
राज्य के धारित भूमियों के भू-धारियों का केवल एक ही वर्ग होगा जो भूमिस्वामी के नाम से ज्ञात होगा।
(1) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो इस संहिता के प्रवृत्त होने के समय, निम्नलिखित किन्हीं भी वर्गों का हो, भूमिस्वामी कहलायेगा और उसे वे समस्त अधिकार होंगे जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन भूमिस्वामी को प्रदत्त किए गए हैं तथा वह उन समस्त दायित्वों के अध्यधीन होगा जो इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन भूमिस्वामी पर अधिरोपित किए गए हैं, अर्थात् :-
(क) प्रत्येक व्यक्ति उस भूमि के संबंध में जो कि मध्यप्रदेश लैण्ड रेवेन्यू कोड, 1954 (क्रमांक 2 सन् 1955 ) के उपबन्धों के अनुसार भूमिस्वामी या भूमिधारी अधिकारों में उसके द्वारा महाकोशल क्षेत्र में धारित हो;
(ख) प्रत्येक व्यक्ति उस भूमि के संबंध में जो कि मध्यभारत भू-आगम एवं कृषिकाधिकार विधान, संवत् 2007 (क्रमांक 66 सन् 1950 ) में यथा परिभाषित पक्का कृषक के रूप में या माफीदार इनामदार या छूट खातेदार के रूप में उसके द्वारा मध्यभारत क्षेत्र में धारित हो;
(ग) प्रत्येक व्यक्ति उस भूमि के संबंध में जो कि भोपाल स्टेट लैण्ड रेवेन्यू एक्ट, 1932 (क्रमांक 4 सन् 1932 ) में यथा - परिभाषित दखलकार के रूप में उसके द्वारा भोपल क्षेत्र में धारित हो;
(घ) (एक) प्रत्येक व्यक्ति उस भूमि के संबंध में जो कि विन्ध्य प्रदेश लैण्ड रेवेन्यू एण्ड टेनेन्सी एक्ट, 1953 (क्रमांक 3 सन् 1955) में यथा परिभाषित पचपन- पैंतालीस कृषक; पट्टेदार कृषक, निकुंजधारी के रूप 'या तालाब - धारक के रूप में उसके द्वारा विन्ध्यप्रदेश क्षेत्र में धारित हो;
(दो) प्रत्येक व्यक्ति उस भूमि के (जो उस भूमि से, जो निकुंज या तालाब हो या जो सरकारी या लोक प्रयोजनों के लिए अर्जित की गई हो या उन प्रयोजनों के लिए अपेक्षित हो, भिन्न हो) संबंध में जो कि गैर हकदार कृषक के रूप में उसके द्वारा विन्ध्यप्रदेश क्षेत्र में धारित हो और जिसके कि संबंध में वह रीवा स्टेट लैण्ड रेवेन्यू एण्ड टेनेन्सी कोड, 1935 की धारा 57 की उपधारा (4) के उपबन्धों के अनुसार पट्टा पाने का हकदार हो;
(तीन) प्रत्येक व्यक्ति उस भूमि के संबंध में जो कि कृषक के रूप में उसके द्वारा विन्ध्यप्रदेश क्षेत्र में धारित हो और जिसके कि संबंध में वह विन्ध्यप्रदेश लैण्ड रेवेन्यू एण्ड टेनेन्सी एक्ट, 1953 (क्रमांक 3 सन् 1955) की धारा 151 की उपधारा (2) तथा (3) के उपबन्धों के अनुसार पट्टा पाने का हकदार हो किन्तु जिसने ऐसा पट्टा इस संहिता के प्रवृत्त होने के पूर्व अभिप्राप्त न किया हो;
(ङ) प्रत्येक व्यक्ति उस भूमि के संबंध में जो कि राजस्थान टेनेन्सी एक्ट, 1955 (क्रमांक 3 सन् 1955) में यथापरिभाषित खातेदार कृषक के रूप में या निकुंजधारी के रूप में उसके द्वारा सिरोंज क्षेत्र में धारित हो।
(2) किसी ऐसे देशी राज्य का, जो कि मध्यप्रदेश राज्य का भाग है, शासक, जो संविधान के प्रारम्भ होने के पूर्व उसके द्वारा की गई प्रसंविदा या करार के आधार पर ऐसे शासक के रूप में इस कोड के प्रवृत्त होने के समय भूमि धारण किए हुए था या भूमि धारण करने के लिये हकदार था, इस कोड के प्रवृत्त होने की तारीख से इस कोड के अधीन ऐसी भूमि का भूमिस्वामी होगा और उन समस्त अधिकारों तथा दायित्वों के अध्ययीन होगा जो कि इस कोड के द्वारा या अधीन किसी भूमिस्वामी को प्रदत्त तथा उस पर अधिरोपित किए गए हों।
(3) प्रत्येक व्यक्ति -
(एक) जो राज्य सरकार या कलेक्टर या आबंटन अधिकारी द्वारा उसे मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम, 1992 के प्रारम्भ पर या उसके पूर्व मंजूर किए गए किसी पट्टे के आधार पर भूमिस्वामी अधिकारों में भूमि धारण किए हुए हैं, ऐसे प्रारम्भ की तारीख से, और
(दो) जिसे राज्य सरकार या कलेक्टर या आबंटन अधिकारी द्वारा भूमि का आबंटन भूमिस्वामी अधिकार में मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम, 1992 के प्रारम्भ के पश्चात् किया गया है, ऐसे आबंटन की तारीख से, ऐसी भूमि के संबंध में भूमिस्वामी समझा जाएगा और उन समस्त अधिकारों तथा दायित्वों के अध्यधीन होगा जो इस संहिता द्वारा या उसके अधीन किसी भूमिस्वामी को प्रदत्त और उस पर अधिरोपित किये गए हैं
परन्तु ऐसा कोई भी व्यक्ति पट्टे या आबंटन की तारीख से 10 वर्ष की कालावधि के भीतर ऐसी भूमि को अंतरित नहीं करेगा।
(4) प्रत्येक व्यक्ति, जो राज्य सरकार या कलेक्टर या आबंटन अधिकारी द्वारा उसे मंजूर किए गये किसी पट्टे के आधार पर भूमि धारण किया हुआ है, ऐसे आबंटन तारीख से 20 वर्ष पूर्ण होने की तारीख पर ऐसी भूमि के संबंध में भूमिस्वामी समझा जाएगा और उन समस्त अधिकारों तथा दायित्वों के अध्यधीन होगा, जो इस संहिता द्वारा या उसके अधीन किसी भूमिस्वामी को प्रदत्त और उस पर अधिरोपित किये गये हैं।
इस धारा में अभिव्यक्ति 'शासक' तथा 'देशी राज्य' के वही अर्थ होंगे जो कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के क्रमशः खण्ड (22) तथा (15) में इन अभिव्यक्तियों के लिए दिए गए हैं।
धारा 158 के अधीन भूमिस्वामी होने वाला प्रत्येक व्यक्ति-
(क) यदि वह अपने द्वारा धारित भूमियों के संबंध में भू-राजस्व का भुगतान कर रहा था ऐसे भू-राजस्व का; या
(ख) यदि वह अपने द्वारा धारित भूमियों के संबंध में लगान का भुगतान कर रहा था ऐसे भू-राजस्व के रूप में भुगतान करेगा।
(1) कहीं भी स्थित प्रत्येक माफी या इनाम भूमि, जिसे राज्य सरकार के विशेष अनुदान से या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबन्धों के अधीन या किसी अन्य लिखत के अनुसरण में, सम्पूर्ण भू-राजस्व या उसके किसी भाग के भुगतान से इसके पूर्व छूट दे दी गई थी, इस संहिता के प्रवृत्त होने के ठीक पश्चात् आने वाले राजस्व-वर्ष के प्रारम्भ से उस सम्पूर्ण भू-राजस्व के भुगतान के दायित्वाधीन होगी जो कि उस भूमि पर निर्धारणीय हो, भले ही किसी ऐसे अनुदान, विधि या लिखत में कोई भी बात अन्तर्विष्ट क्यों न हो।
(2) जहाँ कोई ऐसी माफी या इनाम भूमि किसी सार्वजनिक, धार्मिक या पूर्त संस्था को बनाए रखने या उसके समारक्षण के लिए धारित हो, वहाँ राज्य सरकार ऐसी संस्था के आवेदन पर जो विहित प्ररूप में तथा विहित समय के भीतर किया गया हो उसे भू-राजस्व में उसके द्वारा उपयुक् छूट की रकम से अनधिक ऐसी वार्षिकी प्रदान कर सकेगी जो ऐसी संस्था को समुचित रूप से बनाये रखने या उसके समारक्षण के लिये अथवा उसके द्वारा की जाने वाली सेवा को चालू रखने के लिये युक्तियुक्त समझी जाए।
