Download Constitution of India PDF
|
भारत का संविधान (The Constitution of India) |
|
|
|
|
|
संविधान की विशेषताएं (Features of Constitution) |
|
|
मामले |
निर्णीत तथ्य |
|
1. राम जवाया कपूर बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1995, एस.सी. 549 |
सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि हमारे संविधान ने इंग्लैंड की संसदीय सरकार की प्रणाली को अपनाया है। मूल सिद्धांत यह है कि राष्ट्रपति कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख होता है जबकि वास्तविक कार्यपालिकीय शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित होती है। |
|
2. एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1994, एस.सी. 1918;
अरुणा रॉय बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2002, एस.सी. 3176 |
धर्मनिरपेक्षता संविधान का आधारभूत ढांचा है। सर्वोच्च न्यायालय ने अवधारित किया है कि धर्मनिरपेक्षता को सकारात्मक अर्थ में लेना चाहिए एवं उसका अर्थ विभिन्न धर्मों के प्रति समझ और सम्मान विकसित करना है। |
|
3. एक्सेल वियर बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1979;
एस.सी. 25; डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ ए.आई.आर. 1983, एस.सी. 130 |
न्यायालय राष्ट्रीयकरण तथा राज्य के स्वामित्व को अधिक महत्त्व देना चाहिए किंतु समाजवाद के सिद्धांतों का निर्वचन और कार्यान्वयन इस सीमा तक नहीं किया जाएगा कि यह निजी स्वामित्व के हितों की पूरी तरह अनदेखी कर दे। इसके अलावा, उच्चतम न्यायालय ने धारित किया है कि समाजवाद का मूल उद्देश्य लोगों के जीवन को उच्च स्तर और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। |
|
4. एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1997, एस.सी. 1125 |
सर्वोच्च नयायालय ने माना है कि न्यायालयों के क्षेत्राधिकार का अपवर्जन असंवैधानिक है। न्यायिक समीक्षा संविधान की आधारभूत संरचना है और इसका अपवर्जन नहीं किया जा सकता। |
|
5. एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1994, एस.सी. 1918
एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1994, एस.सी. 1918 |
सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत से निर्धारित किया कि भारतीय संविधान संघीय है। सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत से निर्धारित किया कि भारतीय संविधान संघीय है। |
|
6. राम जवाया कपूर बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1995, एस.सी. 549 |
संघीय सिद्धांत या शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को संविधान में सख्त और कठोर रूप में समाहित नहीं किया गया है। |
|
7. पश्चिम बंगाल राज्य बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1963, एस.सी. 1241 |
भारतीय संविधान वास्तविक रूप से संघात्मक नहीं है और राज्यों (प्रांतों) में सम्प्रभुता निहित नहीं है। राजनीतिक संप्रभुता संघ के पक्ष में अधिक भार के साथ संघ और राज्यों के बीच बटी हई है। |
|
8. राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1977, एस.सी. 1361 |
भारतीय संघ एक परिसंघ है लेकिन संघवाद की सीमा का अधिकांश विकास उस देश की प्रगति और विकास की आवश्यकताओं के अनुसार होता है, जो राष्ट्रीय, राजनीतिक, आर्थिक रूप से समन्वय करते हैं तथा सामाजिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से उत्थान होना चाहिए। |
|
9. कुलदीप नायर बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2006, एस.सी. 3127 |
यद्यपि संघीय सिद्धांत हमारे संविधान में प्रभावी हैं और यह सिद्धांत उसके मूल ढाचों में से एक है, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि इसका संघात्मक स्वरूप एक सशक्त केंद्र या एकात्मक शक्ति के पक्ष में होना चाहिए। |
|
|
|
|
प्रस्तावना (Preamble) |
|
|
10. इन री बेरुबारी यूनियन वाद, ए.आई.आर. 1960, एस.सी. 845 |
उच्चतम न्यायायल ने अभिनिर्धारित किया कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है। |
|
11. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, ए.आई.आर. 1973, एस.सी. 1461
|
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रस्तावना संविधान का ही अंग है। न्यायालय ने माना कि संविधान की प्रस्तावना अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है तथा संविधान को प्रस्तावना के आलोक में पढ़ा तथा व्याख्यायित किया जाना चाहिए। न्यायालय ने आगे कहा कि संविधान के मूल ढांचे में बदलाव किए बिना प्रस्तावना में संशोधन किया जा सकता है। |
|
12. सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई. आर. 1965, एस.सी. 845 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रस्तावना संविधान की विशेषताओं का सार और तत्व है। |
|
13. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1994, एस.सी. 1918 |
उच्चतम न्यायालय ने केशवानंद भारती वाद में अभिव्यक्त दृष्टिकोण को दोहराया और कहा कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है। |
|
14. के. के. बस्करण बनाम तमिलनाडु राज्य, ए.आई.आर. 2011, एस.सी. 1485
|
उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संविधान की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए जिससे कि सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके। |
|
15. नंदिनी सुंदर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, ए.आई.आर. 2011, एस.सी. 2839
|
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना द्वारा प्रदत्त सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करने के वचन को भुलाया या उपेक्षित नहीं किया जा सकता है। |
|
16. सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर. 11965, एस.सी. 845 |
प्रस्तावना समूचे संविधान के सार, दर्शन, आदर्शों, प्राण या आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है। |
|
|
|
|
संघ और क्षेत्र (Union & Territory) |
|
|
17. अमर सिंह जी बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर. 1955, एस.सी. 504 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि किसी भी समय भारत का राज्य क्षेत्र वह क्षेत्र है जो अनुच्छेद 1 के अधीन पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट है। |
|
18. इन री बेरुबारी यूनियन, वाद ए.आई.आर. 1960, एस.सी. 858 |
किसी प्रांत (राज्य) क्षेत्र को घटाने की संसद की शक्ति में किसी भारतीय राष्ट्रीय क्षेत्र (या राष्ट्र) को किसी विदेशी राज्य को अर्ध्यपित या हस्तांतरित करने की शक्ति सम्मिलित नहीं है। इस तरह का समझौता केवल संविधान के अनुच्छेद 368 में संशोधन करके ही क्रियान्वित किया जा सकता है। |
|
19. बाबूलाल बनाम बॉम्बे राज्य, ए.आई.आर. 1960, एस.सी. 51 |
यदि राज्य विधानमंडल, जिसके पास विधेयक भेजा गया है, अपने विचारों को विनिर्दिष्ट या विस्तारित अवधि के भीतर व्यक्त नहीं करता है, तो विधेयक संसद में पेश किया जा सकता है, भले ही अमुक राज्य के विचार राष्ट्रपति द्वारा प्राप्त न किए गए हों। यदि राज्य विधानमंडल अपने विचार विनिर्दिष्ट या विस्तारित समय में व्यक्त करता है तो संसद, राज्य विधानमंडल के विचारों को स्वीकार करने या उन पर कार्रवाई करने के लिए बाध्य नहीं होगी। |
|
20. मगनभाई बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1969, एस.सी. 783 |
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि सीमा विवाद को सुलझाने हेतु किए गए समझौते को किसी अंतर्राष्ट्रीय अभिकरण को भेजना भारत के किसी क्षेत्र का किसी विदेशी राज्य का अध्यर्पण नहीं है अतः इसके लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं है। |
|
21. आरसी पौड्याल बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1993, एस.सी. 1804 |
यद्यपि किसी नए राज्य का प्रवेश या उसकी स्थापना ऐसे नियमों और शर्तों पर होगा जिन्हें संसद उचित समझे, फिर भी ऐसी शर्तें लागू नहीं की जा सकती जो संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध हो। |
|
|
|
|
नागरिकता (Citizenship) |
|
|
22. प्रदीप जैन (डॉ.) बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1984, एस.सी. 1420;
डॉ.योगेश भारद्वाज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए.आई.आर. 1991, एस.सी. 356 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि अनुच्छेद 5 भारत के अधिवास को मान्यता देता है। यह राज्य अधिवास की अवधारणा को मान्यता नहीं देता है। |
|
23. सोंदूर गोपाल बनाम सोंदूर रजिनी, ए.आई.आर. 2013, एस.सी. 2678 |
पसंद के अधिवास के संबंध में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि पसंद के अधिवास में केवल दूसरे अधिवास का अधिग्रहण ही पर्याप्त नहीं है। मूल अधिवास के परित्याग करने का स्पष्ट इरादा भी होना चाहिए। |
|
24. भंवारू खान बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2002, एस.सी. 1614 |
उच्चतम न्यायालय ने मान्यता दी कि जो स्वेच्छा से पाकिस्तान चले गए थे और वहां नागरिक बन गए, भारत वापस नहीं आ सकते। वे भारत की नागरिकता का इस आधार पर दांवा नहीं कर सकते कि वे लंबे समय तक भारत में रह रहे थे और उनके नाम मतदाता सूची में शामिल किए गए है। |
|
25. स्टेट ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया बनाम कॉमर्शियल टैक्स ऑफिसर, ए.आई. आर. 1963, एस.सी. 1811 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि कोई कंपनी एक नागरिक नहीं है और इसलिए उन मौलिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकती है जो उसके नागरिकों को प्रदान किए गए हैं। न्यायालय ने आगे कहा कि कोई कंपनी 'विधिक व्यक्ति' की हैसियत रखती है। यद्यपि कंपनी कोई नागरिक नहीं है परंतु राष्ट्रीयता, अधिवास एवं निवास स्थान रखती है। इसलिए यह मूलाधिकारों का दावा कर सकती है जो सभी 'व्यक्तियों' को प्रदान किये गये हो चाहें वह देश के नागरिक हों या न हों। |
|
26. टाटा इंजीनियरिंग बनाम बिहार राज्य, ए.आई.आर. 1965, एस.सी. 40 |
कंपनी के शेयरधारकों द्वारा प्रतिवाद किया गया था कि यद्यपि कंपनी नागरिक नहीं है परंतु शेयरधारक नागरिक हैं और इसलिए उसके शेयरधारकों के मौलिक अधिकारों को कॉरपोरेट आवरण उठाने से संरक्षित किया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने उक्त विवाद को खारिज करते हुए कहा कि जो सीधे प्राप्त नहीं किया जा सकता, वह अप्रत्यक्ष रूप से भी प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार, कंपनी को शेयरधारकों के माध्यम से मौलिक अधिकारों की सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है। |
|
27. आर. सी. कूपर बनाम भारत संघ, बैंक नेशनलाइजेशन केस ए.आई.आर. 1970, एस.सी. 564 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि राज्य की कार्रवाई में शेयरधारकों और कंपनी के अधिकारों को प्रभावित किया गया है तो शेयरधारक अनुच्छेद 19 के अधीन संरक्षण के हकदार होंगे। इस मामले से सर्वोच्च न्यायालय ने इस पहलू की व्याख्या करने में लचीला रुख अपनाया। |
|
28. गोधरा इलेक्ट्रिसिटी कं. लि. बनाम गुजरात राज्य, ए.आई.आर. 1975, एस.सी. 32 |
उच्चतम न्यायालय ने का निर्णय दिया कि यद्यपि कंपनी कोई नागरिक नहीं है अपितु शेयर धारक को कंपनी के माध्यम से कारोबार जारी रखने का अधिकार है। |
|
|
|
|
आच्छादन, पृथक्करणीयता एवं न्यायिक पुनर्विलोकन के सिद्धांत (Doctrine of Eclipse, Severability Judicial Review) |
|
|
29. केशव माधव मेनन बनाम बॉम्बे राज्य, ए.आई.आर. 1951, एस. सी 128 |
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि पूर्व के सभी अधिनियमों में पूर्व संवैधानिक कानून मौजूद हैं जो संविधान के प्रारंभ से पहले हैं। |
|
30. भीकाजी बनाम मध्य प्रदेश राज्य, ए.आई.आर 1955, एस.सी. 781 |
इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आच्छादन के सिद्धांत की व्याख्या की गई। अदालत ने निर्णय दिया कि इस सिद्धांत के तहत कानून मौलिक अधिकारों के द्वारा निष्प्रभावी हो गया है। और निष्क्रिय रहता है। |
|
31. सगीर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए.आई.आर 1954, एस.सी 728 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि आच्छादन का सिद्धांत केवल पूर्व संवैधानिक कानूनों पर लागू होता है न कि संविधानोत्तर कानूनों पर। दीप चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1959) और महेंद्र लाल जैन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1963) मामले में यह विचार न्यायालय द्वारा पुष्टि की गई। |
|
32. गुजरात राज्य बनाम अंबिका मिल्स, ए.आई.आर 1974, एस.सी 1300 |
सर्वोच्च न्यायालय ने दीपचंद वाद, महेंद्र लाल जैन वाद और सगीर अहमद वाद में व्यक्त अपने दृष्टिकोण को समाहित किया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि संविधानोत्तर विधियां जो मौलिक अधिकारों से असंगत हैं, सभी उद्देश्यों के लिए प्रारंभ से शून्य नहीं है। आच्छादन का सिद्धांत संविधानोत्तर विधियों पर भी लागू होता है। |
|
