धारा 48 से 49 अध्याय 5 राजस्थान न्यायालय फीस एवं वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961

धारा 48 से 49 अध्याय 5 राजस्थान न्यायालय फीस एवं वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1961

अध्याय 5

वादों का मूल्यांकन

धारा 48. वाद जिनके बारे में अन्यथा उपबंधित नहीं है-

(1) ऐसे किसी वाद में, जिसके न्यायालयों की अधिकारिता के अवधारण के प्रयोजन के लिए, मूल्य के बारे में इस अधिनियम में या किसी अन्य विधि में अन्यथा विनिर्दिष्ट उपबंध नहीं किया गया है, उस प्रयोजन के लिए मूल्य और इस अधिनियम के अधीन फीस की संगणना के प्रयोजन के लिए मूल्य वही होगा।

(2) किसी वाद में जहाँ इस अधिनियम के अधीन फीस नियत दर पर संदेय है, न्यायालयों की अधिकारिता के अवधारण के प्रयोजन के लिए मूल्य बाजारी मूल्य या जहाँ उसका धन मूल्य पर प्राक्कलन करना संभव नहीं है, ऐसी रकम जो वादी अपने वादपत्र में कथित करेगा, होगा।

धारा 49. प्रक्रिया जहाँ अपील या पुनरीक्षण में आक्षेप लिया जाए कि अधिकारिता के  प्रयोजनों, के लिए वाद या अपील को समुचित रूप से मूल्यांकित नहीं किया गया -

(1) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 केंद्रीय अधिनियम 5) की धारा 99 में कुछ अंतर्विष्ट होते हुए भी, यह आक्षेप कि वाद या अपील के अति-मूल्यांकन या न्यून मूल्यांकन के कारण प्रथम बार के न्यायालय ने या निचले अपील न्यायालय ने, जिसे वाद या अपील बाबत अधिकारिता नहीं थी, उसकी बाबत अधिकारिता का प्रयोग किया है, अपील न्यायालय द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा, सिवाय उसके जबकि

(क) आक्षेप प्रथम बार के न्यायालय में सुनवाई, जिस पर प्रथम बार विवाद्यक विरचित या अभिलिखित किए गए, पर या उससे पूर्व, या निचले अपील न्यायालय में उस न्यायालय को की गई अपील के ज्ञापन में लिया गया था: या

(ख) अपील न्यायालय का, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से समाधान हो जाता है कि वाद या अपील को अति-मूल्यांकित या न्यून-मूल्यांकित किया गया था और कि उसके अति-मूल्यांकन या न्यून मूल्यांकन का वाद या अपील के गुणागुण पर निपटने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

(2) यदि आक्षेप उप-धारा (1) के खंड (क) में उल्लिखित रीति से लिया गया था, किंतु अपील न्यायालय का उस उप-धारा के खंड (ख) में उल्लिखित दोनों बातों के बारे में समाधान नहीं हुआ है और उसके समक्ष उसको स्वयं को की गई अपील के अन्य आधारों के अवधारण के लिए आवश्यक सामग्री है, वह अपील का निपटारा कर देगा जैसे कि प्रथम बार के न्यायालय या निचले अपील न्यायालय में अधिकारिता की कोई त्रुटि नहीं थी।

(3) यदि आक्षेप उस रीति से लिया गया था और यदि अपील न्यायालय का उन दोनों बातों के बारे में समाधान हो जाता है, और उसके समक्ष वह सामग्री नहीं है, वह अपीलों की सुनवाई के बारे में न्यायालय पर लागू होने वाले नियमों के अधीन अपील का निपटारा करने के लिए अग्रसर होगा किंतु यदि वह वाद या अपील को प्रतिप्रेषित करता है, या विवाद्रद्यक विरचित करता है और विचारण के लिए निर्देशित करता है या अतिरिक्त साक्ष्य अभिलिखित किए जाने की अपेक्षा करता है वह उसके आदेश को वाद या अपील को ग्रहण करने के लिए सक्षम न्यायालय को निदिष्ट करेगा।

(4) अपील न्यायालय की बाबत इस धारा के उपबंध, जहाँ तक कि उन्हें लागू किया जा सके, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1008 (1908 का केंद्रीय अधिनियम 5) की धारा 115, या तत्समय प्रवृत्त अन्य अधिनियमिति के अधीन पुनरीक्षण अधिकारिता का प्रयोग करने वाले न्यायालय पर लागू होंगे।

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