Download Indian Contract Act MCQs Case Law Hindi Medium
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भारतीय संविदा अधिनियम (Indian Contract Act) |
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सामान्य सिद्धांत (General Principles) |
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वाद |
निर्णीत तथ्य |
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1. सत्यवत घोष बनाम मुगनीराम बांगुर एण्ड कंपनी, ए.आई.आर 1954 एस.सी. 44 |
भारतीय संविदा अधिनियम का विस्तार एक विशेष विषय से संबंधित है, जिस पर यह संपूर्ण है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय संविदा अधिनियम अपने विशेष परास (विस्तार) के लिए पर्याप्त कानून है। ऐसे मामलों में अंग्रेजी विधि के सिद्धांतों को लागू करने की अनुमति नहीं है। अंग्रेजी न्यायालयों के निर्णय केवल अनुनयी हैं। |
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2. सी.डब्ल्यू.टी. बनाम अब्दुल हुसैन, (1988) 3 एस.सी.सी. 562 |
यदि संव्यवहार वाणिज्यिक स्वरूप का है तो उपधारणा है, कि पक्षकार विधिक परिणाम से आशयित है। पक्षकारों पर यह सिद्धभार है कि विधिक परिणामों की अनुपस्थिति का पता लगाए। आशय की परीक्षण वस्तुनिष्ठ है न कि व्यक्तिपरक। |
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3. बनवारीलाल बनाम सुखदर्शन दयाल, (1973)1 एससीसी 294 |
उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संविदा करने के लिए विधिक संबंध बनाने के आशय आवश्यक हैं। |
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4. कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल, (1893) 1 QB 256 (CA) |
ऐसे आशय के निर्धारण का परीक्षण वस्तुपरक (objective) है। यह नहीं है कि पक्षकारों के मन में क्या था, लेकिन ऐसी परिस्थितियों में एक युक्तियुक्त व्यक्ति क्या सोचता है यह अनुमान लगाया जाना है। |
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5. रूप कुमार बनाम मोहन ठेदानी, (2003) 6 एससीसी 595 |
सर्वोच्च न्यायालय ने एक संविदा को कम करने को लिखित रूप में करने के महत्व को बताया। न्यायालय ने अवधारित किया कि जब व्यक्ति अपने करार को लिखित रूप में व्यक्त करते हैं तो वह किसी अनिश्चितता से छुटकारा पाने और अपने विचारों को इस रूप में स्थापित करने के स्पष्ट उद्देश्य के लिए है ताकि उसमें कोई गलतफहमी नहीं हो सके। |
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6. उत्तर प्रदेश राज्य बनाम मुरारी लाल, ए.आई.आर 1971 एस.सी 2210 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि अनुच्छेद 299 (1) के उपबंध आज्ञापक हैं। यदि संविदा अनुच्छेद 299 के प्रावधानों के उल्लंघन में की जाती है तो संविदा अवैध होगी। |
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7. बैंक ऑफ इंडिया बनाम ओ. पी. स्वर्णकार, (2003)2 एससीसी 721 |
यदि सेवा की संविदा संविधि या संविधिक नियमों से प्रशासित न हो तो संविदा अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे। |
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प्रस्ताव (Offer) |
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8. लालमन शुक्ला बनाम गौरी दत्त, (1913) 11 A11 LJ 489 |
एक प्रस्ताव को स्वीकृत हुआ नहीं कहा जा सकता जब तक कि स्वीकृत करने वाले व्यक्ति के संज्ञान में नहीं आ जाता। |
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9. कार्लिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बॉल कंपनी लि., (1893)1 QB 256 (CA) |
