IPC (BNS) Case Law Hindi Medium

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

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आई. पी. सी. /बी एन एस से सम्बंधित मामले

(IPC/BNS Case law)

 

सामान्य सिद्धांत, आपराधिक मनःस्थिति

(General Principles, MENS REA)

मामले

निर्णीत तथ्य

1.       क्वीन बनाम टोल्सन, (1889) 232 BD 168 

न्यायालय ने धारित किया कि एक सामान्य नियम के रूप में, अपराध होने से पूर्व एक दोषी मन होना चाहिए, लेकिन एक ऐसे कृत्य का जिसका आशय विधि को तोड़ने का रहा हो, या नहीं आपराधिक बना सकती है।

2.       महाराष्ट्र राज्य बनाम एम. एच जॉर्ज, .आई.आर 965 एस.सी 722

उच्चतम न्यायालय ने सांविधिक अपराधों में आपराधिक मनः स्थिति (mens rea) के सिद्धांत को लागू करने पर विचार किया।

न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जब तक कि विधि या तो स्पष्ट रूप से या आवश्यक निहितार्थ से आपराधिक मनःस्थिति (mens rea) को अपराध का घटक भाग (constituent part) बनाती है, अभियुक्त को अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए जब तक कि उसका मन दोषी न हो।

3.       शेराज बनाम डी. रुटजेन, (1895) 1 QB 918

एक उपधारणा है कि आपराधिक भनः स्थिति (mens rea) प्रत्येक अपराध का एक अनिवार्य तत्व होता है। यह उपधारणा या तो अपराध निर्मित करने वालीं संविधि के शब्दों द्वारा विस्थापन के लिए संभाव्य है या फिर उन विषय-वस्तुओं द्वारा जिससे यह व्यवहार करती है। But this presumption is liable to be displaced either by the worlds of the statute creating the offence or by the subject matter with which it deds.

 

दंड

(Punishment)

4.       बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य, .आई.आर 1980 एस.सी

सर्वोच्च न्यायालय ने धारित किया कि' विरल से विरलतम मामले (rarest of the rare case) की स्थिति को छोड़कर मृत्यु दण्डादेश नहीं दिया जाना चाहिए।

5.       गोपाल विनायक गोडसे बनाम स्टेट, .आई.आर 1961 एस.सी 600

आजीवन कारावास का अर्थ होता है, एक ऐसा कारावास जो अभियुक्त के जीवन पर्यन्त चलता रहता है और इससे कम नहीं।

6.       मोहम्मद मुन्ना बनाम भारत संघ और अन्य, (2005) 7 एससीसी 417

उच्चतम न्यायालय का निर्णय था कि आजीवन कारावास का अर्थ है आजीवन कठोर कारावास।

 

सामान्य अपवाद

(General Exceptions)

7.       के. एम. नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य, .आई.आर 1962 एस.सी 605

उच्चतम न्यायालय ने अवधारित किया कि यदि अभियुक्त भारतीय न्याय संहिता में निहित अपवादों के लिए याचना करता है तो यह उसके विरुद्ध एक उपधारणा है और उस उपधारणा का खंडन करने का भार उसके ऊपर है।

8.       टी. एन. लक्ष्मैया बनाम कर्नाटक राज्य, (2002) 1 एससीसी 219

अभियुक्त को साबित करना होगा कि उसका मामला सामान्य अपवादों के अंतर्गत आता है। सबूत के मानक अभियोजन पक्ष की अपेक्षा के अनुरूप नहीं हैं। यह पर्याप्त है कि अभियुक्त संभावनाओं की प्रबलता के मानक के द्वारा, सामान्य अपवादों में से किसी में अपने मामले को बनाता है।

9.       श्रीकांत आनंदराव भोसले बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2002) 7 एससीसी 748

अभियुक्त मानसिक रोगी (paranoid schizophrenic) या एवं उसने हथौड़े से अपनी पत्नी के सिर पर वार किया जिससे उसकी मृत्यु हो गई। अदालत में अभियुक्त ने IPC धारा 84/ अब BNS धारा 22 का लाभ अपने बचाव में मांगा। अभिलेख पर लाये गये साक्ष्यों के आलोक में यह देखा गया कि अभियुक्त पैरानॉइड शिजोफ्रेनिया (Paranoid Schizophrenia) से पीड़ित था। न्यायालय ने फैसला दिया कि घटना से पहले एवं बाद में वित्त विकृति (Unsoundness of Nind) एक प्रासंगिक तथ्य है। मामले की परिस्थितियों से यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि यह पूर्वधारणा काफी हद तक लगाई जा सकती है कि अभियुक्त उक्त समय विकृत-चित्त का था और इसलिए उसे इस धारा के अंतर्गत लाभ दिया गया।

10.   मैकनॉटन केस, 8 ER 718, Volume 8

न्यायालय ने मत्तता के बारे में निम्नलिखित प्रतिपादनाएं व्यक्त की-

1.       प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थचित उपधारित किया जाता है, और उसके पास अपराधों के लिए पर्याप्त मात्रा में कारण है, जब तक कि उनके उत्प्रेरक को साबित नहीं किया जाता है।

2.       चित्तविकृति की प्रतिरक्षा को स्थापित करने के लिए यह स्पष्ट रूप से दिखाया जाना चाहिए कि कृत्य करते के समय अभियुक्त चित्तविकृति दोष के कारण ऐसी स्थिति में था कि वह जो कर रहा था उसकी प्रकृति और प्रभावों के बारे में नहीं जानता था, अथवा वह यह नहीं जानता था कि वह जो कर रहा था वह गलत था।

