
370. पुलिस विभाग द्वारा उन पुलिस लाइन और थानों के लिये, जिसकी सफाई का कार्य उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916 की धारा 196 (क) के अधीन नगरपालिका द्वारा ले लिया गया है, कोई निजी झाड़ लगाने वाला (मेहतर) सेवायोजित नहीं किया जावेगा। जहाँ वाहन व्यवस्था पुलिस अधीक्षक के हाथों में हो, निजी मेहत्तरों को सेवायोजित किया जा सकता है या मल वाहन के लिए आफिस मैन्युअल का पैरा 136 के अनुसार भत्ते दिए जा सकते हैं।
371. सरकारी सेवकों के निजी मामलों में निबन्धों के लिए गवर्नमेन्ट सर्वेन्ट कन्डक्ट रूल्स और गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका देखिये।
372. पुलिस अधिकारी पुलिस लेखपाल के साथ धन के कोई निजी संव्यवहार नहीं करेंगे और न पुलिस बल या लिपिकीय कर्मचारी मण्डल का कोई सदस्य राजपत्रित अधिकारियों के व्यक्तिगत हिसाब बनाये रखने के लिए सेवायोजित किया जावेगा। तथापि इसमें कोई आपत्ति नहीं है कि राजपत्रित अधिकारियों के प्रवाचकों को छोटे अग्रिम, आकस्मिक व्यय उदाहरणार्थ लकड़ी कटवाने, डेरे गढ़वाने या शिविर की भूमि साफ कराने के लिए करने को दे दिये जाने या मुख्य लिपिकों या लेखपालों के पास छोटी धनराशियाँ उदाहरणार्थ प्रत्याशित मूल्य भुगतान योग्य पार्सल आदि पर व्यय करने के लिए छोड़ दी जायें।
पुलिस अधिनियम की धारा 2 में, भर्ती किये गये पुलिस अधिकारी के लिये यह अनिवार्य है कि वह उस पुलिस अधीक्षक को जिसके अधीन यह सेवा कर रहा हो, उसके अधिक्षेत्र में सरकारी सेवा के अतिरिक्त अन्य व्यापार या सेवायोजन में उसके किसी भी सम्बन्धी के होने की सूचना दे। ऐसो सूचना के प्राप्त होने पर, यह विचार अधीक्षक को करना होगा कि क्या परिस्थितियाँ सम्बन्धित अधिकारी के स्थानान्तरण को औचित्यपूर्ण बनाती है। सामान्य सिद्धान्त यह कि पुलिस अधिकारी को सामान्यतया उस अधिकारिता के भीतर सेवायोजन में नहीं रखना चाहिये, जहाँ उपरोक्त वर्णित पीड़ी के रिश्तेदार कोई निजी व्यापार करते हों। वह सीमा, जिसमें विशेष मामलों में पुलिस अधीक्षक इस सिद्धान्त को प्रवृत्त करेगा, उस मण्डल की स्थिति पर, जिसमें अधिकारी अधिवासित हो तथा सामान्य परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी। यह आदेश, गवर्नमेन्ट सर्विस कन्डक्ट रूल्स के नियम 15 में किसी प्रकार फेरफार नहीं करते।
373. सभी वर्गों के पुलिस अधिकारियों को, विधि के द्वारा अपेक्षित किये जाने के अतिरिक्त श्रमिकों को न ले जायें, श्रमिकों, परिवहन या किसी भी प्रयोजन के लिये उपबन्ध करने और किसी भी प्रकार के बहानों से जनसंख्या के किसी वर्ग के व्यक्तियों और सम्पत्ति में हस्तक्षेप करने से कड़ाई से प्रतिबन्ध किया जाता है।।
