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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

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सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908

(Code of Civil Procedure, 1908)

 

सामान्य सिद्धांत

(General Principles)

वाद

निर्णीत तथ्य

1.      अरुण कुमार बनाम अनीता मिश्रा, (2020) 16 एस. सी. सी. 118

जब डिक्री पैसे की वसूली या ऋण की अदायगी के लिए होती है तो लोक अदालत का निर्णय एवं डिक्री निष्पादन योग्य माना जाता है।

2.      संग्राम सिंह बनाम इलेक्शन ट्रिब्यूनल, .आई.आर. 1955, एससी 425

संहिता को न्याय प्रदान करने की सुविधा के लिए बनाया गया है और इसलिए इसके प्रवधानों का बहुत ही तकनीकी निर्वचन नहीं किया जाना चाहिए। प्रवधानों का निर्वचन उदारतापूर्वक किया जाना चाहिए और तकनीकी आपत्तियों को नहीं लिया जाना चाहिए।

3.      सालेम एडवोकेट्स बार एसोसिएशन (II) बनाम भारत संघ, .आई.आर. 2005 एससी 3353

संहिता की प्रस्तावना में कहा गया है कि संहिता का उद्देश्य द्विपक्षीय है; सिविल न्यायालयों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया से संबंधित विधियों को (1) समेकित करना और उनमें (2) संशोधन करना। यह न्याय को सुविधाजनक बनाने के लिए बनाई गई प्रक्रिया है तथा दंड और अर्थदंड के लिए दांडिक अधिनियम नहीं है।

4.      वेस्टरली दखार बनाम सहकाया लिंगदोह, (2015) 4 एससीसी 292

जिन क्षेत्रों में यह संहिता विस्तारित नहीं होती है, उस क्षेत्र के न्यायालय संहिता के मूलभाव से निर्देशित होंगे।

5.      मनोहर लाल बनाम सेठ हीरालाल, .आई.आर. 1962 एससी 527

संहिता ऐसे मामलों में जो इसमें विनिर्दिष्ट रूप से दिए गए हैं पर संपूर्ण है। हालांकि, विधायिका सिविल वादों में उत्पन्न होने वाली सभी संभावित परिस्थितियों पर विचार करने में असमर्थ है। इसलिए, उन मामलों के संबंध में न्यायालयों के पास 'न्याय, साम्य (equity) और स‌द्विवेक' के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने की अंतर्निहित शक्तियां हैं। न्यायालय की ऐसी अंतर्निहित शक्तियाँ संहिता की धारा 151 में वर्णित हैं।

6.      राम लाल एवं अन्य बनाम सालिंग राम एवं अन्य, .आई.आर. 2019 एससी 729

उच्चतम न्यायलय ने अभिनिर्धारित किया है कि स्थानीय जांच के लिए नियुक्त स्थानीय आयुक्त की रिपोर्ट में अनियमितता, एक सिविल वाद को खारिज करने का आधार नहीं हो सकती है।

7.      जय जय राम मनोहर बनाम नेशनल बिल्डिंग मटेरियल सप्लाई, .आई.आर. 1969 एससी 1267

किसी भूल उपेक्षा, असावधानी या यहां तक कि प्रक्रिया के नियनों के उल्लंघन के कारण पक्षकार को राहत या उपचार से इनकार नहीं किया जा सकता है।

8.      प्रेम लालानाहता बनाम चांदी प्रसाद सिकारिया, .आई.आर. 2007 एससी 1247

यह संहिता सिविल न्यायपालिका के न्यायालयों की प्रक्रिया से संबंधित विधियों को समेकित और संशोधित करती है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह कुछ मूल अधिकारों से भी संबंधित है। लेकिन, इसका आवश्यक उद्देश्य सिविल प्रक्रिया से संबंधित विधियों को समेकित करना है।

9.      मद्रास राज्य बनाम सी.पी. एजेंसीज, .आई.आर. 1960 एससी 1309

शब्द 'वाद हेतुक' उन सभी श्रेणियों के तथ्यों को दर्शाता है, जो किए गए वाद में वादी को अपने पक्ष में डिक्री पाने के लिए अधिकृत होना चाहिए, तो वादी को अपने पक्ष में तथ्यों को साबित करने की आवश्यकता है।

10.  उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सी.बी. मिश्र, .आई.आर. 1980 एससी 591

शब्द 'संहिता' में न केवल धाराएं शामिल हैं, बल्कि प्रथम अनुसूची में नियम और उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए वे नियम जो पहली अनुसूची के नियमों में संशोधन भी शामिल हैं।

11.  साउथ ईस्ट एशिया शिपिंग कंपनी लि. बनाम नव भारत इंटरप्राइजेज प्राइवेट लि., (1996) 3 एससीआर 405

'वाद हेतुक' तथ्यों का एक समूह है, जो उनके लिए लागू विधि के साथ, वादी को प्रतिवादी के विरुद्ध उपचार का दावा करने का अधिकार देता है।

 

परिभाषाएँ

(Definitions)

12.  शंकर बनाम चन्द्रकान्त, (1995) 3 एससीसी 413

प्रारंभिक डिक्री वह है जो आगे की कार्यवाही में तय किये जाने वाले वास्तविक परिणाम छोड़कर पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों की घोषणा करता है और आगे कार्यवाही के परिणामस्वरूप पक्षकारों के प्रारंभिक डिक्री के द्वारा अधिकारों का पूरी तरह से निर्धारण किया जाता है और अंतिम डिक्री पारित की जाती है।

13.  धनी राम बनाम लाला श्री राम, (1980) 2 एसीसीसी 162

डिक्री धारक को वादी होना आवश्यक नहीं है। एक व्यक्ति जो वाद में पक्षकार नहीं है, लेकिन जिसके पक्ष में एक आदेश दिया गया है जो निष्पादन के लिए सक्षम है, वह भी एक डिक्री धारक है।

 

14.  रेणु देवी बनाम महेंद्र सिंह, (2003) 10 एससीसी 200

प्रारंभिक डिक्री और अंतिम डिक्री के बीच का अंतर इसके उद्देश्य में निहित है। एक प्रारंभिक डिक्री पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों की घोषणा करती है और वास्तविक परिणामों को बाद के चरण में घोषित करने के लिए छोड़ देती है। अंतिम डिक्री पक्षकारों के अधिकारों को इस निर्धारण के अनुसार अंतिम रूप से पूर्णतया निर्धारित करते हुए पारित की जाती है।

15.  दीप चंद बनाम भूमि अधिग्रहण अधिकारी, .आई.आर. 1994 एससी 1901

प्रशासनिक प्रकृति के मामले पर निर्णय डिक्री नहीं है।

16.  शिव शक्ति हाउसिंग कोऑपरेशन सोसाइटी बनाम स्वराज डेवेलपर्स, .आई.आर. 2003 एससी 2434

यह निर्धारित करने के लिए कि न्यायालय का आदेश डिक्री है या नहीं, न्यायालय को पक्षकारों के अभिवचनों और एक आदेश के पारित होने तक की कार्यवाही को ध्यान में रखना चाहिए। जिन परिस्थितियों में एक आदेश दिया गया है उन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

17.  फूलचंद बनाम गोपाल लाल, .आई.आर. 1967 एससी 1470

संहिता में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो एक से अधिक प्रारंभिक डिक्री को पारित करने से रोकता है, यदि परिस्थितियाँ इसे न्यायोचित ठहराती हैं और जहाँ ऐसा करना आवश्यक है।

18.  शितल प्रसाद सक्सेना बनाम किशोरी लाल, .आई.आर. 1967 एससी 1236

चूंकि प्रारंभिक डिक्री, अंतिम डिक्री पारित होने के पूर्व की अवस्था है। अतः यदि प्रारंभिक डिक्री के विरुद्ध दायर की गई अपील सफल हो जाती है तो अंतिम डिक्री स्वतः अपास्त हो जाती है क्योंकि इसका समर्थन करने के लिए कोई प्रारंभिक डिक्री नहीं होगी।

19.  राचाकाएँडा बैंकर राव बनाम आर. सत्या बाई, .आई.आर. 2003 एससी 3322

यह एक सुस्थापित विधि है कि एक से अधिक अंतिम डिक्री को पारित किया जा सकता है।

20.  हंसराज गुप्ता बनाम ऑफिसियल लिक्विडटर्स ऑफ देहरादून-मसूरी इलेक्ट्रिकल ट्रेम्वेस कं. लि. बनाम .आई.आर. 1933 पीसी 63;

 

पांडुरंग रामचंद्र बनाम शांतिबाई रामचंद्र, .आई.आर. 1989 एससी 2240

'वाद' शब्द को संहिता में परिभाषित नहीं किया गया है। उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि 'वाद' का तात्पर्य एक वादपत्र की प्रस्तुति के द्वारा शुरू की गई सिविल कार्यवाही है।

21.  लूसी कोचुवारीद बनाम पी. मणिआप्पा गौंडर, .आई.आर. 1979 एससी 1214

अंतःकालीन लाभ (mesne profit) का भुगतान करने की दायित्व अचल संपत्ति के वास्तविक कब्जे और उपभोग के साथ जुड़ी है। लेकिन जहां वादी के बेक़ब्जे को कई व्यक्तियों का संयुक्त या ठोस कार्य माना जा सकता है उनमें से प्रत्येक जो इस कृत्य का भागिदार होता है, वह अन्तःकालीन लाभ के लिए उत्तरदायी होगा, भले ही वह वास्तविक कब्जे में न हो।

22.  बलराज तनेजा बनाम सुनील मदन, .आई.आर. 1999 एससी 3381

निर्णय करते समय मामले के एक पक्षकार या दूसरे पक्षकार के हितों को निर्धारित करने में पूरी तार्किक प्रक्रिया को लागू किया जाना चाहिए इसे केवल इस तरह नहीं कहा जा सकता है कि 'वाद की डिक्री हुई है या वाद खारिज हुआ है'।

 

अधिकार क्षेत्र और सिविल प्रकृति के वाद

(Jurisdiction & Suits of Civil Nature)

23.  वर्दराजन बनाम कंकावल्ली, (2020) 11 एस. सी. सी. 598,

यदि न्यायालय की अधिकारिता का प्रयोग विधि में निहित नहीं है अथवा विधि में निहित अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहता है अथवा अपनी अधिकारिता का प्रयोग अवैध रूप से अथवा तात्विक अनियमितता के साथ करता है तो अधीनस्थ न्यायालय (subordinate court) द्वारा पारित आदेश को शुद्ध करने में ही हस्तक्षेप किया जा सकता है। केवल यह तथ्य कि. उच्च न्यायालय का उन तथ्यों पर दूसरा दृष्टिकोण है, वह अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पारित आदेश में हस्तक्षेप करने का अधिकारिता प्रदान नहीं करेगा।

24.  नुस्ली नेविले वाडिया बनाम आइवरी प्रॉपर्टीज, (2020) 15 एस. सी. सी.681

जहां न्यायालय को वाद ग्रहण करने की अधिकारिता है यदि इस तरह के अधिकारिता का प्रयोग करते हुए कोई गलती की गई, तो यह अधिकारिता त्रुटि (jurisdictional error) का गठन करेगा और यह अधिकारिता का अभाव नहीं माना जायेगा। न्यायालय, जहां सहायक तथ्य (adjudicatory facts) गायब है, अपने अधिकारिता का प्रयोग करके ट्रायल के लिए आगे बढ़ सकता है, लेकिन जहां अधिकारिता संबंधी तथ्य नहीं हैं वहां आगे नहीं बढ़ सकती।

25.  साउथ दिल्ली मुनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाम टुडे होम्स and इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड, (2020) 12 एस. सी. सी.680

सिविल न्यायालय की अधिकारिता विधि के निश्चित प्रावधान के द्वारा ही वर्जित की जा सकती है, जहां विधि द्वारा अधिकार और दायित्व का सृजन किया जाता है और यह विधि ऐसे अधिकार को लागू करने के लिए मशीनरी प्रदान करता है और जहाँ कानून विशेष न्यायाधिकरणों के आदेशों को अंतिम रूप देता है, यवि सिविल न्यायालय सामान्यतया किसी बाब में क्या करेंगे, इसे करने के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं तो सिविल न्यायालयों की अधिकारिता को अपवर्जित ठहराया जा सकता है।

26.  भगवत शरण (मृत) विधिक प्रतिनिधिगण बनाम पुरुषोत्तम एवं अन्य, 2020 पी.एन.पी. (सि.) 913 (एस.सी.) (एस.एन.)