न्यायालय ने सामान्य प्रस्तावों के संबंध में निम्नलिखित बिंदुओं को अवधारित किया- A. प्रस्ताव को संपूर्ण विश्व के लिए किया जा सकता है और संविदा उन्हीं व्यक्तियों के साथ की जाती है जो प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए आगे आते हैं और प्रस्ताव को स्वीकृत करते हैं। B. ऐसे मामलों में प्रतिग्रहण की संसूचना (communication of acceptance) आवश्यक नहीं होती। प्रतिग्रहण के बिना शर्तों का पालन ही पर्याप्त स्वीकृति है। C. सामान्य प्रस्ताव सदैव जारी रहने की प्रकृति रखता है और इसे वापस लेने तक किसी भी संख्या में व्यक्तियों के लिए स्वीकृति के लिए खुला रहता है। |
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10. मैकफर्सन बनाम अप्पना, ए.आई.आर 1951एस.सी 184; हार्वे बनाम फेसी, (1893) UPKC 1 |
न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि केवल न्यूनतम कीमत पर प्रस्तावक विक्रय करेगा, का कथन संविदा का निर्माण नहीं करता। |
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11. फार्मास्यूटिकल सोसायटी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन बनाम बूट्स कैश केमिस्ट्स लिमिटेड, (1952) 2 QB 795 |
यह अवधारित किया गया कि वस्तुओं को मूल्य सूची के साथ प्रदर्शित करना भले ही वह स्वयं सेवा प्रणाली वाली दुकानों में ही क्यूं ना हो वह केवल प्रस्ताव के लिए आमंत्रण नहीं (offer to proposal) होगा। |
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12. हाइड बनाम रैंच, (1840) 49 ER 132; |
प्रति प्रस्ताव मूल प्रस्ताव को समाप्त या नष्ट कर देता है। |
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13. यू. पी राज्य निर्माण निगम लिमिटेड बनाम इन्डयोर प्राइवेट लिमिटेड, ए.आई.आर 1996 एस.सी 1373 |
प्रति प्रस्ताव मूल प्रस्ताव को समाप्त या नष्ट कर देता है। |
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14. फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया बनाम रामकेश यादव (2007) 9 एससीसी 531 सर्वोच्च |
न्यायालय ने अवधारित किया कि जब प्रस्ताव सशर्त होता है, तो प्रस्तावक के पास यह विकल्प होता है कि वह प्रस्ताव को स्वीकार करे या प्रस्ताव को अस्वीकार कर दे या प्रति प्रस्ताव दे। प्रस्तावक सशर्त प्रस्ताव के एक भाग को स्वीकार नहीं कर सकता है, जो प्रस्तावक द्वारा निष्पादन के परिणामस्वरूप होता है और जिस परिणाम के लिए प्रस्ताव किया जाता है उसे अस्वीकार कर देता है। |
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15. अपटान रूरल डिस्ट्रिक्ट कॉरपोरेशन बनाम पॉवेल, (1942) 1 All ER 220 |
संविदा अभिव्यक्त या विवक्षित हो सकती है। इस मामले में प्रतिवादी के फर्म में आग लग गई और उन्होंने उसे मुक्त करने के लिए फायर ब्रिगेड सेवाओं को बुलाया। प्रतिवादी का घर निः शुल्क सेवा क्षेत्र में नहीं था। न्यायालय ने अवधारित किया कि सेवाओं का भुगतान करने के लिए एक विवक्षित वचन पर प्रतिपादन (promise to pay) किया गया था। |
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16. हैरिस बनाम निकर्सन, (1873) LR 8 QB 226 |
नीलामी का विज्ञापन मात्र ही एक प्रस्ताव का आमंत्रण (invitation to offer) है। |
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17. हेण्डरसन बनाम स्टीवेंसन, (1875) 32 LT 709 |
मुद्रित नियम तथा शर्तों की उचित सूचना प्रस्तावकर्ता को दी जानी चाहिए। यदि इस तरह की सूचना नहीं दी जाती है, तो प्रस्तावक इस तरह के नियम और शर्तों से बाध्य नहीं होता है। |
