
समस्त दखलरहित भूमि का अभिलेख इस सम्बन्ध में बनाये गये नियमों के अनुसार, प्रत्येक ग्राम और नगरीय क्षेत्र के लिये तैयार किया जाएगा तथा रखा जाएगा जिसमें -
(क) धारा 237 के अधीन निस्तार अधिकारों के प्रयोग के लिये पृथक् रखी गई दखलरहित भूमि पृथकत: दर्शाई जाएगी;
(ख) अधिसूचित विकास योजना, यदि कोई हो, में निर्धारित प्रयोजनों से असंगत प्रविष्टि नहीं की जायेगी।
(1) उपखण्ड अधिकारी इस संहिता तथा इस संहिता के अधीन बनाये गये नियमों के उपबन्धों से संगति रखते हुए एक निस्तार पत्रक तैयार करेगा, जिसमें किसी ग्राम में की समस्त दखलरहित भूमि के प्रबन्ध की स्कीम तथा उससे आनुषंगिक समस्त विषय और विशिष्टतः धारा 235 में विनिर्दिष्ट विषय सन्निविष्ट होंगे।
(2) निस्तार- पत्रक का प्रारूप, ग्राम में प्रकाशित किया जाएगा और ग्राम सभा की इच्छाओं को विहित रीति में अभिनिश्चित करने के पश्चात् उसे उपखण्ड अधिकारी द्वारा अंतिम रूप दिया जायेगा।
(3) इस प्रकार अंतिम किये गये निस्तार प्रत्रक की एक प्रति ग्राम पंचायत के कार्यालय में रखी जायेगी
परन्तु इस धारा के प्रावधान, किसी राजस्व ग्राम को नगरीय क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किये जाने तथा विकास योजना हेतु अंगीकृत किये जाने की दशा में, लागू नहीं होंगे।
(4) छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 (क्र० 1 सन् 1994) में यथा प्रावधानित ग्राम सभा द्वारा पारित संकल्प पर, कलेक्टर के पूर्व अनुमोदन से तथा आवश्यक जांच पश्चात् उप- खण्ड अधिकारी, निस्तार पत्रक में संशोधन कर सकेगा।
वे विषय, जिनके लिए निस्तार- पत्रक में उपबन्ध किया जाएगा, निम्नलिखित होंगे, अर्थात्
(क) वे निबन्धन तथा शर्तें जिन पर ग्राम में पशुओं को चराने की अनुज्ञा दी जाएगी;
(ख) वे निबन्धन तथा शर्तें जिन पर तथा वह अधिकतम सीमा जिस तक कोई निवासी-
(एक) लकड़ी, इमारती लकड़ी, ईंधन या कोई अन्य वन उपज;
(दो) मुरम, कंकड़, रेत, मिट्टी, चिकनी मिट्टी, पत्थर या कोई अन्य गौण खनिज; अभिप्राप्त कर सकेगा;
(ग) साधारणतः पशुओं को चराने का तथा पैरा (ख) में वर्णित वस्तुओं के हटाये जाने का विनियमन करने वाले अनुदेश;
(घ) कोई अन्य विषय जिसे निस्तार पत्रक में इस संहिता द्वारा या इस संहिता के अधीन अभिलिखित किया जाना अपेक्षित हो।
धारा 235 में यथा उपबन्धित निस्तार-पत्रक तैयार करने में, कलेक्टर, यथासंभव निम्नलिखित के लिये उपबंध करेगा-
(क) कृषि के लिये उपयोग में लाये जाने वाले पशुओं को निःशुल्क चराने के लिये;
(ख) ग्राम के निवासियों द्वारा उनके वास्तविक घरेलू उपभोग के लिये-
(एक) वन उपज का;
(दो) गौण खनिजों का मुफ्त ले जाया जाना;
(ग) ग्राम के शिल्पकारों को खण्ड (ख) में विनिर्दिष्ट की गई वस्तुएँ, उनकी शिल्पकारी के प्रयोजन के लिये ले जाये जाने के लिये दी जाने वाली रियायतें।
(1) इस संहिता के अधीन बनाये गये नियमों के अध्यधीन रहते हुए, कलेक्टर दखलरहित भूमि को निम्नलिखित प्रयोजनों के लिये पृथक् रख सकेगा, अर्थात् :-
(क) इमारती लकड़ी या ईंधन के लिये आरक्षित क्षेत्र के लिये;
(ख) चरागाह, घास, बीड़ या चारे के लिये आरक्षित क्षेत्र के लिये;
(ग) कब्रस्तान तथा श्मशान भूमि के लिये;
(घ) गोठान के लिये और गौशाला तथा एनिमल होल्डिंग प्रेमिसेस की स्थापना के लिए;
(ङ) शिविर भूमि के लिये,
(च) खलिहान के लिये,
(छ) बाजार के लिये,
(ज) खाल निकालने के स्थान के लिये,
(झ) खाद के गड्ढों के लिये,
(ञ) पाठशालाओं, खेल के मैदानों, उद्यानों, सड़कों, गलियों, नालियों जैसे तथा उसी प्रकार के लोक प्रयोजनों के लिए;
(ट) किन्हीं अन्य प्रयोजनों के लिए जो निस्तार के अधिकार के प्रयोग के लिये विहित किए जाएँ।
(3) इस संहिता के अंतर्गत बनाये गये नियमों के अध्यधीन रहते हुए, कलेक्टर उप-धारा (1) के खण्ड (ख) में उल्लिखित भूमि को सुरक्षित रखने के पश्चात् उप-धारा (1) के खण्ड (ख) में वर्णित उस ग्राम की कुल कृषि भूमि के न्यूनतम दो प्रतिशत के आधिक्य की भूमि को अन्य प्रयोजनों के लिए, यथा कृषि, आबादी, आवासीय परियोजनाएं, सड़क निर्माण, नहर, तालाब, अस्पताल, विद्यालय, महाविद्यालय, शासकीय कार्यालय, सार्वजनिक गोदाम, विद्युत प्रणाली, गौशाला, घटकारों द्वारा मिट्टी का उत्खनन, गौण खनिज या किसी अन्य सार्वजनिक उपयोग की परियोजनाओं जैसा कि राज्य शासन द्वारा अवधारित किया जाए, के लिए व्यपवर्तित कर सकेगा।
(3-क) जहां उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन उल्लिखित प्रयोजनों के लिये रखी गई भूमि, किसी औद्योगिक, वाणिज्यिक या खनन परियोजना के लिये चिह्नांकित क्षेत्र के भीतर पायी जाती है, वहां कलेक्टर ऐसी भूमि को, उपरोक्त प्रयोजन के लिए व्यपवर्तित कर सकेगा, किन्तु ऐसा व्यपवर्तन तभी किया जा सकेगा जब उसी ग्राम के भीतर उप-धारा (1) के खण्ड (ख) के प्रयोजन के लिए समतुल्य भूमि उपलब्ध करा दी जाये।
(4) जब उप-धारा (1) में उल्लिखित प्रयोजनों के लिए पृथक रखी गई भूमि का व्यपवर्तन, राज्य शासन की अथवा राज्य शासन द्वारा अनुमोदित परियोजनाओं के लिए अपरिहार्य हो जाए, किन्तु जो उप-धारा (3) में सम्मिलित नहीं है, तब कलेक्टर, स्वयं को संतुष्ट कर लेने के उपरांत कि ऐसे निस्तार अधिकारों की पूर्ति हेतु समान क्षेत्र की वैकल्पिक भूमि उसी ग्राम में उपलब्ध करा दी गई है, भूमि के ऐसे प्रयोजन के लिए व्यपवर्तन का युक्ति-युक्त आदेश पारित कर सकेगा।
