त दोषसिद्ध पाया गया है, पुलिस एक्ट की धारा 7 के अधीन अपराध होता है, (2) यदि हो तो क्या दण्ड आरोपित किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में पुलिस अधीक्षक (एक) अभियुक्त से यह कारण पूछेगा कि उस पर कोई विशिष्ट शास्ति क्यों न आरोपित की जावे। (दो) न्यायालय के निष्कर्षों को विवादास्पद बनाने की अनुमति दिये बिना, ऐसी कोई बात अभिलिखित करेगा, जो अभियुक्त अधिकारी ऐसी शास्ति के विरुद्ध अर्ज करना चाहे और (तीन) और उपरोक्त (1) और (2) से संगत होने वाले अभियुक्त अधिकारी द्वारा उठाई गई प्रतिपादनों से व्यवहार करते हुए, साधारण रीति में अपने निष्कर्ष और आदेश अभिलिखित करेगा।
(ग) यदि अभियुक्त का न्यायिक दोष मुक्ति या उन्मोचन कर दिया गया हो और अपील फाइल करने की समयावधि बीत चुकी हो या कोई अपील फाइल की गई हो, पुलिस अधीक्षक उसे पुनर्स्थापित कर देगा, यदि वह निलम्बित हो, किन्तु यदि न्यायालय के निष्कर्ष इस दृष्टिकोण से असंगत न हो कि पुलिस एक्ट की धारा 7 के अभिप्राय में, अभियुक्त अपने कर्तव्य पालन में असावधान या उसके लिए अनुपयुक्त रहा है तो पुलिस अधीक्षक मामले को उप-महानिरीक्षक को निर्देशित कर और अभियुक्त को असावधानी या अनउपयुक्ता के लिए विभागीय विचारण करने की अनुज्ञा माँग सकता है।
494. जब निरीक्षक का या उससे निम्न पंक्ति का कोई पुलिस अधिकारी का आपराधिक अभियोजन न किया गया हो, परन्तु उसके आचरण को जिला मजिस्ट्रेट या किसी ऐसे अधीनस्थ मजिस्ट्रेट जिसके निष्कर्ष जिला मजिस्ट्रेट द्वारा स्वीकार कर लिये गये हों, के द्वारा जाँच की गई हो, इसके पूर्व कि वह पुलिस अधीक्षक द्वारा विभागीय रूप से दण्डित किया जा सके, अभियुक्त का पुलिस अधीक्षक द्वारा विभागीय रूप से विचारण किया जाना चाहिए, यदि वह मजिस्ट्रेट द्वारा तथ्यों के निष्कर्षों को स्वीकार न करे तो वह जिला मजिस्ट्रेट के निवेदन पर उस प्रश्न को पुलिस उप-महानिरीक्षक को निर्देशित करने के लिए आबद्ध रहेगा।
495. प्रधान कान्सटेबिल की पंक्ति से ऊपर न होने वाले पुलिस बल के सदस्यों द्वारा दुराचरण के नगण्य मामले और अनुशासन के तुच्छ भंग की रिपोर्टों को जहाँ तक सम्भव हो सके, यदि अभियुक्त मुख्यालय पर हो, अर्दली कक्ष में जाँच पर निपटा देना चाहिए, पुलिस अधीक्षक या मुख्यालय के भारसाधक राजपत्रित अधिकारी को सप्ताह में दो या तीन नियत दिनों को लाइन या कोतवाली में अर्दली कक्ष लगाना चाहिए। ऐसे मामलों में धारा 7 के प्रारूप क्रमांक 133 का स्थान अर्दली कक्ष रजिस्टर प्रारूप क्र. 103 लेगा। रिजर्व निरीक्षक इस रजिस्टर के चार स्तम्भों को भरेगा और उन व्यक्तियों को एकत्रित करेगा, जिनकी उपस्थिति आवश्यक हो। पैरा 478 (ग), (घ), (ङ) और (1) में गिनाये गये दण्ड क्रमांक 103 को कार्यवाही के पश्चात् दिये जा सकेंगे। बल के किसी सदस्य को कोई व्यक्तिगत आवेदन या अभ्यावेदन करने के लिए अर्दली कक्ष में उपस्थित होने की अनुज्ञा प्रदान की जावेगी, परन्तु यह कि वह कर्तव्य से फालतू किया जा सकता हो और अपने आशय को उस अधिकारी को लेखीय रूप में सूचित कर दे, जिसके वह निकटतम अधीनस्थ हो। यदि उस अधिकारी का यह समाधान हो जावे कि आवेदक व्यक्तिगत रूप से सुने जाने का अधिकारी है, उसे सूचना पर सूक्ष्म हस्ताक्षर कर देना और उसे उसके साथ अर्दली कक्ष में उपस्थित होने को अनुदेशित कर देना चाहिए यदि वह ऐसी अनुज्ञा रोक ले, उसे अपने कारणों की रिपोर्ट लेखीय रूप में अधीक्षक को करना चाहिए।
