धारा 18 से 30 अध्याय 3 माल-विक्रय अधिनियम, 1930

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Bihar Judiciary (PCS-J) Preparation Bihar Assistant Prosecution Officer (APO) Preparation

अध्याय 3

संविदा के प्रभाव

विक्रेता और क्रेता के बीच सम्पत्ति का अन्तरण

18. माल को अभिनिश्चित करना होगा-

जहाँ कि संविदा अभिनिश्चित माल के विक्रय के लिए है, वहाँ यदि और जब तक माल अभिनिश्चित नहीं कर लिया जाता, माल में की कोई सम्पत्ति क्रेता को अन्तरित नहीं होगी।

19. सम्पत्ति तब संक्रान्त होती है जब उसका संक्रान्त होना आशयित हो-

(1) जहाँ कि संविदा विनिर्दिष्ट या अभिनिश्चित माल के विक्रय के लिए हो, वहाँ उस माल में की संपत्ति क्रेता को उस समय अन्तरित होती है जिस समय उसका अन्तरित किया जाना, उस संविदा के पक्षकारों के द्वारा आशयित हो।

(2) संविदा के निबंधन, पक्षकारों का आचरण और मामले की परिस्थितियाँ पक्षकारों के आशय को अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए ध्यान में रखी जाएँगी।

(3) जब तक कि भित्र आशय प्रतीत न हो, उस समय के बारे में जिस पर माल में को सम्पत्ति क्रेता को संक्रान्त होनी है, पक्षकारों के आशय के अभिनिश्चयन के लिए नियम वे नियम हैं, जो धारा 20 से लेकर 24 तक में अन्तर्विष्ट हैं।

20. परिदेय स्थिति में विनिर्दिष्ट माल-

जहाँ कि संविदा परिदेय स्थिति के विनिर्दिष्ट माल के विक्रय के लिए है, वहाँ उस माल में की संपत्ति क्रेता को उस समय संक्रान्त होती है और जब संविदा की जाती है और यह तत्वहीन है कि कीमत के संदाय का समय या माल के परिदान का समय या दोनों मुल्तवी कर दिये गये हैं।

21. विनिर्दिष्ट माल का परिदेय स्थिति में लाया जाना-

जहाँ कि संविदा विनिर्दिष्ट माल के विक्रय के लिए है और विक्रेता माल को परिदेय स्थिति में लाने के प्रयोजन से माल के प्रति कुछ करने के लिए आबद्ध है, वहाँ सम्पत्ति तब तक संक्रान्त नहीं होती जब तक वह कर नहीं दिया जाता और क्रेता को उसकी सूचना नहीं हो जाती।

22. परिदेय स्थिति में विनिर्दिष्ट माल, जब कि उसकी कीमत अभिनिश्चित करने के लिए उसके प्रति विक्रेता को कुछ करना है-

जहाँ कि संविदा परिदेय स्थिति के विनिर्दिष्ट माल के विक्रय के लिए है किन्तु विक्रेता कौमत अभिनिश्चित करने के प्रयोजन से माल को तौलने, मापने, परखने या उसके बारे में कोई अन्य कार्य या बात करने के लिए आबद्ध है, वहाँ सम्पत्ति तब तक संक्रान्त नहीं होती जब तक वह कार्य या बात नहीं कर दी जाती और क्रेता को सूचना नहीं हो जाती।

23. अनभिनिश्चित माल का विक्रय और विनियोग

(1) जहाँ कि अनभिनिश्चित या भावी माल के वर्णनानुसार विक्रय की संविदा है और ऐसा माल जो उस वर्णन का और परिदेय स्थिति में है या तो क्रेता की अनुमति से विक्रेता द्वारा या विक्रेता की अनुमति से क्रेता द्वारा संविदा मद्धे अशर्त विनियोजित कर दिया जाता है वहाँ तदुपरि माल में की सम्पत्ति क्रेता को संक्रान्त हो जाती है। ऐसी अनुमति अभिव्यक्त या विवक्षित हो सकेगी और विनियोग किये जाने के पूर्व या पश्चात् दी जा सकेगी।

(2) वाहक को परिदान -

जहाँ कि संविदा के अनुसरण में विक्रेता क्रेता को अथवा क्रेता को माल पारेषित किये जाने के प्रयोजन से वाहक को या अन्य उपनिहिती को (चाहे वह क्रेता द्वारा नामित हो या न हो) माल का परिदान कर देता है और व्ययन का अधिकार आरक्षित नहीं रखता, वहाँ यह समझा जायेगा कि उसने संविदा मद्धे उस माल का अशर्त विनियोग कर दिया है।

