धारा 62 से 66 अध्याय 7 माल-विक्रय अधिनियम, 1930

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 7

प्रकीर्ण

62. विवक्षित निबंधनों और शर्तों का अपवर्जन-

जहाँ कि विधि की विवक्षा से कोई अधिकार, कर्तव्य या दायित्व विक्रय की संविदा के अधीन उद्‌भूत होता हो, वहाँ अभिव्यक्त करार द्वारा या पक्षकारों के बीच व्यवहार-चर्या द्वारा या प्रथा द्वारा, यदि प्रथा ऐसी हो, जी संविदा के दोनों पक्षकारों पर आबद्ध कर हो, उसका नकार या उसमें फेरफार किया जा सकेगा।

63. युक्तियुक्त समय तथ्य का प्रश्न है-

जहाँ कि इस अधिनियम में युक्तियुक्त समय के प्रति कोई निर्देश किया गया है, वहाँ युक्तियुक्त समय क्या है? यह तथ्य का प्रश्न है।

64. नीलाम विक्रय-

नीलाम द्वारा विक्रय की दशा में-

(1) जहाँ कि माल लाटों में विक्रय के लिए रखा जाता है, वहाँ हर एक लाट के बारे में प्रथमदृष्ट्या यह समझा जाता है कि यह विक्रय की एक पृथक् संविदा का विषय है;

(2) यह विक्रय, तब पूर्ण हो जाता है जब नीलामकर्ता उसका पूर्ण होना घनपात द्वारा या अन्य रूढ़िक प्रकार से आख्यापित करता है और जब तक ऐसा आख्यापन न किया जाय कोई भी बोली लगाने वाला अपनी बोली बापस ले सकेगा;

(3) बोली लगाने का अधिकार विक्रेता द्वारा था उसकी ओर से अभिव्यक्ततः आरक्षित रखा जा सकेगा और जहाँ कि ऐसा अधिकार अभिव्यक्ततः आरक्षित रखा जाता है, किन्तु अन्यथा नहीं, विक्रेता या उसकी ओर से एक व्यक्ति नीलाम में बोली एतस्मिन्पश्चात् अन्तर्विष्ठ उपबंधों के अध्यधीन लगा सकेगा;

(4) जहाँ कि विक्रय का बिक्रेता की ओर से बोली लगाने के अधिकार के अध्यधीन होना आधिसूचित नहीं है. वहाँ ऐसे विक्रय में स्वयं बोली लगाना या किसी व्यक्ति को बोली लगाने के लिए नियोजित करना विक्रेता के लिए विधिपूर्ण न होगा और न नीलामकर्ता के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह विक्रेता से या ऐसे व्यक्ति से कोई बोली जानते हुए ले, और इस नियम के उल्लंघनकारी विक्रय को क्रेता कपटपूर्ण मान सकेगा:

(5) विक्रय का किसी आरक्षित कीमत या अपसेट कीमत के अध्यधीन होना अधिसूचित किया जा सकेगा;

(6) यदि विक्रेता अपदेशी बोली का प्रयोग, कीमत बढ़ाने के लिए करता है तो विक्रय क्रेता के विकल्प पर शून्यकरणीय है।

64 . वर्धित या कम किये गये करों की रकम का विक्रय की संविदाओं में जोड़ा या घटाया जाना-

(1)जब तक कि संविदा के निबंधनों से भित्र आशय प्रतीत न हो, किसी माल की बाबत उपधारा (2) में वर्णित प्रकृति का कोई कर ऐसे माल के विक्रय या क्रय के लिये वहाँ पर; जहाँ कि संविदा के किए जाने के समय पर प्रभार्य नहीं था, कर के संदाय के बारे में किसी अनुबंध के बिना या वहाँ पर जहाँ कि उस समय पर प्रभार्य था, ऐसे माल के दत्त-कर विक्रय या क्रय के लिए, कोई संविदा की जाने के पश्चात् अधिरोपित, वर्द्धित, कम या परिहृत किये जाने की दशा में-

(क) यदि ऐसा अधिरोपण या वर्द्धन इस प्रकार प्रभाव में आता है कि यथास्थिति कर या वर्द्धित कर या ऐसे कर का कोई भाग संदत्त किया जाता है या संदेय है तो विक्रेता संविदा कीमत में उतनी रकम जोड़ सकेगा, जितनी ऐसे कर या कर की वृद्धि की बाबत संदत्त या संदेय रकम के बराबर हो और ऐसी जोड़ी गई रकम अपने को संदत किये जाने का तथा वह उस रकम के लिए बाद लाने और उसे वसूल करने का हकदार होगा; तथा

(ख) यदि ऐसी कमी या परिहार इस प्रकार प्रभाव में आता है कि यथास्थिति, केवल कम किया गया कर संदत्त किया जाता है या संदेय है, कोई भी कर न संदत्त किया गया है न संदेय है तो क्रेता संविदा-कीमत में से उतनी रकम काट सकेगा जितनी कर की कमी या परिहत कर के बराबर हो और ऐसी कटौती के लिये या की बाबत संदाय करने का वह दायी न होगा और न उस पर बाद लाया जा सकेगा।

(2) उपधारा (1) के उपबंध निम्नलिखित करों को लागू होते हैं अर्थात्-

(क) माल पर कोई भी सीमा शुल्क या उत्पादन शुल्कः

(ख) माल के विक्रय या क्रय पर कोई भी कर।

65. (निरसित)

66. व्यावृत्तियाँ -

(1) इस अधिनियम या एतद्वारा किये गये किसी भी निरसन में की कोई भी बात निम्नलिखित पर न तो प्रभाव डालेगी और न प्रभाव डालने वाली समझी जायेगी-

(क) इस अधिनियम के प्रारम्भ में पूर्व अर्जित, प्रोद्भूत या उपगत कोई भी अधिकार, हक, हित, बाध्यता या दायित्व;  अथवा

(ख) ऐसे किसी अधिकार, हक, हित, बाध्यता या दायित्व के विषय में कोई वैध कार्यवाहियाँ या उपचार; अथवा

(ग) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व की गई या सहन की गई कोई भी बातः अथवा

(घ) माल के विषय से संबंधित ऐसी कोई भी अधिनियमिति जो इस अधिनियम द्वारा अभिव्यक्ततः निरसित नहीं की गयी है; अथवा

(ङ) विधि का ऐसा कोई भी नियम जो इस अधिनियम से असंगत नहीं है।

(2) दिवाला विषयक नियम, जो माल के विक्रय की संविदाओं से संबंधित हों, इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी के होते हुए भी, लागू बने रहेंगे।

(3) विक्रय की संविदाओं से संबंधित इस अधिनियम के उपबंध विक्रय की संविदा के रूप के किसी ऐसे संव्यवहार लागू नहीं हैं जो बंधक, गिरवी, भार या अन्य प्रतिभूति के तौर पर प्रवर्तित होने के लिए आशयित हों।

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