धारा 57 से 60 अध्याय 6 छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959

धारा 57 से 60 अध्याय 6 छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959

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अध्याय 6

भूमि तथा भू-राजस्व

57. समस्त भूमियों में राज्य का स्वामित्व. -

(1) समस्त भूमियाँ राज्य सरकार की हैं और एतद्द्वारा यह घोषित किया जाता है कि समस्त ऐसी भूमियाँ जिनके अंतर्गत रुका हुआ तथा बहता हुआ पानी खानें, खदानें, खनिज तथा वन चाहे वे आरक्षित हों या न हों, तथा किसी भूमि की अधोमृदा में के समस्त अधिकार हैं, राज्य सरकार की सम्पत्ति है:

परन्तु इस कोड में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, इस धारा की कोई बात किसी व्यक्ति के किसी ऐसी सम्पत्ति में के किन्हीं ऐसे अधिकारों पर जो कि इस कोड के प्रवृत्त होने के समय अस्तित्व में रहें हो, प्रभाव डालने वाली नहीं समझा जाएगी।

(2) जहां राज्य तथा किसी व्यक्ति के बीच उपधारा (1) के अधीन के किसी अधिकार के संबंध में कोई विवाद उद्भूत हो, वहां ऐसा विवाद कलेक्टर द्वारा विनिश्चित किया जाएगा।

(3-क) (क) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 1908 का सं. 5) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी कोई भी सिविल न्यायालय 24 अक्टूबर, 1953 को या उसके पश्चात् उपधारा (3) के अधीन संस्थित किए गए किसी सिविल वाद में अस्थायी व्यादेश द्वारा किसी भी ऐसे व्यक्ति को जिसे धारा 250 के अधीन कब्जा वापस दिला दिया जाता है, बाधा नहीं पहुंचायेगा यदि वह व्यक्ति पक्षकार के पक्ष में सिविल न्यायालय द्वारा डिक्री दे दी जाने की दशा में किसी हानि के लिए व्यथित पक्षकार की प्रतिपूर्ति करने के लिए कोई विश्वसनीय प्रतिभूति दे देता है:

परन्तु किसी ऐसी जनजाति के जिसे धारा 165 की उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति घोषित किया गया है किसी सदस्य द्वारा कोई प्रतिभूति दी जाने की अपेक्षा नहीं की जाएगी।

(ख) जहां किसी सिविल न्यायालय के अस्थायी व्यादेश के आदेश द्वारा खण्ड (क) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति को 24 अक्टूबर, 1983 को या उसके पश्चात् किन्तु राजस्व विभाग की अधिसूचना क्र. 1-70 सात-सा-2-83 दिनांक 5 जनवरी, 1984 के प्रकाशन के पूर्व, बाधा पहुंचाई हो, वहां ऐसा आदेश ऐसा प्रकाशन हो जाने पर उपशमित हो जाएगा और तहसीलदार उस व्यक्ति को कब्जा वापस दिला देगा जिसे ऐसे आदेश द्वारा बाधा पहुंचाई गई है।

58. भू-राजस्व के भुगतान के लिए भूमि का दायित्व -

(1) समस्त भूमि चाहे वह किसी भी प्रयोजन के लिए उपयोजित की जाती हो और चाहे वह कहीं भी स्थित हो, राज्य सरकार को राजस्व के भुगतान के लिये दायित्वाधीन है सिवाय ऐसी भूमि के जिसे राज्य सरकार के विशेष अनुदान या राज्य सरकार के साथ की गई संविदा द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि या नियम के उपबंधों के अधीन ऐसे दायित्व से पूर्णतः छूट दे दी गयी है।

(2) ऐसा राजस्व "भू-राजस्व" कहलाता है और उस शब्द के अन्तर्गत भूमि के लिए राज्य सरकार को देय समस्त धन हैं, भले ही ऐसे धन किसी अधिनियमिति, नियम, संविदा या विलेख में प्रीमियम लगान, पट्टा-धन, प्रमुक्ति भाटक के रूप में या किसी अन्य रूप में वर्णित किए जाएँ।

58-ए. कतिपय भूमियों को भू-राजस्व की देनगी से छूट दी जाएगी. -

इस कोड में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई भी भू-राजस्व अनन्यरूपेण कृषि के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाए गए अलाभप्रद खाते के बारे में देय नहीं होगा।

स्पष्टीकरण - एक -

एक इस धारा के प्रयोजनों के लिए-

(क) “अलाभप्रद खाते”  से अभिप्रेत है कोई ऐसा खाता जिसका कि विस्तार 5 एकड़ से अधिक न हो;

(ख) "खाते" से अभिप्रेत है वह कुल भूमि जो कि राज्य में किसी व्यक्ति द्वारा धारित हो इस बात के होते हुए भी कि उसके किसी भाग पर भू-राजस्व पृथक रूप से निर्धारित है और

(ग) “भू-राजस्व” के अन्तर्गत वे धन नहीं आते जो कि प्रीमियम, भाटक या पांच वर्ष से कम कालावधि के लिए पट्टे पर दी गई भूमि के बारे में पट्टा धन के, या प्रमुक्ति भाटक के रूप में भूमि के लिए राज्य सरकार को देय हों।

