
जब किसी अपराध का विचारण उच्च न्यायालय द्वारा धारा 447 के अधीन न करके अन्यथा किया जाता है तब वह अपराध के विचारण में वैसी ही प्रक्रिया का अनुपालन करेगा, जिसका सेशन न्यायालय अनुपालन करता यदि उसके द्वारा उस मामले का विचारण किया जाता ।
1. केन्द्रीय सरकार इस संहिता से और वायुसेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) और नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) और संघ के सशस्त्र बल से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि से संगत नियम ऐसे मामलों के लिए बना सकेगी जिनमें सेना, नौसेना या वायुसेना संबंधी विधि या अन्य ऐसी विधि के अधीन होने वाले व्यक्तियों का विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा, जिसको यह संहिता लागू होती है, या सेना न्यायालय द्वारा किया जाएगा तथा जब कोई व्यक्ति किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष लाया जाता है और ऐसे अपराध के लिए आरोपित किया जाता है, जिसके लिए उसका विचारण या तो उस न्यायालय द्वारा जिसको यह संहिता लागू होती है, या सेना न्यायालय द्वारा किया जा सकता है तब ऐसा मजिस्ट्रेट ऐसे नियमों को ध्यान में रखेगा और उचित मामलों में उसे उस अपराध के कथन सहित, जिसका उस पर अभियोग है, उस यूनिट के जिसका वह हो, कमान आफिसर को या, यथास्थिति, निकटतम सेना, नौसेना या वायुसेना स्टेशन के कमान आफिसर को सेना न्यायालय द्वारा उसका विचारण किए जाने के प्रयोजन से सौंप देगा |
इस धारा में,-
क. यूनिट" के अन्तर्गत रेजिमेंट, कोर, पोत, टुकड़ी, ग्रुप, बटालियन या कम्पनी भी है
ख. "सेना न्यायालय" के अन्तर्गत ऐसा कोई अधिकरण भी है जिसकी वैसी ही शक्तियां हैं जैसी संघ के सशस्त्र बल को लागू सुसंगत विधि के अधीन गठित किसी सेना न्यायालय की होती हैं ।
2. प्रत्येक मजिस्ट्रेट ऐसे अपराध के लिए अभियुक्त व्यक्ति को पकड़ने और सुरक्षित रखने के लिए अपनी ओर से अधिकतम प्रयास करेगा जब उसे किसी ऐसे स्थान में आस्थित या नियोजित सैनिकों, नाविकों या वायुसैनिकों के किसी यूनिट या निकाय के कमान आफिसर से उस प्रयोजन के लिए लिखित आवेदन प्राप्त होता है ।
3. उच्च न्यायालय, यदि ठीक समझे तो यह निदेश दे सकता है कि राज्य के अंदर स्थित किसी जेल में निरुद्ध किसी बंदी को सेना न्यायालय के समक्ष लंबित किसी मामले के बारे में विचारण के लिए या परीक्षा किए जाने के लिए सेना न्यायालय के समक्ष लाया जाए ।
संविधान के अनुच्छेद 227 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अधीन रहते हुए, द्वितीय अनुसूची में दिए गए प्ररूप ऐसे परिवर्तनों सहित जैसे प्रत्येक मामले की परिस्थितियों से अपेक्षित हों, उसमें वर्णित संबद्ध प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाए जा सकते हैं और यदि उपयोग में लाए जाते हैं तो पर्याप्त होंगे ।
1. प्रत्येक उच्च न्यायालय राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से निम्नलिखित के बारे में नियम बना सकेगा :-
क. वे व्यक्ति जो उसके अधीनस्थ दंड न्यायालयों में अर्जी लेखकों के रूप में काम करने के लिए अनुज्ञात किए जा सकेंगे;
ख. ऐसे व्यक्तियों को अनुज्ञप्ति दिए जाने, उनके द्वारा काम काज करने और उनके द्वारा ली जाने वाली फीसों के मापमान का विनियमन ;
ग. इस प्रकार बनाए गए नियमों में से किसी के उल्लंघन के लिए शास्ति उपबंधित करना और वह प्राधिकारी, जिसके द्वारा ऐसे उल्लंघन का अन्वेषण किया जा सकेगा और शास्तियां अधिरोपित की जा सकेंगी, अवधारित करना;
घ. कोई अन्य विषय जिसका राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा उपबंधित किया जाना अपेक्षित है या किया जाए ।
2. इस धारा के अधीन बनाए गए सब नियम राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे ।
यदि किसी राज्य का विधान मंडल संकल्प द्वारा ऐसी अनुज्ञा देता है तो राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात्, अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि धारा 127, धारा 128, धारा 129 धारा 164 और धारा 166 में किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह किसी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के प्रति निर्देश है ।
कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट किसी ऐसे मामले का, जिसमें वह पक्षकार है, या वैयक्तिक रूप से हितबद्ध है, उस न्यायालय की अनुज्ञा के बिना, जिसमें उसके न्यायालय से अपील होती है, न तो विचारण करेगा और न उसे विचारणार्थ सुपुर्द करेगा और न कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट अपने द्वारा पारित या किए गए किसी निर्णय या आदेश की अपील ही सुनेगा ।
कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट किसी मामले में केवल इस कारण से कि वह उससे सार्वजनिक हैसियत में संबद्ध है या केवल इस कारण से कि उसने उस स्थान का, जिसमें अपराध का होना अभिकथित है, या किसी अन्य स्थान का, जिसमें मामले के लिए महत्वपूर्ण किसी अन्य संव्यवहार का होना अभिकथित है, अवलोकन किया है और उस मामले के संबंध में जांच की है इस धारा के अर्थ में पक्षकार या वैयक्तिक रूप से हितबद्ध न समझा जाएगा
कोई अधिवक्ता, जो किसी मजिस्ट्रेट के न्यायालय में विधि-व्यवसाय करता है, उस न्यायालय में या उस न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता के अन्दर किसी न्यायालय में मजिस्ट्रेट के तौर पर न बैठेगा ।
कोई लोक सेवक, जिसे इस संहिता के अधीन संपत्ति के विक्रय के बारे में किसी कर्तव्य का पालन करना है, उस संपत्ति का न तो क्रय करेगा और न उसके लिए बोली लगाएगा ।
इस संहिता की कोई बात उच्च न्यायालय की ऐसे आदेश देने की अन्तर्निहित शक्ति को सीमित या प्रभावित करने वाली न समझी जाएगी जैसे इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिए या किसी न्यायालय की कार्यवाही का दुरुपयोग निवारित करने के लिए या किसी अन्य प्रकार से न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हों ।
प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ सेशन न्यायालयों और न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर अपने अधीक्षण का प्रयोग इस प्रकार करेगा जिससे यह सुनिश्चित हो जाए कि ऐसे न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों का निपटारा शीघ्र और उचित रूप से किया जाता है ।
इस संहिता के अधीन सभी विचारण और कार्यवाहियां, जिसके अंतर्गत
i. समन और वारंट को जारी करना, तामील करना और निष्पादन करना;
ii. शिकायतकर्ता और साक्षियों की परीक्षा ;
iii. जांच और विचारणों में साक्ष्य अभिलिखित करना; और
iv. सभी अपीलीय कार्यवाहियों या कोई अन्य कार्यवाही, इलैक्ट्रानिक संसूचना के उपयोग या श्रव्य दृश्य इलैक्ट्रानिक साधनों के उपयोग द्वारा इलैक्ट्रानिक पद्धति में की जा सकेंगी ।
1. दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) इसके द्वारा निरसित की जाती है ।
2. ऐसे निरसन के होते हुए भी यह है कि,
क. यदि उस तारीख के जिसको यह संहिता प्रवृत्त हो, ठीक पूर्व कोई अपील, आवेदन, विचारण, जांच या अन्वेषण लंबित हो तो ऐसी अपील, आवेदन, विचारण, जांच या अन्वेषण को ऐसे प्रारंभ के ठीक पूर्व यथा प्रवृत्त दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के (जिसे इसमें इसके पश्चात् उक्त संहिता कहा गया है) उपबंधों के अनुसार, यथास्थिति, ऐसे निपटाया जाएगा, चालू रखा जाएगा या किया जाएगा मानो यह संहिता प्रवृत्त न हुई हो ;
ख. उक्त संहिता के अधीन प्रकाशित सभी अधिसूचनाएं जारी की गई सभी उद्घोषणाएं, प्रदत्त सभी शक्तियां, नियमों द्वारा उपबंधित प्ररूप, परिनिश्चित सभी स्थानीय अधिकारिताएं दिए गए सभी दंडादेश किए गए सभी आदेश, नियम और ऐसी नियुक्तियां, जो विशेष मजिस्ट्रेटों के रूप में नियुक्तियां नहीं हैं और जो इस संहिता के प्रारंभ के तुरंत पूर्व प्रवर्तन में हैं, क्रमशः इस संहिता के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन प्रकाशित अधिसूचनाएं जारी की गई उद्घोषणाएं, प्रदत्त शक्तियां, विहित प्ररूप, परिनिश्चित स्थानीय अधिकारिताएं दिए गए दंडादेश और किए गए आदेश, नियम और नियुक्तियां समझी जाएंगी ;
ग. उक्त संहिता के अधीन दी गई किसी ऐसी मंजूरी या सम्मति के बारे में, जिसके अनुसरण में उस संहिता के अधीन कोई कार्यवाही प्रारंभ न की गई हो, यह समझा जाएगा कि वह इस संहिता के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन दी गई है और ऐसी मंजूरी या सम्मति के अनुसरण में इस संहिता के अधीन कार्यवाहियां की जा सकेंगी ।
3. जहां उक्त संहिता के अधीन किसी आवेदन या अन्य कार्यवाही के लिए विहित अवधि इस संहिता के प्रारंभ पर या उसके पूर्व समाप्त हो गई हो, वहां इस संहिता की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह इस संहिता के अधीन ऐसे आवेदन के किए जाने या कार्यवाही के प्रारंभ किए जाने के लिए केवल इस कारण समर्थ करती है कि उसके लिए इस संहिता द्वारा दीर्घतर अवधि विनिर्दिष्ट की गई है या इस संहिता में समय बढ़ाने के लिए उपबंध किया गया है ।