
माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण के लिए, जो संविधान के अधीन प्रत्याभूत और मान्य है और उससे सम्बन्धित या उससे आनुषंगिक मामलों के लिए अधिक प्रभावो प्रावधानों के लिए उपबन्ध करने के लिए अधिनियम
भारत के गणतंत्र के अठावनवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो-
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण तथा कल्याण विधेयक, 2007 लोक सभा में 20 मार्च, 2007 को पुरःस्थापित किया गया था और माननीय अध्यक्ष द्वारा परीक्षण और रिपोर्ट के लिए 27 अप्रैल, 2007 को सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण स्थायी समिति को सौंपा गया था। विधेयक का उद्देश्य संविधान के अधीन प्रत्याभूत और मान्य माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण के और कल्याण के लिए तथा उससे सम्बन्धित और उससे आनुषंगिक मामलों के लिए प्रभावी प्रावधान करने के लिए था। विधेयक का अत्यधिक महत्वपूर्ण प्रावधान माता-पिता का उनके परिवार द्वारा भरण-पोषण को विधिक अधिकार के रूप में बनाना था।
विधेयक-
(क) माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों को आवश्यकता आधारित भरण-पोषण प्रदान करने के लिए स्थापित किये जाने वाले समुचित तंत्र,
(ख) वरिष्ठ नागरिकों को बेहतर चिकित्सीय सुविधा प्रदान करने,
(ग) वृद्धों के जीवन और सम्पत्ति के संरक्षण के लिए उपयुक्त तंत्र के संस्थानीकरण, और
(घ) प्रत्येक जिले में वृद्धावस्था गृहों को स्थापित करने के लिए
प्रावधान करने की प्रस्थापना किया था।
भारत में वृद्धों की जनसंख्या में लगातार वृद्धि हुई है, जैसा कि इस तथ्य से स्पष्ट है कि 1951 में 60 वर्ष से अधिक वृद्ध व्यक्तियों की संख्या केवल 2 करोड़ थी, जिसमें 1991 में 5.7 करोड़ और 2001 में 7.6 करोड़ की वृद्धि हुई थी। पोषण और औषधि तथा इलाज ग्रहण करने में सुधार - जीवन प्रत्याशा में प्रशंसनीय वृद्धि किया है। जीवन प्रत्याशा, जो 1947 में लगभग 29 वर्ष थी, में कई गुना वृद्धि हुई है और यह अब लगभग 63 वर्ष नज़दीक है। अध्ययन निर्दिष्ट करता है कि भारत में 60 वर्ष से अधिक की सख्या में 2013 में 10 करोड़ और 2030 में लगभग दो गुना या 19.8 करोड़ तक की वृद्धि होगी। भारतीय समाज का परम्परागत नियम और मूल्य वृद्धों के प्रति सम्मान दर्शित करने और देखरेख करने पर बल देता है। परिवार के वृद्ध सदस्यों की सामान्तया देखरेख स्वयं परिवार द्वारा की जाती है। लेकिन, आधुनिक समय में समाज संयुक्त पारिवारिक प्रणाली के धीरे-धीरे किन्तु निश्चित विखण्डन को देख रहा है, जिसके परिणामस्वरूप माता-पिता की अधिकतर संख्या का भरण-पोषण उनकी सन्तानों द्वारा नहीं किया जा रहा है, जैसा कि सामान्य सामाजिक प्रथा की। परिणामस्वरूप वृद्ध अब भावनात्मक उपेक्षा और शारीरिक तथा वित्तीय समर्थन के अभाव में छोड़े जाते हैं। वे पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा के अभाव में अत्यधिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। माता-पिता अपनी अस्थिर वित्तीय स्त्रोत और कमजोर स्वास्थ्य के साथ परिवार में रहते समय भार के रूप में देखे जा रहे हैं। कई वृद्ध व्यक्ति अब अपनी पत्नियों के साथ और सन्तान के बिना रह रहे हैं, जबकि कई व्यक्ति विशेष रूप से विधवाएं अकेले अपने अन्धकारमय समय को व्यतीत करने के लिए बाध्य की जाती है। यह स्पष्ट रूप से प्रकट करता है कि वृद्धावस्था मुख्य सामाजिक चुनौती हो गयी है और वित्तीय समर्थन, सावधानी और इलाज की अपेक्षा वृद्ध व्यक्तियों के लिए की जाती है। दुर्भाग्य से समय आ गया है, जब सन्तानों का उनके माता-पिता की उनकी वृद्धावस्था में देखरेख करने की नैतिक आबद्धता को विधिक आबद्धता द्वारा समर्थित किया जाना है। यह स्थापित तथ्य है कि परिवार वरिष्ठ नागरिकों/माता-पिता के लिए सुरक्षा, देखरेख और गरिमा का जीवन व्यतीत करने के लिए अत्यधिक वांछित पर्यावरण है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए और यह सुनिश्चित करने के लिए सन्तान अपने माता-पिता के प्रति अपनी नैतिक आबद्धता का निर्वहन करते हैं, प्रस्तावित विधायन वृद्ध व्यक्तियों के लिए उनकी सन्तानों से आवश्यकता आधारित भरण-पोषण दावा करने के लिए समर्थकारी तंत्र विकसित करना आवश्यक है।
