
महानिदेशक पुलिस विभाग का प्रधान अधिकारी है और पुलिस प्रशासन के सभी प्रश्नों पर सपरिषद गवर्नर के सलाहकार हैं। सपरिषद् गवर्नर की ओर से जारी किए जाने वाले सभी आदेश पुलिस बल के सभी सदस्यों को उसके मार्फत जारी किए जाते हैं, अति आवश्यक दशाओं के सिवाय, जिनमें अधीनस्थ अधिकारियों को सीधे जारी किये गये आदेशों की प्रतियाँ उसे भेज दी जाती हैं। कोई पुलिस अधिकारी सपरिषद् गवर्नर से उसके मार्फत के सिवाय पत्र व्यवहार नहीं कर सकेगा, तब तक नियम के द्वारा विशेषतया प्राधिकृत न कर दिया गया हो। प्रशासनिक चर्चा सम्बन्धी मामले के रूप में, उसका सम्बन्ध राजपत्रित अधिकारियों कर्मचारी मण्डल के सामान्य आबंटन और निधियों के सामान्य वितरण से ही रहता है। कुछ नगरों और थानों में निरीक्षकों की पदस्थ करने, स्थानान्तरण करने और अवकाश अनुदत्त (मंजूर) करने और उस लिपिकीय कर्मचारी मण्डल को पदस्थ करने, स्थानान्तरित करने और पदोन्नत करने बाबत, जो उसके द्वारा पूरी सुविधापूर्वक किए जा सकते हैं, के सिवाय, अराजपत्रित कर्मचारी मंडल के मामले में पूर्ण उत्तरदायित्व (जिम्मेदारी) उप महानिरीक्षक की प्रत्यायोजित कर (सौंप) दिया गया है।
प्रेपक
श्री अनिल कुमार, संयुक्त सचिव, उत्तर प्रदेश शासन।
सेवा में,
पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक, उत्तर प्रदेश, लखनऊ।
महोदय,
[लखनऊ: दिनांक 5 मई, 1983
मुझे यह कहने पर निदेश हुआ है कि भारतीय पुलिस सेवा के सुपर टाइप स्केल के पदों को संख्या में वृद्धि करने के विचार से माननीय राज्यपाल महोदय निम्नलिखित पदों को उसके भरे जाने की तिथि से सुजित/उच्चीकृत्त किए जाने की स्वीकृति प्रदान करते हैं-
(1) सतर्कता निदेशक/अपर पुलिस महानिरीक्षक के पद को पुलिस महानिरीक्षका के पद (वेतनमान ८० 2500-2750) में उच्चीकृत करने,
(2) आगरा, मुरादाबाद तथा फैजाबाद परिक्षेत्रों के लिए सृजित अपर पुलिस महानिरीक्षक के वर्तमान अस्थाई पदों को समाप्त करके उनके स्थान पर क्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षक के तीन अस्थाई पदों को सृजित करने,
(3 ) लखनऊ मुख्यालय पर क्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षक के एक अस्थाई पद को सूजित करने,
(4) पुलिस मुख्यालय, इलाहाबाद के लिए पुलिस महानिरीक्षक के एक अस्थाई पद को सृजित
(5) विशेष जाँच प्रकोष्ठ (हरिजन सेल) में पुलिस महानिरीक्षक के एक अस्थाई पद को सृजित करने,
(6) कमाण्डेन्ट जनरल, होमगार्ड्स तथा निदेशक, नागरिक सुरक्षा के दोनों, कार्यालयों को पृथक-पृथक किए जाने तथा पुलिस महानिरीक्षक के एक अतिरिक्त अस्थाई पद को सृजित करने,
(7) उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान में पुलिस उप-महानिरीक्षक (वेतनमान रु० 2000-2250 में) के एक अस्थाई पद को सृजित करने,
(8) उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम में पुलिस अपर महानिरीक्षक के एक अस्थाई पद को सृजित करने। इस पद को मुख्य सतर्कता/सुरक्षा अधिकारी के नाम से जाना जायेगा।
(9) पुलिस महानिरीक्षक (प्रशिक्षणं) के अधीन पुलिस अपर महानिरीक्षक (प्रशिक्षण) के एक अस्थाई पद को सृजित करेगा। इस पद का मुख्यालय इलाहाबाद रहेगा।
(10) पुलिस उप-महानिरीक्षक के तीन अस्थाई पदों को सृजित करने, इन पदों के हेडक्वार्टर तथा कार्यक्षेत्र के बारे में आदेश अलग से प्रसारित किये जायेंगे।
2. यह सभी पद उनके भरे जाने को तिथि से 28 फरवरी, 1984 तक चलते रहेंगे बशर्ते कि उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के इससे पहले ही समाप्त न कर दिया जाए।
3. आई०पी०एस० (काडर) रूल्स, 1954 के नियम 9(2) के तृतीय प्रतिबन्ध के अन्तर्गत माननीय राज्यपाल महोदय यह भी घोषित करते हैं कि यह सभी पद राज्य आई०पी०एस० संवर्ग में अस्थाई रूप से जुड़े हुये माने जायेंगे तथा स्तर एवं उत्तरदायित्व में उनकी मान्यता आई०पी०एस० संवर्ग से सम्मिलित पुलिस महानिरीक्षक/पुलिस उप-महानिरीक्षक के पद के समकक्ष होगी। तद्नुसार पद के धारकों को उनके पद के वेतन के अतिरिक्त भारत सरकार द्वारा समय-समय पर स्वीकृत महंगाई तथा अन्य भत्ते भी देय होंगे।
महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक, उ०प्र० लखनऊ को सम्बोधित एवं अन्यों को पृष्ठांकित श्री प्रभा शंकर मिश्रा, संयुक्त सचिव उ०प्र० शासन गृह (पुलिस सेवायें) अनुभाग-2 के पत्र सं० 1205/आ०-पु०से०-2-1984 दिनांक 18 अप्रैल, 1984 की प्रतिलिपि।
मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि माननीय राज्यपाल महोदय ने पुलिस महानिरीक्षक, भ्रष्टाचार निवारण संगठन, उत्तर प्रदेश, लखनऊ, (वेतनमान रु० 2500 से 2750) के एक अस्थायी निःसंवर्गीय पद को सृजित किये जाने की स्वीकृति प्रदान कर दी है। यह पद पदधारी द्वारा कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से सुजित्न माना जायेगा और 28 फरवरी, 1985 तक चलता रहेगा, बशर्ते कि उसे बिना किसी पूर्व सूचना के इससे पहले ही समाप्त न कर दिया जाय।
2. आई०पी०एस० (पे) रूल्स, 1954 के नियम 9 (2) के अधीन माननीय माननीय राज्यपाल महोदय यह घोषित करते हैं कि उपरोक्त प्रस्तर में सृजित अस्थाई निःसंवर्गीय पदस्तर एवं उत्तरदायित्व में पदधारी द्वारा कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से पुलिस महानिरीक्षक, अभिसूचना विभाग के संवर्गीय पद के समक्ष माना जायेगा और इस पद के पदधारी को रुपया 2500 से 2750 के वेतनमान में समय-समय पर देय वेतन प्राप्त होगा।
प्रेषक,
श्री प्रभा शंकर मिश्रा, संयुक्त सचिव, उत्तर प्रदेश शासन।
सेवा में,
