
(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, कोई पुलिस अधिकारी, जो 1[निरीक्षक] की पंक्ति से नीचे का न हो, या केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार का कोई ऐसा अन्य अधिकारी, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया गया हो, किसी सार्वजनिक स्थान में प्रवेश कर सकेगा और उसकी तलाशी ले सकेगा तथा वहां पाए गए किसी ऐसे व्यक्ति को बिना वारण्ट गिरफ्तार कर सकेगा जो युक्तियुक्त रूप से संदिग्ध व्यक्ति है या जिसने इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किया है या कर रहा है या करने वाला है।
(1. 2009 के अधिनियम सं० 10 द्वारा प्रतिस्थापित।)
इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, “सार्वजनिक स्थान" पद के अन्तर्गत कोई सार्वजनिक वाहन, कोई होटल, कोई दुकान या कोई ऐसा अन्य स्थान भी आता है, जो जनता द्वारा उपयोग के लिए आशयित है या उनकी पहुंच में है ।
(2) जहां कोई व्यक्ति, उपधारा (1) के अधीन पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी अधिकारी द्वारा गिरफ्तार किया जाता है वहां ऐसा अधिकारी, बिना किसी अनावश्यक विलंब के गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उस मामले में अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष या पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी के समक्ष ले जाएगा या भेजेगा
(3) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध, इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां तक हो सके, इस धारा के अधीन किए गए किसी प्रवेश, ली गई कोई तलाशी या गिरफ्तारी के संबंध में, लागू होंगे।
81. इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में इससे असंगत किसी बात के होते हुए प्रभावी होंगे:
[परन्तु इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई बात किसी व्यक्ति को, प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम, 1957 (1957 का 14) या पेटेंट अधिनियम, 1970 (1970 का 39) 3[या अंकीय वैयक्तिक डाटा संरक्षण अधिनियम, 2023] के अधीन प्रदत्त किसी अधिकार का प्रयोग करने से निर्बन्धित नहीं करेगी।
(3. 2009 के अधिनियम सं० 22 द्वारा अंतःस्थापित ।)
(1) इस अधिनियम के उपबन्ध, तत्समय प्रवृत्त, इलैक्ट्रानिक चेकों तथा रुण्डित चेकों पर या उनके सम्बन्ध में केन्द्र सरकार द्वारा या भारतीय रिजर्व बैंक के परामर्श से शासकीय राजपत्र में ऐसे उपान्तरणों तथा संशोधनों के अधीन लागू होंगे जैसा परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) के प्रयोजनों को क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक हो।
(2) उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्मित प्रत्येक अधिसूचना, बनाये जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा, यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएँ तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएँ कि वह अधिसूचना नहीं निर्मित किया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा। किन्तु अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पूर्व उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल
[3. 2002 के अधिनियम सं० 55 द्वारा (6-2-2003 से ) अंतःस्थापित ।)
इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अभिव्यक्तियों "इलेक्टॉनिक चेक" और "ऋण्डित चेक" का वही अर्थ होगा जैसा उन्हें परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) को धारा 6 में समनुदेशित है।
नियंत्रक, उप नियंत्रक और सहायक नियंत्रकों को भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 21 अंतर्गत लोक सेवक समझा जाएगा ।]
(1. 2009 के अधिनियम सं० 10 द्वारा प्रतिस्थापित ।)
केन्द्रीय सरकार, किसी राज्य की सरकार को इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियम, विनियम या किए गए आदेश के किन्हीं उपबंधों को राज्य में निष्पादित करने के लिए निदेश दे सकेगी।