जहाँ कलेक्टर की यह राय हो कि किसी ग्राम की बंजर भूमि अपर्याप्त है और यह लोकहित में है कि इस धारा के अधीन कार्यवाही की जाए तो वह ऐसी जाँच के पश्चात् जैसी कि वह ठीक समझे, यह आदेश दे सकेगा कि उस ग्राम के निवासियों को पड़ोसी ग्राम में यथास्थिति निस्तार का अधिकार या पशु चराने का अधिकार उस सीमा तक होगा जो कि आदेश में विनिर्दिष्ट है।
(2) किसी ग्राम के निवासी, जिन्हें पड़ोसी ग्राम में पशु चराने का अधिकार उपधारा (1) के अधीन है या सरकारी वन में पशु चराने का अधिकार है, उन अधिकारों का प्रयोग करने के प्रयोजनार्थ अपने मार्गाधिकार को अभिलिखित कराने के लिए कलेक्टर को आवेदन कर सकेंगे।
(3) यदि उपधारा (2) के अधीन किए गए आवेदन की जाँच करने पर, कलेक्टर इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि ऐसे निवासियों को इस बात के लिए समर्थ बनाने में कि वे अपने पशुओं को किसी अन्य ग्राम में या सरकारी वन में चराने के अधिकार का प्रयोग कर सकें, मार्ग का अधिकार युक्तियुक्त रूप से आवश्यक है, तो वह ऐसे मार्ग के लिये उनके अधिकार की घोषणा करते हुए आदेश पारित करेगा और वे शर्तें कथित करेगा जिन पर कि उस अधिकार का प्रयोग किया जाएगा।
(4) कलेक्टर आने-जाने का मार्ग भी अवधारित करेगा और ऐसे मार्ग को ऐसी रीति में निर्बन्धित करेगा जिससे कि उस ग्राम के, जिसमें से होकर वह मार्ग जाता है, निवासियों को कम- से-कम असुविधा हो।
(5) कलेक्टर, यदि वह ठीक समझे, ऐसे मार्ग को सीमांकित कर सकेगा।
(6) इस धारा के अधीन कलेक्टर द्वारा पारित आदेश निस्तार पत्रक में अभिलिखित किए जायेंगे।
(7) जहाँ उपधारा (1) में वर्णित ग्राम भिन्न-भिन्न जिलों में आते हों, वहाँ निम्नलिखित उपबन्ध लागू होंगे, अर्थात् :-
(क) निस्तार का अधिकार या पशु चराने का अधिकार विनिर्दिष्ट करने वाले आदेश उस कलेक्टर द्वारा पारित किए जायेंगे जिसके कि जिले में वह ग्राम आता है जिस पर कि ऐसे अधिकार का दावा किया गया है;
(ख) आने-जाने के मार्ग के बारे में कोई आदेश उस कलेक्टर द्वारा पारित किए जायेंगे जिसकी अपनी अधिकारिता में वह क्षेत्र आता है, जिस पर से कि मार्ग अनुज्ञात किया गया है;
(ग) खण्ड (क) तथा (ख) के अनुसार आदेश पारित करने वाला कलेक्टर सम्बन्धित अन्य कलेक्टर से लिखित में परामर्श करेगा।
(1) जहाँ इस संहिता के प्रवृत्त होने के पूर्व, किसी व्यक्ति द्वारा किसी ग्राम की दखल रहित भूमि, भाठा भूमि तथा बड़े झाड़/छोटे झाड़ के जंगल में कोई फलदार वृक्ष लगाया गया हो, और वैसा अभिलिखित हो, वहाँ इस बात के होते हुए भी कि ऐसी भूमि राज्य सरकार में निहित है, ऐसा व्यक्ति और उसके हित उत्तराधिकारी पीढ़ी-दर- पीढ़ी ऐसे वृक्षों के कब्जे तथा फलोपभोग के लिए किसी रायल्टी या अन्य प्रभार का भुगतान किये बिना, हकदार होंगे।
(2) राज्य सरकार या तहसीलदार की पदश्रेणी से अनिम्न पदश्रेणी का कोई राजस्व अधिकारी, जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया जाए किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को, किसी ग्राम की दखल रहित भूमि, भाठा भूमिं तथा बड़े झाड़/छोटे झाड़ के जंगल पर, जो उस प्रयोजन के लिये पृथक् रक्षित की जाए फलदार वृक्ष या ऐसी अन्य जातियों के वृक्ष, जो इस निमित्त विनिर्दिष्ट किए जाएँ, रोपित किए जाने और उगाने की अनुज्ञा दे सकेगा, और ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को वृक्षारोपण अनुज्ञापत्र और वृक्ष पट्टे इस धारा के तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों में उपबन्धों के अनुसार मन्जूर कर सकेगा।
(3) इस धारा के अधीन मंजूर किया गया वृक्षारोपण अनुज्ञापत्र और वृक्षपट्टा ऐसे प्ररूप में और ऐसे निबन्धनों तथा शर्तों के अध्यधीन रहते हुए होगा जो विहित की जाएँ।
(4) इस धारा के अधीन प्रदत्त अधिकार अन्तरणीय होगा किन्तु अनुज्ञापत्र या पट्टे के धारक को या उसके हित उत्तराधिकारी को उस भूमि पर, जिस पर ऐसा वृक्ष खड़ा है, इस अधिकार के सिवाय कोई अधिकार नहीं होगा कि वह अनुज्ञापत्र और पट्टे के निबन्धनों और शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, उस भूमि पर वृक्ष उगाए और ऐसे वृक्षों में भोगाधिकारों (युसुफ्रक्टुअरी राइट्स) का, जिनके अन्तर्गत ऐसे वृक्षों के काय ( कारपस) में अधिकार भी है, उपभोग करे:
परन्तु विक्रय द्वारा या पट्टे द्वारा कोई भी अन्तरण, उपधारा (2) के अधीन राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत अधिकारी की लिखित पूर्व मंजूरी के बिना नहीं किया जाएगा।
(5) यदि वृक्षारोपण अनुज्ञापत्र या वृक्षपट्टे के निबन्धनों और शर्तों में से किसी निबन्धन तथा शर्त का भंग किया जाता है तो वह अनुज्ञापत्र या पट्टा, उसके धारक को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् रद्दकरणीय होगा।
(5.क) उस भाठा भूमि पर, जिस पर वन संरक्षण अधिनियम, 1980 (1980 का संख्यांक 69) के उपबंध लागू नहीं होते, वृक्षारोपण के लिए स्थाई पट्टा मंजूर किया जा सकेगा।
(ख) बड़े झाड़/छोटे झाड़ के जंगल पर वृक्षारोपण हेतु करार निष्पादित किया जा सकेगा। करार धारक या उसके उत्तराधिकारियों को बड़े झाड़/छोटे झाड़ के जंगल की भूमि पर तथा उक्त भूमि पर रोपित वृक्षों पर कोई भूमिस्वामी अधिकार उद्भूत नहीं होगा। करार धारक या उसके उत्तराधिकारी वृक्षों के भोगाधिकार के हकदार होंगे।
