
छत्तीसगढ़ में भू-राजस्व अधिकारियों की शक्तियों, राज्य सरकार से भूमि धारण करने वालों के अधिकारों और दायित्यों, कृषिक भू- धृतियों तथा भूमि से संबंधित अन्य विषयों तथा उनसे आनुषंगिक दायित्वों से संबंधित विधि को समेकित तथा संशोधित करने हेतु अधिनियम।
भारत गणराज्य के दसवें वर्ष में मध्यप्रदेश विधान मण्डल द्वारा निम्नलिखित रूप से यह अधिनियमित हो :-
(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 है।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण छत्तीसगढ़ पर है किन्तु इस संहिता में अंतर्विष्ट कोई भी बात, भू- राजस्व के भुगतान के लिए भूमि के दायित्व, भूमि के उपयोग के प्रति निर्देश से भू-राजस्व के निर्धारण, भू-राजस्व की उगाही से संबंधित उपबन्धों को और उनसे आनुषंगिक समस्त उपबंधों को छोड़कर ऐसे क्षेत्रों को लागू नहीं होगी जिन्हें भारतीय वन अधिनियम, 1927 (1927 का सं. 16 ) के अधीन समय-समय पर आरक्षित या संरक्षित वनों के रूप में गठित किया जाय:
परन्तु इस संहिता के पूर्वोक्त उपबन्ध ऐसे क्षेत्रों में, धारा 59 में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों में से एक या अधिक प्रयोजनों के लिए भूमि के उपयोग के प्रति निर्देश से लागू होंगे।
(3) यह संहिता ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगी, जिसे राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे।
( 1 ) इस संहिता में, जब तक कि विषय या संदर्भ से कोई बात विरुद्ध न हो :-
(क) “आबादी" से अभिप्रेत है नगरेतर क्षेत्र के किसी ग्राम में उसके निवासियों के निवास के लिए या उससे आनुषंगिक प्रयोजनों के लिए समय-समय पर आरक्षित क्षेत्र, और इस अभिव्यक्ति के किसी अन्य स्थानिक पर्याय, जैसे " ग्राम स्थल" या " गाँव स्थान" का अर्थ भी तदनुसार लगाया जायगा;
(ख) "कृषि " के अन्तर्गत है :-
(एक) वार्षिक या नियतकालिक फसलों का, जिनमें पान तथा सिंघाड़े और उद्यान की उपज सम्मिलित है, उगाया जाना;
(दो) उद्यानकृषि;
(तीन) वाणिज्यिक वृक्षारोपण, फलोद्यान लगाना तथा उनका समारक्षण; और
(चार) चारे चराई या छप्पर छाने की घास के लिए भूमि का आरक्षित किया जाना;
(ग) "कृषि वर्ष " से अभिप्रेत है 1 जुलाई या ऐसी अन्य तारीख को, जिसे राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे, प्रारंभ होने वाला वर्ष;
(घ) "मण्डल" से अभिप्रेत है धारा 3 के अधीन गठित राजस्व मण्डल;
(ङ) "वास्तविक कृषक" से अभिप्रेत है कोई ऐसा व्यक्ति जो भूमि पर स्वयं खेती करता है या जिससे युक्तियुक्त रूप से यह प्रत्याशा की जा सकती है कि स्वयं खेती करेगा;
(च) “सहकारी सोसाइटी” से अभिप्रेत है सहकारी सोसाइटियों से संबंधित किसी विधि के, जो राज्य के किसी क्षेत्र में तत्समय प्रवृत्त है, अधीन उस रूप में रजिस्ट्रीकृत सोसायटी;
(छ) "सरकारी वन" से अभिप्रेत है कोई ऐसा वन जो भारतीय वन अधिनियम, 1927 (1927 का संख्यांक 16 ) के उपबन्धों के अनुसार आरक्षित वन या संरक्षित वन के रूप में गठित किया गया है;
(ज) “सरकारी पट्टेदार" से अभिप्रेत है वह व्यक्ति जो राज्य सरकार से धारा 181 के अधीन भूमि धारण करता है;
(झ) "खाता" से अभिप्रेत है :-
(1) ऐसा भूमि खण्ड जिस पर भू-राजस्व पृथक् रूप से निर्धारित किया गया है और जो एक ही भू-धृति के अधीन धारित है; और
(2) कृषक द्वारा धारित भूमि के सन्दर्भ में कोई ऐसा भूमि खण्ड जो भूमि स्वामी से एक ही पट्टे के अधीन या एक ही संवर्ग की शर्तों के अधीन धारित है;