स्पष्टीकरण - दो. -

स्पष्टीकरण एक के खण्ड (ख) के प्रयोजन के लिए "राज्य में किसी व्यक्ति द्वारा धारित कुल भूमि" से अभिप्रेत है-

(क) वह कुल भूमि जो कि राज्य में किसी व्यक्ति द्वारा व्यक्तिशः धारित हो और उसके अन्तर्गत-

(एक) जहां भूमि ऐसे व्यक्ति द्वारा एक या अधिक व्यक्तियों के साथ संयुक्तत: धारित हो, वहां भूमि का उतना भाग आता है जो कि उसके हिस्से में आता हो, और

(दो) छत्तीसगढ़ भू दान यज्ञ अधिनियम, 1968 (क्रमांक 28 सन् 1968) के अधीन ऐसे व्यक्ति द्वारा भू-दान धारक के रूप में धारित भूमि आती है, और

(ख) जहां भूमि किसी व्यक्ति द्वारा एक या अधिक व्यक्तियों के साथ संयुक्तत: धारित हो, वहां इस प्रकार से संयुक्तत: धारित एकल खाता।

59. जिस प्रयोजन के लिए भूमि उपयोग में लाई जाए उसी के अनुसार भू-राजस्व में फेरफार -

(1) किसी भूमि पर भू-राजस्व का निर्धारण निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए उस भूमि के उपयोग को दृष्टि में रखते हुए किया जाएगा-

(क) कृषि या ऐसे प्रक्षेत्रगृह (फार्म हाउस) के प्रयोजन के लिए जो एक एकड़ या अधिक के खाते पर स्थित हो;

(ख) निवास गृहों के लिए स्थलों के रूप में उपयोग;

(ग) मद (क), (ख), (घ), या (ङ) में विनिर्दिष्ट किये गए प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोग;

(घ) औद्योगिक या वाणिज्यिक प्रयोजन के लिए उपयोग;

(ङ) खान और खनिज (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1957 (1957 का सं. 67) के अर्थ के अन्तर्गत खनन पट्टे के अधीन खनन प्रयोजनों के लिए;

(च) आवासीय कालोनी/परियोजना,

(छ) सार्वजनिक/संस्थागत प्रयोजन,

(ज) चिकित्सा सुविधा केन्द्र:

परन्तु किसी ऐसी भूमि पर जो उन क्षेत्रों में स्थित है, जिन्हें भारतीय वन अधिनियम, 1927 (1927 का सं. 16) के अधीन आरक्षित या संरक्षित वनों के रूप में गठित किया जाए पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी भी प्रयोजन के लिए भूमि के उपयोग के प्रति निर्देश से भू-राजस्व के निर्धारण की कार्यवाही या संहिता के सुसंगत उपबन्धों के अधीन निर्धारण के सम्बन्ध में अनुसरित की जाने वाली कोई भी प्रक्रिया, वन विभाग के ऐसे किसी अधिकारी द्वारा, जिसे राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत किया गया हो, भूमि के उपयोग को अनुज्ञात करते हुए जारी किए गए प्रमाण-पत्र पर ही की जाएगी या प्रारम्भ की जाएगी, अन्यथा नहीं।

स्पष्टीकरण. -

खण्ड (क) के प्रयोजन के लिए "प्रक्षेत्रगृह (फार्म हाउस)" से अभिप्रेत है ऐसा भवन या सन्निर्माण जो धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (ञ) में यथापरिभाषित सुधार है और जिसका कुर्सी क्षेत्र (प्लिंथ एरिया) एक सौ वर्ग मीटर से अधिक नहीं होगा और निर्मित क्षेत्र एक सौ पचास वर्ग मीटर से अधिक नहीं होगा।

(2) जहाँ कोई भूमि, जिस पर किसी एक प्रयोजन के लिए उपयोग में लाये जाने के हेतु निर्धारण किया गया हो, किसी अन्य प्रयोजन के लिए व्यपवर्तित कर दी जाए, वहाँ ऐसी भूमि पर देय, भू-राजस्व इस बात के होते हुए भी कि उस अवधि का, जिसके कि लिए निर्धारण नियत किया गया हो, अवसान नहीं हुआ है, उस प्रयोजन के अनुसार परिवर्तित तथा निर्धारित किए जाने के दायित्वाधीन होगा जिसके कि लिए वह व्यपवर्तित कर दी गई है:

परन्तु राज्य शासन, नवीन सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट सीमा तक छूट उल्लिखित शर्तों के तहत दे सकेगी:

परन्तु यह और कि इस संहिता की अनुसूची - चार में विनिर्दिष्ट किये अनुसार धारा 59 की उप-धारा (1) के खण्ड (च) के प्रयोजन के लिए राज्य शासन द्वारा स्थापित प्राधिकरण अथवा निगमित निकाय द्वारा विकसित भूमि को व्यपवर्तन हेतु पुनः निर्धारण से छूट दी जायेगी।

