धारा 31 से 44 अध्याय 4 माल-विक्रय अधिनियम, 1930

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 4

संविदा का पालन

31. विक्रेता और क्रेता के कर्तव्य-

विक्रेता का कर्त्तव्य है कि माल का परिदान और क्रेता का कर्तव्य है कि उसका प्रतिग्रहण और उसके लिए संदाय विक्रय को संविदा के निबंधनों के अनुसार करे।

32. संदाय और परिदान समवर्ती शर्तें हैं-

जब तक कि अन्यथा करार न हुआ हो, माल का परिदान और कीमत का संदाय समवर्ती शर्तें हैं अर्थात् विक्रेता कीमत के विनिमय में माल का कब्जा क्रेता को देने की तैयार और रजामन्द होगा और क्रेता माल के कब्जे के विनिमय में कीमत देने को तैयार और रजामन्द होगा।

33. परिदान-

विक्रीत माल का परिदान ऐसा कोई काम करके किया जा सकेगा जिसके बारे में पक्षकारों में करार हो कि वह परिदान माना जायेगा या जो माल पर क्रेता का या उसकी ओर से धारित करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति का कब्जा करा देने का प्रभाव रखता हो।

34. भागिक परिदान का प्रभाव

सम्पूर्ण माल का परिदान चालू रहने के दौरान में माल के भाग का परिदान ऐसे माल में की सम्पत्ति के संक्रमण के प्रयोजन के लिए वहीं प्रभाव रखता है जो सम्पूर्ण का परिदान, किन्तु माल के भाग का ऐसा परिदान, जो उसे सम्पूर्ण से पृथक् करने के आशय से किया जाये शेष के परिदान के रूप में प्रवृत्त नहीं होता।

35. परिदान के लिए क्रेता आवेदन करे-

कोई अभिव्यक्त संविदा न हो तो, जब तक क्रेता परिदान के लिए आवेदन न करे, माल का विक्रेता, उसका परिदान करने के लिए आबद्ध नहीं है।

36. परिदान विषयक नियम

(1) यह बात कि माल का कब्जा क्रेता को लेना है या माल क्रेता को विक्रेता द्वारा भेजा जाना है, हर मामले में पक्षकारों के बीच अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा पर अवलम्बित है। कोई ऐसी संविदा न हो तो विक्रीत माल का परिदान उस स्थान पर, जिसमें वह विक्रय के समय हो और विक्रय करने के लिए करारित माल का परिदान उस स्थान पर, जिसमें वह विक्रय करने के करार के समय हो या माल तब अस्तित्व में न हो तो उस स्थान पर, जिसमें वह विनिर्मित या उत्पादित किया जाता है, किया जायेगा।

(2) जहाँ कि विक्रय की संविदा के अधीन क्रेता को माल भेजने के लिए विक्रेता आबद्ध हो, किन्तु उसे भेजने के लिए कोई समय नियत न हो, वहाँ विक्रेता उसे युक्तियुक्त समय के अन्दर भेजने के लिए आबद्ध है।

(3) जहाँ कि माल विक्रय के समय किसी पर व्यक्ति के कब्जे में हो, वहाँ क्रेता को विक्रेता द्वारा परिदान नहीं होता, यदि और जब तक ऐसा पर व्यक्ति क्रेता से यह अभिस्वीकार न कर ले कि वह माल को उसकी ओर से धारित किये हुए :

परन्तु इस धारा की कोई भी बात माल पर हक की किसी दस्तावेज के प्रदान या अन्तरण के प्रवर्तन पर प्रभाव न डालेगी।

(4) परिदान की मांग या निविदा, जब तक कि वह युक्तियुक्त समय पर न की जाये, प्रभावहीन मानी जा सकेगी। मुक्तियुक्त समय क्या है, यह तथ्य का प्रश्न है।

(5) जब तक कि अन्यथा करार न हो, माल को परिदेय स्थिति में लाने के और तदनुषंगिक व्यय विक्रेता द्वारा उठाये जायेंगे।

37. गलत परिमाण का परिदान

(1) जहाँ कि विक्रेता उस परिमाण से, जिसके विक्रय की संविदा उसने की थी, क्रम परिमाण के माल का परिदान क्रेता को करता है, वहाँ क्रेता उसे प्रतिक्षेपित कर सकेगा, किन्तु यदि क्रेता ऐसे परिदत्त माल को प्रतिगृहीत कर लेता है तो वह संविदा-दर से उसके लिए संदाय करेगा।

