
जहां किसी न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उसके समक्ष लंबित मामले में किसी अधिनियम, अध्यादेश या विनियम की या किसी अधिनियम, अध्यादेश या विनियम में अन्तर्विष्ट किसी उपबंध की विधिमान्यता के बारे में ऐसा प्रश्न अन्तर्ग्रस्त है, जिसका अवधारण उस मामले को निपटाने के लिए आवश्यक है, और उसकी यह राय है कि ऐसा अधिनियम, अध्यादेश, विनियम या उपबंध अविधिमान्य या अप्रवर्तनशील है। किन्तु उस उच्च न्यायालय द्वारा, जिसके वह न्यायालय अधीनस्थ है, या उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित नहीं किया गया है वहां न्यायालय अपनी राय और उसके कारणों को उल्लिखित करते हुए मामले का कथन तैयार करेगा और उसे उच्च न्यायालय के विनिश्चय के लिए निर्देशित करेगा ।
इस धारा में "विनियम" से साधारण खंड अधिनियम, 1897 में या किसी राज्य के साधारण खंड अधिनियम में यथापरिभाषित कोई विनियम अभिप्रेत है ।
2. यदि सेशन न्यायालय अपने समक्ष लंबित किसी मामले में, जिसे उपधारा (1) के उपबंध लागू नहीं होते हैं, ठीक समझता है तो वह ऐसे मामले की सुनवाई में उठने वाले किसी विधि - प्रश्न को उच्च न्यायालय के विनिश्चय के लिए निर्देशित कर सकता है ।
3. कोई न्यायालय, जो उच्च न्यायालय को उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन निर्देश करता है, उस पर उच्च न्यायालय का विनिश्चय होने तक, अभियुक्त को जेल को सुपुर्द कर सकता है या अपेक्षा किए जाने पर हाजिर होने के लिए जमानत पर छोड़ सकता है ।
1. जब कोई प्रश्न ऐसे निर्देशित किया जाता है तब उच्च न्यायालय उस पर ऐसा आदेश पारित करेगा जैसा वह ठीक समझे और उस आदेश की प्रतिलिपि उस न्यायालय को भिजवाएगा जिसके द्वारा वह निर्देश किया गया था और वह न्यायालय उस मामले को उक्त आदेश के अनुरूप निपटाएगा ।
2. उच्च न्यायालय निर्देश दे सकता है कि ऐसे निर्देश का खर्चा कौन देगा ।
438. पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए अभिलेख मंगाना
1. उच्च न्यायालय या कोई सेशन न्यायाधीश अपनी स्थानीय अधिकारिता के अन्दर स्थित किसी अवर दंड न्यायालय के समक्ष की किसी कार्यवाही के अभिलेख को, किसी अभिलिखित या पारित किए गए निष्कर्ष, दंडादेश या आदेश की शुद्धता, वैधता या औचित्य के बारे में और ऐसे अवर न्यायालय की किन्हीं कार्यवाहियों की नियमितता के बारे में अपना समाधान करने के प्रयोजन से मंगा सकता है और उसकी परीक्षा कर सकता है और ऐसा अभिलेख मंगाते समय निदेश दे सकता है कि अभिलेख की परीक्षा लंबित रहने तक किसी दंडादेश का निष्पादन निलंबित किया जाए और यदि अभियुक्त परिरोध में है तो उसे उसके बंधपत्र या जमानतपत्र पर छोड़ दिया जाए ।
सभी मजिस्ट्रेट, चाहे वे कार्यपालक हों या न्यायिक और चाहे वे आरंभिक अधिकारिता का प्रयोग कर रहे हों, या अपीली अधिकारिता का, इस उपधारा के और धारा 439 के प्रयोजनों के लिए सेशन न्यायाधीश से अवर समझे जाएंगे ।
2. उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग किसी अपील, जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही में पारित किसी अंतर्वर्ती आदेश की बाबत नहीं किया जाएगा ।
3. यदि किसी व्यक्ति द्वारा इस धारा के अधीन आवेदन या तो उच्च न्यायालय को या सेशन न्यायाधीश को किया गया है तो उसी व्यक्ति द्वारा कोई और आवेदन उनमें से दूसरे के द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