(6) राज्य सरकार, इस धारा के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी।
(1) यदि राज्य सरकार की यह राय हो कि किन्हीं वृक्षों का काटा जाना लोकहित के लिए अपायकर है या यह कि मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए कतिपय वृक्षों के काटे जाने का प्रतिषेध या विनियमन करना आवश्यक है तो वह ऐसे वृक्षों के काटे जाने का प्रतिषेध या विनियमन इस सम्बन्ध में बनाए गए नियमों द्वारा कर सकेगी, चाहे ऐसे वृक्ष भूमिस्वामी की भूमि पर खड़े हों या राज्य सरकार की भूमि पर।
(2) उपधारा (1) के अधीन नियम बनाने में, राज्य सरकार यह उपबन्ध कर सकेगी कि ऐसे समस्त नियम या कोई भी नियम केवल ऐसे क्षेत्र को लागू होंगे जिसे राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे
(3) राज्य सरकार, उन भूमियों पर के, जो कि राज्य सरकार की हों, वनोत्पादों के नियंत्रण, प्रबन्ध काटकर गिराए जाने या हटाए जाने का विनियमन करने वाले नियम बना सकेगी।
(1) यदि राज्य सरकार का यह समाधान हो जाता है कि किसी सरकारी वन से इमारती लकड़ी की चोरी को रोकने के लिये, लोकहित में यह आवश्यक है कि ऐसे वनों से लगे हुए किसी क्षेत्र में समाविष्ट ग्रामों में इमारती लकड़ी के काटकर गिराए जाने तथा उसके वहाँ से हटाए जाने का विनियमन किया जाए, तो राज्य सरकार राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे क्षेत्र को इस धारा के प्रयोजनों के लिए अधिसूचित क्षेत्र घोषित कर सकेगी।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रकाशित प्रत्येक आदेश, अधिसूचित क्षेत्र में समाविष्ट समस्त ग्रामों में विहित रीति में उद्घोषित किया जाएगा।
(3) धारा 179 में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी किन्तु उपधारा (5) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए जब कोई आदेश उपधारा (2) के अधीन किसी ग्राम में उद्घोषित कर दिया गया हो तो कोई भी व्यक्ति, विक्रय के किसी संव्यवहार के अनुसरण में या व्यापार या कारबार के प्रयोजनों के लिए, ऐसे ग्राम के किसी खाते में के इमारती लकड़ी के किसी वृक्ष को ऐसे नियमों के अनुसार ही काटकर गिराएगा या किसी ऐसे वृक्ष के काय (कारपस) को किसी ऐसे खाते से ऐसे नियमों के अनुसार ही हटायेगा जो कि इस सम्बन्ध में बनाए जाएँ, अन्यथा नहीं।
(4) कोई व्यक्ति जो उपधारा (3) के या उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों का, उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयत्न करेगा या उनके उल्लंघन का दुष्प्रेरण करेगा, किसी अन्य कार्यवाही पर, जो कि उसके विरुद्ध की जा सकती हो प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के लिखित आदेश पर पच्चीस हजार रुपये से अनधिक ऐसी शास्ति का, जो कि उसके द्वारा अधिरोपित की जाए भुगतान करने का दायी होगा और अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) यह और आदेश दे सकेगा कि इमारती लकड़ी के किन्हीं भी ऐसे वृक्षों का अधिहरण कर लिया जाए जो कि इस उपधारा के उपबन्धों के उल्लंघन में काटकर गिराए गए हैं।
(5) उपधारा (3) तथा (4) की कोई भी बात किसी व्यक्ति द्वारा अपनी भूमि पर के इमारती, लकड़ी के वृक्षों को अपने वास्तविक कृषिक प्रयोजनों या घरेलू प्रयोजनों के लिए एक कैलेण्डर वर्ष में 2 घनमीटर की अधिकतम सीमा तक काटकर गिराए जाने या हटाए जाने को लागू नहीं होगी, यदि ऐसा काटकर गिराया जाना या हटाया जाना अन्यथा इस संहिता के अन्य उपबन्धों के अनुसार हो। तथापि ऐसे व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह सक्षम अधिकारी द्वारा अपनी भूमि का सीमांकन कराए और ऐसे वृक्षों को काटकर गिराए जाने या हटाए जाने के कम से कम दस दिन पूर्व क्षेत्राधिकारिता रखने वाले राजस्व अधिकारी एवं वन क्षेत्राधिकारी को लिखित सूचना दे।
(1) इस संहिता के प्रवृत्त होने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, उपखण्ड अधिकारी किसी ऐसी भूमि या जल में, जो राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण का न हो या जो उसके द्वारा नियंत्रित या प्रबन्धित न हो-
(क) सिंचाई के अधिकार या मार्गाधिकार या अन्य सुखाचार;
(ख) मछली पकड़ने के अधिकार, की बाबत् प्रत्येक ग्राम की रूढ़ियों को विहित रीति में अभिनिश्चित तथा अभिलिखित करेगा और ऐसा अभिलेख ग्राम के वाजिब-उल-अर्ज के नाम से जाना जाएगा।
(2) उपधारा (1) के अनुसरण में तैयार किया गया अभिलेख, उपखण्ड अधिकारी द्वारा ऐसी रीति में प्रकाशित किया जाएगा जो कि विहित की जाए।
(3) ऐसी अभिलेख में की गई किसी प्रविष्टि से व्यथित कोई भी व्यक्ति ऐसी प्रविष्टि को रद्द या उपान्तरित कराने के लिए सिविल न्यायालय में वाद ऐसे अभिलेख के उपधारा (2) के अधीन प्रकाशित होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर संस्थित कर सकेगा।
(4) उपधारा (1) के अधीन तैयार किया गया अभिलेख, उपधारा (3) के अधीन संस्थित किये गये वाद में सिविल न्यायालय के विनिश्चय के अध्यधीन रहते हुए, अन्तिम और निश्चायक होगा।