विधि सुस्थापित है कि यह सिद्ध करने का भार उस व्यक्ति पर है जो यह अभिकथन करता है कि यह संपति हिंदू संयुक्त परिवार की सयुक्त संपति है। अपने बेटों में से एक को भी ऐसी संपत्ति दान कर सकता है। ऐसे मामलों में यह धारण करना संभव नहीं है कि ऐसी सम्पत्ति वसीयत में दी गई या दान में दी गई, जिसका स्थान पैतृक संपत्ति के रूप में बहुत आवश्यक हो।

27.  ईशा डिस्ट्रीब्यूशन हाउस (पी) लिमिटेड बनाम आदित्य बिरला नुवो लिमिटेड, (2019) 12 एस.सी.सी. 205

क्षेत्रिक अधिकारिता के बारे में प्रश्न, तथ्य और कानून को मिला-जुला प्रश्न है। लिखित कथन में अभिवाक को लेना आवश्यक है। एक बार अभिवाक उठाए जाने के बाद, विवाद्यकों की विरचना की आवश्यकता होती है और तद्नुसार उत्तर दिए जाते हैं।

28.  किरण सिंह बनाम चमन पासवान, .आई.आर. 1954 एससी 340

क्षेत्राधिकार संबंधी दोष डिक्री या आदेश के मूल तक जाता है। उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि क्षेत्राधिकार के अभाव में पारित एक डिक्री शून्य है। न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का दोष न्यायिक प्राधिकार पर प्रहार करता है और इसे पक्षकारों की सहमति से भी ठीक नहीं किया जा सकता।

 

29.  धुलाबाई बनाम मध्य प्रदेश राज्य, .आई.आर. 1969 एससी 78;

 

30.  कमला मिल्स बनाम बॉम्बे राज्य, .आई.आर. 1965 एससी 1942

प्रत्येक उपधारणाओं को न्यायालय के क्षेत्राधिकार के पक्ष में बनाया गया है। न्यायालय के क्षेत्राधिकार के अपवर्जन के प्रावधान को कठोरता से लागू किया जाना चाहिए। अधिकार क्षेत्र के रूप में संदेह के मामले में, न्यायालय क्षेत्राधिकार के पक्ष में झुकेंगे।

31.  हकम सिंह बनाम गैमन (इंडिया) लि., .आई.आर. 1971 एससी 740

जब दो या दो से अधिक न्यायालयों के पास एक वाद को सुनने के लिए अधिकार क्षेत्र होता है, तो पक्षकारों द्वारा ऐसे न्यायालयों में से किसी एक के अधिकार क्षेत्र में प्रस्तुत करने का एक समझौता और दूसरे का अपवर्जन करने का करार वैध एवं बाध्यकारी होता है।

32.  शिवनारायण (स्व.) द्वारा विधिक प्रतिनिधि बनाम माणिकलाल (स्व.) द्वारा विधिक प्रतिनिधि, 2019 (1) आरसीआर (सिविल) 985

उच्चतम न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 17 की व्याख्या की और धारित किया कि, विभिन्न न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में अचल संपत्ति या संपत्तियों के संबंध में एक वाद को किसी भी न्यायालय में स्थापित किया जा सकता है, जिसकी स्थानीय सीमा में संपत्ति का एक हिस्सा या एक या एक से अधिक संपत्ति स्थित है। धारा 17 में 'संपत्ति के हिस्से' (portion of the property) शब्द की व्याख्या को केवल दो न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में स्थित एक संपत्ति के हिस्से को सीमित और प्रतिबंधात्मक अर्थ में नहीं समझा जा सकता है।

33.  अब्दुल्ला बिन अली बनाम गल्लप्पा, .आई.आर. 1985 एससी 577

न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र का निर्णय वादी द्वारा वादपत्र में लगाए गए आरोपों पर किया जाना है, न कि लिखित कथन में प्रतिवादी द्वारा लगाए गए आरोपों पर।

34.  एम.एस. हसानुद्दीन बनाम महाराष्ट्र राज्य, .आई.आर. 1979 एससी 404

प्रत्येक न्यायालय या अधिकरण (ट्रिब्यूनल) न केवल हकदार है, बल्कि यह निर्धारित करने के लिए भी बाध्य है कि जिस मामले में उसे अपने क्षेत्राधिकार का उपयोग करने के लिए कहा गया है वह उसके क्षेत्राधिकार में आता है या नहीं।

35.  एल.आई.सी. बनाम इंडिया ऑटोमोबाइल्स, .आई.आर. 1991 एससी 884

जब सीमित क्षेत्राधिकार के न्यायालय के पास केवल किसी विशेष विवाद का निर्णित करने के लिए क्षेत्राधिकार होता है यह क्षेत्राधिकार किसी संपार्श्विक मुद्दे पर केवल प्रथम दृष्टया विचार करने के लिए है और इस तरह के मुद्दे को अंतिम रूप से अंतिम रूप से तय करने से एक सिविल न्यायालय के क्षेत्राधिकार को उससे वंचित नहीं किया जाता है।

36.  शशि प्रकाश खेमका (स्व.) द्वारा विधिक प्रतिनिधि बनाम एनईपिसी (मिकन) (अब एनईपिसी इंडिया लि. के नाम से जाना जाता है) एवं अन्य, (2019) एससीसी ऑनलाइन एससी 223 70 (आईबीसी) 01/2019

उच्चतम न्यायालय ने स्थापित किया कि सिविल न्यायालय का क्षेत्राधिकार उन मामलों में पूर्णतया वर्जित है, जिनके संबंध में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण को शक्तियां प्रदत्त हैं।

37.  शिव कुमार बनाम नगर निगम (म्युनिसिपल कारपोरेशन), (1993) 3 एससीसी 161

जहां वैधानिक अधिनियम उपचार प्रदान किए बिना केवल अधिकार या दायित्वों का सृजन करते हैं, कोई भी व्यक्ति जिसे कोई क्षति हुई हो वह सामान्य सिविल न्यायालय में जहां अधिकार है, वहां उपचार है (where there is a right, there is a remedy) के विधिक सिद्धान्त के आधार पर जा सकता है।

38.  मोस्ट रेव. पी.एम.. मेट्रोपोलिटन बनाम मोरन मर्थोमा, .आई.आर. 1995 एससी 2001

सिविल प्रकृति का शब्द सिविल प्रक्रिया शब्द की अपेक्षा व्यापक है, धारा १ ऐसे प्रत्येक मामलों के लिए उपलब्ध होगी, जहां विवाद उस प्राकृकि का है कि जो किसी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करती हो और जो केवल सिविल न हो वरन् सिविल प्रकृति का हो।

39.  जितेंद्र नाथ बनाम एम्पायर इंडिया एंड सीलोन टी कं., .आई.आर. 1990 एससी 255

एक वाद अप्रत्यक्ष रूप से वर्जित तब कहा जाता है, जब वह विधि के सामान्य सिद्धांतों के द्वारा वर्जित हो, जहां एक विशिष्ट उपचार संविधि द्वारा दिया जाता है तो यह उस व्यक्ति को वंचित करता है, जो संविधि द्वारा प्रदत्त उपचार से भिन्न किसी अन्य उपचार की मांग करता है।

40.  ऑफिसियल ट्रस्टी बनाम सचिन्द्र, .आई.आर. 1965 एससी 823

न्यायालय ने क्षेत्राधिकार के निर्धारण के संबंध में निम्नलिखित सिद्धांत दिएः-

1.      न्यायालय किसी विशेष मामले को निर्णित करने के लिए क्षेत्राधिकार रखता है यदि न्यायालय वाद विचारण के लिए सक्षम है और साथ ही उस आदेश को पारित करने के लिए क्षेत्राधिकार है।

2.      न्यायालय के क्षेत्राधिकार में विवाद्य प्रश्न को सुनने और निर्णय देने की शक्ति शामिल होनी चाहिए।

41.  उत्तर प्रदेश राज्य बनाम मोरध्वय सिंह, .आई.आर. 1960 एससी 796

सिविल प्रकृति की क्षति रखने वाले व्यक्ति को एक सिविल वाद संस्थापित करने के अधिकार है जब तक कि उसका संज्ञान स्पष्ट या विवक्षित रूप से वर्जित नहीं हो।

42.  सिन्हा रामानुजा बनाम रंगा रामानुजा, .आई.आर. 1961 एससी 1720

उच्चतम न्यायालय ने यह तय करने के लिए दिशानिर्देश दिए कि क्या धार्मिक पद का अधिकार सिविल प्रकृति का अधिकार होगाः-

1.      महज धार्मिक सम्मान की घोषणा के लिए कोई वाद नहीं हो सकेगा।

2.      किसी मंदिर के पद पर अधिकार स्थापित करने और उस पद से जुड़े विशेषाधिकारों आदि करने के लिए वाद पोषणीय होगा।

3.      पद के अस्तित्व के लिए शर्त यह है कि पद का धारक उस पद से जुड़े कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए एक विधिक दायित्व के तहत होना चाहिए।

43.  भारत संघ बनाम लाडलु लाल जैन, .आई.आर. 1963 एससी 1681

धारा 20 को यह सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है कि प्रतिवादी को खुद का पक्ष रखने के लिए लंबी दूरी की यात्रा में परेशानी और व्यय नहीं करना पड़े। धारा 20 एक अवशेषी धारा है और उन सभी मामलों से संबंधित है जो धारा 15 से 19 की परिधि में नहीं आ सकते हैं।

44.  ओम प्रकाश अग्रवाल बनाम विशान दयाल राजपूत, (2019) 14 एससीसी 526

प्रक्रिया संहिता की धारा 21 में निहित नीति यह है कि जब मामले को न्यायालय ने गुण व अवगुणों पर निर्णित किया हो, तो इसे मात्र तकनीकी आधार तब तक पूरी तरह उलटा नहीं जाना चाहिए जब तक इससे न्याय विफल न हो। यदि क्षेत्रीय व आर्थिक क्षेत्राधिकार संबंधी आपत्तियां प्रथम सुलभ अवसर पर नहीं उठाई गई, तो इसे पश्चातवर्ती अवसर पर उठाने की अनुमति नहीं प्रदत्त की जाएगी।

45.  स्नेह लता गोयल बनाम पुष्पलता, (2019) 3 एससीसी 594

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 21 यह स्पष्ट करती है कि क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार के अभाव के संबंध में आपत्ति क्षेत्राधिकार का मूल नहीं है। यह क्षेत्राधिकार के अंतर्निहित अभाव का गठन नहीं करता है।

46.  हीरालाल बनाम कालीनाथ, .आई.आर. 1962 एससी 199

क्षेत्राधिकार की अंतर्निहित कमी और क्षेत्राधिकार या आर्थिक क्षेत्राधिकार के बीच अंतर है। क्षेत्राधिकार की अंतर्निहित कमी मामले के मूल आधार से संबंधित है। क्षेत्रीय या आर्थिक क्षेत्राधिकार के अभाव के बारे में आपत्ति केवल तकनीकी है और इसका मामले के आधार पर कोई प्रभाव नहीं होता है।

 

वादो का अन्तरण

(Transfer of Suits)

47.  दुर्गेश शर्मा बनाम जयश्री, (2008) 9 एससीसी 648

धारा 24 के तहत शक्ति उच्च न्यायालय को अपने अधीनस्थ न्यायालय में किसी भी वाद, अपील आदि को किसी ऐसे न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए अधिकृत नहीं करती है जो उस उच्च न्यायालय के अधीनस्थ न हो।

48.  अरवी इंडस्ट्रीज बनाम रतन लाल, .आई.आर. 1977 एससी 2429

स्थानांतरण की शक्ति का अत्यधिक सावधानी और ऐहतियात के साथ न्याय के हित में प्रयोग किया जाना चाहिए। न्यायालय को निर्णय करते समय दो परस्पर विरोधी हितों को ध्यान में रखना चाहिएः-

1. फोरम का चयन करने के लिए वादी का अधिकार

2. निष्पक्ष विचारण सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय की शक्ति और कर्तव्य

