
255. छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।
ऐसी शर्तों के तथा ऐसी फीस के भुगतान के अध्यधीन रहते हुए जो कि इस संहिता के अधीन बनाये गये नियमों द्वारा विहित की जाएँ, समस्त ऐसे राजस्व अभिलेख, नक्शे तथा भू-अभिलेख, जो इस संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन तैयार किये गये हों या जिनका उसके अधीन तैयार किया जाना या रखा जाना अपेक्षित हो, युक्तियुक्त समयों पर जनता के निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे, और उनमें से प्रमाणित उद्धरण या उनकी प्रमाणित प्रतिलिपियां उन समस्त व्यक्तियों को दी जाएंगी जो कि उनके लिए आवेदन करें।
इस संहिता में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में अन्यथा उपबंधित के सिवाय कोई सिविल न्यायालय किसी ऐसे मामले पर, जिसे कि अवधारित करने, विनिश्चित करने या निपटाने के लिए राज्य सरकार, मण्डल या कोई राजस्व अधिकारी इस संहिता द्वारा सशक्त हो, कोई विनिश्चय या आदेश अभिप्राप्त करने के लिए संस्थित किये गये किसी वाद या किए गये किसी आवेदन को ग्रहण नहीं करेगा, और विशिष्टतया तथा इस उपबन्ध की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कोई सिविल न्यायालय निम्नलिखित किन्हीं भी विषयों के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग नहीं करेगा :-
(क) राज्य सरकार और किसी व्यक्ति के बीच, धारा 57 की उप-धारा (1) के अधीन किसी अधिकार के संबंध में कोई विनिश्चय;
(क-1) जिस प्रयोजन के लिए भूमि धारा 59 के अधीन विनियोजित की गई है उस प्रयोजन बाबत कोई विनिश्चय;
(ख) भू-सर्वेक्षण की अधिसूचना की विधिमान्यता या उसके प्रभाव या भू-राजस्व निर्धारण की अवधि के बारे में कोई प्रश्न;
(ग) जिला सर्वेक्षण अधिकारी या कलेक्टर द्वारा आबादी का अवधारण करते हुए किये गये किसी विनिश्चय को उपांतरित करने के लिए कोई दावा;
(घ) भू-राजस्व दिये बिना, या उचित निर्धारण से कम निर्धारण पर भूमि धारण करने के लिए या किसी भूमि पर निर्धारित भू-राजस्व पूर्णतः या भागतः समनुदेशित किए जाने के लिए राज्य सरकार के विरुद्ध कोई दावा;"
(ङ) इस संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन निर्धारित या पुनः निर्धारित भू-राजस्व की रकम;
(च) किन्हीं भू-अभिलेखों में कोई प्रविष्टि कराने या किसी ऐसी प्रविष्टि का लोप कराने या उसे संशोधित कराने के लिए राज्य सरकार के विरुद्ध कोई दावा;
(छ) अध्याय 10 के अधीन सीमांकन किया जाने या सीमा चिन्हों के लगाये जाने से संबंधित कोई प्रश्न;
(ज) राज्य सरकार के विरुद्ध कोई ऐसा दावा जो भू-राजस्व के संग्रहण से या किसी ऐसी राशि की, जो इस संहिता या किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन भू- राजस्व के तौर पर वसूली योग्य हो, वसूली से संबंधित हो या उससे उद्भूत होता हो;
(झ) भू-राजस्व की छूट या उसके निलंबन के लिए, या इस बात की घोषणा के लिए कि किसी वर्ष में फसलें बिगड़ गई हैं, राज्य सरकार या किसी राजस्व अधिकारी के विरुद्ध कोई दावा;
(ञ) धारा 166 के अधीन कतिपय अन्तरणों के मामलों में समपहरण सम्बन्धी कोई विनिश्चय;
(ट) धारा 168 की उपधारा (4) के अधीन भूमिस्वामी के पट्टेदार की बेदखली;
(ठ) धारा 170 की उपधारा (1) तथा धारा 170 क की उपधारा (2) के खण्ड (क) तथा (ख) के अधीन किसी भी भूमिस्वामी द्वारा किए गए अन्तरण (हस्तांतरण) को रद्द करने के लिए कोई भी दावा;
(ठ-1) धारा 170 ख के अन्तर्गत आने वाला कोई विषय;
(ड) धारा 182 के अधीन सरकारी पट्टेदार की बेदखली;
(ढ) 1[***]
(ण) 2[***]
(त) 3[***]
(थ) 4[***]
(द) 5[***]
(ध) 6[***]
(न) 7[**]
(प) 8[***] छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।
(फ) धारा 209 की उपधारा (3) के अधीन प्रतिकर के रूप में देय रकम, धारा 210 के अधीन खातों की चकबन्दी की स्कीम की पुष्टि की जाना, धारा 213 के अधीन स्कीम को कार्यान्वित करने में अधिकारों का अन्तरण तथा धारा 215 के अधीन खातों की चकबन्दी के खर्चे का निर्धारण तथा प्रभाजन;
(ब) निस्तार- पत्रक में की किसी प्रविष्टि को उपान्तरित कराने के लिए कोई दावा;
(ब-1) अप्राधिकृत रूप से भूमि का कब्जा लेने के लिए धारा 248 के अधीन शास्ति के संबंध में कोई विनिश्चिय;
(भ) धारा 250 के अधीन अनुचित रूप से बेकब्जा किए गए भूमिस्वामी के पुनःस्थापन के बारे में कोई विनिश्चय;
(भ-एक) धारा 250- क के अधीन सिविल कारागार में निरुद्ध किये जाने के बारे में कोई विनिश्चय;
(भ-दो ) धारा 250-ख के अधीन भूमिस्वामी या सरकारी पट्टेदार को भूमि का वास्तविक कब्जा परिदान किये जाने के बारे में कोई विनिश्चये;
(म) धारा 251 के अधीन राज्य सरकार में तालाबों के निहित होने के बारे में कोई विनिश्चय तथा उसके अधीन राज्य सरकार के विरुद्ध उद्भूत होने वाला कोई दावा;
(य) इस संहिता के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के उपबन्धों के अधीन अधिरोपित या निर्धारित किसी प्रीमियम, शास्ति, उपकर या रेट को अपास्त कराने या उपान्तरित कराने के लिये राज्य सरकार के विरुद्ध कोई दावा;
(य-1) छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त
(य-2) किसी राजस्व अधिकारी या इस संहिता के अधीन नियुक्त किसी अन्य अधिकारी पर इस संहिता द्वारा अधिरोपित किसी कर्तव्य के पालन के लिए विवश करने हेतु कोई दावा।
(1) धारा 165 की उपधारा (6) के अधीन या धारा 169 के परन्तुक के अधीन या धारा 170 की उपधारा 1 के अधीन या धारा 170-ए के अधीन या धारा 250 के अधीन किन्हीं भी ऐसी कार्यवाहियों में, जिनके कि पक्षकारों में से एक पक्षकार किसी ऐसी जनजाति का, जिसे कि धारा 165 की उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति घोषित किया गया हो, भूमिस्वामी है, उनके अधीन अन्तरण की विधिमान्यता को साबित करने का भार इस कोड में या तत्समय प्रवृत्त किसी भी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी उस व्यक्ति पर होगा जो कि ऐसे अन्तरण के विधिमान्य होने का दावा करता हो।
(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट की गई किन्हीं भी ऐसी कार्यवाहियों में, जिनके कि पक्षकारों में से एक पक्षकार ऐसी जनजाति का, जिसे कि धारा 165 की उपधारा (6) के अधीन आदिम जनजाति घोषित किया गया हो, भूमिस्वामी है, किसी भी पक्षकार की ओर से कोई भी विधि व्यवसायी उस राजस्व अधिकारी/न्यायालय की, जिसके कि समक्ष वह मामला लम्बित हो, लिखित अनुज्ञा से ही उपसंजात होगा, अभिवचन करेगा या कार्य करेगा अन्यथा नहीं।
(1) राज्य सरकार, साधारणतः इस संहिता के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए नियम बना सकेगी।
(2) विशिष्टतया तथा पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबंध हो सकेंगे-
(एक) धारा 3 के अधीन गठित राजस्व मंडल के अध्यक्ष तथा सदस्यों की सेवा के निबन्धन तथा शर्तें;
(एक-क) धारा 13 के अधीन प्रस्थापना हेतु प्ररूप विहित करना;
(दो) भू-अभिलेख अधीक्षकों तथा सहायक भू-अभिलेख अधीक्षकों के कर्त्तव्यों का विहित किया जाना;
(तीन) भूमि को किन्हीं अन्य प्रयोजनों के लिए व्यपवर्तित किए जाने पर धारा 59 के अधीन भू-राजस्व के निर्धारण का विनियमन तथा प्रीमियम का अधिरोपण;
(चार) धारा 60 के अधीन उस भूमि पर निर्धारण जिस पर निर्धारण नहीं हुआ हो;