इस अधिनियम, इसके अधीन बनाए गए किसी नियम, विनियम या किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, नियंत्रक या उसकी ओर से कार्य करने वाले किसी व्यक्ति, 2[और न्यायनिर्णायक अधिकारियों के विरुद्ध नहीं होगी।
(2. 2017 के अधिनियम सं० 7 द्वारा प्रतिस्थापित।)
केन्द्रीय सरकार, इलैक्ट्रानिक माध्यम के सुरक्षित उपयोग और ई-गवर्नेस और ई-कामर्स के संवर्धन के लिए, गूढ़लेखन के ढंग या पद्धतियां विहित कर सकेगी ।
(1. 2009 के अधिनियम सं० 10 द्वारा अंतःस्थापित ।)
जो कोई किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है, यदि दुष्प्रेरित कार्य, दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाता है और ऐसे दुष्प्रेरण के दंड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं है, इस अधिनियम के अधीन अपराध के लिए उपबंधित दंड से दंडित किया जाएगा।
कोई कार्य या अपराध दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया तब कहा जाएगा, जब वह उस उक्साहट के परिणामस्वरूप या उस षड्यंत्र के अनुसरण में या उसकी सहायता से किया जाता है, जिससे दुष्प्रेरण का गठन होता है ।
जो कोई इस अधिनियम द्वारा दंडनीय अपराध करने का प्रयत्न करता है या ऐसे कोई अपराध कराता है और ऐसे प्रयत्न में अपराध करने की दिशा में कोई कार्य करता है, जहां ऐसे प्रयत्न के दंड के लिए कोई स्पष्ट उपबंध नहीं है, वहां वह उस अपराध के लिए उपबंधित किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि, उस अपराध के लिए उपबंधित कारावास की अधिकतम अवधि के आधे तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो अपराध के लिए उपबंधित है या दोनों से, दंडित किया जाएगा।]
(1) जहां कोई व्यक्ति, जो एक कंपनी है, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी निदेश या आदेश के किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन करता है, वहां प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो उस उल्लंघन के लिए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे उल्लंघन के दोषी समझे, जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि ऐसा उल्लंघन उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे उल्लंघन के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी निदेश या आदेश के किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है वह उल्लंघन कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध या उल्लंघन का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
इस धारा के प्रयोजनों के लिए—
(i) “कंपनी” से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, और
(ii) फर्म के संबंध में “निदेशक” से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है।
(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:
परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश इसके किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र और इलैक्ट्रानिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः–
1[(क) धारा 3क की उपधारा (2) के अधीन इलैक्ट्रानिक चिह्नक या इलैक्ट्रानिक अधिप्रमाणन तकनीक की विश्वसनीयता पर विचार करने के लिए शर्तें;
(कक) धारा 3क की उपधारा (3) के अधीन इलैक्ट्रानिक चिह्नक या अधिप्रमाणन को अभिनिश्चित करने की प्रक्रिया;
(कख) वह रीति, जिसमें धारा 5 के अधीन इलैक्ट्रानिक चिह्नक द्वारा किसी सूचना या सामग्री को अधिप्रमाणित किया जा सकेगा]
(ख) वह इलैक्ट्रानिक रूप, 1 , जिसमें धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन फाइल करने, जारी करने, अनुदान, या संदाय का कार्य किया जाएगा,
(ग) धारा 6 की उपधारा (2) के अधीन वह रीति और रूपविधान, जिसमें इलैक्ट्रानिक अभिलेख फाइल किया जाएगा या जारी किया जाएगा और संदाय करने का ढंग,
2[(गक) वह रीति, जिसमें धारा 6क की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकृत सेवा प्रदाता सेवा प्रभार संगृहीत, प्रतिधारित और विनियोजित कर सकेगा;]
(घ) धारा 10 के अधीन [ इलैक्ट्रानिक चिह्नक] की किस्म से संबंधित विषय वह रीति और रूपविधान, जिसमें इसे लगाया जाएगा;