मष्ठानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक, उत्तर प्रदेश, लखनऊ।
महोदय,
[लखनऊ : दिनांक 18 अप्रैल, 1984
मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि माननीय राज्यपाल महोदय ने निदेशक कम्प्यूटर्स एण्ड साइन्टिफिक सेक्शन, उत्तर प्रदेश, लखनऊ (वेतनमान रु० 2500-2750) के एक अस्थायी निःसंवर्गीय पद को सुजित किये जाने को स्वीकृति प्रदान कर दी है। यह पदधारी द्वारा कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से सृजित माना जायेगा और 28 फरवरी, 1985 तक चलता रहेगा बशर्ते कि उसे बिना किसी पूर्व सूचना के इससे पहले ही समाप्त न कर दिया जाय।
2. आई०पी०एस० (पे) रूल्स, 1954 के नियम 9 (2) के अधीन माननीय राज्यपाल महोदय यह घोषित करते हैं कि उपरोक्त प्रस्तर 1 में सृजित अस्थाई निःसंवर्गीय पद स्तर एवं उत्तरदायित्व में
पदधारी द्वारा कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से पुलिस महानिरीक्षक अभिसूचना विभाग के संवर्गीय पद के समकक्ष माना जायेगा और इस पद के पदधारी को रु० 2500-2750 के वेतनमान में समय- समय पर देय वेतन प्राप्त होगा।
पुलिस महानिदेशक, उ०प्र० को सम्बोधित श्री प्रभाशंकर मिश्र, संयुक्त सचिव, उ०प्र० शासन, गृह (पुलिस सेवायें) अनुभाग-2, लखनऊ के पृ०सं० 1207/आठ-पु० से०-2-1984 दिनांक 18-4-84 की प्रतिलिपि।
मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि माननीय राज्यपाल महोदय ने पुलिस महानिरीक्षक,
आर्थिक अपराध संगठन, उत्तर प्रदेश, लखनऊ (वेतनमान रु० 2500-2750) के एक अस्थाई निः संवर्गीय, पद को सृजित किये जाने की स्वीकृति प्रदान कर दी है। यह पद, पदधारी द्वारा कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से सृजित माना जायेगा और 28 फरवरी, 1985 तक चलता रहेगा बशर्ते कि उसे बिना किसी पूर्व सूचना के इससे पहले ही समाप्त न कर दिया जाय।
2. आई०पी०एस० (पे) रूल्स, 1954 के नियम 9 (2) के अधीन माननीय राज्यपाल महोदय घोषित करते हैं कि उपरोक्त प्रस्तर 1 में सृजित अस्थाई निःसंवर्गीय पद स्तर एवं उत्तरदायित्व में पदधारी द्वारा कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से पुलिस महनिरीक्षक, अधिसूचना विभाग के संवर्गीय पद के समकक्ष माना जायेगा और इस पद के पदधारी को रु० 2500-2750 के वेतनमान के समय-समय पर देय वेतन प्राप्त होगा।
पुलिस महानिदेशक, उ०प्र० को सम्बोधित श्री प्रभाशंकर मिश्र, संयुक्त सचिव, गृह (पुलिस सेवायें) अनुभाग-2, लखनऊ के पृष्ठ सं०-2253/आठ-पु०से०-2-512(2)/84 दिनांक 26-5-84 की प्रतिलिपि ।
शासनादेश संख्या 1574/आठ पु० से०-2-1983, दिनांक 5 मई, 1983 एवं 2224/आठ-
पु०से०-2-1983 दिनांक 21 जून, 1983 के अनुक्रम में मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि पुलिस प्रशासन को समृद्ध करने हेतु उत्तर प्रदेश के विभिन्न परिक्षेत्रों को कुल 5 क्षेत्रों में विभाजित करने उद्द्देश्य से माननीय राज्यपाल महोदय ने उपरोक्त 5 मई, 1983 के शासनादेश से प्रस्तर 1 (2) एवं 1 (3) में सृजित-बार क्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षकों के पदों के अलावा एक और क्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षक अस्थाई पद सृजित किये जाने की स्वीकृति प्रदान कर दी है।
2. पूर्व से निर्धारित क्षेत्रों में संशोधन करते हुये प्रदेश के पांच क्षेत्रों को अब निम्नवत निर्धारित किये जाने की भी माननीय राज्यपाल महोदय स्वीकृति प्रदान करते हैं-
क्षेत्र का नाम क्षेत्र में आने वाले परिक्षेत्र मुख्यालय
1. मेरठ क्षेत्र 1. मेरठ परिक्षेत्र 2. गढ़वाल परिक्षेत्र मेरठ
2. बरेली क्षेत्र 1. मुरादाबाद परिक्षेत्र 2. बरेली परिक्षेत्र 3. कुमायूँ परिक्षेत्र बरेली
3. लखनऊ क्षेत्र 1. लखनऊ परिक्षेत्र 2. फैजाबाद परिक्षेत्र लखनऊ
4. कानपुर परिक्षेत्र 1. आगरा परिक्षेत्र 2. झाँसी परिक्षेत्र 3. कानपुर परिक्षेत्र कानपुर
5. गोरखपुर क्षेत्र 1. गोरखुपर परिक्षेत्र 2. वाराणसी परिक्षेत्र गोरखपु
3. उपरोक्त प्रस्तर 11 में सृजित पद पदधारी द्वारा कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से 28 फरवरी, 1985 तक चलता रहेगा बशर्ते कि उसे बिना पूर्व किसी सूचना के इससे पहले ही समाप्त न कर दिया जाये।
4. आई०पी०एस० (पे) रूल्स 1954 के नियम 9 (2) के अधीन माननीय राज्यपाल महोदय यह घोषित करते हैं कि प्रस्तर में सृजित क्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षक का अस्थाई पद स्तर एवं उत्तरदायित्व में सृजन की तिथि से पुलिस महानिरीक्षक, अभिसूचना के संवर्गीय पद के समकक्ष माना जायेगा और इस पद के पदधारी रु० 2500-2750 के वेतनमान में वेतन प्राप्त करेंगे।
प्रेषक,
श्री प्रभा शंकर मिश्रा,
संयुक्त सचिव,
उत्तर प्रदेश शासन।
सेवा में,
महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक,
उत्तर प्रदेश, लखनऊ।
महोदय, [लखनऊ : दिनांक 16 जुलाई, 1984 शासनादेश संख्या 4316/आठ-पु० से०-2-512(2)/83, दिनांक 22-11-83 और शासनादेश संख्या 1480/आठ-पु०सं०-2-512 (1)/83 दिनांक 9 मई, 1984 में सृजित निदेशक, नागरिक सुरक्षा, उत्तर प्रदेश, लखनऊ एवं महासमादेष्टा, होमगार्ड्स, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के दोनों अस्थाई पदों को एतदद्वारा समाप्त करते हुये मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि माननीय राज्यपाल महोदय ने पुलिस महानिरीक्षक, कार्मिक तथा संगठन एवं प्रणाली, पुलिस मुख्यालय इलाहाबाद, के एक अस्थाई निःसर्वर्गीय पद को सृजित किये जाने की स्वीकृति प्रदान कर दी है। यह पदधारी द्वारा कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से सृजित माना जायेगा और 28 फरवरी, 1985 तक चलता रहेगा बशर्ते कि उसे बिना किसी पूर्व सूचना के इससे पहले ही समाप्त न कर दिया जाये।