496. दुराचरण के आरोप में विभागीय या न्यायिक जाँच के दौरान सभी पुलिस अधिकारी निलम्बन के लिए दायित्वाधीन हैं। किसी अधिकारी का निलम्बन उस प्राधिकारी द्वारा आदेशित किया जा सकता है, जिसे उसे किसी भी रूप का विभागीय दण्ड देने की शक्ति प्राप्त हो, उदाहरणार्थ पुलिस अधीक्षक किसी को निलम्बित कर सकता है चाहे वह उसे पदच्युत न कर सकता हो।
अधीक्षक को जब तक विचारण समाप्त न हो ऐसे किसी पुलिस अधिकारी को निलम्बित कर देना चाहिए जिसका अभियोजन उसके या उप-महानिरीक्षक के द्वारा आदेशित किया गया हो या जिसका अभियोजन मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच किये जाने के परिणामस्वरूप हुआ हो। यदि परिवाद पर किसी प्राइवेट व्यक्ति द्वारा अभियोग संस्थापित किया गया हो, पुलिस अधीक्षक को निर्णय लेना चाहिए कि क्या मामले को परिस्थितियाँ अभियुक्त के निलम्बन को उचित ठहराती हैं।
निलम्बन करने वाला प्राधिकारी, निलम्बन के समय मूलभूत नियम 53 (ग) के अधीन निलम्बन भसे की दर और उस अधिकारी की दशा में जो घोड़ा रखता हो, तीन मास की सीमा तक घोड़ा भत्ता के भुगतान के लिए भी नियत करते हुए सशर्त आदेश पारित करेगा। यदि इस तीन मास की समयावधि में कार्यवाहियों के समाप्त होने की सम्भावना न हो, अधिकारी को अपने घोड़े का निपटारा करने का अधिकार होगा।
497. निलम्बन के अधीन प्रधान कान्सटेबिलों और कान्सटेबिलों से पुलिस अधीक्षक द्वारा लाइनों के भीतर पंक्ति में रहने की अपेक्षा की जा सकेगी, परन्तु उन पर उससे अधिक कठोर निरोध नहीं किया जावेगा जितना कि उन्हीं को पंक्ति के लाइन के कर्तव्य पर रहने वाले अधिकारी पर रहता है। उन्हें अपने विधिक सलाहकार से सम्पर्क करने या उनका बचाव तैयार करने के लिए लाइन छोड़ने की अनुमति दी जानी चाहिए। यही आदेश निलम्बन के अधीन उप-निरीक्षकों की दशा में लागू होगा, यदि उनके लिए लाइन में उपयुक्त स्थान हो।
यदि निलम्बन के अधीन पुलिस अधिकारी से पुलिस लाइन में रहने की अपेक्षा की जावे, निलम्बन के आदेश में इस आशय के अनुदेश का समावेश होना चाहिए।
यह आदेश उन पुलिस अधिकारियों के मामले में लागू नहीं होते जो किसी विधिक न्यायालय द्वारा जमानत पर उन्मोचित कर दिया जावे और निलम्बन के अधीन कर दिया जावे, परन्तु पुलिस अधीक्षक ऐसे अधिकारी को यह आदेश दे सकेगा कि वह उसे अपनी गतिविधियों से सूचित बनाये रखे।
498. उस प्राधिकारी को जो निलम्बन के पश्चात् किसी पुलिस अधिकारी की पुनर्स्थापना का आदेश सिविल सर्विस रेगुलेशन्स और मूलभूत नियमों के अध्याधीन रहते हुए, यह निर्देशित करना चाहिए कि उसे निलम्बन की समयावधि में किस दर से भुगतान किया जाना है और क्या वह समयावधि पेन्शन के लिए गिनी जाना है। यह आदेश उस अधिकारी को घोड़े के भत्ते को अनुदत्त किया जाना प्रभावित नहीं करेगा, जो उपरोक्त पैरा 496 के उप-पैरा तीन के द्वारा शासित होता है।
उस प्राधिकारी को निलम्बन के पश्चात् किसी पुलिस अधिकारी को पुनस्र्थापित किये जाने का आदेश दे देना चाहिए कि वह अपने मूल आदेश की, जहाँ तक उसका सम्बन्ध मामले के परिणाम के अनुसार और मूलभूत नियम 54 के अध्याधीन रहते हुए निलम्बन काल के दौरान वेतन के भुगतान से है, सम्पुष्ट करे या उलट दें। घोड़े के भत्तों के भुगतान के आदेश को पुनरीक्षित करने की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि वह, मामले के परिणाम से सापेक्ष न होते हुए, केवल तीन मास की समयावधि के लिए ही निकाला जावेगा।
