
अध्याय 10
1[अपील अधिकरण]
3( 1 ) भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 1997 (1997 का 24) की धारा 14 के अधीन स्थापित दूर संचार विवाद समाधान और अपील अधिकरण, वित्त अधिनियम, 2017 के अध्याय 6 के भाग 14 के प्रारंभ से ही इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अपील अधिकरण होगा और उक्त अधिकरण, इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उसे प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेगा ।]
(2) केन्द्रीय सरकार, 4[अधिसूचना द्वारा], वे विषय और स्थान 3[विनिर्दिष्ट ] करेगी, जिनके संबंध में अपील अधिकरण] अधिकारिता का प्रयोग करेगा।
(1-4.वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा प्रतिस्थापित।)
49. [***] वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा विलुप्त।
50. [***] वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा विलुप्त।
51. [***] वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा विलुप्त।
52. [52(क) -(ग)] वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा विलुप्त।
यदि दो सदस्यों से मिलकर बनने वाली किसी न्यायपीठ के सदस्यों की किसी प्रश्न पर राय में मतभेद है तो वे उस प्रश्न या उन प्रश्नों का, जिन पर उनमें मतभेद है, कथन करेंगे और 1[अपील अधिकरण] के अध्यक्ष को निदेश करेंगे जो स्वयं उस प्रश्न या प्रश्नों की सुनवाई करेगा और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का विनिश्चय ऐसे सदस्यों के बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा, जिन्होंने मामले की सुनवाई की है, जिनके अंतर्गत वे सदस्य भी हैं, जिन्होंने मामले की पहले सुनवाई की थी ।]
(1.वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा प्रतिस्थापित।)
53. [***] वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा विलुप्त।
54. [***] वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा विलुप्त।
केन्द्रीय सरकार का, 1[अपील अधिकरण] के 2[यथास्थिति, अध्यक्ष या सदस्य] के रूप में किसी व्यक्ति की नियुक्ति करने वाला कोई आदेश किसी भी रोति से प्रश्नगत नहीं किया जाएगा और 3[ अपील अधिकरण] का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस आधार पर किसी भी रीति से प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि 4[ अपील अधिकरण] के गठन में कोई दोष है।
(1-4.वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा प्रतिस्थापित।)
56. [***] वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा विलुप्त।
( 1 ) उपधारा (2) में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय इस अधिनियम के अधीन नियंत्रक या न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, उस 2[ अपील अधिकरण] को अपील कर सकेगा, जिसकी उस विषय पर अधिकारिता है ।
(2) नियंत्रक या न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा पक्षकारों की सहमति से किए गए किसी आदेश के विरुद्ध अपील 3[ अपील अधिकरण] को नहीं होगी ।
(3) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील, उस तारीख से, जिसको नियंत्रक या न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा किए गए आदेश की प्रति व्यथित व्यक्ति द्वारा प्राप्त की जाती है, पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर फाइल की जाएगी और वह ऐसे प्ररूप में होगी और उसके साथ उतनी फीस होगी जो विहित की जाए:
परन्तु 4[अपील अधिकरण], उक्त पैंतालीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उक्त अवधि के भीतर उसे फाइल न किए जाने के लिए पर्याप्त कारण था ।
(4) 5[ अपील अधिकरण], उपधारा (1) के अधीन अपील की प्राप्ति पर अपील के पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, उस आदेश पर जिसके विरुद्ध अपील की गई है, उसकी पुष्टि, उपान्तरण या अपास्त करने वाला ऐसा आदेश पारित करेगा, जो वह उचित समझे ।
(5) 6[ अपील अधिकरण], अपने द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रति अपील के पक्षकारों और संबंधित नियंत्रक या न्यायनिर्णायक अधिकारी को भेजेगा ।
(6) उपधारा (1) के अधीन 7[ अपील अधिकरण] के समक्ष फाइल की गई अपील यथासंभवशीघ्र निपटाई जाएगी और अपील की प्राप्ति की तारीख से छह मास के भीतर अपील को अंतिम रूप से निपटाने का प्रयास किया जाएगा।
(1-7.वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा प्रतिस्थापित। )
