धारा 379 से 391अध्याय 28 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

धारा 379 से 391अध्याय 28 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

अध्याय 28  

न्याय प्रशासन पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के बारे में उपबंध

379. धारा 215 में वर्णित मामलों में प्रक्रिया

1. जब किसी न्यायालय की, उससे इस निमित्त किए गए आवेदन पर या अन्यथा, यह राय है कि न्याय के हित में यह समीचीन है कि धारा 215 की उपधारा (1) के खंड () में निर्दिष्ट किसी अपराध की, जो उसे, यथास्थिति, उस न्यायालय की कार्यवाही में या उसके संबंध में या उस न्यायालय की कार्यवाही में पेश की गई या साक्ष्य में दिए गए दस्तावेज के बारे में किया हुआ प्रतीत होता है, जांच की जानी चाहिए तब ऐसा न्यायालय ऐसी प्रारंभिक जांच के पश्चात् यदि कोई हो, जैसी वह आवश्यक समझे, -

क. उस भाव का निष्कर्ष अभिलिखित कर सकता है ;

ख. उसका लिखित परिवाद कर सकता है ;

ग. उसे अधिकारिता रखने वाले प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को भेज सकता है ;

घ. ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष अभियुक्त के हाजिर होने के लिए पर्याप्त प्रतिभूति ले सकता है या यदि अभिकथित अपराध अजमानतीय है और न्यायालय ऐसा करना आवश्यक समझता है तो, अभियुक्त को ऐसे मजिस्ट्रेट के पास अभिरक्षा में भेज सकता है; और

ङ. ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होने और साक्ष्य देने के लिए किसी व्यक्ति को आबद्ध कर सकता है

2. किसी अपराध के बारे में न्यायालय को उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग, ऐसे मामले में जिसमें उस न्यायालय ने उपधारा (1) के अधीन उस अपराध के बारे में तो परिवाद किया है और ऐसे परिवाद के किए जाने के लिए आवेदन को नामंजूर किया है, उस न्यायालय द्वारा किया जा सकता है जिसके ऐसा पूर्वकथित न्यायालय धारा 215 की उपधारा (4) के अर्थ में अधीनस्थ है।

3. इस धारा के अधीन किए गए परिवाद पर हस्ताक्षर,—

क. जहां परिवाद करने वाला न्यायालय उच्च न्यायालय है वहां उस न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा किए जाएंगे, जिसे वह न्यायालय नियुक्त करे ;

ख. किसी अन्य मामले में, न्यायालय के पीठासीन अधिकारी द्वारा या न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा, जिसे न्यायालय इस निमित्त लिखित में प्राधिकृत करे, किए जाएंगे

4. इस धारा मेंन्यायालयका वही अर्थ है जो धारा 215 में है

380. अपील

1. कोई व्यक्ति, जिसके आवेदन पर उच्च न्यायालय से भिन्न किसी न्यायालय ने धारा 379 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन परिवाद करने से इंकार कर दिया है या जिसके विरुद्ध ऐसा परिवाद ऐसे न्यायालय द्वारा किया गया है, उस न्यायालय में अपील कर सकता है, जिसके ऐसा पूर्वकथित न्यायालय धारा 215 की उपधारा (4) के अर्थ में अधीनस्थ है और तब वरिष्ठ न्यायालय संबद्ध पक्षकारों को सूचना देने के पश्चात्, यथास्थिति, उस परिवाद को वापस लेने का या वह परिवाद करने का जिसे ऐसा पूर्वकथित न्यायालय धारा 379 के अधीन कर सकता था, निदेश दे सकेगा और यदि वह ऐसा परिवाद करता है तो उस धारा के उपबंध तद्रुसार लागू होंगे

2. इस धारा के अधीन आदेश, और ऐसे आदेश के अधीन रहते हुए धारा 379 के अधीन आदेश, अंतिम होगा और उसका पुनरीक्षण नहीं किया जा सकेगा

381.खर्चे का आदेश देने की शक्ति

धारा 379 के अधीन परिवाद फाइल करने के लिए किए गए किसी आवेदन या धारा 380 के अधीन अपील के संबंध में कार्यवाही करने वाले किसी भी न्यायालय को खर्चे के बारे में ऐसा आदेश देने की शक्ति होगी, जो न्यायसंगत हो