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स्वीकृति (Acceptance) |
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18. बोगडेन बनाम मेट्रोपोलिटन रेलवे कंपनी, (1877) LR2 ACC 666(H2) |
प्रतिहरण करने के लिए केवल मानसिक अभिव्यक्ति आवश्यक नहीं है। अन्य पक्षों को इसकी संसूचना होनी चाहिये। |
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19. पॉवेल बनाम ली, (1908) 24 TLR 606 |
संसूचना केवल प्राधिकृत व्यक्ति से ही प्राप्त की जानी चाहिए। इसे उस व्यक्ति द्वारा सूचित किया जाना चाहिए जिसे प्रतिग्रहण करने का प्राधिकार है। अप्राधिकृत व्यक्ति द्वारा 'संसूचना' विधि की दृष्टि में कोई संसूचना नहीं है। |
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20. फेल्टहाउस बनाम बिंडले, (1863) 7 LT 835 |
स्वीकृति केवल प्रस्तावक को संसूचित की जानी चाहिए। किसी अन्य व्यक्ति को संसूचित करना विधि की दृष्टि में कोई संसूचना नहीं है। प्रस्ताव करने वाला यह शर्त नहीं लगा सकता है कि जिसे प्रस्ताव किया गया है, उसका यह उत्तरदायित्व है कि वह यदि प्रस्ताव को स्वीकार करे या उसे इंकार करे। दूसरे शब्दों में, मौन को स्वीकृति के रूप में निर्धारित नहीं किया जा सकता है। |
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21. बोल्टन बनाम जोन्स, (1857) 27 LJ Ex. 117 |
विशिष्ट प्रस्ताव केवल उसी व्यक्ति द्वारा स्वीकार किया जा सकता है जिसके लिए वह किया गया हो। |
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22. फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया बनाम रामकेश यादव, (2007) 9 एससीसी 531 |
जब प्रस्ताव सशर्त होता है तो स्वीकृतिकर्ता के पास सशर्त प्रस्ताव स्वीकार करने का या सशर्त प्रस्ताव को अस्वीकार करने का या प्रति प्रस्ताव देने का विकल्प होता है। लेकिन वह उस प्रस्ताव के कुछ भाग को स्वीकार नहीं कर सकता जो उसके लिए हितकर हो और उस भाग को अस्वीकार कर दे जो शर्तें आरोपित करता हो। |
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23. भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम ग्रेट ईस्टर्न शिपिंग कंपनी, (2008) 1 एससीसी 503 |
कुछ परिस्थितियों में स्वीकृतिकर्ता का मौन आचरण जो, सकारात्मक कार्य का रूप लेता है एक स्वीकृति बन सकता है। |
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24. एंटोर्स लिमिटेड बनाम माइल्स फार ईस्ट कॉरपोरेशन, (1955) 1 QB 327 |
जब कोई संविदा तात्कालिक संसूचना के द्वारा की जाती है तो संविदा केवल प्रस्तावक के द्वारा की गई स्वीकृति के बाद ही पूर्ण हो जाती है। टेलैक्स द्वारा संसूचना के मामले में भी यही नियम लागू किया जाता है। |
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25. भगवान दास बनाम गिरधारी लाल एंड कंपनी, (1966) 1 SCR 656 |
ऐसे मामलों में जहां संविदा डाक संचार द्वारा की जाती हो संविदा का स्थान वह स्थान होता है जहाँ स्वीकृति पत्र भेजा जाता है। तात्कालिक संचार के मामले में संविदा का स्थान वह स्थान होता है जहाँ स्वीकृति को सुना जाता है। |
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प्रतिफल (Consideration) |
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26. क्यूरी बनाम मीसा, (1875) LR 10 Ex. 153 |
न्यायालय ने अवधारित किया कि विधि की दृष्टि में मूल्यवान प्रतिफल या तो किसी एक पक्ष के किसी अधिकार, हित, लाभ या प्रतिलाभमें या किसी अन्य पक्ष के प्रति किसी समर्पण और हानि, क्षति या उत्तरदायित्व में निहित हो सकता है। |
