
इस अध्याय में,-
क. “निरुद्ध" के अन्तर्गत निवारक निरोध के लिए उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन निरुद्ध भी है ;
ख. “कारागार" के अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं,
i.कोई ऐसा स्थान जिसे राज्य सरकार ने, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, अतिरिक्त जेल घोषित किया है ;
ii. कोई सुधारालय, बोर्स्टल संस्था या इसी प्रकार की अन्य संस्था |
302.बन्दियों को हाजिर कराने की अपेक्षा करने की शक्ति
(1) जब कभी इस संहिता के अधीन किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के दौरान किसी दंड न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि-
क. कारागार में परिरुद्ध या निरुद्ध व्यक्ति को किसी अपराध के आरोप का उत्तर देने के लिए या उसके विरुद्ध किन्हीं कार्यवाहियों के प्रयोजन के लिए न्यायालय के समक्ष लाया जाना चाहिए ; या
ख. न्याय के उद्देश्यों के लिए यह आवश्यक है कि ऐसे व्यक्ति की साक्षी के रूप में परीक्षा की जाए, तब वह न्यायलय कारगार के भारसाधक अधिकारी से यह अपेक्षा करने वाला आदेश दे सकता है की वह ऐसे व्यक्ति को आरोप का उत्तर देने के लिए या ऐसी कार्यवाहियों के प्रयोजन के लिए या साक्ष्य देने के लिए न्यायालय के समक्ष पेश करे ।
2. जहां उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा दिया जाता है, वहां वह कारागार के भारसाधक अधिकारी को तब तक भेजा नहीं जाएगा या उसके द्वारा उस पर तब तक कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी जब तक वह ऐसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित न हो, जिसके अधीनस्थ वह मजिस्ट्रेट है ।
3. उपधारा (2) के अधीन प्रतिहस्ताक्षर के लिए पेश किए गए प्रत्येक आदेश के साथ ऐसे तथ्यों का, जिनसे मजिस्ट्रेट की राय में आदेश आवश्यक हो गया है, एक विवरण होगा और वह मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जिसके समक्ष वह पेश किया गया है उस विवरण पर विचार करने के पश्चात् आदेश पर प्रतिहस्ताक्षर करने से इंकार कर सकता है ।
303. धारा 302 के प्रवर्तन से कतिपय व्यक्तियों को अपवर्जित करने की राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार की शक्ति
1. राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार, उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट बातों को ध्यान में रखते हुए, किसी समय, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, यह निदेश दे सकती है कि किसी व्यक्ति को या किसी वर्ग के व्यक्तियों को उस कारागार से नहीं हटाया जाएगा जिसमें उसे या उन्हें परिरुद्ध या निरुद्ध किया गया है, और तब, जब तक ऐसा आदेश प्रवृत्त रहे, धारा 302 के अधीन दिया गया कोई आदेश चाहे वह राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार के आदेश के पूर्व किया गया हो या उसके पश्चात्, ऐसे व्यक्ति या ऐसे वर्ग के व्यक्तियों के बारे में प्रभावी न होगा ।
2. उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश देने के पूर्व, यथास्थिति, राज्य सरकार या जब मामला उसके केन्द्रीय अभिकरण द्वारा संस्थित है, तो केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित बातों का ध्यान रखेगी, अर्थात् :-
क. उस अपराध का स्वरूप जिसके लिए, या वे आधार, जिन पर, उस व्यक्ति को या उस वर्ग के व्यक्तियों को कारागार में परिरुद्ध या निरुद्ध करने का आदेश दिया गया है ;
ख. यदि उस व्यक्ति को या उस वर्ग के व्यक्तियों को कारागार से हटाने की अनुज्ञा दी जाए तो लोक व्यवस्था में विघ्न की संभाव्यता
ग. लोक हित, साधारणतः।
304. कारागार का भारसाधक अधिकारी कतिपय आकस्मिकताओं में आदेश को कार्यान्वित करना
जहां वह व्यक्ति, जिसके बारे में धारा 302 के अधीन कोई आदेश दिया गया है
क. बीमारी या अंगशैथिल्य के कारण कारागार से हटाए जाने के योग्य नहीं है; या
ख. विचारण के लिए सुपुर्दगी के अधीन है या विचारण के लंबित रहने तक के लिए या प्रारंभिक अन्वेषण तक के लिए प्रतिप्रेषणाधीन है ; या
ग. इतनी अवधि के लिए अभिरक्षा में है जितनी आदेश का अनुपालन करने के लिए और उस कारागार में जिसमें वह परिरुद्ध या निरुद्ध है, उसे वापस ले आने के लिए अपेक्षित समय के समाप्त होने के पूर्व समाप्त होती है; या
घ. ऐसा व्यक्ति है जिसे धारा 303 के अधीन राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार द्वारा दिया गया कोई आदेश लागू होता है,
वहां कारागार का भारसाधक अधिकारी न्यायालय के आदेश को कार्यान्वित नहीं करेगा और ऐसा न करने के कारणों का विवरण न्यायालय को भेजेगा :
परन्तु जहां ऐसे व्यक्ति से किसी ऐसे स्थान पर, जो कारागार से पच्चीस किलोमीटर से अधिक दूर नहीं है, साक्ष्य देने के लिए हाजिर होने की अपेक्षा की जाती है, वहां कारागार के भारसाधक अधिकारी के ऐसा न करने का कारण खंड (ख) में वर्णित कारण नहीं होगा ।
धारा 304 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कारागार का भारसाधक अधिकारी, धारा 302 की उपधारा (1) के अधीन दिए गए और जहां आवश्यक है, वहां उसकी उपधारा (2) के अधीन सम्यक् रूप से प्रतिहस्ताक्षरित आदेश के परिदान पर, आदेश में नामित व्यक्ति को ऐसे न्यायालय में, जिसमें उसकी हाजिरी अपेक्षित है, भिजवाएगा जिससे वह आदेश में उल्लिखित समय पर वहां उपस्थित हो सके, और उसे न्यायालय में या उसके पास अभिरक्षा में तब तक रखवाएगा जब तक उसकी परीक्षा न कर ली जाए या जब तक न्यायालय उसे उस कारागार को, जिसमें वह परिरुद्ध या निरुद्ध था, वापस ले जाए जाने के लिए प्राधिकृत न करे ।
कारागार में परिरुद्ध या निरुद्ध किसी व्यक्ति को साक्षी के रूप में परीक्षा के लिए धारा 319 के अधीन कमीशन जारी करने की न्यायालय की शक्ति पर इस अध्याय के उपबंधों का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा; और अध्याय 25 के भाग ख के उपबंध कारागार में ऐसे किसी व्यक्ति की कमीशन पर परीक्षा के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे किसी अन्य व्यक्ति की कमीशन पर परीक्षा के संबंध में लागू होते हैं।