(चार-क) धारा 63 की उपधारा (2) के अधीन प्रयोग की जाने वाली शक्तियां एवं कर्तव्य विहित करना;
(पांच) धारा 68 के अधीन सर्वेक्षण संख्यांकों तथा ग्रामों की विरचना और कृषि प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाई जाने वाली भूमि को समाविष्ट करने वाले सर्वेक्षण-संख्याकों का न्यूनतम विस्तार;
(छह) धारा 70 के अधीन सर्वेक्षण संख्यांकों का समामेलन एवं उपखण्डों में विभाजन और सर्वेक्षण संख्यांक के निर्धारण का सर्वेक्षण - संख्यांक के उपखण्डों के बीच प्रभाजन;
(सात) उन अभिलेखों का विहित किया जाना जिनमें धारा 71 के अधीन सर्वेक्षण - संख्यांकों को तथा सर्वेक्षण संख्यांकों के उपखण्डों का क्षेत्रफल तथा निर्धारण प्रविष्ट किया जाएगा;
(आठ) धारा 73 के अधीन किसी एक ग्राम को दो या अधिक ग्रामों में विभाजित करने या दो या अधिक ग्रामों को एक ग्राम में संयोजित करने या ग्राम गठित करने या ग्राम की सीमाएँ परिवर्तित करने की रीति;
(नौ) धारा 77 के अधीन वह आवश्यक जांच जो पूरी की जाएगी तथा वह प्ररूप जिसमें और वे विशिष्टियाँ जिनके साथ निर्धारण दर सम्बन्धी प्रस्थापनाएं अग्रेषित की जाएँगी;
(दस) वह रीति जिसमें धारा 82 के अधीन निर्धारण की सूचना दी जाएगी;
(ग्यारह ) छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।
(बारह) धारा 91 क के अधीन भू-सर्वेक्षण या भू-राजस्व निर्धारण के संचालन का विनियमन;
(तेरह) धारा 93 के अधीन नगरीय क्षेत्रों में की भूमियों को भू-खंड संख्यांकों के रूप में विभाजित किए जाने, विद्यमान सर्वेक्षण संख्यांकों को भू-खण्ड संख्यांकों के रूप में मान्य किए जाने, भू-खण्ड संख्यांकों को पुनर्गठित किए जाने या नवीन भू-खण्ड संख्यांक विरचित किए जाने का विनियमन;
(चौदह) धारा 94 के अधीन भू-खण्ड संख्यांकों को उपखण्डों में विभाजित करने तथा भू-खण्ड संख्यांक के निर्धारण को उपखण्डों के बीच प्रभाजित करने की रीति और किसी स्थानीय क्षेत्र में उपखण्डों की मान्यता के लिए या तो क्षेत्रफल की या भू-राजस्व की या दोनों की सीमाएं:
(पन्द्रह) धारा 95 के अधीन अभिलेखों का विहित किया जाना;
(सोलह) धारा 96 के अधीन अन्य विशेष प्रयोजनों का विहित किया जाना;
(सत्रह) धारा 97 के अधीन मानक दरों को प्रकाशित करने की रीति;
(अठारह) (क) धारा 98 (1) के अधीन, भूमियों के समस्त रजिस्ट्रीकृत विक्रयों तथा पट्टों के अभिलेख रखने की रीति और
(ख) धारा 98 (2) के अधीन भूमियों के औसत वार्षिक भाटक मूल्य का अवधारण;
(उन्नीस) धारा 104 की उपधारा (2) के अधीन पटवारियों के अन्य कर्तव्यों का विहित किया जाना;
(बीस) धारा 106 के अधीन राजस्व निरीक्षकों के अन्य कर्तव्यों का विहित किया जाना;
(इक्कीस) धारा 107 (2) के अधीन अन्य विशिष्टियों का विहित किया जाना;
(बाईस) धारा 108 के अधीन अधिकार अभिलेख के प्ररूप का तथा उन अतिरिक्त विशिष्टियों का, जो अधिकार अभिलेख में सम्मिलित किए जाने वाले कागज पत्रों में प्रविष्ट की जानी हों; विहित किया जाना;
(तेईस) धारा 109 के अधीन पटवारी द्वारा दी जाने वाली अभिस्वीकृति का प्ररूप;
(चौबीस) (क) धारा 109 के अधीन रिपोर्ट किये गये अधिकारों के अर्जन को दर्ज करने के लिए धारा 110 (1) के अधीन रजिस्टर का विहित किया जाना;
(ख) अन्य व्यक्तियों तथा प्राधिकारियों का, जिन्हें कि धारा 110 (3) के अधीन लिखित प्रज्ञापना दी जाएगी, विहित किया जाना;
(ग) धारा 109 एवं 110 के प्रयोजन हेतु अधिकार के अर्जन की रिपोर्ट, प्रज्ञापना, नामांतरण पूर्व का स्केच, अभिस्वीकृति, नोटिस, प्रतिलिपि, शुल्क लंबित मामलों की जानकारी एवं अन्य आवश्यक दस्तावेजों की रीति एवं प्ररूप विनियमित करना;
(पच्चीस) (क) धारा 114 (1) के अधीन अन्य भू-अभिलेखों का विहित किया जाना;
(ख) उस फीस का विहित किया जाना जिसका कि भुगतान करने पर धारा 114 (2) के अधीन रसीद बही दी जाएगी और उन प्रविष्टियों का विहित किया जाना जो कि उसमें अन्तर्विष्ट होंगी;
(छब्बीस) धारा 120 के अधीन सहायता की अध्यपेक्षा का विनियमन;
(सत्ताईस) धारा 121 के अधीन भू-अभिलेखों का तैयार किया जाना, रखा जाना तथा पुनरीक्षित किया जाना;
(सत्ताईस-क) वह रीति जिसमें धारा 123 (3) के अधीन तहसीलदार द्वारा आपत्तियों का निपटारा किया जाएगा;
(अट्ठाईस) (क). धारा 124 (3) के अधीन ग्रामों के तथा सर्वेक्षण संख्यांकों या भू- खण्ड संख्यांकों के सीमा चिन्हों संबंधी विनिर्देश तथा उसके सन्निर्माण एवं अनुरक्षण की रीति और
(ख). धारा 124 (4) के अधीन नवीन सीमा चिन्हों के सन्निर्माण का खर्च भू-धारकों के बीच विभाजित करने की रीति;
(अट्ठाईस-क) धारा 126 के अधीन संक्षेपत: बेदखली की रीति;
(उनतीस) ग्राम की सड़क, ग्राम की बंजर भूमि या सामुदायिक प्रयोजनों के लिए आरक्षित भूमि तथा उससे लगी हुई भूमि के बीच सीमा चिन्हों को अंकित करने को रीति और वह रीति जिसमें वे सु-अवस्था में रखे जायेंगे तथा उनका नवीकरण किया जाएगा;
(तीस) धारा 129 के अधीन सर्वेक्षण संख्यांकों, उपखण्डों या भू-खंड संख्यांकों का सीमांकन करने की प्रक्रिया, सीमा चिन्हों का प्रकार तथा फीस का उद्ग्रहण,
(इकतीस) धारा 140 के अधीन वे तारीखें जिनको तथा वे किश्तें जिनमें भू-राजस्व देय होगा और वे व्यक्ति जिन्हें तथा वह स्थान जहाँ ऐसी किश्तों का उक्त धारा के अधीन भुगतान किया जाएगा,
(बत्तीस) वह प्ररूप जिसमें धारा 142 के अधीन रसीद दी जाएगी;
(तैंतीस) धारा 144 (1) के अधीन भू-राजस्व की छूट या उसके निलम्बन का विनियमन;
(चौंतीस) धारा 146 के अधीन मांग की सूचना जारी करने में और धारा 147 में विनिर्दिष्ट की गई आदेशिकाओं का निष्पादन करने में राजस्व अधिकारियों का मार्गदर्शन;
(पैंतीस) धारा 160 के अधीन वार्षिकी मंजूर करने के लिए आवेदन का प्ररूप वह समय जिसके भीतर ऐसा आवेदन किया जाएगा तथा ऐसी मंजूरी की शर्तों का विहित किया जाना;
(छत्तीस) धारा 161 के अधीन भू-राजस्व निर्धारण के चालू रहने के दौरान राजस्व के कम किए जाने का विनियमन,
(सैंतीस) ई-नामांतरण पोर्टल एवं ई-राजस्व न्यायालय पोर्टल में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया,
(अड़तीस) धारा 165 के अधीन भूमि की अधिकतम सीमाओं का विहित किया जाना;
(उनतालीस) उस रीति का विहित किया जाना जिसमें धारा 166 के अधीन समपहृत भूमि का चयन तथा सीमांकन किया जाएगा एवं अन्तरिती के पास बच रही भूमि पर भू-राजस्व नियत किया जाएगा;
(चालीस) धारा 170 के अधीन किसी खाते का कब्जा दिलाए जाने सम्बन्धी दावों को निपटाने की प्रक्रिया का विनियमन;
(चालीस-क) वह प्ररूप तथा वह रीति जिसमें धारा 170-ख की उपधारा (1) के अधीन उपखण्ड अधिकारी को जानकारी अधिसूचित की जाएगी,
(इकतालीस) धारा 172 के अधीन किसी भूमिस्वामी को अपने खाते या उसके किसी भाग को व्यपवर्तित करने के लिए अनुज्ञा दी जाने या अनुज्ञा देने से इंकार किए जाने का विनियमन;
(बयालीस) धारा 173 के अधीन किसी भूमिस्वामी द्वारा अधिकारों के त्यजन किए जाने का विनियमन;
(तैंतालीस) उन निबन्धनों तथा शर्तों का विहित किया जाना जिन पर किसी व्यक्ति को धारा 176 (2) के अधीन किसी परित्यक्त खाते का कब्जा दिया जा सकेगा;
(चवालीस) (क) धारा 178 (2) के अधीन खातों के विभाजन तथा निर्धारण के प्रभाजन का विनियमन और
(ख)……………………….
