
1. जब कभी उच्चतम न्यायालय को यह प्रतीत कराया जाता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए यह समीचीन है कि इस धारा के अधीन कोई आदेश किया जाए, तब वह निदेश दे सकेगा कि कोई विशिष्ट मामला या अपील एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय को या एक उच्च न्यायालय के अधीनस्थ दंड न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय के अधीनस्थ समान या वरिष्ठ अधिकारिता वाले दूसरे दंड न्यायालय को अन्तरित कर दी जाए ।
2. उच्चतम न्यायालय भारत के महान्यायवादी या हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर ही इस धारा के अधीन कार्य कर सकेगा और ऐसा प्रत्येक आवेदन समावेदन द्वारा किया जाएगा जो उस दशा के सिवाय, जब कि आवेदक भारत का महान्यायवादी या राज्य का महाधिवक्ता है, शपथपत्र या प्रतिज्ञान द्वारा समर्थित होगा ।
3. जहां इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए कोई आवेदन खारिज कर दिया जाता है वहां, यदि उच्चतम न्यायालय की यह राय है कि आवेदन तुच्छ या तंग करने वाला था तो वह आवेदक को आदेश दे सकेगा कि वह इतनी राशि, जितनी वह न्यायालय उस मामले की परिस्थितियों में समुचित समझे, प्रतिकर के तौर पर उस व्यक्ति को दे, जिसने आवेदन का विरोध किया था ।
1. जब कभी उच्च न्यायालय को यह प्रतीत कराया जाता है कि-
क. उसके अधीनस्थ किसी दंड न्यायालय में ऋजु और पक्षपातरहित जांच या विचारण नहीं हो सकेगा या
ख. किसी असाधारणतः कठिन विधिप्रश्न के उठने की संभाव्यता है; या
ग. इस धारा के अधीन कोई आदेश इस संहिता के किसी उपबंध द्वारा अपेक्षित है, या पक्षकारों या साक्षियों के लिए साधारणत: सुविधाप्रद होगा, या न्याय के उद्देश्यों के लिए समीचीन है, तब वह आदेश दे सकेगा कि-
I. किसी अपराध की जांच या विचारण ऐसे किसी न्यायालय द्वारा किया जाए जो धारा 197 से धारा 205 तक के (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं) अधीन तो अर्हित नहीं है किन्तु ऐसे अपराध की जांच या विचारण करने के लिए अन्यथा सक्षम है;
II. कोई विशिष्ट मामला या अपील या मामलों या अपीलों का वर्ग उसके प्राधिकार के अधीनस्थ किसी दंड न्यायालय से ऐसे समान वरिष्ठ अधिकारिता वाले किसी अन्य दंड न्यायालय को अंतरित कर दिया जाए;
III. कोई विशिष्ट मामला सेशन न्यायालय को विचारणार्थ सुपुर्द कर दिया जाए; या
IV.कोई विशिष्ट मामला या अपील स्वयं उसको अन्तरित कर दी जाए, और उसका विचारण उसके समक्ष किया जाए ।
2. उच्च न्यायालय निचले न्यायालय की रिपोर्ट पर, या हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर या स्वप्रेरणा पर कार्यवाही कर सकेगा :
परन्तु किसी मामले को एक ही सेशन खंड के एक दंड न्यायालय से दूसरे दंड न्यायालय को अन्तरित करने के लिए आवेदन उच्च न्यायालय से तभी किया जाएगा जब ऐसा अन्तरण करने के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश को कर दिया गया है और उसके द्वारा नामंजूर कर दिया गया है ।
3. उपधारा (1) के अधीन आदेश के लिए प्रत्येक आवेदन समावेदन द्वारा किया जाएगा, जो उस दशा के सिवाय, जब आवेदक राज्य का महाधिवक्ता हो, शपथपत्र या प्रतिज्ञान द्वारा समर्थित होगा ।
4. जब ऐसा आवेदन कोई अभियुक्त व्यक्ति करता है, तब उच्च न्यायालय उसे निदेश दे सकेगा कि वह किसी प्रतिकर के संदाय के लिए, जो उच्च न्यायालय उपधारा (7) के अधीन अधिनिर्णीत करे, बंधपत्र या जमानतपत्र निष्पादित करे ।
5. ऐसा आवेदन करने वाला प्रत्येक अभियुक्त व्यक्ति, लोक अभियोजक को आवेदन की लिखित सूचना उन आधारों की प्रतिलिपि के सहित देगा जिन पर वह किया गया है, और आवेदन के गुणागुण पर तब तक कोई आदेश नहीं किया जाएगा, जब तक ऐसी सूचना के दिए जाने और आवेदन की सुनवाई के बीच कम से कम चौबीस घंटे न बीत गए हों ।
6. जहां आवेदन किसी अधीनस्थ न्यायालय से कोई मामला या अपील अंतरित करने के लिए है, वहां यदि उच्च न्यायालय का समाधान हो जाता है कि ऐसा करना न्याय के हित में आवश्यक है, तो वह आदेश दे सकेगा कि जब तक आवेदन का निपटारा न हो जाए, तब तक के लिए अधीनस्थ न्यायालय की कार्यवाहियां, ऐसे निबंधनों पर, जिन्हें अधिरोपित करना उच्च न्यायालय ठीक समझे, रोक दी जाएंगी :
परन्तु ऐसी रोक धारा 346 के अधीन प्रतिप्रेषण की अधीनस्थ न्यायालयों की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी ।