(1) 2[ अपील अधिकरण ], सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 1908 का 5) द्वारा अधिकथित प्रक्रिया से आबद्ध नहीं होगा, किन्तु नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से मार्गदर्शित होगा और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों तथा किन्हीं नियमों के अधीन होगा। 3[ अपील अधिकरण] को, अपनी प्रक्रिया को, जिसके अंतर्गत वह स्थान भी है जहां उसकी बैठकें होंगी, विनियमित करने की शक्ति होगी ।
(2) 4[अपील अधिकरण] को इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित विषयों के संबंध में वही शक्तियां होंगी, जो किसी वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्ः–
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना,
(ख) दस्तावेजों या अन्य इलैक्ट्रानिक अभिलेखों को प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;
(ङ) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;
(च) किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करना या एकपक्षीय विनिश्चय करना;
(छ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
(3) 5[अपील अधिकरण] के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45 ) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत और धारा 196 के प्रयोजनार्थ न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और 6[ अपील अधिकरण], दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(1-6.वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा प्रतिस्थापित। )
अपीलार्थी, 1[अपील अधिकरण] के समक्ष अपना मामला प्रस्तुत करने के लिए स्वयं हाजिर हो सकेगा या एक अथवा अधिक विधि व्यवसायियों को अथवा अपने किसी अधिकारी को प्राधिकृत कर सकेगा।
परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के उपबंध, जहां तक हो सके, 1[अपील अधिकरण] को की गई अपील को लागू होंगे
(59-60.वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा प्रतिस्थापित। )
ऐसे किसी विषय की बाबत, जिसके संबंध में इस अधिनियम के अधीन नियुक्त कोई न्यायनिर्णायक अधिकारी या इस अधिनियम के अधीन गठित कोई 1[ अपील अधिकरण], इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन अवधारित करने के लिए सशक्त है, कोई वाद या कार्यवाही ग्रहण करने की किसी न्यायालय को अधिकारिता नहीं होगी और इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा कोई व्यादेश अनुदत्त नहीं किया जाएगा ।.
2[ अपील अधिकरण ] के किसी विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे विनिश्चय या आदेश से उद्भूत होने वाले तथ्य या विधि के किसी प्रश्न पर 3[अपील अधिकरण] के विनिश्चय या आदेश की उसे संसूचना की तारीख से साठ दिन के भीतर उच्च न्यायालय को अपील कर सकेगा :
परन्तु यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी, उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था तो वह ऐसी और अवधि के भीतर, जो साठ दिन से अधिक नहीं होगी, अपील फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।
(61-62.वित्त अधिनियम, 2017 (2017 का 7) द्वारा प्रतिस्थापित। )
( 1 ) इस 2[ अधिनियम के अधीन कोई उल्लंघन, न्यायनिर्णयन कार्यवाहियों के संस्थापन के पूर्व या पश्चात्, यथास्थिति, नियंत्रक या उसके द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी द्वारा या न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो नियंत्रक या ऐसे अन्य अधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, शमन किया जा सकेगा :
परन्तु ऐसी राशि, किसी भी दशा में, शास्ति की उस अधिकतम रकम से अधिक नहीं होगी, जो इस अधिनियम के अधीन इस प्रकार शमन किए गए उल्लंघन के लिए अधिरोपित है।
(2) उपधारा (1) की कोई बात उस व्यक्ति को लागू नहीं होगी, जो उसके द्वारा किए गए पहले उल्लंघन, जिसका शमन किया गया था, की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के भीतर वही या वैसा ही उल्लंघन करता है।
इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, उस तारीख से, जिसको उल्लंघन का पहले शमन किया गया था, तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् किया गया कोई दूसरा या पश्चात्वर्ती उल्लंघन पहला उल्लंघन समझा जाएगा।
(3) जहां उपधारा (1) के अधीन किसी उल्लंघन का शमन किया गया है, वहां इस प्रकार शमन किए गए उल्लंघन की बाबत उस उल्लंघन के दोषी व्यक्ति के विरुद्ध, यथास्थिति, कोई कार्यवाही या अतिरिक्त कार्यवाही नहीं की जाएगी।
इस अधिनियम के अधीन 2[अधिरोपित शास्ति], या अधिनिर्णीत प्रतिकर ] यदि उसका संदाय नहीं किया जाता है, भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल की जाएगी और यथास्थिति, अनुज्ञप्ति या 2[ इलैक्ट्रानिक चिह्नक] प्रमाणपत्र शास्ति का संदाय किए जाने तक निलंबित रखा जाएगा ।