(3) उपधारा (2) के अधीन प्रदान की गई वार्षिकी ऐसी शर्तों के अध्यधीन होगी जो कि विहित की जाएँ, और वह राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर पुनरीक्षित या प्रत्याहत की जा सकेंगी।
(4) जहाँ उपधारा (2) के अधीन आवेदन कर दिया जाता है, वहाँ संबंधित संस्था से भू- राजस्व की वसूली आवेदन का विनिश्चय होने तक के लिए रोक दी जायेगी।
(1) कलेक्टर, भू-राजस्व निर्धारण चालू रहने के दौरान किसी भी समय, भूमिस्वामी के आवेदन पर या स्वप्रेरणा से ऐसे नियमों के अनुसार, जो कि इस संबंध में बनाये जाएँ, किसी भूमि के संबंध में राजस्व को निम्नलिखित आधारों में से किसी भी आधार पर कम कर सकेगा, अर्थात्:-
(एक) यह कि भूमि बाढ़ों के परिणामस्वरूप या ऐसे भूमिस्वामी के नियन्त्रण से परे किसी अन्य कारण से पूर्णतः या भागतः खेती के अयोग्य हो गई है;
(दो) यह कि राज्य के खर्चे से सन्निर्मित तथा अनुरक्षित सिंचाई का कोई स्रोत, चाहे वह नया हो या पुराना, बेमरम्मत पड़ा हुआ है और उससे उसके संपूर्ण खाते, या उसके किसी भाग की, जिसको कि राजस्व की बढ़ाई गई दर सिंचाई के कारण लागू कर दी गई हैं, सिंचाई नहीं हो रही है;
(तीन) यह कि सिंचाई के किसी प्राइवेट स्रोत से उसके संपूर्ण खाते या उसके किसी भाग की, जिस पर बढ़ाये गये भू-राजस्व का निर्धारण सिंचाई के कारण किया गया है, किसी ऐसे कारण से, जो भूमिस्वामी के नियन्त्रण से परे है, सिंचाई नहीं हो रही है;
(चार) यह कि भूमिस्वामी द्वारा उस भूमि के संबंध में देय राजस्व उस राजस्व से अधिक है जिसकी कि संगणना ऐसी भूमि के लिए गत भू-राजस्व निर्धारण में या किसी अन्य विधि के अधीन नियत की गई दरों से की गई थी;
(पाँच) यह कि ऐसे भूमिस्वामी के खाते का क्षेत्रफल, किसी कारण से, उस क्षेत्रफल से कम हो गया है जिस पर विद्यमान भू-राजस्व निर्धारित किया गया था।
(2) जहाँ उपधारा (1) के अधीन किसी कमी का आदेश किया जाता है, वहाँ ऐसी कमी उस आदेश की तारीख के ठीक आगामी राजस्व वर्ष के प्रारम्भ से प्रभावशाली होगी।
(3) यदि वह हेतुक, जिसकी कि वजह से उपधारा (1) के अधीन राजस्व में कमी की गई हो, वाद में नहीं रह जाता है या दूर कर दिया जाता है, तो कलेक्टर भूमिस्वामी को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, यह निदेश देते हुए आदेश कर सकेगा कि ऐसी कमी प्रभाव में नहीं रहेगी, और ऐसा आदेश पारित कर दिया जाने पर ऐसी कमी उस आदेश की तारीख के ठीक आगामी राजस्व वर्ष के प्रारम्भ से प्रतिसंहत हो जायेगी।
162. छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से शब्द “बंदोबस्त” के स्थान पर प्रतिस्थापित।
भूमिस्वामी अधिकार प्रदान किए जाने के लिए भूमिधारियों द्वारा किए गए समस्त ऐसे आवेदन, जो इस संहिता के प्रवृत्त होने के ठीक पूर्व महाकोशल क्षेत्र के किसी राजस्व न्यायालय के समक्ष चाहे अपील, पुनरीक्षण या पुनर्विलोकन में या चाहे अन्यथा लम्बित हों, फाइल कर दिए जायेंगे और ऐसे भूमिधारियों द्वारा जमा की गई रकम यदि कोई हो, उन्हें वापस कर दी जायगी।
भूमिस्वामी का हित, उसकी मृत्यु हो जाने पर, उसकी स्वीय विधि के अध्यधीन रहते हुए, यथास्थिति विरासत, उत्तरजीविता या वसीयत द्वारा संक्रान्त होगा।
(1) इस धारा के अन्य उपबन्धों के तथा धारा 158 और धारा 168 के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए भूमिस्वामी अपनी भूमि में का कोई भी हित अन्तरित कर सकेगा।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी-
(क) भूमिस्वामी द्वारा किसी भूमि का कोई भी बन्धक इसके पश्चात् तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कि कम से कम पांच एकड़ सिंचित भूमि या दस एकड़ असिंचित भूमि किसी भी विल्लंगम या भार से मुक्त रूप में उसके पास न बच जाये;
(ख) खण्ड (क) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, भूमिस्वामी द्वारा किसी भी भूमि का कोई भोगबन्धक इसके पश्चात् विधिमान्य नहीं होगा यदि वह छह वर्ष से अधिक की कालावधि के लिए हो, और जब तक कि उस बन्धक की एक शर्त यह न हो कि बन्धक विलेख में वर्णित की गई कालावधि का अवसान हो जाने पर उस बन्धक के संबंध में यह समझा जायेगा कि भूमिस्वामी द्वारा किसी भी प्रकार का कोई भुगतान किए बिना ही उसका पूर्णत: मोचन हो गया है, और बन्धकदार उस बन्धक भूमि का कब्जा भूमिस्वामी को तुरन्त वापस दे देगा;
(ग) यदि बन्धक की गई भूमि का कोई सकब्जा बन्धकदार बन्धक की कालावधि का या छह वर्ष का, इनमें से जिसका भी अवसान पहले होता हो, अवसान हो जाने के पश्चात् भूमि का कब्जा नहीं सौंपता है, तो बन्धकदार तहसीलदार के आदेश द्वारा अतिचारी के तौर पर बेदखल किए जाने का दायी होगा और तहसीलदार द्वारा बन्धककर्ता को उस भूमि का कब्जा दिलाया जायेगा:
परन्तु इस उपधारा में की कोई भी बात किसी ऐसी भूमि के किसी बन्धक के मामले में लागू नहीं होगी जो भूमिस्वामी द्वारा कृषि - भिन्न प्रयोजनों के लिए धारित हो।
(3) जहाँ भूमिस्वामी उपधारा (2) के उपबन्धों के अनुसरण में अपनी भूमि का कोई ऐसा बन्धक करता है जो भोग बन्धक से भिन्न हो, वहाँ बन्धक विलेख में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, बन्धक के अधीन प्रोद्भूत होने वाले ब्याज की कुल रकम बन्धकदार द्वारा दी गई मूल रकम के आधे से अधिक नहीं होगी।
(4) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी भी भूमिस्वामी को यह अधिकार नहीं होगा कि वह कोई भी भूमि-
(क) किसी ऐसे व्यक्ति के पक्ष में अन्तरित करे जो ऐसे अन्तरण के फलस्वरूप उसकी भूमि का हकदार हो जायेगा जो स्वयं उसके द्वारा या उसके कुटुम्ब द्वारा धारित भूमि, यदि कोई हो, सहित कुल मिलाकर ऐसी अधिकतम सीमाओं से, 'जो कि विहित की जाएँ, अधिक हो जाए;
(ख)…………….
परन्तु —
(एक) इस उपधारा में की कोई भी बात निम्नलिखित दशाओं में लागू नहीं होगी-
(क) (एक) किसी सार्वजनिक, धार्मिक या पूर्त प्रयोजन के लिये स्थापित किसी संस्था के पक्ष में किए गए अन्तरण या औद्योगिक प्रयोजन के लिए किए गए अन्तरण या बन्धक के रूप में किए गए अन्तरण की दशा में;
(दो) किसी सहकारी सोसाइटी के पक्ष में औद्योगिक प्रयोजन के लिए किए गए अन्तरण या बन्धक के रूप में किए गए अन्तरण की दशा में; तथापि इस शर्त के अध्यधीन रहते हुए कि कृषि प्रयोजनों के लिए कोई भी बन्धक, किसी अग्रिम की वसूली के लिये विक्रय की धारा 147 के खण्ड (ख) के उल्लंघन में प्राधिकृत नहीं करेगा;
(ख) कृषि - भिन्न प्रयोजनों के लिए धारित भूमि के अन्तरण की दशा में;
(दो)…………..
