धारा 44 से 56 अध्याय 5 छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959

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अध्याय 5

अपील, पुनरीक्षण तथा पुनर्विलोकन

44. अपील तथा अपील प्राधिकारी . -

(1) उस स्थिति को छोड़कर जहां अन्यथा उपबंधित किया गया है, इस संहिता या इसके अधीन बनाये गये नियमों के अधीन पारित प्रत्येक मूल आदेश की अपील-

(क) यदि ऐसा आदेश, उपखण्ड अधिकारी के अधीनस्थ किसी राजस्व अधिकारी के द्वारा पारित किया गया है, तो उपखण्ड अधिकारी को होगी;

(ख) यदि ऐसा आदेश, उप सर्वेक्षण अधिकारी के अधीनस्थ किसी राजस्व अधिकारी के द्वारा पारित किया गया है, तो उप सर्वेक्षण अधिकारी को होगी;

(ग) यदि ऐसा आदेश, उपखण्ड अधिकारी के द्वारा पारित किया गया है, तो कलेक्टर को होगी;

(घ) यदि ऐसा आदेश, उप सर्वेक्षण अधिकारी के द्वारा पारित किया गया है, तो जिला सवेक्षण अधिकारी को होगी;

(ङ) यदि ऐसा आदेश, किसी ऐसे राजस्व अधिकारी के द्वारा पारित किया गया है, जिसके संबंध में धारा 12 की उपधारा (3) या धारा 21 के अधीन निर्देश दिया गया हो, तो ऐसे राजस्व अधिकारी को होगी, जिसे राज्य सरकार निर्देश दे;

(च) यदि ऐसा आदेश, केलक्टर के द्वारा पारित किया गया है, तो आयुक्त को होगी;

(छ) यदि ऐसा आदेश, जिला सर्वेक्षण अधिकारी के द्वारा पारित किया गया है, तो आयुक्त, भू-अभिलेख को होगी;

(ज) यदि ऐसा आदेश, आयुक्त या आयुक्त, भू-अभिलेख के द्वारा पारित किया गया है, तो राजस्व मण्डल को होगी।

(2) अन्यथा उपबंधित के सिवाय इस संहिता या इसके अधीन बनाये गये नियमों के अधीन प्रथम अपील में पारित प्रत्येक आदेश के विरुद्ध द्वितीय अपील-

(क) यदि ऐसा आदेश, उपखण्ड अधिकारी या उप सर्वेक्षण अधिकारी या कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी के द्वारा पारित किया गया है, तो आयुक्त को होगी;

(ख) यदि ऐसा आदेश आयुक्त या आयुक्त, भू-अभिलेख के द्वारा पारित किया गया है, तो राजस्व मण्डल को होगी।"

(3) द्वितीय अपील निम्नलिखित आधारों पर होगी,-

(क) यदि मूल आदेश को, प्रथम अपील में खर्चे के मामले के अतिरिक्त अन्य मामले में परिवर्तित किया गया हो, उलट दिया गया हो; या

(ख) यदि आदेश, विधि या विधि का प्रभाव रखने वाली प्रथा के प्रतिकूल हो; या

(ग) यदि आदेश द्वारा, विधि या विधि का प्रभाव रखने वाली प्रथा संबंधी किसी सारवान विवाद्यक का अवधारण नहीं हो सका है; या

(घ) यदि संहिता द्वारा यथा विहित प्रक्रिया में ऐसी सारवान गलती या त्रुटि हुई है, जिससे गुणागुण के आधार पर मामले के विनिश्चय में गलती या त्रुटि उत्पन्न हो।

(4) पुनर्विलोकन में, फेरफार करते हुए या उसे उलटते हुए पारित किया गया कोई आदेश, उसी रीति में अपीलनीय होगा, जिस रीति में मूल आदेश अपीलनीय होता है।

" 45.  छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त

46. कतिपय आदेशों के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी. –

किसी भी ऐसे आदेश-

(क) जिसके द्वारा कोई अपील या पुनर्विलोकन के लिये कोई आवेदन परिसीमा अधिनियम, 1963 1963 का सं० 36) की धारा 5 में विनिर्दिष्ट किये गये आधारों पर ग्रहण किया गया है; या