49.  इंडियन ओवरसीज बैंक बनाम केमिकल कंस्ट्रक्शन, .आई.आर. 1979 एससी 1514

एक वाद के हस्तांतरण के लिए सुविधा का संतुलन प्रमुख है। सुविधा का संतुलन न तो वादी की सुविधा है और न ही प्रतिवादी की, बल्कि दोनों की। वाद की उचित सुनवाई के लिए आवश्यक साक्षी (गवाह) की सुविधा और वाद के मुख्य बिंदुओं पर साक्ष्य की प्रकृति के संबंध में परीक्षण की विशेष जगह की सुविधा और फोरम की सुविधा के सिद्धांत प्रासंगिक कारक हैं।

50.  जितेंद्र सिंह बनाम भानु कुमारी, .आई.आर. 2008 एससी 2987

धारा 24 वादो के हस्तांतरण के आदेश के लिए किसी भी आधार को निर्धारित नहीं करती है। यह केवल न्यायालय को एक विवेकाधीन शक्ति देती है। न्यायालय को स्थानांतरण का निर्देश देने से पहले दूसरे पक्ष को सूचना जारी करना आवश्यक है।

 

विचाराधीन वाद का सिद्धांत एवं पूर्व न्याय का सिद्धांत

(Res Sub Judice & Res Judicasta)

51.  आंध्र प्रदेश राज्य बनाम वी. रंगारेड्डी, (2020) 15 एस. सी. सी. 557,

पूर्व न्याय (res judicata) की प्रयोज्यता के लिए यह आवश्यक है कि पूर्व कार्यवाही को अंतिम रूप दिया गया हो अर्थात् निर्धारित किया गया हो। जहां बाद में पारित डिक्री के खिलाफ अपील लंबित है, इस मुद्दे पर निष्कर्ष सहित डिक्री व अंतिम निर्णय प्राप्त नहीं हो सकती है तथा पूर्ववाद में डिक्री, जिसमें पास अंतिम निर्णय नहीं है, पूर्व न्याय (res judicata) के रूप में कार्य नहीं कर सकता है।

52.  नंद राम बनाम जगदीश प्रसाद, (2020) 9 एस. सी. सी. 393,

यदि किसी प्रकरण में मुख्य मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए आवश्यक था और निर्णय लिया गया, तो उस मुद्दे को सीधे और पर्याप्त रूप से जारी किया जाना चाहिए और यदि यह स्पष्ट है कि निर्णय वास्तव में उस निर्णय पर आधारित था, तो यह बाद के मामले में पूर्व न्याय होगा। किसी को वादी, लिखित बयान, मुद्दों और निर्णयों की जांच करनी है कि क्या मामला सीधे और काफी हद तक विवाद्यक में सम्मिलित था।

53.  कैनरा बैंक बनाम एन. जी. सुब्बाराया शेट्टी, (2018) 16 एस.सी.सी. 228

पूर्वन्याय का सामान्य नियम यह है कि, सभी मुद्दे जो पूर्व वाद या उसी पक्षकारों के बीच कार्यवाही में प्रत्यक्ष और सारतः उत्पन्न होते हैं, वे उसी पक्षकारों के बीच बाद के वाद या कार्यवाही में प्राङ्गन्याय होते हैं। इस सामान्य नियम के संबंध में विधि के मामले में कुछ

अपवाद हैं-

1.      जब पूर्व वाद या कार्यवाही में समन पक्षकारों के बीच विधि का प्रश्न निर्णीत किया जाता है जो न्यायालय की अधिकारिता से संबंधित होता है, पूर्व कार्यवाही में एक गलत निर्णय पश्चात्वर्ती वाद में पूर्व न्याय नहीं है।

2.      पश्चात्वर्ती वाद में समान पक्षों के बीच विधि का मुद्दा जो उठता है, वह पूर्व न्याय नहीं है।

3.      जब किसी सक्षम अधिकारी द्वारा किसी पूर्व निर्णय से विधि में फेर-बदल किया जाता हो।

54.  केनरा बैंक बनाम एन जी सुब्बाराय सेट्टी, (2018) 16 एस.सी.सी. 228

जब तक एक अपील दाखिल करने की सीमा समाप्त नहीं हो जाती, तब रेस (res) न्यायाधीन रहता है और परिसीमा समाप्त होने के बाद, पहले न्यायालय द्वारा किया गया विनिश्चय पूर्वन्याय बन जाएगा।

55.  इलेक्ट्रिकल रेंगली हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट बनाम गिरधारी साहू, (2019) एस.सी.सी. 695

सिविल वाद में, यदि वादी धोखाधड़ी, गलत कथन या अनुचित प्रभाव का आरोप लगाता है, तो वह विवरण देने के लिए बाध्य है। सी.पी.सी. के 10 आदेश 6 नियम 4 के अन्तर्निहित आशय यह है कि विरोधी पक्ष को, जिस वाद में उसे बुलाया गया है, उसको पर्याप्त सूचना दी गई हो।

56.  इलेक्ट्रिकल रेंगली हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट बनाम गिरधारी साहू, (2019) एस.सी.सी. 695

सिविल वाद में, यदि वादी धोखाधड़ी, गलत कथन या अनुचित प्रभाव का आरोप लगाता है, तो वह विवरण देने के लिए बाध्य है। सी.पी.सी. के 10 आदेश 6 नियम 4 के अन्तर्निहित आशय यह है कि विरोधी पक्ष को, जिस वाद में उसे बुलाया गया है, उसको पर्याप्त सूचना दी गई हो।

57.  इंडियन बैंक बनाम महाराष्ट्र स्टेट कॉप. मार्केटिंग फेडरेशन, (1998) 5 एससीसी 69

चूंकि धारा 10 के तहत नियम वाद के परीक्षण पर लागू होता है और उसके संस्थन पर पर नहीं यह न्यायालय को अंतरिम आदेश जैसे व्यादेश का जारी किया जाना, रिसीवर की नियुक्ति आदि को पारित करने से निवारित नहीं करते हैं।

58.  राधा देवी बनाम दीप नारायण, (2003) 11 एससीसी 759

धारा 10 की प्रयोज्यता का परीक्षण यह है कि पूर्व संस्थित बाद में निर्णय बाद में संस्थित किये गए वाद के लिए पूर्वनिर्णीत वाच (प्रांग न्याय का सिद्धांत) के रूप में कार्य करेगा। यदि ऐसा है तो पश्चातवीं वाद को स्थगित कर देना चाहिए।

59.  पुखराज डी. जैन बनाम जी. गोपाल, .आई.आर. 2004 एससी 3504

धारा 10 का उद्देश्य समवर्ती क्षेत्राधिकार के न्यायालयों को एक ही मामले के संबंध में दो समानांतर बादो की सुनवाई करने से निवारित करना है। इस धारा के उल्लंघन में पारित डिक्री अकृत नहीं है क्योंकि यह धारा केवल प्रक्रिया का एक नियम है।

60.  नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एम.एच. ऍड एन.एस. बनाम सी परमेश्वर, .आई.आर. 2005 एससी 242

धारा 10 तभी लागू होगी जब दो वादो में मामले एक समान हो। दोनों बादो में संपूर्ण विषयवस्तु समान होना चाहिए।

61.  सत्यध्यान घोसाल बनाम देओरिजिन देबी, .आई.आर. 1960 एससी 941

प्रांग न्याय का सिद्धांत न्यायिक निर्णयों को अंतिमता देने की आवश्यकता पर आधारित है। मुख्य रूप से यह पूर्ववतों बाद और पश्चातवर्ती वादो के बीच लागू होता है।

 

62.  वर्कमेन बनाम बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज, कोचीन पोर्ट ट्रस्ट, .आई.आर. 1978 एससी 1283

जहां किसी भी मामले को पूर्ववर्ती वाद में बचाव या हमले का आधार बनाया जाना चाहिए था, लेकिन तब ऐसा नहीं किया गया था वादों की बहुलता रोकने के लिए तब वह समझा जायेगा कि यह आन्विक रूप से विवाद्यक उक्त प्रकरण में था।

63.  दरयाओ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, .आई.आर. 1961 एससी 1457

पूर्व न्याय (res judicata) का सिद्धांत सार्वभौमिक अनुप्रयोग का है और यह विधि शासन का एक भाग है।

64.  इफ्तिकार अहमद बनाम सय्यद मेहरबान अली, .आई.आर. 1974 एससी 749

सह-वादी और सह-प्रतिवादियों के बीच मामला प्रांग न्यायिक हो सकता है, अगर निम्नलिखित शर्तें पूरी हो जाती हैं।

1.      सह-वादी और सह-प्रतिवादियों के बीच हितों का विवाद होना चाहिए।

2.      वादी को उपचार देने के लिए इस तरह के विवाद को न्याय निर्णित करना आवश्यक है।

3.      सह-प्रतिवादियों और सह-वादी के बीच के विवाद पर अंतिम रूप से न्याय निर्णिय किया जाना चाहिए।

4.      पूर्ववर्ती वाद में सह-प्रतिवादी/सहवादी आवश्यक या उचित पक्षकार थे।

65.  असगर बनाम मोहन वर्मा, 2019 (2) सुप्रीम 53

किसी पक्ष को 'उचित उपचार' प्राप्त करने के लिए न्यायालय द्वारा दी गई स्वतंत्रता आन्वयिक प्राङ्गन्याय के सिद्धांत के उपयोग को निवारित नहीं करती है, जब व्यक्ति इस तरह उपचार के लिए मांग करता है।

66.  सुलोचना अम्मा बनाम नारायण नायर, जेटी (1993) (5) एससी 450

पूर्व न्याय के नियम सभी न्यायिक कार्यवाहियों पर लागू होंगे चाहे सिविल (मध्यस्थता, कराधान आदि सहित) या आपराधिक और यह प्रशासनिक न्यायाधिकरण के सभी अर्द्ध न्यायिक कार्यवाहियों पर समान रूप से लागू होती है।

67.  पांडुरंग बनाम शांताबाई, .आई.आर. 1989 एससी 2240

ऐसा मामला जिसके संबंध में किसी उपचार का दावा नहीं किया जाता है, वह 'प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से' विवाद्यक नहीं बन सकता है, भले ही डिक्री किसी सक्षम न्यायालय द्वारा पारित की गई हो।

68.  विठ्ठल यशवंत बनाम शिकन्दरखां, .आई.आर. 1963 एससी 385

जहां कई विवाद्यकों पर निष्कर्ष हैं या जहां न्यायालय एक से अधिक बिंदुओं पर निर्णय देती है, सभी विवाद्यकों या बिंदुओं पर निष्कर्ष पूर्व न्यायिक होंगे।

69.  शिवधन सिंह बनाम दरयो कुमार, .आई.आर. 1966 एससी 1332

पूर्ववर्ती वाद का निर्णय गुण-दोषों के आधार पर होना चाहिए और जब न्यायालय के क्षेत्राधिकार के अभाव के कारण या वादी की अनुपस्थिति के कारण या पक्षकारों के असंयोजन या कुसंयोजन के कारण पूर्ववर्ती वाद खारिज किया गया हो तो उसे अंतिम रूप से निर्णीत नहीं कहा जा सकता है।

70.  फारवर्ड कंस्ट्रक्शन कं. बनाम प्रभात मंडल, .आई.आर. 1986 एससी 391

'पदावली हो सकता है (might) और होना चाहिए' (ought) के व्यापक आयाम हैं। 'शब्द' हो सकता है (might)। आक्षेप या बचाव के सभी आधारों की संभावना का विचार व्यक्त करती है, और शब्द 'होना चाहिए (ought)' इस तरह के जुड़ाव के औचित्य पर विचार करता है। परीक्षण यह है कि अन्य पक्षकारों के पास तर्क प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर था और यदि उनके पास था तो मामले को वास्तव में प्रस्तुत हुआ एवं निर्णीत किया गया माना जाएगा।

71.  उत्तर प्रदेश राज्य बनाम नवाब हुसैन, .आई. आर. 1977 एससी 1680

प्रांङ्ग न्याय/पूर्व न्याय और आन्यवयिक प्राङ्ग न्याय के सामान्य सिद्धांत रिट याचिकाओं पर लागू होगा।

72.  गुलाम अब्बास बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, .आई.आर. 1981 एससी 2198