यदि अपील या पुनरीक्षण पर, उस पुलिस अधिकारी के लिए जो पदच्युत कर या निकाल दिया गया हो, पुनर्स्थापित किये जाने का आदेश दिया जावे, जो निवृत्त हो गया है, परन्तु आदेश की प्राप्ति से एक पखवाड़े के भीतर वह अपने कर्तव्य पर पुनः उपस्थित होने में विफल रहता है, तो पदच्युत, निकाल देने या व्यक्ति की पंक्ति में अवनति करने को सशक्त प्राधिकारी यह उपधारणा कर सकता है कि यह युक्तियुक्त रूप से व्यवहारिक नहीं है कि उक्त अधिकारी को कारण बताने का अवसर दिया जावे, और अपने कारणों को लेखीय में अभिलिखित करते हुए, उसकी अनुपस्थिति में कार्यवाही कर सकता है।
499. उन मामलों में जिनमें पुनरीक्षण के लिए आवेदन या अपील को ग्रहण करना उसकी सामर्थ्य के भीतर हो, उप-महानिरीक्षक की या अन्य मामलों में परिषद् सहित गवर्नर या पुलिस महानिरीक्षक को मन्जूरी के बिना निलम्बन काल की समयावधि के लिए घोड़े के भत्ते से हटकर कोई वाहन भत्ता नहीं दिया जावेगा। वेतन के भुगतान के बारे में आदेश पारित करने वाले अधिकारी को, घोड़े के भत्ते से हटकर वाहन भत्ते के भुगतान के प्रश्न को उच्चतर प्राधिकारियों को निर्देशित करने की आवश्यकता |
केवल तभी होगी, जबकि वे उसके भुगतान की सिफारिश करें, निलम्बन इस भत्ते को स्वतः रोक देता है, जब तक कि उसके प्रतिकूल आदेश न दिये जायें।
500. (क) जब कोई न्यायालय किसी पुलिस अधिकारी के आचरण की निन्दा करे, उन बिन्दुओं पर जिनको न्यायालय ने निन्दा के योग्य ठहराया हो, अपील के, यदि कोई हो, परिणाम की प्रतीक्षा किये बिना बिना तत्काल जाँच की जानी चाहिए।
(ख) यदि वह अधिकारी जिसके आचरण की निन्दा की गई हो, पुलिस अधीक्षक हो, रेन्ज का उप-महानिरीक्षक जाँच संचारित करेगा। उसकी समाप्ति पर, वह आयुक्त को रिपोर्ट अग्रेषित करेगा।
(ग) यदि आयुक्त समझता है कि कोई आगामी कार्यवाही आवश्यक नहीं है, वह अपने अभिमत को अभिलिखित करेगा और उप-महानिरीक्षक की रिपोर्ट की एक प्रति और अपना अभिमत महानिरीक्षक को उसकी एक प्रति भेजते हुए, सरकार को अग्रेषित करेगा, यदि वह ऐसा समझता है कि आगामी कार्यवाही वांछनीय है, वह अपना अभिमत अभिलिखित करेगा और महानिरीक्षक को कागज अग्रेषित करेगा और एक प्रति सरकार को भेजेगा।
(घ) यदि वह अधिकारी जिसके आचरण की निन्दा की गई है, पुलिस अधीक्षक से भिन्न पंक्ति का हो, तो जिले का पुलिस अधीक्षक या तो स्वयं या किसी राजपत्रित अधिकारी के माध्यम से जाँच संचारित करेगा। उसकी समाप्ति पर, वह जिला मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट अग्रेषित करेगा।
(ङ) यदि जिला मजिस्ट्रेट यह समझे कि कोई आगामी कार्यवाही वांछनीय नहीं है, वह अपना अभिमत अभिलिखित करेगा और आयुक्त के माध्यम से पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट और अपने अभिमत को सरकार को और ऐसी ही प्रति सेन्ट्रल रेन्ज के उप-महानिरीक्षक को अग्रेषित करेगा। यदि वह समझता है कि आगामी कार्यवाही आवश्यक है, वह अपना अभिमत अभिलिखित करेगा, और सरकार को एक प्रति भेजते हुए कागज पुलिस अधीक्षक को वापस कर देगा। पुलिस अधीक्षक यथासमय अपने द्वारा की गई कार्यवाही से, जिला मजिस्ट्रेट को सूचित करेगा।
501. (1) उस प्रत्येक पुलिस अधिकारी का, जिसके विरुद्ध, अपने पद की सामर्थ्य के भीतर किये जाने को तात्पर्यिंत कार्य के सम्बन्ध में, सरकार के द्वारा अतिरिक्त, सिविल या आपराधिक कार्यवाही संस्थापित की गई हो, राज्य के व्यय से बचाव किया जावेगा, जब वह इस प्रकार बचाव किये जाने की इच्छा करे और राज्य सरकार को यह प्रतीत हो कि उसने ईमानदारी, सम्यक् सतर्कता और ध्यान से कार्य किया है।