24. अनुमोदनार्थ अथवा "विक्रय या वापसी के लिए" भेजा गया माल-

जबकि क्रेता को माल अनुमोदनार्थ अथवा "विक्रय या वापसी के लिए" या ऐसे ही अन्य निबन्धनों पर परिदत्त किया जाता है तब माल में की सम्पत्ति का क्रेता को संक्रामण-

(क) उस समय होता है जब अपना अनुमोदन या प्रतिग्रहण विक्रेता को संज्ञापित करता है या उस संव्यवहार को अंगीकार करने का कोई अन्य कार्य करता है;

(ख) उस दशा में जब कि वह अपना अनुमोदन या प्रतिग्रहण विक्रेता को संज्ञापित नहीं करता किन्तु प्रतिक्षेप की सूचना दिये बिना माल को प्रतिधारित रखता है, यदि माल की वापसी के लिए कोई समय नियत किया गया हो तो उस समय के अवसान पर होता है, और यदि कोई समय नियत नहीं किया गया हो तो युक्तियुक्त समय के अवसान पर होता है।

25. व्ययन के अधिकार का आरक्षण-

(1) जहाँ कि संविदा विनिर्दिष्ट माल के विक्रय के लिए है या जहाँ कि माल संविदा मद्धे तत्पश्चात् विनियोजित कर दिया जाता है वहाँ विक्रेता उस माल के व्ययन का अधिकार संविदा या विनियोग के निबंधनों द्वारा तब तक के लिए आरक्षित रख सकेगा जब तक अमुक शर्तें पूरी नहीं हो जातीं। ऐसी दशा में इस बात के होते हुए भी कि माल का परिदान क्रेता को, या क्रेता को उसका पारेषण करने के प्रयोजन से वाहक को या अन्य उपनिहिती को, कर दिया गया है, माल में की सम्पत्ति क्रेता को तब तक संक्रान्त नहीं होती जब तक विक्रेता द्वारा लगाई गई शर्त पूरी नहीं हो जाती।

(2) जहाँ कि माल पोत द्वारा भेजा जाता है या रेल द्वारा वहन किये जाने के लिए रेल प्रशासन को परिदत्त किया जाता है और यथास्थिति, वहन-पत्र या रेल रसीद पर माल विक्रेता के या उसके अभिकर्ता के आदेशानुसार परिदेय है, वहाँ प्रथम दृष्ट्या यह समझा जाता है कि विक्रेता ने व्ययन का अधिकार आरक्षित कर लिया है।

(3) जहाँ कि माल का विक्रेता क्रेता पर कीमत के लिए विनिमय-पत्र लिखता है और विनिमय-पत्र यथास्थिति, वहन-पत्र या रेल-रसीद के साथ क्रेता को इस दृष्टि से पारेषित करता है कि विनिमय-पत्र प्रतिग्रहीत कर लिया जाए या उसका भुगतान कर दिया जाए, वहाँ यदि क्रेता विनिमय-पत्र का आचरण नहीं करता तो वह वहन-पत्र या रेल-रसीद को लौटाने के लिए आबद्ध है और यदि वह उस वहन-पत्र या रेल रसीद को सदोष प्रतिधारित करता है तो माल में की सम्पत्ति उसको संक्रान्त नहीं होती।

स्पष्टीकरण-

इस धारा में 'रेल' और 'रेल प्रशासन' पदों के वही अर्थ होंगे जो भारतीय रेल अधिनियम, 1890 (1890 का 9) में उन्हें क्रमशः समनुदिष्ट है।

26. जोखिम प्रथमदृष्ट्या सम्पत्ति के साथ संक्रान्त हो जाती है-

जब तक कि अन्यथा कारित न हो, माल तब तक विक्रेता की जोखिम पर रहता है जब तक उसमें की सम्पत्ति क्रेता को अन्तरित नहीं हो जाती, किन्तु जब उसमें की सम्पत्ति क्रेता को अन्तरित हो जाती है तब, चाहे परिदान किया गया हो या नहीं, माल क्रेता की जोखिम पर रहता है :

परन्तु जहाँ कि परिदान क्रेता या विक्रेता के कसूर से विलम्बित हो गया है। वहाँ माल ऐसी किसी हानि की बाबत, जो ऐसे कसूर के अभाव में न हुई होती, उस पक्षकार की जोखिम पर रहता है, जिसका कसूर हो:

परन्तु यह और भी कि इस धारा की कोई भी बात क्रेता या विक्रेता के उन कर्तव्यों या दायित्वों पर प्रभाव न डालेगी, जो दूसरे पक्षकार के माल के उपनिहिती के नाते उसके हैं।