(2-क) उपधारा (2) में निर्दिष्ट किया गया परिवर्तन या निर्धारण सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा।

(3) जहाँ वह भूमि जो इस शर्त पर भू-राजस्व के भुगतान से मुक्त रूप में धारित है कि उसे किसी प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाएगा किसी अन्य प्रयोजन के लिए व्यपवर्तित कर दी जाती है, वहां वह भूमि भू-राजस्व के भुगतान के दायित्वाधीन हो जाएगी और उस पर उस प्रयोजन के अनुसार निर्धारित किया जाएगा जिसके लिए वह व्यवर्तित कर दी गई है।

(4) उपधारा (2) तथा (3) के अधीन किया गया निर्धारण उन नियमों के अनुसार होगा जो कि राज्य सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में बनाये गए हों और ऐसे नियम यथास्थिति अध्याय 7 या 8 में अन्तर्विष्ट सिद्धान्तों के अनुसार होंगे।

(5) जहां किसी एक प्रयोजन के लिए उपयोग में लाई जाने वाली भूमि किसी अन्य प्रयोजन के लिए व्यपवर्तित कर दी जाती है और उस पर भू-राजस्व का निर्धारण इस धारा के उपबन्धों के अधीन किया जाता है वहां सक्षम प्राधिकारी को यह शक्ति भी होगी कि वह उस व्यपवर्तन पर प्रीमियम इस संहिता के अधीन बनाये गए नियमों के अनुसार अधिरोपित करे:

परन्तु किसी भूमि के ऐसे व्यपवर्तन के लिए कोई प्रीमियम अधिरोपित नहीं किया जाएगा जो कि पूर्त प्रयोजनों के लिए हो।

(6) किसी प्रथा या अनुदान के या किसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसी भूमि को जो मध्यप्रदेश लैण्ड रेवेन्यू कोड, 1954 (क्रमांक 2 सन् 1955 ) के प्रवृत्त होने के ठीक पूर्व मालिक मकबूजा अधिकार में धारित थी, धारण करने वाले समस्त व्यक्तियों का वह अधिकार जो कि उन्हें ऐसी भूमि के व्यवपर्तन पर प्रीमियम का भुगतान करने से छूट के सम्बन्ध में प्राप्त था, एतद्द्वारा समाप्त किया जाता है; किन्तु प्रत्येक ऐसा व्यक्ति ऐसी भूमि के व्यपवर्तन पर, ऐसे अधिकार के बदले, उपधारा (5) के अधीन अवधारित की गई प्रीमियम की रकम में से उतने रिबेट का हकदार होगा जो ऐसी भूमि के लिए देय एक वर्ष के भू-राजस्व के बराबर हो।

59-ए. निर्धारण कब प्रभावशील होगा. -

धारा 59 के उपबंध के अधीन किया गया परिवर्तन या निर्धारण उस तारीख से प्रभावशील होगा जिसको कि व्यपवर्तन किया गया था।

59- बी. कोड के प्रवृत्त होने के पूर्व किए गए भूमि के व्यपवर्तन पर पुनर्निर्धारण. -

जहां इस कोड के प्रवृत्त होने के पूर्व, किसी क्षेत्र में की भूमि, जिस पर किसी एक प्रयोजन के लिए निर्धारण किया गया हो, बाद में किसी अन्य प्रयोजन के लिए उपयोग में लाई जाने के हेतु व्यपवर्तित कर दी गई हो, वहां ऐसी भूमि पर देय भू-राजस्व, इस बात के होते हुए भी कि उस अवधि का, जिसके कि लिए निर्धारण नियत किया गया हो, अवसान नहीं हुआ है-

(1) उस प्रयोजन के अनुसार, जिसके कि लिए वह व्यवपर्तित की गई हो, -

(ए) उस तारीख से, जिसको कि ऐसा व्यवर्तन किया गया था, पतिवर्तित तथा निर्धारित किया जा सकेगा यदि सम्बन्धित क्षेत्र में धारा 261 के अधीन निरसित कोई ऐसी अधिनियमिति प्रवृत्त थी जिसमें ऐसे उपबंध अन्तर्विष्ट थे कि ऐसा व्यवर्तन होने पर परिवर्तन या पुनर्निधारण किया जाएगा;

(बी) किसी अन्य मामले में, इस कोड के प्रवृत्त होने की तारीख से परिवर्तित तथा निर्धारित किया जा सकेगा; और

(2) उपर्युक्त (ए) के मामले में ऐसे निरसित अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार तथा उपर्युक्त (बी) के मामले में इस कोड के उपबन्धों के अनुसार परिवर्तित तथा निर्धारित किया जा सकेगा।

60. निर्धारण किससे द्वारा नियत किया जाएगा. -

उन समस्त भूमियों पर, जिन पर निर्धारण नहीं किया गया है, भू-राजस्व का निर्धारण कलेक्टर द्वारा उन नियमों के अनुसार किया जाएगा जो कि संहिता के अधीन बनाये गए हों।

 

 

 

 

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