यद्यपि माता-पिता के भरण-पोषण के लिए दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 धारा 144 के अधीन पहले से विद्यमान है, फिर भी न्यायालय में जाने की प्रक्रिया अत्यधिक व्ययशील होने के अतिरिक्त समय लेने वाली और जटिल दोनों हैं। अतः विधायन को लाने की आवश्यकता है, जो भरण-पोषण के लिए दावा को सरल तीव्र और अव्ययशील बनाये।
द० प्र० सं० की धारा 125/ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 धारा 144 और वर्तमान अधिनियम के बीच कार्यवाही में अन्तर
द० प्र० सं० की धारा 125/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 धारा 144 में केवल मजिस्ट्रेट भरण-पोषण के लिए दावा का आदेश दे सकता है, जबकि वर्तमान विधायन के अधीन, उपखण्डीय मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में अधिकरण मामले का विनिश्चय करेगा। द० प्र० सं०/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अधीन कार्यवाही समय ग्रहण करने वाली है, जबकि उसका निस्तारण प्रस्तावित अधिकरण द्वारा 90 दिनों के समयबद्ध ढंग में किया जायेगा। द० प्र० सं०/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अधीन भरण-पोषण का दावा करने के लिए अधिवक्ता कार्यवाही में भागीदारी करते हैं और इसलिए यह उस व्यक्ति के लिए महंगा है, जो अपने मामले का वित्तपोषण करने की स्थिति में नहीं है, जबकि वर्तमान विधायन के मामले में, अधिवक्ता की भागीदारी अधिकरण की कार्यवाही से वर्जित है। इसके अतिरिक्त, विधायन का मुख्य बल सुलह अधिकारी को मामला निर्दिष्ट करके मैत्रीपूर्ण ढंग से माता-पिता और सन्तानों के बीच विवाद और मतभेद का समाधान करना है। केवल इन प्रयासों की असफलता के मामले में अधिकरण कार्यवाही करेगा। द० प्र० सं०/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन कोई ऐसा प्रावधान नहीं है। द० प्र० सं०/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 में माता-पिता की निर्बन्धात्मक परिभाषा के असमान, माता-पिता और सन्तानों की व्यापक परिभाषा वर्तमान विधायन में दादा-दादी, पौत्र-पौत्री, दत्तक पुत्र और सम्बन्धी/किसी व्यक्ति को आच्छादित करने के लिए शामिल किया गया है, जो वरिष्ठ नागरिक की सम्पत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करते हैं। द० प्र० सं०/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अधीन केवल प्रभावित माता-पिता के भरण-पोषण के लिए मामला दाखिल कर सकते हैं। वर्तमान विधायन के अधीन, माता-पिता के अतिरिक्त, माता-पिता द्वारा प्राधिकृत प्रतिनिधि/ गैर सरकारी संगठन भरण-पोषण का दावा करने के लिए आवेदन दाखिल कर सकते हैं। अधिकरण स्वप्रेरणा से संज्ञान ले सकता है और मामले की कार्यवाही प्रारम्भ कर सकता है।
द० प्र० सं०/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के अधीन भरण-पोषण की अपील के सभी सामान्य अनुक्रम से गुजरना है, जैसा कि विधि के अधीन विहित है। लेकिन, वर्तमान विधायन में केवल एक अपील अपीलीय प्राधिकारी अर्थात् जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष अनुज्ञात की जाती है। अपील का निस्तारण भी समयबद्ध है। वर्तमान विधायन में सन्तानों के लिए उस अवधि के कारावास का दाण्डिक प्रावधान भी अन्तर्विष्ट है, जिसका विस्तार उनके माता-पिता की उपेक्षा और परित्याग के लिए तीन मास