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27. दुर्गा प्रसाद बनाम बलदेव, (1880) 3 All 221 |
यदि कार्य वचनदाता की प्रवांछा पर किया गया है, जो यह वैध प्रतिफल का सृजन करेगा। यदि कार्य वचनदाता की वांछा पर नहीं किया गया है, तो वह वैध प्रतिफल नहीं होगा। |
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28. दुर्गा प्रसाद बनाम बलदेव, (1880) 3 All 221 |
यदि कार्य वचनदाता की प्रवांछा पर किया गया है, जो यह वैध प्रतिफल का सृजन करेगा। यदि कार्य वचनदाता की वांछा पर नहीं किया गया है, तो वह वैध प्रतिफल नहीं होगा। |
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29. केदारनाथ बनाम गोरी मोहम्मद, (1887) ILR 14 Cal. 64 |
अंशदान के भुगतान का वचन तभी प्रवर्तनीय होता है जब जिस पक्षकार को वचन दिया गया हो वह वचन के आधार पर देय हो। |
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30. अब्दुल अज़ीज़ बनाम मासूम अली और अन्य, ए.आई.आर 1914 All 22 |
धर्मार्थ कारणों के लिए अंशदान का वचन उस दशा में प्रवर्तनीय नहीं होता जब दूसरे पक्षकार पर कोई दायित्व न हो। |
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31. विडल बनाम एटकिंसन, (1861) 123 ER 762 |
अंग्रेजी विधि : यह आवश्यक है कि वचनगृहीता (promisee) से ही प्रतिफल प्राप्त हो। प्रतिफल से अपरिचित वाद दायर नहीं हो सकता है। |
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32. चिन्नाया बनाम राम्या, (1881) ILR Mad. 137 |
भारतीय विधिः संविदा के लिए प्रतिफल का अनिवार्य रूप से संविदा के पक्षकारों द्वारा दिया जाना आवश्यक नहीं है। |
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33. निहाल सिंह बनाम पंजाब राज्य, ए. आई. आर 2013 एस.सी. 3547 |
भारतीय विधिः संविदा के लिए प्रतिफल का अनिवार्य रूप से संविदा के पक्षकारों द्वारा दिया जाना आवश्यक नहीं है। |
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34. चिदंबरा बनाम पी.एस रंगा, ए.आई.आर 1965 एस.सी. 193 |
प्रतिफल कुछ ऐसा होना चाहिए जो न केवल पक्षकारों बल्कि विधि में भी कुछ मूल्य रखता हो। |
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35. स्कॉटसन बनाम पेग, (1861) 158 ER 121 |
किसी संविदा के अधीन वचनगृहीता जिस कार्य को करने के लिए वचनबद्ध है उसे करने का वचन संविदा के समर्थन में अच्छा प्रतिफल हो सकता है। |
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संविदा की गुप्तता (Privity of Contract) |
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36. ट्विडल बनाम एटकिंसन, 124 RR 610;
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अंग्रेजी विधि के अंतर्गत स्थिति: संविदा के गुप्तता के सिद्धांत का अनुसरण किया गया और यह अभिनिर्धारित किया गया कि कोई भी अजनबी संविदा का लाभ नहीं प्राप्त कर सकता यद्यपि यह उसके लाभ के लिए निर्मित हो। |
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37. डनलप प्यूमेटिक टायर कंपनी बनाम सेफ्रिज कंपनी लिमिटेड, 1915 AC 847 |
अंग्रेजी विधि के अंतर्गत स्थिति: संविदा के गुप्तता के सिद्धांत का अनुसरण किया गया और यह अभिनिर्धारित किया गया कि कोई भी अजनबी संविदा का लाभ नहीं प्राप्त कर सकता यद्यपि यह उसके लाभ के लिए निर्मित हो। |
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38. एम. सी चाको बनाम स्टेट बैंक ऑफ त्रावनकोर, ए.आई.आर 1970 एस.सी. 504; |
भारतीय विधि के अंतर्गत स्थिति :- सर्वोच्च न्यायालय ने अवधारित किया कि संविदा की गुप्तता का सिद्धांत भारत में लागू होता है और संविदा से अपरिचित व्यक्ति पर वाद नहीं चलाया जा सकता है। |
