
1. जिस व्यक्ति का किसी अपराध के लिए सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा एक बार विचारण किया जा चुका है और जो ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध या दोषमुक्त किया जा चुका है, वह पुनः जब तक ऐसी दोषसिद्धि या दोषमुक्ति प्रवृत्त रहती है तब तक न तो उसी अपराध के लिए विचारण का भागी होगा और न उन्हीं तथ्यों पर किसी ऐसे अन्य अपराध के लिए विचारण का भागी होगा जिसके लिए उसके विरुद्ध लगाए गए आरोप से भिन्न आरोप धारा 244 की उपधारा (1) के अधीन लगाया जा सकता था या जिसके लिए वह उसकी उपधारा (2) के अधीन दोषसिद्ध किया जा सकता था ।
2. किसी अपराध के लिए दोषमुक्त या दोषसिद्ध किए गए किसी व्यक्ति का विचारण, तत्पश्चात् राज्य सरकार की सम्मति से किसी ऐसे भिन्न अपराध के लिए किया जा सकता है जिसके लिए पूर्वगामी विचारण में उसके विरुद्ध धारा 243 की उपधारा (1) के अधीन पृथक् आरोप लगाया जा सकता था ।
3. जो व्यक्ति किसी ऐसे कार्य से बनने वाले किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, जो ऐसे परिणाम पैदा करता है जो उस कार्य से मिलकर उस अपराध से, जिसके लिए वह सिद्धदोष हुआ, भिन्न कोई अपराध बनाते हैं, उसका ऐसे अन्तिम वर्णित अपराध के लिए तत्पश्चात् विचारण किया जा सकता है, यदि उस समय जब वह दोषसिद्ध किया गया था वे परिणाम हुए नहीं थे या उनका होना न्यायालय को ज्ञात नहीं था ।
4. जो व्यक्ति किन्हीं कार्यों से बनने वाले किसी अपराध के लिए दोषमुक्त या दोषसिद्ध किया गया है, उस पर ऐसी दोषमुक्ति या दोषसिद्धि के होने पर भी, उन्हीं कार्यों से बनने वाले और उसके द्वारा किए गए किसी अन्य अपराध के लिए तत्पश्चात् आरोप लगाया जा सकता है और उसका विचारण किया जा सकता है, यदि वह न्यायालय, जिसके द्वारा पहले उसका विचारण किया गया था, उस अपराध के विचारण के लिए सक्षम नहीं था जिसके लिए बाद में उस पर आरोप लगाया जाता है ।
5. धारा 281 के अधीन उन्मोचित किए गए व्यक्ति का उसी अपराध के लिए पुन: विचारण उस न्यायालय की, जिसके द्वारा वह उन्मोचित किया गया था, या अन्य किसी ऐसे न्यायालय की, जिसके प्रथम वर्णित न्यायालय अधीनस्थ है, सम्मति के बिना नहीं किया जाएगा ।
6. इस धारा की कोई बात साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 26 के या इस संहिता की धारा 208 के उपबंधों पर प्रभाव नहीं डालेगी ।
परिवाद का खारिज किया जाना या अभियुक्त का उन्मोचन इस धारा के प्रयोजन के लिए दोषमुक्ति नहीं है ।
(क). क का विचारण सेवक की हैसियत में चोरी करने के आरोप पर किया जाता है और वह दोषमुक्त कर दिया जाता है । जब तक दोषमुक्ति प्रवृत्त रहे, उस पर सेवक के रूप में चोरी के लिए या उन्हीं तथ्यों पर केवल चोरी के लिए या आपराधिक न्यास-भंग के लिए बाद में आरोप नहीं लगाया जा सकता ।
(ख). घोर उपहति कारित करने के लिए क का विचारण किया जाता है और वह दोषसिद्ध किया जाता है । क्षत व्यक्ति तत्पश्चात् मर जाता है । आपराधिक मानववध के लिए क का पुन: विचारण किया जा सकेगा ।
(ग). ख के आपराधिक मानववध के लिए क पर सेशन न्यायालय के समक्ष आरोप लगाया जाता है और वह दोषसिद्ध किया जाता है । ख की हत्या के लिए क का उन्हीं तथ्यों पर तत्पश्चात् विचारण नहीं किया जा सकेगा ।
(घ). ख को स्वेच्छा से उपहति कारित करने के लिए क पर प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा आरोप लगाया जाता है और वह दोषसिद्ध किया जाता है । ख को स्वेच्छा से घोर उपहति कारित करने के लिए क का उन्हीं तथ्यों पर तत्पश्चात् विचारण नहीं किया जा सकेगा जब तक कि मामला इस धारा की उपधारा ( 3 ) के भीतर न आए ।
(ङ). ख के शरीर से सम्पत्ति की चोरी करने के लिए क पर द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा आरोप लगाया जाता है और वह दोषसिद्ध किया जाता है । उन्हीं तथ्यों पर तत्पश्चात् क पर लूट का आरोप लगाया जा सकेगा और उसका विचारण किया जा सकेगा ।
(च). घ को लूटने के लिए क, ख और ग पर प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा आरोप लगाया जाता है और वे दोषसिद्ध किए जाते हैं । डकैती के लिए उन्हीं तथ्यों पर तत्पश्चात् क, ख और ग पर आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण किया जा सकेगा ।
338. लोक अभियोजकों द्वारा हाजिरी
1. किसी मामले का भारसाधक लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक किसी न्यायालय में, जिसमें वह मामला जांच, विचारण या अपील के अधीन है, किसी लिखित प्राधिकार के बिना हाजिर हो सकता है और अभिवचन कर सकता है ।
2. किसी ऐसे मामले में यदि कोई प्राइवेट व्यक्ति किसी न्यायालय में किसी व्यक्ति को अभियोजित करने के लिए किसी अधिवक्ता को अनुदेश देता है तो मामले का भारसाधक लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक अभियोजन का संचालन करेगा और ऐसे अनुदिष्ट अधिवक्ता उसमें लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक के निदेश के अधीन कार्य करेगा और न्यायालय की अनुज्ञा से उस मामले में साक्ष्य की समाप्ति पर लिखित रूप में तर्क पेश कर सकेगा ।
1. किसी मामले की जांच या विचारण करने वाला कोई मजिस्ट्रेट निरीक्षक की पंक्ति से नीचे के पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी भी व्यक्ति द्वारा अभियोजन के संचालित किए जाने की अनुज्ञा दे सकता है; किन्तु महाधिवक्ता या सरकारी अधिवक्ता या लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक से भिन्न कोई व्यक्ति ऐसी अनुज्ञा के बिना ऐसा करने का हकदार न होगा :
परन्तु यदि पुलिस के किसी अधिकारी ने उस अपराध के अन्वेषण में, जिसके बारे में अभियुक्त का अभियोजन किया जा रहा है, भाग लिया है तो अभियोजन का संचालन करने की उसे अनुज्ञा नहीं दी जाएगी ।
2. अभियोजन का संचालन करने वाला कोई व्यक्ति स्वयं या अधिवक्ता द्वारा ऐसा कर सकता है ।
जो व्यक्ति दंड न्यायालय के समक्ष अपराध के लिए अभियुक्त है या जिसके विरुद्ध इस संहिता के अधीन कार्यवाहियां संस्थित की गई हैं, उसका यह अधिकार होगा कि उसकी पसंद के अधिवक्ता द्वारा उसकी प्रतिरक्षा की जाए ।
1. जहां न्यायालय के समक्ष किसी विचारण या अपील में, अभियुक्त का प्रतिनिधित्व किसी अधिवक्ता द्वारा नहीं किया जाता है और जहां न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त के पास किसी अधिवक्ता को नियुक्त करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं है, वहां न्यायालय उसकी प्रतिरक्षा के लिए राज्य के व्यय पर अधिवक्ता नियत करेगा
2. राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से उच्च न्यायालय-
क. उपधारा (1) के अधीन प्रतिरक्षा के लिए अधिवक्ताओं के चयन के ढंग काः
ख. ऐसे अधिवक्ताओं को न्यायालयों द्वारा अनुज्ञात की जाने वाली सुविधाओं काः