(2) जहाँ कि विक्रेता उस परिमाण से, जिसके विक्रय की संविदा उसने की थी, अधिक परिमाण के माल का परिदान क्रेता को करता है, वहाँ क्रेता उस माल को, जो संविदा के अन्तर्गत है, प्रतिगृहीत कर सकेगा और शेष को प्रतिक्षेपित कर सकेगा अथवा सम्पूर्ण को प्रतिक्षेपित कर सकेगा। यदि क्रेता ऐसे परिदत्त समस्त माल को प्रतिग्रहीत कर ले तो वह संविदा-दर से उसके लिए संदाय करेगा।

(3) जहाँ कि विक्रेता उस माल को, जिसके विक्रय की उसने संविदा की थी, उससे भिन्न वर्णन के ऐसे माल से, जो संविदा के अन्तर्गत नहीं है, मिश्रित करके परिदत्त करता है वहाँ क्रेता उस माल को प्रतिगृहीत कर सकेंगा जो संविदा के अनुसार है और शेष को प्रतिक्षेपित कर सकेगा, अथवा समस्त को प्रतिक्षेपित कर सकेगा।

(4) इस धारा के उपबंध व्यापार की प्रथा अथवा पक्षकारों के बीच के विशेष करार या व्यवहार-चर्या के अध्यधीन है |

38. किस्तों में परिदान

(1) जब तक कि अन्यथा करार न हो, माल का क्रेता उसका परिदान किस्तों में प्रतिगृहीत करने के लिए आबद्ध नहीं है।

(2) जहाँ कि संविदा ऐसे माल के विक्रय के लिए हो जिसका परिदान ऐसी कथित किस्तों में किया जाना है, जिसके लिए संदाय पृथक-पृथक् किया जाना है और विक्रेता एक या अधिक किस्तों की बाबत कोई परिदान नहीं करता है या त्रुटियुक्त परिदान करता है अथवा क्रेता एक या अधिक किस्तों का परिदान लेने में उपेक्षा या लेने से इन्कार या एक या अधिक किस्तों के लिए संदाय करने में उपेक्षा या संदाय करने से इन्कार करता है वहाँ यह प्रश्न हर एक मामले में संविदा के निबंधनों और मामले की परिस्थितियों पर अवलम्बित होगा कि संविदा का भंग सम्पूर्ण संविदा का निराकरण है या वह उसका ऐसा पृथक्करणीय भंग है, जिसमें प्रतिकर के लिए दावा तो उद्‌भूत होता है, किन्तु सम्पूर्ण संविदा को निराकृत मानने का अधिकार नहीं।

39. वाहक या घाटवाल को परिदान

(1) जहाँ कि विक्रय की संविदा के अनुसरण में विक्रेता को यह प्राधिकार है या उससे यह अपेक्षित है कि वह क्रेता को माल भेजे, वहाँ उस माल का, क्रेता के पास पारेषण करने के प्रयोजन से वाहक को परिदान, चाहे वाहक क्रेता द्वारा नामित हो या न हो, अथवा घाटवाल को सुरक्षित अभिरक्षा के लिए परिदान प्रथमदृष्ट्या उस माल का क्रेता को परिदान समझा जाता है।

(2) जब तक कि क्रेता द्वारा विक्रेता अन्यथा प्राधिकृत न हो, वह क्रेता की ओर से वाहक से या घाटवाल से ऐसी संविदा करेगा, जो माल की प्रकृति और मामले की अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए युक्तियुक्त हो। यदि विक्रेता ऐसा करने का लोप करता है और माल अभिवहन के अनुक्रम में, अथवा उस समय जब वह घाटवाल की अभिरक्षा में है, खो जाता है या नुकसानग्रस्त हो जाता है, तो क्रेता, वाहक या घाटयाल को किया गया परिदान अपने को किया गया परिदान मानने से इन्कार कर सकेगा या विक्रेता को नुकसानी के लिए उत्तरदायी ठहरा सकेगा।