3[(ङ) धारा 15 के अधीन इलैक्ट्रानिक चिह्नक सृजन डाटा भंडारित करने और उसे लगाने की रीति;
(ङक) धारा 16 के अधीन सुरक्षा प्रक्रिया और पद्धति;]
(च) धारा 17 के अधीन नियंत्रक, उपनियंत्रकों [सहायक नियंत्रकों, अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की अर्हताएं, अनुभव और उनकी सेवा के निबंधन और शर्तें;
(छ) 4[***] 2009 के अधिनियम संख्या 10 द्वारा विलुप्त।
(ज) धारा 21 की उपधारा (2) के अधीन आवेदक द्वारा पूरी की जाने वाली अपेक्षाएं;
(झ) धारा 21 की उपधारा (3) के खंड (क) के अधीन अनुदत्त अनुज्ञप्ति की विधिमान्यता की अवधि;
(ञ) वह प्ररूप, जिसमें धारा 22 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन किया जा सकेगा,
(ट) धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (ग) के अधीन संदेय फीसों की रकम
(ठ) ऐसे अन्य दस्तावेज, जो धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (घ) के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन के साथ लगाए जाएंगे,
(ङ) धारा 23 के अधीन अनुज्ञप्ति के नवीकरण के लिए प्ररूप और उसके लिए संदेय फीस;
5[(डक) धारा 35 के अधीन इलैक्ट्रानिक चिह्नक प्रमाणपत्र जारी करने के लिए आवेदन का प्ररूप और फीस
(ड) वह प्ररूप, जिसमें धारा 35 की उपधारा (1) के अधीन (इलैक्ट्रानिक चिह्नक] प्रमाणपत्र जारी किए जाने के लिए आवेदन किया जा सकेगा;
(ण) धारा 35 की उपधारा (2) के अधीन [ इलैक्ट्रानिक चिह्नक] प्रमाणपत्र जारी किए जाने के लिए प्रमाणकर्ता प्राधिकारी को संदाय की जाने वाली फीस,
6[(णक) धारा 40 क के अधीन उपयोगकर्ताओं के कर्तव्य;
(णख) 1[***] (1. 2023 के अधिनियम संख्या 22 द्वारा विलुप्त ।
(त) वह रीति, जिसमें धारा 46 की उपधारा (1) के अधीन न्यायनिर्णायक अधिकारी जांच करेगा;
(थ) वह अर्हता और अनुभव, जो धारा 46 की उपधारा (3) के अधीन न्यायनिर्णायक अधिकारी के पास होगा;
(द) [***] वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा विलुप्त
(ध) [***] वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा विलुप्त
(न) [***] वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा विलुप्त
(प) वह प्ररूप, जिसमें धारा 57 की उपधारा (3) के अधीन अपील फाइल की जा सकेगी और उसके लिए फीस; (फ) सिविल न्यायालय की कोई अन्य शक्ति, जिसका धारा 58 की उपधारा (2) के खंड (छ) के अधीन विहित किया जाना अपेक्षित है, और
4[(ब) धारा 52क के अधीन [ अपील अधिकरण] के अध्यक्ष की शक्तियां और कृत्य;
(4. वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा प्रतिस्थापित)
(भ) धारा 67ग के अधीन प्रतिधारित और परिरक्षित की जाने वाली सूचना, अवधि, रीति और ऐसी सूचना का प्ररूप;
(म) धारा 69 की उपधारा (2) के अधीन अंतररोधन, मानीटरी या विगूहन के लिए प्रक्रियाएं और रक्षोपाय;
(य) धारा 69क की उपधारा (2) के अधीन जनता की पहुंच का अवरोधन करने की प्रक्रिया और रक्षोपाय,
(यक) धारा 69ख की उपधारा (3) के अधीन ट्रैफिक आंकडे या सूचना की मानीटरी करने और उन्हें एकत्रित करने की प्रक्रिया और रक्षोपायः
(यख) धारा 70 के अधीन संरक्षित प्रणाली के लिए सूचना सुरक्षा पद्धति और प्रक्रियाएं;
(यग) धारा 70क की उपधारा (3) के अधीन अभिकरण के कृत्यों और कर्तव्यों के पालन की रीति;
(यघ) धारा 70ख की उपधारा (2) के अधीन अधिकारी और कर्मचारी;
(यङ) धारा 70ख की उपधारा (3) के अधीन महानिदेशक और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के निबंधन और शर्तें
(यच) वह रीति, जिसमें धारा 70क की उपधारा (5) के अधीन अभिकरण के कृत्यों और कर्तव्यों का पालन किया जाएगा;
(यछ) धारा 79 की उपधारा (2) के अधीन मध्यवर्तियों द्वारा अनुपालन किए जाने वाले मार्गदर्शक सिद्धांत;
(यज) धारा 84क के अधीन विगूडन का ढंग या पद्धति ] ।
(3) 1[धारा 70क की उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना और उसके द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम] उसके निकाले जाने या बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस 2[*] में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह 3[...] नहीं की जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगी। किन्तु 4[*] के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात को विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा 5[**]