ग. ऐसे अधिवक्ताओं को सरकार द्वारा संदेय फीसों का और साधारणतः उपधारा (1) के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, उपबंध करने वाले नियम बना सकता है ।
3. राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकती है कि उस तारीख से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, उपधारा ( 1 ) और (2) के उपबंध राज्य के अन्य न्यायालयों के समक्ष किसी वर्ग के विचारणों के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे सेशन न्यायालय के समक्ष विचारणों के संबंध में लागू होते हैं ।
342. प्रक्रिया, जब निगम या रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी अभियुक्त है
1. इस धारा में “निगम” से कोई निगमित कम्पनी या अन्य निगमित निकाय अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी भी है ।
2. जहां कोई निगम किसी जांच या विचारण में अभियुक्त व्यक्ति या अभियुक्त व्यक्तियों में से एक है वहां वह ऐसी जांच या विचारण के प्रयोजनार्थ एक प्रतिनिधि नियुक्त कर सकता है और ऐसी नियुक्ति निगम की मुद्रा के अधीन करना आवश्यक नहीं होगा |
3. जहां निगम का कोई प्रतिनिधि हाजिर होता है, वहां इस संहिता की इस अपेक्षा का कि कोई बात अभियुक्त की हाजिरी में की जाएगी या अभियुक्त को पढ़कर सुनाई जाएगी या बताई जाएगी या समझाई जाएगी, इस अपेक्षा के रूप में अर्थ लगाया जाएगा कि, वह बात प्रतिनिधि की हाजिरी में की जाएगी, प्रतिनिधि को पढ़कर सुनाई जाएगी या बताई जाएगी या समझाई जाएगी और किसी ऐसी अपेक्षा का कि अभियुक्त की परीक्षा की जाएगी, इस अपेक्षा के रूप में अर्थ लगाया जाएगा कि प्रतिनिधि की परीक्षा की जाएगी
4. जहां निगम का कोई प्रतिनिधि हाजिर नहीं होता है, वहां कोई ऐसी अपेक्षा, जो उपधारा (3) में निर्दिष्ट है, लागू नहीं होगी ।
5. जहां निगम के प्रबंध निदेशक द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा ( वह चाहे जिस नाम से पुकारा जाता हो ) जो निगम के कार्यकलाप का प्रबंध करता है या प्रबंध करने वाले व्यक्तियों में से एक है, हस्ताक्षर किया गया तात्पर्यित इस भाव का लिखित कथन फाइल किया जाता है कि कथन में नामित व्यक्ति को इस धारा के प्रयोजनों के लिए निगम के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया है, वहां न्यायालय, जब तक इसके प्रतिकूल साबित नहीं किया जाता है, यह उपधारणा करेगा कि ऐसा व्यक्ति इस प्रकार नियुक्त किया गया है ।
6. यदि यह प्रश्न उठता है कि न्यायालय के समक्ष किसी जांच या विचारण में निगम के प्रतिनिधि के रूप में हाजिर होने वाला कोई व्यक्ति ऐसा प्रतिनिधि है या नहीं, तो उस प्रश्न का अवधारण न्यायालय द्वारा किया जाएगा ।
1. किसी ऐसे अपराध से, जिसे यह धारा लागू होती है, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में संबद्ध या संसर्गित समझे जाने वाले किसी व्यक्ति का साक्ष्य अभिप्राप्त करने की दृष्टि से, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अपराध के अन्वेषण या जांच या विचारण के किसी प्रक्रम में, और अपराध की जांच या विचारण करने वाला प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट जांच या विचारण के किसी प्रक्रम में उस व्यक्ति को इस शर्त पर क्षमा- दान कर सकता है कि वह अपराध के संबंध में और उसके किए जाने में चाहे कर्ता या दुष्प्रेरक के रूप में संबद्ध प्रत्येक अन्य व्यक्ति के संबंध में सब परिस्थितियों का, जिनकी उसे जानकारी हो, पूर्ण और सत्य प्रकटन कर दे ।
2. यह धारा निम्नलिखित को लागू होती है :-
क. अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीश के न्यायालय द्वारा विचारणीय कोई अपराध ;
ख. ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो या अधिक कठोर दंड से दंडनीय कोई अपराध ।
3. प्रत्येक मजिस्ट्रेट, जो उपधारा (1) के अधीन क्षमा-दान करता है, -
क. ऐसा करने के अपने कारणों को अभिलिखित करेगा ;
ख. यह अभिलिखित करेगा कि क्षमा- दान उस व्यक्ति द्वारा, जिसको कि वह किया गया था स्वीकार कर लिया गया था या नहीं, और अभियुक्त द्वारा आवेदन किए जाने पर उसे ऐसे अभिलेख की प्रतिलिपि निःशुल्क देगा |
4. उपधारा (1) के अधीन क्षमा- दान स्वीकार करने वाले-
क. प्रत्येक व्यक्ति के अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय में और पश्चात्वर्ती विचारण में यदि कोई हो, साक्षी के रूप में परीक्षा की जाएगी ;
ख.प्रत्येक व्यक्ति को, जब तक कि वह पहले से ही जमानत पर न हो, विचारण खत्म होने तक अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाएगा ।
5. जहां किसी व्यक्ति ने उपधारा (1) के अधीन किया गया क्षमा-दान स्वीकार कर लिया है और उसकी उपधारा (4) के अधीन परीक्षा की जा चुकी है, वहां अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट, मामले में कोई अतिरिक्त जांच किए बिना, –
क. मामले को
i. यदि अपराध अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है या यदि संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट है तो, उस न्यायालय को सुपुर्द कर देगा ;
ii. यदि अपराध अनन्यतः तत्समय प्रवृत्त अन्य विधि के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीश के न्यायालय द्वारा विचारणीय है तो उस न्यायालय को सुपुर्द कर देगा ;
ख. किसी अन्य दशा में, मामला मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के हवाले करेगा जो उसका विचारण स्वयं करेगा ।
मामले की सुपुर्दगी के पश्चात् किसी समय किन्तु निर्णय दिए जाने के पूर्व वह न्यायालय जिसे मामला सुपुर्द किया जाता है किसी ऐसे अपराध से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सम्बद्ध या संसर्गित समझे जाने वाले किसी व्यक्ति का साक्ष्य विचारण में अभिप्राप्त करने की दृष्टि से ऐसे व्यक्ति को उसी शर्त पर क्षमा दान कर सकता है ।
1. जहां ऐसे व्यक्ति के बारे में जिसने धारा 343 या धारा 344 के अधीन क्षमा-दान स्वीकार कर लिया है, लोक अभियोजक प्रमाणित करता है कि उसकी राय में ऐसे व्यक्ति ने या तो किसी अत्यावश्यक बात को जानबूझकर छिपा कर या मिथ्या साक्ष्य देकर उस शर्त का पालन नहीं किया है जिस पर क्षमा-दान किया गया था वहां ऐसे व्यक्ति का विचारण उस अपराध के लिए, जिसके बारे में ऐसे क्षमा-दान किया गया था या किसी अन्य अपराध के लिए, जिसका वह उस विषय के संबंध में दोषी प्रतीत होता है, और मिथ्या साक्ष्य के भी अपराध के लिए भी विचारण किया जा सकता है :
परन्तु ऐसे व्यक्ति का विचारण अन्य अभियुक्तों में से किसी के साथ संयुक्ततः नहीं किया जाएगा :
परन्तु यह और कि मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध के लिए ऐसे व्यक्ति का विचारण उच्च न्यायालय की मंजूरी के बिना नहीं किया जाएगा और धारा 215 या धारा 379 की कोई बात उस अपराध को लागू न होगी ।