(ञ) “सुधार” से किसी खाते के संदर्भ में, अभिप्रेत है कोई ऐसा संकर्म जिससे खाते के मूल्य में तात्विक वृद्धि होती है, जो खाते के लिए उपयुक्त है तथा उस प्रयोजन से संगत है जिसके लिए खाता धारित है और जो यदि खाते पर निष्पादित न किया गया हो, तो या तो प्रत्यक्षतः उसके फायदे के लिए निष्पादित किया गया है या निष्पादित किया जाने के पश्चात्, उसके लिए प्रत्यक्षतः फायदाप्रद बना दिया गया है और, पूर्वगामी उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, उसके अन्तर्गत है:-
(एक) कृषि प्रयोजनों के लिए जल के संग्रहण, प्रदाय या वितरण के लिए तालाबों, कुओं जल सरणियों, बाँधों तथा अन्य संकर्मों का सन्निर्माण;
(दो) भूमि के जल निकास के लिए या बाढ़ों से या जल द्वारा कटाव से या जल से होने वाले अन्य नुकसान से भूमि के संरक्षण के लिए संकर्मों का सन्निर्माण;
(तीन) वृक्षारोपण और भूमि के कृष्यकरण, भूमि की सफाई, उसका घेरा लगाना, उसे समतल करना या उसकी सीढ़ी बन्दी करना;
(चार) आबादी या नगरीय क्षेत्र में न होकर अन्यत्र होने वाले खाते पर या उसके सामीप्य में ऐसे भवनों का परिनिर्माण जो उस खाते के सुविधाजनक या लाभदायक उपयोग या अधिभोग के लिए अपेक्षित हों; और
(पाँच) पूर्वगामी संकर्मों में से किसी भी संकर्म का नवीकरण या पुनर्संन्निर्माण या उसमें परिवर्तन या परिवर्धन:
किन्तु उसके अन्तर्गत निम्नलिखित नहीं हैं-
(क) अस्थाई कुएं और ऐसी जलसरणियाँ, बाँध, समतलन, घेरे या अन्य संकर्म या ऐसे संकर्मों में छोटे-मोटे परिवर्तन या उनकी मरम्मत जो कि उस स्थान के खेतिहरों द्वारा कृषि के मामूली अनुक्रम में सामान्यतः की जाती है; या
(ख) कोई ऐसा संकर्म, जिससे कहीं भी स्थित किसी ऐसी भूमि के मूल्य में सारभूत रूप से कमी होती है जिसे कि कोई अन्य व्यक्ति भूमिस्वामी की हैसियत में या मौरूसी कृषक की हैसियत से अधिभोग में रखता है;
किसी ऐसी संकर्म को, जिससे विभिन्न खातों को फायदा पहुँचता है, ऐसे खातों में से प्रत्येक खाते के सम्बन्ध को सुधार समझा जा सकेगा;
(ट) "भूमि" से अभिप्रेत है धरती की सतह का कोई भाग चाहे वह जल के नीचे हो या न हो; और जहाँ भी इस संहिता में भूमि के प्रति निर्देश किया गया है, वहाँ उसके सम्बन्ध में यह समझा जायगा कि उसके अन्तर्गत वे समस्त चीजें हैं जो ऐसी भूमि से बद्ध है या ऐसी भूमि से बद्ध किसी चीज से स्थायी रूप से जकड़ी हुई हैं;
(ठ) "भूमिहीन व्यक्ति" से अभिप्रेत है वह व्यक्ति जो वास्तविक कृषक है जो अकेले या अपने कुटुम्ब के अन्य सदस्यों के साथ संयुक्त रूप से कोई भूमि धारण नहीं करता है या इतनी भूमि धारण करता है जिसका क्षेत्रफल उस क्षेत्रफल से कम है। जो इस संबन्ध में विहित किया जाय;
इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि किसी व्यक्ति का कुटुम्ब उसकी पत्नी या पति सन्तति तथा माता-पिता से मिलकर बना है।
(ड) "भू-अभिलेख" से अभिप्रेत है इस संहिता के उपबन्धों के अधीन रखे गये अभिलेख;
(ढ) "विधि व्यवसायी" से अभिप्रेत है कोई ऐसा व्यक्ति जो विधि व्यवसाय अधिनियम, 1879 (1879 का सं. 18) के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन छत्तीसगढ़ के न्यायालयों में से किसी भी न्यायालय में विधि- व्यवसाय करने का हकदार है;
