
(1) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो राज्य सरकार से भूमि धारण करता है, या जिसे राज्य सरकार या कलेक्टर ने भूमि को दखल में लेने का अधिकार प्रदान कर दिया है और जो भूमि को भूमिस्वामी के रूप में धारण करने का हकदार नहीं है, ऐसी भूमि के संबंध में सरकारी पट्टेदार कहलायेगा।
(2) प्रत्येक ऐसे व्यक्ति को, जो इस संहिता के प्रवृत्त होने के समय-
(क) मध्यभारत क्षेत्र में कोई भूमि मध्यभारत भू-आगम एवं कृषिकाधिकार विधान, संवत् 2007 (क्रमांक 66 सन् 1950) में यथा - परिभाषित साधारण कृषक के रूप में धारण करता है; या
(ख) विन्ध्यप्रदेश क्षेत्र में कोई भूमि विन्ध्यप्रदेश लैण्ड रेवेन्यू एण्ड टेनेन्सी एक्ट, 1953 (क्रमांक 3 सन् 1955) में यथा परिभाषित विशेष कृषक के रूप में या कोई ऐसा निकुंज या तालाब या ऐसी भूमि, जो सरकारी या सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए अर्जित कर ली गई है या अपेक्षित है, गैर हकदार कृषक के रूप में धारण करता है; या
(ग) सिरोंज क्षेत्र में कोई भूमि राज्य सरकार से राजस्थान टेनेन्सी एक्ट, 1955 (क्रमांक 3 सन् 1955 ) में यथा परिभाषित गैर खातेदार कृषक के रूप में धारण करता है; ऐसी भूमि के संबंध में सरकारी पट्टेदार समझा जायेगा।
(1) सरकारी पट्टेदार, इस संहिता में के किन्हीं अभिव्यक्त उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, अपनी भूमि उस अनुदान के जो कि सरकारी अनुदान अधिनियम, 1895 (1895 का संख्यांक 15) के अर्थ के अन्तर्गत अनुदान समझा जायेगा, निर्बन्धनों तथा शर्तों के अनुसार धारण करेगा।
(2) सरकारी पट्टेदार को उसकी भूमि से, राजस्व अधिकारी के आदेश द्वारा, निम्नलिखित आधारों में से किसी एक या अधिक आधारों पर बेदखल किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(एक) यह कि उसने लगान का उस तारीख से, जिसको कि वह शोध्य हो गया था, तीन मास की कालावधि तक भुगतान नहीं किया है, या
(दो) यह कि उसने ऐसी भूमि का उपयोग उन प्रयोजनों से, जिनके कि लिए वह प्रदान की गई थी, भिन्न प्रयोजनों के लिए किया है, या
(तीन) यह कि उसके पट्टे की अवधि का अवसान हो चुका है, या
(चार) यह कि उसने अनुदान के किसी निबन्धन तथा शर्त का उल्लंघन किया है:
परन्तु इस उपधारा के अधीन किसी सरकारी पट्टेदार को बेदखल करने के लिए कोई आदेश उसे अपनी प्रतिरक्षा में सुने जाने का अवसर दिये बिना पारित नहीं किया जायेगा।
(1) ग्राम सेवक के रूप में सेवा करने की शर्त पर भूमि धारण करने वाला कोई व्यक्ति, उस दशा में ऐसी भूमि का हकदार नहीं रह जायेगा जबकि वह ऐसी भूमि को कृषि- भिन्न प्रयोजनों के लिए व्यपवर्तित कर देता है।
(2) ऐसा संव्यवहार, जिसके द्वारा कोई ग्राम सेवक अपनी सेवा भूमि में के अपने हित को विक्रय, दान, बन्धक, उप पट्टे द्वारा या अन्यथा, एक वर्ष से अनधिक कालावधि तक के उप-पट्टे द्वारा के सिवाय, अन्तरित करने का प्रयत्न करता है, शून्य होगा।
(3) यदि ऐसी भूमि का धारक मर जाये, पद त्याग दे या विधिपूर्वक पदच्युत कर दिया जाये, तो वह भूमि उसके पद उत्तरवर्ती को संक्रान्त हो जायेगी।
(4) धारक का ऐसी भूमि में अधिकार किसी डिक्री के निष्पादन में कुर्क नहीं किया जायेगा या बेचा नहीं जायेगा और न ही ऐसी भूमि का प्रबन्ध करने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का संख्यांक 5) की धारा 51 के अधीन कोई रिसीवर नियुक्त किया जायगा।
184. 1[***] 1. छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त।