(ख) जिसके द्वारा पुनर्विलोकन के लिये किये गये किसी आवेदन को नामंजूर किया गया है; या

(ग) जिसके द्वारा किसी ऐसे आवेदन को, जो रोक (स्टे) के लिये हो, मंजूर या नामंजूर किया गया है; या

(घ) जो अन्तरिम स्वरूप का है; या

(ङ) जो धारा 104 की उपधारा (2) या धारा 106 की उपधारा (1) के अधीन की नियुक्ति से संबंधित है, इस संहिता के अधीन कोई अपील नहीं होगी।

47. अपीलों की परिसीमा -

(क) उस आदेश की तारीख से जिसके कि संबंध में आपत्ति की जाय, पैंतालीस दिन का अवसान हो जाने के पश्चात् उपखण्ड अधिकारी या कलेक्टर को या बन्दोबस्त अधिकारी या बन्दोबस्त आयुक्त को कोई अपील नहीं होगी, या

(ख) ऐसी तारीख से साठ दिन का अवसान हो जाने के पश्चात् आयुक्त को कोई अपील नहीं होगी या

(ग) ऐसी तारीख से नब्बे दिन का अवसान हो जाने के पश्चात् मण्डल को कोई अपील नहीं होगी:

परन्तु इस संहिता के प्रवृत्त होने के पूर्व मध्यभारत क्षेत्र में पारित किये गये किसी आदेश की अपील खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट किये गये किसी राजस्व अधिकारी को ऐसे आदेश की तारीख से साठ दिन का अवसान होने के पूर्व फाइल की जा सकेगी:

परन्तु यह और भी कि जहां किसी ऐसे पक्षकार को, जो उस पक्षकार से भिन्न हो जिसके कि विरुद्ध आदेश एक पक्षीय पारित किया गया है, उस तारीख की, जिसको कि आदेश पारित किया गया हो, कोई पूर्व सूचना न रही हो, वहां इस धारा के अधीन परिसीमा की संगणना ऐसे आदेश के संसूचित किये जाने की तारीख से की जायगी।

48. याचिका के साथ उस आदेश की प्रतिलिपि होगी जिसके कि संबंध में आपत्ति की गई है. -

अपील, पुनर्विलोकन या पुनरीक्षण के लिये प्रत्येक याचिका के साथ उस आदेश की, जिसके कि संबंध में आपत्ति की गई है, प्रमाणित प्रतिलिपि होगी जब तक कि ऐसी प्रतिलिपि के पेश किये जाने से अभिमुक्ति न दे दी गई हो।

49. अपील प्राधिकारी की शक्ति. -

(1) अपील प्राधिकारी या तो अपील को ग्रहण कर सकेगा या, अभिलेख मंगाने और अपीलार्थी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उसे संक्षेपतः नामंजूर कर सकेगा:

परन्तु अपील प्राधिकारी उस दशा में अभिलेख मंगाने के लिए आबद्ध नहीं होगा जबकि अपील समय वर्जित है या अपील नहीं हो सकती है।

(2) यदि अपील ग्रहण कर ली जाती है तो सुनवाई के लिये तारीख नियत की जायगी और प्रत्यर्थी पर सूचना तामील की जायेगी।

(3) पक्षकारों को, यदि वे उपसंजात हों, सुनने के पश्चात् अपील प्राधिकारी उस आदेश को जिसके कि विरुद्ध अपील की गयी है, पुष्टि कर सकेगा, उसमें फेरफार कर सकेगा या उसे उलट सकेगा, या वह स्वयं अतिरिक्त साक्ष्य ले सकेगा जो उस प्रकरण के निपटारे के संबंध में आवश्यक हों:

परन्तु अपील प्राधिकारी किसी भी ऐसे मामले को निपटारे के लिये किसी भी अधीनस्थ राजस्व अधिकारी को प्रतिपेषित नहीं कर सकेगा।