(चौवालिस-क) धारा 178 - क के अधीन भूमिस्वामी के जीवन काल में भूमि के विभाजन का विनियमन;
(पैंतालीस) धारा 179 (2) के अधीन वृक्षों में के अधिकार का क्रय करने के हेतु आवेदनों के बारे में राजस्व अधिकारियों का मार्गदर्शन;
(छियालीस) (क) साधारणतः या किन्हीं विनिर्दिष्ट क्षेत्रों में समन, सूचनाओं तथा अन्य आदेशिकाओं की डाक द्वारा या किसी अन्य रीति में तामील और ऐसी तामील का सबूत;
(ख) पक्षकारों तथा साक्षियों को समन करने की राजस्व अधिकारियों की शक्ति का विनियमन तथा साक्षियों के लिए व्ययों की मंजूरी;
(ग) मान्यता प्राप्त अभिकर्ताओं का, इस संहिता के अधीन की कार्यवाहियों में उनके द्वारा की जाने वाली उपसंजातियों, किये जाने वाले आवेदनों तथा किये जाने वाले कार्यों के बारे में विनियमन;
(घ) वह प्रक्रिया, जिसका अनुपालन जंगम तथा स्थावर सम्पत्तियों की कुर्की करने में किया जायेगा;
(ङ) विक्रयों को प्रकाशित करने, संचालित करने, अपास्त करने तथा उनकी पुष्टि करने के लिए प्रक्रिया तथा ऐसी कार्यवाहियों से संसक्त समस्त आनुषंगिक विषय;
(च) पशुधन तथा अन्य जंगम सम्पत्ति का, जब कि वह कुर्की के अधीन हो, अनुरक्षण तथा उसकी अभिरक्षा, ऐसे अनुरक्षण तथा ऐसी अभिरक्षा के लिए देय शुल्क ऐसे पशुधन तथा सम्पत्ति का विक्रय, और ऐसे विक्रय के आगम;
(छ) अपीलों तथा अन्य कार्यवाहियों का समेकन;
(ज) ऐसे समस्त प्ररूप, रजिस्टर, पुस्तकें, प्रविष्टियां तथा ऐसे लेखे, जो राजस्व न्यायालयों के कामकाज के संपादन के लिए आवश्यक या वांछनीय हों;
(झ) वह समय जिसके भीतर किसी अभिव्यक्ति उपबंध के अभाव में अपीलें प्रस्तुत की जा सकेंगी या पुनरीक्षण के लिए आवेदन प्रस्तुत किये जा सकेंगे;
(ञ) किन्हीं भी कार्यवाहियों तथा उनके आनुषंगिक खर्चे;
(ट) कमीशन पर साक्षियों की परीक्षा और ऐसी परीक्षा के आनुषंगिक व्ययों का भुगतान;
(ठ) अर्जी-लेखकों का अनुज्ञापन और उनके आचरण का विनियमन;
(सैंतालीस) 1[***]
(अड़तालीस) 2[***]
(अड़तालीस - क) 3[***]
(उनचास) 4[***]
(पचास) 5[***]
(इक्यावन) 6[***] छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।
(बावन) भू-राजस्व में ऐसी वृद्धि तथा कमी के निर्धारण का विनियमन जैसा कि अध्याय 15 के अधीन अपेक्षित या अनुज्ञात है;
(तिरपन) धारा 222 (1) के अधीन पटेलों की नियुक्ति का विनियमन, जहाँ किसी ग्राम में दो या अधिक पटेल हों, वहां पटेल के पद के कर्तव्यों के वितरण की रीति, पटेल के पारिश्रमिक का नियत किया जाना और धारा 224 के अधीन पटेल के अतिरिक्त कर्तव्यों का विहित किया जाना तथा धारा 226 के अधीन उसे पद से हटाया जाना और धारा 228 के अधीन प्रतिस्थानी पटेल का नियुक्त किया जाना;
(चौवन ) उन ग्रामों के लिए, जो किसी नगरपालिका या किसी नगरपालिक निगम या किसी अधिसूचित क्षेत्र समिति या किसी ग्राम पंचायत के क्षेत्र में सम्मिलित न हों, ग्रामों की स्वच्छता, जानवरों के शवों को गाड़े जाने, कुओं के संरक्षण - तथा उनकी बाड़ लगाये जाने, ग्रामों की सड़कों के समारक्षण का तथा ग्राम स्वायत्त शासन से सम्बन्धित वैसे ही विषयों का विनियमन;
(पचपन) (क) कोटवारों की नियुक्ति, उनके लिए दण्ड, उनका निलंबन और उनकी पदच्युति;
(ख) कोटवारों के कर्तव्यों का विहित किया जाना और उनके पर्यवेक्षण का ढंग;
(छप्पन) छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।
(सत्तावन) धारा 233 के अधीन रखे जाने वाले अभिलेख का विहित किया जाना;
(अट्ठावन) वह रीति जिसमें धारा 234 (2) के अधीन ग्रामवासियों की इच्छाएं अभिनिश्चित की जाएँगी;
(उनसठ) (क) धारा 237 (1) के अधीन निस्तार अधिकारों का प्रयोग करने के लिए दखलरहित भूमि के पृथक् रखे जाने का विनियमन; और
(ख) धारा 237 (1) (ट) के अधीन निस्तार अधिकारों के प्रयोग के लिए अन्य प्रयोजन;
(ग) धारा 237 (3) के अधीन दखलरहित भूमि के व्यपवर्तन का विनियमन;
(साठ) (एक) व्यक्तियों के वे प्रवर्ग जिन्हें वृक्षारोपण अनुज्ञापत्र और वृक्ष-पट्टे मंजूर किए जाने के लिए अग्रता दी जाएगी;
(दो) ऐसे व्यक्तियों के चयन की रीति जिन्हें वृक्षारोपण अनुज्ञापत्र और वृक्ष-पट्टा मंजूर किया जाना हो;
(तीन) पृथक् रक्षित की जाने वाली भूमि का परिमाण;
(चार) वृक्षारोपण अनुज्ञापत्र और वृक्ष पट्टा मंजूर करने हेतु निबन्धन और शर्तें;
(पांच) वृक्षारोपण अनुज्ञापत्र और वृक्ष पट्टे का स्वरूप;
(छह) वृक्षारोपण अनुज्ञापत्र और वृक्ष पट्टे के अधीन भोगाधिकारों की सीमा;
(इकसठ) धारा 240 (1) के अधीन वृक्षों के काटे जाने का तथा धारा 240 (3) के अधीन वनोत्पाद (फारेस्ट ग्रोथ) के नियंत्रण, प्रबन्ध, काटकर गिराये जाने या हटाये जाने का विनियमन;
(बासठ) धारा 241 के अधीन प्रकाशित आदेश की उद्घोषित करने की रीति का विहित किया जाना तथा उसके अधीन वृक्षों के काटकर गिराये जाने या हटाये जाने का विनियमन;
(तिरसठ) (क) धारा 242 (1) में विनिर्दिष्ट किए गए विषयों के बारे में रूढ़ियों को अभिनिश्चित करने तथा उन्हें अभिलिखित करने की रीति और
(ख) धारा 242 (2) के अधीन रूढ़ियों का अभिलेख प्रकाशित करने की रीति;
(चौंसठ) धारा 244 के अधीन आबादी क्षेत्र में के स्थलों के निपटारे की रीति का विहित किया जाना;
(पैंसठ) धारा 249 के अधीन मछली पकड़ने या ग्रामों में जीव-जन्तुओं को पकड़ने, उनका आखेट करने या उनको गोली मारने का तथा राज्य सरकार की भूमि से किन्हीं पदार्थों के हटाने का विनियमन;
(पैसठ-क) धारा 250 के उपबंधों को प्रभावी बनाने हेतु विनियमन;
(छियासठ) (क) धारा 251 (2) के अधीन आवेदन के प्ररूप का विहित किया जाना; और
(ख) धारा 251 (6) के अधीन तालाबों से जल के उपयोग का विनियमन;
(सड़सठ) 2[***]
(अड़सठ) 3[***]छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।
(उनहत्तर) धारा 256 के अधीन अभिलेखों, नक्शों तथा भू-अभिलेखों का निरीक्षण किया जाने तथा उनकी प्रतिलिपियां प्रदान की जाने के लिए शर्तों का विहित किया जाना;
(सत्तर) साधारणत: इस संहिता के अधीन कार्यवाहियों में राजस्व अधिकारियों तथा समस्त अन्य व्यक्तियों के मार्गदर्शन के लिए;
(एकहत्तर) कोई भी अन्य विषय जो विहित किया जाना हो या विहित किया जाए।
(3) इस धारा के अधीन बनाये गये समस्त नियम पूर्व प्रकाशन की शर्त के अध्यधीन होंगे।
(4) इस संहिता के अधीन बनाये गये समस्त नियम विधान सभा के पटल पर रखे जायेंगे और ऐसे उपान्तरणों के अध्यधीन होंगे जो कि विधान सभा द्वारा किए जाएँ।
259. कतिपय भू- धृतियों के प्रति निर्देश. -
किसी अधिनियमिति में,-
(क) महाकौशल क्षेत्र में के भूमिस्वामी या भूमिधारी;
(क-1) मध्यभारत क्षेत्र में के पक्के कृषक, माफीदार इनामदार या छूट खातेदार;
(ख) विन्ध्यप्रदेश क्षेत्र में के किसी पचपन पैंतालीस कृषक, पट्टेदार कृषक, निकुन्जधारी या किसी तालाब के धारक;
(ग) सिरोंज क्षेत्र में के खातेदार कृषक या निकुंजधारी और
(घ) भोपाल क्षेत्र में के दखलकार; के प्रति किये गये किसी निर्देश के संबंध में यह समझा जाएगा कि वह भूमिस्वामी के प्रति निर्देश है।
इस संहिता में ऐसे केन्द्रीय अधिनियम के प्रति, जो राज्य के किसी भी क्षेत्र में प्रवृत्त न हो, किये गये किसी निर्देश का, उस क्षेत्र के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त किसी तत्स्थानी विधि के प्रति निर्देश है।
इस धारा के प्रयोजनों के लिए अभिव्यक्ति "केन्द्रीय अधिनियम" का वही अर्थ होगा जो कि साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का संख्यांक 10 ) की धारा 3 (7) में उसके लिये दिया गया है।
अनुसूची 2 में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियां, एतद्द्वारा, उसके (अनुसूची 2 के) चौथे स्तम्भ में वर्णित सीमा तक निरस्त की जाती हैं :-
परन्तु ऐसा निरसन-