(2) समस्त पुलिस अधिकारियों का ध्यान पुलिस एक्ट की धारा 42 की ओर आकर्षित किया जाता है, तथापि उन्हें यह स्मरण कराया जाता है कि, जहाँ तक सिविल दावे और कार्यवाहियों का सम्बन्ध है, वह धारा अब प्रवर्तन में नहीं है और अब ऐसे दावे और कार्यवाहियाँ काल मर्यादा लिमिटेशन एक्ट, 1963 में अन्तर्विष्ट सामान्य विधि द्वारा शासित होती है।
(3) जब किसी अधिकारी के सरकार द्वारा बचाव किये जाने के आवेदन पर सरकार के आदेश प्राप्त न हुए हों, उसके विरुद्ध मामले में नियत सुनवाई के दिनांक के एक सप्ताह पूर्व, अधिकारी को न्यायालय में स्थगन के लिए आवेदन करना चाहिए। यदि न्यायालय स्थगन के आवेदन को मन्जूर न करे, तो अधिकारी अपने बचाव के लिए स्वयं ही व्यवस्था करेगा और पुलिस अधीक्षक तथा जिला मजिस्ट्रेट के माध्यम से पुलिस महानिरीक्षक को अपने बचाव के व्यय के लिए 300 रुपये से अधिक न होने वाली धनराशि अग्रिम दिये जाने के लिए आवेदन करेगा।
यदि ऐसा अग्रिम मन्जूर किया जावे तो वह उस घनराशि के विरुद्ध जो मामले की समाप्ति पर सरकार के द्वारा अधिकारी को पैरा 501(7) (घ) और 501 (8) (ञ) के उपबन्धों के अधीन भुगताने के लिए मन्जूर किया जावे, वसूली या समायोजन किये जाने के योग्य होगा। प्रत्येक मास के अन्तिम दिनांक की अवशेष रहने वाली धनराशि पर 5 प्रतिशत वार्षिक की दर से साधारण ब्याज प्रभारित किया जावेगा। ऐसे व्ययों के लिए आवेदन ऐसे करार के रूप में होगा, जो ऋण लेने वाले के द्वारा यदि आवश्यक हो तो पुलिस महानिरीक्षक द्वारा अवधारित की गई अंशिकाओं के द्वारा प्राप्तकर्ता के वेतन या वेन्शन से लौटाने के लिए सम्पादित किया जाना हो। अग्रिम की मन्जूरी के समय, पुलिस महानिरीक्षक प्रत्येक मासिक अंशिकाओं की वह राशि अवधारित करेगा जिसमें, यदि अग्रिम वसूली योग्य हो जावे, तो वापस किया जावे। इन अंशिकाओं की धनराशि अन्तिम आंशिक के सिवाय पूरे रुपयों में होगा और ऐसी रीति से अवधारित की जानी चाहिए कि पूरी वसूली आवश्यक हो जाने की दशा में मन्जूर किये गये अग्रिम और प्राप्तकर्ता के मासिक वेतन को ध्यान में रखते हुए, अंशिकाओं की संख्या युक्तियुक्त होना चाहिए। मूलधन को पूर्णतया वसूली कर लिये जाने के पश्चात् ब्याज मूलधन की अंशिकाओं के समान या लगभग समान धनराशि की एक या अधिक अंशिकाओं में वसूल योग्य होगा।
(4) जब वह मामला जिसमें सरकार ने अधिकारों का बचाव किया हो, सफल हो जावे और अधिकारी को व्यय, हानि या क्षति धन प्रदान किया जावे, सरकार द्वारा ऐसे व्यय, हानि या क्षति धन की सीमा तक वहन किया गया व्यय जो उसके द्वारा वसूल किया जा सके, उसके द्वारा लौटा दिया जावेगा।
(5) अपराध अन्वेषण विभाग या रेलवे पुलिस से सम्बन्ध रखने वाले पुलिस अधिकारी की दशा में, उसी जिले का मजिस्ट्रेट जिसमें मामला संस्थापित किया गया हो, निम्नलिखित नियमों के प्रयोजन के लिए जिला मजिस्ट्रेट होगा।
(6) जब कभी इन नियमों के अधीन, पुलिस अधिकारी द्वारा कलेक्टर या जिला मजिस्ट्रेट को कोई संसूचना या रिपोर्ट दी जाना अपेक्षित की गई हो, सभी उन मामलों में, जिनमें पुलिस अधिकारी पुलिस अधीक्षक का अधीनस्थ हो, ऐसी संसूचना या रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक के माध्यम से प्रस्तुत की जावे।
(ख) सिविल दावे और कार्यवाहियाँ
(7) (क) सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के अधीन, किसी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध ऐसे कार्य के सम्बन्ध में जिसका ऐसे पुलिस अधिकारी द्वारा अपने पद की सामर्थ्य में किया जाना तात्पर्यिंत हो, कोई दावा, दो मास के पूर्व सूचना-पत्र के बिना, जो उसको दिया जावे, नहीं या जा सकेगा।