(ण) "आम्रकुंज" से अभिप्रेत है आम के वृक्ष जो इतनी संख्या में लगाए गए हैं कि उनसे उस भूमि का, जिस पर कि वे खड़े हैं या उसके किसी बड़े प्रभाग का, मुख्यतः किसी ऐसे प्रयोजन के लिए जो वृक्षारोपण से भिन्न हो, उपयोग में लाया जाना रुक जाता है या उन आम के वृक्षों के पूरी तरह बढ़ जाने पर यह संभाव्य है कि उनसे भूमि का या उसके किसी बड़े प्रभाग का, मुख्यतः उक्त प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाना रुक जायगा;
(ण-क) "बाजार मूल्य" से अभिप्रेत है, भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 (1899 का सं० 2) के अधीन बनाये गये छत्तीसगढ़ बाजार मूल्य मार्गदर्शक सिद्धान्तों का बनाया जाना तथा उनका पुनरीक्षण नियम, 2000 के अधीन कलेक्टर द्वारा जारी किये गये दिशानिर्देशों के अनुसार निर्धारित भूमि का मूल्य;
(ण-ख) "नगरीय भूमि" से अभिप्रेत है नगरीय क्षेत्रों के मास्टर प्लान/विकास योजना में कृषि के अलावा अन्य उपयोग हेतु अंगीकृत भूमि;
(त) "फलोद्यान" से अभिप्रेत है फल के वृक्ष जो इतनी संख्या में लगाए गए हैं कि उनसे उस भूमि का, जिस पर कि वे खड़े हैं, या उसके किसी बड़े प्रभाग का, मुख्यत: किसी ऐसे प्रयोजन के लिए जो वृक्षारोपण से भिन्न हो, उपयोग में लाया जाना रुक जाता है या उन फलों के वृक्षों के पूरी तरह बढ़ जाने पर यह संभाव्य है कि उनसे भूमि का या उसके किसी बड़े प्रभाग का, मुख्यतः उक्त प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाना रुक जायगा;
(थ) "भू-खण्ड संख्यांक" से अभिप्रेत है नगरीय क्षेत्र में की भूमि का वह प्रभाग जो धारा 93 के अधीन भू-खण्ड संख्यांक के रूप में विरचित किया गया है या उस रूप में मान्य किया गया है और जिसकी बाबत क्षेत्रफल तथा देय भू-राजस्व की प्रविष्टि विहित अभिलेखों में सूचक संख्यांक के अधीन पृथक् पृथक् की गई तथा उसके अन्तर्गत भूमि का कोई ऐसा प्रभाग भी है जिसकी प्रविष्टि पूर्व के अभिलेखों में खसरा या सर्वेक्षण संख्यांक नामक सूचक संख्यांक के अधीन की गई है;
(द) "मान्यता प्राप्त अभिकर्ता” से, संहिता के अधीन कार्यवाही के पक्षकार के संदर्भ में, अभिप्रेत है-
(एक) वह व्यक्ति जिसे ऐसे पक्षकार ने ऐसी कार्यवाहियों में उसकी ओर से उपसंजात होने तथा आवेदन करने एवं अन्य कार्य करने के लिए, मुख्तारनामे के अधीन प्राधिकृत किया है; और
(दो) वह व्यक्ति जिसे ऐसे पक्षकार ने ऐसी कार्यवाहियों में उसकी ओर से उपसंजात होने के लिए लिखित में प्राधिकृत किया है;
(ध) "क्षेत्र" से अभिप्रेत है यथास्थिति महाकौशल क्षेत्र, मध्यभारत क्षेत्र, भोपाल क्षेत्र, विन्ध्यप्रदेश क्षेत्र और सिरोंज क्षेत्र, या इनमें से कोई भी क्षेत्र;
(न) "लगान" से अभिप्रेत है वह कुछ भी जो-
(एक) उसके द्वारा ऐसे भूमिस्वामी से धारित भूमि के उपयोग का अधिभोग के मद्दे या
(दो) सरकारी पट्टेदार द्वारा सरकार को, उस भूमि के, जो कि सरकार द्वारा उस पट्टे पर दी गई है, उपयोग या अधिभोग के मद्दे, धन या वस्तु के रूप में संदत्त किया जाता है या देय है;
(प) "राजस्व अधिकारी" से अभिप्रेत है धारा 11 में उल्लिखित राजस्व अधिकारी;
(फ) "राजस्व वर्ष" से अभिप्रेत है वह वर्ष जो ऐसी तारीख से प्रारम्भ होता है जिसे राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, किसी विशेष स्थानीय क्षेत्र के बारे में नियंत करे;
(ब) "सर्वेक्षण संख्यांक का उपखण्ड" से अभिप्रेत है सर्वेक्षण संख्यांक का ऐसा प्रभाग जिसकी बाबत क्षेत्रफल तथा देय भू-राजस्व की प्रविष्टि भू-अभिलेखों में, उन सर्वेक्षण संख्यांकों के, जिनका कि वह प्रभाग है, सूचक संख्यांक के अधीनस्थ सूचक संख्यांक के अधीन पृथक्-पृथक् की गई है;
