धारा 1 से 3 अध्याय 1 माल-विक्रय अधिनियम, 1930

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

माल-विक्रय अधिनियम, 1930

[1930 का अधिनियम संख्यांक 3]

[15 मार्च, 1930]

 

माल के विक्रय से संबंधित विधि को परिभाषित और संशोधित करने के लिए अधिनियम

माल के विक्रय से संबंधित विधि को परिभाषित और संशोधित करना समीचीन है, अतः एत‌द्वारा यह निम्नलिखित रूप में अधिनियमित किया जाता है-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ

(1) यह अधिनियम, माल-विक्रय अधिनियम, 1930 कहा जा सकेगा।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है।

(3) यह जुलाई, 1930 के प्रथम दिन को प्रवृत्त होगा।

2. परिभाषाएं -

इस अधिनियम में, जब तक कोई बात विषय या सन्दर्भ में विरुद्ध न हो, -

(1) "क्रेता" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है, जो माल का क्रय करता है या क्रय करने का करार करता है;

(2) "परिदान" से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को कब्जा का स्वेच्छ्या अन्तरण अभिप्रेत है;

(3) माल का "परिदेय स्थिति" में होना तब तक कहा जाता है जब कि वह ऐसी स्थिति में हो कि क्रेता उसका परिदान लेने के लिए संविदा के अधीन आबद्ध हो;

(4) "माल पर हक की दस्तावेज" के अन्तर्गत वहन-पत्र, डाक-वारण्ट, भाण्डागारिक प्रमाण-पत्र, घाटवाल का प्रमाण-पत्र, रेल-रसीद, माल के परिदान के लिए वारण्ट या आदेश और ऐसी अन्य कोई भी दस्तावेज आती है, जिसका कारबार के मामूली अनुक्रम में उपयोग माल पर कब्जे या नियन्त्रण के सबूत के रूप में किया जाता है या जो उस दस्तावेज पर कब्जा रखने वाले व्यक्ति को वह माल, जिसके बारे में वह दस्तावेज है अन्तरित या प्राप्त करने के लिए या तो पृष्ठांकन द्वारा या परिदान द्वारा, प्राधिकृत करने वाली तात्पर्थित है;

(5) "कसूर" से सदोष कार्य या व्यतिक्रम अभिप्रेत है।

(6) "भावी माल" से वह माल अभिप्रेत है जिसे विक्रय को संविदा करने के पश्चात् विक्रेता को विनिर्मित या उत्पादित या अर्जित करना है;

(7) "माल" से अनुयोज्य दावों और धन से भिन्न हर किस्म की जंगम सम्पत्ति अभिप्रेत है तथा इसके अन्तर्गत आते हैं, स्टाक और अंश, उगती फसलें, घास और भूमि से बद्ध या उसकी भागरूप ऐसी चीजें, जिनका विक्रय से पूर्व या विक्रय की संविदा के अधीन भूमि से पृथक किये जाने का करार किया गया हो;

(8) वह व्यक्ति "दिवालिया" कहलाता है जिसने कारबार के मामूली अनुक्रम में अपने ऋणों का संदाय बंद कर दिया हो या जो अपने ऋणों का; जैसे-जैसे वे शोध्य होते जायें संदाय न कर सकता हो, चाहे उसने दिवालियेपन का कोई कार्य किया हो या नहीं;

(9) "वाणिज्यिक अभिकर्त्ता" से ऐसा वाणिज्यिक अभिकर्त्ता अभिप्रेत है, जो ऐसा अभिकर्त्ता होने के नाते कारबार के रूढ़िक अनुक्रम में या तो माल के विक्रय का या विक्रय के प्रयोजनों के लिए माल के पारेषण का या माल के क्रय का या माल की प्रतिभूति पर धन खड़ा करने का अधिकार रखता हो;

(10) "कीमत" से वह प्रतिफल अभिप्रेत है, जो माल के विक्रय के धन के रूप में है;

(11) "सम्पत्ति" से माल की साधारण सम्पत्ति, न कि केवल कोई विशेष सम्पत्ति अभिप्रेत है।

(12) "माल की क्वालिटी" के अन्तर्गत उसकी स्थिति या दशा भी आती है:

(13) "विक्रेता" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है, जो माल का विक्रय करता है या विक्रय करने का करार करता है,

(14) "विनिर्दिष्ट माल" से वह माल अभिप्रेत है, जो उस समय, जब विक्रय की संविदा की जाती है, परिलक्षित और करारित किया जाता है; तथा

(15) उन पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त किये गये हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) में परिभाषित हैं, वे ही अर्थ हैं जो उन्हें उस अधिनियम में समनुदिष्ट हैं।

3. 1872 के अधिनियम 9 के उपबंधों का लागू होना -

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के अनिरसित उपबंध. तक के सिवाय जहाँ तक कि वे इस अधिनियम के अभिव्यक्त उपबंधों से असंगत हैं, माल के विक्रय की संविदाओं लागू होते रहेंगे।

 

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