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39. जमना दास बनाम पंडित रामअवतार पांडे, (1911-12) 391 A7 |
भारतीय विधि के अंतर्गत स्थिति :- सर्वोच्च न्यायालय ने अवधारित किया कि संविदा की गुप्तता का सिद्धांत भारत में लागू होता है और संविदा से अपरिचित व्यक्ति पर वाद नहीं चलाया जा सकता है। |
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40. नवाब ख्वाजा मोहम्मद बनाम नवाब हुसैनी बेगम, (1909-10) 37.1A 152 |
ऐसा व्यक्ति जिसके पक्ष में कोई न्यास या भार सृजित किया गया है, संविदा के लिए अपरिचित होने के बावजूद उसे प्रवर्तित कर सकताहै। |
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41. टल्क बनाम मॉक्सहे, (1919) 88 LJKB 861 (HL) |
कोई व्यक्ति जो इस सूचना का साथ भूमि की क्रय करता है कि स्वामी कुछ कर्तव्यों से बंधा है, फिर भी ग्राहक संविदा का पक्षकार नहीं होने के बावजूद बाध्य होगा। |
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42. फिलिप्स बनाम बुक्स लिमिटेड, (1919) 2 KB 243 |
यदि किसी एक पक्षकारों द्वारा कपट किया गया हो और पक्षकार की पहचान के संबंध में कोई भूल न हो तो संविदा शून्यकरणीय है शून्य नहीं। |
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शून्य एवं शून्यकरणीय संविदा (Void & Voidable Contract) |
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43. सेंट्रल इंग्लैंड वॉटर ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम बोर्डो नाथ, ए.आई.आर 1986 एस.सी. 1571 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि लोक नीति में समय के साथ परिवर्तन समुचित विस्तार और संशोधन किया जा सकता है। लोक नीति के नए तत्वों को मौलिक अधिकारों और राज्य नीति के निदेशक के सिद्धांतों के आलोक में विकसित किया जा सकता है। |
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44. कारलिल बनाम कार्बोलिक स्मोक बाल कंपनी, (1893) 1QB 256(CA)
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निम्नलिखित शर्त बाजी लगाने के करार (wagering contract) के लिए अनिवार्य हैं- (1) घटना अनिश्चित होनी चाहिए; (2) दोनों पक्षकारों के लिए लाभ या हानि की पारस्परिक संभावना हो; (3) जीतने या हारने के सिवाय पक्षकारों का कोई हित नहीं होना चाहिए; (4) न ही पक्षकारों को घटना के घटित होने या न घटित होने पर कोई नियंत्रण होना चाहिए। |
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45. घेरूलाल पारेख बनाम महादेव दास, ए.आई.आर 1959 एस.सी. 781 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि बाजी का करार शून्य है लेकिन वे अवैध नहीं हैं। इसलिए, बाजी करार के लिए संपार्श्विक संव्यवहार प्रवर्तन योग्य है। |
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46. सत्यव्रत घोष बनाम मुंगनी बांगुर, 1954 SCR 310 |
सर्वोच्च न्यायालय ने अवधारित किया कि भारत में 'आसंभवता के सिद्धांत' अंग्रेजी विधि में 'नैराश्य के सिद्धांत (doctrine of frustration) के समान हैं। |
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47. सत्य जैन बनाम अनिस अहमद रुश्दी, ए.आई.आर 2013 एस.सी. 434 |
उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि व्यापार प्रभावोत्पादकता के सिद्धांतों का प्रयोग पक्षकारों के इच्छित अर्थ को प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है, जब करार/संविदा की शर्ते संदिग्ध या स्पष्ट नहीं हैं। |