7. जहां उपधारा (1) के अधीन आदेश देने के लिए आवेदन खारिज कर दिया जाता है वहां, यदि उच्च न्यायालय की यह राय है कि आवेदन तुच्छ या तंग करने वाला था तो, वह आवेदक को आदेश दे सकेगा कि ऐसी राशि, जो उस मामले की परिस्थितियों में वह समुचित समझे, प्रतिकर के तौर पर उस व्यक्ति को दे, जिसने आवेदन का विरोध किया था ।
8. जब उच्च न्यायालय किसी न्यायालय से किसी मामले का अन्तरण अपने समक्ष विचारण के लिए करने का उपधारा (1) के अधीन आदेश देता है तब वह ऐसे विचारण में उसी प्रक्रिया का अनुपालन करेगा, जिसका मामले का ऐसा अन्तरण न किए जाने की दशा में वह न्यायालय करता ।
9. इस धारा की कोई बात धारा 218 के अधीन सरकार के किसी आदेश पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी ।
448. मामलों और अपीलों को अन्तरित करने की सेशन न्यायाधीश की शक्ति
1. जब कभी सेशन न्यायाधीश को यह प्रतीत कराया जाता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए यह समीचीन है कि इस उपधारा के अधीन आदेश दिया जाए, तब वह आदेश दे सकेगा कि कोई विशिष्ट मामला उसके सेशन खंड में एक दंड न्यायालय से दूसरे दंड न्यायालय को अन्तरित कर दिया जाए ।
2. सेशन न्यायाधीश निचले न्यायालय की रिपोर्ट पर या किसी हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर या स्वप्रेरणा पर कार्रवाई कर सकेगा ।
3. धारा 447 की उपधारा (3), उपधारा (4), उपधारा ( 5 ), उपधारा (6) उपधारा (7) और उपधारा (9) के उपबंध उपधारा (1) के अधीन किसी आदेश के लिए सेशन न्यायाधीश को आवेदन के संबंध में वैसे ही लागू होंगे, जैसे वे धारा 447 की उपधारा (1) के अधीन आदेश के लिए उच्च न्यायालय को आवेदन के संबंध में लागू होते हैं, सिवाय इसके कि उस धारा की उपधारा ( 7 ) इस प्रकार लागू होगी, मानो उसमें आने वाले “राशि” शब्द के स्थान पर, "दस हजार रुपए से अनधिक की राशि" शब्द रख दिए गए हैं ।
1. सेशन न्यायाधीश अपने अधीनस्थ किसी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से कोई मामला या अपील वापस ले सकेगा या कोई मामला या अपील, जिसे उसने उसके हवाले किया हो, वापस मंगा सकेगा ।
2. अपर सेशन न्यायाधीश के समक्ष मामले का विचारण या अपील की सुनवाई प्रारंभ होने से पूर्व किसी समय सेशन न्यायाधीश किसी मामले या अपील को, जिसे उसने अपर सेशन न्यायाधीश के हवाले किया है, वापस मंगा सकेगा ।
3. जहां सेशन न्यायाधीश, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन कोई मामला या अपील वापस मंगाता है या वापस लेता है, वहां वह यथास्थिति, या तो उस मामले का अपने न्यायालय में विचारण कर सकेगा या उस अपील को स्वयं सुन सकेगा या उसे विचारण या सुनवाई के लिए इस संहिता के उपबंधों के अनुसार दूसरे न्यायालय के हवाले कर सकेगा ।
1. कोई मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट से किसी मामले को वापस ले सकेगा या किसी मामले को, जिसे उसने ऐसे मजिस्ट्रेट के हवाले किया है, वापस मंगा सकेगा और मामले की जांच या विचारण स्वयं कर सकेगा या उसे जांच या विचारण के लिए किसी अन्य ऐसे मजिस्ट्रेट को निर्देशित कर सकेगा, जो उसकी जांच या विचारण करने के लिए सक्षम है ।
2. कोई न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी मामले को, जो उसने धारा 212 की उपधारा (2) के अधीन किसी अन्य मजिस्ट्रेट के हवाले किया है, वापस मंगा सकेगा और ऐसे मामले की जांच या विचारण स्वयं कर सकेगा ।
कोई जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट, –
क. किसी ऐसी कार्यवाही को, जो उसके समक्ष आरंभ हो चुकी है, निपटाने के लिए अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट के हवाले कर सकेगा ;
ख. अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट से किसी मामले को वापस ले सकेगा या किसी मामले को, जिसे उसने ऐसे मजिस्ट्रेट के हवाले किया हो, वापस मंगा सकेगा और ऐसी कार्यवाही को स्वयं निपटा सकेगा या उसे निपटाने के लिए किसी अन्य मजिस्ट्रेट को निर्देशित कर सकेगा ।
452. कारणों का अभिलिखित किया जाना
धारा 448, धारा 449, धारा 450 या धारा 451 के अधीन आदेश करने वाला कोई सेशन न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट, ऐसा आदेश करने के अपने कारणों को अभिलिखित करेगा ।