परन्तु यह और भी कि पूर्ववर्ती परन्तुक के खण्ड (एक) के उपखण्ड (क) के अधीन औद्योगिक प्रयोजन के लिए भूमि का अन्तरण निम्नलिखित शर्तों के अध्यधीन होगा, अर्थात् :-
(एक) यदि ऐसी भूमि किसी कृषि-भिन्न प्रयोजन के लिए व्यपवर्तित की जानी हो तो ऐसे व्यपर्तन के लिए धारा 172 के अधीन उपखण्ड अधिकारी की अनुज्ञा ऐसे अन्तरण के पूर्व प्राप्त कर ली गई है; और
(दो) धारा 172 के उपबंन्ध ऐसे अन्तरण को इस उपान्तरण के साथ लागू होंगे कि उसकी उपधारा (1) के परन्तुक में वर्णित तीन मास तथा छह मास की - कालावधि, ऐसे व्यपवर्तन हेतु आवेदन के प्रयोजनों के लिए क्रमशः पैंतालीस दिन और नब्बे दिन होगी;
(तीन) औद्योगिक प्रयोजन हेतु अंतरित भूमि का आगे अन्तरण नहीं किया जायेगा।
इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति के कुटुम्ब में वह व्यक्ति स्वयं, उसकी अवस्यक संतान तथा ऐसे व्यक्ति की पत्नी या उसका पति जो उसके साथ संयुक्त रूप से रहता हो, और यदि ऐसा व्यक्ति अवयस्क हो तो उसके साथ संयुक्त रूप से रहने वाले उसके माता-पिता सम्मिलित होंगे।
2 [ (4-क) 3[* * *]]
2. छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 32 सन् 2013 द्वारा दिनांक 19-8-2013 से अंतःस्थापित।
3. छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।
(5) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, भूमिस्वामी की कोई भी भूमि, किसी न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश के निष्पादन में, किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं बेची जायेगी जो ऐसे विक्रय के फलस्वरूप उतनी भूमि का हकदार हो जायगा जो स्वयं उसके द्वारा या उसके कुटुम्ब द्वारा धारित भूमि, यदि कोई हो, सहित कुल मिलाकर ऐसी अधिकतम सीमाओं से, जो कि विहित की जाएँ,अधिक हो जाये:
परन्तु इस धारा में की कोई भी बात किसी ऐसी सहकारी सोसाइटी की दशा में लागू नहीं होगी जहाँ ऐसी सोसाइटी के पक्ष में पारित किसी डिक्री या आदेश के निष्पादन में किसी भूमि का विक्रय धारा 154 - क में विहित प्रक्रिया निःशेष करने के पश्चात् किया जाना हो।
इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए अभिव्यक्ति "किसी व्यक्ति के कुटुम्ब' का वही अर्थ होगा जो कि उसके लिए उपधारा (4) में दिया गया है।
(6) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसी जनजाति के, जिसे कि राज्य सरकार ने, उस संबंध में अधिसूचना द्वारा, उस पूरे क्षेत्र के लिये, जिसको कि यह संहिता लागू होती है, या उसके किसी भाग के लिये आदिम जनजाति (एबारीजनल ट्राइब) होना घोषित किया हो, किसी भूमिस्वामी का अधिकार-
(एक). ऐसे क्षेत्रों में, जिनमें आदिम जनजातियाँ प्रमुख रूप से निवास करती हों, तथा ऐसी तारीख से, जिसे/जिन्हें कि राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो कि उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए गए क्षेत्र में की ऐसी जनजाति का न हो, विक्रय द्वारा या अन्यथा या उधार संबंधी किसी संव्यवहार के परिणामस्वरूप न तो अन्तरित किया जायेगा और न ही अन्तरणीय होगा;
(दो) खण्ड (एक) के अधीन अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किये गये क्षेत्रों से भिन्न क्षेत्रों में, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो कि ऐसी जनजाति का न हो, कलेक्टर की पदश्रेणी से अनिम्न पदश्रेणी के किसी राजस्व अधिकारी की ऐसी अनुज्ञा के बिना, जो कि लेखबद्ध किये जाने वाले कारणों से दी जायेगी, विक्रय द्वारा या अन्यथा या उधार संबंधी किसी संव्यवहार के परिणामस्वरूप न तो अन्तरित किया जायेगा और न ही अन्तरणीय होगा
परन्तु इस उपधारा के प्रावधान, भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (2013 का सं० 30) के अन्तर्गत अर्जित भूमि को लागू नहीं होंगे।
इस उपधारा के प्रयोजनों के लिये, अभिव्यक्ति "अन्यथा" के अन्तर्गत पट्टा नहीं आता है।
(6-क). उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसी जनजाति के जिसे उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति होना घोषित किया गया है, भूमिस्वामी से भिन्न किसी भूमिस्वामी का कृषि भूमि को छोड़कर अन्य भूमि में का अधिकार, किसी ऐसे व्यक्ति को जो आदिम जनजाति का न हो कलेक्टर की अनुज्ञा, जो लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से दी जायेगी, के बिना विक्रय द्वारा या अन्यथा अथवा उधार संबंधी किसी संव्यवहार के परिणामस्वरूप, न तो अंतरित किया जायेगा और न ही अंतरणीय होगा:
परन्तु 9 जून,1980 के पश्चात, किन्तु 20 अप्रैल, 1981 के पहले किया गया ऐसा प्रत्येक अंतरण, जो इसमें अंतर्विष्ट उपबन्धों के अनुसार न हो, जब तक कि ऐसे अंतरण का अनुसमर्थन कलेक्टर द्वारा इसमें इसके पश्चात् अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार नहीं कर दिया जाता, शून्य होगा और उसका कोई भी प्रभाव नहीं होगा, भले ही इस संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में कोई बात अंतर्विष्ट क्यों न हो।
(6-ख). परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का सं. 36) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कलेक्टर स्वप्रेरणा से किसी भी समय या ऐसे संव्यवहार से तीन वर्ष के भीतर, ऐसे प्ररूप में जैसा कि विहित किया जाये, इस निमित्त आवेदन किये जाने पर ऐसी जाँच, जैसी कि वह उचित समझे, कर सकेगा, और ऐसे अंतरण से प्रभावित व्यक्तियों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् अंतरण का अनुसमर्थन करने वाला या अंतरण का अनुसमर्थन करने से इंकार करने वाला आदेश पारित कर सकेगा।
(6-ग). कलेक्टर, उपधारा (6-क) के अधीन अनुज्ञा देने वाला या अनुज्ञा देने से इंकार करने वाला अथवा उपधारा (6-ख) के अधीन संव्यवहार का अनुसमर्थन करने वाला या अनुसमर्थन करने से इंकार करने वाला कोई आदेश पारित करते समय निम्नलिखित बातों का सम्यक् ध्यान रखेगा :-
(एक) क्या वह व्यक्ति, जिसे भूमि अंतरित की जा रही है, अनुसूचित क्षेत्र का निवासी है या नहीं;
(दो) वह प्रयोजन जिसके लिए भूमि अंतरण के पश्चात् उपयोग में लाई जाएगी या जिसके लिए उसका उपयोग में लाया जाना संभाव्य है;
(तीन) क्या अंतरण से अधिसूचित क्षेत्र के निवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक हितों की पूर्ति होती है या ऐसे हितों की पूर्ति होना संभाव्य है, अथवा क्या वह ऐसे हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है;
(चार) क्या दिया गया प्रतिफल पर्याप्त है;
(पांच) क्या ऐसा संव्यवहार मिथ्या, बनावटी या बेनामी है; और
(छ) ऐसी अन्य बातें जो विहित की जायें।
कलेक्टर का उपधारा (6-क) के अधीन अनुज्ञा देने वाला या अनुज्ञा देने से इंकार करने वाला विनिश्चय अथवा उपधारा (6-ख) के अधीन अंतरण के संव्यवहार का अनुसमर्थन करने वाला या अनुसमर्थन करने से इंकार करने वाला विनिश्चय अंतिम होगा भले ही इस कोड में कोई प्रतिकूल बात अन्तर्विष्ट क्यों न हो।
इस उपधारा के प्रयोजन के लिए-
(क) “अनुसूचित क्षेत्र" से अभिप्रेत है कोई ऐसा क्षेत्र जिसे भारत के संविधान की पंचम अनुसूची की कंडिका 6 के अधीन छत्तीसगढ़ राज्य के भीतर अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गया है;
(ख) अंतरण मिथ्या, बनावटी या बेनामी नहीं था यह साबित करने का भार उस व्यक्ति पर होगा जो यह दावा करता है कि ऐसा अंतरण विधिमान्य हैं।
(6-घ) उपधारा (6-क) के अधीन अनुज्ञा देने से इंकार कर दिया जाने या उपधारा (6-ख) के अधीन अनुसमर्थन करने से इंकार कर दिया जाने पर, अन्तरिती, यदि भूमि उसके कब्जे में हैं, कब्जा तुरंत छोड़ देगा और मूल भूमिस्वामी को उस भूमि का कब्जा प्रत्यावर्तित कर देगा।
(6-ङ) यदि भूमिस्वामी किसी भी कारण से उस भूमि का जिसके कब्जे का अधिकार उसे उपधारा (6-घ) के अधीन प्रत्यावर्तित हो जाता है, कब्जा नहीं लेता है या कब्जा लेने में असमर्थ रहता है, तो कलेक्टर उस भूमि का कब्जा ग्रहण करवाएगा, और ऐसे निर्बन्धनों तथा शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, जैसी कि विहित की जाएँ, उस भूमि का प्रबन्ध भूमिस्वामी की ओर से उस समय तक करवाएगा जब तक कि मूल भूमिस्वामी अपनी भूमि का कब्जा नहीं कर लेता:
परन्तु यदि कब्जा प्रत्यावर्तित करने में कोई प्रतिरोध किया जाता है तो कलेक्टर ऐसे बल का प्रयोग करेगा या करवाएगा जैसा कि आवश्यक हो।
(6-डङ) 2[****]. छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 8 सन् 2006 द्वारा दिनांक 25-1-2006 से विलुप्त।
(6-च) इस कोड में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के अंतर्विष्ट होते हुए भी उपधारा (6-क) से उपधारा (6-डङ) तक के उपबन्ध प्रभावशील होंगे।
(7) उपधारा (1) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी-
(ए) जहाँ किसी भूमिस्वामी के खाते में समाविष्ट भूमि का क्षेत्रफल या उस भूमस्वामी के एक से अधिक खाते होने की दशा में उसके समस्त खातों का कुल क्षेत्रफल सिंचित भूमि के पाँच एकड़ या असिंचित भूमि के दस एकड़ से अधिक हो, वहाँ उसके खाते या खातों में की भूमि का केवल उतना क्षेत्रफल, जितना कि सिंचित भूमि के पाँच एकड़ या असिंचित भूमि के दस एकड़ से अधिक हो, किसी डिक्री या आदेश के निष्पादन में कुर्क किये जाने या बेचे जाने के दायित्वाधीन होगा;
(ख) किसी ऐसी जनजाति के, जिसे उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति होना घोषित किया गया हो, भूमिस्वामी के खाते में समाविष्ट कोई भूमि किसी डिक्री या आदेश के निष्पादन में कुर्क की जाने या बेची जाने के दायित्वाधीन नहीं होगी;
(ग) खण्ड (क) या खण्ड (ख) के उपबन्धों के प्रतिकूल, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का संख्यांक 5) की धारा 51 के अधीन कोई रिसीवर किसी भूमिस्वामी की भूमि का प्रबन्ध करने के लिये नियुक्त नहीं किया जायेगा और न कोई भी ऐसी भूमि प्रान्तीय दिवाला अधिनियम, 1920 (1920 का संख्यांक 5) के अधीन किसी न्यायालय अथवा किसी रिसीवर में निहित होगी:
परन्तु इस उपधारा में की कोई भी बात उस दशा में लागू नहीं होगी जहाँ कि किसी बन्धक द्वारा उस भूमि पर कोई भार सृजित किया गया हो।
(7-क) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, मध्यप्रदेश भूदान यज्ञ अधिनियम, 1968 (क्रमांक 28 सन् 1968) की धारा 33 में विनिर्दिष्ट किये गये किसी भी भूमिस्वामी को यह अधिकार नहीं होगा कि वह उक्त धारा में विनिर्दिष्ट की गई अपनी भूमि में के किसी भी हित का कलेक्टर की अनुज्ञा के बिना अन्तरण कर दे।
(7-ख) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो कोई भूमि राज्य सरकार से धारण करता है या कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो धारा 158 की उपधारा (3) के अधीन भूमिस्वामी अधिकार में भूमि धारण करता है अथवा जिसे कोई भूमि सरकारी पट्टेदार के रूप में दखल में रखने का अधिकार राज्य सरकार या कलेक्टर द्वारा दिया जाता है और जो तत्पश्चात् ऐसी भूमि का भूमिस्वामी बन जाता है, ऐसी भूमि का अन्तरण कलेक्टर की पदश्रेणी से अनिम्न पदश्रेणी के किसी राजस्व अधिकारी की अनुज्ञा, जो लेखबद्ध किये जाने वाले कारणों से दी जायगी, के बिना नहीं करेगा।
(8) इस धारा में की कोई भी बात किसी भूमिस्वामी को किसी ऐसे अग्रिम के, जो कि उसे भूमि विकास उधार अधिनियम, 1883 (1883 का संख्यांक 19) या कृषक उधार अधिनियम, 1884 (1884 का संख्यांक 12) के अधीन दिया गया हो, भुगतान को प्रतिभूत करने हेतु अपनी भूमि में के किसी अधिकार का अन्तरण करने से नहीं रोकेगी या राज्य सरकार के उस अधिकार पर प्रभाव नहीं डालेगी जो कि ऐसे अग्रिम की वसूली हेतु ऐसे अधिकार का विक्रय करने के लिये उसे प्राप्त है।
(9) इस धारा में की कोई भी बात-
(एक) किसी भूमिस्वामी को किसी ऐसे अग्रिम के, जो उसे किसी सहकारी सोसाइटी द्वारा दिया गया हो, संदाय को प्रतिभूत करने हेतु अपनी भूमि में के किसी अधिकार को बंधक के रूप में अन्तरित करने से निवारित नहीं करेगी किन्तु इस शर्त के अध्यधीन रहते हुए कि वसूली सुनिश्चित करने के लिए भूमि का विक्रय धारा 154 क में विहित प्रक्रिया को निःशेष किए बिना नहीं दिया जायेगा; या
(दो) किसी भूमिस्वामी को दिए गये अग्रिम की वसूली धारा 154 क के उपबन्धों के अनुसार सुनिश्चित करने के ऐसी किसी सोसाइटी के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगी।
(9-क) इस धारा में की कोई भी बात किसी ऐसे भूमिस्वामी को जो विस्थापित व्यक्ति हो, किसी ऐसे अग्रिम के, जो कि उसे दण्डकारण्य विकास प्राधिकारी द्वारा दिया गया हो, भुगतान को प्रतिभूत करने हेतु अपनी भूमि में के किसी अधिकार का अन्तरण करने से नहीं रोकेगी या उस प्राधिकारी के उस अधिकार पर प्रभाव नहीं डालेगी जो कि ऐसे अग्रिम की वसूली हेतु ऐसे अधिकार का विक्रय करने के लिये उसे प्राप्त है।
इस उपधारा में "विस्थापित व्यक्ति" से अभिप्रेत है उन राज्य क्षेत्रों से, जो अब पूर्वी पाकिस्तान में समाविष्ट हैं, विस्थापित हुआ कोई ऐसा व्यक्ति जिसे केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा मंजूर की गई विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास संबंधी किसी स्कीम के अधीन 1 अप्रैल, सन् 1957 को या उसके पश्चात् मध्यप्रदेश में पुनर्वासित किया गया है।
(9-बी) इस धारा की कोई भी बात भूमिस्वामी को किसी ऐसे अग्रिम के, जो कि उसे कृषि के प्रयोजन के लिये या खाते के सुधार के प्रयोजन के लिये, किसी वाणिज्यिक बैंक द्वारा दिया गया हो, भुगतान को प्रतिभूत करने के हेतु अपनी भूमि में के किसी अधिकार का अन्तरण करने से नहीं रोकेगी या किसी ऐसे बैंक के उस अधिकार पर प्रभाव नहीं डालेगी जो कि ऐसे अग्रिम की वसूली के हेतु ऐसे अधिकार का विक्रय करने के लिये उसे प्राप्त है।
(10) भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का संख्यांक 16) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई भी ऐसा अधिकारी, जो उस अधिनियम के अधीन दस्तावेजों की रजिस्ट्री करने के लिए सशक्त हो, किसी भी ऐसी दस्तावेज को, जो इस धारा के उपबन्धों का उल्लंघन करने के लिये तात्पर्यित है, रजिस्ट्रीकरण के लिए ग्रहण नहीं करेगा।
(11) इस धारा में की कोई भी बात -
(क) किसी ऐसे अन्तरण को, जो इस संहिता के प्रवृत्त होने के पूर्व विधिमान्यतः किया गया था, अविधिमान्य नहीं बनायेगी; या
(ख) किसी ऐसे अन्तरण को, जो इस संहिता के प्रवृत्त होने के पूर्व अविधिमान्यतः किया गया था, विधिमान्य नहीं बनायेगी।
इस धारा के प्रयोजनों के लिये, एक एकड़ सिंचित भूमि को दो एकड़ असिंचित भूमि के बराबर समझा जायेगा और इसी प्रकार इसका विपर्यय।
(1) यदि भूमि का अन्तरण धारा 165 की उपधारा (4) के खण्ड (क) के उपबन्धों के उल्लंघन में किया जाता है, तो अन्तरिती के पास की उतनी भूमि जो विहित की गई उच्चतम सीमा से ऊपर हो, अन्तरिती द्वारा विहित कालावधि के भीतर चयन कर ली जाने पर और उपखण्ड अधिकारी द्वारा उसका सीमांकन ऐसे नियमों के, जो कि उस सम्बन्ध में बनाये जाएँ, अनुसार कर दिया जाने के पश्चात्, राज्य सरकार को समपहृत हो जायेगी:
परन्तु यदि अन्तरिती विहित कालावधि के भीतर चयन नहीं करता है तो ऐसा चयन उपखण्ड अधिकारी द्वारा किया जायगा।
(2) [****]
(3) उपखण्ड अधिकारी, उपधारा (1) तथा (2) में निर्दिष्ट किये गये मामलों में, अन्तरिती के पास बच रही भूमि के सम्बन्ध में भू-राजस्व, विहित रीति में नियत करेगा।
धारा 165 के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, भूमिस्वामी, खातों की चकबन्दी के प्रयोजनों के लिये, या खेती में और अधिक सुविधा सुनिश्चित करने के प्रयोजनों के लिये अपने सम्पूर्ण खाते या उसके किसी भाग का विनिमय पारस्परिक करार द्वारा कर सकेंगे।
(1) उन मामलों में के सिवाय जिनके कि लिये उपधारा (2) में उपबन्ध किया गया है, कोई भी भूमिस्वामी उसके खाते में समाविष्ट किसी भूमि को तीन वर्ष की किसी क्रमवर्ती कालावधि के दौरान एक वर्ष से अधिक समय के लिये पट्टे पर नहीं देगा:
परन्तु इस उपधारा में की कोई भी बात किसी भूमि के ऐसे पट्टे को लागू नहीं होगी जो –
(एक) भूमिस्वामी द्वारा ऐसी रजिस्ट्रीकृत सहकारी कृषि सोसाइटी को दिया गया हो जिसका कि वह सदस्य है;
(दो) भूमिस्वामी द्वारा कृषि-भिन्न प्रयोजनों के लिए धारित हो।