धारा 11 संपूर्ण नहीं है। धारा 11 में अधिनियमित किए गए पूर्व न्याय के नियमों में कुछ तकनीकी पहलू हैं। यह सामान्य सिद्धांत, उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए लोकनीति पर आधारित है अर्थात् वादो का अंतिम रूप से निर्धारण होना चाहिए और किसी व्यक्ति को दो बार एक ही वाद के लिए परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

73.  राज लक्ष्मी दासी बनाम बनामली सेन, .आई.आर. 1953 एससी 33

एक मामला जो पूर्ववर्ती के बाद में एक प्रत्यक्ष विवाद्यक' था तब तक वह पूर्व न्याय के रूप में संचालित नहीं होगा जब तक वह पूर्ववर्ती के बाद में 'सारतः विवाद्यक' ना रहा हो।

74.  कोंडा लक्ष्मणा बापूजी बनाम .पी. सरकार, .आई.आर. 2002 एससी 1012

धारा 11 और स्पष्टीकरण IV के संयुक्त पठन से ज्ञात होता है कि एक जो पूर्ववर्ती के वाद में विचार में हो सकता था या जिस पर विचार होना चाहिए था ऐसा माना जाएगा कि पश्चातवर्ती वाद में तर्क को प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध निर्णीत किया गया है।

 

विदेशी निर्णय

(Foreign Judgements)

75.  सरदार मालोजी, नर सिंह रोआ बनाम संकर सरन, .आई.आर. 1962 एससी 1767

धारा 13 में निर्धारित नियम, मौलिक विधि के नियम हैं और केवल प्रक्रियात्मक प्रक्रियात्मक विधि नहीं हैं।

76.  विश्वनाथन बनाम अब्दुल वाजिद, .आई.आर. 1963 एससी 21

जो निर्णय सुनाया गया है, वह एक सक्षम विदेशी न्यायालय द्वारा होना चाहिए, जो राज्य के विधि द्वारा एवं अंतरराष्ट्रीय अर्थों में गठित हुआ हो। और जो की किसी मामले का प्रत्यक्ष निर्धारण करे जिसमें प्रांग न्याय के सिद्धान्त का तर्क प्रस्तुत किया गया हो।

77.  नरसिम्हाराव बनाम वेंकट लक्ष्मी, (1991) 3 एससीसी 451

वैवाहिक मामलों में विदेशी निर्णयों को भारतीय न्यायालयों द्वारा मान्यता दी जाएगी, यदि विदेशी न्यायालय के क्षेत्राधिकार के साथ-साथ जिन आधारों पर उपचार प्रदत्त किया गया है, वह वैवाहिक विधि के अनुसार है, जिसके तहत पक्षकार विवाहित थे।

78.  सत्या बनाम तेजा सिंह, .आई.आर. 1975 एससी 105

प्रत्येक राज्य के व्यक्तिगत अंतर्राष्ट्रीय विधि के नियम अलग-अलग चीजों पर अलग-अलग अथीं में भिन्न होते हैं लेकिन राष्ट्रों के सौहार्द एवं साहचर्य के कारणवश कुछ नियमों को सभ्य क्षेत्राधिकार के रूप में मान्यता दी जाती है। ऐसी मान्यता न्याय, साम्या और सद्विवेक पर आधारित है। यह लोक अंतर्राष्ट्रीय विधि का एक सिद्धान्त है कि यदि कोई विदेशी निर्णय कपट से प्राप्त किया गया हो, तो वह पूर्व न्याय के रूप में कार्य नहीं करेगा। कपट सभी न्यायिक कृत्यों को शून्य कर देती है।

 

वाद के पक्षकार

(Parties of Suit)

79.  मोहम्मद हुसैन गुलाम अली शरीफी बनाम म्युनिसिपल कॉपोरेशन आफ ग्रेटर मुंबई, (2020) 14 एस. सी. सी. 392

वाद का स्वामी होने के कारण वादी को अपने वाद में किसी भी व्यक्ति को पक्षकार के रूप में जोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है, जब तक कि यह अभिवचन को ध्यान में रखते हुए अभिनिर्धारित नहीं किया जाता है और अनुतोष का दावा किया जाता है कि उस व्यक्ति को पक्षकार एक आवश्यक पक्ष है और उसकी उपस्थिति के बिना न तो वाद की कार्यवाही संचालित की जा सकती है और न ही कोई अनुतोष प्रदान किया जा सकता है।

80.  कस्तूरी बनाम इय्यमपेरूमल, (2005) 6 एस. सी. सी. 733,

न्यायालय की अधिकारिता के प्रश्न पर, सी पी सी आदेश 1 नियम 10 में उस पार्टी को जोड़ने के लिए जो वादी द्वारा वाद में पक्षकार नहीं बनाई गई है, तब तक नहीं उठता जब तक कि जोड़े जाने वाली पक्षकार का विवाद में प्रत्यक्ष और विधिक हित नहीं होता है।

81.  स्वप्ना मोहंटी बनाम उड़ीसा राज्य, (2018) 17 एससीसी 621;

 

ग्लोब ग्राउंड (इंडिया) एम्प्लाइज यूनियन बनाम लुफ्थांसा जर्मन एयरलाइन्स, (2019) 15 एससीसी 273

आवश्यक पक्षकार एक ऐसा व्यक्ति है जिसकी उपस्थिति प्रभावी ढंग से और पूरी तरह से निर्णय करने और विवाद में उठाए गए सभी विवाद्यकों के निस्तारण के लिए आवश्यक है। यह एक ऐसा पक्षकार है जिसकी अनुपस्थिति में कोई प्रभावी आदेश नहीं दिया जा सकता है। एक उचित पक्षकार वह है जिसकी अनुपस्थिति में प्रभावी आदेश पारित किया जा सकता है लेकिन जिसकी उपस्थिति पूर्ण और अंतिम निर्णय के लिए आवश्यक है।

82.  कस्तूरी बनाम इय्याम्पेरुमल, .आई.आर. 2005 एससी 2813

एक पक्षकार आवश्यक पक्षकार है या नहीं यह निर्धारित करने के लिए उच्चतम न्यायालय ने दो परीक्षण निर्धारित किएः-

1.      प्रश्नगत कार्यवाही में शामिल मामले के संबंध में ऐसे पक्षकार के विरुद्ध कुछ उपचार का अधिकार होना चाहिए;

2.      ऐसे पक्षकार की अनुपस्थिति में प्रभावी डिक्री पारित करना संभव नहीं होना चाहिए।

83.  अनिल कुमार बनाम शिवनाथ, (1995) 3 एससीसी 147

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि आवश्यक पक्षकार के नियम का उद्देश्य सभी व्यक्तियों को अभिलिखित करना है जो विषय-वस्तु से संबंधित विवाद के पक्षकार हैं ताकि कार्यवाही की असुविधा और बहुलता से बचा जा सके।

84.  अलियथाममुदा बीठतेबिययापपुरा पूकोया बनाम पट्टकल चेरियाकोया, (2019) 16 एससीसी 1

प्रतिनिधि वाद में समझौता करने के लिए, न्यायालय की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है। अनुमति देने से पहले न्यायालय को ऐसे व्यक्तियों को जो की प्रस्तुत वाद में हितग्राही हों, ऐसे तरीकों से, जो न्यायालय को उचित लगे के माध्यम से सूचित करता होगा।

85.  कल्याण सिंह बनाम छोटि, .आई.आर. 1990 एससी 397

प्रतिनिधिक वाद के लिए अनुमति देने में न्यायालय द्वारा विचार किया जाने वाला प्रमुख बिंदु है कि क्या वह संतुष्ट है कि आदेश 1 नियम 8 (Order 1 Rule 8) में निर्धारित प्रक्रिया को अपनाने का औचित्य साबित करने के लिए सामुदायिक हित में मौजूद है।

86.  अलियथाममुदा बीठतेबिययापपुरा पूकोया बनाम पट्टकल चेरियाकोया, (2019) 16 एससीसी 1

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि न्यायालय से अनुमति प्राप्ति के बिना और पक्षकारों को सूचना जारी किए बिना प्रतिनिधिक वाद में हासिल की गई 'समझौता डिक्री' शून्य होगी।

 

आदेश 2 नियम 2

(Order 2 Rule 2)

87.  प्रमोद कुमार बनाम जालक सिंह, (2019) 6 एससीसी 621

आदेश 2 के नियम 2 के प्रतिरोध में केवल वही दावा उत्पन्न होगा, जो छूट गया है या त्याग दिया गया है और ऐसा उपचार जिसका दावा नहीं किया गया है, वह एक ही वाद हेतुक से उत्पन्न होता है। यदि मामले में एक से अधिक वाद हेतुक हैं तो आदेश 2 नियम 2 लागू नहीं होगा।

88.  केवल सिंह बनाम लाजवंती, .आई.आर. 1980 एससी 161

आदेश 2 नियम 2 के अवरोध को लागू करने से पहले निम्नलिखित तीन प्रश्न पूछे जाने हैं:-

1.      क्या पूर्ववर्ती वाद और पश्चातवर्ती वाद में वाद हेतुक एक समान है?

2.      क्या पश्चातवर्ती वाद में मांगा गया उपचार एक वादपत्र में दिए गये अभिवचन के आधार पर पश्चातवर्ती वाद में दिया जा सकता था?

3.      क्या वादी पूर्ववर्ती वाद में उपस्थित वाद हेतुक पर विशेष उपचार की मांग से चूक गया था?

 

अभिवचन

(Pleadings)

89.  दाहिबें बनाम अरविंद भाई कल्याणजी भानुसाली, (2020) 7 एस. सी. सी. 366,

आदेश 7 नियम 11 के तहत यह निर्धारित करना न्यायालय का कर्तव्य है कि क्या वाद, वादपत्र में दिये गये अभिवचनों वाद हेतुक (cause of action) को प्रकटित करता है, और जिन दस्तावेजों पर भरोसा किया गया है उनके साथ संयोजन के रूप में पढ़ने पर वाद को किसी कानून द्वारा प्रतिबंधित किया गया है या नहीं।
आदेश 7 नियम 14 के संबंध में, वादपत्र के साथ दाखिल किए गए दस्तावेजों को आदेश 7 नियम 11 (क) के तहत आवेदन में निर्णय लेने के लिए विचार में लेना आवश्यक है।

90.  वेश अग्रवाल पंचायत बनाम इंद्र कुमार, (2020) 12 एस. सी. सी. 809,

वादपत्र को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसे पूर्व न्याय (res judicata) द्वारा वर्जित कियाग या है। केवल वाद के परिशीलन पर यह नहीं कहा जा सकता है कि वाद को पूर्व न्याय के सिद्धांत द्वारा वर्जित किया गया था। विचारण के दौरान ही इस मुद्दे का फैसला किया जाना है।

91.  एक्स एल करियर्स बनाम फ्रैंकफिन्न एविएशन सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, 2020 एस.सी.सी. ऑनलाइन एस.सी. 621

यदि सी.पी.सी. के आदेश VII नियम 10 और 10ए के तहत एक वादपत्र लौटाया जाता है, जिस न्यायालय में उसे संस्थित किया जाना चाहिए था, तो वादपत्र एक नए वादपत्र के रूप में माना जाएगा और परीक्षण को अभिनवतया योजित किया जाना है। न्यायालय ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कम्पनी लिमिटेड बनाम तजपैरास एसोसिएट्स और एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड, (2019) 9 एस.सी.सी. 435, में भी फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें यह धारित किया गया कि 1.2.1977 दिनांकित संशोधन के अनुसरण में, नियम 10ए के आदेश VII के लिए दाखिल किए जाने के कारण, यह नहीं कहा जा सकता है कि सभी परिस्थितियों में उपयुक्त न्यायालय के समक्ष प्रस्तुति के लिए वादपत्र की वापसी एक ताजा दाखिलों के रूप में मानी जाएगी।

92.  ऑटो कार्स बनाम कार्गो मूवर्स, (2018) 15 एस.सी.सी. 166

धारा 27 तथा आदेश 5 नियम 20 (3) के प्रावधानों का अनुपालन न करना अनिवार्य है। उस आवश्यकता का अनुपालन न करना तात्विक अशक्तता के बराबर होगा, जो संपूर्ण कार्यवाही को दूषित करती है।

93.  गणेश ट्रेडिंग कं. बनाम मोजी राम, .आई.आर. 1979 एससी 484

सिविल मामलों में अभिवचन से संबंधित उपबंध का आशय प्रत्येक पक्ष को दूसरे पक्ष के मामले की सूचना देना है ताकि यह पक्षकारों के बीच वास्तविक विवाद्यक का अवधारण करने में न्यायालय को समर्थ बना सके।

