धारा 10 से 19 अध्याय 3 राजस्थान न्यायालय फीस एवं वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 3

फीस का अवधारण

धारा 10. वाद की विषय वस्तु की विशिष्टियों का विवरण और वादी द्वारा उसका मूल्यांकन-

प्रत्येक वाद में जिसमें इस अधिनियम के अधीन वादपत्र पर संदेय फीस वाद की विषय वस्तु के बाजारी मूल्य पर निर्भर करती हैं, वादी वादपत्र के साथ विहित प्ररूप में वाद की विषय वस्तु की विशिष्टियाँ का विवरण और उसके द्वारा उसका मूल्यांकन फाइल करेगा, सिवाय उसके जबकि ऐसी विशिष्टियाँ और मूल्यांकन वादपत्र में अंतर्विष्ट हों।

धारा 11. समुचित न्यायालय फीस के बोरे में विनिश्चय -

(1) किसी भी न्यायालय में संस्थित किए गए प्रत्येक वाद में, न्यायालय वादपत्र को रजिस्टर किए जाने का आदेश देने से पूर्व वादपत्र में अंतर्विष्ट सामग्री और अभिकथनों पर और धारा 10 के अधीन फाइल किए गए विवरण, यदि कोई हो, में अंतर्विष्ट सामग्री के आधार पर, उस पर संदेय समुचित फीस का विनिश्चय करेगा, तथापि विनिश्चय उत्तरवर्ती उप-धाराओं में वि-निदिष्ट रीति से पुनर्विलोकन, आगे पुनर्विलोकन और संशोधन के अध्यधीन होगा।

(2) कोई भी प्रतिवादी अभिवचन कर सकता है कि वाद की विषय वस्तु का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया है या कि संदत फीस पर्याप्त नहीं है। ऐसे अभिवचनों से उद्भूत होने वाले समस्त प्रश्नों पर सुनवाई और विनिश्चय सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (1908 का केंद्रीय अधिनियम 5) की प्रथम अनुसूची के आदेश 18 द्वारा यथाअनुध्यात वाद की सुनवाई से पूर्व किया जाएगा। यदि न्यायालय यह विनिश्चय करता है कि वाद की विषय वस्तु का समुचित मूल्यांकन किया गया है या कि सदत्त फीस पर्याप्त नहीं है, न्यायालय एक तारीख नियत करेगा जिसके पूर्व न्यायालय के विनिश्चय के अनुसार वादपत्र संशोधित किया जाएगा और फीस की कमी का संदाय किया जाएगा। यदि अनुज्ञात समय के भीतर वादपत्र इस प्रकार संशोधित न किया जाए या यदि फीस को कभी का संदाय न किया जाए, वादपत्र नामंजूर कर दिया जाएगा और न्यायालय वाद के खर्च के बारे में ऐसा आदेश पारित करेगा जैसा वह न्याय संगत समझे।

(3) दावा के गुणागुण पर विवाद्यक विरचित किए जा चुकने के पश्चात् जोड़ा गया प्रतिवादी उसके द्वारा फाइल किए जाने वाले लिखित कथन में अभिवचन कर सकता है कि वाद की विषय वस्तु का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया है या कि संदत्त फीस प्रर्याप्त नहीं है। ऐसे अभिवचनों से उद्‌भूत होने वाले समस्त प्रश्नों पर सुनवाई और विनिश्चय दावा के गुणागुण पर ऐसे प्रतिवादी को प्रभावित करने वाला साक्ष्य अभिलिखित किए जाने से पूर्व किया जाएगा और यदि न्यायालय यह निष्कर्ष निकालता है कि वाद की विषय वस्तु का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया है या कि संदत्त फीस पर्याप्त नहीं है, न्यायालय उप-धारा (2) में अधिकथित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।

स्पष्टीकरण-

इस उप-धारा की कोई भी बात ऐसे प्रतिवादी के उत्तराधिकारी या हित-प्रतिनिधि के रूप में जोड़े गए प्रतिवादी पर लागू नहीं होगी जो दावा के गुणागुण पर विवाद्यक विरचित किए जाने के पूर्व अभिलेख पर था और जिसे यह अभिवचन करते हुए कि वाद की विषय वस्तु का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया था, या कि संदत्त फीस प्रर्याप्त नहीं थी, लिखित कथन फाइल करने का अवसर था।

(4) (क) जहाँ कहीं कोई मामला अपील न्यायालय के समक्ष आता है, ऐसे न्यायालय के लिए या तो स्वप्रेरणा से या पक्षकारों में से किसी के आवेदन पर निचले न्यायालय में वादपत्र या लिखित कथन पर या किसी अन्य कार्यवाही में संदेय फीस को प्रभावित करने वाले, निचले न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश की शुद्धता के बारे में विचार करना और उस पर संदेय समुचित फीस का अवधारण करना विधिपूर्ण होगा।