इस धारा के प्रयोजनों के लिये-
(क) "पट्टा" से अभिप्रेत है किसी भूमि का उपभोग करने के अधिकार का ऐसा अंतरण जो एक अभिव्यक्त या विवक्षित समय के लिये, किसी कीमत के, जो दी गई हो या जिसे देने का वचन दिया गया हो अथवा धन या किसी अन्य मूल्यवान वस्तु के, जो कालावधीय रूप से अंतरिती द्वारा, जो उस अंतरण को ऐसे निबंधनों पर प्रतिगृहित करता है, अन्तरक को दी जानी है, प्रतिफल के रूप में किया गया हो;
(ख) किसी ऐसे ठहराव को, जिसके द्वारा कोई व्यक्ति (पट्टेदार) अपने बैलों से या अपने द्वारा उपाप्त बैलों से और उसके द्वारा भूमिस्वामी को भूमि की उपज का कोई विनिर्दिष्ट अंश देने की शर्त पर भूमिस्वामी की किसी भूमि पर खेती करता है, पट्टा समझा जायेगा;
(ग) केवल घास काटने या पशु चराने या सिंघाड़ा उगाने या लाख का प्रजनन या संग्रहण करने, तेन्दूपत्ते तोड़ने या उनका संग्रहण करने के अधिकार का दिया जाना भूमि का पट्टा नहीं समझा जायगा।
(2) भूमिस्वामी, जो —
(एक) विधवा है; या
(दो) अविवाहित स्त्री है; या
(तीन) ऐसी विवाहित स्त्री है जिसे उसके पति ने त्याग दिया है; या
(चार) अव्यस्क है; या
(पांच) ऐसा व्यक्ति है जो वृद्धावस्था के कारण या अन्यथा शारीरिक या मानसिक दृष्टि से निःशक्त हो गया है; या
(छह) ऐसा व्यक्ति है जो किसी विधि- आदेशिका के अधीन निरुद्ध या कारावासित है; या
(सात) ऐसा व्यक्ति है जो संघ के सशस्त्र बल की सेवा में है; या
(आठ) सार्वजनिक, पूर्त या धार्मिक संस्था है; या
(नौ) स्थानीय प्राधिकारी या सहकारी सोसाइटी है;
अपना सम्पूर्ण खाता या उसका कोई भाग पट्टे पर दे सकेगा:
परन्तु जहाँ कोई खाता एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा संयुक्तत: धारित है, वहाँ इस उपधारा के उपबंध तब तक लागू नहीं होंगे जब तक कि ऐसे समस्त व्यक्ति पूर्वोक्त वर्गों में से किसी एक वर्ग के या एक से अधिक वर्गों के न हों:
परन्तु यह और भी कि इस उपधारा के अनुसरण में दिया गया कोई भी पट्टा, मृत्यु हो जाने या अन्य प्रकार से निःशक्तता समाप्त हो जाने के एक वर्ष पश्चात् प्रवृत्त नहीं रहेगा।
(3) [***]
(4) जहाँ पट्टा उपधारा (2) के अनुसरण में दिया जाता है, वहाँ पट्टेदार उस भूमि को ऐसे निबंधनों तथा शर्तों पर धारण करेगा जैसी कि उसके तथा भूमिस्वामी के बीच करार पाई जाएँ और उसे उस दशा में उपखण्ड अधिकारी के आदेश से बेदखल किया जा सकेगा जबकि भूमिस्वामी ने इस आधार पर आवेदन किया हो कि उस पट्टे के किसी तात्विक निबन्धन या शर्त का उल्लंघन हुआ है या इस आधार पर आवेदन किया हो कि पट्टा प्रवृत्त नहीं रहा है।
(5) जहाँ इस संहिता के प्रवृत्त होने के समय कोई भूमि किसी ऐसे भूमिस्वामी से जो उपधारा (2) में वर्णित वर्गों में से किसी एक वर्ग का या एक से अधिक वर्गों का है, पट्टे पर धारित है, वहाँ इस संहिता के प्रवृत्त होने पर ऐसे पट्टे के सम्बन्ध में यह समझा जायेगा कि उपधारा (2) के अनुसरण में दिया गया पट्टा है।
(6) धारा 168 के उल्लंघन का दोषी पाये गये व्यक्तियों के विरुद्ध, उपखण्ड अधिकारी, प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर रुपये पच्चीस हजार से अनधिक ऐसी राशि का, जैसा कि वह ठीक समझे, अर्थदण्ड अधिरोपित कर सकेगा।
यदि कोई भूमिस्वामी-
(एक) अपने खाते में समाविष्ट किसी भूमि को धारा 168 के उल्लंघन में किसी कालावधि के लिये पट्टे पर दे देता है, या
(दो) किसी ऐसे ठहराव, जो धारा 168 की उपधारा (1) के अधीन पट्टा न हो, द्वारा किसी व्यक्ति को अपने खाते में समाविष्ट किसी भूमि पर अपने भाड़े के श्रमिक के रूप में न होकर अन्यथा, खेती करने हेतु अनुज्ञात करता है, और उस ठहराव के अधीन ऐसा व्यक्ति, उसे धारा 250 के अनुसार बेदखल किये गये बिना, दो वर्ष से अधिक कालावधि के लिये ऐसी भूमि को कब्जे में रखने के लिये अनुज्ञात किया जाता है,
तो मौरूसी कृषक के अधिकार-
(क) उपर्युक्त (एक) के मामले में, पट्टेदार को ऐसी भूमि में तदुपरि प्रोदभूत हो जायेंगे; और
(ख) उपर्युक्त (दो) के मामले में कब्जे की तारीख से दो वर्ष की कालावधि का अवसान हो जाने पर, ऐसे व्यक्ति को उस भूमि में प्रोदभूत हो जायेंगे:
परन्तु इस धारा में की कोई भी बात किसी ऐसी भूमि को लागू नहीं होगी जो किसी ऐसी जनजाति के, जिसे धारा 165 की उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति घोषित किया गया है, किसी भूमि स्वामो के खाते में समाविष्ट हो तथा जो यथास्थिति उसके द्वारा पट्टे पर दी गई है या जिसके संबंध में उसने पूर्वोक्तानुसार कोई ठहराव किया है।
(1) जहाँ किसी भूमिस्वामी द्वारा कब्जे का अन्तरण किसी ऐसे अन्तरण के अनुसरण में किया गया हो जो कि धारा 165 की उपधारा (6) के उल्लंघन में हो, वहां कोई भी ऐसा व्यक्ति जो किसी ऐसे भूमि स्वामी का, जिसके कि कोई निकटतर वारिस न हों, उत्तरजीवी होने की दशा में उस खाते को विरासत में प्राप्त करता-
(एक) 1 जुलाई सन् 1976 के पूर्व के कब्जे के अन्तरण के मामले में, 31 दिसम्बर सन् 1978 तक और
(दो) पश्चात्वर्ती मामलों में कब्जे के ऐसे अन्तरण के बारह वर्ष के भीतर;
उपखण्ड अधिकारी को यह आवेदन कर सकेगा कि उसे इस बात के अध्यधीन कब्जा दिलाया जाये कि उसे भू-राजस्व की बकाया या किन्हीं भी अन्य शोध्यों, जो कि उस खाते पर भार हों, बाबत वे दायित्व स्वीकार्य होंगे जिन्हें कि उपखण्ड अधिकारी इस संबंध में बनाये गये नियमों के अनुसार अवधारित करे और उपखण्ड अधिकारी ऐसे आवेदन का निपटारा ऐसी प्रक्रिया के अनुसार करेगा जैसी कि विहित की जाये।
(2) जहाँ भूमिस्वामी को कोई भूमि धारा 165 की उपधारा (5) के उल्लंघन में बेची जाती है। वहाँ वह न्यायालय जिसके कि द्वारा ऐसे विक्रय का आदेश दिया जाता है, उस भूमिस्वामी के या किसी भी ऐसे व्यक्ति के, जो उस भूमिस्वामी का, जिसके कि कोई निकटतर वारिस न हो, उत्तरजीवी होने की दशा में उस खाते को विरासत में प्राप्त करता, आवेदन पर जो ऐसे विक्रय के दो वर्ष के भीतर किया गया हो, उस विक्रय को अपास्त कर देगा और आवेदक को उस भूमि का कब्जा इस बात के अध्यधीन दिलवाएगा कि उसे भू-राजस्व की बकाया या किन्हीं भी अन्य शोध्यों, जो कि उस भूमि पर भार हों, संबंधी दायित्व स्वीकार्य होंगे।
(1) परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का सं. 36) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी उपखण्ड अधिकारी स्वप्रेरणा से या कृषि भूमि के ऐसे अन्तरक द्वारा, जो किसी ऐसी जनजाति का हो जिसे कि धारा 165 की उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति घोषित किया गया हो, 31 दिसम्बर सन् 1978 को या उसके पूर्व किये गये ऐसे आवेदन पर ऐसी भूमि के ऐसे अन्तरण की जो कि 2 अक्टूबर सन् 1959 से प्रारम्भ होने वाली तथा मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता (तृतीय संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रारम्भ होने की तारीख को समाप्त होने वाली कालावधि के दौरान किसी भी समय विक्रय द्वारा या किसी न्यायालय की डिक्री के अनुसरण में किसी ऐसे व्यक्ति को किया गया हो जो ऐसी जनजाति का न हो, या ऐसे अन्तरण की, जो कि 2 अक्टूबर सन् 1959 से प्रारम्भ होने वाली तथा मध्यप्रदेश भू- राजस्व संहिता (तृतीय संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रारम्भ होने की तारीख को समाप्त होने वाली कालावधि के दौरान किसी भी समय, धारा 169 के अधीन मौरूसी कृषक के अधिकार की या धारा 190 की उपधारा (2-क) के अधीन भूमिस्वामी के अधिकार की प्रोद्भूति द्वारा हुआ हो जाँच ऐसे अन्तरण के सद्भाविक स्वरूप के बारे में स्वयं का समाधान करने के लिये कर सकेगा।
(2) यदि उपखण्ड अधिकारी का, जाँच करने पर तथा ऐसी भूमि में किसी हित का स्वामित्व रखने वाले व्यक्तियों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, यह समाधान हो जाए कि ऐसा अन्तरण सद्भाविक नहीं था, तो वह इस संहिता में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी-
(क) खण्ड (ख) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, ऐसे अन्तरण को उस दशा में अपास्त कर सकेगा जबकि वह किसी ऐसे धारक द्वारा किया गया हो जो किसी ऐसी जनजाति का हो जिसे की धारा 165 की उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति घोषित किया गया हो, और ऐसे अन्तरक को वह भूमि वापस दिला सकेगा; या