(क) इस प्रकार निरस्त किसी विधि के पूर्व प्रवर्तन पर या उसके अधीन सम्यक् रूप से की गई या होने दी गई किसी बात पर प्रभाव नहीं डालेगा; या
(ख) इस प्रकार निरस्त किसी विधि के अधीन अर्जित, प्रोद्भूत या उपगत किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व पर प्रभाव नहीं डालेगा; या
(ग) इस प्रकार निरस्त किसी विधि के विरुद्ध किये गये किसी अपराध की बाबत उपगत किसी शस्ति, समपहरण या दण्ड पर प्रभाव नहीं डालेगा या
(घ) यथापूर्वोक्त किसी ऐसे अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता, दायित्व, शास्ति, समपहरण या दण्ड के बारे में किसी अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार पर प्रभाव नहीं डालेगा; और कोई भी ऐसा अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार उसी प्रकार संस्थित किया जा सकेगा, चालू रखा जा सकेगा या प्रवर्तित किया जा सकेगा, और कोई भी ऐसी शास्ति, समपहरण या दण्ड इस प्रकार अधिरोपित किया जा सकेगा मानों कि यह अधिनियम पारित ही नहीं हुआ था :
परन्तु यह और भी कि पूर्ववर्ती परन्तुक के अध्यधीन रहते हुए किसी भी ऐसी अधिनियमिति के अधीन की गई किसी बात या की गई किसी कार्यवाही (जिसमें बनाये गये कोई नियम, किये गये निर्धारण की गई नियुक्तियां तथा किये गये अन्तरण जारी की गई अधिसूचनाएं जारी किए गए समन जारी की गई सूचनाएँ, जारी किए गए वारण्ट तथा जारी की गई उद्घोषणाएँ, प्रदत्त प्राधिकार तथा शक्तियां, मंजूर किए गए फार्म तथा पट्टे, तैयार किए गए या पुष्टि किए गए अधिकार अभिलेख तथा अन्य अभिलेख, अर्जित किये गये अधिकार, उपगत किये गये दायित्व, तथा नियत किये गये समय तथा स्थान सम्मिलित हैं) के सम्बन्ध में यह समझा जाएगा कि वह इस संहिता के तत्स्थानी उपबन्धों के अधीन की गई है और वह तद्नुसार तब तक प्रवृत्त बनी रहेगी जब तक कि वह इस संहिता के अधीन की गई किसी बात या की गई किसी कार्यवाही द्वारा अतिष्ठित न कर दी जाए।
(1) इस संहिता में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, ऐसे समस्त मामले, जो इस संहिता के प्रवृत्त होने के ठीक पूर्व किसी क्षेत्र में राज्य सरकार के या किसी राजस्व न्यायालय के समक्ष, चाहे अपील, पुनरीक्षण, पुनर्विलोकन में या अन्यथा लंबित हों, ऐसी समुचित विधि के, जो कि इस संहिता के पारित न होने की दशा में उन मामलों को लागू होती, उपबन्धों के अनुसार विनिश्चित किये जायेंगे।
(2) इस संहिता के प्रवृत्त होने के समय किसी सिविल न्यायालय में लंबित कोई ऐसा मामला, जो इस संहिता के अधीन केवल किसी राजस्व न्यायालय द्वारा विचारणीय हो, ऐसे सिविल न्यायालय द्वारा उस विधि के अनुसार निपटाया जाएगा जो कि इस संहिता के प्रारम्भ होने के पूर्व प्रवृत्त हो।
(3) अनुसूची (3) में वर्णित विधियों में से किसी भी विधि के अधीन की ऐसी समस्त कार्यवाहियां जो इस संहिता के प्रारम्भ होने के ठीक पूर्व राज्य सरकार के समक्ष लम्बित हों, ऐसे प्रारम्भ पर मण्डल को अन्तरित हो जाएँगी और तदुपरि वे मण्डल द्वारा इस प्रकार निपटाई जाएँगी मानो कि वे मंडल द्वारा इस संहिता के अधीन ग्रहण की गई कार्यवाहियां हों।
इस उपधारा के प्रयोजन के लिए "राज्य सरकार" के अन्तर्गत राज्यपाल, मंत्रिपरिषद या कोई मंत्री है।
(1) यदि इस संहिता के उपबन्धों को किसी क्षेत्र में प्रभावशील करने में कोई कठिनाई उद्भूत हो, तो राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचित आदेश द्वारा ऐसे उपबन्ध कर सकेगी या ऐसे निदेश दे सकेगी जो कि उस कठिनाई का निराकरण करने के लिए उसे आवश्यक प्रतीत हों।
(2) उपधारा (1) के अधीन पारित आदेश की एक प्रतिलिपि, उसके पारित किये जाने के पश्चात्, यावत्शक्य शीघ्र विधान सभा के समक्ष रखी जाएगी।
इस संहिता में अन्तर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसे व्यक्ति को लागू नहीं होगी जो केन्द्रीय सरकार से भूमि धारण करता है।
1. प्रत्येक समन लिखित में दो प्रतियों में होगा और वह जारी करने वाले अधिकारी द्वारा या ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिसे वह इस सम्बन्ध में सशक्त करे, हस्ताक्षरित और मुद्रांकित होगा और उसमें वह समय तथा स्थान विनिर्दिष्ट होगा जब और जहां हाजिर होने के लिये अपेक्षित व्यक्ति समन किया गया है और यह भी विनिर्दिष्ट होगा कि वह साक्ष्य देने के लिए अपेक्षित है या दस्तावेज पेश करने के लिये।
2. किसी पक्षकार को जारी किये जाने वाले प्रत्येक समन के साथ कार्यवाहियों की विषय-वस्तु के बारे में एक संक्षिप्त कथन होगा।
3. दस्तावेज पेश करने का समन ऐसी दस्तावेजों को या इस प्रकार की उन समस्त दस्तावेजों को पेश करने के लिये हो सकेगा जो विनिर्दिष्ट की जाएँ और जो समन किये गये व्यक्ति के कब्जे या शक्ति में हों।
4. प्रत्येक समन की तामील, उसकी एक प्रति समन किये गये व्यक्ति को व्यक्तिशः या उसके मान्यता प्राप्त अभिकर्ता को निविदत्त या परिदत्त करके की जाएगी।
5. जहां समन किया गया व्यक्ति नहीं पाया जा सके और उसका कोई मान्यताप्राप्त अभिकर्ता न हो, वहां तामील समन किये गये व्यक्ति के कुटुम्ब के ऐसे किसी वयस्क पुरुष सदस्य पर की जा सकेगी जो उसके साथ निवास कर रहा है।
इस नियम के अर्थ के अन्तर्गत सेवक कुटुम्ब का सदस्य नहीं है।
6. जहाँ तामील करने वाला अधिकारी समन की प्रति समन किये गये व्यक्ति को स्वयं या उसके मान्यता प्राप्त अभिकर्ता को या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति को परिदत्त या निविदत्त करता है, वहां जिस व्यक्ति को प्रति परिदत्त या निविदत्त की गई है, उससे यह अपेक्षा करेगा कि वह मूल समन पर पृष्ठांकित तामील की अभिस्वीकृति पर अपने हस्ताक्षर करे।
7. यदि समन की तामील नियम 4, 5 और 6 में उपबन्धित रीति में नहीं की जा सकती है, तो उसकी एक प्रति समन किये गये व्यक्ति के अन्तिम ज्ञात निवास स्थान पर या ऐसे ग्राम के किसी लोक समागम के स्थान पर लगाई जानी चाहिए।
8. जहां समन की प्रति नियम 7 में उपबन्धित किये अनुसार लगा दी जाती है, वहां तामील करने वाला अधिकारी उस समन की मूल प्रति उस न्यायालय को जिसने कि वह समन जारी किया था उस पर पृष्ठांकित या उससे उपाबद्ध ऐसी रिपोर्ट के साथ लौटायेगा जिसमें यह कथित होगा कि उसने वह प्रति लगा दी है और वे परिस्थितियां, जिनमें उसने ऐसा किया, कथित होंगी और उस व्यक्ति का नाम तथा पता कथित होगा जिसकी उपस्थिति में प्रति लगाई गयी थी और वहां वह प्रति समन किये गये व्यक्ति के अन्तिम ज्ञात निवास स्थान पर लगाई गई हो, वहां रिपोर्ट में उस व्यक्ति का, यदि कोई हो, नाम और पता भी दिया होगा जिसने कि गृह पहचाना था।
9. यदि समन किया गया व्यक्ति किसी अन्य जिले में निवास करता है, तो समन तामील के लिए ऐसे जिले के कलेक्टर को डाक द्वारा भेजा जा सकेगा।
10. इस संहिता के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए कोई भी व्यक्ति, जो साक्ष्य देने के लिये किसी राजस्व अधिकारी के समक्ष उपसंजात होने के लिए समन किया जाता है, ऐसे समय तथा स्थान पर हाजिर होगा जो समन में उस प्रयोजन के लिए बतलाया गया हो और दस्तावेज पेश करने के लिये समन किया गया कोई भी व्यक्ति ऐसे समय तथा स्थान पर वह दस्तावेज पेश करने के लिए हाजिर होगा या उसे पेश करवायेगा।
11. प्रत्येक सूचना की तामील उसकी एक प्रति सम्बन्धित व्यक्ति को स्वयं या उसके मान्यताप्राप्त अभिकर्ता को निविदत्त या परिदत्त करके की जाएगी :
परन्तु जहां सम्बन्धित व्यक्ति का मान्यताप्राप्त अभिकर्ता कोई प्लीडर हो, वहां सूचना की तामील उसकी एक प्रति उसके कार्यालय में या उस स्थान पर जहां कि वह मामूली तौर से निवास करता है, छोड़कर की जा सकेगी, और ऐसी तामील उसी प्रकार प्रभावी मानी जाएगी जैसी कि स्वयं मान्यता प्राप्त अभिकर्ता पर की गई तामील।