33. आर. एम. डी. सी. बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1957, एस.सी 628 |
उच्चतम न्यायालय ने पृथक्करणीयता के सिद्धांत पर विस्तार से चर्चा की और अभिनिर्धारित किया कि अमान्य भाग हटाने के बाद जो भाग शेष है, वह एक पूर्ण संहिता है तो पूरे अधिनियम को शून्य घोषित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। |
|
34. रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य, ए.आई.आर 1950, एस.सी 124 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि विधि, मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंधों को अधिकृत करती है जो संविधान में दी गई सीमाओं के भीतर और उनके बिना, सभी तरह के प्रतिबंधों को शामिल करने के लिए पर्याप्त है और इन दोनों में अलग करना संभव नहीं है तो संपूर्ण विधि को खत्म कर दिया जाएगा। |
|
35. किहोटा हॉलोहां बनाम जाचिल्लू, ए.आई.आर 1993, एस.सी 412 |
उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि दसवीं अनुसूची पैरा 7 के अलावा अन्य वैध और संवैधानिक है। दसवीं अनुसूची के शेष प्रावधान अपने आप में पूर्ण और व्यवहार्य है। |
|
36. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, ए.आई.आर 1973, एस.सी 1461 |
न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति केवल यह निर्णय करने तक सीमित नहीं है कि क्या विधायी निकायों ने निश्चित विधायी सूचियों की सीमाओं के भीतर अपेक्षित विधियां बनाई हैं या नहीं, परंतु यह आवश्यक है कि क्या विधि संविधान के अनुच्छेदों के अनुसार बनाई गई हैं एवं वे विधियां संविधान के अन्य उपबंधों का उल्लंघन नहीं करतीं। |
|
37. एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1997, एस.सी 1125 |
सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि अनुच्छेद 32 और 226 के तहत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को दी गई न्यायिकं पुनर्विलोकन की शक्ति संविधान की आधारभूत संरचना है और इसे अनुच्छेद 368 के तहत सांविधिक संशोधन के द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता है। |
|
|
|
|
राज्य की अवधारणा (Concept of State) |
|
|
38. यूनिवर्सिटी ऑफ मद्रास बनाम शांताबाई, ए.आई. आर 1954, मद्रास 67 |
मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि 'अन्य प्राधिकारियों' की व्याख्या केवल एजस्डेम जनेरिस (सामान्य प्रकृति) के सिद्धांत का उपयोग करके की जा सकती है। इसलिए, इसका अर्थ केवल सरकारी या संप्रभु कार्यों को करने वाले प्राधिकारी ही हो सकते हैं। |
|
39. राजस्थान इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम मोहनलाल, ए.आई.आर 1967, एस.सी 1857 |
शांताबाई के वाद की व्याख्या को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया और अभिव्यक्ति दी कि 'अन्य प्राधिकारियों' की अभिव्यक्ति इतनी व्यापक है कि वे संविधान या संस्थान द्वारा बनाए गए सभी प्राधिकारियों को शामिल कर सकते हैं जिन पर विधि द्वारा प्राधिकार दिया गया है। यह आवश्यक नहीं है कि प्राधिकारी सरकारी या संप्रभु कार्य करने में लगे हों। |
|
40. सुखदेव सिंह बनाम भगत राम, ए.आई.आर 1975, एस.सी 1331 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि निगम के कृत्य लोक महत्व के हैं और सरकार के कार्यों से निकट से जुड़े हुए हैं तो इसे सरकार का अभिकरण या साधन माना जाना चाहिए (भाग 3 के अंतर्गत 'राज्य' की परिभाषा में)। |
|
41. रामन्ना दयाराम शेट्टी बनाम दी इंटरनेशनल एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया, ए.आई.आर 1979, एस.सी 1628 |
सर्वोच्च न्यायालय ने सुखदेव के मामले में व्यापक परीक्षण किया। न्यायालय ने यह निर्धारित करने के लिए कि क्या कोई निकाय राज्य की एजेंसी है या उपकरण है निम्नलिखित परीक्षण संपादित किए - 1. राज्य के वित्तीय संसाधन निकाय का प्रमुख धन स्रोत हैं। 2. राज्य नियंत्रण का व्यापक एवं गहरा अस्तित्व। 3. निकाय का कार्यात्मक चरित्र भाव में सरकारी हो। 4. सरकार के विभाग को निगम में स्थानांतरित कर दिया गया हो। 5. क्या निगम को एकाधिकार का दर्जा प्राप्त है जो राज्य द्वारा प्रदत्त या राज्य द्वारा संरक्षित हो। |
|
42. अजय हासिया बनाम खालिद मुजीब, ए.आई.आर 1981, एस.सी 487 |
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्धारित किया की सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1898 के तहत पंजीकृत एक सोसायटी राज्य का एक अभिकरण या उपकरण है और इसलिए अनुच्छेद 12 के अर्थ के अंतर्गत एक 'राज्य' है। न्यायालय ने अवधारित किया कि परीक्षण यह नहीं है कि एक विधिक व्यक्ति कैसे बनाया गया है, बल्कि यह है कि वह क्यों अस्तित्व में लाया गया है। |
|
43. नरेश बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए.आई.आर 1967, एस.सी 1 |
सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रश्न पर विचर किया कि क्या न्यायपालिका 'राज्य' शब्द के अंतर्गत आती है या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर कोई निश्चित राय व्यक्त नहीं की। आगे कहा गया कि यदि न्यायालय को 'राज्य' के अर्थ के भीतर माना जाए तो भी किसी उच्च न्यायालय को उसके न्यायिक आदेशों के विरुद्ध अनुच्छेद 32 के अधीन रिट जारी नहीं की जा सकती। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस तरह के न्यायिक आदेशों को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता है। |
|
44. रिजू प्रसाद शर्मा बनाम असम राज्य, (2015) 9 एस. सी. सी. 461 |
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से निर्धारित किया की न्यायिक पक्ष पर काम करते हए अदालतें संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' नहीं हैं। हालांकि न्यायालय पूर्णतया प्रशासनिक ढंग से कार्य करते हैं तो वे अपने प्रशासनिक कार्यों के विरुद्ध रिट की अधिकारिता के अंतर्गत आ सकते हैं। इस प्रकार, स्थिति के इस निर्णय के बाद यह स्पष्ट है कि न्यायिक पक्ष पर काम करने वाली अदालतें 'राज्य' नहीं हैं, लेकिन वे प्रशासनिक क्षमता में कार्य करने पर 'राज्य' के अंतर्गत आ सकते हैं। |
|
|
|
|
मौलिक अधिकार : साधारण (Fundamental Rights: General) |
|
|
45. मेनका गांधी बनाम भारत संघ, (1978) 1 एस.सी.सी 248 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि मौलिक अधिकार भारत की जनता द्वारा संजोए बुनियादी मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे किसी व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करते हैं और ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करते हैं, जिनमें प्रत्येक मानव अपने व्यक्तित्व को पूरी तरह से विकसित कर सकता है। |
|
46. एम. नागराज बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 2007, एस.सी 71 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि संविधान ने मौलिक अधिकारों के अस्तित्व की पुष्टि की है और उन्हें संरक्षण दिया है। कोई भी मनुष्य किसी भी संविधान में कुछ बुनियादी मानव अधिकारों को इस तथ्य के कारण स्वतंत्र रूप से धारण करता है क्योंकि वे मनुष्य है। |
|
47. सिद्धराम सतलिंगप्पा महेत्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2011) 1 एस.सी.सी 694 |
सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मौलिक अधिकार भारत के लोगों द्वारा समृद्ध बुनियादी मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह राज्य के हस्तक्षेप के खिलाफ कुछ निश्चित बुनियादी मानव आधिकारों को सुरक्षित एवं संरक्षित करते है। इसका उद्देय राजनीतिक विसंगतियों के विरुद्ध कुछ निश्चित एवं आवश्यक अधिकारों की पवित्रता (अनुल्लंघनीयता) को सुनिश्चित करना है। |
|
48. बहराम बनाम बॉम्बे राज्य, ए.आई.आर 1955, एस.सी 123;
बशेशर नाथ बनाम इनकम टैक्स कमिश्नर, ए.आई.आर 1959, एस.सी 149 |
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों का त्याग नहीं कर सकता है। यह विकल्प उसके लिए उपलब्ध नहीं है। ये अधिकार न केवल व्यक्तिगत हित के लिए बल्कि पूरे समाज के लाभ के लिए संविधान में समाहित किए गए हैं। |
|
49. रमेश संका बनाम भारत संघ, (2019) 3 एस.सी.सी 589 |
अनुच्छेद 32 के तहत रिट व्यक्तिगत संविदात्मक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सधार्य नहीं है। |
|
|
|
|
समता का अधिकार (Right to Equality) |
|
|
50. सौरभ यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, [M.A. no. 2641 of 2019 of SLP (CIVIL) no.23223 of 2018] |
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार सामान्य/खुली श्रेणी के रिक्त पदों को भी भरने के लिए पात्र है। जस्टिस उदय उमेश ललित, एस रवींद्र भट और ऋषिकेश रॉय की पीठ ने कहा कि खुली श्रेणी में क्षैतिज आरक्षण की रिक्तियों को भरने में भी इस सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए। यह मामला उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा पुलिस कांस्टेबलों के 41,610 पदों को भरने के लिए की गई चयन प्रक्रिया से संबंधित है। [यूपी सिविल पुलिस/प्रोविंसियल आर्मड कांस्टेब्यूलरी (PAC)/ फायरमैन)। सुश्री सोनम तोमर और सुश्री रीता रानी ओबीसी महिला और एससी महिला उम्मीदवार, जिन्होंने चयन प्रक्रिया में भाग लिया था, ने सामान्य श्रेणी की महिला उम्मीदवारों के रिक्त पदों पर उनके दावों पर विचार न करने से नाराज होकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था। दूसरे विचार को अस्वीकार करते हुए पीठ ने कहा, 'दूसरा विचार ऐसी स्थिति की ओर ले जा सकता है कि खुली या सामान्य श्रेणी की सीटों में क्षैतिज आरक्षण के लिए समायोजन करते समय कम मेधावी उम्मीदवारों को समायोजित किया जा सकता है, जैसा कि वर्तमान मामले में हुआ है। कुल मिलाकर, खुली सामान्य महिला वर्ग में अंतिम चयनित उम्मीदवार, जिसे क्षैतिज आरक्षण के जरिए समायोजन करते समय लिया गया है, ने आवेदकों की तुलना में कम अंक प्राप्त किए थे। आवेदकों के दावे को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया गया था कि वे केवल और केवल तभी दावा कर सकते हैं, जब उनके लिए अपनी-अपनी आरक्षित श्रेणियों में समायोजित होने का अवसर या मौका हो।' 'दूसरा दृष्टिकोण, जो क्षैतिज आरक्षण के चरण में एक अलग सिद्धांत अपनाता है, उन स्थितियों को जन्म दे सकता है, आरक्षित श्रेणी के अधिक मेधावी उम्मीदवारों पर, कम कम मेधावी उम्मीदवारों को वरीयता देकर चुना जा सकता है।' सर्वोच्च न्यायालय ने क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर आरक्षण की अवधारणा को इस प्रकार समझाया- 'महिलाओं के लिए प्रदान किया गया कोटा, साथ ही साथ स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों, (डीएफएफ) और पूर्व सैनिकों के आश्रितों को प्रदान किया गया कोटा, वर्तमान मामले में 'क्षैतिज' के रूप में जाना जाता है, जबकि सामाजिक समूहों (एससी, एसटी, ओबीसी) के लिए तय किया गया कोटा 'ऊर्ध्वाधर' के रूप में जाना जाता है। 'इस अंतर शब्दावली के प्रयोग को इस तथ्य से रेखांकित किया जाता है कि बाद का अनुच्छेद 16 (4) में स्पष्ट रूप से स्वीकृत है, जबकि पहले को अनुमेय वर्गीकरण (अनुच्छेद 14, 16 (1)) की एक प्रक्रिया के माध्यम से विकसित किया गया है, हालांकि इस तरह के क्षैतिज आरक्षण अनुच्छेद 15 (3) 14 में अतिरिक्त रूप से स्थित है।' |
|
51. पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार, ए.आई.आर 1952, एस.सी 75 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि 'विधियों के समान संरक्षण' की अभिव्यक्ति 'विधि के समक्ष समानता' का परिणाम है और ऐसी स्थिति की कल्पना करना कठिन है जिसमें विधि के समान संरक्षण का उल्लंघन विधि के समक्ष समता का उल्लंघन नहीं होगा। |
|
52. इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण, ए.आई.आर 1975, एस.सी 2299 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि संविधान के अनुच्छेद 14 में 'समाविष्ट विधि का नियम' संविधान की आधारभूत विशेषता है और उसे संविधान संशोधन द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता। |
|
53. आर.के. गर्ग बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1981, एस.सी 2138 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि अनुच्छेद 14 वर्ग-विधान का निषेध करता है परंतु वह युक्तियुक्त वर्गीकरण को प्रतिबंधित नहीं करता। |
|
54. पश्चिम बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार, ए.आई.आर 1952, एस.सी 75 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि भिन्नता जो वर्गीकरण का आधार है जबकि अधिनियम का उद्देश्य दो अलग अलग बातें हैं। वर्गीकरण और अधिनियम के उद्देश्य के आधार के बीच संबंध होना महत्त्वपूर्ण है। |
|
55. चिरिंजित लाल बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1951, एस.सी 41 |
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि कोई कानून संवैधानिक हो सकता है, भले ही वह विशेष परिस्थितियों के कारण किसी एक व्यक्ति पर लागू होता हो। वह एक व्यक्ति एक वर्ग के रूप में व्यवहृत हो सकता है। संवैधानिकता की प्रकल्पना सदैव कानूनों के पक्ष में होती है और संवैधानिकता को चुनौती देने वाले व्यक्तियों को यह दिखाना होता है कि विधि मनमानी तथा अयुक्तियुक्त है। |