382. जहां मजिस्ट्रेट संज्ञान करे वहां प्रक्रिया

1. वह मजिस्ट्रेट, जिससे कोई परिवाद धारा 379 या धारा 380 के अधीन किया जाता है, अध्याय 16 में किसी बात के होते हुए भी, जहां तक हो सके मामले में इस प्रकार कार्यवाही करने के लिए अग्रसर होगा, मानो वह पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित है

2. जहां ऐसे मजिस्ट्रेट के या किसी अन्य मजिस्ट्रेट के, जिसे मामला अंतरित किया गया है, ध्यान में यह बात लाई जाती है कि उस न्यायिक कार्यवाही में, जिससे वह मामला उत्पन्न हुआ है, किए गए विनिश्चय के विरुद्ध अपील लंबित है वहां वह, यदि ठीक समझता है तो, मामले की सुनवाई को किसी भी प्रक्रम पर तब तक के लिए स्थगित कर सकता है जब तक ऐसी अपील विनिश्चित हो जाए

383. मिथ्या साक्ष्य देने पर विचारण के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया

1. यदि किसी न्यायिक कार्यवाही को निपटाते हुए निर्णय या अंतिम आदेश देते समय कोई सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट यह राय व्यक्त करता है कि ऐसी कार्यवाही में उपस्थित होने वाले किसी साक्षी ने जानते हुए या जानबूझकर मिथ्या साक्ष्य दिया है या इस आशय से मिथ्या साक्ष्य गढ़ा है कि ऐसा साक्ष्य ऐसी कार्यवाही में प्रयुक्त किया जाए तो यदि उसका समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में यह आवश्यक और समीचीन है कि साक्षी का, यथास्थिति, मिथ्या साक्ष्य देने या गढ़ने के लिए संक्षेपतः विचारण किया जाना चाहिए तो वह ऐसे अपराध का संज्ञान कर सकेगा और अपराधी को ऐसा कारण दर्शित करने का कि क्यों उसे ऐसे अपराध के लिए दंडित किया जाए, उचित अवसर देने के पश्चात्, ऐसे अपराधी का संक्षेपतः विचारण कर सकेगा और उसे कारावास से जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दंडित कर सकेगा

2. ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय संक्षिप्त विचारणों के लिए विहित प्रक्रिया का यथासाध्य अनुसरण करेगा

3. जहां न्यायालय इस धारा के अधीन कार्यवाही करने के लिए अग्रसर नहीं होता है वहां इस धारा की कोई बात, अपराध के लिए धारा 379 के अधीन परिवाद करने की उस न्यायालय की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी

4. जहां, उपधारा (1) के अधीन किसी कार्यवाही के प्रारंभ किए जाने के पश्चात्, सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत कराया जाता है कि उस निर्णय या आदेश के विरुद्ध जिसमें उस उपधारा में निर्दिष्ट राय अभिव्यक्त की गई है अपील या पुनरीक्षण के लिए आवेदन किया गया है वहां वह, यथास्थिति, अपील या पुनरीक्षण के आवेदन के निपटाए जाने तक आगे विचारण की कार्यवाहियों को रोक देगा और तब आगे विचारण की कार्यवाहियां अपील या पुनरीक्षण के आवेदन के परिणामों के अनुसार होंगी

384. अवमान के कुछ मामलों में प्रक्रिया

1. जब कोई ऐसा अपराध, जैसा भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 210, धारा 213, धारा 214, धारा 215 या धारा 267 में वर्णित है, किसी सिविल, दंड या राजस्व न्यायालय की दृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किया जाता है तब न्यायालय अभियुक्त को अभिरक्षा में निरुद्ध करा सकता है और उसी दिन न्यायालय के उठने के पूर्व किसी समय, अपराध का संज्ञान कर सकता है और अपराधी को ऐसा कारण दर्शित करने का, कि क्यों उसे इस धारा के अधीन दंडित किया जाए, उचित अवसर देने के पश्चात् अपराधी को एक हजार रुपए से अनधिक जुर्माने का और जुर्माना देने में व्यतिक्रम होने पर एक मास तक की अवधि के लिए, जब तक कि ऐसा जुर्माना उससे पूर्वतर दे दिया जाए, सादा कारावास का दंडादेश दे सकता है

2. ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय वे तथ्य जिनसे अपराध बनता है, अपराधी द्वारा किए गए कथन के (यदि कोई हो) सहित तथा निष्कर्ष और दंडादेश भी अभिलिखित करेगा

3. यदि अपराध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 267 के अधीन है तो अभिलेख में यह दर्शित होगा कि जिस न्यायालय के कार्य में विघ्न डाला गया था या जिसका अपमान किया गया था, उसकी बैठक किस प्रकार की न्यायिक कार्यवाही के संबंध में और उसके किस प्रक्रम पर हो रही थी और किस प्रकार का विघ्न डाला गया या अपमान किया गया था

385. जहां न्यायालय का विचार है कि मामले में धारा 384 के अधीन कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए वहां प्रक्रिया

1. यदि किसी मामले में न्यायालय का यह विचार है कि धारा 384 में निर्दिष्ट और उसकी दृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किए गए अपराधों में से किसी के लिए अभियुक्त व्यक्ति जुर्माना देने में व्यतिक्रम करने से अन्यथा कारावासित किया जाना चाहिए या उस पर दो सौ रुपए से अधिक जुर्माना अधिरोपित किया जाना चाहिए या किसी अन्य कारण से उस न्यायालय की यह राय है कि मामला धारा 384 के अधीन नहीं निपटाया जाना चाहिए तो वह न्यायालय उन तथ्यों को जिनसे अपराध बनता है और अभियुक्त के कथन को इसमें इसके पूर्व उपबंधित प्रकार से अभिलिखित करने के पश्चात्, मामला उसका विचारण करने की अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को भेज सकेगा और ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसे व्यक्ति की हाजिरी के लिए प्रतिभूति दी जाने की अपेक्षा कर सकेगा, या यदि पर्याप्त प्रतिभूति दी जाए तो ऐसे व्यक्ति को अभिरक्षा में ऐसे मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा

2. वह मजिस्ट्रेट, जिसे कोई मामला इस धारा के अधीन भेजा जाता है, जहां तक हो सके इस प्रकार कार्यवाही करने के लिए अग्रसर होगा मानो वह मामला पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित है

386. रजिस्ट्रार या उप रजिस्ट्रार  कब सिविल न्यायालय समझा जाएगा

जब राज्य सरकार ऐसा निदेश दे तब कोई भी रजिस्ट्रार या कोई भी उप- रजिस्ट्रार, जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 के अधीन नियुक्त है, धारा 384 और 385 के अर्थ में सिविल न्यायालय समझा जाएगा

387. माफी मांगने पर अपराधी का उन्मोचन

जब किसी न्यायालय ने किसी अपराधी को कोई बात, जिसे करने की उससे विधिपूर्वक अपेक्षा की गई थी, करने से इंकार करने या उसे करने के लिए या साशय कोई अपमान करने या विघ्न डालने के लिए धारा 384 के अधीन दंडित किए जाने के लिए न्यायनिर्णीत किया है या धारा 385 के अधीन विचारण के लिए मजिस्ट्रेट के पास भेजा है, तब वह न्यायालय अपने आदेश या अपेक्षा के उसके द्वारा मान लिए जाने पर या उसके द्वारा ऐसे माफी मांगे जाने पर, जिससे न्यायालय का समाधान हो जाए, स्वविवेकानुसार अभियुक्त को उन्मोचित कर सकता है या दंड का परिहार कर सकता है

388. उत्तर देने या दस्तावेज पेश करने से इंकार करने  व्यक्ति को कारावास या उसकी सुपुर्दगी