12. जहां सम्बन्धित व्यक्ति पाया नहीं जा सके और उसका कोई मान्यताप्राप्त अभिकर्ता न हो, वहां तामील सम्बन्धित व्यक्ति के कुटुम्ब के किसी ऐसे वयस्क पुरुष सदस्य पर की जा सकेगी जो कि उसके साथ निवास कर रहा है।
इस नियम के अर्थ के अन्तर्गत सेवक कुटुम्ब का सदस्य नहीं है।
13. जहां तामील करने वाला अधिकारी सूचना की प्रति सम्बन्धित व्यक्ति को स्वयं या किसी अभिकर्ता को या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति को परिदत्त या निविदत्त करता है, वहां जिस व्यक्ति को प्रति परिदत्त या निविदत्त की गई है, उससे यह अपेक्षा करेगा कि वह मूल सूचना पर पृष्ठांकित तामील की अभिस्वीकृति पर अपने हस्ताक्षर करे।
14. यदि सूचना की तामील नियम 11, 12 और 13 में उपबंधित रीति में नहीं की जा सकती है, तो उसकी एक प्रति सम्बन्धित व्यक्ति के अन्तिम ज्ञात निवास स्थान पर या उस ग्राम के, जिसमें सूचना से सम्बन्धित भूमि स्थित है या जहां से उस भूमि पर खेती की जाती है, लोक समागम के किसी स्थान पर लगाई जा सकेगी।
15. जहां सूचना की प्रति नियम 14 में उपबन्धित किये अनुसार लगा दी जाती है, वहां तामील करने वाला अधिकारी उस सूचना की मूल प्रति, उस अधिकारी को जिसने कि उसे जारी किया था, उस पर पृष्ठांकित या उससे उपाबद्ध ऐसी रिपोर्ट के साथ लौटायेगा जिसमें यह कथित होगा कि उसने उस प्रति को लगा दिया है, और वे परिस्थितियां, जिनमें उसने ऐसा किया, कथित होंगी और उस व्यक्ति का नाम तथा पता कथित होगा जिसकी उपस्थिति में प्रति लगाई गई थी और जहां वह प्रति उस व्यक्ति के, जिसके कि लिये वह सूचना जारी की गई हो, अन्तिम ज्ञात निवास स्थान पर लगाई गई हो, वहां रिपोर्ट में उस व्यक्ति का नाम तथा पता भी दिया होगा जिसने कि गृह पहचाना था।
16. यदि वह व्यक्ति, जिस पर सूचना तामील की जानी है, किसी अन्य जिले में निवास करता है, तो सूचना तामील के लिए ऐसे जिले के कलेक्टर को डाक द्वारा भेजी जा सकेगी।
17. जब कभी इस संहिता के अधीन कोई उद्घोषणा जारी की जाती है, तो उसकी प्रतिलिपियाँ उसे जारी करने वाले राजस्व अधिकारी के कार्यालय के सूचना बोर्ड पर, उस तहसील के जिसके भीतर उद्घोषणा से सम्बन्धित भूमि स्थित है, मुख्यालय पर और उस उद्घोषणा से सम्बन्धित भूमि पर के या उसके समीप के किसी लोक समागम के स्थान पर लगाई जाएगी और जब तक कि उसे जारी करने वाला अधिकारी अन्यथा निदेश न दे, उपर्युक्त के अतिरिक्त वह उद्घोषणा उस भूमि पर उसके निकट डोंडी पिटवा कर प्रकाशित की जाएगी जिससे कि वह उद्घोषणा सम्बन्धित है।
18. किन्हीं कार्यवाहियों में राजस्व अधिकारी द्वारा पारित प्रत्येक मूल आदेश में मामले का संक्षिप्त कथन, विनिश्चय के लिए मुद्दे, उन पर किया गया विनिश्चय और ऐसे विनिश्चय के कारण अन्तर्विष्ट होंगे।
कुर्की
19. बकायादार के कब्जे में की ऐसी जंगम सम्पत्ति की कुर्की जो कृषि उपज से भिन्न है.—
(1) जहां बकायादार के कब्जे में की कुर्क की जाने वाली सम्पत्ति कृषि उपज से भिन्न -जंगम सम्पत्ति है, वहां कुर्की वास्तविक अभिग्रहण के द्वारा की जाएगी और कुर्की करने वाला अधिकारी उस सम्पत्ति को स्वयं अपनी अभिरक्षा में या अपने अधीनस्थों में से एक की अभिरक्षा में रखेगा और उसकी सम्यक् अभिरक्षा के लिए उत्तरदायी होगा :
परन्तु जब अभिगृहीत सम्पत्ति शीघ्रतया और प्रकृत्या क्षयशील है या जब उसे अभिरक्षा में रखने का व्यय उसके मूल्य से ज्यादा होना सम्भाव्य है, तब कुर्की करने वाला अधिकारी उसका तुरंत ही विक्रय कर सकेगा :
परन्तु यह और भी कि जब कुर्क की गई सम्पत्ति पशु-धन, कृषि उपकरण या अन्य ऐसी वस्तुएँ हैं जो सुविधापूर्वक हटाई नहीं जा सकतीं और कुर्की करने वाले अधिकारी इस नियम के प्रथम परन्तुक के अधीन कार्य नहीं करता है, तो वह बकायादार की या ऐसी सम्पत्ति में हितबद्ध होने का दावा करने वाले किसी व्यक्ति की प्रेरणा पर उस सम्पत्ति को उस ग्राम में या उस स्थान पर, जहां कि वह कुर्क की गई है-
(क) बकायादार के, या उस स्थान के कांजी हाउस के रखवाले के यदि कोई हो, भारसाधन में छोड़ सकेगा, या
(ख) ऐसी सम्पत्ति में हितबद्ध होने का दावा करने वाले व्यक्ति के या किसी ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति के भारसाधन में छोड़ सकेगा जो ऐसी सम्पत्ति को रखने का जिम्मा ऐसी सम्पत्ति के मूल्य से कम न होने वाली रकम का एक या अधिक प्रतिभूओं सहित, इस आशय का बन्धपत्र लिखकर ले ले कि वह ऐसी सम्पत्ति की उचित देखभाल करेगा और मांग की जाने पर उस सम्पत्ति को पेश कर देगा।
(2) कुर्की करने वाला अधिकारी कुर्क की गई सम्पत्ति की सूची बनायेगा और उस सूची पर उस व्यक्ति की, जिसकी कि अभिरक्षा में वह सम्पत्ति छोड़ी गई है, अभिस्वीकृति और यदि सम्भव है, तो बकायादार की और कम से कम एक प्रतिष्ठित व्यक्ति की अभिस्वीकृति, उस सूची के सही होने के अनुप्रमाणन के तौर पर अभिप्राप्त करेगा। यदि कुर्क की गई सम्पत्ति में पशुधन तथा अन्य वस्तुएं दोनों ही सम्मिलित हैं, तो पशुधन की एक पृथक् सूची भी उसी प्रकार तैयार की जाएगी और अनुप्रमाणित की जाएगी।
20. (1) जहां कुर्क की जाने वाली सम्पत्ति कृषि उपज है, वहां कुर्की के वारण्ट की एक प्रति---
(क) उस दशा में जब ऐसी उपज उगती फसल है, उस पर, जिसमें ऐसी फसल उगी है; या
(ख) उस दशा में, जब ऐसी उपज काटी जा चुकी है या इकट्ठी की जा चुकी है, खलिहान में या अनाज गाहने के स्थान में या तद्रूप स्थान में या चारे के ढेर पर, जिस पर या जिसमें वह निक्षिप्त की गई है; लगा कर और एक अन्य प्रति उस गृह के, जिसमें कि बकायादार मामूली तौर से निवास करता है, बाहरी द्वार पर या किसी अन्य सहजदृश्य भाग पर लगाकर या यदि कोई ऐसा गृह न हो, तो उस गृह के, जिसमें कि वह कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है या जिसके बारे में यह ज्ञात है कि वहां वह अन्तिम बार निवास करता था या कारबार करता था या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता था, बाहरी द्वार या उसके किसी अन्य सहजदृश्य भाग पर लगा कर कुर्की की जाएगी; और तदुपरि यह समझा जाएगा कि उपज न्यायालय के कब्जे में आ गई है।
(2) कुर्की करने वाला अधिकारी कृषि उपज की अभिरक्षा के लिए और साथ ही उपज की रखवाली करने, कटाई करने, उसे इकट्ठा करने और उसे भण्डार में रखने के लिए ऐसी व्यवस्था करेगा जैसी कि वह पर्याप्त समझे, और उसे पकाने या उसके परिक्षण के लिए आवश्यक कोई अन्य कार्य करेगा।
(3) उपनियम (2) के अधीन उपगत खर्चे बकायादार द्वारा वहन किए जाएंगे।
21. (1) जहां कुर्क किया गया पशुधन बकायादार के भारसाधन में नहीं छोड़ा गया है, वहां उसे खिलाने-पिलाने के व्यय ऐसी दर से प्रभारित किए जायेंगे जो कलेक्टर, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, नियत करे।
(2) जहां कुर्क की गई सम्पत्ति कोई ऐसी जंगम सम्पत्ति है जो कृषि उपज या पशुधन से भिन्न है और वह बकायादार के भारसाधन में नहीं छोड़ी गई है, वहां उसकी सुरक्षित अभिरक्षा के लिए व्यय ऐसी दर से प्रभारित किया जाएगा जो कलेक्टर, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, नियत करे।
(3) उपनियम (1) या (2) के अधीन उपगत खर्चे सम्पत्ति से विक्रय आगम पर प्रथम भार होंगे।
22. सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का संख्यांक 5) के आदेश 21 के नियम 46 से 53 तक के उपबन्ध, जो उन नियमों के अधीन विभिन्न वर्गों की जंगम सम्पत्ति की कुर्की के सम्बन्ध में हैं, जहां तक हो सके, इस संहिता के अधीन की गई कुर्की को लागू होंगे।
23. (1) जहां कि सम्पत्ति स्थावर है, वहां कुर्की ऐसे आदेश द्वारा की जाएगी जो सम्पत्ति को किसी भी प्रकार से अन्तरित या भारित करने से बकायादार को और ऐसे अन्तरण या भार से कोई भी फायदा उठाने से समस्त व्यक्तियों को प्रतिषिद्ध करता है।