373-ए, पुलिस फोर्स के सदस्यों, को अपने कर्तव्यानुपालन के दौरान या जब समुचित आशा की जाती हो कि वे कार्य सरकार करने के लिये बुलाये जा सकते हैं, नशीले पदार्थों का सेवन करना सख्त मना है। उन्हें कड़ी चेतावनी दी जाती है कि इसका उल्लंघन या थोड़ी भी अवहेलना उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही किये जाने का कारण होगा जिसमें सम्बन्धित अधिकारी की सेवा मुक्ति भी सम्मिलित है।
374. लोक निधि या पुलिस के प्रभार में किसी अन्य सम्पत्ति के गबन या हानि के मामले में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया के लिये फाइनेन्शियल हैन्ड बुक खण्ड पाँच के भाग एक में एकाउन्ट रूल्स के पैरा 82 द्वारा संशोधित गवर्नमेन्ट आर्डर्स पुस्तिका देखिये।
375. अपने जिले के बाहर गुप्तचर के रूप में किसी पुलिस अधिकारी को भेजने वाला पुलिस अधीक्षक सदैव हो उचित प्राधिकारियों द्वारा अपेक्षा किये जाने पर उन्हें दिखाने के लिये एक लिखित विश्वास पत्र देगा।
पुलिस बल के भर्ती न होने वाले मुखबिरों या नौसिखिये गुप्तचरों को परवाने न दिये जायें।
376. जब सम्बन्धित प्राधिकारियों द्वारा ऐसा करने को कहा जावे, रेलवे, डाक तथा अन्य सरकारी विभागों को अधीनस्थ सेवाओं के उम्मीदवारों के चरित्र और पूर्व वृत्तांत के बारे में पुलिस द्वारा जाँच की जानी चाहिये और उन्हें उस प्रयोजन के लिये भेजी गई सत्यापन नामावली को पूर्ण करना चाहिये।
377. डाकघर की तिजोरियाँ (लोहे की) थाने में स्थाई रूप से नियत की जा सकती हैं और संतरी के चार्ज में रखी जा सकती हैं। ऐसी तिजोरी की चात्रियाँ डाक अधिकारियों द्वारा रखो जायेंगी। नकद और मूल्यवान वस्तुओं को अन्तर्विष्ट करने वाला कैश बाक्स तिजोरी में रखा जाता है, जो दोहरे ताले द्वारा सुरक्षित किया जाता है। ताले को चमड़े को छोटी थेली में रखा जाता है या कपड़े से लपेटकर रखा जाता है और उसे चारों ओर से सुतली द्वारा बाँध दिया जावेगा। गठानों पर डार्क कार्यालय को तारीख की मोहर लगा दी जावेगी।
सम्बन्धित थाने की जनरल डायरी में तिजोरी में कैश बाक्स जमा करने और उसमें से निकालने की प्रविष्टि की जानी चाहिये, जिसमें डाकघर के अधिकारियों की तिजोरी को बाहरी और ताले पर मोहर की दशा के बारे में भरपाई देना चाहिये।
378. (1) जिला पुलिस मुख्यालयों पर बनाई रखी जाने वाली मोहर लारी या हलके वाहन, दंगों का दमन करने और रोकने, डकैतों और अन्य अपराधियों पर छापा मारने, महत्वपूर्ण दोषसिद्ध और विचाराधीन धन्दियों का मार्ग रक्षण करने, डकैतों को अभिज्ञान के लिए लाने या उन परिस्थितियों में, जहाँ हुत्त परिवहन महत्वपूर्ण हों, के सम्बन्ध में पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों के परिवहन के प्रयोजन के लिए मुख्यतया अभिप्रेत है। उन्हें साधारण परिवहन के लिए प्रयोग न किया जाये. जयकि रेलवे या परिवहन के अंन्य सस्ते साधन उपलब्ध हों।"