3.       यदि अभियुक्त को यह ज्ञान था कि वह कृत्य उसके द्वारा नहीं किए जाना चाहिए था और यदि वह कृत्य उसी समय पर विधि के प्रतिकूल था तो वह दंडनीय है।

4.       यदि कोई व्यक्ति उन्मादी विभ्रम के अधीन है, जिसके परिणामस्वरूप मौजूदा तथ्य उसके कारण अपराध कारित करते हैं, तो इसका उत्तर विभ्रम की प्रकृति पर निर्भर करता है, बल्कि यह मान लेना चाहिए कि वह केवल आंशिक विभ्रम के तहत प्रयास करता है और अन्य मामलों में उन्मादी नहीं है, उस पर उसी स्थिति में विचार किया जाना चाहिए जैसे कि उन तथ्यों पर जिनके संबंध में विभ्रम मौजूद है, वास्तविक थे।

11.   क्वीन एंप्रेस बनाम के.एन. शाह, (1896) ILR 23 Cal. 604

चित्तविकृतता की प्रत्येक अवस्था को किसी अपराधी दायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता। केवल चितविकृतता ही मस्तिष्क की संज्ञानात्मक शक्तियों को बिगाड़ देती है जो आपराधिक दायित्व से छूट का आधार बन सकती है।

12.   लक्ष्मी बनाम राज्य, .आई. आर 1959 All 534

IPC धारा 84/ अब BNS धारा 22 उपबन्धित करती है कि जो अभियुक्त, इसके अधीन संरक्षण का दावा कर रहा है, उसको यह नहीं जानना चाहिए कि कृत्य सही या गलत है, बल्कि अभियुक्त यह जानने में असमर्थ होना चाहिए कि उसके द्वारा किया गया कार्य सही है या गलत है। किसी चीज को जानने की क्षमता एक व्यक्ति कितना जानता है से काफी अलग है। अंतर्निहित या जैविक अक्षमता, गलत या त्रुटिपूर्ण धारणा से संबंधित नहीं है।

13.   दयाभाई ठक्कर बनाम गुजरात राज्य, .आई.आर 1964 एस. सी 1563

जब विकृतचित्तता का तर्क स्थापित हो जाए तो न्यायालय को यह विचार करना होगा कि अभियुक्त चित्त विकृति के कारण, यह जानने में असमर्थ था कि वह जो कुछ कर रहा था वह गलत था या विधि के प्रतिकूल था। अभियुक्त के मानसिक दशा को सुनिश्चित करने के

लिए निर्णायक समय वह समय है जब अपराध किया गया था।

14.   डायरेक्टर ऑफ पब्लिक प्रॉसीक्यूशन बनाम बेयर्ड, (1920) AC 479

हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने मतत्तता के बारे में तीन नियम निर्धारित किए-

1.       विकृतचित्तता, चाहे नशे की लत से उत्पन्न हो या अन्यथा आरोपित अपराध का बचाव है।

2.       मनता के माक्ष्य, जो एक अपराध गठित करने के लिए आवश्यक विशिष्ट आशय को सृर्जिन करने में अभियुक्त को असमर्थ बना देता है, को अन्य स्थापित नथ्यों के साथ या विनिश्चित करने हेतु कि क्या वह इस आशय से युक्त था अथवा नहीं, ध्यान में रखना चाहिए।

3.       यह कि अपराध गठित करने के लिए आवश्यक आशय को सृजित करने के लिए अभियुक्त में सत्यापित असमर्थता में न्यून मत्तना का माध्य, तथा केवल यह साबित करना कि उसका मस्तिष्क नशे से प्रभावित था जिससे वह सहज ही तीव्र उत्तेजना के प्राप्त कर, इस अवधारणा का खंडन (नहीं करता कि अभियुक्त अपने कृत्य के स्वाभाविक परिणामों को जानता था।

15.   बासुदेव बनाम स्टेट ऑफ पेप्सू, .आई. आर 1956 एम. मी 488

जहां तक ज्ञान का प्रश्न हैं मत व्यक्ति को उसी ज्ञान से युक्त माना जाए जिससे की एक सामान्य प्रज्ञा वाला व्यक्ति युक्त होना है। किंतु जहां तक आशय का प्रश्न है इसका निर्धारण मामले की सामान्य परिस्थितियों से, मत्तता की मात्रा को उचित स्थान देते हुए, किया जाना चाहिए।

16.   डॉमिनिक वर्षी बनाम केरल राज्य, .आई. आर 1971 एस. सी 1208

व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार तीन विचारों पर टिका हुआ है-

1.       प्रतिरक्षा के उद्देश्य के लिए आवश्यकता से अधिक कोई और अपहानि नहीं कारित किया जाना चाहिए।

2.       अपराध के प्रयास या धमकी से शरीर के खतरे की युक्तियुक्त आशंका होनी चाहिए।

3.       इस अधिकार का प्रारंभ तब तक नहीं हो सकता जब तक कि युक्तियुक्त आशंका न हो।

17.   के. एम. नानावती बनाम महाराष्ट्र राज्य, .आई.आर 1962 एस.सी 605

सर्वोच्च न्यायालय ने तीव्र व अचानक प्रकोपन के निम्न परीक्षण निर्धारित किए-

1.       एक प्रज्ञावान व्यक्ति जो समाज के उसी वर्ग से आता है एवं उसी स्थिति में रखा गया है, जिसमें कि अभियुक्त, क्या वह उकसाने पर अपना आत्मनियंत्रण खो देगा;

2.       कुछ परिस्थितियों में शब्द और हाव-भाव भी गंभीर व अचानक प्रकोपन हो सकते हैं;

3.       पीड़ित के पूर्ववर्ती कृत्यों के द्वारा बनाई गई मानसिक पृष्ठभूमि पर विचार किया जा सकता है।