किसी अभिलेख की धारा 438 के अधीन परीक्षा करने पर या अन्यथा उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को निदेश दे सकता है कि वह, ऐसे किसी परिवाद की, जो धारा 226 या धारा 227 की उपधारा (4) के अधीन खारिज कर दिया गया है, या किसी अपराध के अभियुक्त ऐसे व्यक्ति के मामले की, जो उन्मोचित कर दिया गया है, अतिरिक्त जांच स्वयं करे या अपने अधीनस्थ मजिस्ट्रेटों में से किसी के द्वारा कराए तथा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ऐसी अतिरिक्त जांच स्वयं कर सकता है या उसे करने के लिए अपने किसी अधीनस्थ मजिस्ट्रेट को निदेश दे सकता है :
परन्तु कोई न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति के मामले में, जो उन्मोचित कर दिया गया है, इस धारा के अधीन जांच करने का कोई निदेश तभी देगा जब इस बात का कारण दर्शित करने के लिए कि ऐसा निदेश क्यों नहीं दिया जाना चाहिए, ऐसे व्यक्ति को अवसर मिल चुका हो ।
1. ऐसी किसी कार्यवाही के मामले में जिसका अभिलेख सेशन न्यायाधीश ने स्वयं मंगवाया है, वह उन सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकता है जिनका प्रयोग धारा 442 की उपधारा (1) के अधीन उच्च न्यायालय कर सकता है ।
2. जहां सेशन न्यायाधीश के समक्ष पुनरीक्षण के रूप में कोई कार्यवाही उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई है वहां धारा 442 की उपधारा (2), उपधारा ( 3 ), उपधारा (4) और उपधारा (5) के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसी कार्यवाही को लागू होंगे और उक्त उपधाराओं में उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे सेशन न्यायाधीश के प्रति निर्देश हैं ।
3. जहां किसी व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से पुनरीक्षण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश के समक्ष किया जाता है वहां ऐसे व्यक्ति के संबंध में उस बाबत सेशन न्यायाधीश का विनिश्चय अन्तिम होगा और ऐसे व्यक्ति की प्रेरणा पर पुनरीक्षण के रूप में और कार्यवाही उच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय द्वारा ग्रहण नहीं की जाएगी
अपर सेशन न्यायाधीश को किसी ऐसे मामले के बारे में, जो सेशन न्यायाधीश के किसी साधारण या विशेष आदेश के द्वारा या अधीन उसे अंतरित किया जाता है, सेशन न्यायाधीश की इस अध्याय के अधीन सब शक्तियां प्राप्त होंगी और वह उनका प्रयोग कर सकता है।
1. ऐसी किसी कार्यवाही के मामले में, जिसका अभिलेख उच्च न्यायालय ने स्वयं मंगवाया है या जिसकी उसे अन्यथा जानकारी हुई है, वह धारा 427, धारा 430, धारा 431 और धारा 432 द्वारा अपील न्यायालय को या धारा 344 द्वारा सेशन न्यायालय को प्रदत्त शक्तियों में से किसी का स्वविवेकानुसार प्रयोग कर सकेगा और जब उन न्यायाधीशों, जो पुनरीक्षण न्यायालय में पीठासीन हैं, की राय समान रूप से विभाजित हो, तब मामले का निपटारा धारा 433 द्वारा उपबंधित रीति से किया जाएगा ।
2. इस धारा के अधीन कोई आदेश, जो अभियुक्त या अन्य व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक उसे अपनी प्रतिरक्षा में या तो स्वयं या अधिवक्ता द्वारा सुने जाने का अवसर न मिल चुका हो ।
3. इस धारा की कोई बात, उच्च न्यायालय को दोषमुक्ति के निष्कर्ष को दोषसिद्धि के निष्कर्ष में संपरिवर्तित करने के लिए प्राधिकृत करने वाली नहीं समझी जाएगी ।
4. जहां इस संहिता के अधीन कोई अपील होती है, किन्तु कोई अपील की नहीं जाती है, वहां उस पक्षकार की प्रेरणा पर, जो अपील कर सकता था, पुनरीक्षण की कोई कार्यवाही ग्रहण नहीं की जाएगी