(5) उपखण्ड अधिकारी, उसमें हितबद्ध किसी व्यक्ति के आवेदन पर या स्वप्रेरणा से, निम्नलिखित किन्हीं भी आधारों पर वाजिब उल अर्ज में की किसी प्रविष्टि को उपान्तरित कर सकेगा या उसमें कोई नवीन प्रविष्टि अन्तःस्थापित कर सकेगा :-
(क) यह कि ऐसी प्रविष्टि में हितबद्ध समस्त व्यक्ति उसे उपान्तरित कराना चाहते हैं; या
(ख) यह कि किसी सिविल वाद में दी गई किसी डिक्री द्वारा उसे गलत घोषित कर दिया गया है; या
(ग) यह कि सिविल न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश पर या किसी राजस्व अधिकारी के आदेश पर आधारित होते हुए भी वह ऐसी डिक्री या आदेश के अनुसार नहीं है; या
(घ) यह कि इस प्रकार आधारित होते हुए भी, वाद में ऐसी डिक्री या ऐसे आदेश को अपील, पुनरीक्षण या पुनर्विलोकन में फेरफारित कर दिया गया है; या
(ङ) यह कि सिविल न्यायालय ने डिक्री द्वारा ग्राम में विद्यमान किसी रूढ़ि का पर्यवसान कर दिया है।
(1) जहाँ आबादी के लिए आरक्षित क्षेत्र, कलेक्टर की राय में अपर्याप्त हो, वहाँ वह ग्राम की दखलरहित भूमि में से ऐसा और क्षेत्र आरक्षित कर सकेगा जैसा कि वह ठीक समझे।
(2) जहाँ आबादी के प्रयोजनों के लिये दखलरहित भूमि उपलब्ध न हो, वहां राज्य सरकार आबादी के विस्तारण के लिये कोई भी भूमि अर्जित कर सकेगी।
(3) भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (2013 का सं० 30) के उपबन्ध ऐसे अर्जन को लागू होंगे और ऐसी भूमि के अर्जन के लिये प्रतिकर उस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार देय होगा।
इस संबंध में बनाये गये नियमों के अध्यधीन रहते हुए, ग्राम पंचायत या जहां कोई ग्राम पंचायत गठित न की गई हो, वहां तहसीलदार आबादी क्षेत्र में के स्थलों का निपटारा करेगा।
आबादी में स्थित ऐसा भवन स्थल, जो युक्तियुक्त माप (डायमेन्शन) का है, भू-राजस्व के भुगतान के दायित्वाधीन नहीं होगा, यदि ऐसा स्थल किसी कोटवार के या किसी ऐसे व्यक्ति के दखल में है जो कि ऐसे ग्राम में, या उस ग्राम में जिसमें कि सामान्यतः ऐसे ग्राम से खेती की जाती है, भूमि धारण करता है या कृषि शिल्पी या कृषि श्रमिक के रूप में कार्य करता है।
प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 (क्र० 20 सन् 1959 ) के प्रवृत्त होने के ठीक पूर्व आबादी भूमि अंतर्गत कोई भूमि, विधि पूर्वक धारण करता है या उसके पश्चात् ऐसी भूमि को विधि पूर्वक अर्जित कर लेता है, ऐसी भूमि के संबंध में भूमिस्वामी होगा। कब्जेदार ऐसी भूमि के संबंध में भूमि स्वामी होगा, जो कि राज्य शासन द्वारा ऐसे किसी आबादी या किसी अन्य दखल रहित भूमि में गृहस्थल के रूप में धारित भूमि के कब्जेदार को, किसी विधि/नियम के अधीन दिये गये भूमिस्वामित्व प्रमाणपत्र में वर्णित है।
(1) जब तक कि सरकार द्वारा दिये गये किसी अनुदान के निबन्धनों द्वारा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित न किया जाए, समस्त- खनिजों खानों तथा खदानों का अधिकार राज्य सरकार में निहित होगा जिसे ऐसी समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी जो कि ऐसे अधिकारों के समुचित उपयोग के लिये आवश्यक हों।
(2) समस्त खानों तथा खदानों के अधिकार के अन्तर्गत आता है खनन तथा खदान क्रिया के प्रयोजन के लिये भूमि तक पहुंचने का अधिकार तथा ऐसी अन्य भूमि को दखल में लेने का अधिकार जो कि उससे (खनन तथा खदान क्रिया से) समनुषंगी उन प्रयोजनों के लिये आवश्यक है जिनके अन्तर्गत कार्यालयों का, कर्मकारों के निवास गृहों का परिनिर्माण तथा मशीनरी का प्रतिष्ठापन, खनिजों का ढेर लगाना तथा कूड़ा-करकट इकट्ठा करना, सड़कों, रेल पथों या ट्राम- पथों का सन्निर्माण और कोई ऐसे अन्य प्रयोजन भी हैं जिन्हें राज्य सरकार खनन तथा खदान- से समनुषंगी होना घोषित करे।
(3) यदि सरकार ने किन्हीं खनिजों, खानों या खदानों पर का अपना अधिकार किसी व्यक्ति को समनुदेशित कर दिया हो, और यदि ऐसे अधिकार के समुचित उपभोग के लिए आवश्यक हो कि उपधारा (1) तथा (2) में विनिर्दिष्ट की गई समस्त शक्तियों का या उनमें से किसी भी शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए तो कलेक्टर, लिखित आदेश द्वारा ऐसी शक्तियां, ऐसी शर्तों, तथा आरक्षणों के अध्यधीन रखते हुए, जो कि वह विनिर्दिष्ट करे, उस व्यक्ति को प्रत्यायोजित कर सकेगा जिसे कि वह अधिकार समनुदेशित किया गया हो:
परन्तु कोई भी ऐसा प्रत्यायोजन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसे समस्त व्यक्तियों पर, जो प्रभावित हुई भूमि में अधिकार रखते हों, सूचना की सम्यक् रूप से तामील न कर दी गई हो, और उनकी आपत्तियों को सुन न लिया गया हो और उन पर विचार न कर लिया गया हो।
(4) यदि, इसमें निर्दिष्ट किये गये अधिकार का, किसी भूमि पर प्रयोग करने में, ऐसी भूमि की सतह को दखल में लेने के कारण या उस पर होने वाली हलचल के कारण किन्हीं व्यक्तियों के अधिकारों का अतिलंघन होता हो, तो राज्य सरकार या उसका समनुदेशिती ऐसे अतिलंघन के लिए ऐसे व्यक्तियों को प्रतिकर का भुगतान करेगा और ऐसे प्रतिकर की रकम की संगणना उपखण्ड अधिकारी द्वारा, या यदि उसका अधिनिर्णय स्वीकार न किया जाए, तो सिविल न्यायालय द्वारा, यथाशक्य भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (2013 का सं० 30) के उपबन्धों के अनुसार की जाएगी।