4.       प्रकोपन प्रभाव का पता लगाया जाना चाहिए और प्रकोपन शान्त होने के बाद नहीं।

18.   पूरन सिंह बनाम पंजाब राज्य, .आई. आर 1975 एस.सी 1674

इस बाद में कब्जे की प्रकृति (Nature of Possession) की बात की गयी, जो संपत्ति एवं व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का उपयोग करने के लए एक अतिचारक की हकदार बनाती है, ऐसा कहा गया है कि इसमें निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए-

  i.       यह कि अतिचारक (Trespasser) पर्याप्त अवधि के दौरान संपत्ति के वास्तविक भौतिक कब्जे में होना चाहिये;

ii.       कि कब्जे के संबंध में स्वामी की अभिव्यक्त या विवक्षित सहमति होनी चाहिए अथवा उसे इसका ज्ञान होना चाहिए, जिसमें "animus possidendi" का एक तत्व होता है।

iii.       अतिचारक द्वारा संपत्ति के वास्तविक स्वामी का संपत्ति से पूर्व और अंतिम निर्वासन (disposession) किया जाना चाहिए, तथा

iv.       खेती योग्य भूमि के मामले में, स्थापिन कब्जे (Settled possession) की गुणवता निर्धारित करने के लिए सामान्य परीक्षणों में से एक यह होगा कि कब्जा प्राप्त करने के पश्चात, कथित अतिचारक ने वहां कोई फसल उगाई थी या नहीं। यदि फसल को अतिचारक द्वारा उगाया गया था, तब संपति के वास्तविक स्वामी को अतिचारक द्वारा उगाई गई फसल को नष्ट करने तथा जबरन कब्जे में लेने का कोई अधिकार नहीं है, उस स्थिति में अतिचारक के पास व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार होगा और ऐसा कोई अधिकार वास्तविक स्वामी के पास नहीं होगा।

विदित हो कि IPC धारा 97/ अब BNS धारा 35 कहती है कि संपत्ति की प्रतिरक्षा का अधिकार आपराधिक अतिचार के मामलों में मौजूद होना है।

19.   देवनारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, .आई.आर 1973 एस.सी 473

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 102/ अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 40 में शरीर के व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार उसी क्षण आरंभ हो जाता है जिस समय अपराध की चेष्टा या धमकी से शरीर के संकट की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती हो एवं यह अधिकार तब तक बना रहता है जब तक कि आशंका बनी रहे। जब अपराध किया जा रहा है इसका प्रयोग केवल अपराध किये जाने की आशंका पर ही किया जा सकता है। हालांकि, खतरा वर्तमान और आसत्र खतरे को जन्म दे सकता है और दूरस्थ खतरे को नहीं।

20.   महावीर चौधरी बनाम बिहार राज्य, (1996) 5 एससीसी 107

IPC धारा 97/ अब BNS धारा 35 किसी व्यक्ति के अधिकार को न केवल अपने या दूसरे के शरीर की प्रतिरक्षा करने के लिए बल्कि अपने स्वयं के या किसी अन्य की संपत्ति की प्रतिरक्षा की भी मान्यता देती है। यह सुनिश्चित है कि सामान्य विधिक न्यायालयों द्वारा मान्यता प्राप्त अनुसरण का नियम भारतीय न्याय संहिता के तहत प्रासंगिक नहीं है। भारत में ऐसा कोई नियम नहीं है जो किसी व्यक्ति से ऐसी स्थिति का सामना करने की उम्मीद करता है वह व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग कर सकता है।

21.   स्टेट आफ उत्तर प्रदेश बनाम चतुर सिंह, .आई. आर. एससी 745

इस प्रकरण में कारित किया गया कि इसमें अभियुक्त कुल्हाड़ी लेकर अपने भाई के घर गया तथा वहां भाई वैशाली पर कुल्हाड़ी से वार किया। अभियोजन पक्ष का मामला न्यायालय एक्स्ट्राज्यूडिशन एवं अन्य साक्ष्य से संबंधित था लेकिन संपूर्ण मामले में कहीं पर भी यह बात नहीं आई कि अभियुक्त को मृतक द्वारा लाठी से मारा गया था। अभियुक्त द्वारा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313/ अब BNSS की धारा 351 के अंतर्गत किए गए अपने कथनों में भी अभियुक्त द्वारा स्वयं को लाठी से मारने की बात नहीं कही गई उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इसमें कारित की गई हत्या को व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अंतर्गत बचाव के तौर पर नहीं माना जा सकता। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 102/ अब BNS की धारा 40  में प्रतिरक्षा के आरंभ और उसके अंत होने के संबंध में प्रावधान किया गया है। शरीर की व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार उसी क्षण आरंभ हो जाता है जिस समय की अपराध करने की चेष्टा या धमकी से शरीर को संकट की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती हो और यह अधिकार उस समय तक बना रहता है जब तक की आशंका बनी रहे आवश्यक नहीं है कि अधिकार का प्रयोग उचित समय किया जाए। जब अपराध किया जा रहा है इसका प्रयोग केवल अपराध किए जाने की आशंका पर ही किया जा सकता है।

22.   कुंवर सेन बनाम वीरसेन, [(1969) Cri LJ 76)]