|
56. डी.एस नकारा बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1983, एस.सी 130 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि समाज के कमजोर वर्गों की सहायता के लिए और कानून बनाए रखने के लिए वर्गीकरण का सिद्धांत विकसित किया गया है। |
|
57. इ. पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य, ए.आई.आर 1974, एस.सी 555 |
अनुच्छेद 14 में समानता को परंपरागत अवधारणा बताया गया है जो तर्कसंगत वर्गीकरण पर आधारित है। उच्चतम न्यायालय ने समानता की नई संकल्पना निर्धारित की जो तर्कसंगत वर्गीकरण की पारंपरिक संकल्पना से भित्र है। अनुच्छेद 14 राज्य की कार्रवाई में मनमानेपन पर प्रहार करता है और निष्पक्षता तथा समानता सुनिश्चित करता है। |
|
58. काठी रनिंग रावत बनाम सौराष्ट्र राज्य, ए.आई.आर 1952, एस.सी 123 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि जब कोई विधि अनुच्छेद 15 के निषेध के भीतर आती है तो उसे उचित वर्गीकरण के सिद्धांत का प्रयोग करके अनुच्छेद 14 के आश्रय द्वारा मान्य नहीं किया जा सकता है |
|
59. मद्रास राज्य बनाम चंपाकम दोराईराजन, ए.आई.आर 1951, एस.सी 226 |
उच्चतम न्यायालय ने मद्रास सरकार द्वारा उन सरकारी आदेशों को रद्द कर दिया, जो धर्म, नस्ल और जाति के आधार पर विभित्र समुदायों के लिए राज्य के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीटें आरक्षित करते थे। उच्चतम न्यायालय ने इसको अवैध घोषित कर दिया क्योंकि इसने छात्रों को जाति एवं धर्म के आधार पर वर्गीकृत किया था। |
|
60. बालाजी बनाम मैसूर राज्य, ए.आई.आर 1963, एस.सी 649 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि अनुच्छेद 16(4) प्रावधान केवल नागरिकों के पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने का विवेकाधिकार प्रदान करता है। |
|
61. टी. एम. ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य, ए.आई.आर 2003, एस.सी 355;
पी. ए इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए.आई.आर 2005, एस.सी 3226 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि राज्य निजी तौर पर संचालित शैक्षणिक संस्थाओं और उच्च शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश के लिए सीटों को आरक्षित नहीं कर सकता। |
|
62. अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ, (2008) 6 एस.सी.सी 1 |
इस वाद में 93 वें संविधान संशोधन को चुनौती दी गई। उच्चतम न्यायालय ने 93वें संविधान संशोधन की संवैधानिकता को बरकरार रखा। हालांकि न्यायालय ने कहा कि आरक्षण का लाभ क्रीमीलेयर से संबंधित उम्मीदवारों को नहीं दिया जा सकता है। |
|
63. प्रमती एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 2014, एस.सी 2114 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि असहायता प्राप्त निजी शिक्षा संस्थानों और सहायता प्राप्त निजी शैक्षणिक संस्थानों का वर्गीकरण अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है। |
|
64. बिहार राज्य बनाम चंद्रेश्वर पाठक, ए.आई.आर 2014, एस.सी 3752 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि राज्य सेवाओं के मामले में अवसरों की समानता का अर्थ है कर्मचारियों के एक ही वर्ग के सदस्यों के समक्ष समानता न कि अलग या स्वतंत्र वर्गों के सदस्यों के बीच में समानता। |
|
65. बालाजी बनाम मैसूर राज्य, ए.आई.आर 1963, एस.सी 649 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि व्यक्ति की 'जाति' यह सुनिश्चित करने का एकमात्र परीक्षण नहीं हो सकती कि एक वर्ग पिछड़ा है या नहीं। गरीबी, व्यवसाय आदि अन्य प्रासंगिक कारक हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। परंतु यदि पूरी जाति सामाजिक तथा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए पायी जाती है तो उसे पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल किया जा सकता है। |
|
66. इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1993, एस.सी 477 |
इस वाद में अनुच्छेद 16(4) के क्षेत्र एवं विस्तार और सीमा की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गहन परीक्षण किया गया। न्यायालय के बहुमत की राय इस प्रकार संक्षेप में प्रस्तुत की गई हैः- 1. अनुच्छेद 16(4) में नागरिकों के पिछड़े वर्ग की पहचान जाति के आधार पर की जा सकती है और केवल आर्थिक आधार पर बल्कि केवल जाति के आधार पर विचार करके नहीं हो सकती है। 2. अदालत ने इस आधार पर आरक्षण के आर्थिक मानदंड को उलट दिया क्योंकि वह अनुच्छेद 16(4) में उल्लेखित नहीं है। 3. अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) का अपवाद नहीं है। यह वर्गीकरण का एक उदाहरण है। आरक्षण अनुच्छेद 16(1) के तहत दिया जा सकता है। बालाजी बनाम मैसूर राज्य के अपने निर्णय को न्यायालय ने खारिज कर दिया जिसमें यह अवधारित किया गया था कि अनुच्छेद 16(4) अनुच्छेद 16(1) का भी विचारण नहीं हो सकता। अपवाद है। 4. अनुच्छेद 16(4) में व्याख्यायित पिछड़े वर्ग, अनुच्छेद 15(4) के सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के समान नहीं हैं। यह सामाजिक तथा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों से कहीं अधिक है। हो सकता है कि कुछ वर्ग अनुच्छेद 15(4) के लिए अर्हता प्राप्त न हों लेकिन वे अनुच्छेद 16(4) के लिए अर्ह हो। न्यायालय ने इस वाद के द्वारा बाला जी निर्णय को खारिज कर दिया जिसमें पिछड़े वर्गों के नागरिकों को अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के ही समान माना गया था। 5. क्रीमी लेयर को पिछड़े वर्गों से बाहर रखा जाना चाहिए। 6. अनुच्छेद 16(4) अनुमति देता है कि पिछड़े वर्गों में पिछड़े और अधिक पिछड़े वर्गों का वर्गीकरण किया जा सकता है। 7. आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता। असाधारण स्थितियों में यह देश के दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के पक्ष में शिथिल हो सकता है। 8. अदालत ने देवदासन बनाम भारत संघ (1964) मामले को खारिज कर दिया और कहा कि 'कैरी फॉरवर्ड' नियम वैध है, बशर्ते कि इससे आरक्षण के 50 प्रतिशत नियम का उल्लंघन न हो। 9. न्यायालय ने धारित किया कि अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण पदोन्नति में नहीं दिया जा सकता है। |
|
67. भारत संघ बनाम वीरपाल सिंह, ए.आई.आर 1996, एस.सी 448 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि पदोन्नति के लिए जाति की कसौटी संविधान के अनुच्छेद 16(4) का अतिक्रमण है। आरक्षित एवं सामान्य उम्मीदवारों के बीच वरिष्ठता की गणना उनकी नियुक्ति के समय से उनके पैनल पोजीशन द्वारा की जाएगी। पदोन्नति की गति को बढ़ाने का अर्थ त्वरित एवं परिणामी वरिष्ठता प्रदान करना नहीं है। न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 16 (4) एवं 16(4) सामान्य वर्ग की श्रेणी में अधिकार के रूप में वरिष्ठता को अनिवार्य नहीं करता। |
|
68. जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता, एसएलपी (सिविल) 30621, 2011 |
जनरैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही 12 वर्ष पुराने एम. नागराज बनाम भारत सरकार मामले में दिये गये पूर्ववर्ती फैसले पर सहमति व्यक्त की। सर्वोच्च न्यायालय की तत्कालीन पीठ का मानना था कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि एससी-एसटी को मिलने वाला पूरा लाभ उस वर्ग से संबंधित चुनिंदा सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सशक्त लोगों को न मिले अतः आरक्षण में क्रीमीलेयर की अवधारणा का प्रयोग आवश्यक है। |
|
69. बी.के. पवित्रा बनाम भारत संघ, (2019) 16 एस.सी.सी 129 |
क्रीमीलेयर की अवधारणा परिणामी वरिष्ठता में व्यवहृत नहीं होती। |
|
70. पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1982, एस.सी 1473 |
इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 17 न केवल राज्य के विरुद्ध बल्कि व्यक्तियों के विरुद्ध भी संरक्षण प्रदान करता है। |
|
71. बालाजी राघवन बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1996, एस.सी 770 |
उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि 'राष्ट्रीय पुरस्कार' अनुच्छेद 18 के भीतर उपाधि के समान नहीं होगा। न्यायालय ने यह भी निर्धारित किया कि राष्ट्रीय पुरस्कार प्रत्ययों या उपसर्गों के रूप में प्रयोग नहीं किए जाएंगे। |
|
72. राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 2014, एस.सी 1863 |
इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ट्रांसजेंडर समुदाय को तीसरे लिंग (न तो पुरुष न ही महिला) के रूप में मान्यता दी गई। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि उन्हें सभी मौलिक अधिकार हासिल होने चाहिए जो किसी सामान्य नागरिक को प्राप्त होते हैं। उनके साथ उनकी यौन उन्मुखता, लैंगिक पहचान को लेकर किसी भी भेद-भाव से संरक्षित करना राज्य का दायित्व है। इसके साथ ही न्यायालय ने ट्रांसजेंडरों को विशेष दर्जा देने की भी बात सरकार से कही। |
|
|
|
|
स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedoms) |
|
|
73. अलगापुरम आर. मोहनराज बनाम तमिलनाडु, विधानसभा, ए.आई.आर 2016 एस.सी 867 |
अनुच्छेद 19 के तहत प्रत्याभूत अधिकार केवल नागरिकों के लिए प्राप्य हैं। |
|
74. बेनेट कोलमैन एंड कं. बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1973 एस.सी 106 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 19 (1)(क) के संबंध में शेयरधारकों के अधिकार निगम के माध्यम से शेयरधारकों के स्वामित्व और नियंत्रित समाचार पत्रों द्वारा संरक्षित और अभिव्यक्त किए जाने चाहिये। |
|
75. डी.सी एंड जी.एम बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1983 एस.सी 937 |
उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए कंपनी द्वारा दाखिल रिट याचिका संधार्य है। |
|
76. रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य, ए.आई.आर 1950 एस.सी 124 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी लोकतांत्रिक संगठनों की नींव पर निहित है। स्वतंत्र राजनीतिक बहस के अभाव में सरकार की प्रक्रिया के बारे में सार्वजनिक जागरूकता नहीं लाई जा सकती। |
|
77. इंडियन एक्सप्रेस न्यूज पेपर्स बनाम भारत संघ, (1985) 1 एस.सी.सी 641 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि प्रेस की स्वतंत्रता का अर्थ है प्राधिकारी के हस्तक्षेप से आजादी, जिसका प्रभाव अखबारों की विषय वस्तु एवं उसे प्रकाशित करने पर होगा। |
|
78. बेनेट कोलमैन एंड कं. बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1973 एस.सी 106 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि किसी अखबार द्वारा मुद्रित पृष्ठों की अधिकतम संख्या को निश्चित करना वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है। प्रेस की स्वतंत्रता मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों है। यह संचलन और विषय-वस्तु दोनों में निहित है। |
|
79. एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1958 एस. सी 578 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रेस, कराधान और औद्योगिक अनुप्रयोग के विधियों से मुक्त नहीं है। |
|
80. सकल पेपर्स लिमिटेड बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1962 एस. सी 305 |
वाक एवं अधिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो अधिकार भारत के किसी नागरिक को प्राप्त है, वह प्रेस को भी प्राप्त है। किसी भी प्रेस में पृष्ठों की संख्या को निर्धारित किया जाना एवं न्यूनतम मूल्य के निर्धारण हेतु आदेश देना संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (a) का उल्लंघन है। |
|
81. आर. राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य, (1994) 6 एस.सी.सी 632 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि सरकार का अपने अधिकारियों के विरुद्ध अपमानसूचक सामग्री के प्रकाशन के पहले रोक लगाने का कोई अधिकार नहीं है। |
|
82. देवीदास रामचंद्र तुलजापुरकर बनाम महाराष्ट्र, राज्य, (2015)6 एस.सी.सी. 1 |
अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत ऐतिहासिक रूप से सम्मानित व्यक्तित्वों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का उपयोग कलात्मक स्वतंत्रता, रचनात्मक वैचारिकी या रचनात्मकता के नाम पर अनुमति नहीं दी जा सकती। |
|
83. दमयंती बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1971 एस. सी 966 |
उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संस्था बनाने के अधिकार का अनिवार्य रूप से यह अर्थ है कि संस्था बनाने वाले व्यक्ति को केवल उन्हीं व्यक्तियों से संबद्ध रहने का अधिकार है जिन्हें वे स्वेच्छा से संस्था में स्वीकार करते हैं। कोई विधि जिसके द्वारा स्वैच्छिक संस्था में प्रवेश दिए गए सदस्यों को बिना किसी विकल्प के बाहर कर दिया जाता है या कोई विधि स्वैच्छिक रूप से शामिल होने वाले सदस्यों की सदस्यता हटा लेती है, वह ऐसी विधियां होगी जो संस्था बनाने के अधिकार का उल्लंघन करती है। |