2. आई०पी०एस० (वेतन) नियमावली, 1954 के नियम 9 (2) के अधीन माननीय राज्यपाल महोदय यह घोषित करते हैं कि उपरोक्त प्रस्तर में सृजित अस्थाई निःसंवर्गीय पद स्तर एवं उत्तरदायित्व में पदधारी द्वारा कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से पुलिस महानिरीक्षक अभिसूचना विभाग के संवर्गीय पद के समकक्ष माना जायेगा और पद के पदधारी को रु० 2500-2750 के वेतनमान में समय-समय पद देय वेतन प्राप्त होगा।
दुर्गा शंकर मिश्र, संयुक्त सचिव, उत्तर प्रदेश शासन।
सेवा में,
महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक, उत्तर प्रदेश, लखनऊ।
[लखनऊ: दिनांक 28 नवम्बर, 1989
विषय-इलाहाबाद जोन का सृजन जोन्स के कार्यक्षेत्रों का पुनर्निर्धारण।
महोदय,
उक्त विषय में मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि इलाहाबाद में पुलिस परिक्षेत्र के सृजन के फलस्वरूप राज्य में विद्यमान पुलिस जोन्स के पुनर्गठन का प्रकरण राज्य सरकार के विचाराधीन था। इस सम्बन्ध में विचारोपरान्त शासन ने यह निर्णय लिया है कि वर्तमान पाँच पुलिस जोन्स के अतिरिक्त इलाहाबाद में एक नया पुलिस जोन्स सृजित किया जाये। अतएव श्री राज्यपाल इलाहाबाद जोन का सृजन करने तथा उसके लिये पुलिस महानिरीक्षक का एक अस्थायी पद भरे जाने की तिथि से 28-2-1990 तक के लिए सृजित करने की अनुमति प्रदान करते हैं। यह पद इससे पूर्व भी बिना सूचना समाप्त किया जा सकता है। यह पद भारतीय पुलिस सेवा संवर्ग नियमावली, 1954 के नियम-4(2) के दूसरे परन्तुक के अनुसार उ०प्र० के भारतीय पुलिस सेवा संवर्ग में अस्थायी वृद्धि माना जायेगा। पदधारी के कर्तव्य/उत्तरदायित्व तथा अधिकार वहीं होंगे जो शासनादेश संख्या 1952/(2)/आठ-पु० से०-2-522(5)/84 दिनांक 1987 में निधर्धारित किये गये हैं अथवा आगे शासन द्वारा निर्धारित किये जायें। वेतन व भत्तों पर होने वाले आवर्तक तथा अनावर्तक व्यय हेतु श्री राज्यपाल रुपये 22,000 मात्र (रुपये बाईस हजार मात्र) की धनराशि भी वर्ष के अन्तिम 3 माह हेतु व्यय करने की अनुमति प्रदान करते हैं।
2. इलाहाबाद में नये पुलिस जोन के सृजन के फलस्वरूप श्री राज्यपाल शासनादेश संख्या 2253/आठ-पु०से०-2-512(29)/84 दिनांक 26 मई, 1984 का अतिक्रमण करके राज्य को पाँच के बजाय 6 जोन में विभाजित कर निम्नांकित स्वीकृति प्रदान करते हैंー
जोन का नाम जोन में आने वाले परिक्षेत्र जोन का मुख्यालय
1. मेरठ जोन 1. मेरठ परिक्षेत्र 2. गढ़वाल परिक्षेत्र मेरठ
2. बरेली जोन 1. मुरादाबाद परिक्षेत्र 2. बरेली परिक्षेत्र 3. कुमायूँ परिक्षेत्र बरेली
3. लखनऊ जोन 1. लखनऊ परिक्षेत्र 2. फैजाबाद परिक्षेत्र लखनऊ
4. गोरखपुर जोन 1. गोरखपुर परिक्षेत्र 2. वाराणसी परिक्षेत्र गोरखपुर
5. कानपुर जोन 1. आगरा परिक्षेत्र 2. कानपुर परिक्षेत्र कानपुर
6. इलाहाबाद जीन 1 इलाहाबाद परिक्षेत्र 2. झाँसी परिक्षेत्र इलाहाबाद
3. इलाहाबाद जोन के सृजन के मसम्बन्ध में होने वाला व्यय वर्ष 1989-0 के आय-व्यय के अनुदान संख्या 27 (गृह विभाग पुलिस) के लेखा शीर्षक "2055 पुलिस आयोजनेत्तर-001-निदेशन और प्रशासन-01-मुख्य" के अन्तर्गत संगत प्राथमिक इकाइयों के नामे डाला जायेगा तथा अनुदान की सम्पूर्ण बचतों के पुनर्विनियोग द्वारा वहन किया जायेगा।
4. यह आदेश वित्त विभाग के अशा०सं०ई० 12/2134 दस 89 दिनांक 27 नवम्बर, 1989 में प्राह उनकी सहमति से जारी किये जा रहे हैं।
भवदीय,
दुर्गा शंकर मिश्र
प्रेषक,
हरीश चन्द्र गुप्ता, प्रमुख सचिव, गृह उत्तर प्रदेश शासन।
सेवा में,
पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश, लखनऊ।
[लखनऊ: दिनांक 19 अप्रैल, 1997
महोदय,
विषय-उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा पर विशेष समस्याओं के समाधान हेतु पुलिस व्यवस्था का सुद्दीकरण।
महोदय,
मुझे यह कहने का निर्देश हुआ है कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश बिहार सीमा पर एक जोन व तीन परिक्षेत्र है. जिसमें कुल 15 जनपद हैं। उत्तर प्रदेश बिहार सीमा पर पुलिस व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने और अपराध नियंत्रण करने, विशेषकर सोमा पर सक्रिय जंगल पार्टियों व नक्सलवादियों की गतिविधियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से श्री राज्यपाल निम्नलिखित विवरण के अनुसार उत्तर प्रदेश बिहार सीमा में स्थित गोरखपुर जोन को पुनर्गठित करने की स्वीकृति प्रदान करते हैं-
क्र० जोन परिक्षेत्र जनपद
1. गोरखपुर 1 . गोरखपुर परिक्षेत्र 1. गोरखपुर 2. पडरौना 3. देवरिया
2. बस्ती परिक्षेत्र 1. महाराजगंज 2. सिद्धार्थनगर, 3. बस्ती
3. आजमगढ़ परिक्षेत् 1 . आजमगढ़ 2. मऊ 3. बलिया 4. जौनपुर
2. वाराणसी जोन 1. वाराणसी परिक्षेत्र 1. वाराणसी 2. गाजीपुर
2.मिर्जापुर परिक्षेत्र 1. मिर्जापुर 2. सोनभद्र 3. भदोही
2. श्री राज्यपाल उक्त पुनर्गठन के फलस्वरूप एक नवसृजित जोन (वाराणसी जोन) तथा 2 नवसृजित परिक्षेत्र (बस्ती एवं मिर्जापुर परिक्षेत्र) का कार्य संचालित किये जाने हेतु परिशिष्ट-1 पर उल्लिखित अस्थायी पदों को उनके भरे जाने की तिथि से, जो इस शासनादेश के जारी होने की तिथि से पहले की न होगी, दिनांक 28 फरवरी, 1998 तक, बशर्ते कि ये पद बिना किसी पूर्व सूचना के पहले ही समाप्त न कर दिया जाय, सूजित किये जाने की स्वीकृति भी प्रदान करते हैं।
3. उक्त पद धारकों को वेतन के अतिरिक्त शासन द्वारा समय-समय पर स्वीकृत अन्य भत्ते, जो नियमानुसार अनुमन्य हों, देय होंगे।