50. पुनरीक्षण. -

(1) मण्डल या आयुक्त या आयुक्त, भू-अभिलेख या कलक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी स्वप्रेरणा से या किसी पक्षकार द्वारा किये गये आवेदन पर, किसी भी समय, अपने अधीनस्थ किसी भी राजस्व अधिकारी द्वारा पारित किये गये किसी आदेश की वैधता या औचित्य के संबंध में या उसकी कार्यवाहियों की नियमितता के संबंध में अपना समाधान करने के प्रयोजन के लिये, किसी भी ऐसे मामले का, जो ऐसे अधिकारी के समक्ष लम्बित हो या उसके द्वारा निपटाया गया हो, अभिलेख मंगा सकेगा और उसकी परीक्षा कर सकेगा और उसके संबंध में ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जैसा कि वह ठीक समझे:

परन्तु-

(एक) पुनरीक्षण के लिये कोई भी आवेदन-

(क) इस संहिता के अधीन अपीलनीय किसी आदेश के विरुद्ध ग्रहण नहीं किया जाएगा;

(ख) धारा 210 के अधीन आयुक्त, भू-अभिलेख के किसी आदेश के विरुद्ध ग्रहण नहीं किया जायेगा;

(ग) आयुक्त अथवा आयुक्त, भू-अभिलेख द्वारा धारा 170-ख के अधीन के मामलों के संबंध में पुनरीक्षण में पारित किसी आदेश के विरूद्ध ग्रहण नहीं किया जाएगा और न ही मंडल द्वारा स्वप्रेरणा से ऐसे आदेश का पुनरीक्षण किया जाएगा;

(दो) कोई भी ऐसा आवेदन तब तक ग्रहण नहीं किया जायगा जब तक कि वह आदेश की तारीख से यथास्थिति आयुक्त या आयुक्त, भू-अभिलेख या कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी को साठ दिन के भीतर या राजस्व मण्डल को नब्बे दिन के भीतर प्रस्तुत न किया गया हो, और पूर्वोक्त कालावधि की संगणना करने में उक्त आदेश की प्रतिलिपि अभिप्राप्त करने के लिये अपेक्षित समय छोड़ दिया जायगा,

(तीन) किसी भी आदेश को पुनरीक्षण में तब तक फेरफारित नहीं किया जायगा या उलटा नहीं जायगा जब तक कि हितबद्ध पक्षकारों पर सूचना की तामील न कर दी गई हो और उन्हें सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो।

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी-

(एक) जहाँ किसी मामले के संबंध में कार्यवाहियां उपधारा (1) के अधीन मण्डल द्वारा प्रारम्भ कर दी गई हों, वहां आयुक्त या आयुक्त, भू-अभिलेख या कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी द्वारा उनके संबंध में कोई कार्यवाही नहीं की जायेगी;

(दो) जहां किसी मामले के संबंध में कार्यवाहियां उपधारा (1) के अधीन आयुक्त, आयुक्त, भू-अभिलेख द्वारा प्रारंभ कर दी गई हैं, वहां कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी द्वारा उनके संबंध में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी;

(तीन) जहां किसी ऐसे मामले के संबंध में कार्यवाहियां उपधारा (1) के अधीन आयुक्त, आयुक्त, भू-अभिलेख, कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी द्वारा प्रारम्भ कर दी गई हों वहां मंडल यथास्थिति आयुक्त, आयुक्त, भू-अभिलेख या कलक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी द्वारा ऐसी कार्यवाहियों के अंतिम रूप से निपटाये जाने तक, ऐसे मामले के संबंध में इस धारा के अधीन या तो कोई कार्यवाही करने से विरत रह सकेगा या ऐसी कार्यवाहियों को वापस ले सकेगा और ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जैसा कि वह उचित समझे;

(चार) जहां किसी ऐसे मामले के सबंध में कार्यवाहियां उपधारा (1) के अधीन कलक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी द्वारा प्रारंभ कर दी गई हैं, वहां आयुक्त या आयुक्त, भू-अभिलेख, यथास्थिति कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी द्वारा ऐसी कार्यवाहियों के अंतिम रूप से निपटाये जाने तक, ऐसे मामले के संबंध में इस धारा के अधीन या तो कोई कार्यवाही करने से विरत रह सकेगा या ऐसी कार्यवाहियों को वापस ले सकेगा और ऐसा आदेश पारित कर सकेगा, जैसा कि वह उचित समझे;