इस मामले में, व्यक्ति एक रास्ते से जा रहा था। वह रास्ता किसी दूसरे व्यक्ति के खेत से गुजरता था। जब वह उस रास्ते के मध्य में था तो कुछ लोग आये और उससे पूछने लगे कि वो उस रास्ते से क्यूं गुजर रहा है, इस पर उस व्यक्ति ने माफी मांगी और कहा कि वो आगे से ऐसा नहीं करेगा, लेकिन जो लोग उससे पूछताछ करने आये थे और कुछ लाठी और हथियार साथ लाये थे, उन्होंने उस पर धावा बोल दिया और उसके हाथ की हड्डियां तोड़ दी। इस मामले में यह माना गया कि अभियुक्तों ने अपने संपत्ति के व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार की सीमा को पार किया और घोर उपहति कारित करने हेतु उन्हें दोषी ठहराया गया।

23.   गुरदत्त मल, (AIR 1965 SC 257)

इस मामले में जिन लोगों की मृत्यु कारित की गई थी उनके पास किसी प्रकार के जानलेवा हथियार नहीं थे, और वो लोग खेत में शांतिपूर्वक पुलिस की सुरक्षा के अंतर्गत कार्य कर रहे थे। अभियुक्त, जो उस खेत की फसलों पर अपना दावा कर रहा था उसने लोक अधिकारी से मदद मांगने के बजाए पुलिस कर्मियों को वहां से हटा दिया और उसके बाद मृत व्यक्तियों पर बंदूक एवं अन्य जानलेवा हथियार से हमला कर दिया एवं उन्हें बहुत करीब से गोली मार दी। यह अभिनिर्णित किया गया कि मृत व्यक्ति लूट कारित नहीं कर रहे थे और इसलिए अभियुक्त के पास उनको जान से मारने का अधिकार नहीं था।

 

षड्यंत्र

(Conspiracy)

24.   बिंबाधर प्रधान बनाम उड़ीसा राज्य, .आई.आर 1954 एस.सी 469

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि यह आवश्यक नहीं है कि षड्यंत्र के अपराध के लिए एक से अधिक व्यक्तियों को दण्डित किया जाए। यह पर्याप्त है अगर न्यायलय यह पता लगाने की स्थिति में है कि षड्यंत्र में दो या अधिक व्यक्ति वास्तव में सम्मिलित थे।

25.   योगेश उर्फ सचिन जगदीश जोशी बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2008) 4 क्रिमिनल L.J 3872 (SC)

उच्चतम न्यायालय का निर्णय था कि षड्यंत्र का अपराध गठित करने के लिए, दो या अधिक व्यक्तियों के मस्तिष्कों का मिलन अपरिहार्य शर्त है। षड्यंत्र का अनुमान आसपास की परिस्थितियों से लगाया जा सकता है क्योंकि प्रत्यक्ष सबूत खोजना मुश्किल है।

26.   तमिलनाडु राज्य बनाम नलिनी, 1999 Cri. L.J 3124 (SC)

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्तों का मुख्य अभियुक्त से संबंध या षड्यंत्र का ज्ञान अभियुक्त को षड्‌यंत्रकारी नहीं बनाएगा। करार अपराध के लिए अपरिहार्य (sine qua non) है।

 

राज्य के विरुद्ध अपराधों के विषय में

(Offences Against the State)

27.   राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) बनाम नवजोत संधू, 2005 Cri. L.J 3950

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 121 (वर्तमान में निरसित) के तहत युद्ध करने के अपराध का गठन करने के लिए सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के आशय एवं प्रयोजन अनिवार्य शर्त है। (Supreme Court held that to constitute offence of waging war under section 121 of the code the intention and purpose of the warlike operation directed against the government is sine qua non.)

28.   केदारनाथ बनाम राज्य, .आई.आर 1962 एस.सी 955

उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि धारा 124-ए संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) का उल्लंघन नहीं करता क्योंकि यह एक युक्तियुक्त प्रतिबंध है।

 

सामान्य आशय और सामान्य उद्देश्य

(Common Intention and Common Object)

29.   मेहबूब शाह बनाम एंपरर, (Indus River case) .आई. आर 1945 PC 118

न्यायालय ने धारित किया कि सामान्य आशय एक पूर्व-नियोजित योजना, मस्तिष्कों का पूर्व मिलन या समूह के गठन के सभी व्यक्तियों के बीच पूर्व परामर्श होना चाहिए।

न्यायालय ने IPC धारा 34/ अब BNS धारा 3(5) के तहत निम्नलिखित सिद्धांतों की व्याख्या की-

1.       IPC धारा 34/ अब BNS धारा 3(5) के तहत दायित्व का सार 'सामान्य आशय' में पाया जाता है।

2.       IPC धारा 34/ अब BNS धारा 3(5) को लागू करने के लिए यह साबित किया जाना चाहिए कि सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा कार्य किया गया है।

3.       सामान्य आशय में पूर्वनियोजित योजना अंतर्निहित है और यह साबित किया जाना चाहिए कि पूर्वनियोजित योजना के अनुसरण में आपराधिक कृत्य सम्मति के साथ किया गया थाः

4.       एक आशय को सामान्य होने के लिए, सभी सदस्यों को आशय का ज्ञान होना चाहिए तथा उनके द्वारा वास्तविक भागीदारी किया जाना चाहिए।

 

नोट: भारतीय दंड संहिता की धारा 34 / अब BNS की धारा 3(5) सामान्य आशय का उल्लेख करती है। अनेक तात्कालिक रूप से नहीं होते हैं अपितु पूर्व नियोजित योजना के अनुसार किये जाते हैं तथा उन अपराधों में अनेक लोग भी शामिल होते हैं। सभी लोगों की अपराध में वास्तविक भागीदारी होनी चाहिए। सामान्य आशय (Common Intention) ऐसे अपराधियों को दंडित करने में सहायता करता है जब एक या एक से अधिक व्यक्ति मिलकर आपराधिक कृत्य करते हैं।