4. परिशिष्ट-1 में दिये गये विवरण के अनुसार उक्त पदों पर होने वाले व्यय को वहन करने हेतु विभागीय आय-व्ययक में प्रावधान उपलब्ध नहीं है तथा व्यय अत्यावश्यक एवं अपरिहार्य है। अतः श्री राज्यपाल उत्तर प्रदेश आकस्मिकता निधि से रु० 28,15,796 (अट्ठाईस लाख पन्द्रह हजार सात सौ छियान्चे रुपये मात्र) की धनराशि अग्रिम आहरित करने की स्वीकृति भी प्रदान करते हैं। इस अग्रिम को उक्त निधि में प्रतिपूर्ति यथासमय अनुपूरक माग द्वारा की जायेगी।
5. इस सम्बन्ध में होने वाला व्यय राज्य आकस्मिकता निधि के लेखे प्रथमतः 8000-आकस्मिकता निधि-राज्य आकस्मिकता निधि तथा अन्ततः वर्ष 1997-98 के आय-व्ययक की अनुदान संख्या 26 के लेखा शीर्षक "2055-पुलिस आयोजनेत्तर 109-जिला पुलिस-03-जिला पुलिस" के अन्तर्गत सुसंगत प्राथमिक इकाइयों के नामे डाला जायेगा।"
भवदीय,
हरीश चन्द्र गुप्त
प्रमुख सचिव, गृह।
प्रतिलिपि महालेखाकार, उत्तर प्रदेश इलाहाबाद को दो अतिरिक्त प्रतियों सहित सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित।
आज्ञा से,
अनु सचिव
वित्त विभाग
|
क्र० नाम पदों की संख्या बेतनमान व्यय की सीमा रुपये में |
|||||
|
आर्वतक अनावर्तक |
|||||
|
1 |
पुलिस महानिरीक्षक |
1 |
रु० 5900-200-6700 |
2,07,372 |
- |
|
2 |
पुलिस उप पैहानिरीक्षक |
2 |
रु० 5100-150-54028 वर्ष या इसके बाद)-150-6150 |
3,68,856 |
- |
|
3 |
अपर पुलिस अधीक्षक |
1 |
रु० 3000-4750 |
1,20,600 |
1800 |
|
4 |
पुलिस उपाधीक्षक (सीनियर स्केल) |
2 |
रु 2200-4000 |
2,37,600 |
3600 |
|
5 |
निरीक्षक (एम) स्टैनी |
4 |
रु० 2000-60-2300-८०री०-75-3200 |
3,04,800 |
2000 |
|
6 |
निरीक्षक (एम)/प्र०लि० |
2+1=3 |
तदैव |
2,28,600 |
1500 |
|
8 |
एस०आई० (एम) |
3 (6) |
रु० 1640-60-2600-८०० 75-2900 |
1,55,412 |
1500 |
|
9 |
ए०एस०आई० (एम) |
4 (6) |
रुरु-1320-30-1560-द०रो०-40-2040 |
2,07,216 |
2000 |
|
10 |
हेड कान्स० ए०पी० |
3 |
रु० 975-25-1150-द८०रो०-30-1660 |
1,25,826 |
14676 |
|
11 |
हेड कान्स० सी०पी० |
3 |
तदैव |
1,25,826 |
14676 |
|
12 |
कान्स० ए०पी० |
4 (12) |
रु० 950-20-1150-५००-25-1400 |
1,54,784 |
19152 |
|
13 |
कान्स० सी०पी० |
3 |
तदैव |
1,16,088 |
14364 |
|
14 |
कान्स०/ड्राइवर |
4 (-2) |
तदैव |
1,54,784 |
19152 |
|
15 |
अर्दली/प्यून |
7 (-3) |
रु० 750-12-870-द०रो०-14-102 |
2,13,612 |
- |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
[लखनऊ: दिनांक 28 जनवरी, 1998
सरकारी अधिसूचना संख्या-3031/1-5/97-353/97-1-5, दिनांक 20 अक्टूबर, 1997 और 3438/1-5/97-366/97-1०-5, दिनांक 21 अक्टूबर, 1997 द्वारा क्रमशः चित्रकूटधाम मण्डल और देवीपाटन मण्डल सृजन के फलस्वरूप राज्यपाल इस अधिसूचना के गजट में प्रकाशित होने के दिनांक से चित्रकूटधाम और देवीपाटन में दो नये पुलिस रेंज के सूजन का आदेश देते हैं।
2. चित्रकूटधाम और देवीपाटन के नये पुलिस रेंज के सृजन के कारण श्री राज्यपाल अग्रतर समय पर उपान्तरित सरकारी अधिसूबना संख्या-7083/छः-पु-1-94-146-94, दिनांक 7 जून, 1993 का अतिक्रमण करके विभिन पुलिस रेंजों को निम्नवत् पुनर्गठित करते हैं-
|
क्र० |
पुलिस रेंज का नाम |
पुलिस रेंज का मुख्यालय |
पुलिस रेंज में सम्मिलित जिलों के नाम |
|
1 |
बरेली रेंज |
बरेली |
बरेली, बदायूँ, पीलीभीत और शाहजहाँपुर। |
|
2 |
मेरठ रेंज |
मेरठ |
मेरठ, बुलन्दशहर, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर और बागपत |
|
3 |
मुरादाबाद रेंज |
मुरादाबाद |
मुरादाबाद, रामपुर, बिजनौर और जूतियाफूले नगर। |
|
4 |
लखनऊ रेंज |
लखनऊ |
लखनऊ, हरदोई, खोरी, रायबरेली, सीतापुर और उन्नाव। |
|
5 |
आगरा रेंज |
आगरा |
आगरा, अलीगढ़, मैनपुरी, एटा, फिरोजाबाद, मथुरा और महामाया नगर (हाथरस)। |
|
6 |
गोरखपुर रेंज |
गोरखपुर |
गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया और महाराजगंज। |
|
7 |
कानपुर रेंज |
कानपुर |
कानपुर नगर, कानपुर देहात, इटावा, फरुर्खाबाद, कनौज और अंरिया। |
|
8 |
इलाहाबाद रेंज |
इलाहाबाद |
इलाहाबाद, फतेहपुर, प्रतापगढ़ और कौशाम्बी। |
|
9 |
फैजाबाद रेंज |
फैजाबाद |
फैजाबाद, बाराबंकी, सुल्तानपुर और अम्बेडकर नगर। |
|
10 |
झांसी रेंज |
झांसी |
झांसी, ललितपुर और जालीन। |
|
11 |
वाराणसी रेंज |
वाराणसी |
वाराणसी, गाजीपुर, चन्दौली और जौनपुर। |
|
12 |
कुमायूँ रेंज |
नैनीताल |
नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चम्पावत, बागेश्वर और उधमसिंह नगर। |
|
13 |
गढ़वाल रेंज |
पौड़ी गढ़वाल |
पौड़ी गढ़वाल, टेहरी गढ़वाल, देहरादून, चमौली, उत्तरकाशी और रुद्र प्रयाग। |
|
14 |
आजमगढ़ रेंज |
आजमगढ़ |
आजमगढ़, बलिया और मऊ। |
|
15 |
सहारनपुर रेंज |
सहारनपुर |
सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और हरिद्वार। |
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16 |
बस्ती रेंज |
बस्ती |
बस्ती, सिद्धार्थनगर और संत कबीर नगर। |
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17 |
मिर्जापुर रेंज |
मिर्जापुर |
मिर्जापुर, भदोही और सोनभद्र। |
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18 |
चित्रकूटधाम रेंज बांदा |
बांदा |
महोबा, छत्रपति साहू जी महाराज नगर, बांदा और हमीरपुर। |
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19 |
देवीपाटन रेंज |
गोण्डा |
गोण्डा, बहराइच, श्रावस्ती और बलरामपुर। |
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आज्ञा से.