|
84. सोदन सिंह बनाम न्यू दिल्ली म्यूनिसिपल कमेटी, ए.आई.आर. 1989 एस.सी. 1988 |
सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि सड़कों के फुटपाथ पर व्यापार जारी रखना फेरी वालों का मौलिक अधिकार है। हालांकि, यह अधिकार अनुच्छेद 19(6) में वर्णित युक्ति-युक्त प्रतिबंधों के अधीन है। |
|
85. खोडे डिस्टलरीज लिमिटेड बनाम कर्नाटक राज्य, (1995) 1 एस.सी.सी. 574 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि किसी नागरिक को शराब को पेय के रूप में व्यापार या कारोबार करने का कोई अधिकार नहीं है। राज्य के पास यह अधिकार है कि वह चिकित्सकीय उद्देश्यों के अलावा ऐसा करने वाले उत्पादक, बिक्री, उसकी संपत्ति एवं वितरण को प्रतिबंधित कर सकता है। |
|
86. बी.आर. एंटरप्राइज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए.आई.आर. 1999 एस. सी 1867 |
उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि लॉटरी को अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत व्यापार या व्यवसाय के रूप में नहीं लगाया जा सकता है। इसमें संयोग का तत्व निहित होता है और इसलिए यह एक जुए की तरह है। |
|
87. ओमप्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए.आई.आर. 2004 एससी 1896
|
उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि ऋषिकेश की नगरपालिका सीमा में अंडों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना उचित है क्योंकि इसमें युक्तियुक्त प्रतिबंध निहित है। नगर की सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि की दृष्टि से उपयुक्तता का निर्माण किया जाना चाहिए। |
|
88. गोदावत पान मसाला प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2004 एस. सी 4057 |
सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि नाबालिग व्यक्तियों के लिए तंबाकू युक्त पान मसाला और गुटखा पर प्रतिबंध, अनुच्छेद 19 (1)(जी) का उल्लंघन नहीं है। |
|
89. मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ, (2018) 17 एस.सी.सी 324 |
विरोध (प्रदर्शन) करने का अधिकार संविधान के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह अधिकार लोकतंत्र में महत्त्वपूर्ण है जिसका आधार शासन में एक सुविज्ञ नागरिकों की भागीदारी होती है। |
|
90. गुजरात राज्य धनाम मिर्जापुर मोती कुरैशी कसाब जमात, ए.आई.आर. 2006 एस. सी 212
|
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि गायों और बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं के वध पर प्रतिबंध अनुच्छेद 19(1)(जी) का उल्लंघन नहीं है। यह एक युक्ति-युक्त प्रतिबंध है क्योंकि गायें और उसकी संततियां भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही हैं। |
|
91. टी. बराल बनाम हेनरी एन. होए, (1983) 1 एस.सी.सी 177
|
अभियुक्त कार्योत्तर विधियों के तहत लाभकारी प्रावधानों का लाभ उठा सकता है। |
|
92. आंध प्रदेश सरकार बनाम सी. एच. गांधी, ए.आई.आर. 2013 एस. सी 2113
|
अगर कार्योत्तर विधियां (ex-post facto laws) सुधारात्मक है तो भूतलक्षी भी हो सकती है। If expost facto law is ameliorative it may be retrospective. |
|
93. एम.पी. शर्मा बनाम सतीश चन्द्र, ए.आई.आर. 1954 एस. सी 300 |
उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 20 (3) में तीन निम्नलिखित अनिवार्यताएं हैं:- 1. व्यक्ति पर अपराध का अभियोग होना चाहिए। 2. यह प्रावधान साक्षी होने के लिए बाध्यता के खिलाफ एक सुरक्षा है। 3. यह संरक्षण स्वयं के खिलाफ सबूत देने के लिए बाध्यता के खिलाफ है। |
|
94. आर. के. डालमिया बनाम दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन, ए.आई.आर. 1962 एस. सी 1821
|
इस वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा कहा गया कि दो श्रेणियां ऐसी हैं जिसमें व्यक्ति सहभागी न होने पर सहअपराधी हो जाता है- 1. ऐसा व्यक्ति जिसने चोरी की संपत्ति यह जानते हुए प्राप्त की हो कि वह वस्तु चोरी की है। 2. विचाराधीन अभियुक्त के साथ उसी प्रकार के पूर्ववर्ती अपराध में सहयोगी व्यक्ति । एम.पी शर्मा बनाम सतीश चंद्र, ए.आई.आर. 1954 एस. सी 300 एक व्यक्ति जिसका नाम एफ.आई.आर में एक अभियुक्त के रूप में वर्णित है, वह अनुच्छेद 20 के तहत सुरक्षा का दावा कर सकता है। |
|
95. मुंबई राज्य बनाम काठी कालू, ए.आई.आर. 1961 एस. सी 1808
|
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एमपी शर्मा के मामले में दिए गए 'गवाह होने' संबंधी वाक्यांश की व्याख्या बहुत व्यापक है। 'गवाह होना' साक्ष्य प्रस्तुत करने के समतुल्य नहीं है। स्वयं दोषारोपण का अर्थ है केवल जानकारी देने वाले व्यक्ति के व्यक्तिगत ज्ञान के आधार पर सूचना पहुंचाना हो सकता है तथा इसमें दस्तावेजों के निर्माण की यांत्रिक प्रक्रिया या उंगली के निशान या रक्त के नमूने आदि शामिल नहीं हो सकते हैं। |
|
96. नंदिनी सतपथी बनाम पी.एल. दानी, ए.आई.आर. 1977 एस. सी 1025 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि पुलिस पूछताछ के प्रारंभिक चरण से अनुच्छेद 20 (3) का संरक्षण प्राप्य है। |
|
97. सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य, ए.आई.आर. 2010 एस. सी 1974
|
झूठ अनुवेदक परीक्षण (Lie detector tests) केवल अभियुक्त की सहमति से किया जाना चाहिए। यदि अभियुक्त की सहमति प्राप्त नहीं की जाती है तो ऐसे परीक्षण अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन माने जाएंगे। |
|
98. फ्रांसिस कोरोली बनाम केंद्रशासित दिल्ली, ए.आई.आर. 1981 एस. सी 746 |
सर्वोच्च न्यायालय ने अवधारित किया कि जीने का अधिकार केवल पशुओं की तरह अस्तित्व तक ही सीमित नहीं होती है। यह केवल शारीरिक अस्तित्व से कुछ अधिक है। |
|
99. इंडियन होटल एंड रेसटोरेंट्स एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2019)3 एस.सी.सी 429 |
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि महाराष्ट्र में डांस बारों को पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता है। न्यायपीठ ने डांस बारों के लिए लाइसेंस प्राप्त करने के लिए सरकार द्वारा लगाई गई कड़ी शर्तों में भी ढील दी। डांस बार में शराब पेश करने पर पूरी तरह से रोक को न्यायालय ने समाप्त कर दिया। |
|
100. इंडिबिलिटी क्रिएटिव प्राइवेट लिमिटेड और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य, (2019) W.P (civil) no. 306/2019 तारीख 11. 04. 2019 |
सर्वोच्च न्यायालय ने अवधारित किया कि हिंसा के भय से वाक् स्वतंत्रता को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने बंगाली फिल्म 'भविष्योत्तर भूत' के निर्माताओं को 20 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश सरकार को दिया, जिस पर पश्चिम बंगाल सरकार ने 'अनधिकृत प्रतिबंध' लगा दिया था। |
|
|
|
|
प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के विभिन्न पहलू (Various Facts of Right to Life and Liberty) |
|
|
101. ए.के. गोपालन बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1950 एस. सी 27 |
अनुच्छेद 21 में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ भौतिक शरीर की स्वतंत्रता है और कुछ नहीं। विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का अर्थ सम्यक विधि प्रक्रिया नहीं है। विधि का अर्थ है राज्य द्वारा बनाई विधि है और इसका अर्थ यह नहीं है कि इसमें प्राकृतिक न्याय का तत्व निहित होना चाहिए। |
|
102. मेनका गांधी बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1978 एस. सी 597 |
अनुच्छेद 21 में व्यक्तिगत स्वतंत्रता व्यापक आयाम का है और विभिन्न अधिकारों को शामिल करता है। विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया न्यायोचित, न्यायसंगत और युक्तियुक्त होनी चाहिए। विधि का अर्थ इसमें व्यापक प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का तत्व होना भी होता है। |
|
103. न्यायमूर्ति के. एस. पुत्तास्वामी (सेवानिवृत्त) और एक अन्य बनाम भारत संघ और अन्य, ए.आई.आर. 2017 एस. सी 4161 |
निजता का अधिकार :- उच्चतम न्यायालय ने धारित किया की निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और यह अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है। न्यायालय ने एमपी शर्मा और खरक सिंह के मामलों को खारिज कर दिया कि जहां तक निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं माना गया था। न्यायालय ने आगे कहा कि "निजता मनुष्य के गरिमापूर्ण अस्तित्व का अभिन्न अंग है, यह सही है कि संविधान में इसका उल्लेख नहीं है परंतु निजता के अधिकार को संविधान संरक्षण देता है क्योंकि यह जीवन के अधिकार एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का बाई प्रोडक्ट है। निजता का अधिकार, स्वतंत्रता एवं सम्मान के साथ जीने के अन्य मौलिक अधिकारों के सहचर्य में लोकतंत्र को मजबूत बनाएगा। |
|
104. न्यायमूर्ति के. एस. पुत्तास्वामी (सेवानिवृत्त) और एक अन्य बनाम भारत संघ और अन्य, (2019)1 एस.सी.सी 1 |
आधार को संवैधानिक धारित किया गयाः सर्वोच्च न्यायालय ने आधार की संवैधानिक वैधता को पढ़ने और कुछ प्रावधानों को खत्म करने के बाद उसे बरकरार रखा। |
|
105. जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ, (2019) 3 एस.सी.सी 39 |
जारता का अपराध असंवैधानिक हैः सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार दिया। न्यायालय ने धारित किया कि यह महिलाओं के सम्मान के अधिकार का उल्लंघन है और इस तरह यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। |
|
106. नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ, (2019) 3 एस.सी.सी 345 |
समलैंगिकता वैधानिक है उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को असंवैधानिक करार दिया क्योंकि वह सहमति से वयस्कों के बीच कायम समलैंगिकता का अपराधीकरण करती है। |
|
107. पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1982 एस. सी 1473 |
न्यूनतम मजदूरी का भुगतान न करना :- • सर्वोच्च न्यायालय ने यह अवधारित किया कि न्यूनतम मजदूरी का भुगतान न करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। |
|
108. ओलगा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन, ए.आई.आर. 1986 एस. सी 180 |
आजीविका का अधिकारः- उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि जीवन के अधिकार में आजीविका का अधिकार भी समाहित है। |
|
109. चमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1996) 2 एस.सी.सी 549 |
आश्रय का अधिकार :- उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि आश्रय का अधिकार अनुच्छेद 21 के अधीन एक मौलिक अधिकार है। |
|
110. सुचित्रा श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ एडमिनिस्ट्रेशन, ए.आई.आर. 2010 एस. सी 235 |
प्रजनन विकल्प :- उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि प्रजनन संबंधी विकल्प का अधिकार (बच्चा पैदा या न पैदा करने का निर्णय) अनुच्छेद 21 में निहित है। |
|
111. परमानंद कटारा बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1989 एस. सी 2039 |
स्वास्थ्य के अधिकार :- उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि सभी चिकित्सक (प्राइवेट या सरकारी), कानूनी औपचारिकताओं की मांग किए बिना तुरंत घायलों को चिकित्सा सहायता देने के लिए बाध्य हैं। |
|
112. रामलीला मैदान बनाम गृह सचिव, भारत संघ, (2012) 5 एस.सी.सी 1
|
निद्रा का अधिकार :- उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि निद्रा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है क्योंकि यह जैविक तथा जीवन की मूल आवश्यकताओं के लिए अनिवार्य तत्व है। |
|
113. जॉली जॉर्ज वर्गीज बनाम स्टेट बैंक ऑफ कोचीन, ए.आई.आर. 1980 एस. सी 470 |
निर्णीत ऋणी की गिरफ्तारी :- सुप्रीम कोर्ट ने इस वाद में निर्णय दिया कि पर्याप्त साधनों के बावजूद जानबूझ कर असफल न होने वाले ईमानदार ऋणी को गिरफ्तार कर हिरासत में लिया जाना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। कहने का तात्पर्य है कि ऋणी यदि जानबूझकर ऋण न चुकाए तभी उसकी गिरफ्तारी न्यायिक घेरे में आएगी। |
|
114. नीरजा चौधरी बनाम मध्य प्रदेश राज्य, ए.आई.आर. 1984 एस. सी 1099 |
बंधुआ मजदूर :- सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि बंधुआ मजदूरों की पहचान और उन्हें पुनर्वासित किया जाना चाहिए। |
|
115. ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य, (1996) 2 एस.सी.सी 648 |
मरने का अधिकार :- सर्वोच्च न्यायालय का मानना था कि जीवन के अधिकार में मरने का अधिकार शामिल नहीं है। |
|
116. अरुणा रामचंद्र शानबाग बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2011 एस.सी 1290 |
निष्क्रिय इच्छामृत्यु :- सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि कुछ मामलों में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु प्रदान की जा सकती है। |
|
117. नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2014 एस.सी 1863: |