(5) सरकार का कोई भी समनुदेशिती, कलेक्टर की पूर्व मंजूरी के बिना और तब तक जब तक कि प्रतिकर अवधारित न कर दिया गया हो तथा उन व्यक्तियों को, जिनके कि अधिकारों का अतिलंघन होता हो, निविदत्त न कर दिया गया हो, किसी भूमि की सतह पर न तो प्रवेश करेगा और न ही उसे दखल में लेगा।
(6) यदि राज्य सरकार का कोई समनुदेशिती, उपधारा (4) में यथा उपबंधित प्रतिकर का भुगतान नहीं करता है, तो कलेक्टर उससे ऐसा प्रतिकर उन व्यक्तियों की ओर से, जो कि उसके हकदार हों, इस प्रकार वसूल कर सकेगा मानो कि वह भू-राजस्व का बकाया हो।
(7) कोई भी व्यक्ति, जो विधिपूर्ण प्राधिकार के बिना किसी ऐसी ख़ान या खदान से, जिसका कि अधिकार सरकार में निहित है तथा सरकार द्वारा समनुदेशित नहीं किया गया है, खनिजों को निकालेगा या हटायेगा तो वह किसी अन्य कार्यवाही पर, जो कि उसके विरुद्ध की जा सकती हो, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कलेक्टर के लिखित आदेश पर ऐसी शास्ति का भुगतान करने का दायी होगा जो इस प्रकार निकाले गये या हटाये गये खनिजों के बाजार मूल्य के दुगुने के हिसाब से संगणित राशि से अधिक नहीं होगी:
परन्तु यदि इस प्रकार संगणित राशि पच्चीस हजार रुपये से कम हो, तो कलेक्टर ऐसी उच्चतर राशि की शास्ति अधिरोपित कर सकेगा जो पच्चीस हजार रुपये से अधिक नहीं होगी।
(8) उपधारा (7) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कलेक्टर किसी ऐसी खान या खदान से, जिसका कि अधिकार सरकार में निहित है और सरकार द्वारा समनुदेशित नहीं किया गया है, निकाले गये या हटाये गये किसी खनिज का अभिग्रहण तथा अधिहरण कर सकेगा।
इस धारा में, "खनिज" के अन्तर्गत कोई ऐसी रेत या चिकनी मिट्टी है जिसके कि संबंध में राज्य सरकार यह घोषित करे कि वह वाणिज्यिक महत्व की है या यह कि वह किसी लोक प्रयोजन के लिये अपेक्षित है।
(1) कोई भी व्यक्ति, जो कि अप्राधिकृत रूप से दखलरहित भूमि, आबादी, सेवा भूमि या किसी ऐसी अन्य भूमि पर, जो धारा 237 के अधीन किसी विशेष प्रयोजन के लिए पृथक् रखी गई हो, या किसी ऐसी भूमि पर, जो शासन की सम्पत्ति हो, कब्जा कर लेता है या उस पर कब्जा बनाए रखता है, तहसीलदार के आदेश द्वारा संक्षिप्ततः बेदखल किया जा सकेगा और कोई भी फसल जो कि भूमि पर खड़ी हो तथा कोई भी भवन या अन्य निर्माण कार्य, जो उसने उस पर निर्मित किया हो, यदि ऐसे समय के भीतर, जैसा कि तहसीलदार नियत करे, उसके द्वारा नहीं हटाया जाता है, तो अधिहरित किया जा सकेगा। इस प्रकार अधिहरित की गई किसी भी सम्पत्ति का तहसीलदार के निर्देशानुसार निपटारा किया जायेगा और किसी भी फसल, भवन या अन्य निर्माण कार्य, को हटाने का तथा भूमि को उसकी मूल स्थिति में लाने के लिए आवश्यक समस्त कार्यों का खर्चा उससे भू-राजस्व की बकाया की भांति वसूली योग्य होगा। ऐसा व्यक्ति, तहसीलदार के विवेकानुसार, अप्राधिकृत दखल की कालावधि के लिए भूमि का लगान उस स्थान में ऐसी भूमि के लिए स्वीकार्य दर की दुगुनी दर से चुकाने के तथा ऐसे जुर्माने के, जो पच्चीस हजार रुपये तक हो सकता है, तथा ऐसे और जुर्माने के, जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसको ऐसा अप्राधिकृत दखल या कब्जा प्रथम बेदखली के दिनांक के पश्चात् चालू रहे, दो सौ रुपये तक हो सकता है, लिए भी दायित्वाधीन होगा। तहसीलदार सम्पूर्ण जुर्माने या उसके किसी भाग को ऐसे व्यक्तियों को प्रतिकर देने के लिए उपयोग में ला सकेगा जिन्हें उसकी राय में अधिक्रमण से हानि या क्षति हुई हो:
परन्तु तहसीलदार-
(एक) महाकौशल क्षेत्र में-
(क) विलीन राज्यों से भिन्न क्षेत्रों में सितंबर सन् 1917 के प्रथम दिन के पूर्व;
(ख) विलीन राज्यों में अप्रैल सन् 1950 के तृतीय दिन के पूर्व
(दो) मध्य भारत क्षेत्र में अंगस्त सन् 1950 के पन्द्रहवें दिन के पूर्व;
(तीन) विन्ध्य प्रदेश क्षेत्र में अप्रैल सन् 1955 के प्रथम दिन के पूर्व;
(चार) भोपाल क्षेत्र में नवम्बर सन् 1933 के आठवें दिन के पूर्व और
(पांच) सिरोंज क्षेत्र में जुलाई सन् 1958 के प्रथम दिन के पूर्व, निर्मित भवनों या निर्माण कार्यों द्वारा किए गए अधिक्रमण के सम्बन्ध में इस उपधारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों को प्रयोग में नहीं लायेगा।
इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए शब्द, "विलीन राज्यों" का वही अर्थ होगा जो कि मध्यप्रदेश मड स्टेट्स (स्टेट) लॉज एक्ट, 1950 (क्रमांक 12 सन् 1950) में उसके लिए दिया गया है।
(1-क) किसी अप्राधिकृत कब्जे के संबंध में ग्राम पंचायत द्वारा किसी संकल्प के सम्यक् रूप से पारित किए जाने पर तहसीलदार, ऐसे संकल्प की सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीस दिन के भीतर इस धारा के अधीन कार्यवाहियों को प्रारंभ करेगा तथा पूर्ण करेगा और उसके द्वारा की गई कार्यवाही ग्राम पंचायत को संसूचित करेगा।
(2) तहसीलदार इस बात के लिए सक्षम नहीं होगा कि वह दस हजार रुपये से अधिक का जुर्माना अधिरोपित करे, किन्तु यदि किसी मामले में वह यह समझता है कि मामले की परिस्थितियां अधिक जुर्माने के अधिरोपण के लिए समुचित आधार हैं, तो वह मामला उप जिला पदाधिकारी को निर्दिष्ट कर सकेगा जो तब, सम्बन्धित पक्षकार को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् जुर्माने के सम्बन्ध में ऐसे आदेश पारित करेगा जैसे कि वह उचित समझे।