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48. हकुम सिंह बनाम गैमन (इंडिया) लिमिटेड, ए.आई.आर 1971 एस.सी. 740 |
न्यायलय ने अवधारित किया कि अगर दो न्यायालय किसी विषयवस्तु से निस्तारण के लिए समान रूप से सक्षम हैं, तो यह पक्षकारों के लिए खुला है कि वे इस बात पर सहमत हों कि विवाद को केवल एक न्यायालय द्वारा निर्णीत किया जाना चाहिए। |
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49. गुरमुख सिंह बनाम अमर सिंह, (1991) 3 एससीसी 79 |
लोक नीति स्थिर नहीं होती है। यह बदलते समय और समाज की जरूरतों के साथ बदलता रहता है। |
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50. मधु चंदेर बनाम राज कूमार, (1874) XIV BLR 76 |
धारा 27 का उद्देश्य केवल पूर्ण अवरोध बरतना नहीं है अपितु आंशिक अवरोध है। |
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51. निरंजन शंकर बनाम सेंचुरी स्पिनिंग कंपनी लिमिटेड, ए.आई.आर 1967 एस.सी. 1098 |
रोजगार की संविदा की अवधि के दौरान संचालित नकारात्मक प्रसंविदा, जब कर्मचारी विशिष्ट रूप से नियोक्ता की सेवा करने के लिए बाध्य है, सामान्यतौर पर व्यापारिक अवरोध के रूप में नहीं माना जाता है और इसलिए यह संविदा अधिनियम की धारा 27 के तहत नहीं आता है। |
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52. के. आर लक्ष्मण बनाम तमिलनाडु राज्य, (1996) 2 एससीसी 226 |
घुड़दौड़ (horse racing) का व्यवसाय जुआ खेलना नहीं होता है बल्कि यह एक कौशल मात्र का खेल है। |
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संविदा सदृश (Quasi Contract) |
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53. चैपल बनाम कूपर, 153 ER 105 |
आवश्यकताएं क्या होती हैं? आवश्यकताओं का तात्पर्य उन चीजों से होता है, जो किसी व्यक्ति के जीवन को उसकी स्थिति के अनुसार बनाए रखने के लिए आवश्यक होती हैं। यह किसी विशेष अवयस्क के संपत्ति और परिस्थितियों के संदर्भ में निर्धारित किया जाता है। आवश्यकताएं व्यक्ति की प्रस्थिति और वास्तविक प्रतिपादन के समय उसकी आवश्यकताओं पर भी निर्भर करती हैं। |
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54. नाश बनाम इनमान, (1908) 2 KB 1 |
न्यायालय ने अवधारित किया कि आवश्यक वस्तुओं के लिए शिशु की संपत्ति को प्रस्तुत करने के लिए दो शर्तों को संतुष्ट करना चाहिएः क. जीवन में उसके सहयोग के लिए आवश्यक वस्तु के लिए आपूर्ति का होना आवश्यक है; तथा ख. उसके पास परिदान के समय पहले से ही आवश्यक वस्तुओं की पर्याप्त आपूर्ति नहीं होना चाहिए। |
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55. मफतलाल इंडस्ट्रीज बनाम भारत संघ, (1997) 5 एससीसी 536 |
उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि धारा 72 साम्यिक प्रतिफल पर आधारित है। |
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56. ललितेश्वर प्रसाद बनाम बालेश्वर प्रसाद, ए.आंई.आर 1968 एस.सी. 580 |
जब संविधान के अनुच्छेद 299(1) के अपालन के कारण संविदा शून्य हो जाती है, तो पक्षकारों के अधिकार भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 70 के अनुसार निर्धारित किए जाएंगे। |
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57. मोसेस बनाम मैकफरलान, (1760) 2 Burr 1005 |
विधि को न्याय के साथ-साथ अन्यायपूर्ण अभिवृद्धि को निवारित करने का प्रयास करना चाहिए, अर्थात दूसरे की लागत पर एक व्यक्ति की अभिवृद्धि। संविदा सदृश्य दायित्व का आधार है। |