लिंग का आत्म निर्धारण सर्वोच्च न्यायालय ने अवधारित किया कि लिंग का आत्म निर्धारण अनुच्छेद 21 के तहत आश्वस्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। |
|
118. बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2011 एस. सी 3361 |
बाल अधिकार उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि सर्कस में बच्चों का यौन शारीरिक और भावनात्मक दुरूपयोग अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। |
|
119. एम.एच होस्कॉट बनाम महाराष्ट्र राज्य, ए.आई.आर. 1978 एस. सी 1548 |
निशुल्क विधिक सहायता का अधिकार :- उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि निःशुल्क विधिक सहायता का अधिकार प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है। |
|
120. हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य, ए.आई.आर. 1979 एस. सी 1360 |
शीघ्र परीक्षण का अधिकार :- सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि शीघ्र परीक्षण का अधिकार मौलिक अधिकार है और यह अनुच्छेद 21 में निहित है। |
|
121. निर्मल सिंह खलोन बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 2009 एस. सी 984 |
निष्पक्ष जांचः- उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि निष्पक्ष सुनवाई में निष्पक्ष जांच शामिल है। |
|
122. सुनील बत्रा बनाम दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन, ए.आई.आर. 1980 एस. सी 1579 |
परीक्षणाधीन कैदियों को सिद्धदोष कैदियों के साथ रखनाः उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जेल में उन कैदियों को, जिन के मामले परीक्षणाधीन है, सिद्धदोष कैदियों के साथ रखना अनुच्छेद 21 का अतिक्रमण है। |
|
123. प्रेम शंकर बनाम दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन, ए.आई.आर. 1980 एस. सी 1535 |
हथकड़ी लगाने के विरुद्ध संरक्षण उच्चतम न्यायालय निर्धारित किया कि हथकड़ी लगाना प्रथम दृष्टया अमानवीय, मनमानी एवं अनुचित है। हथकड़ी तब लगाना चाहिए जब स्पष्ट और वर्तमान खतरा (clear and present danger) मौजूद हो। |
|
124. किशोर सिंह बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर. 1981 एस. सी 625 |
तृतीय श्रेणी अर्थात क्रूर दंड (third degree) का उपयोग :- उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि पुलिस द्वारा तृतीय श्रेणी अथर्थात क्रूरदंड (third degree) अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। |
|
125. मुरली एस. देवरा बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2002 एस.सी 40 |
सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध :- सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को गैर धूम्रपान करने वालों पर धूम्रपान के प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगाने के आदेश जारी करने का निर्देश दिया। |
|
126. अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया बनाम लक्ष्मा देवी, ए.आई.आर. 1986 एस.सी 467 |
लोक साधारण के समक्ष फांसी :- उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि लोक साधारण के समक्ष फांसी देना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। |
|
127. दीना बनाम भारत संघ, (1983) 4 एस.सी.सी 645 |
फांसी से लटकानाः- उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि रस्सी से लटका कर फांसी देना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं है। |
|
128. टीवी वाथीस्वरण बनाम तमिलनाडु राज्य, ए.आई.आर. 1981 एस.सी 643 |
मौत की सजा के निष्पादन में देरी :-उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि मौत की सजा के निष्पादन में देरी अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। |
|
129. निलबती बेहरा बनाम ओडिशा राज्य, (1993) 2 एस.सी.सी 746 |
अभिरक्षा में यातना/मौत :- सर्वोच्च न्यायालय ने मृतक के परिवार को पिटाई के कारण मरने पर मुआवजा दिलवाया। |
|
130. डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, ए.आई.आर. 1997 एस.सी 610 |
उच्चतम न्यायालय ने गिरफ्तारी और निरोध के मामले में जांच एजेंसियों द्वारा पालन किए जाने हेतु दिशा-निर्देश जारी किया। |
|
131. जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1994) 4 एस.सी.सी 260 |
उच्चतम न्यायालय ने अन्वेषण के दौरान व्यक्तियों की गिरफ्तारी के लिए दिशानिर्देश दिए। |
|
132. रूदल शाह बनाम बिहार राज्य, (1983)4 एस.सी.सी 141 |
अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के लिए मुआवजा : उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि न्यायालयों को अनुच्छेद 21 के समुचित उल्लंघन के मामलों में मुआवजा प्रदान करने की शक्ति है। |
|
133. विशाखा बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर. 1997 एस.सी 3011 |
यौन उत्पीड़न की रोकथाम सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यस्थल पर कार्यरत महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए। |
|
134. रूरल लिटिगेशन एंड इनटाइटलमेंट केंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1985) 2 एस.सी.सी 431;
एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ (Shri ram food fertilizer case), (1986)2 एस.सी.सी 176;
इंडियन काउंसिल फॉर एन्वाय-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ, (1996)3 एस.सी.सी 212;
वेल्लोर सिटीजंस वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ, (1996) 5 एस.सी.सी 650 |
स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार एक मौलिक अधिकार है जो अनुच्छेद 21 में निहित है। साथ ही साथ उच्चतम न्यायालय ने पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के बारे में विभिन्न दिशा निर्देश दिए। |
|
135. मोहिनी जैन बनाम कनर्नाटक राज्य, (1992)3 एस.सी.सी 666 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि हर स्तर पर शिक्षा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है जो अनुच्छेद 21 में निहित। |
|
136. उन्नी कृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, (1993)1 एस.सी.सी 645 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि शिक्षा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है जो अनुच्छेद 21 में निहित है लेकिन निःशुल्क शिक्षा का अधिकार 14 वर्ष की आयु तक के ही बच्चों को उपलब्ध है। इसके बाद शिक्षा प्रदान करने के लिए राज्य का दायित्व आर्थिक क्षमता और विकास का विषय होगा। |
|
137. तमिलनाडु राज्य बनाम के. श्याम सुंदर, (2011) 8 एस.सी.सी 737
|
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि शिक्षा के अधिकार को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक विस्तारित करना चाहिये जो किसी आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव न करता हो। |
|
138. ए.के. रॉय बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1982 एस.सी 710
|
उच्चतम न्यायालय ने निवारक निरोध विधियों के तहत गिरफ्तारी से संबंधित, निम्नलिखित दिशा निर्देश दिएः- 1. निरुद्धि के बाद निरुद्ध व्यक्ति के परिवार के सदस्यों को निरोध और निरोध के स्थान के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। 2. निरुद्ध व्यक्ति को ऐसी जगह निरोध में लेना चाहिए जहां वह आदतन रहता हो। कुछ अपवादिक परिस्थितियों (exceptional situation) में अन्य स्थानों पर नजरबंदी संभव है। 3. निरुद्ध व्यक्ति को पुस्तकों, लेखन सामग्री, स्वयं के भोजन और परिवार और दोस्तों से मिलने का अधिकार होना चाहिए। 4. उसे उन लोगों से अलग रखा जाना चाहिए जो दोषी हैं। 5. दंडात्मक चरित्र का उपचार उसे नहीं मिलना चाहिए। |
|
139. मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ, (2018) 17 एस.सी.सी. 324 |
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत यदि दो अधिकारों में अन्तद्वंद्व होता है तो 'व्यापक जनहित' के परीक्षण की आवश्यकता होगी। तात्पर्य यह है कि व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुए व्यापक हित से संबंधित अधिकार को वरीयता दी जाएगी। |
|
140. के. एस. पुत्तास्वामी बनाम भारत संघ, (Aadhar Case), (2019) 1 एस.सी.सी 1 |
निजता यह सुनिश्चित करती है कि कोई व्यक्ति किसी अवांक्षित हस्तक्षेप से मानव व्यक्तित्व के आंतरिक अवकाश को सुरक्षित करते हुए गरिमामय जीवन का नेतृत्व कर सकता है। किसी व्यक्ति से संबंधित सभी मामले निजता के अधिकार में समाहित करने योग्य नहीं होते हैं। केवल वही मामले अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित होंगे जिन पर निजता की उचित अपेक्षा (Reasonable Expectation) है। मौलिक अधिकार के रूप में निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 तक सीमित नहीं है। यह संविधान के भाग-3 के संपूर्ण भाग पर प्रतिध्वनित होता है। निजता को एक प्राकृतिक अधिकार के रूप में भी मान्यता दी जाती है जो व्यक्ति को विरासत में प्राप्त होती है और इस प्रकार अहस्तांतरित है। निजता की अवधारणा सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों होती है। एक नकारात्मक अवधारणा के रूप में यह राज्य को नागरिकों के व्यक्तिगत स्वतंत्रता के जीवन पर हस्तक्षेप करने से रोकता है। सकारात्मक दायित्व के रूप में यह राज्य पर व्यक्ति की गोपनीयता की रक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करने का दायित्व आरोपित करता है। → उत्तम और न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था वो है, जो गरिमा का सम्मान करती है। गरिमा को सशक्तिकरण और विकास के अधिकार के रूप में माना जाना चाहिए। |
|
|
|
|
शोषण के विरूद्ध अधिकार (Right Against Exploitation) |
|
|
141. पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1982 एस. सी 1943 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि जो व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को न्यूनतम वेतन से कम के लिए श्रम या सेवा प्रदान करता है, वह बंधुआ मजदूरी के ही समान होता है। |
|
142. दीना बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1983 एस. सी 1155
|
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि उचित पारिश्रमिक के बिना कैदियों से लिया गया श्रम अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है। |
|
143. पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1982 एस. सी 1943 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि निर्माण कार्य एक खतरनाक कार्य है और निर्माण उद्योग में बच्चों को रोजगार प्रदान करना अनुच्छेद 24 का उल्लंघन है। |
|
144. एम.सी मेहता बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1997 एस. सी 699 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे किसी भी खतरनाक उद्योग, खानों और अन्य कार्यों में काम नहीं कर सकते। न्यायालय ने इस वाद में बच्चों के आर्थिक, सामाजिक और मानवीय अधिकारों के संरक्षण के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए। |
|
|
|
|
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion) |
|
|
145. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1994 एस. सी 1918 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूल विशेषता है। भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता की सकारात्मक अवधारणा का प्रतीक है। धर्म के मामले में, राज्य तटस्थ है और सभी धर्मों को बराबर मानता है। |
|
146. अरुणा रॉय बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2002 एस. सी 3176 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि विद्यालय में धर्म का अध्ययन संविधान के धर्मनिरपेक्षता के दर्शन के खिलाफ नहीं है। धर्मनिरपेक्षता सकारात्मक अर्थ में लचीला भाव रखती है जैसे विभिन्न धर्मों के प्रति समझ और सम्मान को विकसित करना। |
|
147. इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ, (1994) 6 एस.सी.सी 360 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि प्रार्थना या पूजा करना एक धार्मिक आचरण है, लेकिन हर स्थान पर जहां ऐसी प्रार्थना की जा सकती है वहां यह आवश्यक धार्मिक आचरण नहीं होगा। |
|
148. चर्च ऑफ गॉड (फुल गॉस्पेल) ऑफ इंडिया बनाम के. के.आर.एम.सी. वेलफेयर एसोसिएशन, ए.आई.आर. 2000 एस. सी 2773 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का प्रयोग करते समय किसी भी व्यक्ति को शोर-प्रदूषण या दूसरे की शांति भंग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। लाउडस्पीकरों के माध्यम से धार्मिक प्रार्थना करना किसी भी धर्म का अनिवार्य तत्व नहीं है। |
|
149. एस. पी. मित्तल बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1983 एस. सी 1 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि धार्मिक संप्रदायों को निम्नलिखित आवश्यकताओं को पूरा करना होगाः- 1. यह उन व्यक्तियों का एक संग्रह होना चाहिए जिनके पास विश्वास की एक प्रणाली है जो उनके आध्यात्मिक कल्याण के लिए अनुकूल है। 2. इसमें एक सामन्य संगठन होना अनिवार्य है। 3. इसका एक विशिष्ट नाम से नामित होना अनिवार्य है। |