स्पष्टीकरण –

इस धारा के प्रयोजन के लिए समस्त राजस्व अधिकारी मण्डल के अधीनस्थ समझे जायेंगे।

51. आदेशों का पुनर्विलोकन. -

(1) मण्डल तथा प्रत्येक राजस्व अधिकारी, या तो स्वप्रेरणा से या किसी हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर, किसी ऐसे आदेश का, जो स्वतः उसके द्वारा या उसके पूर्वाधिकारियों में से किसी पूर्वाधिकारी द्वारा पारित किया गया हो, पुनर्विलोकन कर सकेगा और उसके संबंध में ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जैसा कि वह ठीक समझे :

परन्तु -

(एक) यदि आयुक्त, आयुक्त, भू-अभिलेख, कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी किसी ऐसे आदेश का, जो कि उसने स्वयं पारित न किया हो, पुनर्विलोकन करना आवश्यक समझता है, तो वह पहले मण्डल की मंजूरी अभिप्राप्त करेगा, और यदि कलेक्टर या जिला सर्वेक्षण अधिकारी के अधीनस्थ कोई अधिकारी किसी ऐसे आदेश का, जो चाहे स्वयं उसके द्वारा या उसके किसी पूर्वाधिकारी द्वारा पारित किया गया हो, पुनर्विलोकन करने की प्रस्थापना करता है, तो वह पहले उस प्राधिकारी की जिसके कि वह ठीक अधीनस्थ है, लिखित मंजूरी अभिप्राप्त करेगा;

(एक क) किसी भी आदेश को तब तक फेरफारित नहीं किया जाएगा या उलटा नहीं जाएगा जब तक कि हितबद्ध पक्षकारों को उपसंजात होने तथा ऐसे आदेश की पुष्टि में सुने जाने की सूचना न दे दी गई हो;

(दो) किसी भी ऐसे आदेश का, जिसकी कि अपील की गई है, या जो किन्हीं पुनरीक्षण कार्यवाहियों का विषय है, उस समय तक पुनर्विलोकन नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसी अपील या कार्यवाहियां लम्बित रहती हैं;

(तीन) किसी भी ऐसे आदेश का पुनर्विलोकन जो प्राइवेट व्यक्तियों के बीच अधिकार संबंधी किसी प्रश्न पर प्रभाव डालता हो, कार्यवाहियों के किसी पक्षकार के आवेदन पर ही किया जाएगा अन्यथा नहीं और ऐसे आदेश के पुनर्विलोकन के लिए कोई आवेदन तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक कि वह उस आदेश के पारित किये जाने के नब्बे दिन के भीतर न किया गया हो।

(2) किसी भी आदेश का पुनर्विलोकन सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का संख्यांक 5) में उपबंधित किये गए आधारों पर ही किया जाएगा अन्यथा नहीं।

(3) इस धारा के प्रयोजनों के लिये, कलेक्टर को किसी भी ऐसे राजस्व अधिकारी का पद उत्तरवर्ती समझा जाएगा जिसने जिला छोड़ दिया है या जिसने राजस्व अधिकारी की हैसियत से शक्तियों का प्रयोग करना बंद कर दिया है तथा जिले में जिसका उत्तराधिकारी नहीं है।

(4) किसी भी ऐसे आदेश का, जिस पर अपील या पुनरीक्षण में विचार किया जा चुका है, किसी ऐसे राजस्व अधिकारी द्वारा पुनर्विलोकन नहीं किया जाएगा जो अपील या पुनरीक्षण प्राधिकारी के अधीनस्थ है।

52. आदेशों के निष्पादन का रोका जाना. -

(1) राजस्व अधिकारी, जिसने कोई आदेश पारित किया हो उसका पद उत्तरवर्ती अपील या पुनरीक्षण के लिए विहित की गई कालावधि का अवसान होने के पूर्व, किसी भी समय, यह निदेश दे सकेगा कि ऐसे आदेश का निष्पादन उतने समय तक के लिये रोक दिया जाए जो अपील या पुनरीक्षण फाइल करने तथा अपील या पुनरीक्षण प्राधिकारी से रोक आदेश (स्टे आर्डर) अभिप्राप्त करने के लिये अपेक्षित हो।