स्पष्टीकरण-

कोई मामला तब भी अपील न्यायालय के समक्ष आना समझा जाएगा चाहे अपील वाद की विषय वस्तु के केवल किसी भाग से ही संबंधित हो।

(ख) यदि अपील न्यायालय विनिश्चय करता है, की निचले न्यायालय में संदत्त फीस पर्यापत नहीं है, न्यायलय दायी पक्षकार से ऐसे समय भीतर जो उसके द्वारा नियत किया जाए फीस की कमी का संदाय किए जाने की अपेक्षा करेगा।

(ग) यदि नियत किए गए समय के भीतर फीस की कमी का संदाय नहीं किया जाता है और व्यतिक्रम ऐसे अनुतोष के बारे में है जिसे निचले न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया गया है और जिसकी अपीलार्थी अपील में ईप्सा करता है, अपील खारिज कर दी जाएगी, किंतु यदि व्यतिक्रम ऐसे अनुतोष के बारे में है जिसे निचले न्यायालय द्वारा डिक्री किया गया है फीस की कमी उसी प्रकार वसूली योग्य होगी मानो वह भू-राजस्व की बकाया हो।

(घ) यदि निचले न्यायालय में संदत्त की गई फीस अधिक है, न्यायालय उस पक्षकार को जो उसका हकदार है, आधिक्य के प्रतिदाय का निदेश देगा।

(5) प्रतिवादी के लिखित कथन से उद्भूत होने वाले न्यायालयों की अधिकारिता के अवधारण के प्रयोजन के लिए मूल्य-विषयक समस्त प्रश्नों पर सुनवाई और विनिश्चय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का केंद्रीय अधिनियम 5) की प्रथम अनुसूची के आदेश 18 द्वारा अनुध्यात वाद की सुनवाई से पूर्व किया जाएगा।

स्पष्टीकरण -

इस धारा में अभिव्यक्ति 'दावा के गुणागुण ऐसे विषयों के प्रति निदेश करती है जो वाद के अवधारण के लिए उद्‌भूत होते हैं और जो वाद की विरचना, पक्षकारों और वाद-हेतुकों के कुसंयोजन, न्यायालय की वाद ग्रहण करने या विचारण करने की अधिकारिता या संदेय फीस संबंधी विषय नहीं है कितु जिनके अंतर्गत पूर्व न्याय, परिसीमा और ऐसे ही अभिवचनों से उद्भूत विषय आते हैं।

धारा 12. विरचित किए गए विवाद्यकों पर अतिरिक्त फीस -

जहाँ कोई पक्षकार वाद में विरचित किए गए किसी विवाद्यक के कारण अतिरिक्त फीस के संदाय का दायी हो जाता है, अंतिम पूर्वगामी धारा के उपबंध ऐसी अतिरिक्त फीस के अवधारण और उदग्रहण पर ऐसे उपांतरण के अध्यधीन कि जहीं दायी पक्षकार अनुज्ञात समय के भीतर ऐसी अतिरिक्त फीस का संदाय न करे तो न्यायालय उस विवादयक को काट देगा और मामले में अन्य विवादयकों की सुनवाई और विनिश्चय करने को अग्रसर होगा, लागू होंगे।

धारा 13 दावा के भाग का त्यजन -

कोई वादी जिससे अतिरिक्त फीस के संदाय की अपेक्षा की गई है अपने दावा के किसी भाग त्याग सकता है और वादपत्र को संशोधित कराने के लिए आवेदन कर सकता है ताकि संदत्त फीस यथा संशोधित वादपत्र में किए गए दावा के लिए यथोचित हो जाए। न्यायालय ऐसे आवेदन को, ऐसे निबंधनों पर जो वह न्यायसंगत समझे, अनुज्ञात करेगा और यथासंशोधित वादपत्र में किए गए दावा की सुनवाई और विनिश्चय करने के लिए अग्रसर होगा:

परंतु वादी को वाद के किसी पश्चात्वर्ती प्रक्रम में इस प्रकार त्याग किए गए भाग को दावा जोड़ने के लिए अनुज्ञात नहीं किया जाएगा।