|
150. इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य, (सबरीमाला मंदिर केस) (2019)11 एस.सी.सी 1 |
धर्म की स्वतंत्रता असीम नहीं है और उसका अन्य अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं से सामंजस्य होना चाहिए तथा वह संवैधानिक नैतिकता के अधीन है। धार्मिक कानूनों के प्रयोजन के लिए देवता एक न्यायवादी व्यक्ति हो सकता है और संपत्ति के अधिकारों पर अधिकार जताने में सक्षम हो सकता है। किंतु, ईश्वर संविधान के भाग 3 (मूलाधिकार) के प्रयोजन से 'व्यक्ति' नहीं है। |
|
|
|
|
संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (Cultural and Educational Rights) |
|
|
151. फ्रैंक एंथनी पब्लिक स्कूल इंप्लॉइज एसोसिएशन बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1987 एस. सी 311 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार देने का विचार उन्हें सुरक्षा और आत्मविश्वास की भावना प्रदान करना है। |
|
152. टी.एम.ए पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य, (2002) 8 एस.सी.सी 481 |
उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित बातें रखीं :- 1. राज्य को भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों के निर्धारण के लिए एक इकाई माना जाता है। 2. राज्य से सहायता प्राप्त संस्थान सरकारी नियमों व विनियमों के अधीन हो सकते हैं। 3. असहायता प्राप्त संस्थानों के संबंध में, सरकार केवल प्रधानाचार्यों एवं शिक्षकों की योग्यता का निर्धारण कर सकती है। 4. बोर्ड या विश्वविद्यालय द्वारा या राज्य द्वारा मान्यता और संबद्धता की शर्तों का अनुपालन किया जाना है। 5. एक सहायता प्राप्त संस्थान को गैर अल्पसंख्यक छात्रों की एक उचित संख्या को प्रवेश देना पड़ेगा। 6. अल्पसंख्यक संस्थानों की अपनी प्रक्रिया तथा प्रवेश पद्धति हो सकती है परंतु यह प्रक्रिया निष्पक्ष तथा पारदर्शी होनी चाहिए। |
|
153. इस्लामिक एकेडमी ऑफ एजुकेशन बनाम कर्नाटक राज्य, (2003) 6 एस.सी.सी 697 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि शिक्षण संस्थानों का अपना शुल्क ढांचा हो सकता है परंतु इसमें मुनाफेखोरी (Profiteering) एवं प्रतिव्यक्ति शुल्क (Capitation Fee) नहीं लगाये जाने चाहिए। |
|
|
|
|
संवैधानिक उपचारों का अधिकार और जनहित याचिका (P.I.L) (Right to Constitutional Remedies and Public Interest Litigation) |
|
|
154. रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य, ए.आई.आर. 1950 एस.सी 124 |
उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों का संरक्षक और प्रत्याभूतिदाता है और वह ऐसे अधिकारों के अतिलंघन से सुरक्षा की मांग करने वाले आवेदनों को स्वीकार करने से इंकार नहीं कर सकता है। |
|
155. प्रेम चंद गर्ग बनाम एक्साइज कमिश्नर, उत्तर प्रदेश, ए.आई.आर. 1963 एस.सी 996 उच्चतम न्यायालय में
|
जाने के मौलिक अधिकार को संविधान द्वारा स्थापित की गई लोकतांत्रिक इमारत की आधारशिला कहा जा सकता है। उसे सौंपे गए कर्तव्यों का निर्वहन करते समय न्यायालयों को चेतना के प्रहरी की भूमिका निभानी होगी और उसे सदा मौलिक अधिकार की तत्परता और जागरूकता से रक्षा का पवित्र कर्त्तव्य निभाना चाहिए। |
|
156. दरियाओ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए.आई.आर. 1961. एस.सी 1457
|
जब मामले को उच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 के अंतर्गत सुन लिया गया है एवं निर्णय दे दिया गया हो तो अनुच्छेद 32 के अंतर्गत रिट पूर्व न्याय के सिद्धांत (res judicata) के अनुसार वर्जित होगी। |
|
157. रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा, ए.आई.आर. 2002 एस.सी 1771
|
न्याय के सकल दुर्वहन को सही करने के लिए जिसे फिर से चुनौती नहीं दी जा सकती है, न्यायालय उपचारात्मक याचिका (curative petition) को अंतिम आदेश की दूसरी समीक्षा की मांग करने की अनुमति देगा। |
|
158. फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन कामगार यूनियन बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1981 एस.सी 344 |
उपयुक्त मामलों में यह आवश्यक हो जाता है कि कानूनी अधिकारों और सामाजिक दायित्वों के बारे में सामाजिक जागरूकता को बदला जाए और कार्रवाई (proceeding) आरंभ करने के लिए 'सुने जाने के अधिकार' (locus standi) के प्रश्न पर विस्तृत दृष्टिकोण अपनाया जाए। |
|
159. ए.बी.एस.के. संघ (Rly) बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1981 एस. सी 298 |
'वर्गीय कार्यवाही' (class action) 'जनहित याचिका' (PIL) या 'प्रतिनिधिक कार्यवाही' (Representative proceedings) के माध्यम से न्याय तक पहुँच संवैधानिक न्यायशास्त्र का हिस्सा है। |
|
160. एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1982 एस. सी 149 |
सार्वजनिक या सामाजिक समूह का कोई भी सदस्य, सद्भावनापूर्वक (bona fide) कार्य करते हुए, उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का आह्वान कर सकता है, जो ऐसे व्यक्तियों के विधिक या संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध निवारण चाहते हैं जो गरीबी या सामाजिक-आर्थिक दिव्यांगता के कारण न्यायालय के पास नहीं जा सकते। |
|
161. उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफल, ए.आई.आर. 2010 एस. सी 2551 |
सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका की पवित्रता बनाए रखने के लिए निम्नलिखित निर्देश जारी किएः- 1. न्यायालयों को वास्तविक सद्भाव से दायर जनहित याचिकाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए और अप्रासंगिक जनहित याचिकाओं को हतोत्साहित करना चाहिए। 2. न्यायलयों को जनहित याचिकाओं को स्वीकार करने पूर्व, प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता की सत्यता को प्रमाणित करने वाले दस्तावेजों की पुष्टि करना चाहिए। 3. न्यायालय को जनहित याचिकाओं को स्वीकार करने के पूर्व, प्रथम दृष्टया याचिका की विषय की सत्यता के संबंध में संतुष्ट होना चाहिए। 4. न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जनहित याचिका में अधिक से अधिक जनहित शामिल हो और उन्हें अन्य याचिकाओं पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। 5. न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जनहित याचिका दायर करने के पीछे कोई व्यक्तिगत लाभ, निजी उद्देश्य अथवा परोक्ष अभिप्राय न हो। 6. न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी व्यस्त निकाय द्वारा दाखिल याचिका अप्रासंगिक या कोई गुप्त उद्देश्य न रखती हो, ऐसा होने पर या तो उचित लागत लगाना चाहिए या फिर इस तरह की तुच्छ याचिकाओं पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। |
|
162. एल. चंद्रकुमार बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1997 एस. सी 1125 |
अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय की अधिकारिता और अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता संविधान की अनुल्लंघनीय बुनियादी संरचना है। |
|
|
|
|
राज्य के नीति के निदेशक तत्व (Directive Principles) |
|
|
163. रणधीर सिंह बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1982 एस. सी 879 |
उच्चतम न्यायालय का निर्णय था कि समान कार्य के लिए समान वेतन का निदेशक सिद्धांत मूल अधिकार नहीं है, परंतु यह एक संवैधानिक लक्ष्य जरूर है, इसलिए इसे अनुच्छेद 32 के माध्यम से लागू किया जा सकता है। |
|
164. मद्रास राज्य बनाम चम्पाकम दोराइराजन, ए.आई.आर. 1951 एस. सी 228 |
सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के बीच द्वंद्व की स्थिति में मौलिक अधिकार प्रभावी होंगे। |
|
165. इन री केरला एजुकेशन बिल, ए.आई.आर. 1957 एस.सी 956 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि यद्यपि नीति निदेशक तत्व मौलिक अधिकारों पर प्रभावी नहीं हो सकते, फिर भी मौलिक अधिकारों के कार्यक्षेत्र और परिधि का निर्धारण करने के लिए न्यायालय नीति निदेशक तत्वों को ध्यान में रख सकता है और सुसंगत सहमति के सिद्धांत (principle of harmonious construction) को अपना सकता है। |
|
166. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, ए.आई.आर. 1973 एस. सी 1461 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि मौलिक अधिकार तथा निदेशक तत्वों का लक्ष्य सामाजिक क्रांति तथा कल्याणकारी राज्य की स्थापना है और उनको एक साथ प्रयोग या व्याख्यायित किया जा सकता है। |
|
167. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1980 एस. सी 1789 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि निदेशक तत्वों पर पूर्ण प्रधानता देने से संविधान का सामंजस्य भंग हो जाता है, जो कि मूल ढांचा है। |
|
|
|
|
कार्यपालिका (Executive) |
|
|
168. यू.एन. राव बनाम इंदिरा गांधी, ए.आई.आर. 1971 एस. सी 1002 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि अनुच्छेद 74(1) अनिवार्य है और राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सहायता तथा सलाह के बिना कार्यपालिकीय शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता है। लोक सभा के विघटन के बाद भी मंत्रिपरिषद के पद की समाप्ति नहीं होती। |
|
169. राम जवाया कपूर बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1955 एस. सी 549 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि राष्ट्रपति कार्यपालिका का औपचारिक एवं संवैधानिक प्रमुख है जबकि वास्तविक कार्यकारी शक्तियां मंत्रिपरिषद में निहित हैं। |
|
170. हरगोविंद बनाम रघुकुल, ए.आई.आर. 1979 एस. सी 1109 |
सुप्रीम कोर्ट ने धारित किया कि राज्य सरकार के राज्यपाल का कार्यालय केंद्र सरकार के तहत एक रोजगार नहीं है। यह एक स्वतंत्र संवैधानिक कार्यालय है और केंद्र सरकार के नियंत्रण या अधीनस्थता के तहत नहीं है। |
|
171. राम जवाया कपूर बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1955 एस. सी 549 |
साधारणतया कार्यपालिकीय शक्ति विधायी एवं न्यायिक कार्यों के बाद सरकारी कार्यों के अवशेष नहीं हो सकते। कार्यपालिका-शक्ति पहले से अधिनियमित कानूनों के प्रशासन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सरकारी नीतियों का निर्धारण, कानून-व्यवस्था का अनुरक्षण, विदेश नीति आदि शामिल हैं। |
|
172. शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर. 1974 एस. सी 2192 |
जब भी संविधान को राष्ट्रपति या राज्यपाल की सहमति की आवश्यकता होती है, यह उनकी व्यक्तिगत सहमति नहीं है। यह आम तौर पर राष्ट्रपति या राज्यपाल की सहायता और सलाह देने वाली मंत्रिपरिषद की सहमति होती है। |
|
173. यू.एन. राव बनाम इंदिरा गांधी, ए.आई.आर. 1971 एस. सी 1002 |
अनुच्छेद 74 (1) अनिवार्य है, इसलिए, राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के बिना कार्यकारी शक्ति का उपयोग नहीं कर सकते। मंत्रिमंडल अनुच्छेद 74(1) के अंतर्गत तब भी अनिवार्य है जब लोकसभा का कार्यकाल खत्म हो गया हो या उसका विघटन हो गया हो। |
|
174. एस.पी आनंद बनाम एचडी देवे गौड़ा, (1966)6 एससीसी 734 |
अनुच्छेद 75(5) राष्ट्रपति को एक ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति की अनुमति देता है जो मंत्री (प्रधानमंत्री सहित) के रूप में संसद के किसी भी सदन का सदस्य न हो, लोक सभा के सदस्यों के बहुमत के समर्थन की संभावना रखता हो। |
|
175. बी.पी सिंघल बनाम भारत संघ, (2010) 6 एससीसी 331 |
गवर्नरों को मनमाने ढंग से इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि केंद्र सरकार ने उन पर विश्वास खो दिया है और वे उसकी नीतियों और विचारधाराओं से सहमत नहीं हैं। |
|
176. रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2006 एस. सी 980 |
अनुच्छेद 163(1) में 'अपेक्षित' शब्द इस बात का प्रतीक है कि राज्यपाल अपनी विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग तभी कर सकता है जब ऐसा करने की अनिवार्य आवश्यकता हो। राज्यपाल अपने विवेक का प्रयोग करके ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता था जिसे करने के लिए निषिद्ध किया गया हो। न्यायालय के पास यह अधिकार है कि वह उनके कार्यों की वैधता की जांच कर सके। जब यह कार्य दुर्भावनापूर्ण (mala fide) ढंग से संपादित किये जायें। |
|
177. केहर सिंह बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1989 एस. सी 653 |
क्षमा, अनुग्रह का कार्य है और इसकी मांग एक अधिकार के रूप में नहीं की जा सकती। राष्ट्रपति को अपने आदेश के लिए कारण स्पष्ट करने के लिए नहीं कहा जा सकता है। |
|
178. एप्रू सुधाकर बनाम आंध्र प्रदेश सरकार, ए.आई.आर. 2006 एस. सी 3385 |
क्षमादान का अधिकार सीमित आधारों, जैसे बुद्धि/विवेक का ठीक से इस्तेमाल न करना, दुर्भावना, मनमानेपन एवं अर्संगत विचार आदि पर न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत आता है। क्षमादान की शक्ति का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। |
|