(2) पुलिस के मोटरयानों का पुलिस टीम के सदस्यों को खेल प्रतियोगिताओं, टूनमिंटों इत्यादि में केवल ऐसे मामलों में, जहाँ उनका प्रयोग रेल या अन्य प्रकार के यात्रा करने को तुलना में मितव्ययों हो, परिवहन के लिये प्रयोग किये जा सकते हों।
379. समस्त राजपत्रित अधिकारी अपने पास 14.2 हाथ ऊंचाई से कम न होने वाला एक घोड़ा उपलब्ध रखेंगे और वे सभी मण्डल निरीक्षक तथा उप निरीक्षक, जो घोड़े का भत्ता प्राप्त करते हैं. अपने पास ऐसे उपर्युक्त घोड़े उपलब्ध रखेंगे, जो ऊँचाई से 14 हार से कम न हों। पुलिस महानिरीक्षक किसी प्रान्तीय पुलिस अधिकारी को घोड़ा रखने की आवश्यकता से छूट दे सकता है, यदि उसका यह समाधान हो जाये कि उस अधिकारी के द्वारा समुचित रूप से कत्र्तव्य पालन के लिये चोड़े को बनाये रखना आवश्यक नहीं है। इस प्रकार छूट प्राप्त अधिकारी घोड़े के बजाय कोई मोटरयान रख सकता है। उससे किसी प्रारम्भिक या नथोकृत अनुदान की लौटाने की अपेक्षा नहीं की जावेगी जो उसने इस प्रयोजन तथा भोड़े और उसकी साज सज्जा के रख रखाव के लिए प्राप्त की हो,
परन्तु यह कि उस अनुदान का उपयोग घोड़े और उसको सस्था को खरीदने या मनाये रखने में किया जा चुका है और यह भी कि वह समयावधि जिसमें यह मोटरयान बनाये रखें, घोड़े और उसकी साज-सज्जा के भता के लिये विहित की गई सात वर्ष की समयावधि में से अफजॉर्जत कर दी जावेगी।
380. चिकित्सालय की स्थापना चिकित्सा विभाग के निमन्त्रणाधीन है, दथा पुलिस अधीक्षक को चिकित्सालय कर्मवारी मण्डल की नियुक्ति, छुट्टी, पदोन्नति दण्ड और पदच्युति के बारे में कोई कृक्ति प्राप्त नहीं है। यद्यपि यह इन विषयों में सिविल सर्जन को या पुलिस महानिरीक्षक के माध्यम में अमेनिक चिकित्सालयों के महानिरीक्षक को अभ्यावेदन कर सकता है।
भारसाधक चिकित्सा अधिकारी के सिवाय पद स्थापना का वेतन, पुलिस लेखमाल के द्वारा निकासा या वितरण किया जाता है।
यूरोपियन औषधियों (तथा चिकित्सालय की अपेक्षायें) की मद का पुलिस बजट में आर्धटन असैनिक चिकित्सालयों के महानिरीक्षक के निपटारे पर है, जो उसे सिविल सर्जनों के बीच जावे, विभाजित करता है। रिजर्व लाइन, पुलिस थाने और चौकियों में पदस्थ के बीच वितरण की जाने बाली कुनैन के खरीदने का व्यय, इस शीर्ष में नामे डाले जाने योग्य है। इस शीर्ष में नामे डाले जाने बासरी पिल सिविल सर्जन के पास भुगतान के लिये भेज दिये जायें।
सिविल सर्जन द्वारा अपेक्षित कोई अन्य औषधि पुलिस अधीक्षक को पृथक से ठेका मद से क्रय करना चाहिये।