(1-5. 2009 के अधिनियम संख्या 10 द्वारा विलुप्त |
(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् यथाशीघ्र एक समिति का गठन करेगी जिसे साइबर विनियमन सलाहकार समिति कहा जाएगा।
(2) साइबर विनियमन सलाहकार समिति में एक अध्यक्ष होगा और उतनी संख्या में ऐसे अन्य शासकीय और अशासकीय सदस्य होंगे जो मुख्य रूप से प्रभावित हितों का प्रतिनिधित्व करते हों या जिन्हें विषयवस्तु का विशेष ज्ञान हो, जो केन्द्रीय सरकार ठीक समझे ।
(3) साइबर सलाहकार समिति निम्नलिखित को सलाह देगी,
(क) केन्द्रीय सरकार को या तो साधारणतया किन्हीं नियमों के संबंध में या इस अधिनियम से संबद्ध किसी अन्य प्रयोजन के लिए,
(ख) नियंत्रक को इस अधिनियम के अधीन विनियम बनाने में,
(4) ऐसी समिति के अशासकीय सदस्यों को ऐसे यात्रा और अन्य भत्ते संदत्त किए जाएंगे, जो केन्द्रीय सरकार नियत करे ।
(1) नियंत्रक, साइबर सलाहकार समिति सपरामर्श करने के पश्चात् और केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को क्रियान्वित करने के लिए इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन विनियम बना सकेगा।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 18 के खंड 1[(ढ)] के अधीन प्रत्येक प्रमाणकर्ता प्राधिकारी के प्रकटन अभिलेख से युक्त डाटा संचय के अनुरक्षण से संबंधित विशिष्टियां;
(ख) वे शर्तें और निर्बन्धन जिनके अधीन रहते हुए नियंत्रक धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन भारत से बाहर किसी देश में किसी अंकीय चिह्नक प्रमाणपत्र जारी करने के लिए प्राधिकृत किसी प्रमाणकर्ता प्राधिकारी को मान्यता प्रदान कर सकेगा;
(ग) वे निबन्धन और शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए धारा 21 की उपधारा (3) के खंड (ग) के अधीन कोई अनुज्ञप्ति अनुदत्त की जा सकेगी;
(घ) प्रमाणकर्ता प्राधिकारी द्वारा धारा 30 के खंड (घ) के अधीन पालन किए जाने वाले अन्य मानक;
(ङ) वह रीति जिसमें प्रमाणकर्ता प्राधिकारी, धारा 34 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट विषय प्रकट करेगा;
(च) विवरण की विशिष्टियां, जो धारा 35 की उपधारा (3) के अधीन आवेदन के साथ संलग्न होंगी, और
(छ) वह रीति जिसमें उपयोगकर्ता धारा 42 की उपधारा (2) के अधीन प्रमाणकर्ता प्राधिकारी को प्राइवेट कुंजी गोपनीय न रह जाने की सूचना देगा।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा। किंतु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
[(1. सूचना प्रौद्योगिकी (कठिनाईयों का निवारण) आदेश, 2002 द्वारा प्रतिस्थापित (19-09-2002)]
(1) राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) वह इलैक्ट्रानिक प्ररूप जिसके तहत धारा 6 की उपधारा (1) अधीन फाइल, जारी, प्रदान, प्राप्त या संदाय किया जाएगा;;
(ख) धारा 6 को उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट विषय;
(ग)[*] 1. 2009 के अधिनियम संख्या 10 द्वारा विलुप्त (27-10-2009 से प्रभावी)।
(3) इस धारा के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, इसके बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र जहाँ राज्य विधान मण्डल के दो सदन हैं वहाँ प्रत्येक सदन के समक्ष या जहाँ राज्य विधानमण्डल का एक सदन है वहाँ इस सदन के समक्ष रखा जाएगा।
[सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 (2009 का 10), धारा 48 द्वारा विलुप्त (27-10-2009 से प्रभावी) ।
[सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 (2009 का 10), धारा 48 द्वारा विलुप्त (27-10-2009 से प्रभावी) ।]
[सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 (2009 का 10), धारा 48 द्वारा विलुप्त (27-10-2009 से प्रभावी)।
[ सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 (2009 का 10), धारा 48 द्वारा विलुप्त (27-10-2009 से प्रभावी) ।