179. केहर सिंह बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1989 एस. सी 653, |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि क्षमा करने की शक्ति का प्रयोग करते समय राष्ट्रपति लिखित साक्ष्य की संवीक्षा कर सकते है और एक अलग निष्कर्ष पर पहुंच सकते है। ऐसा करते समय, राष्ट्रपति न्यायिक अभिलेखों का संशोधन या अवहेलना नहीं करते है। दया के लिए याचिकाकर्ता को राष्ट्रपति द्वारा मौखिक सुनवाई का कोई अधिकार नहीं है। |
|
180. एप्रू सुधाकर बनाम आंध्र प्रदेश सरकार, ए.आई.आर. 2006 एस. सी 3385 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि अनुच्छेद 72 के अधीन राष्ट्रपति की और अनुच्छेद 161 के अधीन राज्यपाल की क्षमादान शक्तियां न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं। जाति और राजनीतिक कारणों के आधार पर क्षमादान का प्रयोग नहीं किया जा सकता। |
|
181. शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ, (2014)3 एससीसी 1 |
मृत्युदंड के दोषियों की दया याचिका की अस्वीकृति में देरी को 'यातना' (torture) रूप में माना जाता है और यह अपने आप में मौत की सजा को उम्रकैद की सजा देने के लिए पर्याप्त आधार है। |
|
|
|
|
विधान मंडल (Legislature) |
|
|
182. डी.सी वाधवा बनाम बिहार राज्य, (1987) 1 एससीसी 378 |
इस बाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कहा गया कि अध्यादेशों की भाषा को बदले बिना तथा विधानसभा द्वारा विधेयक पारित करने का प्रयास न करके अध्यादेशों का पुनः प्रकाशन करना संविधान का उल्लंघन है तथा इस प्रकार के पुनः प्रकाशित अध्यादेश रद्द होने चाहिए। इसके अतिरिक्त अध्यादेश द्वारा विधि बनाने की वैकल्पिक शक्ति (यानी अध्यादेश) को राज्य विधायिका की विधायी शक्ति का विकल्प नहीं बनाना चाहिये। इस बाद में बिहार सरकार द्वारा 256 अध्यादेशों के पुनः प्रकाशन के बाद इसको संवैधानिक प्रक्रिया के विरुद्ध माना था। |
|
183. एस.पी आनंद बनाम एचडी देवे गौड़ा, ए.आई.आर. 1997 एस. सी 272 |
उच्चतम न्यायालय द्वारा यह निर्णय दिया गया कि कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन की सदस्यता के बिना मंत्रिपद पर प्रधानमंत्री द्वारा 6 माह के लिए नियुक्त हो सकता है। |
|
184. लिली थॉमस बनाम भारत संघ, (2013) 7 एससीसी 653 |
चंसद एवं विधानसभा के सिद्धदोष सदस्यों को अपील के लिए तीन माह का समय दिए बिना तत्काल प्रभाव से सदन की सदस्यता बनाए रखने से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। |
|
185. आर.के. गर्ग बनाम भारत संघ, (1981)4 एससीसी 675 |
अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति तब होती है जब संसद के दोनों सदनों का अधिवेशन न हो। यह आपात स्थितियों के लिए किया गया प्रबंध है जो कार्यपालिकीय दायित्थों में सहायक हो सके। किसी अध्यादेश का प्रख्यापन संसद की विधि बनाने की शक्ति के अनुसार होता है और राष्ट्रपति एक अध्यादेश जारी नहीं कर सकता जिसे संसव विधि के रूप में अधिनियमित न करती हो। |
|
186. बी. आर कपूर बनाम तमिल नाडु राज्य, (2001)(6) SCALE 309 |
किसी मंत्री को विधान सभा का सदस्य होना चाहिए और इस प्रकार राज्य की जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। किसी गैर-सदस्य के पास अनुच्छेद 173 में निहित अहर्ता नहीं है या अनुच्छेद 191 के अधीन अयोग्य करार दिया गया है, तो उसे मुख्यमंत्री नहीं नियुक्त किया जा सकता। |
|
187. पी.वी नरसिम्हा राव बनाम राज्य, ए.आई.आर. 1998 एस.सी 2120 |
संसद सदस्यों के लिए उन्मुक्ति के संरक्षण का क्षेत्र काफी व्यापक है और यह केवल न्यायिक कार्रवाइयों के विरुद्ध ही सीमित नहीं है बल्कि उन्हें सभी प्रकार की कार्रवाई और दांडिक कार्रवाइयों या उनके द्वारा दिए गए किसी बात या दिए गए किसी मत के विरुद्ध उपलब्ध है। इस संरक्षण का उद्देश्य यह है कि सदस्य संसद में निर्बाध रूप से और निर्भीकता से अपने विचार व्यक्त कर सके। |
|
188. इन री केशव सिंह, ए.आई.आर. 1965 एस. सी 745 |
यदि अनुच्छेद 194 के अधीन प्रावधानों और मौलिक अधिकारों से संबंधित उपबंधों के बीच टकराव होता है तो सुसंगत निर्माण (harmonious construction) के नियम को अपनाकर उक्त संघर्ष के समाधान का प्रयास किया जाएगा। अनुच्छेद 194 और 105 अनुच्छेद 21 और 22 के अधीन प्रत्याभूत मौलिक अधिकारों के अधीन हैं। |
|
189. जया बच्चन बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 2006 एस. सी 2119 |
'लाभ का पद' एक ऐसा पद होता है, जो लाभ या आर्थिक लाभ देने में सक्षम होता है। भुगतान की प्रकृति को प्रपत्र के बजाय धन संपत्ति से संबंधित समझा जाना चाहिये। 'मानदेय' शब्द का मात्र उपयोग भुगतान को लाभ के दायरे से बाहर नहीं ले जाएगा। |
|
|
|
|
न्याय-पालिका (Judiciary) |
|
|
190. भारत संघ बनाम सांकलचंद सेठ, ए.आई.आर. 1977 एस.सी 2328 |
उच्चतम न्यायालय का निर्णय था कि 'परामर्श' (consultation) का अर्थ पूर्ण और प्रभावी परामर्श है। इसका अर्थ 'सहमति' नहीं है और राष्ट्रपति ऐसे परामर्श से बंधे नहीं है। |
|
191. एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1982 एस.सी 149 |
यह वाद (1st जजेस केस या जजेस ट्रांसफर केस के नाम से भी जाना जाता है) सर्वोच्च न्यायालय ने सांकलचंद के मामले के निर्णय से सहमति व्यक्त की। इसका तात्पर्य था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिकीय सर्वोच्चता से था। |
|
192. एस. सी. एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ, (1993)4 एससीसी 441 |
यह वाद (2nd जजेस केस के नाम से भी जाना जाता है) सर्वोच्च न्यायालय ने एस.पी. गुप्ता वाद के फैसले को पलट दिया। न्यायालय का निर्णय था कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश 'को प्रधानता दी जानी चाहिए। |
|
193. इन री-प्रेसिडेंशियल रेफरेंस, ए.आई.आर. 1999 एस.सी 1 |
यह वाद (3rd जजेस केस के नाम से भी जाना जाता है) उच्चतम न्यायालय का निर्णय था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा अपनाई जाने वाले परामर्श प्रक्रिया के लिए न्यायाधीशों के बहुमत के परामर्श की आवश्यकता होगी। |
|
194. सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ, (2015) ए.आई.आर. एससीडब्ल्यू 5457 |
उच्चतम न्यायालय ने 99वां संविधान संशोधन एवं एनजेएसी अधिनियम, (NJAC Act), 2014 दोनों को असंवैधानिक तथा अमान्य घोषित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, कोलेजियम प्रणाली फिर से प्रभावी हो गई। |
|
195. इन री केरला एजुकेशन बिल, ए.आई.आर. 1958 एस. सी 956 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि न्यायालय राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई सलाह को देने के लिए बाध्य नहीं है। |
|
196. राजेश्वर सिंह बनाम सुब्रतो रॉय सहारा, ए.आई.आर. 2014 एस. सी 476 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि अनुच्छेद 129 के अधीन उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के उपबंधों से स्वतंत्र है। |
|
197. दिल्ली जुडिशियल सर्विस एसोसिएशन बनाम गुजरात राज्य, (1991)4 एससीसी 406 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि अनुच्छेद 129 के अधीन उच्चतम न्यायालय स्वयं की तथा अपने अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना करने के लिए किसी व्यक्ति को दंड देने की शक्ति रखता है। |
|
198. बंगाल इम्यूनिटी बनाम बिहार राज्य, ए.आई.आर. 1955 एस. सी 661 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि उच्चतम न्यायालय अपने पूर्व निर्णयों से भिन्न राय रख सकता है अर्थात् अपने विनिश्चयों से आबद्ध नहीं है। अभिव्यक्ति 'भारतीय क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालय', से तात्पर्य सर्वोच्च न्यायालय को छोड़कर सभी न्यायालयों से है। इसलिए उच्चतम न्यायालय अपने निर्णय से बंधा नहीं है और उचित स्थिति में वह इसे पलट सकता है। |
|
199. झारखंड राज्य बनाम सुरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, (2019) 4 एससीसी 214 |
न्यायिक आदेशों को चुनौती देने वाले अनुच्छेद 227 के अधीन रिट याचिका पोषणीय है, लेकिन अनुच्छेद 226 के अधीन नहीं। उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने आदेश में दोहराया गया कि दीवानी न्यायालयों द्वारा पारित न्यायिक आदेशों के विरुद्ध उत्प्रेषण रिट (writ of certiorari) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत पोषणीय नहीं है। |
|
200. राजेन्द्र दीवान बनाम प्रदीप कुमार रानीबालों, सिविल अपील नं. 3613 ऑफ 2016, 10.2.2019 को निर्णीत |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि राज्य विधानमंडल ऐसे कानून को लागू नहीं कर सकते जो सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता को प्रभावित करे। |
|
201. अनिल कुमार बनाम भारत संघ और अन्य, (2019) 4 एससीसी 276 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि कोई प्राधिकरण सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का पालन न करने के विशेषाधिकार का दावा नहीं कर सकता। |
|
202. रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा, ए.आई.आर. 2002 एस. सी 1771 |
अनुच्छेद 137 के तहत समीक्षा याचिका की बर्खास्तगी के बाद जो निर्णय अंतिम हो गया है, उसकी समीक्षा करते हुए उच्चतम न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति के तहत एक उपचारात्मक याचिका दायर की जा सकती है। |
|
|
|
|
विधायी संबंध (Legislative Relations) |
|
|
203. एच. वाडिया बनाम कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स, ए.आई.आर. 1949 एफ. सी 18 । |
राज्य विधानसभा अधिकारातीत विधियों (extra territorial laws) को नहीं बना सकती है, सिवाय जब तक राज्य और कानून के विषय-वस्तु के बीच पर्याप्त संबंध ना हो |
|
204. बॉम्बे राज्य बनाम आरएमडीसी, ए.आई.आर. 1957 एस. सी 699 |
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अधिकारातीत कानून को केवल तभी न्यायोचित ठहराया जा सकता है जब प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्य और राज्य द्वारा उन्हें प्राप्त करने के प्रयत्न के बीच पर्याप्त संबंध हो। संबंध वास्तविक होना चाहिए न कि भ्रामक। |
|
205. जावेद बनाम हरियाणा राज्य, ए.आई.आर. 2003 एस. सी 3057 |
सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि संविधान केंद्र और राज्यों को उनके संबंधित क्षेत्रों में स्वायत्तता प्रदान करता है। किसी एक राज्य के विधान को उसके नागरिकों के विरूद्ध भेदभावपूर्ण व्यवहार करना नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि संसद या अन्य राज्य की विधासभाएं समान कानून लागू करने के लिए नहीं चुनी गईं हैं। |
|
206. आर.डी जोशी बनाम अजीत मिल्स, ए.आई.आर. 1977 एस. सी 2279 |
सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि सूची में प्रविष्टियों को सभी अनुषंगी और समनुषंगी शक्तियों को लागू करने के लिए व्यापक अर्थ दिया जाना चाहिए। न्यायलय ने धारित किया कि सामाजिक कानून लागू करने के लिए दंडात्मक उपाय समनुषंगी उपाय हैं। |
|
207. प्रफुल्ल कुमार बनाम बैंक ऑफ कॉमर्स, खुलना, ए.आई.आर. 1947 पी. सी 60 |
न्यायालय ने धारित किया कि संघ और राज्य विधानमंडलों की विधायी शक्तियों के बीच स्पष्ट भेद संभव नहीं है। वे एक-दूसरे से अतिव्याप्त (overlap) है। अधिनियम के तत्व और सार को सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय को इस पर विचार करना चाहिएः- 1. अधिनियम का उद्देश्य, 2. अधिनियम का क्षेत्र 3. समूल प्रभाव |
|
208. बॉम्बे राज्य बनाम एफ.एन बलसारा, ए.आई.आर. 1951 एस. सी 318 |
न्यायालय ने बंबई प्रतिषेध अधिनियम (bombay prohibition act) को वैध ठहराया क्योंकि अधिनियम का सार और तत्व संघ सूची में संयोगवश अतिक्रमण किए जाने के बावजूद राज्य सूची में आ गया था। |
|
209. के.सी.जी नारायण देव बनाम ओडिशा राज्य, ए.आई.आर. 1953 एस. सी 375 |
छद्म विधायन (colourable legislation) का अर्थ है कि यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से विधानमंडल, शक्तियों की सीमाओं के भीतर कार्य करके कथित कानून पारित करते हुए इन शक्तियों का उल्लंघन किया था। अतिक्रमण प्रच्छन्न या अप्रत्यक्ष है। |
|
210. जी.वी.के. इंडस्ट्रीज बनाम इनकम टैक्स ऑफिसर, (2011) 4 एस.सी.सी 36 |
राज्य क्षेत्रातीत पहलुओं या कारणों के संबंध में संसद द्वारा अधिनियमित किसी भी कानून का भारत के साथ या उस पर कोई प्रभाव नहीं है जो संविधान के अनुच्छेद के लिए अधिकरातीत (ultra vires) होगा। |
|
211. जावेद बनाम हरियाणा राज्य, जेटी 2003 (6) एस.सी. 283 ए.आई.आर. 2003 एस. सी 3057 |
किसी एक राज्य को उसके नागरिकों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण करना या शत्रुतापूर्ण व्यवहार के वशीभूत होकर किया गया कृत्य नहीं कहा जा सकता क्योंकि उस संसद/राज्य विधानसभाओं को अन्य राज्यों की विधियों को समान कानून लागू करने के लिए नहीं चुना गया था। |
|
212. के.सी गजपति नारायण देव बनाम ओडिशा राज्य, ए.आई.आर. 1956 एस. सी 375 |