राजीव रत्न शाह
प्रमुख सचिव, गृह
1-ए. अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक अपने अधीनस्थ क्षेत्रों के प्रभारी एवं पर्यवेक्षण अधिकारी होंगे तथा अपने क्षेत्रों के उप-महानिरीक्षकों को यथोचित मार्ग दर्शन करेंगे। अपने क्षेत्रान्तर्गत कर्मचारियों/अधिकारियों के सम्बन्ध में उनके कर्तव्य अधिकार निम्नवत् होंगे-
गृह पुलिस अनु० 7-सं० 3708/आठ-7-175, दिनांक, 8-7-811 )
(1) अपने अधीनस्थ परिक्षेत्रों के अराजपत्रित अधिकारियों का स्थानान्तरण करना। अतः परिक्षेत्रीय स्थानान्तरण पुलिस मुख्यालय के स्तर से ही पूर्ववत् किये जाते रहेंगे, परन्तु उनके सम्बन्ध में प्रक्रिया यह होगी कि यह आदेश पुलिस मुख्यालय द्वारा अब सम्बन्धित अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक की संस्तुतियों के अनुसार किये जायेंगे।
(2) अपने अधीनस्थ परिक्षेत्रों में नियुक्त कर्मचारियों के प्रतिवेदन, अपोलों, रिवीजन याचिकाओं आदि का निस्तारण करना।
(3) अपने अधीनस्थ क्षेत्रों के राजपत्रित अधिकारियों को आकस्मिक अवकाश स्वीकृत करना जो अब तक पुलिस महानिरीक्षक स्वीकृत करते थे।
(4) अपने क्षेत्र के राजपत्रित अधिकारियों की वार्षिक प्रविष्टि हेतु उनके कार्य के सम्बन्ध में अपना मंतव्य पुलिस महानिरीक्षक को उपलब्ध कराना।
(5) ऐसे अन्य कार्य जो शासन या पुलिस महानिरीक्षक द्वारा समय-समय पर उन्हें सौंपे जाएँ।
2. कुछ उप महानिरीक्षक जिले के रेंज के प्रभार (चार्ज) हैं। उनमें से प्रत्येक अपने रेंज की पुलिस की दक्षता के लिये उत्तरदायी हैं और उसे देखना चाहिये कि प्रशासन का उचित स्तर बनाये रखा जाता है। उसे अपने अधीक्षकों से सदैव निकट सम्पर्क में रहना चाहिये और उन्हें सहायता पहुँचाना, परामर्श देना या उन पर नियन्त्रण बनाये रखने के लिए तत्पर रहना चाहिये। उसे वर्ष में कम से कम एक बार हर एक जिले के अधीक्षक के कार्यों का निरीक्षण करना चाहिए और विहित प्रारूप (फार्म) में निरीक्षण रिपोर्ट तैयार करना चाहिये। उसे प्रारूप के छपे हुये शीर्षों में अपने सम्प्रेक्षण (नतीजे) अभिलिखित करने की आवश्यकता नहीं है, आठवें 'अपराध के कार्यकरण' और नवें 'सामान्य' के सिवाय यदि प्रत्येक वाद व्यवस्थित हो और किसी कार्यवाही के किए जाने की अपेक्षा न हो तो उसे चाहिए कि वह अपनी रिपोर्ट में ऐसे विषयों को वर्जित करे जो अधिकतम यथोचित रूप से जिले के कर्मचारी मण्डल का मार्ग दर्शन कर सकें या अपने उत्तराधिकारी को सूचना दे सकें। अपना निरीक्षण पूरा कर लेने पर, वह तत्काल त्रुटियों का उपचार करने (नुक्स को ठीक करने) के लिये ऐसी समस्त कार्यवाही करेगा जो उसकी शक्तियाँ अनुज्ञा देती हों और गम्भीर दोष या उन सिद्धान्तों के प्रश्न जिनसे व्यवहार करने की उसे शक्ति नहीं है, महानिरीक्षक को निर्दिष्ट करेगा।
3. उप महानिरीक्षक अपने रेन्ज में अपराध पर सामान्य पर्यवेक्षण (निगरानी) के लिए उत्तरदायी है, उन्हें यह देखना चाहिए कि गम्भीर प्रारम्भ (out break) से निपटने के लिये उचित उपाध्रकिये जाते हैं और जिलों के बीच सहयोग प्रभावी रहता है। इस प्रयोजन के लिये उसे (1) डकैती (2) वध (3) लूट (4) विष देने और (5) प्रकीर्ण मामलों के रजिस्टर महानिरीक्षक के प्रारूप क्र० 138 में रखना चाहिये। वह महानिरीक्षक को एक पाक्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा जो उसकी रेन्ज से सम्बन्धित ऐसे मामलों को अन्तर्विष्ट (शामिल) करेगी जिनके बारे में उसका यह विचार हो कि महानिरीक्षक को सूचित होना चाहिये। इसके साथ डकैतियों का एक विवरण, प्रत्येक मामले की अत्यन्त सूक्ष्म विशिष्टियाँ देते हुए संलग्न किया जावेगा। यह असाधारण मामलों में अपराध की विशेष रिपोर्ट महानिरीक्षक को भेजेगा। अधीक्षक को विशेष महत्वपूर्ण स्वरूप के विधेयों को, जिनके बारे में सरकार तत्काल सूचना अपेक्षित करे, यथा प्रशांति को गम्भीर भंग, यूरोपियों और भारतीयों के बीच भिड़न्त और राजनैतिक स्वरूप के महत्वपूर्ण विषयों को महानिरीक्षक और उपमहानिरीक्षक को सीधे रिपोर्ट करना चाहिये. परन्तु जहाँ तक सम्भव हो, उपमहानिरीक्षक वह प्रणाली होगा जिसके मार्फत महानिरीक्षक सूचना प्राप्त करेगा। वार्षिक जिला प्रशासन रिपोर्ट की प्राप्ति पर, उप महानिरीक्षक को अपनी पूरी रेन्ज के लिये, इन मामलों पर टिप्पणियों सहित, जो प्रान्तीय रिपोर्ट में विशेष उल्लेख किये जाने योग्य हों. एक पुनर्विलोकन तैयार कर महानिरीक्षक को भेज देना चाहिये।
पुलिस शिक्षा और प्रशिक्षण के उप महानिरीक्षक रेन्ज के प्रशिक्षण केन्द्रों में पर्यवेक्षण करने और सामान्जस्य रखने के लिये उत्तरदायी होंगे जिसका वह समय-समय पर निरीक्षण करेंगे। इसके अतिरिक्त, अन्यत्र प्रारम्भ की गई प्रशिक्षण की नवीनतम रीतियों के सम्पर्क में रहेंगे और उन्हें पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों में उपयोग करने के लिये अपनायेंगे।
वह पुलिस ट्रेनिंग कालेज मुरादाबाद, सीतापुर स्थित आई पुलिस सेन्टर तथा पुलिस मोटर ट्रान्सपोर्ट वर्कशाप और लखनऊ स्थित वायरलेस सेक्शन पर भी प्रशिक्षण का पर्यवेक्षण करेंगे, जो सभी, सीतापुर स्थित पुलिस मोटर ट्रान्सपोर्ट, वर्कशाप के अतिरिक्त उनके प्रशासनिक नियन्त्रण के अधीन रहेंगे। वह विभिन्न पुलिस प्रशिक्षण नियमावलियाँ प्रारूपित करेंगे।
4. सरकारी रेलवे पुलिस के प्रभार में रहने वाला महानिरीक्षक का सहायक अपने प्रभार में रहने वाले रेलवे पुलिस थानों के सम्बन्ध में रेन्ज के उप महानिरीक्षक की भाँति ही शक्तियाँ, कर्तव्य और दायित्व धारण करता है, निरीक्षकों और उप-निरीक्षकों को पदच्युत की शक्ति के सिवाय, जो पुलिस मुख्यालयों और रेल के उप महानिरीक्षक में निहित रहती है।
5. आयुक्त शब्द में, जहाँ कहीं भी वह पुलिस विनियमों में आये, कलेक्टर या किसी सम्भाग की भारसाधक उप आयुक्त सम्मितिल होंगे।