94.  उद्भव सिंह बनाम माधव राव सिंधिया, .आई.आर. 1976 एससी 744

वाद हेतुक या प्रतिरक्षा के अस्तित्व को स्थापित करने के लिए जिन प्राथमिक तथ्यों को एक पक्षकार द्वारा विचारण में सिद्ध किया जाना चाहिए, वह महत्त्वपूर्ण तथ्य हैं।

95.  पोन्नायल बनाम करुप्पाणाम, (2019) 11 एससीसी 800

सिविल वादों का निर्णय अभिवचन और विवाद्यकों के आधार पर किया जाता है। वाद के पक्षकारों को अभिवचनों से परे जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

96.  वीरेंद्रनाथ बनाम सतपाल सिंह, .आई.आर. 2007 एससी 581

'महत्त्वपूर्ण तथ्य' (material fact) वे तथ्य हैं जिन पर वादी का वाद हेतुक (कार्रवाई का कारण) या प्रतिवादी की प्रतिरक्षा निर्भर करती है।

97.  राजा राम बनाम जय प्रकाश सिंह, (2019) 8 एससीसी 701

कपट, असम्यक असर और प्रपीड़न के मामलों में, पूर्ण विवरणों को अभिवचन में निर्धारित किया जाना चाहिए और केवल निर्धारित किए गए विवरण के आधार पर ही मामलो में निर्णय लिया जा सकता है। पक्षकारों को दूसरे द्वारा प्राप्त अनुचित लाभ के प्रभाव की सुस्पष्ट तरीके से निवेदन करना चाहिए।

98.  हरीश चन्द्र बनाम त्रिलोकी सिंह, .आई.आर. 1957 एससी 444

अभिवचनों का निर्वचन बहुत ही कठोरता से नहीं किया जाना चाहिए। उनकी उदारतापूर्वक व्याख्या करनी होगी और उसे मामले के सार से संबंधित होना चाहिए।

99.  साठी विजय कुमार बनाम तोता सिंह, (2006) 13 एससीसी 353

अभिवचनों को अमान्य करने की शक्ति असाधारण प्रकृति की है और इसे न्यायालय द्वारा संयमपूर्वक और अत्यधिक सावधानी के साथ प्रयोग किया जाना चाहिए।

100.  एम. रेवन्ना बनाम अंजनम्मा, (2019) 4 एससीसी 332

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि वाद का विचारण शुरू होने के बाद संशोधन आवेदन पर विचार करने के दौरान न्यायालयों को विचार करना होगा कि क्या यह सद्भावनापूर्वक किया गया है या असद्भावनापूर्वक किया गया है और क्या यह दूसरे पक्ष के प्रति ऐसी क्षति का कारण बनता है जिसे धन के माध्यम से पर्याप्त रूप से क्षतिपूर्ति नहीं दी जा सकती है।

101.  उषा देवी बनाम रिजवान अहमद, (2008) 3 एससीसी 717

संशोधन के माध्यम से शामिल किए जाने के लिए मांगी गई संशोधन की महत्तता को संशोधन के लिए प्रार्थना की अनुमति देने के स्तर पर निर्णीत नहीं किया जा सकता है।

102.  एम/एस एम. लक्ष्मी एवं कंपनी बनाम डॉ. आनंद आर. देशपांडे, .आई.आर. 1973 एससी 171

संशोधन के आवेदन पर विचार करते समय, न्यायालय विवाद को कम करने, दोनों पक्षों के अधिकारों को सुरक्षित रखने और न्याय को प्रदान करने के लिए, पश्चातवर्ती घटनाओं पर संज्ञान ले सकती है।

103.  जय जय राम मनोहर लाल बनाम नेशनल बिल्डिंग कंपनी, .आई.आर. 1969 एससी 1267

संशोधन प्रदान करने की शक्ति तकनीकी सीमाओं द्वारा नियंत्रित नहीं है। पक्षकारों के नाम के गलत विवरण को सुधारने के उद्देश्य से वादपत्र का संशोधन स्वीकार्य योग्य है।

104.  हरिदास अलिदास थडानी बनाम गोदरेज रुस्तम करमानी, .आई.आर. 1983 एससी 319

न्यायालयों को अभिवचन के संशोधन की प्रार्थना को स्वीकार करने में बेहद उदार होना चाहिए जब तक कि दूसरे पक्ष के साथ गंभीर अन्याय अथवा अपूर्णीय क्षति न हो।

105.  वरुण पहवा बनाम रेणु चौधरी, (2019)15 एससीसी 628

अधिवक्ता द्वारा पक्षकारों के वाद हेतुक/पक्षकारों का ज्ञापन बताते समय, पक्षकारों का वर्णन करते हुए अनजाने में हुई प्रक्रियात्मक भूल को सुधारने के लिए वादपत्र में संशोधन अनुमन्य है। प्रक्रिया के नियम, पक्षकारों के सारवान अधिकारों को पराजित नहीं कर सकते है।

106.  एम. रेवन्ना बनाम अंजनम्मा, (2019)4 एससीसी 332

अगर संशोधन पूरी तरह से अलग, नया और विवाद से असंगत मामला पेश करता है या वाद के मूल चरित्र को चुनौती देता है तो संशोधित करने से इनकार किया जा सकता है। विचारण शुरू होने के बाद जो व्यक्ति संशोधन की मांग करता है, उस पर यह साबित करने का भार होता है कि सम्यक् तत्परता के बावजूद, ऐसा संशोधन पहले नहीं मांगा जा सकता था।

107.  ओएनजीसी बनाम मॉडर्न कंस्ट्रक्शन कंपनी, (2014) 4 एससीसी 648

जब गलत न्यायालय से वापस होने के बाद उपयुक्त न्यायालय में वादपत्र संस्थित किया जाता है, तो इसे वाद की निरंतरता नहीं कहा जा सकता है। उपयुक्त न्यायालय में वाद संस्थित किए जाने पर वाद प्रारंभ होना समझा जाना चाहिए।

108.  माधव प्रसाद अग्रवाल बनाम एक्सिस बैंक, (2019)7 एससीसी 158

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है की वाद या तो पूरी तरह से खारिज किया जा सकता है या पूर्णतया नहीं। वाद का एक हिस्सा जो कि प्रतिवादीयों में से के कुछ के विरुद्ध है उसे अस्वीकार तथा अन्य के विरुद्ध जारी रखने की अनुमती नहीं है।

109.  शौकत हुसैन मुहम्मद पटेल बनाम खातुनबेन मोहम्मदभाई पोलारा, (2019)10 एससीसी 226

वादपत्र की अस्वीकृति के लिए आवेदन को सुनते समय, वादपत्र के संपूर्ण बिंदुओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

110.  कर्नल श्रवण कुमार जयपुरियार बनाम कृष्ण नंदन सिंह एवं अन्य, (2019), सिविल अपील संख्या. 6720/2019. 02.09.2019

उच्चतम न्यायालय ने माना कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत एक वाद को खारिज किया जा सकता है, अगर वह स्पष्ट रूप से तंग करने वाला, गुणहीन और आधारहीन है तथा इस अर्थ में कि वह स्पष्ट रूप से वाद दायर करने के अधिकरों को वर्णित नहीं करता है। यहां चिंतन मात्र या संभावना कि उचित अधिकार के आधार के अभाव में अधिकार उल्लंघन का हो सकता है, यह कहने के लिए पर्याप्त नहीं होगा कि वादपत्र, वाद हेतुक का कारण बनाता है।

111.  राघवेन्द्र शरण सिंह बनाम राम प्रसन्न सिंह, सिविल अपील संख्या 2960/2019, 13.03.2019 को निर्धारित

उच्चतम न्यायालय ने माना कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम (11) डी के तहत एक वादपत्र को खारिज किया जा सकता है, अगर वाद-बिंदुओं पर विचार करते हुए यह पाया जाता है कि वाद स्पष्ट रूप से परिसीमा विधि द्वारा वर्जित है।

112.  मयार एच. के. लिमिटेड बनाम ऑनर्स एंड पार्टीज, वेसल एम.वी. फॉर्च्यून एक्सप्रेस, .आई.आर. 2006 एससी 1828

आदेश 7 नियम 11 में निर्दिष्ट वादपत्र की अस्वीकृति के लिए आधार संपूर्ण नहीं हैं। अन्य प्रासंगिक आधारों पर भी एक वादपत्र को अस्वीकृत किया जा सकता है। जहां वाद तंग करने वाला अथवा गुणहीन हो तथा उस पर वाद चलाये जाने लिए स्पष्ट अधिकार नहीं पाया जाता हो, तब न्यायालय वाद को अस्वीकार कर सकती है।

113.  रूप लाल साठी बनाम नछत्तर सिंह गिल, .आई.आर. 1982 एससी 1559

वादपत्र का केवल एक हिस्सा खारिज नहीं किया जा सकता है और यदि वाद हेतुक का खुलासा नहीं किया जाता है, तो वादपत्र को पूर्ण रूप से अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए।

114.  ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम तेजपारस एसोसिएट्स ऍड एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड, (2019)9 एससीसी 435

न्यायालय में ऐसी याचिका का पुनःप्रस्तुति, जो वादपत्र की अस्वीकृति के लिए की गयी है, सभी परिस्थितियों में नवीन प्रस्तुति के रूप में नहीं माना जा सकता है जब याचिका को इस तरह के पुनःप्रस्तुति के लिए बादी को लौटा दिया जाता है।

115.  कैलाश बनाम ननखु, .आई.आर. 2005 एससी 2441; सलेम एडवोकेट बार एसोसिएशन (2) बनाम भारत संघ, (2005)6 एससीसी 344

लिखित कथन प्रस्तुत करने के लिए 90 दिनों की समय सीमा आज्ञापक नहीं है। न्यायालय १० दिनों के अतिरिक्त लिखित कथन प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा का विस्तार कर सकती है लेकिन इसे केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाना चाहिए और नियमित आदेश पारित नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने सामंजस्यपूर्वक आदेश 8 नियम 1, 9 और 10 का निर्वचन किया है।

116.  एस सी जी कॉन्ट्रैक्ट्स (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड बनाम के. एस. चमनकार इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड, (2019)12 एससीसी 210

आदेश 5 नियम 1 जिसको आदेश 8 नियम 1 और 10 सिविल प्रक्रिया संहिता के साथ पढ़ा जाता है (जैसा कि 2016 के अधिनियम 4 द्वारा निर्दिष्ट मूल्य के वाणिज्यिक विवादों से संबंधित वाद के लिए संशोधित किया गया है), के स्पष्ट, निश्चित और आज्ञापक प्रावधान धारा 151 सिविल प्रक्रिया संहिता अंतर्निहित शक्तियों के द्वारा दरकिनार नहीं किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने माना कि सिविल प्रक्रिया संहिता में वाणिज्यिक न्यायालय, वाणिज्यिक प्रभाग और उच्च न्यायालय के वाणिज्यिक अपीलीय डिवीजन संहिता, 2015 द्वारा योजित परन्तुक आज्ञापक है, और यदि लिखित कथन वाद के समन की तामीली की तारीख से 120 दिनों के भीतर दायर नहीं किया गया है, तो कोई भी लिखित कथन वाणिज्यिक वाद में नहीं लिया जा सकता है।

117.  अशोक कुमार कालरा बनाम विंग कमांडर सुरेन्द्र अग्निहोत्री एवं अन्य, (2019) सुप्रीम एससी 1280

उच्चतम न्यायालय ने माना है कि एक न्यायालय अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकती है और विचारण में लिखित कथन के बाद व विवाद्यकों के स्थिरीकरण के स्तर तक प्रतिदावा दायर करने की अनुमति दे सकती है। सीपीसी का आदेश 8 नियम 6A लिखित कथन दर्ज करने के बाद प्रतिदावा दाखिल करने पर प्रतिबंध नहीं लगाता है।

 

पक्षकारों की उपस्थिति और गैर-उपस्थिति
(Appearance and Nonappearance of Parties)