छद्म विधायन (colourable legislation) का पूरा सिद्धांत इस सूक्ति पर आधारित है कि आप अप्रत्यक्ष रूप से वह नहीं कर सकते जो आप सीधे नहीं कर सकते हैं (you cannot do indirectly what you can not do directly)। इस सिद्धांत में उद्देश्य सामर्थ्य का अर्थ है और विधायिका के इरादे, अशिष्टता या दुर्भावना के उल्लेख के लिए नहीं है। |
|
|
|
|
व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता (Freedom of Trade and Commerce) |
|
|
213. बॉम्बे राज्य बनाम आर.एम.डी.सी, ए.आई.आर. 1957 एस. सी 699 |
यह अभिनिर्धारित किया गया कि अनुच्छेद 301 के तहत दी गई सुरक्षा वैध व्यापारिक गतिविधि के लिए उपलब्ध है और न कि उन गतिविधियों के लिए जो वाणिज्य से बाहर (res extra commercium) है। |
|
214. ऑटोमोबाइल ट्रांसपोर्ट लिमिटेड बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर. 1962 एस. सी 1406 |
उच्चतम न्यायालय ने विनियमात्मक और प्रतिकारात्मक करों (regulatory and compensatory taxes) की अवधारणा को मान्यता दी और कहा कि प्रतिकारात्मक कर अनुच्छेद 301 के दायरे से बाहर हैं। व्यापारिक सुविधाओं के उपयोग के लिए प्रतिकारात्मक करों को लागू करने वाले नियामक उपाय अनुच्छेद 301 के अधीन परिचारित प्रतिबंध के दायरे में नहीं आते हैं और ऐसे उपायों के लिए अनुच्छेद 304 (ख) की आवश्यकताओं का अनुपालन करने की आवश्यकता नहीं है। |
|
|
|
|
आपातकाल (Emergency) |
|
|
215. ए.डी.एम, जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला, ए.आई.आर 1976 एस.सी 1207 |
इस वाद को आमतौर पर 'हैबियस कापर्स' वाद के नाम से जाना जाता है। इसमें अदालत ने कहा कि आपातकाल की उद्घोषणा के बाद अनुच्छेद 21 के द्वारा प्रदत्त मूलाधिकार भी निलंबित हो जाता है एवं किसी भी व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष सुने जाने के अधिकार (locas standi) के तहत याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है। विदित हो कि 44वें संविधान संशोधन के द्वारा 1978 में यह प्रावधान किया गया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित अनुच्छेद 21 को आपातकाल के दौरान भी विलंबित नहीं किया जा सकता। |
|
216. मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1980 एस.सी 1789 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि आपातकाल की घोषणा की वैधता की न्यायिक समीक्षा पर कोई रोक नहीं है। किंतु न्यायालय की शक्ति इस बात की जांच करने तक सीमित है कि संविधान द्वारा प्रदत्त सीमाओं का पालन किया गया है या नहीं। यदि राष्ट्रपति की सहमति अर्थहीन, असद्भावी या अनुचित है तो उसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। |
|
217. एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ, (1994) 3 एस.सी.सी 1 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि यदि याचिका में असद्भावी (mala fide) आरोप लगाए गए हैं तो राष्ट्रपति की उद्घोषणा की न्यायिक समीक्षा की अनुमति प्राप्त है। न्यायालय ने निम्नलिखित दिशा-निर्देश दियेः- 1. राज्य विधान सभा की उद्घोषणा न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे में आती है। 2. राष्ट्रपति शासन को राजनैतिक मीमांसा (consideration) के आधार पर नहीं लगाया जा सकता। 3. राष्ट्रपति शासन लागू करने और राज्य विधानसभा के विघटन को एक साथ नहीं किया जा सकता है, 4. राज्य विधानसभा का विघटन संसद की घोषणा के पश्चात् ही किया जा सकता है। 5. भौतिक परिस्थितियों का अस्तित्व (existence of materials) राष्ट्रपति शासन के लागू होने से संतुष्ट होने के लिए पूर्व शर्त है। |
|
218. रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ, (2006)2 एस.सी.सी 1 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि विधानसभा के विघटन की सिफारिश करते हुए राज्यपाल को अपने फैसले में प्रासंगिक सामग्रियों की रिपोर्ट को संलग्न करना होगा। प्रासंगिक सामग्री की अनुपस्थिति में इसे राज्यपाल की व्यक्तिगत राय के रूप में माना जाएगा। |
|
|
|
|
संशोधन (Amendment) |
|
|
219. शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1951 एस.सी 458 |
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ के वाद में 1952 में सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि संसद निर्धारित प्रक्रिया द्वारा मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है। न्यायालय के अनुसार, अनुच्छेद 13 में प्रयुक्त 'विधि' शब्द के अंतर्गत केवल वे विधियां आती हैं, जो सामान्य विधायी शक्ति के प्रयोग द्वारा बनाई जाती हैं, न कि संविधान संशोधन की संविधायी शक्ति द्वारा पारित किए जाते हैं। |
|
220. सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य के वाद (1965) में |
न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णय को पुष्ट किया। न्यायालय ने कहा कि यदि संविधान निर्मातागण मूल अधिकारों को संशोधन से परे रखना चाहते होते, तो निश्चित ही उन्होंने इस बारे में संविधान में स्पष्ट उपबंध किया होता। |
|
221. सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य, ए.आई.आर 1965 एस.सी 845 |
बाद में उच्चतम न्यायालय ने शंकरी प्रसाद के मामले को बहुमत को मान्यता दी और कहा कि 'संविधान संशोधन' का अर्थ है संविधान के सभी भागों में संशोधन। |
|
222. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य, ए.आई.आर 1967 एस.सी 1643 |
सर्वोच्च न्यायालय ने शंकरी प्रसाद और सज्जन सिंह के मामले में दिए गए अपने पूर्व निर्णय को पलट दिया। न्यायालय ने आगे धारित किया कि संविधान के भाग 3 में संशोधन करने की संसद के पास कोई शक्ति नहीं है कि वह मौलिक अधिकारों को छीन ले या उनका अतिक्रमण कर सके। इस वाद में न्यायालय ने मूलाधिकारों को नैसर्गिक अधिकार घोषित किया। न्यायालय ने कहा कि संसद मूलाधिकारों में ऐसा कोई संशोधन नहीं कर सकती जो भांग-3 में प्रदत्त अधिकारों को छीनती या न्यून करती हो। |
|
223. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, ए.आई.आर 1973 एस.सी 1461 |
24वें संविधान संशोधन की वैधता को चुनौती दी गई और उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन तो कर सकती है परंतु संविधान के मूल ढांचे में संशोधन नहीं कर सकती है। |
|
224. मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ (1980) 1980 ए.आई.आर एस.सी 1784 |
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ के वाद में न्यायालय ने केशवानंद भारती वाद के निर्णय को पुष्ट किया। वर्तमान स्थिति भी यही है कि संसद संविधान के किसी भी उपबंध में संशोधन कर सकती है परंतु इससे संविधान के आधारभूत ढांचे पर कोई सकारात्मक असर न पड़े। |
|
225. आई.आर कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य, ए.आई.आर 2007 एस.सी 861 |
उच्चतम न्यायालय का निर्णय था कि 24 अप्रैल, 1974 के बाद संविधान की 9वीं अनुसूची में रखी गई किसी विधि को न्यायालय में इस आधार पर चुनौती देना संभव होगा कि वह संविधान के मूल ढांचे को नष्ट कर देगी। |
|
|
|
|
प्रकीर्ण (Miscellaneous) |
|
|
226. राम शरण मौर्य और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, अपील नं. 3707 of 2020 |
संविधान के अनुच्छेद 21 ए की गारंटी के अनुसार दी गई शिक्षा के सिविल अधिकार में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की परिकल्पना की जाएगी, जो बदले में यह दर्शाती है कि शिक्षक योग्य तथा सर्वश्रेष्ठ होने चाहिए। |
|
227. सुनील राठी बनाम हरियाणा राज्य, 2020 एस. सी. सी. ऑनलाइन एस. सी. 594 |
संविधान का अनुच्छेद 1'39क उच्चतम न्यायालय को यह अधिकारिता देता है कि वह किसी उच्च न्यायालय में निम्नलिखत दो शर्तों के अधीन लंबित मामले को अंतरित या वापस किए जाने का निर्देश दे सकता है-उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित मामले में, शामिल विधि के प्रश्न समान या काफी हद तक समान होने चाहिए, जो कि उच्च न्यायालय में मामले में शामिल हो, जिनकी वापसी के लिए कहा जा सकता है; उच्चतम न्यायालय, संविधान के अनुच्छेद 139क के तहत इसमें निहित अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते समय इस बात से समाधान होना चाहिए कि ऐसे प्रश्न सामान्य महत्त्व के सारभूत प्रश्न हैं। इस तरह का समाधान महान्यायवादी द्वारा दिए गए आवेदन पर या ऐसे किसी मामले में किसी पक्ष द्वारा किए गए आवेदन के आधार पर, या उच्चतम न्यायालय के अपने प्रेरणा पर हो सकता है। इन शर्तों के संतुष्ट होने पर, यह न्यायालय अपने विवेकाधिकार का उपयोग करके या उसी के मामले का स्वयं निपटारा करने में निर्देश दे सकती है। इस तरह के विवेक का प्रयोग किस तरीके से किया जाएगा वह अलग-अलग मामले में अलग-अलग होगा। |
|
228. कंटारू राजीवरु बनाम इंडियन यंग लॉयर एसोसिएशन, 2020 एस.सी.सी. ऑनलाइन एस. सी. 158 |
उच्चतम न्यायालय ने सबरीमाला मामले के संदर्भ में सुनवाई करते समय निर्णय दिया कि उच्चतम न्यायालय पुनर्विलोकन अधिकारिता का प्रयोग करते समय, विधि के प्रश्नों को एक बृहद पीठ को सन्दर्भित कर सकता है। |
|
229. विद्या देवी बनाम स्टेट ऑफ एच.पी. एवं अन्य, |
सिविल अपील सं. 60-61 वर्ष 2020 (वर्ष 2020 की वि. अ. या. (सि.) सं. 467-468 से प्रौदभूत) निर्णीत तिथि 8 जनवरी, 2020 मूल अधिकार के अंग पर आधारित विलंब का मर्षण न्यायिक विवेकाधिकार का मामला है जिसका प्रयोग मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों में न्यायिक एवं युक्ति-युक्त रूप से किया जाना चाहिए। यह मूल अधिकार के अंग एवं दावाकृत उपचार एवं विलंब कब और कैसे हुआ था, पर आधारित होगा। न्यायालय द्वारा सारभूत न्याय करने एवं उनकी संवैधानिक अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए कोई परिसीमा अवधि विहित नहीं है। |
|
230. प्यारे लाल बनाम हरियाणा राज्य, दाण्डिक अपील सं. 1003 वर्ष 2017, 17 जुलाई, 2020 |
सुसंगत सामग्री राज्यपाल के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 161 के अधीन शक्ति का प्रयोग करने के लिए उसे समर्थ बनाने के लिए पेश किया जाना चाहिए और उस कारण असफलता का परिणाम संविधान के अनुच्छेद 161 के अधीन जारी किए गए परिहार के संबद्ध आदेशों को विखंडित करने में हो सकता था। शक्ति का प्रयोग सम्बद्ध मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए और मामले के तथ्यों और सामग्री पर आधरित होना चाहिए। |
|
231. जिलुभाई मानभाई खाचर बनाम गुजरात राज्य, ए.आई.आर 1995 एस.सी 142 |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि अनुच्छेद 300(A) के अधीन संपत्ति का अधिकार संविधान का आधारभूत ढांचा नहीं है। |
|
232. के.टी. प्लांटेशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम कर्नाटक राज्य, ए.आई.आर 2011 एस.सी 3430 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि संपत्ति से वंचित करने की स्थिति में मुआवजा पाने का अधिकार अनुच्छेद 300-A में निहित है। |
|
233. एम. सिद्दीक (डी) थू LRS बनाम महंत सुरेश दास और अन्य, सिविल अपील नं. 1, 10866 ऑफ 2010, 01.11.2019 को निर्णीत |
एक सर्वसम्मत निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अयोध्या में 2.77 एकड़ के सम्पूर्ण विवादित भूमि को राम मंदिर के निर्माण के लिए सौंप दिया जाए। साथ ही, अदालत ने निर्णय दिया कि मस्जिद के निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को वैकल्पिक भूमि 5 एकड़ आबंटित की जानी चाहिए। यह निर्देश संविधान के अनुच्छेद 142 के अधीन शक्ति निहित करता है। न्यायालय ने कहा कि 1992 में बाबरी मस्जिद का ढहना कानून का उल्लंघन था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले के खिलाफ दायर की गई समीक्षा याचिकाओं को खारिज कर दिया। |
|
234. स्विस रिबन्स प्राइवेट लिमिटेड और एक अन्य, बनाम भारत संघ, (2019) 4 एस.सी.सी 17 |
सर्वोच्च न्यायालय ने दिवाला और अशोधन क्षमता संहिता 2016 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। |
|
235. सेंट्रल पब्लिक इंफॉर्मेशन ऑफिसर, सुप्रीम कोर्ट बनाम सुभाष चन्द्र अग्रवाल, सिविल अपील नं. 10044 ऑफ 2010 13.11. 2019 को निर्णीत |
उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण है। उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले को सही ठहराया, जिसमें कहा गया था कि आर.टी.आई अधिनियम मुख्य न्यायधीश के कार्यालय पर लागू होगा। |
|
236. हिन्दुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड बनाम भारत संघ, डब्ल्यू. पी. (सिविल) नं. 1074 ऑफ 2019, 27.11. 2019 को निर्णीत |
उच्चतम न्यायालय ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम 1996 की धारा 87 को रद्द कर दिया, जिसे 2019 संशोधन अधिनियम के माध्यम से जोड़ा गया था। न्यायालय ने उस प्रावधान को रखा, स्वतः स्थापन प्रावधान को वापस लाया गया, ताकि भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का 'प्रकट रूप से मनमाना' और उल्लंघन न किया जा सके। |
|
237. पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ, (2013) 10 एस.सी.सी. 1 |
सर्वोच्च न्यायालय ने 'नकारात्मक मतदान की अवधारणा' की शुरुआत की यदि कोई व्यक्ति यह समझता है कि कोई उम्मीदवार योग्य नहीं है तो उसके पास किसी को भी न वोट (नोटा) करने का अधिकार है। |
Download Constitution of India PDF