(क) खण्ड (ख) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए ऐसे अन्तरण को उस दशा में अपास्त कर सकेगा जबकि वह किसी ऐसे धारक द्वारा किया गया हो जो किसी ऐसी जनजाति का हो जिसे की धारा 165 की उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति घोषित किया गया हो, और ऐसे अन्तरक को वह भूमि उसे उस भूमि का कब्जा तत्काल दे कर वापस दिला सकेगा; या
(ख) जहाँ ऐसी भूमि कृषि भिन्न प्रयोजनों के लिये व्यपवर्तित कर दी गई हो, वहाँ वह ऐसी भूमि की वह कीमत नियत करेगा जो कि ऐसी भूमि के लिये, उसके अन्तरण के समय प्राप्त होती तथा अन्तरिती को यह आदेश देगा कि वह इस प्रकार नियत की गई कीमत तथा वस्तुतः संदत्त की गई कीमत के बीच होने वाले अन्तर, यदि कोई हो, की रकम अन्तरक को छह मास की कालावधि के भीतर संदत्त कर दे।
(1) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम, 1980 (जो इसमें इसके पश्चात् संशोधन अधिनियम, 1980 के नाम से निर्दिष्ट है) के प्रारम्भ की तारीख को किसी ऐसी कृषि भूमि का कब्जा रखता है जो 2 अक्टूबर, 1959 से प्रारम्भ होने वाली और संशोधन अधिनियम, 1980 के प्रारम्भ होने की तारीख को समाप्त होने वाली कालावधि के बीच, किसी ऐसी जनजाति के सदस्य की रही ही जिसे धारा 165 की उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति घोषित किया गया हो, ऐसे प्रारम्भ से दो वर्ष के भीतर, उपखण्ड अधिकारी को ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति में, जैसी कि विहित की जाये, इस संबंध में समस्त जानकारी अधिसूचित करेगा कि ऐसी भूमि उसके कब्जे में कैसे आई।
(2) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के द्वारा अपेक्षित किये गए अनुसार जानकारी, उसमें विनिर्दिष्ट की गई कालावधि के भीतर, अधिसूचित नहीं करता है, तो यह उपधारणा की जायेगी कि ऐसी कृषि भूमि ऐसे व्यक्ति के कब्जे में बिना किसी विधिपूर्ण प्राधिकार के रही है और वह कृषि- भूमि, पूर्वोक्त कालावधि का अवसान हो जाने पर उस व्यक्ति को प्रतिवर्तित हो जायेगी जिसकी वह मूलतः थी और यदि वह व्यक्ति मर चुका है तो उसके विधिक वारिसों को प्रतिवर्तित हो जायेगी।
(2-क) यदि कोई ग्राम सभा संविधान के अनुच्छेद 244 के खंड (1) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्र में यह पाती है कि आदिम जनजाति के सदस्य से भिन्न कोई व्यक्ति आदिम जनजाति के भूमिस्वामी की भूमि के कब्जे में बिना किसी विधिपूर्ण प्राधिकार के है, तो वह ऐसी भूमि का कब्जा उस व्यक्ति को प्रत्यावर्तित करेगी जिसकी कि वह मूलतः थी और यदि उस व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है तो उसके विधिक वारिसों को प्रत्यावर्तित करेगी:
परन्तु यदि ग्राम सभा ऐसी भूमि का कब्जा प्रत्यावर्तित करने में असफल रहती है, तो वह मामला उपखंड अधिकारी की ओर निर्दिष्ट करेगी जो ऐसी भूमि का कब्जा, निर्देश की प्राप्ति की तारीख से तीन मास के भीतर प्रत्यावर्तित करेगा।
(3) उपधारा (1) के अधीन जानकारी प्राप्त होने पर उपखण्ड अधिकारी अन्तरण के ऐसे समस्त संव्यवहारों के बारे में ऐसी जाँच करेगा, जैसी कि आवश्यक समझी जाये, और यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि आदिम जनजाति के सदस्य को उसके विधिसम्मत अधिकार से कपट- वंचित किया गया है तो वह उस संव्यवहार को अकृत और शून्य घोषित करेगा और उस कृषि भूमि को अन्तरक में, और यदि वह मर चुका है तो उसके विधिक वारिसों में पुनः निहित करने वाला आदेश पारित करेगा।
(3) उपधारा (1) के अधीन जानकारी प्राप्त होने पर उपखण्ड अधिकारी अन्तरण के ऐसे समस्त संव्यवहारों के बारे में ऐसी जाँच करेगा जैसी कि आवश्यक समझी जाए, और यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि आदिम जनजाति के सदस्य को उसके विधिसम्मत अधिकार से कपट- वंचित किया गया है तो वह उस संव्यवहार को अकृत और शून्य घोषित करेगा, और-
(क) जहाँ उस कृषि भूमि पर कोई भवन या संरचना ऐसे निष्कर्ष पर पहुँचने के पूर्व परिनिर्मित नहीं की गई है, वहाँ उस कृषि भूमि को अंतरक में और यदि वह मर चुका है तो उसके विधिक वारिसों में पुनर्निहित करने वाला आदेश पारित होगा;
(ख) जहाँ उस कृषि भूमि पर कोई भवन या संरचना ऐसे निष्कर्ष पर पहुँचने के पूर्व परिनिर्मित कर ली गई है, वहाँ वह ऐसी भूमि की कीमत उन सिद्धान्तों के अनुसार नियत करेगा जो भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (2013 का सं० 30) में भूमि की कीमत नियत करने के लिए अभिकथित किए गए हैं, और उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्ति को यह आदेश देगा कि वह इस प्रकार नियत की गई कीमत तथा अदरक को वस्तुतः चुकाई गई कीमत के बीच के अन्तर की रकम का, यदि कोई हो, संदाय अन्तरक को कर दे :
परन्तु जहाँ कोई भवन या संरचना जनवरी 1984 के प्रथम दिन के पश्चात् परिनिर्मित कर ली गई है वहाँ, उपर्युक्त खण्ड (ख) के उपबन्ध लागू नहीं होंगे :
परन्तु यह और भी खण्ड (ख) के अधीन कीमत का नियतन उस कीमत के, जो उपखण्ड अधिकारी के समक्ष मामला रजिस्टर किये जाने की तारीख को ही, प्रति निर्देश से किया जाएगा।
अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का सं० 25 ) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी कोई भी अधिवक्ता धारा 170 क या धारा 170 ख के अधीन किन्हीं भी कार्यवाहियों में किसी राजस्व अधिकारी के समक्ष ऐसे अधिकारी की अनुज्ञा के बिना उपसंजात नहीं होगा:
परन्तु यदि किसी एक पक्षकार को, जो उस जनजाति का सदस्य न हो, जिसे धारा 165 की उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति घोषित किया गया हो, ऐसी अनुज्ञा दे दी जाती है तो वैसी ही सहायता सदैव उस जनजाति के दूसरे पक्षकार को विधिक सहायता अभिकरण के खर्चे पर तथा उसके माध्यम से दी जाएगी।
इस संहिता में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किन्हीं भी ऐसे आदेशों के विरुद्ध कोई द्वितीय अपील नहीं होगी जो दिनांक 24 अक्टूबर, 1983 को या उसके पश्चात् धारा 170 क तथा 170 ख के अधीन पारित किए गए हों।
कृषि के प्रयोजन के लिये धारित भूमि का भूमिस्वामी, उस भूमि पर अधिक अच्छी खेती के लिये या पूर्वोक्त प्रयोजन के लिए उसके अधिक सुविधापूर्ण उपयोग हेतु उस पर कोई भी सुधार करने का हकदार है।
(एक) नगरीय क्षेत्र में या ऐसे क्षेत्र की बाहरी सीमाओं से पाँच मील की त्रिज्या के भीतर; या
(दो) किसी ऐसे ग्राम में, जिनकी जनसंख्या गत जनगणना के अनुसार दो हजार या उससे अधिक हो; या
(तीन) ऐसे अन्य क्षेत्रों में, जिन्हें राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे;
किसी प्रयोजन के लिये धारित भूमि का भूमिस्वामी अपने खाते या उसके किसी भाग को कृषि के सिवाय किसी अन्य प्रयोजन के लिये व्यपवर्तित करना चाहता है तो वह इस बाबत अनुज्ञा दी जाने के लिए सक्षम प्राधिकारी को आवेदन करेगा, जो इस धारा के तथा इस संहिता के अधीन बनाये गये नियमों के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुये, अनुज्ञा देने से इंकार कर सकेगा या अनुज्ञा ऐसी शर्तों पर दे सकेगा जैसी कि वह ठीक समझे
परन्तु यदि सक्षम प्राधिकारी उपधारा (1) के अधीन आवेदन प्राप्त होने के पश्चात् तीन मास तक उसके संबंध में अनुज्ञा या इंकारी का आदेश करने तथा उसे आवेदक को परिदत्त करने में उपेक्षा या चूक करता है, और आवेदक ने उस चूक या उपेक्षा की ओर सक्षम प्राधिकारी का ध्यान लिखित संसूचना द्वारा आकृष्ट कर दिया हो तथा ऐसी चूक या उपेक्षा छह मास की और कालावधि तक जारी रहती है तो यह समझा जायेगा कि सक्षम प्राधिकारी ने अनुज्ञा बिना किसी शर्त के प्रदान कर दी है:
परन्तु यह और कि यदि किसी ऐसी भूमि, जो विकास योजना में कृषि से भिन्न प्रयोजन के लिये आरक्षित की गई हैं किन्तु उसका उपयोग कृषि के लिए किया जाता है, का भूमिस्वामी, अपनी भूमि या उसके किसी भाग को ऐसे प्रयोजनों, जिसके लिये वह भूमि विकास योजना में आरक्षित है, के लिए अथवा ऐसी भूमि या उसका कोई भाग जिसका निर्धारण कृषि प्रयोजन हेतु किया गया है तथा जो विकास योजना के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र से भिन्न किसी क्षेत्र में स्थित है, औद्योगिक प्रयोजन के लिये व्यपवर्तित करना चाहता है, तो भूमिस्वामी द्वारा अपने आशय की सक्षम प्राधिकारी को दी गई लिखित जानकारी पर्याप्त होगी तथा ऐसे व्यपवर्तन के लिए कोई अनुमति अपेक्षित नहीं होगी:
परन्तु यह और कि औद्योगिक प्रयोजन हेतु व्यपवर्तित की गई भूमि के व्यपवर्तन की सूचना देने के दिनांक से, सूक्ष्म (अतिलघु), लघु एवं मध्यम उद्योगों को तीन वर्ष की कालावधि के भीतर तथा बड़े उद्योगों की दशा में पांच वर्ष की कालावधि के भीतर, स्थापित किया जाना अनिवार्य होगा। यदि उद्योग की स्थापना के पश्चात् उपरोक्त उल्लिखित विनिर्दिष्ट कालावधि के भीतर, उत्पादन शुरू नहीं किया जाता है, तो व्यपवर्तन स्वमेव शून्यवत हो जायेगा :
परंतु यह और भी कि राज्य शासन, लिखित में लेखबद्ध किये जाने वाले विशिष्ट कारणों से, उक्त कालावधि को बढ़ा सकेगा:
परन्तु यह भी कि यदि सक्षम प्राधिकारी किसी अवैध कालोनी, जिसकी भूमि व्यपवर्तित नहीं की गई है, के नियमितीकरण के कार्य का जिम्मा लेता है तो ऐसी भूमि विकास योजना के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए व्यपवर्तित हो गई समझी जाएगी और ऐसी भूमि धारा 59 के अधीन प्रीमियम तथा पुनरीक्षित भू-राजस्व के लिए दायी होगी।
इस धारा के प्रयोजन के लिये सक्षम प्राधिकारी का वही अर्थ होगा जो उसके लिए छत्तीसगढ़ नगरपालिक निगम अधिनियम, 1956 (क्रमांक 23 सन् 1956) और छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 ( क्रमांक 37 सन् 1961) के अधीन बनाए गए छत्तीसगढ़ नगर पालिका (कालोनाईजर का रजिस्ट्रीकरण, निबंधन तथा शर्ते) नियम, 1998 में दिया गया है।
(2) व्यपवर्तित करने की अनुज्ञा देने से सक्षम प्राधिकारी द्वारा केवल इन आधारों पर इंकार किया जा सकेगा कि उस व्यपवर्तन से लोक न्यूसेंस होना संभाव्य है, या यह कि भूमिस्वामी उन शर्तों का, जो कि उपधारा (3) के अधीन अधिरोपित की जायें, अनुपालन करने में असमर्थ है या अनुपालन करने के लिये राजी नहीं है।
(3) व्यपवर्तन के संबंध में शर्तें निम्नलिखित उद्देश्यों, अर्थात् सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा सुविधा सुनिश्चित करने के लिये ही अधिरोपित की जा सकेंगी अन्य उद्देश्यों के लिये नहीं और उस भूमि की दशा में जिसका कि उपयोग निर्माण स्थलों के रूप में किया जाना है, उपर्युक्त बातों के अतिरिक्त यह सुनिश्चित करने के लिये अधिरोपित की जा सकेंगी कि स्थलों की विमा, उनका विन्यास तथा उन तक पहुंच दखलकारों के स्वास्थ्य तथा सुविधा की दृष्टि से पर्याप्त है या संबंधित बस्ती के लिये उपयुक्त है।
(4) यदि कोई भूमि, भूमिस्वामी द्वारा बिना अनुज्ञा के या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भूमिस्वामी की सम्मति से या उसकी सम्मति के बिना व्यपवर्तित कर दी गई है तो सक्षम प्राधिकारी, उसकी जानकारी प्राप्त होने पर उस व्यक्ति पर जो व्यपवर्तन के लिये जिम्मेदार है, ऐसी शास्ति अधिरोपित कर सकेगा जो दस हजार रुपये से अधिक न हो, और उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार इस प्रकार कार्यवाही कर सकेगा मानो व्यपवर्तित करने की अनुज्ञा के लिये आवेदन कर दिया गया हो।
(5) यदि कोई भूमि, पूर्वगामी उपधाराओं में से किसी उपधारा के अधीन पारित किये गये किसी आदेश या अधिरोपित की गई किसी शर्त के उल्लंघन में व्यपवर्तित की गई है, तो सक्षम प्राधिकारी उस व्यक्ति पर, जो ऐसे उल्लंघन के लिये जिम्मेदार है, सूचना तामील कर सकेगा जिसमें उसे यह निदेश दिया जायेगा कि वह उस सूचना में कथित युक्तियुक्त कालावधि के भीतर उस भूमि को उसके मूल प्रयोजन के लिये उपयोग में लाए या शर्त का अनुपालन करे; और ऐसी सूचना में ऐसे व्यक्ति से यह अपेक्षा की जा सकेगी कि वह किसी संरचना को हटा ले, किसी उत्खात को भर दे या ऐसे अन्य उपाय करे जो इस दृष्टि से अपेक्षित हों कि उस भूमि को उसके मूल प्रयोजन के लिये उपयोग में लाया जा सके, या यह कि शर्त को पूरा किया जा सके। सक्षम प्राधिकारी ऐसे व्यक्ति पर ऐसे उल्लंघन के लिये ऐसी शास्ति, जो एक हजार रुपये से अधिक की नहीं होगी तथा ऐसी अतिरिक्त शास्ति भी, जो प्रत्येक ऐसे दिन के लिये, जिसके दौरान कि ऐसे उल्लंघन चालू रहे, एक सौ रुपयेसे अधिक की नहीं होगी, अधिरोपित कर सकेगा।
(6) यदि कोई व्यक्ति, जिस पर उपधारा (5) के अधीन सूचना तामील की गई है, सक्षम प्राधिकारी द्वारा उस उपधारा के अधीन आदिष्ट उपाय सूचना में कथित कालावधि के भीतर नहीं करता है तो सक्षम प्राधिकारी ऐसे उपाय या तो स्वयं कर सकेगा या करवा सकेगा; और ऐसा करने में उपगत कोई भी खर्च ऐसे व्यक्ति से उसी प्रकार वसूल किया जा सकेगा मानो कि वह भू- राजस्व की बकाया हो।
(6-क) 3[* * *] 3. छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 32 सन् 2013 द्वारा दिनांक 19-8-2013 से विलुप्त।
इस धारा में व्यपवर्तन से अभिप्रेत है भूमि को, जिस पर धारा 59 के अधीन किसी एक प्रयोजन के लिये निर्धारण किया गया हो, उस धारा में वर्णित किसी अन्य प्रयोजन के लिये उपयोग में लाना किन्तु भूमि को, जबकि उस पर किसी अन्य प्रयोजन के लिये निर्धारण किया गया हो, कृषि प्रयोजन के लिये उपयोग में लाना व्यपवर्तन नहीं समझा जायेगा।
इस धारा के प्रयोजनों के लिये शब्द 'विकास योजना' का वही अर्थ होगा जो कि छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 (क्रमांक 23 सन् 1973) में उसके लिये दिया गया है।
(1) इस संहिता के अधीन बनाये गये नियमों के अध्यधीन रहते हुये, भूमिस्वामी, कृषि वर्ष प्रारम्भ होने की तारीख से कम-से-कम तीस दिन पूर्व तहसीलदार को लिखित सूचना देकर अपने अधिकारों का त्यजन कर सकेगा अर्थात् उन्हें राज्य सरकार के पक्ष में त्याग सकेगा, किन्तु ऐसा किन्हीं ऐसे अधिकारों, भौमिक अधिकारों, विल्लंगमों या साम्याधिकारों के अध्यधीन रहते हुये ही किया जा सकेगा जो राज्य सरकार या भूमिस्वामी से भिन्न किसी व्यक्ति के पक्ष में विधिपूर्वक विद्यमान हों और जब वह भूमिस्वामी ऐसे आदेश की ऐसी तारीख के ठीक आगमी कृषि-वर्ष से भूमिस्वामी नहीं रह जायेगा। खाते के केवल किसी भाग का त्यजन किया जाने की दशा में, तहसीलदार उस खाते पर निर्धारित राशि को इस संहिता के अधीन बनाये गये नियमों के अनुसार प्रभाजित करेगा:
परन्तु किसी खाते का या खाते के किसी भाग का विल्लंगम या भार के अध्यधीन त्यजन विधिमान्य नहीं होगा।
(2) संहिता की धारा 172 के अंतर्गत व्यपवर्तित की गई भूमि का त्यजन, उपधारा (1) के अनुसार उपखण्ड अधिकारी को लिखित सूचना देकर किया जा सकेगा।
यदि धारा 173 के अधीन सर्वेक्षण संख्यांक या भू-खंड संख्यांक के किसी उपखंड का त्यजन कर दिया जाता है, तो तहसीलदार उसी सर्वेक्षण संख्यांक या भू-खंड संख्यांक के अन्य उपखंडों के भूमिस्वामी को ऐसी प्रीमियम पर, जो कि वह उचित समझे, ऐसे उपखंड को दखल में लेने के अधिकार देगा और यदि ऐसे भूमिस्वामियों में स्पर्धा हो तो वह ऐसे अधिकार को उनमें से सबसे ऊँची बोली लगाने वाले भूमिस्वामी को बेच देगा।
यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसी भूमि के संबंध में, जिसके कि लिये मार्ग उसके द्वारा प्रतिधारित अन्य भूमि में से होकर जाता है, अपने अधिकारों का त्यजन कर देता है, तो त्यजन की गई भूमि का कोई भावी धारक प्रतिधारित भूमि में से होकर आने-जाने का हकदार होगा।
(1) यदि कोई ऐसा भूमिस्वामी, जो अपने खाते पर या तो स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दो वर्ष तक खेती नहीं करता है, भू-राजस्व का भुगतान नहीं करता है और उसने उस ग्राम को, जिसमें कि वह सामान्यतः निवास करता है, छोड़ दिया हो तो तहसीलदार, ऐसी जाँच के पश्चात् जैसी कि वह आवश्यक समझे, उस खाते में समाविष्ट भूमि का कब्जा ले सकेगा और एक बार में एक कृषि-वर्ष की कालावधि के लिए उस भूमि को भूमिस्वामी की ओर से पट्टे पर देकर उस पर खेती की व्यवस्था कर सकेगा।