(2-क) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के अधीन बेदखली के आदेश की तारीख के पश्चात् सात दिन से अधिक दिनों तक भूमि पर अप्राधिकृत दखल या कब्जा चालू रखे तो ऐसे जुर्माने पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जो कि उक्त उपधारा के अधीन अधिरोपित किया जा सकता हो, उपखण्ड अधिकारी उस व्यक्ति को पकड़वायेगा और उसे प्रथम बेदखली की दशा में पन्द्रह दिन की कालावधि के लिए तथा दूसरी या पश्चात्वर्ती बेदखली की दशा में तीन मास की कालावधि के लिए सिविल कारगार में परिरुद्ध किया जाने के लिए वारण्ट के साथ भेजेगा:
परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई भी कार्यवाही -
(एक) तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि ऐसी सूचना जारी न की गई हो जिसमें कि ऐसे व्यक्ति से यह अपेक्षा की गई हो कि वह सूचना में विनिर्दिष्ट किए गए दिन उपखण्ड अधिकारी के समक्ष उपसंजात हो तथा यह कारण दर्शाए कि उसे सिविल कारागार के सुपुर्द क्यों न किया जाए;
(दो) ऐसी सरकारी तथा नजूल भूमियों पर किये गये अधिक्रमणों के सम्बन्ध में नहीं की जायेगी, जिनके कि बन्दोबस्त के लिये सरकार ने समय-समय पर आदेश जारी किए हों:
परन्तु यह और भी, कि उपखण्ड अधिकारी ऐसे व्यक्ति को, वारन्ट में वर्णित कालावधि का अवसान होने के पूर्व भी निरोध से निर्मुक्त किए जाने का आदेश दे सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाए कि अप्राधिकृत कब्जा छोड़ा जा चुका है:
परन्तु यह भी कि कोई स्त्री इस उपधारा के अधीन गिरफ्तार या निरुद्ध नहीं की जाएगी।
(2-ख) राज्य सरकार उपधारा (2-क) के उपबन्धों को क्रियान्वित करने के प्रयोजन के लिए नियम बना सकेगी।
(1) राज्य सरकार निम्नलिखित को विनियमन करने के लिये नियम बना सकेगी-
(क) सरकारी तालाबों में मछली पकड़ना;
(ख) ग्रामों में जीवजन्तु को पकड़ना, उनका आखेट करना या उनको गोली मारना; और
(ग) राज्य सरकार की भूमियों से किन्हीं पदार्थों को हटाना।
(2) ऐसे नियमों में, अनुज्ञा पत्र देने के लिए, ऐसे अनुज्ञा पत्रों से संलग्न की जाने वाली शर्तों के लिए तथा अनुज्ञा पत्रों के लिए फीस के अधिरोपण हेतु एवं अन्य आनुषंगिक विषयों के लिए उपबन्ध हो सकेंगे।
(1) इस धारा और धारा 250-क के प्रयोजन के लिए भूमिस्वामी के अन्तर्गत सरकारी पट्टेदार आयेंगे।
(1-क) यदि किसी भूमिस्वामी को भूमि से विधि के सम्यक् अनुक्रम में बेकब्जा न करके अन्यथा बेकब्जा कर दिया गया हो, या यदि कोई व्यक्ति भूमिस्वामी की किसी ऐसी भूमि पर, जिसके कि उपयोग के लिए ऐसा व्यक्ति इस कोड के किसी उपबन्ध के अधीन हकदार न रह गया हो, अप्राधिकृत रूप से कब्जा किए रहे, तो भूमिस्वामी या उसका हित उत्तराधिकारी,
(क) छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।
(ख) छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।
तहसीलदार को यह आवेदन कर सकेगा कि उसे कब्जा वापस दिलाया जाए।
(1-ख) तहसीलदार, यह ज्ञात होने पर कि किसी भूमिस्वामी को उसकी भूमि से विधि के सम्यक् अनुक्रम में बेकब्जा न करके अन्यथा बेकब्जा कर दिया गया है, इस धारा के अधीन कार्यवाहियां स्वप्रेरणा से आरम्भ करेगा।
(2) तहसीलदार, पक्षकारों से सम्बन्धित उनके दावों की जांच करने के पश्चात्, आवेदन को विनिश्चित करेगा और जब वह भूमिस्वामी को कब्जा वापस दिए जाने का आदेश देता है, तो फिर वह उसे भूमि का कब्जा भी दिलाएगा।
(2-क) इस धारा के अधीन आरम्भ की गई कार्यवाहियां दूसरे पक्षकार से उत्तर प्राप्त हो जाने के पश्चात् दिन-प्रतिदिन तब तक चालू रहेंगी जब तक कि लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से दीर्घकालिक स्थगन, आवश्यक नहीं समझा जाता है और उस दशा में उस आदेश पत्रक (आर्डर-शीट) की, जिसमें ऐसे स्थगन के लिये कारण अन्तर्विष्ट हों, एक प्रति कलेक्टर को भेजी जायेगी।
(3) तहसीलदार, जांच के किसी भी प्रक्रम पर यथास्थिति भूमिस्वामी, सरकारी पट्टेदार को भूमि का कब्जा दिए जाने के लिए अन्तरिम आदेश पारित कर सकेगा, यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उसे इस धारा के अधीन आवेदन प्रस्तुत किए जाने या स्वप्रेरणा से कार्यवाहियां प्रारम्भ की जाने के पूर्व के छह मास के भीतर विरोधी पक्षकार द्वारा बेकब्जा कर दिया गया था। ऐसे किसी मामले में विरोधी पक्षकार को, यदि आवश्यक हो, तहसीलदार के आदेशों के अधीन बेदखल कर दिया जायेगा।
(4) जब उपधारा (3) के अधीन कोई अन्तरिम आदेश पारित कर दिया गया हो, तो तहसीलदार द्वारा विरोधी पक्षकार से यह अपेक्षा की जा सकेगी कि वह तहसीलदार द्वारा अन्तिम आदेश पारित किया जाने तक उस भूमि का कब्जा लेने से विरत रहने के लिए ऐसी राशि का जैसी कि तहसीलदार उचित समझे, बन्धपत्र निष्पादित करे।
(5) यदि यह पाया जाए कि बन्धपत्र निष्पादित करने वाले व्यक्ति ने बन्धपत्र के उल्लंघन में उस भूमि में प्रवेश किया है या उसका कब्जा ले लिया है, तो तहसीलदार बन्धपत्र को पूर्णत: या भागतः समपहृत कर सकेगा और ऐसी रकम भू-राजस्व के बकाया के तौर पर वसूल कर सकेगा।