(ख) वह अधिकारी जिसको उसके विरुद्ध धमकी दावे का सिविल क्रिया संहिता की धारा 804 अधीन सूचना-पत्र, प्राप्त हो, जब तक कि वह उस दावे को स्वीकार करने को तैयार न हो, तत्काल अपने वरिष्ठ अधिकारी को सूचित करेगा और बिना किसी विलम्ब के और यथासम्भव पूर्णरूप में उन तथ्यों का विवरण जिनके कारण सूचना-पत्र दिया गया है और दावा फाइल कर दिये जाने की दशा में अपना प्रस्तावित बचाव, तैयार करेगा। तब वह उस वर्णन को कलेक्टर को अग्रेषित कर देगा, जो सरकारी प्लीडर का अभिमत प्राप्त करेगा। सरकारी प्लीडर सम्बन्धित अधिकारी से ऐसी अतिरिक्त जानकारी प्राप्त कर सकता है, जो अभिमत व्यक्त करने के लिए आवश्यक हो। यदि सूचना-पत्र किसी वाद-पत्र के रूप में हो, सरकारी प्लीडर एक प्रारूप लेखीय कथन तैयार करेगा। कलेक्टर वर्णन को सरकारी प्लीडर के अभिमत और (यदि कोई हो) प्रारूप लेखीय कथन के साथ सीधे लीगल रिमेम्बरेन्सर के पास, इस बात की सावधानी अपनाते हुए कि कागज उसके पास सूचना-पत्र में दी गई कृपात समयावधि की समाप्ति से कम से कम तीन सप्ताह पूर्व पहुँच जावे, अग्रेषित कर देगा और उसी के साथ ही यह रिपोर्ट करेगा कि धमकी दिये गये दावे के लाये या न लाये जाने की क्या सम्भावनायें हैं। लीगल रिमेम्बरेन्सर, पुलिस महानिरीक्षक को संसूचना के पश्चात् सरकार के इस बारे में आदेश प्राप्त करेगा कि क्या उसके व्यय पर दावे का बचाव हाथ में ले लें, यदि दावा फाइल किया जावे तो अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया सभी विषयों में वही होगी, जैसा कि सरकार के विरुद्ध दावे में होती है।
(ग) यदि किसी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध, उसके द्वारा पद की सामर्थ्य में किये जाने के लिए तात्पर्पित कार्य सम्बन्ध में कोई दावा सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के द्वारा अपेक्षित सूचना-पत्र के विना लाया जावे, वह, जब तक कि सरकार के आदेश प्राप्त कर लिये जाने के लिए पर्याप्त समय न दिया गया हो, जिले के कलेक्टर को तत्काल सूचना देगा, जो सरकारी प्लीडर को स्थगन के लिये आवेदन-पत्र देने को अनुदेशित करेगा।
(घ) जब कोई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध वाद लाये जाने की धमकी दिये जाने की सूचना पैरा 501 (7) (ख) के अधीन प्राप्त करे, वह इस तथ्य की रिपोर्ट और परिस्थितियों का संक्षिप्त विवरण पुलिस महानिरीक्षक को तत्काल उचित प्रणाली के माध्यम से देगा।
(ङ) किसी मामले में जिसमें सरकार दावे के बचाव को अपने हाथ में लेने को तैयार न हो या अधिकारी ने स्वयं पैरा 501 (3) के अधीन अपना वकील नियोजित कर लिया हो, यदि सरकार का यह समाधान हो जावे कि स्वयं का बचाव करने के लिए निर्वहन किया गया या उसके विरुद्ध पारित की जाने वाली किसी आज्ञप्ति को संतुष्टि या न्यायालय के बाहर मामले का व्यवस्थापन करने के लिए युक्तियुक्त व्यय भुगताया जावे।
(च) किसी सिविल वाद में जिसमें, किसी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध आज्ञप्ति पारित हो जावे, सरकार आज्ञप्त धनराशि भुगताने के लिए बाध्य नहीं है और उसके अतिरिक्त दावे के बचाव में वहन किये गये व्यय को वसूल करने के लिए अधिकारी रहेगी।
(8) (क) वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध संस्थापित आपराधिक अभियोजन की दशा में, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 लागू होगी और उसका अनुसरण किया जावेगा।