की अवधि तक हो सकता है। इस प्रकार इन सभी से यह स्पष्ट है कि वर्तमान विधायन समयबद्ध ढंग में और व्यय प्रभावी ढंग में भरण-पोषण का दावा करने के लिए तंत्र का प्रावधान करता है और इस प्रकार द० प्र० सं० की धारा 125/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 धारा 144 पर लाभप्रद है। पुनः विधायन में वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण जैसे स्वास्थ्य, सुरक्षा, आश्रय, जीवन और सम्पत्ति के संरक्षण का प्रावधान करने के रूप में व्यापक प्रावधान अन्तर्विष्ट है। इसके अतिरिक्त वर्तमान विधायन में ऐसा प्रावधान भी अन्तर्विष्ट है, जो माता-पिता की, जो अपनी सन्तानों या किसी व्यक्ति को अपनी सम्पत्ति का अन्तरण उनको भरण-पोषण प्रदान करने की शर्त पर अन्तरित करते हैं, उसकी असफलता पर ऐसे अन्तरण का प्रतिसंहरण करने के लिए समर्थ बनाता है।
यह मान्यता देते हुए कि परिवार वरिष्ठ नागरिक/माता-पिता को सुरक्षा, देख-रेख और गरिमा का जीवन व्यतीत करने के लिए अत्यधिक वांछित पर्यावरण है और यह सुनिश्चित करने के लिए, कि सन्तान अपने माता-पिता के प्रति अपनी नैतिक आबद्धता का पालन करते हैं, जो अपने वृद्धावस्था में बिना देखरेख के और निराश्रय छोड़े जाते हैं। वर्तमान विधायन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करता है कि वृद्धों का उनके परिवार द्वारा भरण-पोषण माता-पिता के लिए अधिकार का मामला होगा। वर्तमान विधायन वृद्धों के लिए उनकी सन्तानों से आवश्यकता आधारित भरण-पोषण का दावा करने के लिए समर्थकारी तंत्र सृजित करने का उद्देश्य धारण करता है। हिमांचल प्रदेश राज्य ने पहले ही ऐसा विधायन अधिनियमित किया है, जिसे "हिमांचल प्रदेश माता-पिता और आश्रित भरण-पोषण अधिनियम, 2001" कहा जाता है। पारम्परिक वंशज द्वारा वैध रूप से भरण-पोषण प्रदान करने के पश्चात् भी वृद्धावस्था गृह की आवश्यकता अकिंचन वृद्ध व्यक्तियों की देखरेख और संरक्षण के लिए विद्यमान है। यह इस कारण है कि कुछ वृद्ध व्यक्ति किसी पारिवारिक समर्थन के बिना हो सकते हैं या उनकी सन्तान विदेश में निवास कर सकती है या वे किसी कारण से अपनी सन्तानों के साथ मैत्रीपूर्ण ढंग से रहने में असमर्थ हो सकते हैं, इसलिए वर्तमान विधायन राज्य सरकारों द्वारा चरणबद्ध ढंग में प्रत्येक जिले में न्यूनतम 150 अकिंचन लाभार्थियों के ऐसे गृहों में समायोजित करने के लिए कम से कम एक (या एक से अधिक) के साथ प्रारम्भ करके वृद्धावस्था गृहों को स्थापित करने के लिए प्रावधान करता है।
भारतीय समाज का परम्परागत नियम और मूल्य वृद्धों के लिए देखरेख प्रदान करने पर बल दिया था। लेकिन, संयुक्त परिवार प्रणाली में विखण्डन के कारण वृद्धों की व्यापक संख्या का उनके परिवार द्वारा पालन नहीं किया जा रहा है। परिणामस्वरूप कई वृद्ध व्यक्ति विशिष्ट रूप से विधवाएँ अपने अन्तिम समय को अकेले व्यतीत करने के लिए बाध्य की जा रही हैं, और भावनात्मक उपेक्षा और शारीरिक तथा वित्तीय समर्थन के अभाव में रखी जाती हैं। यह स्पष्ट रूप से प्रकट करता है कि वृद्धावस्था प्रमुख सामाजिक परिवर्तन हो गया है और वृद्ध व्यक्तियों के लिए देखरेख और संरक्षण पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। यद्यपि माता-पिता दण्ड़ प्रक्रिया संहिता, 1973/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 धारा 144 के अधीन भरण-पोषण की दावा कर सकते हैं, फिर भी प्रक्रिया समय ग्रहण करने वाली तथा व्ययशील दोनों है। इसलिए साधारण अव्ययशील और त्वरित प्रावधानों की माता-पिता के लिए भरण-पोषण का दावा करने के लिए आवश्यक है।
2. विधेयक सभी व्यक्तियों पर, जो अपने वृद्ध सम्बन्धी की सम्पत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करते हैं, ऐसे वृद्ध सम्बन्धियों का भरण-पोषण करने की आबद्धता अधिरोपित करता है और अकिचन वृद्धों को भरण पोषण प्रदान करने के लिए वृद्धावस्था गृहों की स्थापना करने के लिए प्रावधान करने की प्रस्थापना करता है।