जब उपचाराधीन हो, कोई पुलिस अधिकारी चिकित्सालय की, सिविल सर्जन या पुलिस की विकित्सा के भारसाधक अधिकारी की बिना अनुज्ञप्त अनुता के सिवाय, किसी बहाने से नहीं छोड़ेगा। बिना अनुमति के चिकित्सालय से अनुपस्थिति को अनुशासन का भंग मान कर व्यवहार करना चाहिये। उपचार के अधीन रोगियों के लिये प्रारूप 73, 74, 77, 92 और 302 का प्रयोग किया जाये। प्रत्येक चिकित्रालय के आबंटित दो अर्दलियों में से एक ब्राह्मण और दूसरा मुसलमान होना चाहिये। यह अर्दली यह देखने के लिये उत्तरदायी होंगे कि प्रभार में रहने वालों के पास विहित किये गये के अतिरिक्त कोई भोजन न भेजे। चिकित्सालय का प्रति दिन रिजर्व निरीक्षक या राजपत्रित अधिकारी द्वारा परिदर्शन किया आवे, और चिकित्सालय के अदलियों की ओर से होने वाली किसी असावधानी या आज्ञा के उल्लंघन के किसी मामले की रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक द्वारा सिविल सर्जन को की जावे।
चिकित्सालय में प्रवेश का एक रजिस्टर तीन खण्डों में रखा जावे, और प्रत्येक को पृथक् से क्रम संख्या दी जाये।
(1) समस्त सशस्त्र पुलिस के लिये, सवार पुलिस के लिये एक खण्ड सहितः
(2) मुख्यालय के विकित्सालय में उपचार की गई जिले की समस्त सिविल पुलिसः
(3) सरकारी रेलवे पुलिस, दूसरे जिले के सिपाही, अर्दली चपरासी और अन्य वे जो (एक) या (दो) में सम्मिलित न हुये हों। पदस्थ होने का स्थान सदैव ही दिया जाते।।
381. चिकित्सा अवकाश या चिकित्सा प्रमाण-पत्रों पर अवकाश के विस्तारण के लिये आवेदकों को यह आवश्यक है कि वह चिकित्सा प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन करने के अपने विचार की पुलिस अधीक्षक को सूचना दें। ऐसा करने में विफल रहने का परिणाम यह निर्णय हो सकता है कि चिकित्सा प्रमाण-पत्र दुर्व्यपदेशन (गलत जानकारी देकर) द्वारा प्राप्त किया गया है और उसके गम्भीर परिणाम हो सकते हैं।
382. कर्तव्य पर रहते हुये या कर्त्तव्य से लौटने पर अवर अधिकारी या कान्सटेबिल स्वस्थ हो गवें तो उन्हें जिला पुलिस चिकित्सालय में या यदि वह सरल पहुँच से बाहर हो तो निकटतम औषधालय में प्रवेश के लिये आवेदन करना चाहिये। उसके प्रवेश या उपचार के तथ्य की रिपोर्ट स्थानीय अधीक्षक को करना चाहिये। जो, जब तक कि वे उसके ही अधीनस्थ न हों, उस अधीक्षक को, जिसके वे अधीनस्थ हों, संसूचित करने के लिए पग उठायेगा। उच्चत्तर पंक्ति के अधिकारी पुलिस चिकित्सालयों में प्रविष्ट होने के लिए विवश नहीं है, परन्तु उपरोक्त रूप में विहित किये गये अनुसार चिकित्सा प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के अपने विचार को पुलिस अधीक्षक को अवगत कराने के उचरदायित्व से उन्हें छूट प्राप्त नहीं हो जाती।
383. पदस्थ होने के जिले से भित्र किसी पुलिस चिकित्सालय से मुक्त होने पर, किसी ऐसे अवर अधिकारी या कान्सटेबिल को, जिसके अवकाश के लिए सिविल सर्जन द्वारा सिफारिश की जावे, अवकाश के आवेदन पर आदेश के लम्बित रहने तक तत्काल अपने पदस्थ होने के जिले में लौटाना चाहिये। जब तक उसे उस जिले के, जिसमें वह हो, पुलिस अधीक्षक द्वारा इसके लिये मुक्त न कर दिया जाये। न लौटाने की अनुज्ञा बहुत ही विशेष परिस्थितियों में दी जानी चाहिये।