(ख) जब कोई पुलिस अधिकारी, पद की सामर्थ्य में किये गये अपने किसी कार्य के आधार पर अपराध करने का अभियुक्त हो वह तत्काल अपने वरिष्ठ अधिकारी को सूचित करेगा और जब तक कि वह निम्नलिखित उपबन्धों के अनुसार सरकार के व्यय से अपने बचाव कराने के लिए इच्छुक न हो, वकील के सहित या रहित अपने बचाव की स्वयं अपनी व्यवस्था करेगा। पुलिस अधीक्षक या अन्य कोई वरिष्ठ अधिकारी उचित प्रणाली के माध्यम से महानिरीक्षक को उस प्रत्येक मामले की तत्काल सूचना देगा, जिसमें कोई पुलिस अधिकारी किसी अपराध के करने का अभियुक्त हो।
(ग) अपने पद को सामर्थ्य में किये गये किसी कार्य के आधार पर, अपराध करने के लिए अभियुक्त कोई पुलिस अधिकारी सरकार के व्यय पर बचाव किये जाने के लिए आवेदन कर सकता है। प्रथम अवस्था में ऐसा आवेदन पुलिस अधीक्षक को किया जाना चाहिए। यदि आरोप किसी तुच्छ प्रकृति का हो कि उसका उत्तर अभियुक्त अधिकारी की व्यक्तिगत उपस्थिति से ही हो सकता है, पुलिस अधीक्षक अधिकारी को व्यक्तितः बचाव करने का परामर्श देगा। दूसरे मामलों में अपने इस अभिमत के साथ कि अधिकारी का बचाव किया जाना चाहिए, लोक अभियोजक नियोजित न किया जा सके या उसका नियोजन वांछनीय नहीं है, पुलिस अधीक्षक सरकार के व्यय पर किसी वकील की नियुक्ति की सिफारिश करेगा। महानिरीक्षक को आवेदन अग्रेषित करते समय, जिला मजिस्ट्रेट यह कथन करेगा कि उसके अभिमत में अभियुक्त अधिकारी का लोक अभियोजक द्वारा या उसके विफल रहने पर किसी वकील के द्वारा सरकारी व्यय पर बचाव किया जाना चाहिए या उससे अपने बचाव के लिए स्वयं का वकील नियुक्त करने की अपेक्षा की जानी चाहिए। पुलिस महानिरीक्षक जिला मजिस्ट्रेट की सिफारिश प्राप्त करने पर, सरकार से यह आदेश प्राप्त करेगा कि क्या अभियुक्त अपराधी का लोक अभियोजक के द्वारा या सरकारी व्यय पर वकील के द्वारा बचाव किया जाना चाहिए।
(घ) जब इस पैरा के अधीन पुलिस अधिकारी का सरकारी व्यय पर बचाव किया जावे, उसके बचाव में, ऐसे मामले में, जिसमें वह सेशन न्यायालय में विचारण के लिए सुपुर्द किया जावे, बचाव में मजिस्ट्रेट के न्यायालय में जाँच के दौरान और सेशन न्यायालय में विचारण के दौरान, दोनों ही बचाव माने जायेंगे।
जब कोई पुलिस अधिकारी, जिसका सरकारी व्यय पर बचाव किया जाना हाथ में लिया गया हो, मजिस्ट्रेट द्वारा उन्मोचित कर दिया जावे, किन्तु उसे मजिस्ट्रेट की आज्ञा के विरुद्ध लाई गई पुनरीक्षण आवेदन के कारण पुनः अपना बचाव करना पड़े, अधिकारी का बचाव सरकारी व्यय पर पुलिस महानिरीक्षक की मन्जूरी से किया जाना जारी रहेगा, तथापि पुलिस महानिरीक्षक पुनरीक्षण आवेदन के सम्बन्ध में अधिकारी या सरकारी व्यय पर बचाव किया जाना अस्वीकार कर सकता है, यदि ऐसी स्वीकृति के लिए मजिस्ट्रेट का आदेश या उसके कब्जे में होने वाली कोई अन्य जानकारी पर्याप्त कारण प्रकट करे।
(ङ) जब पुलिस द्वारा अभियोजित कोई व्यक्ति उसके अभियोजन के लिए उत्तरदायी पुलिस अधिकारी के विरुद्ध कोई प्रतीत मामला लाता है है तो अभियुक्त अधिकारी का अधीनस्थ न्यायालय में लोक अभियोजक द्वारा और जिले के सरकारी वकील द्वारा सेशन न्यायालय में बचाव किया जा सकता है, परन्तु यह कि पुलिस द्वारा संस्थापित मामले के अभियोजन के सिद्धान्त से अधिकारी का बचाव पूर्णतया संगत हो।
(च) यदि कोई पुलिस अधिकारी उस अपराध के लिए दोषसिद्ध पाया जावे, जिसका वह अभियुक्त हो, और अपील करने की इच्छा करे, उसे स्वयं अपना वकील नियोजित करना चाहिए, किन्तु ऐसे मामले में सरकार बाद में, निम्नलिखित नियमों के अनुसार उसके बचाव के लिए युक्तियुक्त व्यय का भुगतान कर सकती है।