2. क्षमा-दान स्वीकार करने वाले ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया और धारा 183 के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा या धारा 343 की उपधारा (4) के अधीन किसी न्यायालय द्वारा अभिलिखित कोई कथन ऐसे विचारण में उसके विरुद्ध साक्ष्य में दिया जा सकता है ।
3. ऐसे विचारण में अभियुक्त यह अभिवचन करने का हकदार होगा कि उसने उन शर्तों का पालन कर दिया है जिन पर उसे क्षमादान दिया गया था, और तब यह साबित करना अभियोजन का काम होगा कि ऐसी शर्त का पालन नहीं किया गया है ।
4. ऐसे विचारण के समय न्यायालय-
क. यदि वह सेशन न्यायालय है तो आरोप अभियुक्त को पढ़कर सुनाए जाने और समझाए जाने के पूर्व ;
ख. यदि वह मजिस्ट्रेट का न्यायालय है तो अभियोजन के साक्षियों का साक्ष्य लिए जाने के पूर्व, अभियुक्त से पूछेगा कि क्या वह यह अभिवचन करता है कि उसने उन शर्तों का पालन किया है जिन पर उसे क्षमादान दिया गया था ।
5. यदि अभियुक्त ऐसा अभिवचन करता है तो न्यायालय उस अभिवाक् को अभिलिखित करेगा और विचारण के लिए अग्रसर होगा और वह मामले में निर्णय देने के पूर्व इस विषय में निष्कर्ष निकालेगा कि अभियुक्त ने क्षमा की शर्तों का पालन किया है या नहीं ; और यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि उसने ऐसा पालन किया है तो वह इस संहिता में किसी बात के होते हुए भी, दोषमुक्ति का निर्णय देगा ।
1. प्रत्येक जांच या विचारण में कार्यवाहियां सभी हाजिर साक्षियों की परीक्षा हो जाने तक दिन-प्रतिदिन जारी रखी जाएंगी, जब तक कि ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, न्यायालय उन्हें अगले दिन से परे स्थगित करना आवश्यक न समझे :
परन्तु जब जांच या विचारण भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 70 या धारा 71 के अधीन किसी अपराध से संबंधित है, तब जांच या विचारण, यथासंभव आरोप पत्र फाइल किए जाने की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर पूरा किया जाएगा ।
2. यदि न्यायालय किसी अपराध का संज्ञान करने या विचारण के प्रारंभ होने के पश्चात् यह आवश्यक या उचित समझता है कि किसी जांच या विचारण का प्रारंभ करना मुल्तवी कर दिया जाए या उसे स्थगित कर दिया जाए तो वह, समय-समय पर, ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, ऐसे निबन्धनों पर, जैसे वह ठीक समझे, उतने समय के लिए जितना वह उचित समझे उसे मुल्तवी या स्थगित कर सकता है और यदि अभियुक्त अभिरक्षा में है तो उसे वारंट द्वारा प्रतिप्रेषित कर सकता है :
परन्तु कोई न्यायालय किसी अभियुक्त को इस धारा के अधीन एक समय में पन्द्रह दिन से अधिक की अवधि के लिए अभिरक्षा में प्रतिप्रेषित न करेगा :
परन्तु यह और कि जब साक्षी हाजिर हों तब उनकी परीक्षा किए बिना स्थगन या मुल्तवी करने की मंजूरी विशेष कारणों के बिना, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, नहीं दी जाएगी :
परन्तु यह भी कि कोई स्थगन केवल इस प्रयोजन के लिए नहीं मंजूर किया जाएगा कि वह अभियुक्त व्यक्ति को उस पर अधिरोपित किए जाने के लिए प्रस्थापित दंडादेश के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने में समर्थ बनाए :
परंतु यह भी कि-
क. कोई भी स्थगन किसी पक्षकार के अनुरोध पर तभी मंजूर किया जाएगा, जब परिस्थितियां उस पक्षकार के नियंत्रण से परे हों ;
ख. जहां परिस्थितियां पक्षकार के नियंत्रण से बाहर है, न्यायालय द्वारा अन्य पक्षकारों के आक्षेपों की सुनवाई के पश्चात् और ऐसे कारणों से जो अभिलिखित जाए, दो से अनधिक स्थगन प्रदान किया जा सकेगा;
ग. यह तथ्य कि पक्षकार का अधिवक्ता किसी अन्य न्यायालय में व्यस्त है, स्थगन के लिए आधार नहीं होगा ;
घ. जहां साक्षी न्यायालय में हाजिर है किंतु पक्षकार या उसका अधिवक्ता हाजिर नहीं है या पक्षकार या उसका अधिवक्ता न्यायालय में हाजिर तो है, किंतु साक्षी की परीक्षा या प्रतिपरीक्षा करने के लिए तैयार नहीं है वहां यदि न्यायालय ठीक समझता है तो वह साक्षी का कथन अभिलिखित कर सकेगा और ऐसे आदेश पारित कर सकेगा, जो, यथास्थिति, साक्षी की मुख्य परीक्षा या प्रतिपरीक्षा से छूट देने के लिए ठीक समझे ।
यदि यह संदेह करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है कि हो सकता है कि अभियुक्त ने अपराध किया है और यह संभाव्य प्रतीत होता है कि प्रतिप्रेषण करने पर अतिरिक्त साक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है तो यह प्रतिप्रेषण के लिए एक उचित कारण होगा ।
जिन निबंधनों पर कोई स्थगन या मुल्तवी करना मंजूर किया जा सकता है, उनके अन्तर्गत समुचित मामलों में अभियोजन या अभियुक्त द्वारा खर्चों का दिया जाना भी है |
1. कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के किसी प्रक्रम में, पक्षकारों को सम्यक् सूचना देने के पश्चात् किसी स्थान में, जिसमें अपराध का किया जाना अभिकथित है, या किसी अन्य स्थान में जा सकेगा और उसका निरीक्षण कर सकता है, जिसके बारे में उसकी राय है कि उसका अवलोकन ऐसी जांच या विचारण में दिए गए साक्ष्य का उचित विवेचन करने के प्रयोजन से आवश्यक है और ऐसे निरीक्षण में देखे गए किन्हीं सुसंगत तथ्यों का ज्ञापन, अनावश्यक विलम्ब के बिना, लेखबद्ध करेगा |
2. ऐसा ज्ञापन मामले के अभिलेख का भाग होगा और यदि अभियोजक, परिवादी या अभियुक्त या मामले का अन्य कोई पक्षकार ऐसा चाहे तो उसे ज्ञापन की प्रतिलिपि निःशुल्क दी जाएगी ।
कोई न्यायालय इस संहिता के अधीन किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के किसी प्रक्रम में किसी व्यक्ति को साक्षी के तौर पर समन कर सकता है या किसी ऐसे व्यक्ति की, जो हाजिर हो, यद्यपि वह साक्षी के रूप में समन न किया गया हो, परीक्षा कर सकता है, किसी व्यक्ति को, जिसकी पहले परीक्षा की जा चुकी है पुनः बुला सकता है और उसकी पुनः परीक्षा कर सकता है; और यदि न्यायालय को मामले के न्यायसंगत विनिश्चय के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य आवश्यक प्रतीत होता है तो वह ऐसे व्यक्ति को समन करेगा और उसकी परीक्षा करेगा या उसे पुनः बुलाएगा और उसकी पुनः परीक्षा करेगा ।
यदि प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट का यह समाधान हो जाता है कि इस संहिता के अधीन किसी अन्वेषण या कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति को, जिसके अन्तर्गत अभियुक्त व्यक्ति भी है, नमूना हस्ताक्षर या हस्तलेख या आवाज का सैंपल देने के लिए निर्देश देना समीचीन है, तो वह उस आशय का आदेश कर सकेगा और उस दशा में, वह व्यक्ति, जिससे आदेश संबंधित है, ऐसे आदेश में विनिर्दिष्ट समय और स्थान पर पेश किया जाएगा या वहां उपस्थित होगा और अपने नमूना हस्ताक्षर या हस्तलेख या आवाज का प्रतिदर्श देगा:
परन्तु इस धारा के अधीन कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक उस व्यक्ति को ऐसे अन्वेषण या कार्यवाही के संबंध में किसी समय गिरफ्तार न किया गया हो:
परंतु यह और कि मजिस्ट्रेट ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किए जाएं, किसी अन्य व्यक्ति को गिरफ्तार किए बिना ऐसा नमूना या प्रतिदर्श देने के लिए आदेश कर सकेगा ।
राज्य सरकार द्वारा बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, यदि कोई दंड न्यायालय ठीक समझता है तो वह ऐसे न्यायालय के समक्ष इस संहिता के अधीन किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के प्रयोजन से हाजिर होने वाले किसी परिवादी या साक्षी के उचित व्ययों के राज्य सरकार द्वारा दिए जाने के लिए आदेश दे सकता है ।
1. प्रत्येक जांच या विचारण में, इस प्रयोजन से कि अभियुक्त अपने विरुद्ध साक्ष्य में प्रकट होने वाली किन्हीं परिस्थितियों का स्वयं स्पष्टीकरण कर सके,
न्यायालय—
क. किसी प्रक्रम में, अभियुक्त को पहले से चेतावनी दिए बिना, उससे ऐसे प्रश्न कर सकता है जो न्यायालय आवश्यक समझे;
ख. अभियोजन के साक्षियों की परीक्षा किए जाने के पश्चात् और अभियुक्त से अपनी प्रतिरक्षा करने की अपेक्षा किए जाने के पूर्व उस मामले के बारे में उससे साधारणतया प्रश्न करेगा:
परन्तु किसी समन मामले में, जहां न्यायालय ने अभियुक्त को वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे दी है, वहां वह खंड (ख) के अधीन उसकी परीक्षा से भी अभिमुक्ति दे सकता है ।
2. जब अभियुक्त की उपधारा (1) के अधीन परीक्षा की जाती है तब उसे कोई शपथ न दिलाई जाएगी ।
3. अभियुक्त ऐसे प्रश्नों के उत्तर देने से इंकार करने से या उसके मिथ्या उत्तर देने से दंडनीय न हो जाएगा ।
4. अभियुक्त द्वारा दिए गए उत्तरों पर उस जांच या विचारण में विचार किया जा सकता है और किसी अन्य ऐसे अपराध की, जिसका उसके द्वारा किया जाना दर्शाने की उन उत्तरों की प्रवृत्ति हो, किसी अन्य जांच या विचारण में ऐसे उत्तरों को उसके पक्ष में या उसके विरुद्ध साक्ष्य के तौर पर रखा जा सकता है ।
5. न्यायालय ऐसे सुसंगत प्रश्न तैयार करने में, जो अभियुक्त से पूछे जाने हैं, अभियोजक और प्रतिरक्षा काउंसेल की सहायता ले सकेगा और न्यायालय इस धारा के पर्याप्त अनुपालन के रूप में अभियुक्त द्वारा लिखित कथन फाइल किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा ।
1. कार्यवाही का कोई पक्षकार, अपने साक्ष्य की समाप्ति के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संक्षिप्त मौखिक बहस कर सकता है और अपनी मौखिक बहस, यदि कोई हो, पूरी करने के पूर्व, न्यायालय को एक ज्ञापन दे सकता है जिसमें उसके पक्ष के समर्थन में तर्क संक्षेप में और सुभिन्न शीर्षकों में दिए जाएंगे, और ऐसा प्रत्येक ज्ञापन अभिलेख का भाग होगा ।
2. ऐसे प्रत्येक ज्ञापन की एक प्रतिलिपि उसी समय विरोधी पक्षकार को दी जाएगी ।
3. कार्यवाही का कोई स्थगन लिखित बहस फाइल करने के प्रयोजन के लिए तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक न्यायालय ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, ऐसा स्थगन मंजूर करना आवश्यक न समझे ।
4. यदि न्यायालय की यह राय है कि मौखिक बहस संक्षिप्त या सुसंगत नहीं है तो वह ऐसी बहसों को विनियमित कर सकता है ।
1. कोई व्यक्ति, जो किसी अपराध के लिए किसी दंड न्यायालय के समक्ष अभियुक्त है, प्रतिरक्षा के लिए सक्षम साक्षी होगा और अपने विरुद्ध या उसी विचारण में उसके साथ आरोपित किसी व्यक्ति के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को नासाबित करने के लिए शपथ पर साक्ष्य दे सकता है:
परन्तु -
क. वह स्वयं अपनी लिखित प्रार्थना के बिना साक्षी के रूप में नहीं बुलाया जाएगा,
ख. उसका स्वयं साक्ष्य न देना पक्षकारों में से किसी के द्वारा या न्यायालय द्वारा किसी टीका-टिप्पणी का विषय नहीं बनाया जाएगा और न ही उसे उसके, या उसी विचारण में उसके साथ आरोपित किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई उपधारणा ही की जाएगी ।
2. कोई व्यक्ति जिसके विरुद्ध किसी दंड न्यायालय में धारा 101 या धारा 126 या धारा 127 या धारा 128 या धारा 129 के अधीन या अध्याय 10 के अधीन या अध्याय 11 के भाग ख, भाग ग या भाग घ के अधीन कार्यवाहियां संस्थित की जाती हैं, ऐसी कार्यवाहियों में अपने आपको साक्षी के रूप में पेश कर सकता है :
परन्तु धारा 127, धारा 128 या धारा 129 के अधीन कार्यवाहियों में ऐसे व्यक्ति द्वारा साक्ष्य न देना पक्षकारों में से किसी के द्वारा या न्यायालय द्वारा किसी टीका-टिप्पणी का विषय नहीं बनाया जाएगा और न उससे उसके या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध जिसके विरुद्ध उसी जांच में ऐसे व्यक्ति के साथ कार्यवाही की गई है, कोई उपधारणा ही की जाएगी ।
धारा 343 और 344 में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, किसी वचन या धमकी द्वारा या अन्यथा कोई प्रभाव अभियुक्त व्यक्ति पर इस उद्देश्य से नहीं डाला जाएगा कि उसे अपनी जानकारी की किसी बात को प्रकट करने या न करने के लिए उत्प्रेरित किया जाए ।
1. इस संहिता के अधीन जांच या विचारण के किसी प्रक्रम में यदि न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट का उन कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएंगे, समाधान हो जाता है कि न्यायालय के समक्ष अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी न्याय के हित में आवश्यक नहीं है या अभियुक्त न्यायालय की कार्यवाही में बार-बार विघ्न डालता है तो, ऐसे अभियुक्त का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता द्वारा किए जाने की दशा में, वह न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट उसकी हाजिरी से उसे अभिमुक्ति दे सकता है और उसकी अनुपस्थिति में ऐसी जांच या विचारण करने के लिए अग्रसर हो सकता है और कार्यवाही के किसी पश्चात्वर्ती प्रक्रम में ऐसे अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी का निदेश दे सकता है ।
2. यदि ऐसे किसी मामले में अभियुक्त का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता द्वारा नहीं किया जा रहा है या यदि न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट का यह विचार है कि अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी आवश्यक है तो, यदि वह ठीक समझे तो उन कारणों से, जो उसके द्वारा लेखबद्ध किए जाएंगे, वह या तो ऐसी जांच या विचारण स्थगित कर सकता है या आदेश दे सकता है कि ऐसे अभियुक्त का मामला अलग से लिया जाए या विचारित किया जाए ।
इस धारा के प्रयोजनों के लिए अभियुक्त की वैयक्तिक उपस्थिति में श्रव्य-दृश्य साधनों के माध्यम से उपस्थिति भी सम्मिलित है ।