हक का अन्तरण

27. उस व्यक्ति द्वारा विक्रय, जो स्वामी नहीं है-

इस अधिनियम और किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबंधों के अध्यधीन यह है कि जहाँ कि माल ऐसे व्यक्ति द्वारा बेचा जाता है जो उसका स्वामी नहीं है और जो स्वामी के प्राधिकार के अधीन या सम्मति से उसे नहीं बेचता वहाँ क्रेता, उस माल पर उस हक से, जो विक्रेता का था, बेहतर हक नहीं अर्जित करता, जब तक कि माल का स्वामी विक्रेता के विक्रय प्राधिकार का प्रत्याख्यान करने से अपने आचरण द्वारा प्रवारित नहीं हो जाता :

परन्तु जहाँ कि वाणिज्यिक अभिकर्ता माल पर या माल पर हक की दस्तावेज पर स्वामी की सम्मति से कब्जा रखता है, वहाँ जब तक वह वाणिज्यिक अभिकर्ता के कारबार के मामूली अनुक्रम में कार्य कर रहा हो, उसके द्वारा किया गया, कोई भी विक्रय वैसा ही विधिमान्य होगा मानो माल के स्वामी द्वारा वह ऐसा करने के लिए अभिव्यक्ततः प्राधिकृत हो; परन्तु यह तब जब कि क्रेता स‌द्भावनापूर्वक कार्य करे और विक्रय को संविदा के समय उसे यह सूचना न हो कि विक्रेता को विक्रय प्राधिकार नहीं है।

28. संयुक्त स्वामियों में से एक द्वारा विक्रय-

यदि माल के कई संयुक्त स्वामियों में से एक का उस माल पर एकमात्रिक कब्जा सहस्वामियों की अनुज्ञा से है तो उस माल में की सम्पत्ति ऐसे किसी व्यक्ति को अन्तरित हो जाती है, जो ऐसे संयुक्त स्वामी से उसे सद्भावपूर्वक क्रय करे और जिसे विक्रय की संविदा के समय सूचना न हो कि विक्रेता को विक्रय-प्राधिकार नहीं है।

29. शून्यकरणीय संविदा के अधीन कब्जा रखने वाले व्यक्ति द्वारा विक्रय-

जबकि माल के विक्रेता ने भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) की धारा 19 या धारा 19क के अधीन शून्यकरणीय संविदा के अधीन उस पर कब्जा अभिप्राप्त किया है, किन्तु वह संविदा विक्रय के समय विखण्डित नहीं हो चुकी है, तब क्रेता उस माल पर अच्छा हक अर्जित कर लेता है; परन्तु यह तब जबकि वह उसे स‌द्भावपूर्वक और विक्रेता के हक की त्रुटि की सूचना के बिना क्रय करे।

30. विक्रय के पश्चात् विक्रेता या क्रेता का कब्जा करना-

(1) जहाँ कि किसी व्यक्ति का माल का विक्रय कर देने पर भी उस माल या उस माल पर हक की दस्तावेजों पर कब्जा बना रहता है या होता है, वहाँ उस व्यक्ति द्वारा या उसके लिए कार्य करने वाले वाणिज्यिक अभिकत्र्ता द्वारा उस माल का या हक की दस्तावेजों का किसी विक्रय, गिरवी या अन्य व्ययन के अधीन किसी ऐसे व्यक्ति को किया गया परिदान या अन्तरण, जो उसे सद्भावपूर्वक और पूर्वतन विक्रय की सूचना के बिना प्राप्त करता है, वही प्रभाव रखेगा, मानो परिदान या अन्तरण करने वाला व्यक्ति, माल के स्वामी द्वारा वैसा करने के लिए अभिव्यक्ततः प्राधिकृत था।

(2) जहाँ कि कोई व्यक्ति, माल का क्रय करके या क्रय करने का करार करके उसे माल का या उस माल पर हक की दस्तावेजों का कब्जा विक्रेता की सम्मति से अभिप्राप्त करता है, वहाँ उस व्यक्ति द्वारा या उसके लिए कार्य करने वाले वाणिज्यिक अभिकर्ता द्वारा उस माल का या हक की दस्तावेजों का किसी विक्रय, गिरवी या अन्य व्ययन के अधीन किसी ऐसे व्यक्ति को किया गया परिदान या अन्तरण, जो उसे सद्भावपूर्वक और माल के बारे में मूल विक्रेता के किसी धारणाधिकार या अन्य अधिकार की सूचना के बिना प्राप्त करता है, ऐसा प्रभाव रखेगा; मानो ऐसा धारणाधिकार या अधिकार अस्तित्व में था ही नहीं।

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