(6) यदि उपधारा (2) के अधीन पारित किया गया आदेश आवेदक के पक्ष में हो तो तहसीलदार विरोधी पक्षकार द्वारा आवेदक को संदत्त किया जाने वाला प्रतिकर भी अधिनिर्णीत करेगा जो उस दर पर होगा जो एक हजार रुपये प्रति हेक्टर प्रतिवर्ष के आनुपातिक हो ।
(7) इस धारा के अधीन अधिनिर्णीत किया गया प्रतिकर भू-राजस्व के बकाया के तौर पर वसूली योग्य होगा।
(8) जब उपधारा (2) के अधीन, भूमिस्वामी को पुनः कब्जा दिलाया जाने के लिए आदेश दे दिया गया हो, तो तहसीलदार विरोधी पक्षकार को इस बात के लिए अपेक्षित कर सकेगा कि वह आदेश के उल्लंघन में भूमि का कब्जा लेने से विरत रहने के लिये ऐसी राशि का जैसी कि तहसीलदार उचित समझे, बन्धनामा निष्पादित करे।
(9) जहां उपधारा (2) के अधीन, भूमिस्वामी को पुनः कब्जा दिलाया जाने के लिये आदेश दे दिया गया हो, वहां विरोधी पक्षकार जुर्माने के, जो दस हजार रुपये तक का हो सकेगा, लिए भी दायित्वाधीन होगा:
परन्तु तहसीलदार इस बात के लिए सक्षम नहीं होगा कि वह पांच हजार रुपये से अधिक का जुर्माना अधिरोपित करे, किन्तु यदि किसी मामले में वह यह समझता है कि मामले की परिस्थितियां अधिक जुर्माने के अधिरोपण के लिए समुचित आधार हैं, तो वह मामला उपखण्ड अधिकारी को निर्देशित कर सकेगा जो सम्बन्धित पक्षकार को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् जुर्माने के सम्बन्ध में ऐसे आदेश पारित करेगा जैसे कि वह उचित समझे।
(1) यदि कोई व्यक्ति, धारा 250 के अधीन कब्जा वापस दे दिया जाने के आदेश की तारीख के पश्चात् सात दिन से अधिक कालावधि तक किसी भूमि पर अप्राधिकृत दखल या कब्जा किए रहता है, तो उक्त धारा की उपधारा (6) के अधीन देय प्रतिकर या उपधारा (9) के अधीन जुर्माने पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे भूमि स्वामी को कब्जा वापस दिया जाने के लिए किए गए प्रथम आदेश की दशा में, उपखण्ड अधिकारी उसे गिरफ्तार करवाएगा और पन्द्रह दिन की कालावधि के लिए परिरूद्ध किया जाने के लिए, उसे वारण्ट के साथ सिविल कारागार में भेजेगा, तथा ऐसे भूमि स्वामी को कब्जा वापस दिया जाने के लिये किए गए द्वितीय या पश्चात्वर्ती आदेश की दशा में, उपखण्ड अधिकारी उसे गिरफ्तार करवाएगा और तीन मास की कालावधि के लिए परिरुद्ध किया जाने के लिए, उसे वारण्ट के साथ सिविल कारागार में भेजेगा:
परन्तु इस धारा के अधीन कोई कार्यवाही तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि उस व्यक्ति से यह अपेक्षा करने वाली सूचना जारी न कर दी गई हो कि वह उपखण्ड अधिकारी के समक्ष ऐसी तारीख को, जो कि सूचना में विनिर्दिष्ट की जाएगी, उपसंजात हो और इस संबंध में कारण दर्शाए कि उसे सिविल कारागार के सुपुर्द क्यों न किया जाए:
परन्तु यह और भी कि उपखण्ड अधिकारी ऐसे व्यक्ति को, वारण्ट में उल्लिखित कालावधि का अवसान होने के पूर्व, निरोध से छोड़े जाने का आदेश दे सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अप्राधिकृत कब्जा छोड़ दिया गया है:
परन्तु यह भी कि इस धारा के अधीन किसी स्त्री को गिरफ्तार या निरुद्ध नहीं किया जाएगा।
(2) राज्य सरकार उपधारा (1) के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए नियम बना सकेगी।
(1) यदि कोई व्यक्ति, जिसे राज्य सरकार की कार्यपालिक शक्ति के अधीन भूमि के वितरण या व्ययन या आबंटन की किसी स्कीम के, जो राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर अंगीकृत या प्रायोजित की जाए, या तत्समय प्रवृत्त किसी अधिनियिमित के अधीन किसी ऐसी स्कीम के अनुसार दिए गए किसी पट्टे के अधीन कोई भूमि भूमिस्वामी अधिकार में या सरकारी पट्टेदार की हैसियत में आबंटित की गई है और ऐसा व्यक्ति उसे इस प्रकार आबंटित भूमि का वास्तविक कब्जा लेने में असमर्थ रहा है तो वह उस भूमि का वास्तविक कब्जा उसे दिलाया जाने के लिए तहसीलदार को आवेदन कर सकेगा जो उसे दिए गए पट्टे के अधीन उसे आबंटित की गई है।
(2) ऐसा आवेदन प्राप्त होने पर, तहसीलदार लिखित आदेश द्वारा-
(एक) उस भूमि के कब्जाधारी व्यक्ति को यह निदेश देगा कि वह उसे तत्काल खाली कर दे; या
(दो) उस दशा में जबकि कब्जा लिए जाने या कब्जा परिदत्त किये जाने में किसी व्यक्ति द्वारा बाधा डाली जाती है, ऐसे व्यक्ति को यह निदेश देगा कि वह ऐसी बाधा हटा ले जिससे कि कब्जे का परिदान हो सके, और वह उसके द्वारा भूमि खाली कर दिये जाने पर या बाधा हटा ली जाने पर उसका वास्तविक कब्जा पट्टे के अधीन भूमि धारण करने के लिए हकदार यथास्थिति भूमिस्वामी या सरकारी पट्टेदार को परिदत्त करेगा।
(3) तहसीलदार, यदि आवश्यक हो, पुलिस बल को सम्मिलित करते हुए ऐसे बल का प्रयोग कर सकेगा जो आबंटिती को भूमि का वास्तविक कब्जा दिलाया जाने के लिए आवश्यक हो ।
(4) यदि वह व्यक्ति, जिसे उपधारा (2) के अधीन निदेश दिया जाता है, निदेश का अनुपालन करने में असफल रहता है तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, या दोनों से, और जहां निदेश का ऐसा अनुपालन चालू रहने वाला अनुपालन है, वहां ऐसे अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम अनुपालन के पश्चात् के प्रत्येक ऐसे दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसे अनुपालन का चालू रहना साबित हो जाता है, पांच सौ रुपये तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा।
(5) इस धारा के अधीन का अपराध संज्ञेय और अजमानतीय होगा।