(छ) अपने पद को सामर्थ्य में किये गये किसी कार्य के आधार पर अपराध करने के लिए अभियुक्त किसी पुलिस अधिकारी की मजिस्ट्रेट के न्यायालय में जाँच या विचारण या सेशन न्यायालय में विचारण या, यदि कोई हो, तो अपील के निर्णय के पश्चात् उस मामले में जिसमें किसी पुलिस अधिकारी को 'दोषसिद्ध ठहराया जावे, उसका वरिष्ठ अधिकारी निर्णय की एक प्रति अन्य संगत कागजों के साथ और अपने इस अभिमत के साथ कि क्या अधिकारी ने ईमानदारी या सम्यक् सतर्कता और ध्यान से कार्य किया था या नहीं, जिला मजिस्ट्रेट को भेज देगा।
(ज) जिला मजिस्ट्रेट वरिष्ठ अधिकारी के अभिमत के साथ निर्णय को, अपने स्वयं के इस अभिमत के साथ कि क्या अधिकारी ने ईमानदारी और सम्यक् सतर्कता और ध्यान से कार्य किया था या नहीं, पुलिस महानिरीक्षक के पास अग्रेषित करेगा। जिला मजिस्ट्रेट चाहे वह यह समझे या न समझे कि अधिकारी ने ईमानदारी और सम्यक् सतर्कता और ध्यान से कार्य किया था, वह प्रत्येक मामले में यह कथन करेगा कि उसके अभिमत में कि बचाव के युक्तियुक्त व्यय क्या माने जायें।
(झ) यह सिफारिश करने में कि बचाव के युक्तियुक्त व्यय क्या माने जायें जिला मजिस्ट्रेट निम्नलिखित नियमों द्वारा शासित होगा।
(1) सरकारी वकील को देय वकील फीस की मन्जूर दरें ध्यान में रखी जानी चाहिए और सिफारिश की गई फीस पूरे दिन के कार्य के लिए 50/- रुपये और आधे दिन के लिए 25/- रुपये के अधिकतम से अधिक नहीं होना चाहिए।
किसी न्यायालय या न्यायालयों में तीन घन्टे से अधिक कार्य पूरे दिन का कार्य गिना जावेगा, तीन या उससे कम घन्टों का कार्य आधे दिन का कार्य गिना जावेगा।
(2) प्रत्येक पेशी के लिए एक वकील से अधिक के लिए भुगतान नहीं किया जाना चाहिए।
(3) जिले के बाहर के वकील के नियोजन के लिए वहन किये गये कोई अतिरिक्त व्यय भुगतान नहीं किया जाना चाहिए।
यदि किसी मामले में जिला मजिस्ट्रेट यह समझता है कि इन सिद्धान्तों का न्याय के प्रतिकूल प्रभाव होगा, उन्हें इन नियमों से हटने का औचित्य बताना चाहिए।
(अ) जिला मजिस्ट्रेट की सिफारिश प्राप्त होने पर पुलिस महानिरीक्षक, उस राशि के बारे में, यदि कोई हो, जो बचाव के लिए उस अधिकारी को व्यय के रूप में भुगताई जानी चाहिए, सरकार के आदेश प्राप्त करेगा।
(ट) जब कभी किसी आपराधिक मामले में कोई पुलिस अधिकारी दोषसिद्ध ठहराया जावे, सरकार उससे उसके बचाव में वहन किये गये व्ययों को वसूल कर सकेगी। ऐसे मामलों में सरकार, यदि पुलिस अधिकारी पर न्यायालय द्वारा जुर्माना आरोपित किया गया हो, भुगतान के लिए भी आबद्ध न होगी, चाहे उस मामले का मूलतः सरकारी व्यय पर बचाव किया गया हो।
502. जब कोई पुलिस अधिकारी निम्नलिखित में से कोई एक या अधिक पदक धारण करता है फील्ड सर्विस मेडल, किंग्स पुलिस मेडल, इण्डियन पुलिस मेडल, यदि वह दोषसिद्ध पाया जावे और कठोर कारावास से दण्डित किया जावे, पुलिस अधीक्षक को इस तथ्य की रिपोर्ट पुलिस महानिरीक्षक को इस विचार के लिए कि क्या एक या अधिक पदकों का समपहरण कर लिया जावे, करना चाहिए। रिपोर्ट प्रस्तुत करते समय पुलिस अधीक्षक को मामले के पूरे तथ्य देना और न्यायालय के निर्णय की एक प्रति अग्रेषित करना चाहिए।
503. यदि कोई पुलिस अधिकारी, अवकाश पर न होते हुए, अपने पदस्थ किये जाने के अतिरिक्त अन्य किसी जिले में किसी आपराधिक आरोप पर गिरफ्तार कर लिया जावे उस जिले का पुलिस अधीक्षक जिसमें उसे गिरफ्तार किया गया है, उस जिले के, जहाँ वह पदस्थ हो, पुलिस अधीक्षक को सूचना करेगा।