1. इस संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जब किसी व्यक्ति को उद्घोषित अपराधी घोषित किया जाता है, चाहे उस पर संयुक्त रूप से आरोप लगाया गया हो या नहीं, विचारण की वंचना करने के लिए करार है और उसे गिरफ्तार करने का कोई अव्यवहित पूर्वेक्षण नहीं है, इसे ऐसे व्यक्ति के उपस्थित होने और वैयक्तिक विचारण के अधिकार के अभित्याग के रूप में प्रवर्तित होना समझा जाएगा और न्यायालय ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किए जाएं न्याय हित में ऐसी रीति में और ऐसे प्रभाव के साथ, जैसे कि वह उपस्थित था, इस संहिता के अधीन विचारण के लिए अग्रसर होगा और निर्णय सुनाएगा:
परंतु न्यायालय तब तक विचारण प्रारंभ नहीं करेगा, जब तक कि आरोप की विरचना की तारीख से नब्बे दिन की अवधि की समाप्ति नहीं हो जाती है ।
2. न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि आगामी प्रक्रिया का उपधारा (1) के अधीन कार्यवाहियों से पहले अनुपालन किया गया है, अर्थात् :-
i. कम से कम तीस दिन के अंतराल पर लगातार दो गिरफ्तारी वारंटों को जारी करना;
ii. उद्घोषित अपराधी से विचारण के लिए न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने की अपेक्षा करते हुए और उसे सूचना देते हुए कि यदि वह ऐसे प्रकाशन की तारीख से तीस दिन के भीतर प्रस्तुत होने में असफल रहता है, तो उसकी अनुपस्थिति में विचारण किया जाएगा, उसके अंतिम ज्ञात निवास स्थान पर परिचालित राष्ट्रीय या स्थानीय दैनिक समाचार में प्रकाशन;
iii. उसके नातेदार या मित्र को विचारण के प्रारंभ होने के बारे में सूचना, यदि कोई हो; और
iv. उस गृह या वास स्थान, जिसमें ऐसा व्यक्ति मामूली तौर पर निवास करता है के किसी सहजदृश्य स्थान पर विचारण के प्रारंभ होने के बारे में सूचना चिपकाना और उसके अंतिम ज्ञात निवास के जिले के पुलिस स्टेशन में प्रदर्शन ।
3. जहां उद्घोषित अपराधी का किसी अधिवक्ता द्वारा प्रतिनिधित्व नहीं किया जाता है, तो उसके लिए राज्य के व्यय पर अपनी प्रतिरक्षा के लिए एक अधिवक्ता का प्रबंध किया जाएगा ।
4. जहां मामले का विचारण करने या विचारण के लिए सुपुर्दगी के लिए सक्षम न्यायालय ने अभियोजन के लिए किन्हीं साक्षियों की परीक्षा की है और उनके अभिसाक्ष्यों को अभिलिखित किया है, ऐसे अभिसाक्ष्य, ऐसे अपराध जिसके लिए उद्घोषित अपराधी को आरोपित किया गया है, की जांच या विचारण में उसके विरुद्ध साक्ष्य में दिए जाएंगे:
परंतु यदि उद्घोषित अपराधी ऐसे विचारण के दौरान गिरफ्तार किया जाता है या न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है या उपस्थित होता है, न्यायालय न्याय हित में उसे किसी ऐसे साक्ष्य, जो उसकी अनुपस्थिति में लिया गया है, की परीक्षा करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।
5. जहां विचारण इस धारा के अधीन व्यक्ति से संबंधित है, तो साक्षियों का अभिसाक्ष्य और परीक्षा जहां तक व्यवहार्य हो, श्रव्य दृश्य इलैक्ट्रानिक साधनों, अधिमानतः मोबाइल द्वारा अभिलिखित की जा सकेगी और ऐसी रिकार्डिंग ऐसी रीति में रखी जाएगी, जो न्यायालय निदेश दे ।
6. इस संहिता के अधीन अपराधों के अभियोजन में, उपधारा (1) के अधीन विचारण प्रारंभ होने के पश्चात् अभियुक्त की स्वेच्छया अनुपस्थिति, विचारण जिसके अंतर्गत निर्णय सुनाया जाना भी है, जारी रहने को नहीं रोकेगी, यद्यपि वह ऐसे विचारण की समाप्ति पर गिरफ्तार और प्रस्तुत किया जाता है या उपस्थित होता है ।
7. इस धारा के अधीन किए गए निर्णय के विरुद्ध तब तक अपील नहीं होगी जब तक उद्घोषित अपराधी स्वयं को अपीलीय न्यायालय के समक्ष स्वयं को उपस्थित नहीं कर देता :
परंतु दोषसिद्धि के विरुद्ध कोई अपील निर्णय की तारीख से तीन वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं होगी ।
8. राज्य अधिसूचना द्वारा धारा 84 की उपधारा (1) में उल्लिखित किसी फरार व्यक्ति पर इस धारा के उपबंधों का विस्तार कर सकेगी ।
यदि अभियुक्त विकृत चित्त व्यक्ति न होने पर भी ऐसा है कि उसे कार्यवाहियां समझाई नहीं जा सकतीं तो न्यायालय जांच या विचारण में अग्रसर हो सकता है; और उच्च न्यायालय से भिन्न न्यायालय की दशा में, यदि ऐसी कार्यवाही का परिणाम दोषसिद्धि है, तो कार्यवाही को मामले की परिस्थितियों की रिपोर्ट के साथ उच्च न्यायालय भेज दिया जाएगा और उच्च न्यायालय उस पर ऐसा आदेश देगा जैसा वह ठीक समझे ।
1. जहां किसी अपराध की जांच या विचारण के दौरान साक्ष्य से यह प्रतीत होता है कि किसी व्यक्ति ने, जो अभियुक्त नहीं है, कोई ऐसा अपराध किया है जिसके लिए ऐसे व्यक्ति का अभियुक्त के साथ विचारण किया जा सकता है, वहां न्यायालय उस व्यक्ति के विरुद्ध उस अपराध के लिए जिसका उसके द्वारा किया जाना प्रतीत होता है, कार्यवाही कर सकता है ।
2. जहां ऐसा व्यक्ति न्यायालय में हाजिर नहीं है वहां पूर्वोक्त प्रयोजन के लिए उसे मामले की परिस्थितियों की अपेक्षानुसार, गिरफ्तार या समन किया जा सकता है ।
3. कोई व्यक्ति जो गिरफ्तार या समन न किए जाने पर भी न्यायालय में हाजिर है, ऐसे न्यायालय द्वारा उस अपराध के लिए, जिसका उसके द्वारा किया जाना प्रतीत होता है, जांच या विचारण के प्रयोजन के लिए निरुद्ध किया जा सकता है ।
4. जहां न्यायालय किसी व्यक्ति के विरुद्ध उपधारा (1) के अधीन कार्यवाही करता है, वहां
क. उस व्यक्ति के बारे में कार्यवाहियां फिर से प्रारंभ की जाएगीं और साक्षियों को फिर से सुना जाएगा;
ख. खंड (क) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, मामले में ऐसे कार्यवाही की जा सकती है, मानो वह व्यक्ति उस समय अभियुक्त व्यक्ति था जब न्यायालय ने उस अपराध का संज्ञान किया था जिस पर जांच या विचारण प्रारंभ किया गया था ।
1. नीचे दी गई सारणी के प्रथम दो स्तम्भों में विनिर्दिष्ट भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं के अधीन दंडनीय अपराधों का शमन उस सारणी के तृतीय स्तम्भ में उल्लिखित व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है:-
सारणी
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अपराध |
भारतीय न्याय वह संहिता, 2023 की धारा जो लागू होती है
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व्यक्ति जिसके द्वारा अपराध का शमन किया जा सकेगा |
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1 |
2 |
3 |
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किसी विवाहित महिला को आपराधिक दूराशय फुसलाकर ले जाना जाना या निरुद्ध रखना । |
84 |
महिला का पति और महिला |
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स्वेच्छया उपहति कारित करना ।
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115(2) |
वह व्यक्ति जिसे उपहति कारित की गई है। |
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प्रकोपन पर स्वेच्छया उपहति कारित करना । |
122(1) |
वह व्यक्ति जिसे उपहति कारित की गई है । |
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गंभीर और अचानक प्रकोपन पर स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना ।