(2) वह आदेश ऐसी सम्पत्ति में के या उसके पार्श्वस्थ किसी स्थान पर डोंडी पिटवाकर या अन्य रुढ़िगत रीति से उद्घोषित किया जाएगा और ऐसे आदेश की एक प्रति सम्पत्ति के किसी सहजदृश्य भाग पर और तब राजस्व अधिकारी के कार्यालय के सूचना बोर्ड पर लगाई जाएगी।
(3) ऐसा आदेश मूल्य देकर वास्तविक क्रेताओं के विरुद्ध उस तारीख से, जिसको कि आदेश की प्रति सम्पत्ति पर लगाई गई हो तथा बकायादार के अन्य समस्त अंतरितियों के विरुद्ध उस तारीख से, जिसको कि ऐसा आदेश किया गया हो, प्रभावी होगा।
24. (1) यदि उस सम्पत्ति के संबंध में, जो इस संहिता के उपबन्धों के अधीन कुर्क की गई है। या जिसके विरुद्ध इस संहिता के उपबन्धों के अधीन कोई कार्यवाही की गई है, किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कोई दावा खड़ा किया जाता है, तो राजस्व अधिकारी उस दावे के सम्बन्ध में जांच करेगा और उसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकेगा।
(2) वह व्यक्ति जिसके कि विरुद्ध उपनियम (1) के अधीन कोई आदेश किया गया हो, उस अधिकार को स्थापित करने के लिए जिसका कि वह उस सम्पत्ति के सम्बन्ध में, जो कि कुर्क की गई हो या जिसके कि विरुद्ध कार्यवाही की गई हो, दावा करता है, ऐसे आदेश की तारीख से एक वर्ष के भीतर वाद संस्थित कर सकेगा, किन्तु ऐसे वाद के, यदि कोई हो, परिणाम के अध्यधीन रहते हुए, वह आदेश निश्चायक होगा।
25. प्रत्येक विक्रय इस सम्बन्ध में साधारण या विशेष आदेश द्वारा नियुक्त किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति द्वारा संचालित किया जाएगा और वह लोक नीलाम द्वारा किया जाएगा।
26. (1) राजस्व अधिकारी आशयित विक्रय की उद्घोषणा करवाएगा जिसमें विक्रय का समय तथा स्थान कथित होगा और उसमें निम्नलिखित बातें यथासम्भव ऋजुता और यथार्थता से विनिर्दिष्ट होंगी :-
(क) वह सम्पत्ति जो बेची जानी है;
(ख) जहां वह सम्पत्ति, जो बेची जानी है, सरकार को राजस्व देने वाली किसी भूमि में कोई हित है, वहां उस भूमि पर निर्धारित भू-राजस्व;
(ग) वह रकम, जिसकी वसूली के लिये विक्रय आदिष्ट किया गया है; और
(घ) प्रत्येक अन्य बात जिसके बारे में राजस्व अधिकारी का विचार हो कि सम्पत्ति की प्रकृति और मूल्य का निर्णय करने के लिये उसकी जानकारी क्रेता के लिए तात्विक है।
(2) जब उपनियम (1) के अधीन जारी की गई उद्घोषणा किसी खाते के विक्रय के सम्बन्ध में है, तो उसकी एक प्रति उस सहकारी बैंक तथा भू-बंधक बैंक को भेजी जायेगी जो कि उस क्षेत्र के भीतर कार्यरत हो जिसमें वह खाता स्थित है।
27. यदि राजस्व अधिकारी, ऐसा करना आवश्यक समझता है तो वह बकायादार को समन कर सकेगा और विक्रय उद्घोषणा में सम्मिलित किए जाने वाले विषयों के सम्बन्ध में उसकी परीक्षा कर सकेगा।
28. नियम 19 के प्रथम परन्तुक में वर्णित किस्म की सम्पत्ति की दशा में के सिवाय, एतद्धीन कोई भी विक्रय, बकायादार को लिखित सहमति के बिना-
(एक) रविवार को या सिविल न्यायालय के किसी प्राधिकृत अवकाश के दिन या किसी ऐसे दिन, जो उस क्षेत्र के लिए, जिसमें कि विक्रय किया जाना हो, स्थानीय अवकाश के रूप में घोषित किया गया हो, नहीं होगा; और
(दो) तब तक न होगा जब तक कि उस तारीख से, जिसको कि उसकी उद्घोषणा की गई थी, कम से कम तीस दिन का अवसान न हो गया हो।
29. (1) राजस्व अधिकारी एतद्धीन विक्रय को किसी भी विनिर्दिष्ट दिन और घण्टे के लिए स्वविवेकानुसार स्थगित कर सकेगा और ऐसे किसी विक्रय का संचालन करने वाला अधिकारी स्थगन के अपने कारणों को अभिलिखित करते हुए विक्रय को स्वविवेकानुसार स्थगित कर सकेगा :
परन्तु जहाँ राजस्व अधिकारी का आदेश समय पर अभिप्राप्त किया जा सकता है, वहां कोई भी ऐसा स्थगन ऐसे आदेश के बिना नहीं किया जाएगा।
(2) जहां विक्रय 15 दिन से अधिक की कालावधि के लिए उपनियम (1) के अधीन स्थगित किया जाता है, वहां तब के सिवाय जबकि बकायादार उसका अधित्यजन करने के लिए अपनी सम्मति दे दे, नई उद्घोषणा की जाएगी।
(3) यदि लाट के लिए बोली के समाप्त होने के पहले ही शोध्य रकम और खर्चे विक्रय का संचालन करने वाले अधिकारी को निविदत्त कर दिए जाते हैं या उसको समाधानप्रद रूप में यह सबूत दे दिया जाता है कि ऐसे शोध्यों की रकम और खर्चे का उस राजस्व अधिकारी को भुगतान किया जा चुका है जिसने विक्रय का आदेश दिया था तो ऐसा प्रत्येक विक्रय रोक दिया जाएगा।
30. क्रेता के व्यतिक्रम के कारण होने वाले पुनर्विक्रय में जो कमी कीमत में हो जाए वह व्यतिक्रम करने वाले क्रेता से इस प्रकार वसूल की जा सकेगी मानो कि वह भू-राजस्व का बकाया हो।
31. कोई भी ऐसा अधिकारी या अन्य व्यक्ति, जिसे किसी विक्रय के सिलसिले में किसी कर्तव्य का पालन करना हो, बेची गई सम्पत्ति में के किसी हित के लिए न तो प्रत्यक्ष और न परोक्ष रूप से बोली लगायेगा और न उसे अर्जित करेगा और न अर्जित करने का प्रयत्न करेगा।
32. (1) जहां बेची जाने वाली सम्पत्ति कृषि उपज है, वहां विक्रय-
(क) यदि ऐसी उपज उगती फसल है, तो उस भूमि पर या उसके समीप किया जाएगा जिसमें कि ऐसी फसल उगी है; या
(ख) यदि ऐसी उपज काटी जा चुकी है या इकट्टी की जा चुकी है, तो खलिहान में या अनाज गाहने के स्थान में या तद्रूप किसी स्थान में या चारे के ढेर पर या उसके समीप किया जायगा :
परन्तु यदि राजस्व अधिकारी की यह राय हो कि वैसा करने से उपज अधिक फायदे पर बेची जा सकती है तो वह यह निदेश दे सकेगा कि विक्रय लोक समागम के निकटतम किसी स्थान पर किया जाए।
(2) जहां, उपज को विक्रय के लिए पुरोधृत किए जाने पर-
(क) विक्रय करने वाले व्यक्ति के अनुमान से उसके लिए ऋजु मूल्य की बोली नहीं लगाई है; और
(ख) उस उपज का स्वामी या उसकी और से कार्य करने के लिये प्राधिकृत व्यक्ति विक्रय को आगामी दिन तक या यदि विक्रय के स्थान पर कोई मण्डी लगती है, तो अगली मण्डी लगने के दिन तक के लिए मुल्तवी करने के लिए आवेदन करता है, वहां विक्रय तद्नुसार मुल्तवी कर दिया जाएगा और तत्पश्चात् उपज के लिए चाहें कोई भी कीमत लगे वह पूरा कर दिया जाएगा।
33. (1) जहां बेची जाने वाली सम्पत्ति उगती फसल है और वह ऐसी प्रकृति की है कि उसे भण्डार में रखा जा सकता है किन्तु उसे उस समय तक भण्डार में नहीं रखा गया है, वहां विक्रय का दिन इस प्रकार नियत किया जाएगा कि उस दिन के आने से पहले उसे भण्डार में रखे जाने के लिए तैयार कर लिया गया है और विक्रय तब तक नहीं किया जाएगा जब तक फसल काट नहीं ली जाती है या इकट्ठी नहीं कर ली जाती है और भण्डार में रखे जाने के लिए तैयार नहीं कर ली जाती है।
(2) जहां फसल की प्रकृति ऐसी है कि उसे भण्डार में नहीं रखा जा सकता है या जहां राजस्व अधिकारी को यह प्रतीत हो कि उस फसल को अपरिपक्व अवस्था में और अधिक फायदे के साथ बेचा जा सकता है, वहां वह काटी जाने तथा इकट्ठी की जाने से पहले बेची जा सकेगी, और क्रेता भूमि पर प्रवेश करने और उसकी देखभाल करने तथा उसे काटने या इकट्ठी करने के प्रयोजन से समस्त आवश्यक बातें करने का हकदार होगा।
34. (1) जहां जंगम सम्पत्ति लोक नीलाम द्वारा बेची जाती है, वहां प्रत्येक लाट का मूल्य विक्रय के समय पर संदत्त किया जाएगा या उसके पश्चात् शीघ्र ही ऐसे समय पर संदत्त किया जाएगा जो वह अधिकारी या अन्य व्यक्ति निर्दिष्ट करे जो कि विक्रय कर रहा है और संदाय में व्यतिक्रम होने पर, सम्पत्ति तत्क्षण ही फिर से बेची जाएगी।
(2) क्रयधन का संदाय कर दिए जाने पर उसके लिए रसीद वह अधिकारी या अन्य व्यक्ति देगा, जो कि विक्रय कर रहा है और विक्रय आत्यन्तिक हो जाएगा।
(3) जहां बेची जाने वाली जंगम सम्पत्ति ऐसे माल में अंश है जो कि बकायादार और किसी सहस्वामी का है और दो या अधिक व्यक्ति, जिनमें से एक ऐसा सहस्वामी है, क्रमशः ऐसी सम्पत्ति या उसके किसी लाट के लिए, एक ही राशि की बोली लगाते हैं, वहां वह बोली उस सहस्वामी की बोली समझी जाएगी।