384. थाने का प्रत्येक भारसाधक अधिकारी, हर एक चौकी, बैरक, अनुरक्षण या अन्य टुकड़ी का भारसाधक प्रत्येक गार्ड, कमान्डर या कान्सटेबिल अपनी कमान में रहने वाले सिपाहियों के बीच अस्वस्था की रिपोर्ट करने और चिकित्सालयों में उन्हें प्रवेश प्राप्त कराने के लिए उत्तरदायी है। इस सम्बन्ध में असावधान पाये गये अधिकारी के विरुद्ध इन विनियमों के इक्कीसवें अध्याय के अधीन कार्यवाही की जाना चाहिये। ऐसी असावधानी प्रमाणित करने के लिए यह दर्शाना आवश्यक होगा कि सम्बन्धित अधिकारी यह जानता था या युक्तियुक्त श्रम का प्रयोग करके यह सुनिश्चित कर सकता था कि उसके अधीनस्थ कोई सिपाही अस्वस्थ है।
385. गुप्तांग रोग से पीड़ित प्रत्येक प्रधानःकान्सटेबिल या कान्सटेबिलों को इस तथ्य की रिपोर्ट अपने निकटतम वरिष्ठ अधिकारी को देना चाहिये, जो उसकी तत्काल पुलिस चिकित्सालय में, प्रवेश प्राप्त कराने के लिए पग उठायेगा। प्रधान कान्सटेबिलों द्वारा या कान्सटेबिलों को अपने गुप्तांग रोगों को छुपाना पुलिस अधिनियम की धारा 7 के अधीन दण्डनीय अपराध है। वह अधिकारी जो गुप्तांग रोग से ग्रस्त होने को छुपाने के अपराध के लिए सिद्धदोष ठहरा दिया जावे, ऐसे दण्ड के अतिरिक्त, जिसका उस पर आरोपित करना आवश्यक समझा जावे, निलम्बित किया जाकर तब तक चिकित्सालय में निरुद्ध रखा जायेगा तब तक कि वह ठीक या समर्थ न हो जावे। ऐसे निलम्बन काल की अवधि में उसे मूलभूत नियम 53 के अधीन पोषण भत्ता दिया जावेगा। (फाइनेन्शियल, हैण्डबुक, खण्ड दो, भाग दो)
386. प्रत्येक अधिकारी और उप-निरीक्षक से कम पंक्ति के लिये विहित प्रारूप दी प्रतियों में एक चिकित्सा इतिहास पत्र बनाये रखा जावेगा, एक प्रति चरित्र नामावली से संलग्न को जावेगी और दूसरी स्वयं अधिकारी द्वारा रख ली जावेगी। जब कोई अधिकारी पुलिस चिकित्सालय में प्रवेश के लिए आवेदन करें, उसे अपने साथ अपने चिकित्सा इतिहास पत्र की प्रतिलिपि ले जाना चाहिए। जब उसे चिकित्सालय से, मुक्त कर दिया जावे, उस रोग की जिससे वह चिकित्सालय में रहते हुए पीड़ित रहा हो, उसके चिकित्सा इतिहास पत्र में प्रविष्टि की जावेगी और उसे चिकित्सालय से सीधे ही पुलिस अधीक्षक को भेज दिया जावेगा। तब इस प्रविष्टि की प्रतिलिपि चरित्र नामावली के संलग्न चिकित्सा इतिहास पत्र में की आयेगी, इसके पश्चात् अधिकारी की प्रति उसे लौटा दी जावेगी। चिकित्सा प्रमाण-पत्र के अवकाश पर विस्तार का अवकाश उप-निरीक्षक से न्यून पंक्ति के होने वाले किसी अधिकारी को साधारणतया अनुदत्त न किया जावे, जब तक कि उसके द्वारा चिकित्रा का इतिहास पत्र, जिसमें चिकित्सा अधिकारी ने अपनी अभियुक्तियाँ और हस्ताक्षर प्रविष्ट कर दिये हों, प्रस्तुत न कर दिया जावे।