(1) ऐसे समस्त तालाब, जो संबंधित क्षेत्रों में मध्यवर्तियों के अधिकारों की समाप्ति का उपबन्ध करने वाले अधिनियम के प्रवृत्त होने की तारीख को या उसके पूर्व दखलरहित भूमि पर स्थित हों और जिन पर ऐसी तारीख के ठीक पूर्व ग्राम समुदाय के सदस्य सिंचाई या निस्तार के अधिकारों का प्रयोग करते रहे हों यदि वे राज्य सरकार में पूर्व से ही निहित न हुए हों, तो 6 अप्रैल 1959 से राज्य सरकार में पूर्णरूपेण निहित हो जायेंगे:
परन्तु इस धारा की किसी भी बात के सम्बन्ध में यह नहीं समझा जाएगा कि वह तालाब के निहित होने की तारीख को विद्यमान पट्टे के अधीन तालाब में पट्टेदार के किसी ऐसे अधिकार पर प्रभाव डालती है जो पट्टे में विनिर्दिष्ट की गई सीमा तक तथा उसमें विनिर्दिष्ट किये गये निबन्धनों तथा शर्तों के अध्यधीन रहते हुए प्रयोग किया जा सकेगा:
परन्तु यह और भी कि कोई भी तालाब राज्य सरकार में तब तक निहित नहीं होगा जब तक कि-
(एक) कलेक्टर का, ऐसी जांच करने के पश्चात् जैसी कि वह उचित समझे, यह समाधान न हो जाए कि तालाब इस उपधारा में अधिकथित की गई शर्तों को पूरा करता है; और
(दो) हितबद्ध पक्षकारों पर सूचना की तामील न कर दी गई हो और उन्हें सुनवाई का अवसर न दे दिया गया है।
(2) किसी भी ऐसे तालाब में, सिंचाई या निस्तार के अधिकार से भिन्न किसी हित का दावा करने वाला कोई व्यक्ति, उपधारा (1) के अधीन निहित होने की तारीख से चार वर्ष की कालावधि के भीतर अपने हित के संबंध में प्रतिकर के लिये कलेक्टर को विहित प्ररूप में आवेदन कर सकेगा।
(2-क) धारा 239 के उपबन्ध, उपधारा (1) के अधीन राज्य सरकार में निहित तालाब के तटबन्धों पर खड़े हुए वृक्षों को उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार कि वे दखलरहित भूमि में लगाये गये वृक्षों को लागू होते हैं।
(3) ऐसा प्रतिकर उस भू-राजस्व का, जो कि तालाब में समाविष्ट भूमि पर निर्धारणीय है, पन्द्रह गुना होगा और निर्धारण के प्रयोजनों के लिये ऐसी भूमि को उसी प्रकार की सिंचित भूमि माना जाएगा जैसी कि उससे लगी हुई भूमि है।
(4) उपधारा (3) के अधीन यथा अवधारित प्रतिकर का भुगतान कलेक्टर द्वारा उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों को किया जाएगा जिनके संबंध में उसके समाधानप्रद रूप में यह सिद्ध हो जाए कि वे सम्बन्धित तालाब में हित रखते हैं।
(5) उपधारा (4) के अधीन प्रतिकर का भुगतान करने से राज्य सरकार का उन समस्त दायित्वों से पूर्ण उन्मोचन हो जाएगा जो कि सम्बन्धित तालाब की बाबत राज्य सरकार के हों किन्तु उससे तालाब सम्बन्धी उन अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा जिन्हें कोई अन्य व्यक्ति विधि की सम्यक् प्रक्रिया द्वारा उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों के विरुद्ध प्रवर्तित कराने का हकदार हो जिसको या जिनको पूर्वोक्त रूप में प्रतिकर का भुगतान किया जा चुका है।
(6) राज्य सरकार, ऐसे तालाबों से जल के उपयोग के विनियमन के लिये उपबन्ध करने वाले नियम बना सकेगी।
(7) उपधारा (1) के अधीन किसी तालाब के निहित हो जाने से ऐसे तालाब में के सिंचाई तथा निस्तार के उन अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जिनके कि लिये कोई व्यक्ति निहित होने की तारीख के ठीक पूर्व हकदार हो।
इस धारा के प्रयोजनों के लिए, तालाब के अन्तर्गत उस तालाब के तटबन्धों पर खड़े हुए वृक्ष हैं किन्तु उसके तटबन्धों पर स्थित भवन, मन्दिर या अन्य सन्निर्माण नहीं हैं।
252. छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।
(1) इस संहिता में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय कोई भी व्यक्ति जो इस अध्याय के या इस अध्याय के अधीन बनाये गये नियमों के उपबन्धों के उल्लंघन में कार्य करेगा, या जो किन्हीं नियमों या वाजिब - उल - अर्ज में दर्ज की गई किसी रूढ़ि का उल्लंघन करेगा या उनका अनुपालन नहीं करेगा या निस्तार पत्रक में की गई किसी प्रविष्टि को भंग करेगा पच्चीस हजार रुपये से अनधिक ऐसी शास्ति का दायी होगा जैसी कि उपखंड अधिकारी, ऐसे व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, उचित समझे, तथा उपखण्ड अधिकारी किसी भी ऐसी इमारती लकड़ी, वन उपज या किसी अन्य उपज के अधिहरण का भी आदेश दे सकेगा जिसका कि ऐसे व्यक्ति ने राज्य सरकार की भूमियों में से लेकर उपयोग कर लिया हो या जिसे कि उसने वहां से हटा लिया हो।
(2) जहां उपधारा (1) के अधीन दण्डनीय कोई उल्लंघन, भंग या अननुपालन ग्राम सभा द्वारा किया गया हो, वहां ग्राम सभा का प्रत्येक पदाधिकारी उस उपधारा के अधीन तब तक दायी होगा जब तक कि वह यह साबित न कर दे कि वह उल्लंघन, भंग या अननुपालन उसकी जानकारी के बिना हुआ था या यह कि उसने ऐसे उल्लंघन, भंग या अननुपालन को रोकने के लिए समस्त सम्यक् तत्परता बरती थी।
(3) जहां उपखंड अधिकारी इस धारा के अधीन शास्ति अधिरोपित करते हुए कोई आदेश पारित करता है, वहां वह यह निदेश दे सकेगा कि सम्पूर्ण शास्ति या उसके किसी भाग का उपयोजन ऐसे उपायों के, जो कि ऐसे उल्लंघन, भंग या अननुपालन के कारण जनता को होने वाली हानि या क्षति को रोकने के लिए आवश्यक हों, खर्च की पूर्ति करने के लिए किया जा सकेगा।
254. छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।