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122(2) |
वह व्यक्ति जिसे उपहति कारित की गई है । |
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किसी व्यक्ति का सदोष अवरोध या परिरोध । |
126(2), 127(2) |
वह व्यक्ति जो अवरुद्ध या परिरुद्ध किया गया है । |
|
किसी व्यक्ति का तीन या अधिक दिनों के लिए सदोष परिरोध । |
127(3) |
परिरुद्ध व्यक्ति । |
|
किसी व्यक्ति का दस या अधिक दिनों के लिए सदोष परिरोध । |
127(4) |
परिरुद्ध व्यक्ति । |
|
किसी व्यक्ति का गुप्त स्थान में सदोष परिरोध |
127(6) |
परिरुद्ध व्यक्ति । |
|
हमला या आपराधिक बल का प्रयोग | |
131, 133, 136 |
वह व्यक्ति जिस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग किया गया है । |
|
किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के विमर्शित आशय से शब्द उच्चारित करना, आदि । |
302 |
वह व्यक्ति जिसकी धार्मिक भावनाओ को ठेस पहुंचना आशयित है |
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चोरी | |
303(2) |
चुराई हुई संपत्ति का स्वामी । |
|
संपत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग । |
314 |
दुर्विनियोजित संपत्ति का स्वामी । |
|
वाहक, घाटवाल, आदि द्वारा आपराधिक न्यास-भंग । |
316(3) |
उस संपत्ति का स्वामी, जिसके संबंध में न्यास भंग किया गया है । |
|
चुराई हुई संपति को, उसे चुराई हुई हुए बेईमानी से प्राप्त करना । |
317(2) |
चुराई हुई संपत्ति का स्वामी । |
|
चुराई हुई संपत्ति को, यह जानते हुए कि वह चुराई हुई है, छिपाने में या व्ययनित करने में सहायता करना । |
317(5) |
चुराई हुई संपत्ति का स्वामी । |
|
छल । |
318(2) |
वह व्यक्ति जिससे छल किया गया है |
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प्रतिरूपण द्वारा छल । |
319(2) |
वह व्यक्ति जिससे छल किया गया है |
|
लेनदारों में वितरण निवारित करने के लिए संपत्ति आदि का कपटपूर्वक अपसारण या छिपाना । |
320 |
उससे प्रभावित लेनदार | |
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अपराधी का अपने को शोध्य ऋण या मांग का लेनदारों के लिए उपलब्ध किया जाना कपटपूर्वक निवारित करना । |
321 |
उससे प्रभावित लेनदार | |
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अंतरण के ऐसे विलेख का, जिसमें प्रतिफल के संबंध में मिथ्या कथन अंतर्विष्ट है, कपटपूर्वक निष्पादन । |
322 |
उससे प्रभावित लेनदार | |
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संपत्ति का कपटपूर्वक अपसारण या छिपाया जाना । |
323 |
उससे प्रभावित लेनदार | |
|
रिष्टि, जब कारित हानि या नुकसान केवल प्राइवेट व्यक्ति को हुई हानि या नुकसान है। |
324(2), 324(4) |
वह व्यक्ति, जिसे हानि या नुकसान हुआ है।
|
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जीवजन्तु का वध करने या उसे विकलांग करने के द्वारा रिष्टि । |
325 |
जीवजन्तु का स्वामी । |
|
सिंचन संकर्म को क्षति करने या जल को दोषपूर्वक मोड़ने के द्वारा रिष्टि, जब उससे कारित हानि या नुकसान केवल प्राइवेट व्यक्ति को हुई हानि या नुकसान है। |
326(क) |
वह व्यक्ति, जिसे हानि या नुकसान हुआ है। |
|
आपराधिक अतिचार । |
329(3) |
वह व्यक्ति जिसके कब्जे में ऐसी संपत्ति है जिस पर अतिचार किया गया है । |
|
गृह- अतिचार | |
329(4) |
वह व्यक्ति जिसके कब्जे में ऐसी संपत्ति है जिस पर अतिचार किया गया है । |
|
कारावास से दंडनीय अपराध को (चोरी से भिन्न) करने के लिए गृह अतिचार |
332(ग) |
वह व्यक्ति, जिसका उस ग्रह पर कब्ज़ा है जिस पर अतिचार किया गया है |
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मिथ्या व्यापार या संपत्ति चिह्न का उपयोग | |
345(3) |
वह व्यक्ति, जिसे ऐसे उपयोग से हानि या क्षति कारित हुई है । |
|
अन्य व्यक्ति द्वारा उपयोग में लाए गए संपत्ति चिह्न का कूटकरण । |
347(1) |
वह व्यक्ति, जिसे ऐसे उपयोग से हानि या क्षति कारित हुई है । |
|
कूटकृत संपत्ति चिह्न के साथ चिह्नित माल का विक्रय । |
349 |
वह व्यक्ति, जिसे ऐसे उपयोग से हानि या क्षति कारित हुई है । |
|
अपराधिक अभित्रास । |
351(2), 351(3) |
अभित्रस्त व्यक्ति । |
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लोक-शांति भंग कराने को प्रकोपित करने के आशय से अपमान । |
352 |
अपमानित व्यक्ति । |
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किसी व्यक्ति को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित करके कि वह दैवी अप्रसाद का भाजन होगा, कराया गया कार्य। |
354 |
वह व्यक्ति जिसे उत्प्रेरित किया गया ।
|
|
उपधारा (2) के अधीन सारणी के स्तंभ में भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 356 ( 2 ) के सामने यथाविनिर्दिष्ट ऐसे मामलो के सिवाय मानहानि |
356(2) |
वह व्यक्ति जिसकी मानहानि की गई है। |
|
मानहानिकारक जानी हुई बात को मुद्रित या उत्कीर्ण करना । |
356(3) |
वह व्यक्ति जिसकी मानहानि की गई है। |
|
मानहानिकारक विषय रखने वाले मुद्रित या उत्कीर्ण पदार्थ का यह जानते हुए बेचना कि उसमें ऐसा विषय अंतर्विष्ट है । |
356(4) |
वह व्यक्ति जिसकी मानहानि की गई है ।
|
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सेवा संविदा का आपराधिक भंग
|
357 |
वह व्यक्ति जिसके साथ अपराधी ने संविदा की है । |
|
(2) नीचे दी गई सारणी के प्रथम दो स्तम्भों में विनिर्दिष्ट भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं के अधीन दंडनीय अपराधों का शमन उस न्यायालय की अनुज्ञा से, जिसके समक्ष ऐसे अपराध के लिए कोई अभियोजन लंबित है, उस सारणी के तृतीय स्तंभ लिखित व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है :-
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अपराध |
भारतीय न्याय वह संहिता, 2023 की धारा जो लागू होती है
|
व्यक्ति जिसके द्वारा अपराध का शमन किया जा सकेगा |
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शब्द अंगविक्षेप या कार्य, जो किसी महिला की लज्जा का अनादर करने के लिए आशयित है । |
79 |
वह महिला जिसका अनादर करना अशयित था या जिसकी एकांतता का अतिक्रमण किया गया था । |
|
पति या पत्नी के जीवनकाल में पुनः विवाह करना । |
82(1) |
ऐसे विवाह करने वाले व्यक्ति का पति या पत्नी । |
|
गर्भपात कारित करना । |
88 |
वह महिला जिसका गर्भपात किया गया है । |
|
स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना । |
117(2) |
वह व्यक्ति जिसे उपहति कारित की गई है। |
|
उतावलेपन और उपेक्षा से किसी कार्य द्वारा उपहति कारित करना जिससे मानव जीवन या दूसरों का वैयक्तिक क्षेम संकटापन्न हो जाए । |
125(क) |
वह व्यक्ति जिसे उपहति कारित की गई है।
|
|
