धारा 55 से 61 अध्याय 6 माल-विक्रय अधिनियम, 1930

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 6

संविदा भंग के लिए वाद

55. कीमत के लिए बाद

(1) जहाँ कि विक्रय को संविदा के अधीन माल में की संपत्ति क्रेता को संक्रान्त हो गई है और क्रेता संविदा के निबंधनों के अनुसार, उस माल का संदाय करने की उपेक्षा या करने से सदोष इन्कार करता है, वहाँ विक्रेता माल की कीमत के लिए उसके विरुद्ध बाद ला सकेगा।

(2) जहाँ कि विक्रय की संविदा के अधीन कीमत, इस बात को दृष्टि में लाये बिना कि परिदान हुआ है या नहीं, किसी निश्चित दिन को देय हो और क्रेता ऐसी कीमत का संदाय करने की उपेक्षा या करने से इन्कार सदोष करता है, वहाँ विक्रेता कीमत के लिए उसके विरुद्ध वाद ला सकेगा। यद्यपि माल में को सम्पत्ति संक्रान्त न हुई हो और वह माल संविदा मद्धे विनियोजित न किया गया हो।

56. अप्रतिग्रहण के लिए नुकसानी-

जहाँ कि क्रेता माल का प्रतिग्रहण और उसके लिए संदाय करने की उपेक्षा या करने से इन्कार सदोष करता है, वहाँ विक्रेता अप्रतिग्रहण के लिए नुकसानी का वाद उसके विरुद्ध ला सकेगा।

57. अपरिदान के लिए नुकसानी-

जहाँ विक्रेता माल का परिदान क्रेता को करने की उपेक्षा या करने से इन्कार सदोष करता है, वहाँ क्रेता अपरिदान के लिए नुकसानी का वाद विक्रेता के विरुद्ध ला सकेगा।

58. विनिर्दिष्ट पालन-

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1877 (1877 का 1) के अध्याय 2 के उपबंधों के अध्यधीन यह है कि विनिर्दिष्ट या अभिनिश्चित माल के परिदान को संविदा के भंग के किसी बाद में न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, आवेदन पर अपनी डिक्री द्वारा प्रतिवादी को, यह विकल्प दिये बिना कि वह नुकसानी देकर माल को प्रतिधारित रखे, यह निदेश दे सकेगा कि संविदा का पालन विनिर्दिष्टतः किया जाये। डिक्री अशर्त हो सकेगी अथवा नुकसानी या कीमत के संदाय विषयक या अन्यथा ऐसे निबंधनों और शर्तों सहित हो सकेगी, जिन्हें न्यायालय न्यायसंगत समझे और बादी द्वारा आवेदन डिक्री से पूर्व किसी समय भी किया जा सकेगा।

59. वारण्टी के भंग का उपचार

(1) जहाँ कि वारण्टी का भंग विक्रेता द्वारा किया जाता है या जहाँ कि क्रेता यह निर्वाचन करता है या ऐसा मानने के लिए विवश हो जाता है कि विक्रेता पक्ष से जो शर्त का भंग हुआ, वह वारण्टी का भंग है, वहाँ क्रेता वारण्टी के भंग के कारण ही उस माल को प्रतिक्षेपित करने का हकदार नहीं हो जाता। किन्तु यह-

(क) वारण्टी के भंग की कीमत कम या निर्वापित कराने में विक्रेता के विरुद्ध रख सकेगा; अथवा

(ख) वारण्टी के भंग के लिए विक्रेता के विरुद्ध नुकसानी का वाद ला सकेगा।

(2) यह तथ्य विक्रेता ने वारण्टी के भंग की कीमत कम या निर्वापित कराने में रखा है, वारण्टी के उसी भंग के लिए बाद लाने से उसे निवारित नहीं करता, यदि उसे अतिरिक्त नुकसान उठाना पड़ा हो।

60. सम्यक् तारीख से पूर्व संविदा का निराकरण-

जहाँ कि विक्रय संविदा के पक्षकारों में से कोई सा भी पक्षकार परिदान की तारीख से पूर्व उस संविदा का निराकरण कर देता है, वहाँ दूसरा पक्षकार या तो यह मान सकेगा कि संविदा अस्तित्व में बनी हुई है और परिदान की तारीख तक प्रतीक्षा कर सकेगा या संविदा को विखण्डित मान सकेगा और उस भंग के लिए वाद ला सकेगा।

61. नुकसानी के तौर पर ब्याज और विशेष नुकसानी

(1) उस दशा में, जिसमें ब्याज या विशेष नुकसानी विधि द्वारा वसूलीय हो, ब्याज या विशेष नुकसानी की अथवा जहाँ कि धन के संदाय का, जो प्रतिफल था, वह निष्फल हो गया है, दिये हुए धन को, वसूली करने के विक्रेता या क्रेता के अधिकार पर इस अधिनियम की कोई भी बात प्रभाव न डालेगी।

(2) तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में न्यायालय कीमत की रकम पर ऐसी दर से जिसे वह ठीक समझेः व्याज-

(क) विक्रेता को उस वाद में, जो उसने कीमत के लिए किया है, माल की निविदा की तारीख से या उस तारीख से, जिस तारीख को कीमत संदेय थी, अधिनिर्णीत कर सकेगा;

(ख) क्रेता को उस बाद में, जो उसने विक्रेता की तरफ से संविदा-भंग की दशा में कीमत के प्रतिदान के लिए किया है, उस तारीख से अधिनिर्णीत कर सकेगा, जिस तारीख को कीमत का संदाय किया गया था।

 

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