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58. पश्चिम बंगाल राज्य बनाम बी. के मंडल एंड संस, ए.आई.आर 1962 एस.सी. 779 |
धारा 70 के लागू होने से पहले निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना होगा- 1. एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के लिए कुछ विधि पूर्ण कार्य करना चाहिए या परिदत्त किया जाना चाहिए। 2. उसका आशय ऐसा निःशुल्क कार्य करने का नहीं होना चाहिए। 3. ऐसा व्यक्ति, जिसको वस्तु संदाय की गई हो, को उसका नाम रखना स्वीकार करना चाहिए। इस धारा के तहत दायी व्यक्ति के पास हमेशा चीजों को अस्वीकार करने का विकल्प होता है। केवल तभी जब वह स्वेच्छा से स्वीकार करता है तब दायित्व उत्पन्न होता है। |
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59. फूड कॉरपोरेशन आफ इंडिया बनाम मजदूर शक्ति मंडली, (2007) 13 एससीसी 544 |
क्वांटम मेरिट (quantum meruit) का सिद्धांत वहां प्रायः लागू किया जाता है जहां किसी तकनीकी कारण से संविदा को अवैध घोषित किया जाता है। ऐसी परिस्थितियों में किए गए कार्य के लिए युक्तियुक्त रूप से भुगतान करने को एक विवक्षित संविदा माना जाता है। धारा 70 के प्रावधान क्वांटम मेरिट के सिद्धांत पर आधारित हैं। |
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60. श्री शिबा प्रसाद सिंह बनाम महाराजा नन्दी, 76 IA 44 (PCC 1949); |
धारा 72 में 'भूल' शब्द में न केवल तथ्य की भूल शामिल है बल्कि विधि की भूल भी शामिल है। यह खंड संविदा अधिनियम की धारा 21 के विरुद्ध नहीं है। |
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61. सेल्स टैक्स ऑफिसर बनाम कन्हैया लाल सर्राफ, ए.आई.आर 1959 एस.सी.135 |
धारा 72 में 'भूल' शब्द में न केवल तथ्य की भूल शामिल है बल्कि विधि की भूल भी शामिल है। यह खंड संविदा अधिनियम की धारा 21 के विरुद्ध नहीं है। |
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क्षतिपूर्ति (Damages) |
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62. जार्विस बनाम स्वान टूर्स लिमिटेड, 1973 QB 233 |
साधारणतया मानसिक पीड़ा एवं कष्ट के लिए क्षति स्वीकार्य नहीं होती लेकिन कुछ विशेष मामलों में उनकी प्राप्ति की जा सकती है। यह अभिनिर्धारित किया गया कि उचित मामले में मानसिक संकट के लिए क्षतिपूर्ति को प्रदान किया जा सकता है। |
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63. जमाल बनाम मूला दाउद सन्स एंड कंपनी, (1916) 43 IA 6 |
यह अवधारित किया गया कि क्षतिपूर्ति की उचित माप संविदा मूल्य और संविदा के उल्लंघन की तारीख पर बाजार मूल्य के बीच का अंतर है। |
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64. हेडली बनाम बैक्सेंडले, (1854) EWHC 570 |
जब दो पक्षकारों ने एक संविदा की हो जो उनमें से एक ने भंग कर दिया हो तो दूसरे पक्षकार को संविदा के उल्लंघन के संबंध में जो क्षतिपूर्ति दूसरे पक्ष को मिलनी चाहिए, वह ऐसी होनी चाहिए जो अन्य पक्ष को संविदा के उल्लंघन के संबंध में उचित और युक्तियुक्त रूप से उन पर सामान्य परिस्थितियों से प्राकृतिक रूप से विचार किया जा सके या उनके द्वारा संविदा किए जाने के समय पक्षकारों के ध्यान में उचित रूप से उत्पन्न हो। |
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65. भारत संघ बनाम वेस्ट पंजाब फैक्ट्रीज, ए.आई.आर 1966 एस.सी 395 |
क्षति के समय बाजार मूल्य, क्षतिपूर्ति प्रदान की जाने के लिए एक उचित माप है। |
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66. बृजपाल सिंह बनाम गुजरात राज्य, ए.आई.आर 1984 एस.सी 1703; |