30.   बारेंद्र कुमार घोष बनाम एंपरर, (Post Office case) 52 I.A 40 (PC)

न्यायालय ने धारित किया कि भले ही वह व्यक्ति कुछ भी नहीं करता है, लेकिन यदि उसका सामान्य आशय (Common Intention) है तो वह उत्तरदायी होगा। न्यायालय ने कहा कि 'वे भी कार्य करते हैं जो केवल खड़े रहते हैं और प्रतीक्षा करते हैं'।

31.   ऋषिदेव पांडेय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, .आई.आर 1955 एस.सी 331

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि सामान्य आशय घटना स्थल पर भी विकसित हो सकता है और अपराध कारित करते समय भी यह विकसित हो सकती है।

32.   श्री कांतिया बनाम बॉम्बे राज्य, .आई. आर 1955 एस.सी 287

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि शारीरिक उपस्थिति और अपराध में सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। परंतु उच्चतम न्यायालय ने जे. एन. देसाई बनाम बॉम्बे राज्य में यह विचार व्यक्त किया है कि सभी मामलों में भौतिक उपस्थिति और सक्रिय भागीदारी आवश्यक नहीं है।

33.   पांडुरंग बनाम हैदराबाद स्टेट, .आई.आर 1955 एस.सी 216

सर्वोच्च न्यायालय ने समान आशय (Similar Intention) और सामान्य आशय (Common Intention) के बीच अन्तर किया है। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि कई व्यक्ति एक ही साथ किसी एक व्यक्ति पर आक्रमण कर सकते हैं तथा प्रत्येक व्यक्ति का हत्या करने का आशय हो सकता है और उनमें से प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग घातक प्रहार कर सकता है तब भी कोई भी व्यक्ति इस धारा में इच्छित सामान्य आशय से युक्त नहीं हो सकता क्योंकि मस्तिष्कों का पूर्व मिलन पूर्व नियोजित योजना को निर्मित करने हेतु नहीं हुआ था।

34.   माला सिंह बनाम हरियाणा राज्य, (2019) 5 एससीसी 127

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि, IPC की धारा 149/ अब BNS की धारा 190 को IPC की धारा 34/ अब BNS की धारा 3(5) के आरोप बदलकर अभियुक्त को दोषी ठहराते समय, उनका 'सामान्य आशय' साबित किया जाना चाहिए।

 

नोटः IPC की धारा 34/ अब BNS की धारा 3(5) सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किये गये कृत्य जबकि कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा उनके सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है, तब ऐसे व्यक्तियों में से प्रत्येक व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है, मानों वह कार्य अकेले उसी ने किया हो। IPC की धारा 149/ अब BNS की धारा 190- विधि विरुद्ध जमाव का हर सदस्य सामान्य उद्देश्य (Common Object) के अग्रसरण करने में किये गये अपराध का दोषी होगा।

35.   मुथू नईकर बनाम तमिलनाडू राज्य, .आई.आर 1978 एस.सी

विधि विरुद्ध जमाव में जिज्ञासु दर्शक के रूप में उपस्थित व्यक्ति उस विधि विरुद्ध जमाव का सदस्य नहीं होगा।

36.   राजेश गोविंद बनाम महाराष्ट्र राज्य, .आई.आर 2000 एस.सी 160

सामान्य आशय क्षण भर की प्रेरणा पर भी विकसित हो सकता है। हालांकि, ऐसे मामलों में सभी अभियुक्तों को दोषी ठहराने हेतु निष्कर्ष

पर पहुँचने के लिए एक निश्चयात्मक सामग्री होनी चाहिए।

37.   तुकाराम गणपत बनाम महाराष्ट्र राज्य, .आई.आर 1974 एस.सी 514

IPC की धारा 34/ अब BNS की धारा 3(5) अंतिम आपराधिक कार्य के लिए उत्तरदायी बनने के लिए सभी अभियुक्त व्यक्तियों द्वारा अलग कार्यों की परिकल्पना नहीं करता है। प्रत्येक अभिपुत की ओर से प्रकट एक स्वतंत्र कार्य की स्थापना, IPC की धारा 34/ अब BNS की धारा 3(5) को लागू करने की की मांग नहीं करता

38.   मदन सिंह बनाम बिहार राज्य, 2004 CH. LJ 2862(SC)

विधि विकद्ध समान में उपस्थित होने पर व्यक्ति तब तक दायी नहीं हो सकता जब तक कि कोई सामान्य उद्देश्य (Common Object) न हो और वह उसी उद्देश्य को साझा किया हो या इस सामान्य उद्देश्य से प्रेरित हुआ हो और उद्देश्य IPC की धारा 14/ अब BNS की धारा 3(5) में दिये गये उन उद्देश्यों में से एक हो।

39.   मल्कियत सिंह बनाम पंजाब राज्य, .आई.आर. 1970 एस.सी. 713

यह निर्धारित करने के लिए परीक्षण कि क्या कारित कृत्य, प्रयत्न या तैयारी है, या अवरोध कृत्य की तैयारी जो पहले ही हो चुका है, ऐिसा है, कि यदि अपराधी ने अपना मस्तिष्क परिवर्तित कर लिया है, व आपराधिक मूल्य में आगे नहीं बढ़ा है, तो कृत्य क्षति शून्य हो जाएगा।

 

मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले अपराधों के विषय में

(Offence Against Human Body)

40.   आर. वी स्विंडल एंड ऑस्वोर्न, (1846) 2 सी एंड के 230

नशे में धुत होकर दो कार चालकों ने एक-दूसरे के साथ कार रेस शुरू की और एक बूढ़े व्यक्ति पर कार चढ़ा दी। दोनों पर उनकी उपेक्षा और अनुचित आचरण से मृत्यु कारित करने के लिए आरोपित किया गया।