(2) जहाँ भूमिस्वामी या भूमि के लिए विधिपूर्वक हकदार कोई अन्य व्यक्ति, उस तारीख के, जिसको कि तहसीलदार ने उस भूमि का कब्जा लिया हो, ठीक आगामी कृषि-वर्ष के प्रारम्भ से तीन वर्ष की कालावधि के भीतर उस भूमि के लिए दावा करता है, वहां वह भूमि, शोध्यों का, यदि कोई हो, भुगतान कर दिया जाने पर तथा ऐसे निबंधनों एवं शर्तों पर, जैसी कि तहसीलदार उचित समझे, उसे वापस दिला दी जायेगी।
(3) जहाँ उपधारा (2) के अधीन कोई दावा नहीं किया जाता है या यदि कोई दावा किया जाता है और वह नामंजूर कर दिया जाता है, तो तहसीलदार, उस खाते को परित्यक्त घोषित करते हुए आदेश करेगा और वह खाता ऐसी तारीख से, जो कि उस आदेश में उस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाये, राज्य सरकार में पूर्णरूप से निहित हो जाएगा।
(4) जहाँ कोई खाता उपधारा (3) के अधीन परित्यक्त घोषित कर दिया जाता है, वहाँ राजस्व की उस बकाया के संबंध में जो कि उस खाते की बाबत उस भूमिस्वामी से शोध्य हो, उस भूमिस्वामी के दायित्व का उन्मोचन हो जायेगा।
(1) यदि कोई ऐसा भूमिस्वामी, जिसकी भूमि पर धारा 59 के अधीन कृषि के प्रयोजन के लिए निर्धारण किया गया हो, या जो भूमि को निवास के प्रयोजनों के लिए धारण करता है, किन्हीं ज्ञात वारिसों के बिना मर जाए, तो तहसीलदार उसकी भूमि का कब्जा ले लेगा और उसे एक बार में एक वर्ष की कालावधि के लिए पट्टे पर दे सकेगा।
(2) यदि तहसीलदार द्वारा भूमि का कब्जा लेने की तारीख से तीन वर्ष के भीतर कोई दावेदार उस खाते को उसे वापस दिलाये जाने के लिए आवेदन करता है, तो तहसीलदार, ऐसी जाँच के पश्चात् जैसी कि वह उचित समझे, ऐसे दावेदार को उस भूमि का कब्जा दिलवा सकेगा या उसका दावा नामंजूर कर सकेगा।
(3) उपधारा (2) के अधीन पारित तहसीलदार का आदेश अपील या पुनरीक्षण के अध्यधीन नहीं होगा किन्तु कोई भी ऐसा व्यक्ति, जिसका कि दावा उपधारा (2) के अधीन नामंजूर कर दिया हो, तहसीलदार का आदेश संसूचित किया जाने को तारीख से एक वर्ष के भीतर, अपना हक स्थापित करने के लिए सिविल वाद फाइल कर सकेगा, और ऐसा वाद फाइल कर दिया जाने की दशा में तहसीलदार उपधारा (1) में उपबन्धित किये गये अनुसार भूमि को तब तक पट्टे पर देता रहेगा जब तक कि उस वाद का विनिश्चय न हो जाये।
(4) यदि तहसीलदार द्वारा उस भूमि का कब्जा लिया जाने की तारीख से तीन वर्ष के भीतर कोई दावेदार सामने नहीं आता है या यदि वह दावेदार, जिसका कि दावा उपधारा (2) के अधीन नामंजूर कर दिया गया हो, उपधारा (3) में उपबंधित किए गए अनुसार एक वर्ष के भीतर वाद फाइल नहीं करता है, तो तहसीलदार मृत भूमिस्वामी के उस खाते में के अधिकार को नीलामी द्वारा बेच सकेगा।
(5) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा दावेदार, जो उस भूमि में, जिसके कि संबंध में इस धारा के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही की जा चुकी है, अपना हक स्थापित कर देता है, उपधारा (1) के अधीन देय लगान, तथा उपधारा (4) के अधीन उगाहे गये विक्रयु आगमों का ही हकदार होगा और उनमें से उस खाते पर भू-राजस्व के मद्दे शोध्य समस्त राशियाँ तथा प्रबंध और विक्रय के व्यय काट लिये जायेंगे।
(1) यदि किसी खाते में, जिस पर धारा 59 के अधीन कृषि के प्रयोजन के लिये निर्धारण किया गया हो, एक से अधिक भूमिस्वामी हों तो उनमें से कोई भी भूमिस्वामी उस खाते में के अपने अंश के विभाजन के लिए तहसीलदार को आवेदन कर सकेगा:
परन्तु यदि हक सम्बन्धी कोई प्रश्न उठाया जाता है, तो तहसीलदार अपने समक्ष की कार्यवाहियों को तीन मास को कालावधि तक के लिए रोक देगा, जिससे की हक सम्बन्धी प्रश्न के अवधारण के लिए सिविल वाद का संस्थित किया जाना सुकर ही जाये,
(1-ए) यदि कोई सिविल वाद उपधारा (1) के परन्तुक में विनिर्दिष्ट की गई कालावधि के भीतर फाइल कर दिया जाये, और सिविल न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया जाये, तो तहसीलदार अपनी कार्यवाहियों को सिविल न्यायालय का विनिश्चय होने तक रोक रखेगा। यदि कोई सिविल वाद उक्त कालावधि के भीतर फाइल न किया जाये, तो वह रोक रखने के आदेश को अभिशून्य कर देगा और खाते के विभाजन की कार्यवाही अधिकार अभिलेख में की प्रविष्टियों के अनुसार करेगा।
(2) तहसीलदार, सह-भूधारियों की सुनवाई करने के पश्चात्, खाते को विभाजित कर सकेगा और उस खाते के निर्धारण को इस संहिता के अधीन बनाये गये नियमों के अनुसार प्रभाजित कर सकेगा।
इस धारा के प्रयोजनों के लिए, भूमिस्वामी के खाते के किसी भी ऐसे सह अंशधारी को, जिसने किसी सक्षम सिविल न्यायालय से ऐसे खाते में के अपने हक के संबंध में घोषणा प्राप्त कर ली हो, ऐसे खाते का सह-भू-धारी समझा जायेगा।
(1) जब कभी कोई भूमिस्वामी अपनी कृषि भूमि को अपने जीवनकाल के दौरान अपने विधिक वारिसों में विभाजित करना चाहता है, तो वह विभाजन के लिए तहसीलदार को आवेदन कर सकेगा।
(2) तहसीलदार, विधिक वारिसों की सुनवाई करने के पश्चात् खाते को विभाजित कर सकेगा और उस खाते के निर्धारण को इस संहिता के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार प्रभाजित कर सकेगा।
(1) तहसीलदार, खाता विभाजन हेतु प्राप्त आवेदनों को सर्वप्रथम ई-नामांतरण पोर्टल में प्रविष्ट कर, हितबद्ध पक्षकारों को सूचना जारी करेगा एवं आम सूचना या ईश्तहार का प्रकाशन करेगा।
(2) किसी प्रकरण में आपत्ति प्राप्त होने पर या तहसीलदार को प्रकरण, किसी कारण से विवादित प्रतीत होने पर वह ऑनलाइन ई- नामांतरण पोर्टल से प्रकरण को अपने ई-राजस्व न्यायालय में स्थानांतरित कर पंजीकृत करेगा, अन्यथा प्रकरण में समस्त कार्यवाही ऑनलाइन ई- नामांतरण पोर्टल में की जायेगी।
(3) इस धारा के अधीन किसी भी माध्यम से आवेदन प्राप्त होने पर, तहसीलदार विहित समयावधि के भीतर -
(क) ऑनलाइन ई-नामांतरण पोर्टल में कार्यवाही प्रारंभ करेगा;
(ख) हितबद्ध समस्त पक्षकारों को नोटिस जारी करेगा;
(ग) आम सूचना या ईश्तहार का प्रकाशन, कार्यालयीन सूचना पटल, संबंधित ग्राम/नगर में निर्धारित स्थान एवं विभागीय वेबपोर्टल पर करेगा।
(4) तहसीलदार, हितबद्ध व्यक्तियों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् तथा ऐसी और जांच, जैसा कि वह आवश्यक समझे, करने के पश्चात् प्रकरण में उस भाग के संबंध में आदेश पारित करेगा तथा यथास्थिति, ग्राम के खसरे एवं नक्शा सहित अन्य सुसंगत अभिलेखों में आवश्यक प्रविष्टि करेगा। पटवारी, विहित समयावधि के भीतर आवश्यकतानुसार अभिलेख में सुधार कर सत्यापित करेगा, तत्पश्चात् तहसीलदार, प्रकरण नस्तीबद्ध करेगा।
(5) इस धारा के अधीन समस्त कार्यवाहियां विहित समयावधि के भीतर पूर्ण की जायेंगी। उस दशा में, जहां मामले, विनिर्दिष्ट कालावधि के भीतर निराकृत नहीं किये जाते हैं, तो तहसीलदार, लंबित मामलों की जानकारी की रिपोर्ट, ऐसे प्ररूप तथा रीति में, जैसा कि विहित किया जाये, कलेक्टर को देगा।
(1) धारा 240 तथा 241 के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, वे समस्त वृक्ष जो भूमिस्वामी के खाते में खड़े हुए हों, उस भूमिस्वामी के ही होंगे।
(2) उपधारा (1) की कोई भी बात भूमिस्वामी के खाते में खड़े हुए वृक्षों में के किसी ऐसे अधिकार पर जो इस संहिता के प्रवृत्त होने की तारीख को किसी व्यक्ति के पक्ष में विद्यमान हो, प्रभाव नहीं डालेगी, किन्तु भूमिस्वामी ऐसे अधिकार का मूल्य नियत किया जाने के लिए तहसीलदार को आवेदन कर सकेगा और उस अधिकार को ऐसी रीति में, जैसी कि विहित की जाये, तहसीलदार की मार्फत क्रय कर सकेगा।
(1) भूमिस्वामी द्वारा अपने खाते में समाविष्ट किसी भूमि पर खड़े हुए वृक्षों का अन्तरण वृक्षों की उपज के अन्तरण को छोड़कर शून्य होगा, जब तक कि भूमि ही अन्तरित न कर दी जाये।
(2) ऐसे वृक्ष, जो किसी भूमिस्वामी के खाते में समाविष्ट किसी भूमि में खड़े हुए हों, किसी सिविल न्यायालय की डिक्री या आदेश के निष्पादन में अथवा किसी राजस्व अधिकारी के किसी आदेश के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के किन्हीं उपबन्धों के अनुसरण में किये गये किसी आदेश के अधीन तब तक कुर्क नहीं किये जायेंगे या बेचे नहीं जायेंगे जब तक कि वह भूमि ही कुर्क न कर ली जाये या बेच न दी जाये।