कार्य की संविदा में, जहां कार्य सौंपने वाला पक्षकार संविदा भंग करता है, लाभ की हानि के शीर्ष के अंतर्गत ठेकेदार का क्षतिपूर्ति का दावा स्वीकार्य है। |
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67. एमएसके प्रोजेक्ट्स (I) (JV) लिमिटेड बनाम राजस्थान राज्य, (2011) 10 एससीसी 573 |
कार्य की संविदा में, जहां कार्य सौंपने वाला पक्षकार संविदा भंग करता है, लाभ की हानि के शीर्ष के अंतर्गत ठेकेदार का क्षतिपूर्ति का दावा स्वीकार्य है। |
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68. एम. लचाई शेट्टी बनाम कॉफी बोर्ड बंगलौर, (1980) 4 एससीसी 636 |
हानि को कम करने का सिद्धांत क्षतिपूर्ति का मूल्यांकन करते समय ध्यान में रखी जाने वाली एक परिस्थिति है। |
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69. डनलप न्यूमैटिक टायर लिमिटेड बनाम न्यू मोटर कंपनी लिमिटेड, (1915) AC 79 |
यदि एक मुश्त राशि एक या अधिक या सभी घटनाओं के घटित होने पर प्रतिपूर्ति के रूप में संदाय की जाती है, जिनमें से कुछ गंभीर और अन्य तुच्छ प्रभार की संभावना हो सकती है, तो यह अनुमान लगाया जाता है कि राशि दंड के रूप में है। |
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70. मौला बक्स बनाम भारत संघ, ए.आई.आर 1970 एस.सी 1955 |
अग्रिम धन क्रय मूल्य का एक भाग होता है किन्तु प्रतिभूति जमा राशि ऐसी प्रकृति की नहीं होती। इसलिए समपहरण का नियम अग्रिम धन पर लागू होता है, न कि प्रतिभूति जमा राशि पर। |
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विविध (Miscellaneous) |
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71. पायनियर अर्बन लैंड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम गिविंदम राघवन, (2019) 5 एस.सी. 725 |
न्यायालय ऐसे संविदा को लागू नहीं करेंगी और एक अन्यायपूर्ण और अनुचित अनुबंध या उन पक्षों के बीच खंडन करेंगी जिसके पक्ष समान रूप से सौदा करने की शक्ति में नहीं है। |
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72. एम.टी.एन.एल. बनाम टाटा कम्युनिकेशन लिमिटेड, (2019) 5 एस. सी. 341 |
संविदा द्वारा निर्धारित न किए गए मूल्य के कारण प्रदान किए गए कार्य अथवा प्रदान की गई सेवाओं के लिए क्षतिपूर्ति (quantum meruit) अधिनिर्णित की जाती है। संविदा की शर्तों के अनुसार किए गए कार्य या सेवाओं के लिए क्षतिपूर्ति (quantum meruit) उस स्थान पर अधिनिर्णीत नहीं की जा सकती है, जहां संविदा इस संबंध में प्रतिफल परिलब्ध है। |
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73. बी.के एजुकेशनल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम पराग गुप्ता एंड एसोसिएट्स, (2019) 11 एस.सी.सी. 633 |
अधिनियम की धारा 60 और 61 इस तथ्य को मान्यता देती है कि परिसीमा उपाय को रोकती है लेकिन अधिकार को नहीं। धारा 60 'वास्तव में बकाया और देय...' शब्द का उपयोग करता है। वास्तव में अभिव्यक्ति यह स्पष्ट करती है कि वास्तव में परिसीमा नियम के होते हुए भी ऋण देय होना चाहिए। |
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74. एम. टी. एल. बनाम टाटा कम्युनिकेशन लिमिटेड, (2019) 5 एस. सी. 341 |
जहां एक व्यक्ति द्वारा धारा 70 के तहत दूसरे के खिलाफ मुआवजे का दावा किया जाता है, यह किसी भी अस्तित्ववाद संविदा के आधार पर नहीं बल्कि एक अलग तरह के दायित्व पर है। ऐसे मामले में दायित्व का विधिगत आधार किसी संविदा या अपकृत्य पर आधारित नहीं है बल्कि संविदा कल्प (quasi contract) पर आधारित है। |
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