504. बल को छोड़ते समय प्रत्येक अधिकारी प्ररूप क्र. 26 में पदमुक्त प्रमाण-पत्र के लिए अधिकारी होगा। बल के छोड़ने के कारण (उदाहरणार्थ पदच्युति, त्याग-पत्र इत्यादि) का वर्णन किया जाना चाहिए, किन्तु पदच्युति इत्यादि का कारण आवेदक की इच्छा के सिवाय उसमें अन्तस्र्स्थापित न किया जावे।
505. निरीक्षक या उससे निम्न पंक्ति का कोई पुलिस अधिकारी अपने पद से त्याग-पत्र देने के अपने आशय की दो मास पूर्व सूचना देकर पद त्याग कर सकता है, परन्तु वह अपने पद के कर्त्तव्यों से तब तक प्रत्याहरित नहीं होगा जब तक कि उसका त्याग-पत्र उपयुक्त अधिकारी द्वारा स्वीकार न कर लिया जावे और उसने सरकार का किसी पुलिस निधि को उसके द्वारा देय सभी ऋणों का शोधन न कर लिया हो।
परन्तु यह कि प्राधिकारी द्वारा ऐसा त्याग-पत्र सूचना-पत्र की समाप्ति के पूर्व के होने वाले किसी दिनांक के प्रभाव से स्वीकार किया जा सकता है।
परन्तु यह और भी कि किसी ऐसे पुलिस अधिकारी का त्याग-पत्र जिसका आचरण जाँच के अधीन हो या जिसके विरुद्ध पुलिस एक्ट, 1861 (1861 का पाँचवाँ) की धारा 7 के अधीन विभागीय कार्यवाही की जा रही हो या जिसका विधि के द्वारा किसी अपराध का विचारण हो रहा हो, से अधिकारी के विवेकानुसार उस समय तक स्वीकार नहीं किया जा सकेगा जब तक कि, जैसी स्थिति हो, ऐसी जाँच कार्यवाही या विचारण के परिणामस्वरूप अन्तिम आदेश पारित न कर दिया जावे।
506. उस पुलिस अधिकारी को अवकाश अनुदत्त नहीं किया जा सकेगा जिसका आचरण जाँच के अधीन हो या निकट भविष्य में जाँच के अधीन होना सम्भावित हो। उस जिले के जहाँ वह पदस्थ हो सिविल सर्जन द्वारा हस्ताक्षरित चिकित्सकीय प्रमाण-पत्र के सिवाय अवकाश अनुदत्त नहीं किया जा सकेगा, किन्तु यदि ऐसा पुलिस अधिकारी निलम्बन के अधीन हो किसी प्रकार का अवकाश (चिकित्सकीय आधार पर अवकाश को सम्मिलित करते हुए) अनुदत्त न किया जा सकेगा।
507. कभी-कभी पुलिस अधिकारी अवकाश के साथ-साथ कष्ट निवारण के निवेदन को अपनी नियुक्ति से त्याग-पत्र के प्रस्ताव के साथ, यदि अवकाश अनुदत्त न किया जावे, संयुक्त कर देता है। इस प्रकार के सशर्त त्याग-पत्र साधारणतया स्वीकार न किये जायें। अवकाश या कष्ट निवारण के आवेदनों पर ही आदेश पारित किये जायें। यदि अधिकारी पारित किये गये आदेश से असन्तुष्ट हो, वह उच्चतर अधिकारी को अपील कर सकता या बिना शर्त त्याग-पत्र दे सकता है।
(1. यह नियम राज्यपाल द्वारा स्थापित होकर विज्ञप्ति सं. 2487/आठ-7-175-81, गृह (पुलिस) अनुभाग-7 दिनांक जून 7, 1983 से जारी हुआ जो उ.प्र. गजट, असामान्य, दिनांक 7-6-83 में प्रकाशित हुआ। )
(1) प्रादेशिक सशस्त्र कान्सटेबुलरी के सदस्यों के सम्बन्ध में "इन्स्पेक्टर जनरल पुलिस" प्रादेशिक सशस्त्र कान्सटेबुलरी, उत्तर प्रदेश, का सन्दर्भ माना जावेगा,
(2) आसूचना (इन्टेलीजेन्स) विभाग के कार्मिक दल के सम्बन्ध में "इन्स्पेक्टर जनरल पुलिस" आसूचना विभाग, उत्तर प्रदेश, का सन्दर्भ माना जावेगा,
(3) अपराध अनुसंधान विभाग के कार्मिक दल के सम्बन्ध में "इन्स्पेक्टर जनरल पुलिस" अपराध अनुसंधान विभाग, उत्तर प्रदेश, का सन्दर्भ माना जावेगा,
(4) पुलिस प्रशिक्षण संस्थाओं के कार्मिक दल के सम्बन्ध में "इन्स्पेक्टर जनरल पुलिस" प्रशिक्षण, उत्तर प्रदेश, का सन्दर्भ माना जावेगा,
(5) राजकीय रेलवे पुलिस के कार्मिक दल के सम्बन्ध में "इन्स्पेक्टर जनरल पुलिस" रेलवेज, उत्तर प्रदेश, का सन्दर्भ माना जावेगा।