41.   उत्तर प्रदेश राज्य बनाम वीरेंद्र प्रसाद, 2004 Cri. L. J. 1373 (SC)

IPC धारा 300 के खंड 3/अब BNS धारा 101 के खंड 3 के तहत अपराधिक मानव-वध हत्या होती है अगर निम्नलिखित कथन संतुष्ट है-

(1) जिस कृत्य से मृत्यु कारित होती है, मृत्यु करने के आशय से किया जाता है या शारीरिक क्षति कारित करने के आशय से किया

(2) प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में क्षति मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त हो।

42.   मिठ्ठू बनाम पंजाब राज्य, .आई.आर 1983 एम.सी

उच्चतम न्यायालय की IPC धारा 303/अब BNS धारा 104 असंवैधानिक है, क्योंकि वह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 की भावना के विरुद्ध है।

43.   जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य, 2005 Cri. LJ 3710 (SC)

IPC धारा 304ए/अब BNS धारा 106 में 'सकल' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है, लेकिन यह सुनिश्चित है कि आपराधिक विधि में, उपेक्षा या असावधानी इतनी उच्च स्तरीय हो की 'सकल' हो जाए। अभिव्यक्ति उतावलापन या उपेक्षा पूर्ण कार्य' 'सकल' शब्द से योग्य होना चाहिए।

44.   मुस्तफा शहदल शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य, .आई.आर 2013 एस.सी 853

उच्चतम न्यायालय ने 'मृत्यु से पूर्व' (soon before death) अभिव्यक्ति की व्याख्या की और अभिनिर्धारित किया कि दहेज मांग और संबद्ध मृत्यु पर आधारित क्रूरता के प्रभाव के बीच आसत्र और जीवंत कड़ी का अस्तित्व होना चाहिए।

45.   गिरीश सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य, 2019 Criminal Appeal no 1475 of 2009 Decided on 23.07.2019

उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि IPC धारा 304बी/ अब BNS धारा 80 के तहत दोषसिद्धि तभी प्रदान की जा सकती है जब महिला को उसके पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार बनाया गया, जो उसकी मृत्यु से पूर्व या उसके लिए किसी भी मांग के संबंध  में होना चाहिए। क्रूरता का संबंध दहेज की मांग से होना चाहिए।

46.   ओमप्रकाश बनाय पंजाब राज्यईआर61 1782

एक व्यक्ति हत्या करने के आशय से अपराध करता है, इस तरह के आशय गठित करने के लिए कार्य करता है, वह हत्या के प्रयास के लिए उत्तरदायी होगा I यह आवश्यक नहीं है कि शारीरिक क्षति मृत्यु का कारण बने I

47.   पी रडिनाथ बनाम भारत संघ, .आई.आर 1994 एम.सी

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि IPC धारा 300/ अब BNS धारा 101 संविधान के अनुच्छेद 21 कान करती है।

48.   श्रीमती ज्ञान कौर बनाम पंजाच राज्य JT 1996 (3) NC 339

उच्चतम न्यायालय ने पिछले फैसले को उलट दिया और धारित किया IPC धारा 309/ अब BNS धारा 101 संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लेघन नहीं है। मरने का अधिकार जीवन के अधिकार में शामिल नहीं है।

49.   वरदराजन बनाम मद्रास राज्य, .आई. आर 1962 एस.सी 942

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया ले जाना' (taking) और एक अवयस्क को किसी व्यक्ति के साथ जाने की अनुमति देने में अंतर है। इसमें अधिक, किसी प्रकार की उत्प्रेरणा या अभियुक्त की सक्रिय भागीदारी व्यक्ति को ले जाने में साबित की जानी चाहिये।

50.   टी.डी वादगामा बनाम गुजरात राज्य, .आई.आर 1973 एस.सी 2313

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया था कि 'बहका ले जाना' शब्द दूसरे पर आशा या कामना उत्पन करके प्रलोभन या लालच के विचार से जुड़ा प्रतीत होता है।

51.   इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ, (2017) 10 एससीची 800

उच्चतम न्यायालय ने धारा 375 में अपवाद 2/ अब BNS धारा 63 में अपवाद 2 की व्याख्या की। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि 18 साल से कम आयु की पत्नी के साथ संभोग बलात्कार का गठन करता है। अतः इस मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुकर भाग 375 अपवाद 2/ अब BNS धारा 63 में अपवाद 2 में 15 वर्ष को 18 वर्ष पड़ा जाना चाहिए।

52.   नवतेज सिंह जौहर और अन्य बनाम भारत संघ, (2018) 10 एसबीसी 1

उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (वर्तमान में निरसित) को असंवैधानिक अभिनिर्धारित किया और उस सीमा तक जिसमें वह व्यक्तिगत रूप से सम्मत समलैंगिक कृत्यों का अपराधीकरण करती है. सर्वोच्च न्यायालय ने सुरेशकुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन में पिछले 2013 के पूर्वर्ती निर्णयों को उलट दिया।

53.   बलदेव सिंह बनाम पंजाब राज्य, (2008) 13 एससीसी 233

IPC की धारा 304-B/ अब BNS धारा 80 और साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 113-8/ साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 114 में प्रयुक्त 'उसकी मृत्यु के कुछ पूर्व’ अभिव्यक्ति निकटता परीक्षण के विचार के साथ मौजूद है। कोई निश्चित अवधि सूचित नहीं की गई है और ‘कुछ पूर्व’ अभिव्यक्ति परिभाषित नहीं की गई है। अभिव्यक्ति 'कुछ पूर्व' सामान्यतया इसका द्योतक है कि संबंधित क्रूरता तथा उत्पीड़न और प्रश्नगत-मृत्यु के बीच अंतराल अधिक नहीं होना बाहिए।