सम्भागों के आयुक्त, अपने-अपने सम्भागों के जिला मजिस्ट्रेटों पर, प्रशासन की अन्य शाखों की भाँति पुलिस से सम्बन्धित में, सामान्य पर्यवेक्षण करने की शक्ति का प्रयोग करते हैं। वार्षिक प्रशासनिक रिपोर्टों के बारे में उनके कत्र्तव्यों के लिये आफिस मैनुअल का पैरा 62 देखिये।
6. जिला मजिस्ट्रेट जिले में आपराधिक प्रशासन का प्रधान होता है, और उस समार्थ्य में पुलिस के कार्यों को, नियन्त्रित और निर्देशित करता है। वह ग्राम चौकीदारों का दण्डित करने के सम्बंध में विभागीय शक्तियाँ रखता है, निरीक्षकों और थाने के भारसाधक अधिकारियों के स्थानान्तर के लिये उसका अनुमोदन आवश्यक होता है (पैरा 524), और वह इनाम देने या सेवा और चरित्र तालिका में प्रविष्टियाँ करने की सिफारिश कर सकता है (आफिस मैनुअल का पैरा 296)। अधीक्षकों सम्बन्धी ऐसे भाग को, जो मुख्य कार्यपालन अधिकारी के रूप में जिला मजिस्ट्रेट से सम्बन्ध रखता हो या जिले के सामान्य प्रशासन को प्रभावित करे, जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय से होकर निकलना चाहिये।
परन्तु यह कि उन जिलों में जहाँ कलेक्टर/उप आयुक्त, संभाग का भारसाधक कलेक्टर/उप आयुक्त हो, निरीक्षकों और थाने के भारसाधक अधिकारियों के स्थानान्तर के बारे में उसके कृत्यों का प्रयोग अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (कार्यपालन) द्वारा किया जायेगा।
7. जिला मजिस्ट्रेट को अधीक्षक द्वारा घटित होने वाले सभी गम्भीर अपराधों और सामान्य रूप से अपराधों के परिणाम वृद्धि की तत्परता से सूचना दी जानी चाहिये और उसे जिले के भीतर अपराधों का, उसके स्थल और कारणों का पाक्षिक पुनर्विलोकन प्राप्त करना चाहिये। इसी प्रकार के अपराधों के पुनर्विलोकन, सामान्यतया या तो पाश्क्षिक या मासिक रूप से उप महानिरीक्षक को रेन्ज के क्रम अनुसार भेजे जावेंगे। अधीक्षक को चाहिये कि वह जिला मजिस्ट्रेट को उन सभी घटनाओं से भी सूचित रखे जो पुलिस के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हों और उसके साथ स्वयं विचार-विमर्श करने के अवसर बहुधा तलाश करना चाहिये। अब दोनों अधिकारी मुख्यालय प न हों या एक साथ भ्रमण पर हों तो मौखिक विचार-विमर्श के स्थान अर्द्धशासकीय पत्र व्यवहार किया जाये। यदि अधीक्षक भ्रमण पर हो और जिला मजिस्ट्रेट मुख्यालय पर हो. मुख्यालय के भारसाधक पुलिस अधिकारी को चाहिये कि वह जिला मजिस्ट्रेट को ऐसी महत्वपूर्ण सूचना दे जो मजिस्ट्रेट के पास अधीक्षक द्वारा पर्याप्त शीघ्रता से अन्यथा न पहुँच सकती हो।
(क) उस जिले में जिसमें कलेक्टर/उप आयुक्त, सम्भाग का भारसाधक कलेक्टर या भारसाधक उप आयुक्त हो, इस पैरा के अधीन उसके कृत्यों का प्रयोग अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (कार्यपालन) द्वारा किया जायेगा।
7-अ. जब कभी पुलिस द्वारा किसी अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार, संताप देने, अधिकार का दुरुपयोग करने और अवैध हिरासत में रखने की मिसाल जिला मजिस्ट्रेट की जानकारी में आये तो उन्हें यह अधिकार होगा कि वे पुलिस अधीक्षक से इसमें तत्काल जाँच कराने व आवश्यक अभिलेखों के साथ उसका परिणाम बताने को कहें। यदि इस जाँच के परिणाम में किसी पुलिस फोर्स के सदस्य को दोषी पाया गया तो जिला मजिस्ट्रेट को यह अधिकार होगा कि वह पुलिस अधीक्षक से उसके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही करने के लिये कहें। वे अनुशासनिक कार्यवाही के परिणाम स्वरूप देय दन्ड के पर्याप्तता अथवा अन्यथा होने पर भी परामर्श देंगे। जिला मजिस्ट्रेट व पुलिस अधीक्षक हर माह सभी ऐसे शिकायतों व उन पर किये गये कार्यवाही पर सम्मिलित रूप से समीक्षा करेंगे।
7-व. जब भी जिले में विधि एवं व्यवस्था को प्रभावित करने की अवस्थिति उत्पन्न होने को हो, पुलिस अधीक्षक तत्काल जिला मजिस्ट्रेट को शीघ्रातिशीघ्र माध्यम से सूचित करेंगे व अवस्थिति से निपटने के संम्बन्ध में अनुदेश लेंगे, जब तक कि परिस्थितिवश ऐसा करना असाध्य न हो। अवस्थिति से निपटने के लिये अग्रिम कार्यवाही जिला मजिस्ट्रेट के लगातार निकट के परामर्श, मार्ग दर्शन व अनुदेशों के अनुसार की जायेगी।
8. नियन्त्रण करने को अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुये जिला मजिस्ट्रेट को ऐसे काम करने से बचना चाहिये जो अधीक्षक के प्राधिकार को निर्बल करें। मतभेदों का निजी रूप से समायोजन कर लेना चाहिये और दोनों अधिकारियों के बीच कोई संघर्ष प्रकट न होना चाहिये।
9. जिला मजिस्ट्रेट को साधारण तौर पर प्रत्येक थाने का अर्द्ध वर्ष में एक बार निरीक्षण करना चाहिये, तथापि उन जिलों में जहाँ एडीशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (कार्यालय) पदस्थ हो, जिला मजिस्ट्रेट थानों का निरीक्षण उसे सौंप सकता है। जिला मजिस्ट्रेट को देखना चाहिये कि प्रत्येक अर्द्ध वर्ष के भीतर सब डिवीजन मजिस्ट्रेट हर थाने का कम से कम एक बार सविस्तार और एक बार आकस्मिक रूप से निरीक्षण करता है। उसे उनके मन में यह भावना जमाना चाहिये कि उनके कर्त्तव्य दोहरे हैं- पुलिस को विधि और व्यवस्था के प्रवर्तन (बनाये रखने) में सहायता पहुँचाना और अन्याय का प्रतिषेध करना। वह अपने किसी अधीनस्थ मजिस्ट्रेट को थानों को निरीक्षण करने के लिये निर्देश दे सकता है, परन्तु साधारणतया तृतीय वर्ग के मजिस्ट्रेट को उन्हें निरीक्षण करने को निर्देशित नहीं किया जाना चाहिये जब तक कि यह उनके प्रशिक्षण के अंग के रूप में आवश्यक न हो। खाली पृष्ठों से युक्त मजिस्ट्रेटों द्वारा प्रयोग किये जाने के लिये एक निरीक्षण पुस्तक प्रत्येक थाने में रखी जाग्रेगी। ऐसी हर निरीक्षण पुस्तक, के आवरण (कवर) के भीतरी और प्रारूप क्र० 390 में अपराध का संक्षेप चिपकाया जायेगा। जब कभी उसमें निरीक्षण टीप अंकित की जावे, इस पुस्तक को पुलिस अधीक्षक को भेजी जानी चाहिए और उसके द्वारा वह जिला मजिस्ट्रेट को सूचना के लिये भेज दी जावेगी।'