(भ) "सर्वेक्षण संख्यांक" से अभिप्रेत है नगरेतर क्षेत्र में की भूमि का ऐसा प्रभाग जो ठीक पहले के राजस्व सर्वेक्षण के समय सर्वेक्षण संख्यांक के रूप में विरचित किया गया है या उस रूप में मान्य किया गया है अथवा कलेक्टर द्वारा उसके पश्चात् उस रूप में मान्य किया गया है और जिसकी बाबत् क्षेत्रफल तथा देय भू- राजस्व की प्रविष्टि भू-अभिलेखों में, सूचक संख्यांक के अधीन पृथक-पृथक की गई है; और उसके अन्तर्गत भूमि का कोई भी ऐसा प्रभाग है जिसकी प्रविष्टि भू- अभिलेखों में, खसरा क्रमांक, नाम सूचक संख्यांक के अधीन की गई है;
(म) छत्तीसगढ़ अधिनियम क्रमांक 6 सन् 2022 द्वारा दिनांक 4-5-2022 से विलुप्त ।
(य) “भू-धारी” से अभिप्रेत है वह व्यक्ति जो राज्य सरकार से भूमि धारण करता है और जो इस संहिता के उपबंधों के अधीन भूमिस्वामी है या भूमिस्वामी समझा जाता है;
(य-1) "इमारती लकड़ी के वृक्ष" से अभिप्रेत है निम्नलिखित जाति के वृक्ष, अर्थात् :-
(एक) टेक्टोना ग्रन्डिस (सागवान) ;
(दो) टेरोकारपस मारसुपियम (बीजा);
(तीन) डलवेरिया लेटीफोलिया (शीशम);
(चार) शोरिया रोबस्टा (साल);
(पाँच) तिनसा;
(छ) टर्मीनेलिया टोमंटोसा (एन या साज);
(सात) संटालम अलबम ( चन्दन );
(आठ) एडाइना कॉर्डिफोलिया ( हल्दू);
(नौ) मित्रागाइना पारविफ्लोरा (मुण्डी);
(दस) टर्मिनेलिया अर्जुना (अर्जुन);
(ग्यारह) डायोस्पाइरस मेलनोक्जाइलान (तेन्दू);
(बारह) मेलाइना आरबोरिया (खम्हार) ;
(य-2) "स्वयं खेती करना" से अभिप्रेत है-
(एक) अपने स्वयं के श्रम द्वारा, या
(दो) अपने कुटुम्ब के किसी भी सदस्य के श्रम के द्वारा, या
(तीन) ऐसी मजदूरी पर, जो नकद या वस्तु के रूप में देय है किन्तु फसल के अंश के रूप में देय नहीं है, रखे गये सेवकों द्वारा, या
(चार) अपने वैयक्तिक पर्यवेक्षण के अधीन या अपने कुटुम्ब के किसी सदस्य के वैयक्तिक पर्यवेक्षण के अधीन भाड़े के श्रमिकों द्वारा, अपने स्वयं के लिए खेती करना।
(य-3) "दखलरहित भूमि” से अभिप्रेत है किसी ग्राम में की ऐसी भूमि जो आबादी या सेवाभूमि से या किसी भूमि -स्वामी, कृषक या सरकारी पट्टेदार द्वारा धारित भूमि से भिन्न है;
(य-4) "नगरीय क्षेत्र" से अभिप्रेत है वह क्षेत्र जो नगरपालिकाओं से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन गठित किसी नगरपालिक निगम की या किसी नगरपालिका या अधिसूचित क्षेत्र की या किसी ऐसे ग्राम या ग्राम समूह की, जो कि राज्य सरकार द्वारा नगरीय क्षेत्र के रूप में विनिर्दिष्ट किया जाय, सीमाओं के भीतर तत्समय सम्मिलित है; और अभिव्यक्ति "नगरेतर क्षेत्र" का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा।
(य-5) "ग्राम” से अभिप्रेत है कोई ऐसा भू-भाग जिसे इस संहिता के प्रवृत्त होने के पूर्व किसी ऐसी विधि के, जो तत्समय प्रवृत्त है, उपबन्धों के अधीन ग्राम के रूप में मान्य किया गया था या उस रूप में घोषित किया गया था, तथा कोई ऐसा अन्य भू-भाग जिसे किसी राजस्व सर्वेक्षण में एतत्पश्चात् ग्राम के रूप में मान्य किया जाय या जिसे राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, ग्राम के रूप में घोषित करे;
(य-6) "विकास योजना" का वही अर्थ होगा, जो छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 (क्र० 23 सन् 1973 ) में परिभाषित है।
(2) इस संहिता के प्रवृत्त होने की तारीख के प्रति इस संहिता में किए गए किसी भी निर्देश का अर्थ इस प्रकार लगाया जायगा मानो कि वह धारा 1 की उपधारा (3) के अधीन अधिसूचना द्वारा नियत की गई तारीख के प्रति निर्देश है।