387. प्रधान कान्सटेबिल के और उससे निम्नतर पंक्ति के अधिकारी अनिवार्य चिकित्सा निरीक्षण के लिए दायित्वाधीन हैं और पुलिस अधीक्षक यह निश्चित करेगा कि उसके कमान्ड में रहने वाले सभी अधिकारियों का प्रत्येक कैलेन्डर वर्ष में कम से कम एक बार चिकित्सकीय निरीक्षण हो जाता है। उन जिलों में जहाँ पुलिस चिकित्सालयों के लिए पूर्वकालिक चिकित्सा अधिकारी भारसाधक होते हैं, इन पुलिस अधिकारियों का बार्षिक चिकित्सकीय परीक्षण सम्बन्धित जिले के सिविल सर्जन द्वारा किया जावेगा। पहाड़ी जिलों के आंतरिक क्षेत्र में, यदि सिविल सर्जन ऐसा करना प्राधिकृत कर दे, यह कार्य बाहरी औषधालयों के चिकित्सा अधिकारियों द्वारा किया जा सकता है। इस निरीक्षण के लिए प्रत्येक अधिकारी को अपने साथ अपना चिकित्सा इतिहास पत्र लाना चाहिये।
388. अन्य प्रान्तों के पुलिस अधिकारी और सिपाहियों को, जिन्हें अस्वस्थता या अन्य किसी कारण से जब वे इन प्रान्तों में कर्तव्य पर या अवकाश पर हों, उपचार की आवश्यकता हो, उनका उपचार इन प्रान्तों के पुलिस चिकित्सालयों में कराया जा सकता है। उन्हें भीतर रोगियों के रूप में भर्ती किया जा सकता है, यदि उनके स्थान उपलब्ध हों।
(इस राज्य के पुलिस अस्पताल में इस प्रकार दाखिल किये गये प्रत्येक रोगी के लिये चिकित्सा तथा औषधियाँ देने के बाद और अन्य प्रासंगिक व्ययों को पूरा करने के लिये तथा साथ में आहार के लिये, यदि वह दिया गया हो, वास्तविक व्यय पूर्ति के लिये 1- मैदानी क्षेत्र में रुपया 75 पैसा, 2-पहाड़ी क्षेत्र में रु० 2-00, 3-क्षय रोग से पीड़ित रोगियों के लिये रु० 2-75 प्रतिदिन के समान दर से धनराशि उन राज्यों को जिसमें सम्बन्धित व्यक्ति सेवा कर रहा हो सरकार से महालेखाकार (Accountant General) द्वारा रखे जाने वाले विनियम नयम लेख के जरिये वसूल की जायेगी। केवल असम के मामले में ऐसा नहीं किया जायेगा।
असम की दशा के सिवाय प्रभार धन वसूलने और समायोजित करने के लिए निम्न प्रक्रिया का अनुसरण किया जावेगा। चिकित्सालय से रोगी के मुक्त किये जाने के पश्चात् यथासम्भव शीघ्र, उस जिले के पुलिस अधीक्षक, जहाँ के चिकित्सालय में वह भर्ती हुआ था, उस जिले के पुलिस अधीक्षक को जहां वह सेवारत हो, रोगी का नाम, उसकी क्रम संख्या, पंक्ति, प्रवेश और मुक्ति का दिनांक, प्रदान किये गए भोजन का वास्तविक व्यय, यदि कोई हो, और उपरोक्त द्वितीय उप पैरा के अनुसार गणित की गई कुल हुए व्यय की राशि, सूचित करेगा। उसी के साथ इस रिपोर्ट की एक प्रति उत्तर प्रदेश के महालेखपाल को, इस निवेदन के साथ कि वे विनियम लेखाओं के माध्यम से सम्बन्धित प्राप्त के नामे उस राशि को डाल दें, अग्रेषित की जावेगी। अन्य प्रान्तों के पुलिस अधीक्षकों द्वारा सीधे भेजे गए धन स्वीकार न किये जायेंगे, और न कोई वसूली उन अन्य प्रान्तों के उन पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों के उपचार के लिये की जावें, जो बाहरी रोगी के रूप में इन प्रान्तों के चिकित्सालयों से उपचार प्राप्त करें।