घारा 14. लिखित कथनों पर संदेय फीस -

जहाँ प्रतिवादी के द्वारा फाइल किए गए लिखित कथन पर इस अधिनियम के अधीन फीस संदेय हैं ऐसे लिखित कथन पर संदेय फीस के अवधारण और उद्‌ग्रहण पर, संबंध प्रतिवादी को उक्त प्रयोजन के लिए वादी और वादी या सह-प्रतिवादी पक्षकार को जिसके विरुद्ध दावा किया जाए, प्रतिवादी के रूप में मानते हुए, धारा 11 के उपबंध लागू होंगे।

धारा 15. अपीलों इत्यादि पर संदेय फीस-

वादों में वादपत्रों पर फीस के अवधारण और उ‌ग्रहण संबंधी धारा 10 से 13 के उपबंध, यथावश्यक परिवर्तन सहित द्वितीय अपील में या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन राजस्थान के उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश के निर्णय की अपील में अन्य कार्यवाही के बारे में अपील के ज्ञापन, प्रत्याक्षेप या फीस के अवधारण और उग्रहण पर लागू होंगे।

धारा 16. अर्जियों, आवेदनों, इत्यादि पर संदेय फीस -

धारा 10 से 13 के उपबंध, यथावश्यक परिवर्तन सहित न्यायालयों में अर्जियों, आवेदनों और अन्य कार्यवाहियों के बारे में फीस के अवधारण और उद्‌ग्रहण पर उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे वादों में वादपत्रों पर फीस के अवधारण और उद्‌ग्रहण पर लागू होते हैं।

धारा 17. न्यायालय फीस परीक्षक-

(1) उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों के अभिलेखों का, ऐसे न्यायालयों में कार्यवाहियों के बारे में विषय वस्तु के मूल्यांकन और फीस की पर्याप्तता सबंधी प्रश्नों पर किए गए अभ्यावेदनों और न्यायालयों द्वारा पारित आदेशों की शुद्धता की परीक्षा करने की दृष्टि से निरीक्षण करने के लिए अधिकरियों, जो न्यायालय फीस परीक्षक पदाभिहित होंगे को प्रतिनियुक्त कर सकता है।

(2) ऐसे न्यायालय फीस परीक्षकों द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्टो में उठाए गए और किसी न्यायालय में लंबित वाद, अपील या अन्य कार्यवाही संबंधी प्रश्नों की सुनवाई और विनिश्चयः ऐसे न्यायालयों द्वारा किया जाएगा, और शंकाओ के परिवर्जन के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि ऐसी किसी रिपोर्ट में उठाए गए प्रश्न की सुनवाई और विनिश्चय करने में, न्यायालय के लिए उसी प्रश्न पर न्यायालय द्वारा दिए गए पूर्वत्तर विनिश्चय का पुनर्विलोकन किया जाना विधिपूर्ण होगा।

घारा 18. जाँच और कमीशन-

यह विनिश्चत करने के प्रयोजन से कि आय किसी वाद या अन्य कार्यवाही की विषय वस्तु का मूल्यांकन किया गया है या आया संदत्त फीस पर्याप्त है न्यायालय ऐसी जाँच कर सकता है जो वह उचित समझे और यदि वह ठीक समझे, किसी उचित व्यक्ति को, उसे ऐसा स्थानीय या अन्य अन्वेषण, जैसा कि आवश्यक हो करने और उस पर न्यायालय को रिपोर्ट करने का निदेश देते हुए कमीशन जारी कर सकता है। ऐसी रिपोर्ट और ऐसे व्यक्ति द्वारा अभिलिखित किया गया साक्ष्य ऐसी जाँच में साक्ष्य होंगे।

धारा 19. राज्य सरकार को सूचना -

किसी वादपत्र, लिखित कथन, अर्जी अपील के ज्ञापन या अन्य दस्तावेज पर संदेय फीस, या दावा की विषय वस्तु जिससे कि वादपत्र, लिखित कथन, अर्ज़ी, अपील का ज्ञापन या अन्य दस्तावेज संबंधित है, के मूल्यांकन संबंधी किसी भी जाँच में, जहाँ तक ऐसा मूल्यांकन संदेय फीस को प्रभावित करता है, यदि वह ऐसा करना न्यायसंगत या आवश्यक समझे, राज्य सरकार को सूचना दे सकता है, और जहाँ ऐसी सूचना दी जाती है, राज्य सरकार उस वाद या अन्य कार्यवाही में, जहाँ तक यथापूर्वोक्त प्रश्न या प्रश्नों के अवधारण का संबंध है, पक्षकार समझी जाएगी और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों पर न्यायालय का विनिश्चिय, जब वह ऐसे वाद या कार्यवाही में, कोई डिक्री या अंतिम आदेश पारित करता है, ऐसी डिक्री या अंतिम आदेश का भाग समझा जाएगा।

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