विधेयक अग्रिम वरिष्ठ नागरिकों को बेहतर चिकित्सीय सुविधा प्रदान करने और उनके जीवन एवं सम्पत्ति के संरक्षण के लिए प्रावधान करने की प्रस्थापना करता है।
3. इसलिए विधेयक-
(क) माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों को आवश्यकता आधारित भरण-पोषण प्रदान करने के लिए समुचित तंत्र को स्थापित किये जाने,
(ख) वरिष्ठ नागरिकों को बेहतर चिकित्सीय सुविधा प्रदान करने
(ग) वृद्धों की सम्पत्ति और जीवन के संरक्षण के लिए उपयुक्त तंत्र के संस्थितिकरण के लिए, और,
(घ) प्रत्येक जिले में वृद्धावस्था गृहों की स्थापना करने के लिए प्रावधान करने की प्रस्थापना करता है।
4. विधेयक उक्त उद्देश्यों की प्राप्ति करने की ईप्सा करता है।
(1) इस अधिनियम को माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 कहा जाएगा।
(2) इसका विस्तार 2[***] सम्पूर्ण भारत पर है और यह भारत के बाहर भारत के नागरिकों को भी लागू होगा। (2. 2019 के अधिनियम सं० 34 की धारा 95 और पांचवी अनुसूची द्वारा शब्द "जम्मू और कश्मीर राज्य को छोड़कर" (31 10.2019 से) लोपित।)
(3) यह राज्य में ऐसी तारीख3 को प्रवृत्त होगा, जैसा कि राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे। (3. माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण भोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 का कार्यान्वयन)
इस अधिनियम में, जब तक सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) "सन्तान" में पुत्र, पुत्री, पौत्र और पौत्री सम्मिलित है किन्तु अवयस्क सम्मिलित नहीं है,
(ख) "भरणपोषण" में भोजन, कपड़े, निवास और चिकित्सीय परिचर्या और इलाज के लिए व्यवस्था सम्मिलित है,
(ग) "अवयस्क" का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है, जिसे वयस्कता अधिनियम, 1875 (1875 का 9) के प्रावधानों के अधीन वयस्कता की आयु प्राप्त न करने वाला माना जाता है,
(घ) "माता-पिता" का तात्पर्य ऐसे माता या पिता से है, चाहे जैविक, दत्तकग्राही या सौतेला पिता या सौतेली माता, यथास्थिति, हों, चाहे पिता या माता वरिष्ठ नागरिक हैं या नहीं,
(ङ) 'विहित" का तात्पर्य इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा निर्मित नियमावली द्वारा विहित से है,
(च) "सम्पत्ति" का तात्पर्य किसी प्रकार की सम्पत्ति से है, चाहे जंगम हो या स्थावर, पैतृक हो या स्वअर्जित, मूर्त हो या अमूर्त और उसमें ऐसी सम्पत्ति में अधिकार और हित सम्मिलित है,
(छ) "सम्बन्धी" का तात्पर्य सन्तानहीन वरिष्ठ नागरिक का कोई विधिक उत्तराधिकारी से है, जो अवयस्क नहीं है और उसकी मृत्यु के को उत्तराधिकार में प्राप्त करेगा, के पश्चात उसकी सम्पत्ति के व्यवसाय में है या को उत्तराधिकार में प्राप्त करेगा,
(ज) "वरिष्ठ नागरिक" का तात्पर्य किसी ऐसे व्यक्ति से है, जो भारत का नागरिक है और जिसने साठ वर्ष या अधिक की आयु प्राप्त कर लिया है,
(झ) संघ राज्य क्षेत्र के सम्बन्ध में "राज्य सरकार" का तात्पर्य संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त किये गये उसके प्रशासक से है,
(ञ) "अधिकरण" का तात्पर्य धारा 7 के अधीन गठित भरण-पोषण अधिकरण से है,
(ट) "कल्याण" का तात्पर्य भोजन, स्वास्थ्य देखरेख, मनोरंजन केन्द्र और वरिष्ठ नागरिकों के लिए आवश्यक अन्य सुविधाओं के लिए व्यवस्था से है।
इस अधिनियम के प्रावधानों का इस अधिनियम के अतिरिक्त किसी अन्य अधिनियमिति में या इस अधिनियम के अतिरिक्त किसी अन्य अधिनियमिति के परिणामस्वरूप प्रभाव धारण करने वाले किसी लिखत में अन्तर्विष्ट उससे असंगत किसी चीज के होते हुए भी प्रभाव होगा।