35. जंगम सम्पत्ति के विक्रय के प्रकाशन या संचालन में हुई किसी अनियमितता से विक्रय दूषित नहीं होगा; किन्तु जिस किसी व्यक्ति को कोई क्षति ऐसी अनियमितता के कारण किसी अन्य व्यक्ति द्वारा हुई है वह उसके विरुद्ध प्रतिकर के लिए या (यदि वह अन्य व्यक्ति क्रेता है) तो उसी विनिर्दिष्ट सम्पत्ति के प्रत्युद्धरण के लिए और ऐसे प्रत्युद्धरण में व्यतिक्रम होने पर प्रतिकर के लिए वाद ला सकेगा।
36. (1) जहां बेची गई सम्पत्ति ऐसी जंगम सम्पत्ति है जिसका वास्तविक अभिग्रहण कर लिया गया है, वहां वह क्रेता को परिदत्त की जाएगी।
(2) किसी अन्य जंगम सम्पत्ति की दशा में, राजस्व अधिकारी, ऐसी सम्पत्ति को क्रेता में या जैसा निदेश क्रेता दे उसके अनुसार निहित करने वाला आदेश कर सकेगा और ऐसी सम्पत्ति तद्नुसार निहित होगी।
37. स्थावर सम्पत्ति के प्रत्येक विक्रय पर वह व्यक्ति, जिसे क्रेता होना घोषित किया गया है, अपने क्रयधन की रकम के पच्चीस प्रतिशत का निक्षेप विक्रय का संचालन करने वाले अधिकारी या अन्य व्यक्ति को ऐसी घोषणा के तुरन्त पश्चात् देगा और ऐसा निक्षेप करने में व्यतिक्रम होने पर वह सम्पत्ति तत्क्षण फिर बेची जाएगी।
38. क्रयधन की संदेय पूरी रकम का क्रेता द्वारा संदाय सम्पत्ति के विक्रय की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर किया जाएगा।
39. नियम 38 में वर्णित कालावधि के भीतर संदाय करने में व्यतिक्रम होने पर निक्षेप, यदि राजस्व अधिकारी ठीक समझे, विक्रय के व्ययों को काटने के पश्चात् सरकार को समपहृत किया जा सकेगा और सम्पत्ति का फिर से विक्रय किया जायेगा और उस सम्पत्ति पर या जिस राशि के लिए उसका तत्पश्चात् विक्रय किया जाए उसके किसी भाग पर व्यतिक्रम करने वाले क्रेता के समस्त दावे समपहृत हो जायेंगे।
40. (1) जहां स्थावर सम्पत्ति इस संहिता के अधीन बेच दी गई है वहां या तो ऐसी सम्पत्ति का स्वामी या उसमें ऐसे हक के आधार पर, जो ऐसे विक्रय के पूर्व अर्जित किया गया था, हितबद्ध कोई व्यक्ति-
(क) क्रेता को दिए जाने के लिए, क्रयधन के पांच प्रतिशत के बराबर रकम;
(ख) बकाया रकम के भुगतान मद्दे, विक्रय की उद्घोषणा में ऐसी रकम के रूप में विनिर्दिष्ट रकम जिसकी वसूली के लिए विक्रय का आदेश किया गया था और जिसमें से विक्रय की उद्घोषणा की तारीख के पश्चात् उस मद्दे चुकाई गई रकम घटा दी गई हो; और
(ग) विक्रय के खर्चे, उस विक्रय की तारीख से तीस दिन के भीतर किसी भी समय निक्षिप्त करने पर राजस्व अधिकारी को विक्रय अपास्त कराने के लिए आवेदन कर सकेगा।
(2) यदि ऐसा निक्षेप विक्रय की तारीख से तीस दिन के भीतर कर दिया जाता है, तो राजस्व अधिकारी विक्रय को अपास्त करने वाला आदेश पारित करेगा:
परन्तु यदि कोई व्यक्ति ऐसे विक्रय को अपास्त कराने के लिये नियम 41 के अधीन आवेदन करता है तो वह इस नियम के अधीन आवेदन करने का हकदार नहीं होगा।
41. कोई भी ऐसा व्यक्ति, जिसके कि हित ऐसे विक्रय द्वारा प्रभावित होते हों, उस विक्रय को विक्रय के प्रकाशन या संचालन में हुई किसी तात्विक अनियमितता या भूल के आधार पर अपास्त कराने के लिये राजस्व अधिकारी को आवेदन विक्रय की तारीख से तीस दिन के भीतर किसी भी समय कर सकेगा और राजस्व अधिकारी, उस विक्रय द्वारा प्रभावित हुए व्यक्तियों को सूचना देने के पश्चात् विक्रेय को अपास्त करने वाला आदेश पारित कर सकेगा और पुनर्विक्रय के लिए आदेश दे सकेगा, किन्तु कोई भी विक्रय ऐसे आधारों पर तब तक अपास्त नहीं किया जाएगा जब तक कि आवेदक राजस्व अधिकारी के समाधानप्रद रूप में यह साबित न कर दे कि ऐसी अनियमितता या भूल के कारण उसे सारवान् क्षति हुई है।
42. किसी ऐसे मामले में के सिवाय जहां कि भूमि का विक्रय ऐसे बकाया के लिए किया गया हो जो कि भूमि पर भार बनता है, जहां क्रेता इस आधार पर कि बेची गई सम्पत्ति में बकायादार का कोई विक्रेय हित नहीं था, विक्रय को अपास्त कराने के लिए राजस्व अधिकारी को आवेदन विक्रय की तारीख से तीस दिन के भीतर किसी भी समय कर सकेगा और राजस्व अधिकारी, सम्यक् जांच करने के पश्चात् ऐसे आवेदन पर ऐसे आदेश पारित करेगा जो कि वह ठीक समझे।
43. नियम 41 के अधीन कोई भी पुनर्विक्रय तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि नियम 26 में अधिकथित किए गए अनुसार नवीन उद्घोषणा प्रकाशित नहीं कर दी जाती है।
44. यदि विक्रय की तारीख से तीस दिन का अवसान हो जाने पर नियम 40, 41, या 42 के अधीन कोई आवेदन नहीं किया गया है, या यदि ऐसा आवेदन किया गया है, और वह नामंजूर कर दिया गया है, तो राजस्व अधिकारी विक्रय की पुष्टि करने वाला आदेश पारित करेगा:
परन्तु यदि कलेक्टर के पास यह समझने का कारण हो कि
(एक) इस बात के होते हुए भी कि कोई ऐसा आवेदन नहीं किया गया है; या
(दो) किसी ऐसे आवेदन में, जो किया गया हो तथा नामंजूर कर दिया गया हो, कथित आधारों से भिन्न आधारों पर या
(तीन) इस बात के होते हुए भी विक्रय की तारीख से तीस दिन की कालावधि का 'अवसान हो गया है; विक्रय को अपास्त किया जाना चाहिए तो वह, विक्रय की पुष्टि करने के आदेश देने के पूर्व किसी भी समय, विक्रय को, अपने कारण लेखबद्ध करने के पश्चात् अपास्त कर सकेगा।
45. (1) यदि नियम 41 के अधीन कोई आवेदन उसके लिये अनुज्ञात समय के भीतर नहीं किया जाता है, तो ऐसे समस्त दावे, जो अनियमितता या भूल के आधार पर किये जा सकते हों, वर्जित हो जायेंगे।
(2) उपनियम (1) में की कोई भी बात विक्रय को कपट के आधार पर या इस आधार पर कि वह बकाया, जिसके कि लिए सम्पत्ति बेची गई है, शोध्य नहीं है या इस आधार पर कि बेची गई सम्पत्ति में बकायादार का कोई विक्रेय हित नहीं था, अपास्त कराने के लिए सिविल न्यायालय में कोई वाद संस्थित किये जाने का वर्जन नहीं करेगी।
46. यदि किसी सम्पत्ति का विक्रय नियम 40, 41, 42, या 44 के अधीन अपास्त कर दिया जाता है, तो क्रेता द्वारा निक्षिप्त क्रयधन की रकम उसे लौटा दी जायेगी।
47. यदि किसी स्थावर सम्पत्ति के विक्रय की पुष्टि कर दी गई हो, तो राजस्व अधिकारी क्रेता को एक प्रमाण-पत्र देगा जिसमें वह तारीख, जिसको कि विक्रय की पुष्टि की गई हो, बेची गई सम्पत्ति तथा क्रेता का नाम विनिर्दिष्ट किया जायेगा और क्रेता को ऐसी सम्पत्ति का कब्जा दिलायेगा।
48. (1) जहां सम्पत्ति का कब्जा अभिप्राप्त करने में क्रेता का किसी व्यक्ति द्वारा प्रतिरोध किया जाता है या उसे बाधा डाली जाती है, वहां ऐसे प्रतिरोध या बाधा का परिवाद करते हुए आवेदन राजस्व अधिकारी को कर सकेगा।
(2) राजस्व अधिकारी उस बात के अन्वेषण के लिए तारीख नियत करेगा और जिस पक्षकार के विरुद्ध आवेदन किया गया है, उसे उपसंजात होने तथा उत्तर देने के लिए समन करेगा।
49. जहां राजस्व अधिकारी का यह समधान हो जाता है कि-
(क) बकायादार द्वारा या उसके उकसाने पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा; या
(ख) उस भूमि का, जो कि उसके संबंध में शोध्य भू-राजस्व के बकाया के लिए बेची गई थी, क्रय किए जाने के मामले में किसी भी व्यक्ति द्वारा; ऐसा प्रतिरोध किया गया था या ऐसी बाधा डाली गई थी तो वह यह निदेश देगा कि क्रेता को उस सम्पत्ति का कब्जा दिया जाए।
50. जहां किसी ऐसे मामले में, जिसको कि नियम 49 लागू नहीं होता है, राजस्व अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि प्रतिरोध या बाधा किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया था या डाली गई थी, जो स्वयं अपनी ओर से या बकायादार से भिन्न किसी व्यक्ति की ओर से ऐसी सम्पत्ति पर कब्जा रखने का सद्भावपूर्वक दावा करता है, वहां राजस्व अधिकारी आवेदन को खारिज करने वाला आदेश करेगा।