118.  मधुमिलन सिंटेक्स लिमिटेड बनाम भारत संघ, .आई.आर. 2007 एससी 1481

यदि न्यायालय संतुष्ट है कि वादी के उपस्थित न होने का कारण पर्याप्त था, तो वह वाद को खारिज करने के आदेश को अपास्त कर सकता है और वाद की कार्यवाही के लिए एक दिन तय कर सकता है।

119.  जी.पी. श्रीवास्तव बनाम आर. के. रायज़ादा, जानी .आई.आर. 2000 एससी 1221, 82, 145

शब्द 'पर्याप्त कारण' (sufficient cause) की निर्वचन उदारतापूर्वक किया जाना चाहिए ताकि न्यायालय को शक्ति एक्स डेबिटो जस्टिटे (ex debito justitae) के तरीके से इस्तेमाल करने में समर्थ बनाया जा सके। आदेश 9 नियम 13 के उद्देश्य के लिए 'पर्याप्त कारण' को नपी-तुली अभिव्यक्ति के रूप में चित्रित किया जाना है, जिसके लिए कोई कठोर नियम निर्धारित नहीं किये जा सकते हैं। प्रतिवादी द्वारा गैर-उपस्थिति के लिए 'पर्याप्त कारण' तय करने की तारीख वह तारीख है जिस दिन एक पक्षीय (ex parte) डिक्री पारित की गई थी न कि प्रतिवादी की पिछले चूक अथवा उसकी पूर्ववर्ती लापरवाही का दिन।

120.  अर्जुन सिंह बनाम मोहिंदर कुमार, .आई.आर. 1964 एससी 993

आदेश 9 नियम 7 के तहत 'अच्छे कारण' और आदेश 9 नियम 13 के तहत 'पर्याप्त कारण' के दो परीक्षणों को संतुष्ट करने के लिए स्थापित तथ्यों के बीच कोई विशेष अंतर नहीं है। कोई ऐसा 'अच्छा कारण' नहीं हो सकता है जो पर्याप्त' ना हो।

121.  संग्राम सिंह बनाम इलेक्शन ट्रिब्यूनल, कोटा, .आई.आर. 1955 एससी 42

एक पक्षीय कार्यवाही का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रतिवादी को वाद के पश्चातवीं सभी कार्यवाही में उपसंजात होने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यह केवल सुनवाई के उस विशेष दिन से संबंधित है जिस पर प्रतिवादी अनुपस्थित रहता है।

122.  जी. रत्ना राज (एलआरएस द्वारा) बनाम श्री मुथूकुमारस्वामी परमानेंट फंड लिमिटेड, (2019)11 एससीसी 301

उच्चतम न्यायालय ने माना कि वादी का साक्ष्य लेने के बाद, प्रतिवादी की उपस्थिति के बिना पारित डिक्री, एकपक्षीय डिक्री होती है। इस तरह की डिक्री को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश १ नियम 13 के तहत अपास्त किया जा सकता है।

 

निष्पादन

(Execution)

123.  स्नेह लता गोयल बनाम पुष्पलता, (2019)3 एससीसी 594

उच्चतम न्यायालय ने माना कि एक निष्पादन न्यायालय के पास यह निर्णीत करने का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है कि क्या न्यायालय ने जो डिक्री पारित की है उसमे क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार था या नहीं। क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार के अभाव के लिए आपत्ति को सुनने के लिए कोई सिविल न्यायालय अपने क्षेत्राधिकार की अंतर्निहित कमी अथवा उसके मूल के परे नहीं जायेगा।

124.  सर सोभा सिंह एंड सन्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम शशि मोहन कपूर (डी) (एलआरएस द्वारा), 2019(9) स्केल 369

उच्चतम न्यायालय ने माना कि जब तक न्यायालय डिक्री धारक को डिक्री की प्रमाणित प्रति दाखिल करने का निर्देश नहीं देती तब तक डिक्री की प्रति निष्पादन आवेदन के साथ दायर करना आवश्यक नहीं है।

125.  एस. भास्करन बनाम सेबेस्टियन (मृत) (एलआरएस द्वारा) (2019)9 एससीसी 161

उच्चतम न्यायालय ने पुनः प्रतिपादित किया है कि एक निष्पादन न्यायालय निष्पादन के दौरान आदेश अथवा डिक्री के पीछे नहीं जा सकती है।

126.  मेरला रमन्ना बनाम नल्लापराजू, .आई.आर. 1956 एससी 87

जिस न्यायालय ने वास्तव में डिक्री पारित की है, वह उस विषय-वस्तु को दूसरे न्यायालय की अधिकारिता में स्थानांतरित किए जाने मात्र से निष्पादित करने की अधिकारिता को नहीं खोता है।

127.  किरण सिंह बनाम चमन पासवान, .आई.आर. 1954 एससी 340

एक डिक्री का निष्पादन करने वाला न्यायालय डिक्री के परे नहीं जा सकता है और उसे वैसा ही निष्पादित करना चाहिए जैसी वह प्रस्तुत हो। ऐसे न्यायालय के पास डिक्री की वैधता और शुद्धता या औचित्यता के विषय में किसी भी आपत्ति को सुनने की कोई शक्ति नहीं है। क्षोत्रधिकार की अंतर्निहित कमी के मामले में ऐसे न्यायालय की डिक्री शून्य होगी और इसकी अवैधता को प्रयोज्य किया जा सकता है, चाहे वह निष्पादन की कार्यवाही में हो या संपार्श्विक कार्यवाही में।

128.  घंटेशर बनाम मदन मोहन, .आई.आर. 1997 एससी 471

जो न्यायालय डिक्री पारित करता है उसका यह कर्तव्य है कि वह इस निर्णय को निष्पादित करने की दृष्टि से देखे कि इस तरह के डिक्री से प्राप्त अधिकारों और दायित्वों का अंतिम रूप से अनुपालन होता है या नहीं। जब तक यह चरण पूरर्ण नहीं हो जाता, तब तक न्यायालय ने जो डिक्री पारित की है, वह अधिकारहीन (functus officio) नहीं हो जाती है।

129.  पंजाब राज्य बनाम दीना नाथ, .आई.आर. 1984 एससी 352

धारा 60 (1) का परंतुक, मुख्य प्रावधान में निर्धारित सामान्य नियम के अपवाद की प्रकृति का है।

 

विशेष वाद

(Special Suit)

130.  रघुनाथ दास बनाम भारत संघ, .आई.आर. 1969 एससी,

 

बिहारी चौधरी बनाम बिहार राज्य, .आई.आर. 1984 एससी 1043

धारा 80 के तहत सूचना का प्राथमिक उद्देश्य सरकार या लोक अधिकारी को भावी वादी द्वारा लगाए गए दावे को निपटाने और अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचने का अवसर देना है।

131.  वाई. सवारिमुथू बनाम तमिल नाडु राज्य, (2019) 13 एससीसी 142

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 (1) के तहत सूचना में उस धारा को निर्दिष्ट करने की आवश्यकता नहीं है जिसमें यह दायर की गई है इसमें धारा 80 (3) के सभी आवश्यक तत्व निहित हो।

132.  बिहार चौधरी बनाम बिहार राज्य, .आई.आर. 1984 एससी 1043

धारा 80 के तहत सूचना का उद्देश्य सरकार या लोक सेवक को विधिक स्थिति में सामंजस्य बनाने और मुकदमेबाजी से बचने के लिए आवश्यक होने पर संशोधन करने का अवसर देना है। धारा 80 का उद्देश्य न्याय की उन्नति है।

133.  पुखराज बनाम राजस्थान राज्य, .आई.आर. 1973 एससी 2591

अभिव्यक्ति 'कार्य' में अवैध लोप भी शामिल है। यदि लोक अधिकारी द्वारा अपनी व्यक्तिगत क्षमता में किए गए कृत्य से संबंधित कोई वाद है, तो ऐसे मामले में किसी सूचना की आवश्यकता नहीं है।

134.  राम चन्द्र आर्य बनाम मान सिंह एवं अन्य, .आई.आर. 1968 एससी 954

यदि अभिभावक को नियुक्त किए बिना एक अवयस्क के विरुद्ध डिक्री पारित की जाती है, तो ऐसी डिक्री अकृत होगी।

135.  यूनियन बैंक ऑफ इंडिया बनाम खादर इंटरनेशनल कंस्ट्रक्शन, (2001) 5 एससीसी 22

आदेश 33 नियम 1 में विहित शब्द 'व्यक्ति' का उदार निर्वचन किया जाना चाहिए। इसमें नैसर्गिक व्यक्तियों के साथ-साथ विधिक व्यक्तियों का भी उल्लेख होना चाहिए। एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी इस प्रावधान के तहत आवेदन को अच्छी तरह से न्यायालय में रख सकती है।

 

अस्थायी व्यादेश

(Temporary Injunction)

136.  मार्टिन बर्न लिमिटेड बनाम आर. एन. बैनर्जी, .आई.आर. 1958 एससी 79

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि एक प्रथम दृष्टया मामले का तात्पर्य यह नहीं है कि कोई मामला साबित हुआ है बल्कि एक ऐसा मामला जिसे स्थापित किया जा सकता है अगर सबूत के आधार पर उस मामले को माना जाए तब मामला साबित होता है।

137.  मनोहर लाल चोपड़ा बनाम सेठ हीरालाल, .आई.आर. 1962 एससी 527

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि यदि मामला आदेश 39 में उल्लिखित आधारों के तहत नहीं आता है, तब भी न्यायालय द्वारा अंतरिम व्यादेश, संहिता की धारा 151 के तहत अंतर्निहित शक्तियों को अनुप्रयोग करते हुए प्रदान कर सकता है।

138.  यू. सी. सुरेन्द्र नाथ बनाम मांबलीज बेकरी, (2019) एससीसी ऑनलाइन एससी 923

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि किसी व्यक्ति को आदेश 39 नियम 2A के जान-बूझकर अवज्ञा करने का दोषी केवल 'अवज्ञा' के लिए नहीं, बल्कि 'जान-बूझकर अवज्ञा' के लिए ठहराया जा सकता है।

139.  मॉर्गन स्टैनली म्यूचुअल फंड बनाम कार्तिक दास, (1994)4 एससीसी 225

सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित कारकों को निर्धारित किया है जो एक पक्षीय अंतरिम व्यादेश देने से पहले न्यायालय का मार्गदर्शन करेंगे:-

1.      क्या एक पक्षीय अंतरिम व्यादेश से इंकार करने से इसको प्रदान करने की तुलना में अधिक अन्याय होगा;

2.      न्यायालय एक पक्षीय अंतरिम व्यादेश के प्रदत्त के लिए पक्षकारों से अत्यधिक सद्भावना की अपेक्षा करेगा;

3.      क्या इससे वादी को अपूरणीय तथा गंभीर क्षति होगी;

4.      न्यायालय द्वारा सामान्य सिद्धांतों जैसे कि प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति पर भी भी विचार किया जाएगा;

5.      यदि एक पक्षीय अंतरिम व्यादेश दिया भी जाता है तो भी वह सीमित अवधि के लिए होगा।

140.  समीर नारायण भोजवानी बनाम ऑरोरा प्रॉपर्टीज एंड इन्वेस्टमेंट, (2018)17 एससीसी 203

अंतरिम आज्ञापक व्यादेश केवल उन परिस्थितियों में प्रदत्त किया जा सकता है जो स्पष्ट हो और प्रथम दृष्टया तथ्य स्पष्ट रूप से इस निष्कर्ष को न्यायोचित ठहरा देती है कि एक पक्षकारों द्वारा यथास्थिति में परिवर्तन किया गया है और न्याय के हित की मांग है कि यथास्थिति को पुनः बहाल किया जाए। उपचार की मांग को अंतिम उपचार के विचार के समय माना जा सकता है न कि मध्यवर्ती स्तर पर।

141.  मोदी एंटरटेनमेंट नेटवर्क बनाम डब्ल्यू. एस. जी. क्रिकेट, 2003 (1) स्केल 388

जब कोई न्यायालय किसी वाद या कार्यवाही को रोक देता है तो उसे किसी विदेशी न्यायालय सहित किसी अन्य न्यायालय में मामले को स्थापित करने या मुकदमे चलाने से रोकने के लिए इसे 'वाद-विरोधी निषेधाज्ञा' (anti suit injunction) कहा जाता है।