(3) जब तक अन्यथा करार न हो, जहाँ कि विक्रेता द्वारा क्रेता को ऐसे मार्ग से, जिसमें समुद्र-अभिवहन अन्तर्वलित है, ऐसी परिस्थितियों में माल भेजा जाता है, जिनमें प्रायः बीमा कराया जाता है, वहाँ क्रेता को विक्रेता ऐसी सूचना देगा जिससे क्रेता उसके समुद्र-अभिवहन के दौरान के लिए उसका बीमा कराने को समर्थ हो सके और यदि विक्रेता ऐसा करने में असफल रहता है तो माल ऐसे समुद्र-अभिवहन के दौरान में उसकी जोखिम पर समझा जायेगा।

40. जोखिम, जहाँ कि माल का परिदान दूर के स्थान पर किया जाता है-

जहाँ कि माल का विक्रेता अपनी ही जोखिम पर उसका परिदान उस स्थान से भिन्न स्थान पर करने का करार करता है जहाँ वह माल विक्रय के समय है, वहाँ ऐसा होते हुए भी क्रेता, जब तक कि अन्यथा करार न हो, उस माल में ऐसे क्षय की जोखिम उठायेगा जो अभिवहन के अनुक्रम में अवश्यमेव हुआ करता है।

41. माल की परीक्षा करने का क्रेता का अधिकार

(1) जहाँ कि क्रेता को ऐसा माल परिदत किया जाता है. जिसकी परीक्षा उसने तत्पूर्व नहीं की है, यहाँ यह न समझा जायेगा कि उसने उसका प्रतिग्रहण कर लिया है यदि और जब तक उसे यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजन से कि वह संविदा के अनुरूप है या नहीं, उसको परीक्षा करने का युक्तियुक्त अवसर न मिल गया हो।

(2) यदि अन्यथा करार न हो तो जब विक्रेता माल का परिदान क्रेता को निविदत्त करता है तब वह इस बात के लिए आबद्ध है कि यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजन से कि माल संविदा के अनुरूप है या नहीं, माल की परीक्षा करने का युक्तियुक्त अवसर, प्रार्थना किये जाने पर, क्रेता को दे।

42. प्रतिग्रहण-

क्रेता ने माल का प्रतिग्रहण कर लिया है, यह तब समझा जाता है जब वह क्रेता को यह प्रज्ञापित कर देता है कि उसने वह माल प्रतिगृहीत कर लिया है, या जब माल क्रेता को परिदत्त कर दिया गया है और उसने उसके संबंध में ऐसा कोई कार्य किया है जो विक्रेत है जो विक्रेता के स्वामित्व से असंगत है, या जब युक्तियुक्त समय के बीत जाने पर भी वह विक्रेता को अपना प्रतिक्षेपण प्रज्ञापित किये बिना माल को प्रतिधारित किये रहता है।

43. क्रेता प्रतिक्षेपित माल को वापस करने के लिए आबद्ध नहीं है-

जब तक अन्यथा करार न हो, जहाँ कि क्रेता को माल परिदत्त किया जाता है और वह उसका प्रतिग्रहण करने से इन्कार ऐसा करने का अधिकार रखते हुए, करता है वहाँ वह उसे विक्रेता को वापस करने के लिए आबद्ध  नहीं है, किन्तु यह पर्याप्त होगा कि वह विक्रेता को प्रज्ञापित कर दे कि वह उसका प्रतिग्रहण करने से इन्कार करता है।

44. माल का परिदान लेने में उपेक्षा या लेने से इन्कार करने के लिए क्रेता का दायित्व-

जब कि विक्रेता माल का परिदान करने को तैयार और रजामन्द है और क्रेता से परिदान लेने की प्रार्थना करता है और क्रेता ऐसी प्रार्थना के पश्चात् युक्तियुक्त समय के अन्दर उस माल का परिदान नहीं लेता है तब वह विक्रेता के प्रति ऐसी किसी हानि के लिए, जो परिदान लेने में क्रेता द्वारा की गई उपेक्षा या इन्कार से हुई है, और माल की देखरेख और अभिरक्षा के युक्तियुक्त प्रभार के लिए भी, दायी है:

परन्तु जहाँ कि परिदान लेने में क्रेता द्वारा की गई उपेक्षा या इन्कार संविदा के निराकरण की कोटि में आता है वहाँ इस धारा की कोई भी बात विक्रेता के अधिकारों पर प्रभाव न डालेगी।

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