दहेज मांग और संबद्ध मृत्यु पर आधारित क्रूरता के प्रभाव के बीच आसन्न और जीवंत कड़ी का अस्तित्व होना चाहिए।

54.   मध्य प्रदेश राज्य बनाम कल्याण सिंह और अन्य, (2019) 4 एससीसी 268

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आईपीसी की धारा 307/ अब BNS धारा 109 (हत्या करने का प्रयत्न) के तहत अपराध, रद्द नहीं किया जा सकता है, भले ही परिवादकर्ता और अभियुक्त के बीच कोई समझौता हुआ हो, क्योंकि यह एक अशमनीय अपराध है।

55.   डॉक्टर ध्रुव राम मुरलीधर सोनार बनाम महाराष्ट्र राज्य Criminal appeal no. 1443 of 2018 22-11-2018

यदि विवाह का वचन महिला को संभोग के लिए बहकाने के एकल आशय से किया गया था तो यह बलात्कार नहीं है।

56.   राजेश बनाम हरियाणा राज्य, (2019) 6 एससीसी 368

उच्चतम न्यायालय ने दोहराया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 306/ अब BNS धारा 108 (आत्महत्या का दुष्प्रेरण) के तहत दोषसिद्धि, उत्पीड़न का यह अभिकथन पोषणीय योग्य नहीं है कि उसे आरोपी की ओर से घटना के समय आसन्न कोई सकारात्मक कृत्य न होने के कारण जिससे व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिए विवश किया हो।

57.   उत्तर प्रदेश राज्य बनाम फकीरे, (2019) 5 एससीसी 605

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि यदि प्रकोपन अभियुक्त की ओर से स्वैच्छिक था, तो वह भारतीय दंड संहिता (हत्या के अपराध के अपवाद) की धारा 300 का अपवाद 1/BNS की धारा 101 का अपवाद 1 आकर्षित नहीं होगा।

58.   अनुराग सोनी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, (2019) 13 एससीसी 1

उच्चतम न्यायालय ने दोहराया कि विवाह के मिथ्या वचन के द्वारा किसी व्यक्ति द्वारा प्राप्त संभोग के लिए सहमति उसको बलात्कार के आरोप से क्षम्य नहीं करेगी।

 

संपत्ति के विरूद्ध अपराध

(Offences Against Property)

59.   आर. एस नायक बनाम . आर अंतुले और एक अन्य, 1986 Cri. LJ 1922 (SC)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उदापन के अपराध के लिए, भय या धमकी का प्रयोग किया जाना चाहिए।

60.   आर.के डालमिया बनाम दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन, .आई.आर 1962 एस.सी 1821

IPC धारा 405/ BNS धारा 316 के शब्द इतने व्यापक है कि यदि यह साबित हो जाए कि उन्हें साझेदारी की संपति या प्रभुत्व का दायित्व सौंपा गया है और उसे इच्छानुसार बेईमानी से उसका दुर्विनियोग किया गया था या उसे बदला गया था।

61.   सतीशचंद्र रतन लाल शाह बनाम गुजरात राज्य, क्रिमिनल अपील नंबर 0009 ऑफ 2019

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऋण की वापसी करने में किसी व्यक्ति की असमर्थता तब तक धोखा देने के लिए दांडिक अभियोजन को जन्म नहीं दे सकती, जब तक कि संख्यवहार के आरंभ में ही कपट या बेईमानी के आशय को सही न दिखाया गया हो।

 

विवाह के विरुद्ध अपराध

(Offences Against Marriage)

62.   जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ, (2019) 3 एससीसी 39

सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को रद्द कर दिया, जो जारकर्म को असंवैधानिक बनाता है।

63.   नीतिका बनाम यादविंदर सिंह, क्रिमिनल अपील नंबर 1096 ऑफ 2019

उच्चतम न्यायालय ने दोहराया कि न्यायालय उस स्थान पर, जहां पत्नी, क्रूरता के कृत्यों के कारण, वैवाहिक घर से चले जाने या जाने के बाद शरण लेती है, भारतीय दंड संहिता की धारा 498 (क) / अब BNS धारा 85 के तहत अपराध गठन का अभियोग लगाते हुए, उस परिवाद को विचारणार्थ स्वीकार करने की अधिकारिता भी है।

64.   रश्मि चोपड़ा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2019) 15 एससीसी 357

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि IPC धारा 498 (क)/ अब BNS धारा 85 इस पर विचार नहीं करता है कि IPC धारा 498 (क)/ अब BNS धारा 85  के तहत अपराध के लिए परिवाद केवल महिलाओं द्वारा दर्ज की जानी चाहिए, जो पति या उसके रिश्तेदारों के द्वारा क्रूरता के अधीन है।

 

प्रयत्न

(Attempt)

65.   अभयानंद मिश्रा बनाम विहार राज्य, एआईआर 1961 एम.मी 1698

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि कोई का प्रयत्न करता है जब-

1.       यह उस अपराध को करने का आशय रखता है

2.       कोई कार्य जिसमें आपराधिक प्रवल जिसमे आपराधिक कृत्य संरक्षित होती हो।

3.       आशियत उद्देश्य की पूर्ति में असफलता अर्थात कार्य का अपराध के पूर्णता तक ना पहुंचना।

66.   महाराष्ट्र राज्य बनाम मोहम्मद याकूब, .आई.आर 1980 एस.सी 1111

सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि कुछ कार्य अपराध के गठन की ओर होने चाहिए और उसे कार्य के आशयित परिणाम से सन्नि कटत होना चाहिए।