10. अपराध रजिस्टर से किसी अपराध को निकाल देने के लिये जिला मजिस्ट्रेट की मन्जूरी आवश्यक है, सिवाय रेलवे पुलिस के मामलों के, जिनके निकाल देने के लिये रेलवे पुलिस के प्रभारी पुलिस उप महानिरीक्षक की स्वीकृति प्राप्त की जानी चाहिये।
(क) उस जिले में, जिसमें कलेक्टर/उन आयुक्त प्रभारी कलेक्टर हो या सभ्माग का प्रभारी उप आयुक्त हो, इस पैरा के अधीन उनके कृत्यों का प्रयोग अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (कार्यपालन) द्वारा किया जावेगा।
11. 1861 के अधिनियम क्रमांक पाँच की धारा 30 के अधीन, जुलूसों को अनुज्ञा (लाइसेन्स) देने और उन्हें विनियमित करने की अधीक्षक और सहायक अधीक्षक की शक्तियों का प्रयोग जिला मजिस्ट्रेट के नियन्त्रण के अध्याधीन रखते हुये किया जाना चाहिये।
अधिकांश स्थानों में जहाँ धार्मिक शोभा यात्राओं जैसे मोहर्रम (जुलूसों) और सार्वजनिक उत्सवों के लिये अनुज्ञा दी जाती है, मार्ग और अनुसरण को जाने वाली प्रक्रिया, दीर्घकाल से चली आ रही प्रथा या किसी सक्षम प्राधिकारी के द्वारा विहित किये गये अनुसार नियत किये जाते हैं। ऐसे मामले में, पुलिस का कर्त्तव्य यह देखना है कि व्यवस्था बनाये रखी जाती है और उसके द्वारा अनुसरण किये जाने वाले मार्ग या विहित की गई प्रक्रिया में कोई अन्तर नहीं किया जाता। यदि समुदाय का कोई खण्ड या व्यक्तिगत सदस्य अपनी शोभा यात्रा या उत्सव को विहित समय पर या रीति से कार्यान्वित करने से इन्कार करे तो उन्हें यह सूचित कर दिया जाना चाहिये कि उन्हें विहित समय के पश्चात् या किसी अन्य मार्ग या किसी अन्य रीति से उन्हें कार्यान्वित करने की मन्जूरी नहीं दी जावेगी।
विशेष मामलों में जिनके बारे में कोई सुनिश्चित प्रथाओं या विद्यमान आदेशों के द्वारा कोई उपबन्धन किये गये हों, पुलिस को चाहिये कि वह जिला मजिस्ट्रेट और उसकी अनुपस्थिति में सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट या दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के अधीन आदेश पारित करने के लिये सशक्त अन्य मजिस्ट्रेट को आवेदन करे और निर्देशों का अनुसरण करे। जहाँ मजिस्ट्रेट के न होने के कारण यह सम्भव न हो सके, भारसाधक अधिकारी को, पूर्व अभ्यास को जो यथासम्भव सुनिश्चित किया जा सके, अपने कार्य का कार्य का आधार मान कर अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिये।
12. अधीक्षक जिले के पुलिस बल का प्रधान होता है, वह उसकी दक्षता, अनुशासन और कत्र्तव्यों के समुचित पालन के लिये उत्तरदायी है। उसे यह देखना चाहिये कि न्यायालयों और अन्य सक्षम प्राधिकारियों के आदेशों को तत्काल क्रियान्वित किया जाता है। मजिस्ट्रेटों और पुलिस बल के बीच सभी पत्र व्यवहार उनके माध्यम से किया जाता है, पुलिस को जारी किये जाने वाले सभी आदेश और निर्देश उसके पास से आना चाहिये।
मजिस्ट्रेटरों के न्यायालय, जो जिला मुख्यालयों पर स्थित न हों उसे सबडिवीजन में जिसमें न्यायालय स्थित हैं, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अध्याय छः सातः दस तथा धारा 421 (1) (क) के अधीन जारी किये गये समन, वारन्ट या अन्य आदेशिकायें थानों को तामील हेतु सीधे भेज सकते हैं. पुलिस अधीक्षक के कार्यालय के मार्फत नहीं। ऐसी आदेशिकायें तामील के पश्चात् सम्बन्धित न्यायालयों को सीधे भेज दी जायेंगी, पुलिस अधीक्षक के कार्यालय के मार्फत नहीं।
13. जब अधीक्षक मुख्यालय पर हो, तो सभी कामकाज के दिनों में, उन्हें कार्यालय में हाजिर रहना चाहिये। साधारणतया उन्हें सभी शासकीय कार्य कार्यालय में करना चाहिये, ऐसे गोपनीय विषयों के सिवाय जिन्हें वह अपने निवास स्थान पर निपटाना उचित समझे।
अपने निवास स्थान पर उसे जन साधारण की पहुँच के लिये उपलब्ध रहना चाहिये, जो उससे भेंट करने की इच्छा करें। उसे चाहिये कि वह उन्हें अपने से परिदर्शन करने और अपने विचारों को स्वतन्त्रतापूर्वक संसूचित करने को प्रोत्साहित करें। बल के बाहर जितने अधिक सूचना के साधन उसके पास होंगे, वह पुलिस अधिकारी के रूप में उतना ही अधिक दक्ष होगा।
जिले में निवास कर रहे पुलिस के पेन्शनरों से भी उसे सम्पर्क रखना चाहिये
पुलिस अधीक्षक को यह देखना चाहिये कि उसके जिले के भीतर सभी थानों का वार्षिक रूप से एक राजपत्रित अधिकारी द्वारा/राजपत्रित अधिकारियों द्वारा थाने के निरीक्षण के लिये ज्ञापन में निर्धारित रोति से पूर्ण निरीक्षण कर लिया जाता है और उसे प्रत्येक थाने का वर्ष में कम से कम एक बार स्वयं परिदर्शन करना चाहिये।
भ्रमण को शरद ऋतु में ही सीमित करना आवश्यक नहीं है, जहाँ निरीक्षण गृह उपलब्ध हों, दूरस्थ धानों का ग्रीष्म ऋतु और वर्षा में भी परिदर्शन किया जावे।
ज्ञापन के अनुसार मुख्यालय पर थाने का पूरा निरीक्षण, यदि सम्भव हो तो वर्ष में एक बार, किन्तु किसी दशा में तीन वर्ष का एक बार पुलिस अधीक्षक को स्वर्य ही करना चाहिये।
पुलिस अधीक्षक को अपनी रिजर्व लाइन का वार्षिक निरीक्षण जुलाई और शरद ऋतु के बीच उप महानिरीक्षक द्वारा होने वाले निरीक्षण से पहले करना चाहिये। इस निरीक्षण को करने में, उसे प्रारूप क्रमांक 327 उप महानिरीक्षक द्वारा जिला निरीक्षण रिपोर्ट के प्रारूप के शीर्ष 'पाँच' के शीर्षकों से मार्ग-दर्शन लेना चाहिये। लाइन के निरीक्षण की रिपोर्ट अंग्रेजी की कार्यालय निरीक्षण पुस्तक में प्रविष्ट की जानी जाहिए।
आबकारी विषयों पर होने वाले वार्षिक सम्मेलन में पुलिस अधीक्षक की दृष्टिगत हाजिरी आवश्यक है।
अन्य प्रदेशों या देशी राज्यों के सीमान्त के जिलों के अधीक्षकों की, पड़ोसी जिलों के अधिकारियों से वर्ष के कप्स से कम एक बार और यदि सभ्मव हो सके तो बहुधा, भेंट करने की व्यवस्था करना चाहिये। अधीक्षक द्वारा ऐसी भेंट का अभिलेख तैयार किया जावे जिस रेन्ज के उप महानिरीक्षक को सूचनार्थ भेज देना चाहिये।