142.  मनोहर लाल बनाम सेठ हीरालाल, .आई.आर. 1962 एससी 527

जब मामला आदेश 39 के तहत नहीं आता है तो न्यायालय द्वारा संहिता की धारा 151 के तहत विहित अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग करते हुए अंतरिम व्यादेश जारी किया जा सकता है।

 

अपील

(Appeals)

143.  पेरी कांसाग्रा बनाम स्मृति मदन कांसाग्रा, (2019) 20 एस. सी. सी. 753

पुनरीक्षण न्यायालय स्वयं अपने आदेश के विरुद्ध अपील में नहीं बैठता है। यह इस सामान्य नियम का अपवाद है कि एक बार निर्णय पर हस्ताक्षर होने के बाद इसमें परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए। त्रुटि के सुधार के लिए पुनर्विलोकन का प्रयोग किया जा सकता है न कि किसी राय के स्थानापन्न के लिए। आदेश 47 नियम 1 के तहत एक निर्णय तब पुनर्विलोकन के लिए खुला हो सकता है जब अभिलेख में सामने कोई गलती या त्रुटि दिखाई दे। एक त्रुटि जो स्वतः स्पष्ट नहीं है और तर्क की प्रक्रिया के द्वारा पता लगाना है, और यह अभिलेख में सामने त्रुटि स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है।

144.  त्रिलोकी नाथ सिंह बनाम अनिरुद्ध सिंह, (2020) 6 एस. सी. सी. 629,

जहां समझौता करने के लिए एक पार्टी इस तरह के समझौता के निष्पादन से इनकार करती है, एक चुनौती को उठाने के लिए आदेश 43 नियम 1-ए (2) के तहत अधिकार दिया गया है। धारा 96 (3) इस तरह की अपील पर रोक नहीं लगाता। धारा 96 (3) वहां लागू होता है जहां समझौता का तथ्य विवादित नहीं होता है। समझौते की वैधता को चुनौती देते हुए समझौते के लिए अजनबी द्वारा दाखिल सिविल वाद चलाने योग्य नहीं है।

145.  गुजरात एग्रो इंडस्ट्रीज बनाम म्यूनीसिपल कॉपीरेशन, .आई.आर. 1999 एससी 1818

अपील संविधि का सृजन है और यह एक अंतर्निहित अधिकार नहीं है।

146.  भिवचंद्र शंकर मोरे बनाम बालू गंगाराम, (2019)6 एससीसी 387

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 (2) के तहत अपील का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है और प्रतिवादी को अपील के वैधानिक अधिकार से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता है कि उसके द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 9 नियम 13 के तहत दायर किया गया आवेदन खारिज कर दिया गया है।

147.  आर. एस. अंजय्या गुप्ता बनाम थिपय्या सेट्टी, (2019)7 एससीसी 300

प्रथम अपील में पक्षकारों को विधि के प्रश्नों के साथ-साथ तथ्यों पर भी सुनवाई का अधिकार है। न्यायालय को सभी पहलुओं को अपने समक्ष संबोधित करवाने और कारणों को वर्णित करते हुए मामले को निणींत करने की आवश्यकता है।

148.  टेक सिंह बनाम शशि वर्मा, (2019) 16 एससीसी 678

उच्चतम न्यायालय ने दोहराया कि धारा 115 के तहत दायर पुनरीक्षण याचिकाएं अन्तर्वर्ती आदेशों के विरुद्ध पोषणीय नहीं हैं।

149.  मनोहर शंकर नाले बनाम जयपालसिंह शिवलाल सिंह राजपूत, (2008)1 एससीसी 520

जब एक पुनर्विलोकन याचिका को खारिज कर दिया जाता है तब विलय के सिद्धांत (doctrine of merger) का कोई आवेदन नहीं हो सकता। परंतु यह कहने के लिए एक अलग बात है कि निर्णीत ऋणि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 47 नियम 1 सपठित धारा 114 के संदर्भ में पुनर्विलोकन के लिए एक आवेदन दायर करने का हकदार था, कि डिक्री धारक के पक्ष में पारित डिक्री को खारिज करने वाले आदेश के साथ पुनर्विलोकन आवेदन का विलय हो जाता है।

150.  तुलसीधरा बनाम नरायानप्पा, (2019)6 एससीसी 409


उच्च न्यायालय द्वारा द्वितीय अपील में तथ्यों के समवर्ती निष्कषीं के साथ हस्तक्षेप द्वितीय अपील में अनुज्ञेय है जब तथ्य या सुसंगत साक्ष्य पर विचार नहीं किया गया हो या जब प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा अग्राह्य साक्ष्य पर भरोसा करके निष्कर्षों पर पहुंचा जाता है।

151.  तुलसीधरा बनाम नरायानप्पा, (2019)6 एससीसी 409

द्वितीय अपील में क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने के लिए विधि के सारवान प्रश्न का निर्माण आवश्यक (sine qua non) है।

152.  गुरनाम सिंह बनाम लेहना सिंह, (2019)7 एससीसी 641

द्वितीय अपील में उच्च न्यायालय प्रथम अपीलीय न्यायालय के लिए अपनी राय प्रतिस्थापित नहीं कर सकता, जब तक कि वह यह न पाए कि निचली न्यायालय द्वारा तैयार निष्कर्ष इन वजहों से त्रुटिपूर्ण थे कि –

1.      विधि के आज्ञापक प्रावधानों के विपरीत है।

2.      सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत विधि के विपरीत है।

3.      असंगत साक्ष्यों अथवा बिना किसी साक्ष्य पर आधारित है।

153.  नारायण ग्रमीणी बनाम मरियम्मल, (2018) 18 एससीसी 645


 

द्वितीय अपील में उच्च न्यायालय द्वारा शक्तियों का प्रयोगः-
सिद्धांतों का सारांश :

1.      द्वितीय अपील पर तभी विचार किया जा सकता है जब उच्च न्यायालय संतुष्ट हो कि मामले में 'विधि का सारवान प्रश्न' निहित हैं'।

2.      एक बार उच्च न्यायालय को संतुष्ट हो जाए कि मामले में विधि का सारवान प्रश्न निहित हैं, तब वह इसे विचरित करेगा और फिर प्रतिवादियों को सूचना जारी करेगा।

3.      उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार केवल इस तरह के विधि के सारवान प्रश्न पर निर्णय देने के लिए प्रतिबंधित है।

4.      विधि के सारवान प्रश्न को विरचित किए बिना प्रकरण में किसी भी तरह का निष्कर्ष क्षेत्राधिकार के बाहर मानी जायेगी।

5.      सामान्यतया प्रतिवादी की अनुपस्थिति में विधि का सारवान प्रश्न तैयार किया जाता है। उन्हें यह अनुरोध करने की स्वतंत्रता दी जाती है कि मामले में विधि का सारवान प्रश्न निहित नहीं है।

154.  श्रीदेवी एवं अन्य बनाम सरोजम एवं अन्य, सिविल अपील संख्या 1301/2019, अपील 30.01.2019 को निर्धारित।

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि उच्च्च न्यायालय विधि का सारवान प्रश्न को विरचित करने के लिए बाध्य है, तब भी जबकि द्वितीय अपील पर विचार करने पर यह पता चले कि निचली न्यायालय के निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण ग्रस्त हैं।

155.  राजस्थान राज्य बनाम शिव दयाल, (2019) 8 एससीसी 637

उच्चतम न्यायालय ने माना कि एक उच्च न्यायालय द्वितीय अपील को केवल इस आधार पर खारिज नहीं कर सकता है कि दो न्यायालयों के निष्कर्ष समवर्ती है (चाहे वाद को खारिज करने या वाद में डिक्री पारित करने में) और इसलिए ऐसा निष्कर्ष अखंडनीय हो जाता है।

156.  इलोह वलप्पिल अंबुन्ही (मृत) (एलआरएस द्वारा) बनाम कुन्हांबू कमावन, सिविल अपील संख्या 1429/2011, 19.09.2019

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि विधि के सारवान प्रश्न के विरचन में त्रुटि मात्र से द्वितीय अपील में दिये गये निर्णय अपास्त किए जाने योग्य नहीं होगा यदि यह पाया जाता है कि मामले में विधि का कोई सारवान प्रश्न निहित था ओर ऐसे प्रश्न का उत्तर उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया था।

157.  सीतल प्रसाद बनाम किशोरी लाल, .आई.आर. 1967 एससी 1236

धारा 97 का उद्देश्य गुण-दोषों के आधार पर निर्णय देने के बाद अपील के स्तर पर उठाए जा रहे प्रारंभिक प्रश्नों के निवारित करना है। चूंकि प्रारंभिक डिक्री पारित करना अंतिम डिक्री के पारित होने से पहले की एक अवस्था मात्र होती है, यदि प्रारंभिक डिक्री के सफल होने के विरुद्ध अपील की जाती है, और वह सफल हो जाती है, तो अंतिम डिक्री स्वतः ही परास्त हो जाती है।

158.  चुन्नीलाल मेहता बनाम सेंचुरी स्पिनिंग एमजीएफ. कंपनी लिमिटेड, .आई.आर. 1962 एससी 1314

सर्वोच्च न्यायालय ने 'विधि के सारवान प्रश्न' के बारे में निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किएः-
(1) यदि प्रश्न सामान्य लोक महत्त्व का है या यह वस्तुतः और प्रत्यक्षतः पक्षकारों के अधिकारों को प्रभावित करती है।
(2) यदि यह एक अनिर्णीत प्रश्न है, जिसका तात्पर्य है कि यह अंतिम रूप से सर्वोच्च न्यायालय या प्रिवी काउंसिल या संघीय न्यायालय द्वारा निर्णीत नहीं किया गया है।

159.  पांडुरंग रामचंद्र मंडली बनाम मारुति रामचंद्र घटगे, .आई.आर. 1966 एससी 153

अधीनस्थ न्यायालय द्वारा विधि के सारवान प्रश्न पर एक त्रुटिपूर्ण निर्णय, जिसका उस न्यायालय के क्षेत्राधिकार के प्रश्न से कोई संबंध नहीं है, धारा 115 के तहत उच्च न्यायालय द्वारा सुधारा नहीं जा सकता है।

 

विविध

(Miscellaneous)

160.  . मुरुगेसन बनाम जमुना रानी, (2019) 20 एस. सी. सी. 803,

आदेश 9 नियम 13 में 'पर्याप्त रूप से प्रकट होने से रोका गया' शब्दों को उदारतापूर्वक समझा जाना चाहिए ताकि अदालत को पक्षों के बीच पूर्ण न्याय करने में सक्षम बनाया जा सके, विशेष रूप से तब जब कोई लापरवाही या निष्क्रियता गलत पार्टी के लिए अभेद्य है।

161.  सुगंधी बनाम पी. राजकुमार, (2020) 10 एस. सी. सी. 706,

जब आदेश 8 नियम 1 (3) के तहत दस्तावेज को पेश करने के लिए आवेदन किया गया है, तो न्यायालयों को उदार विचार करना चाहिए। प्रक्रियात्मक बारीकियां, सारवान न्याय (substantial justice) करने के राह में नहीं आनी चाहिए।

162.  श्रवण कुमार जयपुरिया बनाम कृष्ण नंदन सिंह, (2020) 16 एस. सी. सी. 594

वाद हेतुक (cause of action) का अर्थ है, हर वह तथ्य, अगर चल रहा है, वादी के लिए प्रतिवादी के खिलाफ एक डिक्री और अनुतोष की मांग करने के लिए साबित करने के लिए आवश्यक होगा। वाद हेतुक (cause of action) के लिए अधिकार या दायित्व भंग के उल्लंघन की आवश्यकता होती है और इसमें वे सभी तात्विक तथ्य शामिल हैं जिन पर उल्लंघन का अधिकार और दावा आधारित है।

163.  इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहरलाल, (2020) 8 एस. सी. सी. 129,

मुकदमेबाजी की समाप्ति पर संपूर्ण न्याय करने के विचार पर ही प्रत्यास्थापन का साम्या सिद्धांत (doctrine of restitution) आधारित है। यह अन्यायपूर्ण समृद्धि  (unjust enrichment) और गलत लाभ के खिलाफ का है। सी.पी.सी. की धारा 144 प्रत्यास्थापन का साम्या (restitution) का आधार स्रोत नहीं है। यह तो न्याय, समता और निष्पक्षता की कानूनी मान्यता है। न्यायालय को पूर्ण न्याय करने के लिए प्रत्यास्थापन आदेश देने के लिए अंतर्निहित क्षेत्राधिकार है |