यदि दंड न्यायालय के समक्ष कोई साक्षी या कोई व्यक्ति, जो किसी दस्तावेज या चीज को पेश करने के लिए बुलाया गया है, उन प्रश्नों का, जो उससे किए जाएं, उत्तर देने से या अपने कब्जे या शक्ति में की किसी दस्तावेज या चीज को, जिसे पेश करने की न्यायालय उससे अपेक्षा करे, पेश करने से इंकार करता है और ऐसे इंकार के लिए कोई उचित कारण पेश करने के लिए युक्तियुक्त अवसर दिए जाने पर ऐसा नहीं करता है तो ऐसा न्यायालय उन कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, उसे सात दिन से अनधिक की किसी अवधि के लिए सादा कारावास का दंडादेश दे सकेगा या पीठासीन मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश द्वारा हस्ताक्षरित वारण्ट द्वारा न्यायालय के किसी अधिकारी की अभिरक्षा के लिए सुपुर्द कर सकेगा, जब तक कि उस बीच ऐसा व्यक्ति अपनी परीक्षा की जाने और उत्तर देने के लिए या दस्तावेज या चीज पेश करने के लिए सहमत नहीं हो जाता है और उसके इंकार पर डटे रहने की दशा में उसके बारे में धारा 384 या धारा 385 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही की जा सकेग।

389. समन के पालन में साक्षी के हाजिर होने पर उसे दंडित करने के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया

1. यदि किसी दंड न्यायालय के समक्ष हाजिर होने के लिए समन किए जाने पर कोई साक्षी समन के पालन में किसी निश्चित स्थान और समय पर हाजिर होने के लिए विधिमान्य रूप से आबद्ध है और न्यायसंगत कारण के बिना, उस स्थान या समय पर हाजिर होने में उपेक्षा या हाजिर होने से इंकार करता है या उस स्थान से, जहां उसे हाजिर होना है, उस समय से पहले चला जाता है जिस समय चला जाना उसके लिए विधिपूर्ण है और जिस न्यायालय के समक्ष उस साक्षी को हाजिर होना है उसका समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में यह समीचीन है कि ऐसे साक्षी का संक्षेपतः विचारण किया जाए तो वह न्यायालय उस अपराध का संज्ञान कर  सकता है और अपराधी को इस बात का कारण दर्शित करने का कि क्यों उसे इस धारा के अधीन दंडित किया जाए अवसर देने के पश्चात् उसे पांच सौ रुपए से अनधिक जुर्माने का दंडादेश दे सकता है

2. ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय उस प्रक्रिया का यथासाध्य अनुसरण करेगा जो संक्षिप्त विचारणों के लिए विहित है

390.धारा 383, धारा  384, धारा 388 और धारा 389 के अधीन दोषसिद्धियों से अपीलें

उच्च न्यायालय से भिन्न किसी न्यायालय द्वारा धारा 383, धारा 384, धारा 388 या धारा 389 के अधीन दंडादिष्ट कोई व्यक्ति, इस संहिता में किसी बात के होते भी, उस न्यायालय में अपील कर सकता है जिसमें ऐसे न्यायालय द्वारा दी गई हुए डिक्रियों या आदेशों की अपील मामूली तौर पर होती है

अध्याय 31 के उपबंध, जहां तक वे लागू हो सकते हैं, इस धारा के अधीन अपीलों को लागू होंगे, और अपील न्यायालय निष्कर्ष को परिवर्तित कर सकता है या उलट सकता है या उस दंड को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, कम कर सकता है या उलट सकता है।

लघुवाद न्यायालय द्वारा की गई ऐसी दोषसिद्धि की अपील उस सेशन खंड के सेशन न्यायालय में होगी जिस खंड में वह न्यायालय स्थित है

धारा 386 के अधीन जारी किए गए निदेश के आधार पर सिविल न्यायालय समझे गए किसी रजिस्ट्रार या उप रजिस्ट्रार द्वारा की गई ऐसी दोषसिद्धि से अपील उस सेशन खंड के सेशन न्यायालय में होगी जिस खंड में ऐसे रजिस्ट्रार या उप रजिस्ट्रार का कार्यालय स्थित है

391.कुछ न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों के समक्ष किए गए अपराधों का उनके द्वारा विचारण किया जाना

धारा 383, धारा 384, धारा 388 और धारा 389 में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, (उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से भिन्न ) दंड न्यायालय का कोई भी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट धारा 215 में निर्दिष्ट किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति का विचारण उस दशा में नहीं करेगा, जब वह अपराध उसके समक्ष या उसके प्राधिकार का अवमान करके किया गया है या किसी न्यायिक कार्यवाही के दौरान ऐसे न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की हैसियत में उसके ध्यान में लाया गया है

Free Judiciary Coaching
Free Judiciary Notes
Free Judiciary Mock Tests
Bare Acts