14. सरकारी आदेशों की पुस्तिका में जिले का प्रभार सौंपने वाले किसी जिला राजपत्रित अधिकारी द्वारा गोपनीय ज्ञापन तैयार करने के लिये अन्तर्विष्ट निदेशों का पुलिस अधीक्षक द्वारा अनुसरण किया जाना चाहिये। ज्ञापन के विपयों में अपेक्षाओं के अनुसार परिवर्तन किया जाना चाहिये।
15. अंग्रेजी की आदेश पुस्तिका (आर्डर बुक) प्रतिदिन, निरीक्षक से कम पंक्ति के न होने वाले अधिकारी द्वारा लिखी और अधीक्षक या उसकी अनुपस्थिति में मुख्यालय के भारसाधक अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित की जावेगी। मुख्यालय को लौटने पर अधीक्षक प्रविष्टयों का परीक्षण करेगा और यह सत्यापित करेगा कि उसने अपनी अनुपस्थिति की कालावधि की प्रविष्टियों की जाँच कर ली। यह पुस्तक उसकी पूर्णता के 45 वर्ष तक रखी जाती रहेगी, इसमें आरक्षी दल की आन्तरिक अर्थ-व्यवस्था से सम्बन्धित प्रत्येक कार्यपालिक आदेश उदाहरणार्थ, नियुक्ति दण्ड, स्थानान्तरण, अवकाश, पद-स्थापना और रक्षकों (गार्ड्स) तथा पहरेदारों (एस्कार्ट्स) के प्रदाय और मुक्ति के आदेश, प्रविष्ट किये जायेंगे।
प्रत्येक दिन के अभिलेख का आरम्भ रात के गश्ती दलों को मुक्त करने के और आगामी दिनांक के लिए रिजर्व लाइन के दिन के अधिकारी के आदेश से प्रारम्भ की जावें। इसके पश्चात् अधीक्षक . या मुख्यालय के भारसाधक अधिकारी द्वारा पृथक् से कार्यपालक आदेश दिये जायें। प्रधान आरक्षकों को उनकी संख्या और आरक्षकों को उनकी संख्या और नाम से भी पदांकित किया जावे।
मार्ग-रक्षियों से सम्बन्ध रखने वाले आदेश में, उन बन्दियों की संख्या या कोष की राशि जिनका मार्गरक्षण किया जाना है सदैव ही अभिकथित की जायें।
16. उन सभी संज्ञेय अपराधों की जिनकी रिपोर्ट थाने पर हो, अंग्रेजी के अपराध रजिस्टर में स्थान दिया जाना चाहिये। इस रजिस्टर का एक पृथक् भाग हर थाने के लिये समनुदेशित किया (दिया) जावेगा और वार्षिक निरीक्षण रिपोर्ट के संलग्र होने वाला विवरण 'क' में विनिर्दिष्ट किए गये अपराध के छहों वर्ग उस भाग के भीतर रहेंगे। यदि कोई विशेष अपराध उदाहरणार्थ, पशुओं की चोरी व्यापक हो, अधीक्षक उन मामलों के वर्ग के भीतर जिनसे उसका सम्बन्ध हो उनके लिये पृथक पृष्ठ समनुदेशित कर सकता है।
अधीक्षक अपने प्रवाचंक (रीडर) को रजिस्टर के पहले आठ स्तम्भों को भरने के लिये निर्देशित कर सकता है, किन्तु अभियुक्तियों का स्तम्भ (खाना) उसे स्वयं अपने हाथ से ही भरना चाहिए, परन्तु यह कि वह सबडिवीजन के भारसाधक किसी सहायक या उपअधीक्षक को यह निर्देशित कर सकता है कि वह सब डिवीजन से सम्बन्धित रजिस्टर का भाग रखे, ऐसी दशा में ऐसा अधिकारी सभी स्तम्भों को अपने ही हाथ से भरेगा। सभी स्तम्भों में प्रविष्टियाँ यथासमय से भरी जाना चाहिये जैसे-जैसे केस डायरी और महत्वपूर्ण कागज प्राप्त होते रहें। जब कोई विचारण, और जहाँ विचारण न हो, महत्व के किसी मामले में अन्वेषण समाप्त हो जावे, अधीक्षक को तथ्यों के पुनर्विलोकन के पश्चात् यह निर्णय करना चाहिये कि क्या पुलिस का आचरण किसी पक्षपात या अन्यथा रूप से ध्यान देने योग्य है और अभियुक्तियों के स्तम्भ में यथोचित अन्तिम प्रविष्टि करना चाहिये। उसे इस स्तम्भमें लाल स्याही से उन सभी व्यक्तियों के नाम जिन पर मामले में सन्देह किया गया हो यदि उसके मतानुसार संदेह युक्तियुक्त हो, प्रविष्टि करना चाहिये।
17. सहायक और उप अधीक्षक, अधीक्षक के किसी ऐसे कार्य का पालन का सकेंगे जिसे वह किसी विधि या नियम के द्वारा स्वयं ही करने को बाध्य न हों। वे जांच और सिफारिश कर सकते हैं चाहे तब वह अन्तिम आदेश प्राप्त करने को सशक्त न हो। उन्हें भ्रमण पर जाना और निरीक्षण करना चाहिये। महत्वपूर्ण अन्वेषणों के पर्यवेक्षण और निर्देशन के लिए उनकी सेवाओं का स्वछन्द रूप से उपयोग किया जावे। इस अधिकारी को जिसने पैरा 528 के अधीन अपेक्षित प्रमाण प्राप्त कर दिया हो, जिले की एक भाग की भारसाधना में अधीक्षक के नियन्त्रण के अधीन रखा जाना चाहिये।
कोई सहायक अधीक्षक जो जिले का प्रभार ग्रहण करने के लिए अर्ह (योग्य) हो गया हो, अधीक्षक की अपुपस्थिति में मुख्यालय का प्रभार ग्रहण करेगा। जब ऐसा अधिकारी उपलब्ध न हो तो राजपत्रित पंक्तियों की सेवा-समय को लम्बाई में वरिष्ठ होने वाला राजपत्रित अधिकारी साधारणतया प्रभार ग्रहण करेगा। यदि अधीक्षक इस साधारणतया से हट कर कोई भिन्न प्रस्ताव करे तो, रेन्ज के उप महानिरीक्षक को निर्देश किया जाना चाहिये।
जब मुख्यालय पर कोई राजपत्रित अधिकारी हाजिर न हो, तो अधीक्षक को मुख्यालय पर किसी अंग्रेजी जानने वाले निरीक्षक को अपने कार्यालये का प्रभार सौंपना चाहिये।
पैरा 497 (एफ) में प्रमाणित (गिनाये गये) कुछ सहायक तथा उप, पुलिस अधीक्षक कुछ निबन्धनों के अध्यधीन रहते हुये (देखिये पैरा 491) पुलिस अधिनियम की धारा 7 के अधीन अधीक्षक के कर्त्तव्यों का पालन करने को सशक्त होंगे, जहाँ तक उनका सम्बन्ध निरीक्षक से कम पंक्ति के होने वाले अधिकारियों से है।
अन्य वे सहायक अधीक्षक और उप अधीक्षक जिनकी नियुक्तियाँ सम्पुष्ट की जा चुकी हों, कुछ निबन्धनों के अधीन रहते हुये पुलिस अधिनियम की धारा 7 के अधीन पुलिस के अधीक्षक के कर्त्तव्यों का पालन करने को सशक्त हैं, जहाँ तक उनका सम्बन्ध पुलिस अधिकारियों के निलम्बन और पुलिस अधिकारियों को दिये जाने वाले अधिनियम की धारा 7 (ख) में विनिर्दिष्ट दन्डाज्ञाओं से है। [पैरा 479 (जी) देखिये]।
पुलिस के सभी उप अधीक्षक, पुलिस अधिनियम की धारा 30 और 30-ए के अधीन पुलिस के अधीक्षक के सभी कर्तव्यों का पालल करने को सशक्त हैं।
पुलिस के सभी सहायुक और उप अधीक्षक जिले पर भारसाधक के रूप में पद धारण करते हुये, जब तक उन्हें रेन्ज के उप महानिरीक्षक द्वारा छूट न दे दी जावे, सभी स्थायी परिपत्र आदेशों की प्रति जिन्हें वे जारी करना प्रस्तावित करें, इन आदेशों के कारण के बारे में जहाँ आवश्यक हो स्पष्टीकरण के साथ उन्हें (उप महानिरीक्षक का) अनुमोदनार्थ भेजेंगे।
17-अ. [निकाल दिया गया है]