संचिकट समय और क्रिया के संबंध में होनी आवश्यक नहीं है बीक आशय के संबंध में होनी चाहिए।

67.   क्वीन बनाम कॉलिन्स, 9 Cox, CC. 407

यह निर्धारित किया गया था कि यदि एक व्यक्ति असंभव कार्य करने का प्रयत्न करता है तो वह उत्तरदायी नहीं होगा आर. बी. मैकफर्सन और आर बनाम प्रोडू के मामले में भी यही निर्णय लिया गया।

68.   आर. बनाम ऑस्बेराँ, (1920) 84 J.P 63

इस मामले में 'क ने गर्भपात के लिए विशेष गोलियां दी। यह पाया गया कि गोलियां अहानिकरक थीं। यह अभिनिर्धारित किया गया कि चूंकि वह व्यक्ति कार्य पर नहीं था इसलिए वह प्रयत्न के लिए उतरदायी नहीं है। इस मामले को आर बनाम स्पाइसर के मामले में उलट कर दिया गया है।

 

विविध

(Miscellaneous)

69.   . प्र. राज्य बनाम राकेश मिश्रा, 498एवं 499 वर्ष 2015, 2015 (3) सी.सी. एस. सी. 1527 (एस.सी.)

उच्च न्यायालय ने अपने निष्कर्ष निकालने के लिए प्रचलित विधि के विरुद्ध केवल स्वयं के समक्ष सामग्री की परीक्षा की अपर सत्र न्यायाधीश द्वाता पारित आरोप विरचित करने के आदेश को अपास्त करने वाला उच्च न्यायालय का आपित निर्णय एवं आदेश।

70.   धनपाल बनाम राष्ट्रीय राजधानी राज्य दिल्ली, (27 अप्रैल, 2020 को विनिश्चित)

इसके बाद मारपीट की प्रकृति ऐसी होती है कि लक्षित व्यक्ति के उसके परिणामस्वरूप होने वाली चोटों से मरने की संभावना होती है,

अभियुक्त को अपने कृत्य के परिणामों के बारे में पता होना चाहिए।

71.   मोहम्मद अनवर बनाम राष्ट्रीय राजधानी राज्य दिल्ली (19 अगस्त 2020 को विनिहित)

दण्ड संहिता 1860 की धारा 84/ BNS की धारा 22 के तहत मन की अस्वस्थता की पत्तीले या आयु की जुबेनिलिटी जैसी परिस्थितियों को कम करने के लिए आमतौर पर परीक्षण के दौरान ही उठाया जाना चाहिए। देर से सही दावे न केवल उचित उत्पादन एवं सबूतों की सराहना को रोकते है, बल्कि वे बचाव पक्ष के मामले की वास्तविकता को भी कमजोर करते हैं।

72.   बलवीर सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2019) 15 एस. सी. सी. 599

IPC धारा 34/ BNS धारा 3(5) का आह्वान करने के लिए यह स्थापित करना होगा कि आपराधिक कृत्य सभी के सामान्य आशय को आगे बढ़ाने के लिए एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा किया गया। इसलिए, यह साबित करना चाहिए कि-

1.       कोई विशेष अपराध करने के लिए अनेक व्यक्तियों के भाग पर एक सामान्य आशय था

तथा

2.       अपराध वास्तव में उनके द्वारा एक सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया गया था।

73.   सुकुमारन बनाम राज्य, (2019) 15 एस. सी. सी. 117

आत्मरक्षा के अधिकार को लागू करने के लिए एक उचित आशंका काफी है। यह आवश्यक नहीं है कि वहां अपराध का वास्तविक घटना, निजी रक्षा का अधिकार देने के लिए होना चाहिए। यह काफी है कि अभियुक्त ने आशंकित किया कि इस तरह के अपराध का चिंतन है और यह निजी रक्षा के अधिकार का प्रयोग न किए जाने पर ऐसा संभवतः किए जाने की संभावना है।

74.   राजेंद्र बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, (2019) 10 एस. सी. सी. 623

आपराधिक षड्‌यंत्र का आरोप स्थापित करने के लिए तीन आवश्यकताओं का साबित होना चाहिए। प्रथमतः एक आपराधिक उद्देश्य, द्वितीयतः एक मंसूबा या योजना, साधनों को अक्तारित करना उन्हें पूरा करने के लिए और अंततः, दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच ऐसे उद्देश्य की पूर्ति के लिए सहयोग करने का समझौता।

75.   स्टालिन बनाम राज्य, 2020 एस. सी. सी. ऑनलाइन एस.सी. 723

वहाँ कोई कठोर नियम नहीं है कि एक चोट के मामले में IPC धारा 302/ BNS धारा 102  आकर्षित नहीं होगा। यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। चोट की प्रकृति, शरीर का वह हिस्सा जहां वह हुआ, इस तरह की चोट के कारण के लिए इस्तेमाल किया गया हथियार इस तथ्य के सूथक हैं कि क्या अभियुक्त मृतक की मौत का कारण मृत्यु या नहीं करने के इरादे से किया था।

76.   सुबेद अली बनाम असम राज्य, 2020 एस. सी. सी. ऑनलाइन एस.सी. 794

यह आवश्यक नहीं है कि इससे पहले कि किसी व्यक्ति को सामान्य आशय के आधार पर दोषी ठहराया जाए, वह सक्रिय रूप से मारपीट की शारीरिक गतिविधि में शामिल होना चाहिए। यदि साक्ष्य का स्वरूप पहले से व्यवस्थित योजना प्रदर्शित करता है और योजना के अनुसार काम करता है, तो सामान्य आशय का अनुमान लगाया जा सकता है।

     

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