164.  हरी स्टील एंज जनरल इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम दलजीत सिंह, (2019) 20 एस. सी. सी. 435,

आदेश 12 नियम 6 एक सक्षम प्रावधान है। यह अनिवार्य नीहं है और दावे के रूप में दावा नहीं किया जा सकता। न्यायालय को अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग यह धान में रखते हुए करना होगा कि निर्णय की स्वीकृति वह बिना विचारण के एक निर्णय है, जो प्रतिवादी के किसी भी उपाय से स्थायी रूप से इन्कार करता है। इसलिए, जब तक स्वीकृति स्पष्ट, असंदिग्ध और बिना शर्त के न हो, दावेदारी पेश करने के लिए प्रतिवादी के बहुमूल्य अधिकार को अस्वीकार करने के लिए न्यायालय के विवेक का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

165.  वैजीनाथ बनाम अफसर बेगम, (2020) 15 एस. सी. सी. 128,

सक्षम अधिकारिता न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णयों के बाध्यकारी स्वरूप को विधि का शासन (rule of law) का अनिवार्य अंग माना गया है। कानून के प्रश्न पर भी गलत निर्णय पूर्व न्याय के रूप में संचालित होता है। किसी सक्षम न्यायालय का एक गलत निर्णय उतना ही बाध्यकारी है जितना कि एक सही निर्णय होता है।

166.  असगर बनाम मोहन वर्मा, (2020) 16 एस. सी. सी. 128,

यह निर्णय लेने में कि क्या किसी मामले को पहले की कार्यवाही में आग्रह किया गया है, न्यायालय को खुद से पूछना चाहिए कि क्या यह पहले की कार्यवाही में आग्रह किया जा सकता था। न्यायालय को पूर्ववर्ती कार्यवाही के दायरे और विवाद की प्रकृति से संबंधित गठजोड़ का समुचित ध्यान रखना चाहिए।

167.  एम. सिद्दीक बनाम सुरेश दास, (2020) 1 एस. सी. सी. 1,

धारा 11, स्पष्टीकरण VI के मामले आदेश 1 नियम 8 तक सीमित नहीं हैं। यह किसी भी मुकदमे को शामिल करने का विस्तार करता है जिसमें आदेश 1 नियम 8 के अलावा, पार्टियाँ अपने अलावा अन्य हितबद्ध व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करने के हकदार हैं। आदेश 1 नियम 8 के प्रावधान धारा 11, स्पष्टीकरण VI की प्रयोज्यता को नियंत्रित नहीं करते हैं।

168.  विजयनाथ बनाम अफसर बेगम, (2020) 15 एस. सी. सी. 128,

जहां ट्रायल न्यायालय गुणदोष के आधार पर निर्णय दिया जाता है और मामला अपील में लाया गया और अपील कुछ प्रारंभिक आधार पर खारिज कर दी जाती है, यह अभिनिर्धारित किया जाना चाहिए कि ऐसी बर्खास्तगी जब ट्रायल न्यायालय के निर्णय की पुष्टि करता है तो वह गुणदोष के आधार पर ही की जा सकती है और अंत में अपील की खारीज का आधार जो भी हो उसके गुणदोष को सुन कर निर्णय लिया गया है।

169.  श्रुति कौशल बिष्ट बनाम कौशल आर. बिस्ट, (2020) 10 एस. सी. सी. 725,

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 21 और 21-ए, दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 25 (1) के तहत उपलब्ध उच्चतम न्यायालय की शक्ति की विहित नहीं करती है। हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत स्थानांतरण की व्यवस्था सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता को अपवर्जित नहीं करती।

170.  अशोक कुमार गुप्ता बनाम सीतालक्ष्मी साहूवाला मेडिकल ट्रस्ट, (2020) 4 एस. सी. सी. 321,

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 92 का आह्वान करने के लिए तीन शर्तें अपेक्षित हैं-

1.      जिस न्यास पर प्रश्न है वह एक धर्मार्थ या धार्मिक प्रकृति के सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए बनाया गया है;

2.      ऐसे न्यास के प्रबंधन में न्यासबंग (breech of trust) या न्यायालय का निदेश (direction of court) आवश्यक है;

3.      3. धार 92 में दिए गए अनुतोषों में से एक या अन्य अनुतोष का दावा किया गया हो।

171.  बैंक ऑफ बड़ौदा बनाम कोटक महिन्द्रा बैंक लि., 17 मार्च, 2020 विनिश्चित

विलंब और अतिविलंब का सिद्धांत जो कि रिट कार्यवाहियों को प्रयोज्य है, सिविल कार्यवाहियों को लागू (Applied) नहीं हो सकता है और सि. प्र. सं. के अधीन दाखिल कार्यवाहियों जिन्हें विहित परिसीमा की अवधि के भीतर अवश्य दाखिल किया जाना चाहिए को किसी प्रकार से आकर्षित नहीं होता है।
वाद हेतुक सिविल वादों से संबंधित अवधारणा है और न कि निष्पादन याचिकाओं से संबंधित है। वाद हेतुक और कुछ नहीं, बल्कि तथ्यों का बंडल है जो वादी को वाद दाखिल करने के लिए समर्थ बनाने का विधिक अधिकार उत्पन्न करता है। भारत में (व्यतिकारी देश से) विदेशी न्यायालय द्वारा पारित डिक्री के निष्पादन के लिए परिसीमा की अवधि व्यक्तिकारी विदेश देश में विहित परिसीमा होगी। जब संहिता की धारा 44क की उपधारा (1) और उपधारा (2) साथ-साथ पढ़ी जाती है तो स्पष्ट होता है कि क्या दाखिल किया जाना आवश्यक है। संहिता की धारा 44-क की उपधारा (1) के निबंधनों डिक्री की प्रमाणित प्रति और हेतुक देश के न्यायालय से विस्तार यदि कोई हो को कथित करते हुए कि कौन डिक्री संतुष्ट या समायोजित की गई है, का प्रमाणपत्र। ये दो अपेक्षायें हैं और जब तक दोनों अपेक्षायें पूरी नहीं होती हैं कोई विदेशी डिक्री निष्पादित नहीं की जाती हैं। व्यक्ति जिसने न्यायालय जहां डिक्री पारित की गई थी में विदेशी डिक्री के निष्पादन के लिए अपने-अपने अधिकार या उपचार को खो दिया है, परीिसमा की अवधि बढ़ाने के लिए भारतीय विधि के उपबंधों का फायदा ले सकेगा।

172.  किरण सिंह बनाम चमन पासवान, .आई.आर. 1954 एससी 340

उच्च श्रेणी के न्यायालय द्वारा पारित एक डिक्री एक अनियमितता मात्र है जो धारा 99 के तहत आती है और यह एक अकृतता नहीं है।

173.  आर. धनसुंदरी उर्फ आर. राजेश्वरी बनाम . एन. उमाकांत एवं अन्य, सिविल अपील संख्या 7292/2009, 06.03.19 को निर्धारित

सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश 23 के नियम 1 ए की जांच करते हुए यह धारित किया कि यदि वादी आदेश 23 के नियम 1 के तहत अपने दावे को वापस लेने या छोड़ने की मांग कर रहा है और प्रतिवादी जो वाद का अंतरण चाहता है और वह वाद के विषय- वस्तु में रुचि रखता है और जिसके चलते दूसरे प्रतिवादी के विरुद्ध न्यायिक हित में सार्वभौमिक प्रश्न पूछा जाना चाहिए, तब प्रतिवादियों को वादी के रूप में स्थानांतरित किया जा सकता है।

174.  गुरमीत सिंह भाटिया बनाम किरण कांत रॉबिनसन एवं अन्य, (2019) एससीसी ऑनलाइन एससी 912

सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया है कि, एक वाद में, वादी वाद का मालिक (dominus litis) है और उसे उन पक्षकारों को वाद में योजित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है जिनके विरुद्ध लड़ना नहीं चाहता जब तक कि विधि के शासन की बाध्यता न हो।

175.  मायांडी बनाम पंडारचामी एवं अन्य, सिविल अपील संख्या 6424/2019, 19.08.2019 को निर्णीत

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि, वादी के विरुद्ध डिक्री अनियमितता के कारण खारिज कर दी गई है, तो उसी वाद हेतुक पर वादी के उत्तराधिकारियों को नया वाद लाने से निवारित करती है।

176.  बंशीधर शर्मा (मृत्यु के बाद से) बनाम राजस्थान राज्य, 2019 (14) स्केल 658

सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि जब किसी डिक्री या आदेश में कोई भिन्नता या प्रत्यावर्तन नहीं होता है, तो सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के प्रावधान आकर्षित नहीं होंगे। पुनर्स्थापना के सिद्धांत की मूल धारणा यह है कि विधिक वाद के उस पक्षकार को यह दायित्व सौंपता है जिसने डिक्री के लाभ को प्राप्त किया दूसरे पक्षकार ने जो कुछ भी खोया उसकी पुनर्स्थापना की व्यवस्था करे।

177.  इंडियन बैंक बनाम महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड, .आई.आर. 1998 एससी 1952

न्यायालय के पास समान पक्षकारों के बीच विभिन्न वादो को 'समेकित' करने की अंतर्निहित शक्ति होती है, जिसमें विवाद्यक काफी हद तक समान होते हैं।

178.  तुषार कांति बनाम सावित्री देवी, .आई.आर. 1996 एससी 2752

आयुक्त द्वारा इकट्ठा किए गए तथ्य एवं आंकड़े प्रथम दृष्टया साक्ष्य निर्मित करेंगे, यह एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य का भाग गठित करेंगे और उचित आधार के बिना अस्वीकार नहीं किये जाएंगे। यह न्यायालय द्वारा खुला विचार होगा कि आयुक्त द्वारा एकत्रित साक्ष्य का क्या महत्त्व होगा।

179.  सरदार गोविन्दराव बनाम देवी सहाय, .आई.आर. 1982 एससी 989

निर्णय से पहले कुर्की के आदेश के पीछे एकमात्र उद्देश्य यह कि वादी को यह आश्वासन देना है कि यदि उसकी डिक्री की जाती है तो वह निष्पादन योग्य होगी। प्रत्याभूति के रूप में कि उपलब्ध सम्पत्ति जिससे वादी डिक्री को संतुष्ट करा सके, कि सम्पत्ति की कमी के कारण डिक्री निष्फल न हो जाये।

180.  बनवारी लाल बनाम चंदो देवी, .आई.आर. 1993 एससी 1139

समझौता डिक्री पारित करने वाला न्यायालय न्यायिक कार्य करता है न कि लिपिकीय कार्य। इसलिए, न्यायालय को स्वयं को संतुष्ट करना चाहिए कि समझौता वैध है और यह उसके अनुसार वह एक डिक्री पारित कर सकता है और समझौता करने वाले सभी पक्षकारों के विरुद्ध इस तरह की डिक्री को प्रवर्तित किया जा सकता है।

181.  शंकर बनाम बालकृष्ण, .आई.आर. 1954 एससी 325

एक समझौता डिक्री गुणदोष पर निर्णय नहीं है और यह नहीं कहा जा सकता है कि इस मामले को 'सुना गया और अंततः निर्णीत किया गया था'। यह सम्मति पर आधारित है और इसलिए, 'विबंधन' के रूप में कार्य करेगा।

182.  मेनका गुप्ता बनाम उमाश्री देवी (2019), सिविल अपील संख्यों 6163-6164/2019, (07.08.2019 को निर्धारित)

उच्च्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है अंतरितो के पास वादकालीन (pendente lite) लोकस स्टँडाई (locus standi) सुने जाने का अधिकार है, जो मूल प्रतिवादी के प्रतिस्थापन की मांग करने के लिए एक आवेदन कर सकता है, उस मूल प्रतिवादी के विरुद्ध जिसने आदेश 9 नियम 13 के तहत एक पक्षीय डिक्री को अपास्त करने के लिए याचिका दायर की थी।

183.  हरी स्टील ऍड जनरल इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम दलजीत सिंह, (2019) 4 एमएलजे 100 (एससी)

सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि, 'स्वीकृति पर निर्णय' पर तभी आदेश दिया जा सकता है जब अभिवचन में स्पष्ट और शर्त रहित स्वीकृति दी जाती हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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