उतावलेपन और उपेक्षा से किसी कार्य द्वारा घोर उपहति कारित करना जिससे मानव जीवन या दूसरों का वैयक्तिक क्षेम संकटापन्न हो जाए । |
125(ख) |
वह व्यक्ति जिसे उपहति कारित की गई है।
|
|
किसी व्यक्ति का सदोष परिरोध करने के प्रयत्न में हमला या आपराधिक बल का प्रयोग । |
135 |
वह व्यक्ति जिस पर हमला किया गया या जिस पर बल का प्रयोग किया गया था । |
|
लिपिक या सेवक द्वारा स्वामी के कब्जे की संपत्ति की चोरी | |
306 |
चुराई हुई संपत्ति का स्वामी ।
|
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आपराधिक न्यास -भंग | |
316(2) |
उस संपत्ति का स्वामी, जिसके संबंध में न्यास भंग किया गया है । |
|
लिपिक या सेवक द्वारा आपराधिक न्यास-भंग । |
316(4) |
उस संपत्ति का स्वामी, जिसके संबंध में न्यास-भंग किया गया है । |
|
ऐसे व्यक्ति के साथ छल करना जिसका हित संरक्षित रखने के लिए अपराधी या तो विधि द्वारा या वैध संविदा द्वारा आबद्ध था । |
318(3) |
वह व्यक्ति, जिससे छल किया गया है । |
|
छल करना या संपत्ति परिदत्त करने या मूल्यवान प्रतिभूति की रचना करने या उसे परिवर्तित या नष्ट करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करना । |
318(4) |
वह व्यक्ति, जिससे छल किया गया है । |
|
राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल अथवा संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक या किसी मंत्री के विरुद्ध उसके जब लोक अभियोजक द्वारा किए गए परिवाद पर संस्थित की जाए । |
356(2) |
वह व्यक्ति जिसकी मानहानि की गयी है
|
3. जब कोई अपराध इस धारा के अधीन शमनीय है, तब ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण का, या ऐसे अपराध को करने के प्रयत्न का ( जब ऐसा प्रयत्न स्वयं अपराध हो ) या जहां अभियुक्त भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 3 की उपधारा ( 5 ) या धारा 190 के अधीन दायी हो, शमन उसी प्रकार से किया जा सकता है |
4 (क) जब वह व्यक्ति, जो इस धारा के अधीन अपराध का शमन करने के लिए अन्यथा सक्षम होता, बालक है या विकृत चित्त है, तब कोई व्यक्ति जो उसकी ओर से संविदा करने के लिए सक्षम हो, न्यायालय की अनुज्ञा से ऐसे अपराध का शमन कर सकता है ।
ख. जब वह व्यक्ति, जो इस धारा के अधीन अपराध का शमन करने के लिए अन्यथा सक्षम होता, मर जाता है तब ऐसे व्यक्ति का, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में यथापरिभाषित, विधिक प्रतिनिधि, न्यायालय की सम्मति से, ऐसे अपराध का शमन कर सकता है ।
5. जब अभियुक्त विचारणार्थ सुपुर्द कर दिया जाता है या जब वह दोषसिद्ध कर दिया जाता है और अपील लंबित है, तब अपराध का शमन, यथास्थिति, उस न्यायालय की इजाजत के बिना अनुज्ञात न किया जाएगा जिसे वह सुपुर्द किया गया है, या जिसके समक्ष अपील सुनी जानी है ।
6. धारा 442 के अधीन पुनरीक्षण की अपनी शक्तियों के प्रयोग में कार्य करते हुए उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय किसी व्यक्ति को किसी ऐसे अपराध का शमन करने की अनुज्ञा दे सकता है जिसका शमन करने के लिए वह व्यक्ति इस धारा के अधीन सक्षम है ।
7. यदि अभियुक्त पूर्व दोषसिद्धि के कारण किसी अपराध के लिए या तो वर्धित दंड से या भिन्न किस्म के दंड से दंडनीय है तो ऐसे अपराध का शमन न किया जाएगा ।
8. अपराध के इस धारा के अधीन शमन का प्रभाव उस अभियुक्त की दोषमुक्ति होगा जिससे अपराध का शमन किया गया है ।
9. अपराध का शमन इस धारा के उपबंधों के अनुसार ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
360. अभियोजन वापस लेना
किसी मामले का भारसाधक कोई लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक निर्णय सुनाए जाने के पूर्व किसी समय किसी व्यक्ति के अभियोजन को या तो साधारणतः या उन अपराधों में से किसी एक या अधिक के बारे में, जिनके लिए उस व्यक्ति का विचारण किया जा रहा है, न्यायालय की सम्मति से वापस ले सकता है और ऐसे वापस लिए जाने पर—
क. यदि वह आरोप विरचित किए जाने के पहले किया जाता है तो अभियुक्त ऐसे अपराध या अपराधों के बारे में उन्मोचित कर दिया जाएगा ;
ख. यदि वह आरोप विरचित किए जाने के पश्चात् या जब इस संहिता द्वारा कोई आरोप अपेक्षित नहीं है, तब किया जाता है तो वह ऐसे अपराध या अपराधों के बारे में दोषमुक्त कर दिया जाएगा:
परन्तु जहां—
i. ऐसा अपराध किसी ऐसी बात से संबंधित किसी विधि के विरुद्ध है जिस पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, या
ii. ऐसे अपराध का अन्वेषण किसी केन्द्रीय अधिनियम के अधीन किया गया है, या
iii. ऐसे अपराध में केन्द्रीय सरकार की किसी सम्पत्ति का दुर्विनियोग, नाश या नुकसान अन्तर्ग्रस्त है, या
iv. ऐसा अपराध केन्द्रीय सरकार की सेवा में किसी व्यक्ति द्वारा किया गया है, जब वह अपने पदीय कर्तव्यों के निर्वहन में कार्य कर रहा है या कार्य करना तात्पर्यत है, और मामले का भारसाधक अभियोजक केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त नहीं किया गया है, तो वह जब तक केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे ऐसा करने की अनुज्ञा नहीं दी जाती है, अभियोजन को वापस लेने के लिए न्यायालय से उसकी सम्मति के लिए निवेदन नहीं करेगा तथा न्यायालय अपनी सम्मति देने के पूर्व, अभियोजक को यह निदेश देगा कि वह अभियोजन को वापस लेने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा दी गई अनुज्ञा उसके समक्ष पेश करे:
परंतु यह और कि कोई न्यायालय उस मामले में पीड़ित को सुनवाई का अवसर दिए बिना ऐसी वापसी अनुज्ञात नहीं करेगा ।
1. यदि किसी जिले में किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष अपराध की किसी जांच या विचारण के दौरान उसे ऐसा साक्ष्य प्रतीत होता है कि उसके आधार पर यह उपधारणा की जा सकती है कि-
क. उसे मामले का विचारण करने या विचारणार्थ सुपुर्द करने की अधिकारिता नहीं है, या
ख. मामला ऐसा है जो जिले के किसी अन्य मजिस्ट्रेट द्वारा विचारित या विचारणार्थ सुपुर्द किया जाना चाहिए, या
ग. मामले का विचारण मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाना चाहिए,
तो वह कार्यवाही को रोक देगा और मामले की ऐसी संक्षिप्त रिपोर्ट सहित, जिसमें मामले का स्वरूप स्पष्ट किया गया है, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को या अधिकारिता वाले अन्य ऐसे मजिस्ट्रेट को, जिसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट निर्दिष्ट करे, भेज देगा ।
2. यदि वह मजिस्ट्रेट, जिसे मामला भेजा गया है, ऐसा करने के लिए सशक्त है, तो वह उस मामले का विचारण स्वयं कर सकता है या उसे अपने अधीनस्थ अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट को निर्देशित कर सकता है या अभियुक्त को विचारणार्थ सुपुर्द कर सकता है।