5. जहां इस संहिता के अधीन कोई अपील होती है, किन्तु उच्च न्यायालय को किसी व्यक्ति द्वारा पुनरीक्षण के लिए आवेदन किया गया है और उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा आवेदन इस गलत विश्वास के आधार पर किया गया था कि उससे कोई अपील नहीं होती है और न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो उच्च न्यायालय पुनरीक्षण के लिए आवेदन को अपील की याचिका मान सकेगा और उस पर तदसार कार्यवाही कर सकेगा
1. जब एक ही विचारण में दोषसिद्ध एक या अधिक व्यक्ति पुनरीक्षण के लिए आवेदन उच्च न्यायालय को करते हैं और उसी विचारण में दोषसिद्ध कोई अन्य व्यक्ति पुनरीक्षण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश को करता है तब उच्च न्यायालय, पक्षकारों की सुविधा और अन्तर्ग्रस्त प्रश्नों के महत्व को ध्यान में रखते हुए यह विनिश्चय करेगा कि उन दोनों में से कौन सा न्यायालय पुनरीक्षण के लिए आवेदनों को अंतिम रूप से निपटाएगा और जब उच्च न्यायालय यह विनिश्चय करता है कि पुनरीक्षण के लिए सभी आवेदन उसी के द्वारा निपटाए जाने चाहिएं तब उच्च न्यायालय यह निदेश देगा कि सेशन न्यायाधीश के समक्ष लंबित पुनरीक्षण के लिए आवेदन उसे अन्तरित कर दिए जाएं और जहां उच्च न्यायालय यह विनिश्चय करता है कि पुनरीक्षण के आवेदन उसके द्वारा निपटाए जाने आवश्यक नहीं हैं वहां वह यह निदेश देगा कि उसे किए गए पुनरीक्षण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश को अन्तरित किए जाएं ।
2. जब कभी पुनरीक्षण के लिए आवेदन उच्च न्यायालय को अन्तरित किया जाता है तब वह न्यायालय उसे इस प्रकार निपटाएगा, मानो वह उसके समक्ष सम्यक् रूप से किया गया आवेदन है ।
3. जब कभी पुनरीक्षण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश को अन्तरित किया जाता है तब वह न्यायाधीश उसे इस प्रकार निपटाएगा, मानो वह उसके समक्ष सम्यक् रूप से किया गया आवेदन है ।
4. जहां पुनरीक्षण के लिए आवेदन उच्च न्यायालय द्वारा सेशन न्यायाधीश को अन्तरित किया जाता है वहां उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों की प्रेरणा पर जिनके पुनरीक्षण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश द्वारा निपटाए गए हैं पुनरीक्षण के लिए कोई और आवेदन उच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय में नहीं होगा ।
इस संहिता में अभिव्यक्त रूप से जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, जो न्यायालय अपनी पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग कर रहा है उसके समक्ष स्वयं या अधिवक्ता द्वारा सुने जाने का अधिकार किसी भी पक्षकार को नहीं है ; किन्तु यदि न्यायालय ठीक समझता है तो वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग करते समय किसी पक्षकार को स्वयं या उसके अधिवक्ता द्वारा सुन सकेगा ।
जब उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश द्वारा कोई मामला इस अध्याय के अधीन पुनरीक्षित किया जाता है तब वह धारा 429 द्वारा उपबंधित रीति से अपना विनिश्चय या आदेश प्रमाणित करके उस न्यायालय को भेजेगा, जिसके द्वारा पुनरीक्षित निष्कर्ष, दंडादेश या आदेश अभिलिखित किया गया या पारित किया गया था, और तब वह न्यायालय, जिसे विनिश्चय या आदेश ऐसे प्रमाणित करके भेजा गया है ऐसे आदेश करेगा, जो ऐसे प्रमाणित विनिश्चय के अनुरूप है और यदि आवश्यक हो तो अभिलेख में तद्रुसार संशोधन कर दिया जाएगा।