असम में सेवारत किसी पुलिस अधिकारी या सिपाही की दशा में उपरोक्त उप पैरा 2 के अनुसार गणित्त और किया गया सम्पूर्ण व्यय, रोगी से सीधे वसूल किया जावेगा। यदि वह किसी कारण से तत्काल भुगतान करने में असमर्थ हो, उस जिले का पुलिस अधीक्षक जिसके चिकित्सालय में सिपाही भर्ती हुआ हो, उस जिले के पुलिस अधीक्षक के माध्यम से, जिसमें वह सिपाही सेवारत हो, उपचार व्यय, उपरोक्त उप पैरा 2 और 3 में दिये गए विवरणों को प्रदान करते हुए, वसूल करेगा। कीमत जब प्राप्त हो जावे, शीर्ष "0-55-पुलिस-प्रकीर्ण" के नामे डाली जानी चाहिये।
389. पुलिस अधीक्षक दूसरे जिले के लिये आपाल काल की दशा में अराजपत्रित प्रान्तीय पुलिस बल को पुनः बाँट सकता है। स्थायी पुनराबंटन के प्रत्येक प्रस्ताव की रिपोर्ट, जिला मजिस्ट्रेट के * माध्यम से, महानिरीक्षक को की जानी चाहिये, जो सरकार की मन्जूरी के लिए आवेदन किये बिना बल को जिले या जिलों में पुनः बाँट सकेगा, बशर्ते कि वह पद स्थापना के प्रान्तीय मान से विचलित नहो।
थाने को कमांड करने वाले अधिकारी से पुलिस अधीक्षक को प्रस्तुत की गई, पुलिस टुकड़ी की संख्या के सम्बन्ध में किसी प्रस्ताव के पहले सम्पर्क कर लेना चाहिए।
390. जिला मजिस्ट्रेट की मन्जूरी से ग्रामीण पुलिस जिले में पुनराबंटित की जा सकेगी।
391. रेंज का उप महानिरीक्षक अस्थायी रूप से अपने एक जिले के पुलिस बल की, अन्य जिलों में निरीक्षक के ऊपर की पंक्ति के न होने वाले पुलिस अधिकारियों का हटाकर डकैती के विरुद्ध अभियान चलाने या मेले जैसे प्रयोजनों के लिए, वृद्धि करने को सशक्त है। अतिरिक्त पुलिस (सशस्त्र और सिविल) के लिए पुलिस अधीक्षक को रेंज के 'उप महानिरीक्षक के प्रति आवेदन करना चाहिये। वार्षिक मेलों और समारोहों के लिए नियतकालिक अपेक्षाओं के, लिए, जिनके लिए साधारणतया भारो बलयोजित होता हो, दीर्घ सूचना दी जानी चाहिए।
392. प्रत्येक जिले में पुलिस आबंटन में स्वीकृति, निश्चित की गई गारदों की संख्या और मान दर्शायी जाती है और उसे बदला नहीं जाना चाहिए।
393. प्रत्येक जिले के पुलिस अधीक्षक के प्रवाचक के रूप में एक उप-निरीक्षक की अनुमति है. अधीक्षक के प्रवाचक का पद सदैव उप-निरीक्षक के द्वारा धारण किया जाना चाहिए।
394. अवर अधिकारियों की पंक्ति के लिए पदोन्नति करने के हेतु कान्सटेबिलों के प्रशिक्षण देने के प्रयोजन के लिये सीतापुर में एक प्रशिक्षण विद्यालय बनाया गया है।
395. सैनिक पुलिस के निकाय की सूचना प्रान्तीय सरकार द्वारा मन्जूर की गई है। मुख्यालय का डिपो और प्रशिक्षण केन्द्र सीतापुर में है। कम्पनियों को सुविधाजनक केन्दों पर पदस्थ किया जाता है। इसकी निम्नलिखित सहायता सेवायें होती हैं:-
(क) वायरलेस शाखा।
(ख) अनुगैस शाखा।
(ग) कारखाने सहित मोटरयान शाखा, जहाँ बालकों को प्रशिक्षण दिया जाता है और वाहनों की मरम्मत की जाती है।