यदि किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष अपराध की किसी जांच या विचारण में निर्णय पर हस्ताक्षर करने के पूर्व कार्यवाही के किसी प्रक्रम में उसे यह प्रतीत होता है कि मामला ऐसा है, जिसका विचारण सेशन न्यायालय द्वारा किया जाना चाहिए, तो वह उसे इसमें इसके पूर्व अंतर्विष्ट उपबंधों के अधीन उस न्यायालय को सुपुर्द कर देगा और तब अध्याय 19 के उपबंध ऐसी सुपुर्दगी को लागू होंगे ।
1. जहां कोई व्यक्ति भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अध्याय 10 या अध्याय 17 के अधीन तीन वर्ष या अधिक की अवधि के लिए कारावास से दंडनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध किए जा चुकने पर उन अध्यायों में से किसी के अधीन तीन वर्ष या अधिक की अवधि के लिए कारावास से दंडनीय किसी अपराध के लिए पुनः अभियुक्त है, और उस मजिस्ट्रेट का, जिसके समक्ष मामला लंबित है, समाधान हो जाता है कि यह उपधारणा करने के लिए आधार है कि ऐसे व्यक्ति ने अपराध किया है तो वह उस दशा के सिवाय विचारण के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजा जाएगा या सेशन न्यायालय के सुपुर्द किया जाएगा, जब मजिस्ट्रेट मामले का विचारण करने के लिए सक्षम है और उसकी यह राय है कि यदि अभियुक्त दोषसिद्ध किया गया तो वह स्वयं उसे पर्याप्त दंड का आदेश दे सकता है ।
2. जब उपधारा (1) के अधीन कोई व्यक्ति विचारण के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजा जाता है या सेशन न्यायालय को सुपुर्द किया जाता है तब कोई अन्य व्यक्ति, जो उसी जांच या विचारण में उसके साथ संयुक्ततः अभियुक्त है, वैसे ही भेजा जाएगा या सुपुर्द किया जाएगा जब तक ऐसे अन्य व्यक्ति को मजिस्ट्रेट, यथास्थिति, धारा 262 या धारा 268 के अधीन उन्मोचित न कर दे ।
1. जब कभी अभियोजन और अभियुक्त का साक्ष्य सुनने के पश्चात् मजिस्ट्रेट की यह राय है कि अभियुक्त दोषी है और उसे उस प्रकार के दंड से भिन्न प्रकार का दंड या उस दंड से अधिक कठोर दंड, जो वह मजिस्ट्रेट देने के लिए सशक्त है, दिया जाना चाहिए या द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट होते हुए उसकी यह राय है कि अभियुक्त से धारा 125 के अधीन बंधपत्र या जमानतपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा की जानी चाहिए तब वह अपनी राय अभिलिखित कर सकता है और कार्यवाहियों तथा अभियुक्त को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को, जिसके वह अधीनस्थ हो, भेज सकता है ।
2. जब एक से अधिक अभियुक्त व्यक्तियों का विचारण एक साथ किया जा रहा है और मजिस्ट्रेट ऐसे अभियुक्तों में से किसी के बारे में उपधारा (1) के अधीन कार्यवाही करना आवश्यक समझता है तब वह उन सभी अभियुक्तों को, जो उसकी राय में दोषी हैं, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेज देगा |
3. यदि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जिसके पास कार्यवाही भेजी जाती है, ठीक समझता है तो पक्षकारों की परीक्षा कर सकता है और किसी साक्षी को, जो पहले ही मामले में साक्ष्य दे चुका है, पुनः बुला सकता है और उसकी परीक्षा कर सकता है और कोई अतिरिक्त साक्ष्य मांग सकता है और ले सकता है और मामले में ऐसा निर्णय, दंडादेश या आदेश देगा, जो वह ठीक समझता है और जो विधि के अनुसार है ।
1. जब कभी किसी जांच या विचारण में साक्ष्य को पूर्णतः या भागतः सुनने और अभिलिखित करने के पश्चात् कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट उसमें अधिकारिता का प्रयोग नहीं कर सकता है और कोई अन्य न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट, जिसे ऐसी अधिकारिता है और जो उसका प्रयोग करता है, उसका उत्तरवर्ती हो जाता है, तो ऐसा उत्तरवर्ती न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट अपने पूर्ववर्ती द्वारा ऐसे अभिलिखित या भागतः अपने पूर्ववर्ती द्वारा अभिलिखित और भागतः अपने द्वारा अभिलिखित साक्ष्य पर कार्य कर सकता है:
परन्तु यदि उत्तरवर्ती न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की यह राय है कि साक्षियों में से किसी की जिसका साक्ष्य पहले ही अभिलिखित किया जा चुका है, अतिरिक्त परीक्षा करना न्याय के हित में आवश्यक है तो वह किसी भी ऐसे साक्षी को पुनः समन कर सकता है और ऐसी अतिरिक्त परीक्षा, प्रतिपरीक्षा और पुनः परीक्षा के, यदि कोई हो, जैसी वह अनुज्ञात करे, पश्चात् वह साक्षी उन्मोचित कर दिया जाएगा ।
2. जब कोई मामला एक न्यायाधीश से दूसरे न्यायाधीश को या एक मजिस्ट्रेट से दूसरे मजिस्ट्रेट को इस संहिता के उपबंधों के अधीन अंतरित किया जाता है तब उपधारा (1) के अर्थ में पूर्वकथित मजिस्ट्रेट के बारे में समझा जाएगा कि वह उसमें अधिकारिता का प्रयोग नहीं कर सकता है और पश्चात्कथित मजिस्ट्रेट उसका उत्तरवर्ती हो गया है ।
3. इस धारा की कोई बात संक्षिप्त विचारणों को या उन मामलों को लागू नहीं होती हैं जिनमें कार्यवाहियां धारा 361 के अधीन रोक दी गई हैं या जिनमें कार्यवाहियां वरिष्ठ मजिस्ट्रेट को धारा 364 के अधीन भेज दी गई हैं ।
1. वह स्थान, जिसमें कोई दंड न्यायालय किसी अपराध की जांच या विचारण के प्रयोजन से बैठता है, खुला न्यायालय समझा जाएगा, जिसमें जनता साधारणतः प्रवेश कर सकेगी जहां तक कि सुविधापूर्वक वे उसमें समा सकें :
परन्तु यदि पीठासीन न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट ठीक समझता है तो वह किसी विशिष्ट मामले की जांच या विचारण के किसी प्रक्रम में आदेश दे सकता है कि जनसाधारण या कोई विशेष व्यक्ति उस कमरे में या भवन में, जो न्यायालय द्वारा उपयोग में लाया जा रहा है, न तो प्रवेश करेगा, न होगा और न रहेगा ।
2. उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67 धारा 68 धारा 70 या धारा 71 के अधीन बलात्संग या किसी अपराध या लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 4, धारा 6, धारा 8 या धारा 10 के अधीन अपराधों की जांच या उसका विचारण बंद कमरे में किया जाएगा:
परन्तु पीठासीन न्यायाधीश, यदि वह ठीक समझता है तो, या दोनों में से किसी पक्षकार द्वारा आवेदन किए जाने पर, किसी विशिष्ट व्यक्ति को, उस कमरे में या भवन में, जो न्यायालय द्वारा उपयोग में लाया जा रहा है, प्रवेश करने, होने या रहने की अनुज्ञा दे सकता है:
परंतु यह और कि बंद कमरे में विचारण यथासाध्य किसी महिला न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाएगा ।
3. (3) जहां उपधारा (2) के अधीन कोई कार्यवाही की जाती है वहां किसी व्यक्ति के लिए किसी ऐसी कार्यवाही के संबंध में किसी बात को न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा के बिना, मुद्रित या प्रकाशित करना विधिपूर्ण नहीं होगा:
परंतु बलात्संग के अपराध के संबंध में विचारण की कार्यवाहियों के मुद्रण या प्रकाशन पर पाबंदी, पक्षकारों के नाम और पते की गोपनीयता को बनाए रखने के अध्यधीन हटाई जा सकेगी