(2) अपील या पुनरीक्षण प्राधिकारी, किसी भी समय यह निदेश दे सकेगा कि उस आदेश का जिसकी अपील की गई है या जिसके कि विरुद्ध पुनरीक्षण किया गया है, निष्पादन उतने समय तक के लिये रोक दिया जाए जितना कि वह ठीक समझे;

परन्तु आदेश का निष्पादन, एक बार में तीन माह से अधिक या अगली सुनवाई की तारीख, जो भी पहले हो, तक के लिए स्थगित नहीं किया जायेगा।

(3) वह प्राधिकारी, जो धारा 50 या धारा 51 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो, यह निर्देश दे सकेगा कि उस आदेश का, जो पुनरीक्षण या पुनर्विलोकन के अधीन है, निष्पादन उतने समय तक के लिए रोक दिया जाए जितना की वह ठीक समझे;

परन्तु आदेश का निष्पादन, एक बार में तीन माह से अधिक या अगली सुनवाई की तारीख, जो भी पहले हो, तक के लिए स्थगित नहीं किया जायेगा।

(4) किसी आदेश का निष्पादन रोक दिये जाने के निदेश देने वाला राजस्व अधिकारी या प्राधिकारी ऐसी शर्तें अधिरोपित कर सकेगा या ऐसी प्रतिभूति दिये जाने का आदेश दे सकेगा, जैसी की वह ठीक समझे।

(5) कोई भी ऐसा आदेश, जिससे किसी आदेश के निष्पादन को रोक दिये जाने का निदेश दिया गया हो, इस धारा के उपबंधों के अनुसार ही पारित किया जाएगा अन्यथा नहीं।

53. परिसीमा अधिनियम का लागू होना. -

इस संहिता में अन्तर्विष्ट किसी अभिव्यक्त उपबन्ध के अध्यधीन रहते हुए, परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का सं० 36) के उपबंध इस संहिता के अधीन समस्त अपीलों तथा पुनर्विलोकन तथा पुनरीक्षण हेतु समस्त आवेदनों को लागू होंगे।

54. लंबित पुनरीक्षण -

इस अध्याय में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसी समस्त पुनरीक्षण छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2013 के प्रवृत्त होने के ठीक पूर्व किसी राजस्व अधिकारी के समक्ष लंबित हों, ऐसे राजस्व अधिकारी द्वारा उसी प्रकार से सुनी जाएंगी तथा विनिश्चित की जाएंगी, मानो कि यह अधिनियम, अधिनियमित ही न हुआ हो।

55. अध्याय का लागू होना. -

शंका के परिवर्जन के लिए, एतद्वारा यह घोषित किया जाता है कि इस संहिता में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबन्धित के सिवाय इस अध्याय के उपबन्ध निम्नलिखित को लागू होंगे :-

(क) ऐसे समस्त आदेशों को, जो इस संहिता के प्रवृत्त होने की तारीख के पूर्व किसी राजस्व अधिकारी द्वारा पारित किए गए हों और जिनके कि विरुद्ध कोई अपील या पुनरीक्षण कार्यवाहियां ऐसी तारीख के पूर्व लम्बित न हों; और

(ख) राजस्व अधिकारियों के समक्ष की समस्त कार्यवाहियों को, इस बात के होते हुए भी कि वे इस संहिता के प्रवृत्त होने के पूर्व संस्थित की गई थीं या प्रारम्भ की गई कार्यवाहियों से उद्भूत हुई थीं।-

56. आदेश का अर्थान्वयन –

इस अध्याय में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, अभिव्यक्ति 'आदेश' से अभिप्रेत है उस विनिश्चय की प्ररूपित अभिव्यक्ति जो कि यथास्थिति मंडल या किसी राजस्व अधिकारी द्वारा इस कोड या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी मामले के संबंध में किया गया हो।

 

 

 

 

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