51. (1) जहां बकायादार से भिन्न कोई व्यक्ति स्थावर सम्पत्ति के क्रेता द्वारा ऐसी सम्पत्ति से बेकब्जा कर दिया जाता है, वहां वह इस प्रकार बेकब्जा किये जाने का परिवाद करते हुए राजस्व अधिकारी को आवेदन कर सकेगा।
(2) राजस्व अधिकारी उस बात के अन्वेषण के लिए तारीख नियत करेगा और क्रेता को उपसंजात होने तथा उत्तर देने के लिए समन करेगा।
52. जहां राजस्व अधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक स्वयं अपनी ओर से या बकायादार से भिन्न किसी व्यक्ति की ओर से सम्पत्ति पर कब्जा रखता था, वहां वह निदेश देगा कि सम्पत्ति पर आवेदक का कब्जा कराया जाए।
53. बकायादार से भिन्न कोई भी पक्षकार, जिसके विरुद्ध नियम 49, 50 और 52 के अधीन आदेश किया गया है, उस अधिकार को स्थापित करने के लिए वाद संस्थित कर सकेगा जिसका कि दावा वह सम्पत्ति के तत्काल कब्जे के लिए करता है, किन्तु ऐसे वाद के, यदि कोई हो, परिणाम के अध्यधीन रहते हुए, आदेश निश्चायक होगा।
54. कोई भी राजस्व अधिकारी किन्हीं भी कार्यवाहियों में किसी ऐसे व्यक्ति की परिप्रश्नों द्वारा या अन्यथा परीक्षा करने के लिए कमीशन जारी कर सकेगा जिसे न्यायालय में हाजिर होने से छूट मिली हो या जो रुग्णता या अंग शैथिल्य के कारण न्यायालय में हाजिर होने में असमर्थ हो।
55. साक्षी की परीक्षा करने के लिये कमीशन जारी करने का आदेश राजस्व अधिकारी या तो स्वप्रेरणा से या कार्यवाहियों के किसी पक्षकार के या उस साक्षी के, जिसकी परीक्षा की जानी है, ऐसे आवेदन पर, जो शपथपत्र द्वारा या अन्यथा समर्थित हो, किया जा सकेगा।
56. कोई भी राजस्व अधिकारी-
(क) अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं से परे निवासी किसी भी व्यक्ति की;
(ख) किसी भी ऐसे व्यक्ति की, जो ऐसी सीमाओं को उस तारीख से पहले छोड़ने वाला है, जिसको कि न्यायालय में परीक्षा की जाने के लिए वह अपेक्षित है;
(ग) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की सेवा में के किसी ऐसे व्यक्ति की जिसके कि बारे में ऐसे राजस्व अधिकारी की यह राय हो कि लोक सेवा का अपाय किये बिना वह हाजिर नहीं हो सकता;
परीक्षा करने के लिए कमीशन किन्हीं भी कार्यवाहियों में जारी कर सकेगा।
57. (1) किसी व्यक्ति की परीक्षा करने के लिये कमीशन किसी भी ऐसे व्यक्ति को, जिसे कि न्यायालय उसका निष्पादन करने के लिए ठीक समझता है, या किसी ऐसे अन्य राजस्व अधिकारी को, जो सुविधापूर्वक ऐसे व्यक्ति की परीक्षा कर सकता हो, जारी किया जा सकेगा।
(2) प्रत्येक राजस्व अधिकारी, जिसे किसी व्यक्ति की परीक्षा करने के लिए कमीशन प्राप्त हो, उसके अनुसरण में उसकी परीक्षा करेगा या करवायेगा।
(3) राजस्व अधिकारी, कोई भी कमीशन इस नियम के अधीन जारी करने पर यह निदेश देगा कि क्या कमीशन उसको ही लौटाया जाएगा या कि उसके किसी अधीनस्थ राजस्व अधिकारी को।
58. जहां कमीशन का सम्यक् रूप से निष्पादन कर दिया गया हो, वहां वह उसके अधीन लिये गये साक्ष्य सहित उस राजस्व अधिकारी को जिसने कि उसे जारी किया था, उस दशा के सिवाय लौटा दिया जायेगा जिसमें कि कमीशन जारी करने वाले आदेश द्वारा अन्यथा निर्दिष्ट किया गया और उस दशा में कमीशन ऐसे आदेश के निबन्धनों के अनुसार लौटाया जाएगा और कमीशन और उसके साथ वाली विवरणी और उसके अधीन लिया गया साक्ष्य (ठीक आगामी नियम के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए) कार्यवाहियों के अभिलेख का भाग होंगे।
59. कमीशन के अधीन लिया गया साक्ष्य कार्यवाही में साक्ष्य के तौर पर उस पक्षकार की सम्मति के बिना जिसके कि विरुद्ध वह दिया गया है, उस दशा के सिवाय नहीं पढ़ा जाएगा, जिसमें कि-
(क) वह व्यक्ति जिसने साक्ष्य दिया है, न्यायालय की अधिकारिता के परे है, या मर गया है या रुग्णता या अंगशैथिल्य के कारण वैयक्तिक रूप से परीक्षा की जाने के लिए हाजिर होने में असमर्थ है या न्यायालय में स्वीय उपसंजाति से छूट पाया हुआ है, या केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की सेवा में का ऐसा व्यक्ति है जिसके बारे में राजस्व अधिकारी की राय है कि वह लोक सेवा का अपाय किये बिना हाजिर नहीं हो सकता; या
(ख) राजस्व अधिकारी खण्ड (क) में वर्णित परिस्थितियों में से किसी के भी साबित किये जाने से अभिमुक्ति स्वविवेकानुसार दे देता है और किसी व्यक्ति के साक्ष्य को कार्यवाहियों में साक्ष्य के तौर पर पढ़ा जाना, इस सबूत के होते हुए भी कि कमीशन के माध्यम द्वारा ऐसा साक्ष्य लेने का हेतुक उसके पढ़े जाने के समय जाता रहा है, प्राधिकृत कर देता है।
60. राजस्व अधिकारी इन नियमों के अधीन कोई कमीशन जारी करने के पूर्व यह आदेश दे सकेगा कि ऐसी राशि (यदि कोई हो), जैसी कि वह कमीशन के व्ययों के लिये युक्तियुक्त समझे, नियत किये जाने वाले समय के भीतर उस पक्षकार द्वारा भुगतान की जाए जिसकी कि प्रेरणा पर या जिसके कि फायदे के लिए कमीशन जारी किया जाना है।
61. (1) साक्षियों को समन करने, साक्षियों की हाजिरी और साक्षियों के परीक्षा संबंधी और साक्षियों के पारिश्रमिक तथा उन पर अधिरोपित की जाने वाली शास्तियों संबंधी इस संहिता के उपबन्ध उन व्यक्तियों को लागू होंगे जिनसे साक्ष्य देने की या दस्तावेज पेश करने की अपेक्षा इन नियमों के अधीन की गई है और कमीशन के बारे में इस नियम के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि वह राजस्व न्यायालय है।
(2) कमिश्नर कोई ऐसी आदेशिका जारी करने के लिए, जिसे वह साक्षी के नाम या विरुद्ध जारी करना आवश्यक पाये, ऐसे किसी राजस्व अधिकारी से, जिसकी कि अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर साक्षी निवास करता है, आवेदन कर सकेगा और ऐसा राजस्व अधिकारी, स्वविवेकानुसार, ऐसी आदेशिका जारी कर सकेगा जैसी कि वह युक्तियुक्त तथा उचित समझे।
62. (1) जहां कि कमीशन इन नियमों के अधीन जारी किया जाता है, वहां राजस्व अधिकारी यह निदेश देगा कि कार्यवाहियों के पक्षकार कमिश्नर के सामने या तो स्वयं या अपने अभिकर्ताओं के या प्लीडरों के द्वारा उपसंजात हों।
(2) जहां कि समस्त पक्षकार या उनमें से कोई ऐसे उपसंजात न हों वहां कमिश्नर उनकी अनुपस्थिति में कार्यवाही कर सकेगा।
63. अवयस्क द्वारा प्रत्येक आवेदन, अवयस्क के संरक्षक के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति द्वारा अवयस्क के नाम से दिया जायेगा।
64. जहां अनावेदक अवयस्क है, वहां राजस्व अधिकारी उसकी अवयस्कता के तथ्य के बारे में अपना समाधान हो जाने पर किसी उपयुक्त व्यक्ति को कार्यवाहियों के प्रयोजन के लिए ऐसे अवयस्क का संरक्षक नियुक्त करेगा।
65. कोई भी व्यक्ति, जो स्वस्थचित्त है तथा वयस्क हो गया है और जिसका हित अवयस्क के हित के प्रतिकूल नहीं है, कार्यवाहियों में अवयस्क पक्षकार के संरक्षक के रूप में कार्य कर सकेगा।
66. उस दशा में, जबकि अनावेदक अवयस्क हो और नियुक्त किए गए संरक्षक के पास आवश्यक व्ययों की पूर्ति के लिए कोई निधियां न हों, राजस्व अधिकारी आवेदक को यह निदेश दे सकेगा कि वह उस प्रयोजन के लिये पर्याप्त धन राशि जमा करे। आवेदक द्वारा इस प्रकार उपगत किए गए खर्चे, खर्चे के सम्बन्ध में पारित किये गये अंतिम आदेश के अनुसार समायोजित किये जायेंगे।
67. (1) कोई भी संरक्षक अवयस्क की ओर से कोई करार या समझौता उन कार्यवाहियों के बारे में जिनमें वह अवयस्क के संरक्षक के रूप में कार्य करता है, राजस्व अधिकारी की इजाजत के बिना नहीं करेगा जो इजाजत कार्यवाहियों में स्पष्टतया अभिलिखित की जाएगी।
(2) राजस्व अधिकारी की ऐसी अभिलिखित इजाजत के बिना किया गया कोई भी ऐसा करार या समझौता अवयस्क से भिन्न समस्त पक्षकारों के विरुद्ध शून्यकरणीय होगा।
68. नियम 63 से 67 तक में अन्तर्विष्ट उपबन्ध, यथावश्यक परिवर्तन संहित, विकृतचित्त व्यक्तियों को लागू होंगे।