धारा 45 से 54 अध्याय 5 माल-विक्रय अधिनियम, 1930

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अध्याय 5

माल पर असंदत्त विक्रेता के अधिकार

45. असंदत्त विक्रेता की परिभाषा

(1) माल का विक्रेता इस अधिनियम के अर्थ के अन्दर " असंदत्त विक्रेता" तब समझा जाता है-

() जब कि पूरी कीमत संदत्त या निविदत्त की गई हो।

() जब कि विनिमय-पत्र या अन्य परक्राम्य लिखत सशर्त संदाय के रूप में प्राप्त हुई हो और जिस शर्त पर वह प्राप्त हुई थी वह लिखत के अनादरण के कारण या अन्यथा पूरी हुई हो।

(2) इस अध्याय में "विक्रेता" पद के अन्तर्गत ऐसा कोई भी व्यक्ति आता है जो विक्रेता की स्थिति में हो, उदाहरणार्थ विक्रेता का वह अभिकर्ता जिसे वहन-पत्र पृष्ठांकित कर दिया गया है या वह परेषक या अभिकर्ता, जिसने कीमत स्वयं दे दी है या जो कीमत के लिए सीधे उत्तरदायी है।

46. असंदत्त विक्रेता के अधिकार

(1) इस अधिनियम के और किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबंधों के अध्यधीन यह है कि इस बात के होते हुए भी कि माल में की सम्पत्ति क्रेता को संक्रान्त हो, माल के असंदत्त विक्रेता को उस नयी विधि की विवक्षा से निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं:

() माल पर कीमत लेखे तब तक धारणाधिकार जब तक उसका उस पर कब्जा रहता है।

() क्रेता के दिवालिया हो जाने की दशा में, माल अपने कब्जे से अलग कर देने के पश्चात् उसे अभिवहन में रोक देने का अधिकार;

() पुनर्विक्रय का अधिकार, जैसा अधिनियम द्वारा परिसीमित है।

(2) जहाँ कि माल में की सम्पत्ति क्रेता को संक्रांत नहीं हुई है वहाँ असंदत्त विक्रेता को अपने अन्य उपचारों के अतिरिक्त परिदान के विधारण का ऐसा अधिकार प्राप्त है, जो विक्रेता के उस धारणाधिकार और अभिवहन में रोकने के अधिकार के समान और समविस्तीर्ण है जो उसे उस दशा में प्राप्त होता है जब क्रेता को सम्पत्ति संक्रान्त हो जाती है।

असंदत्त विक्रेता का धारणाधिकार

47. विक्रेता का धारणाधिकार

(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन यह है कि माल का असंदत्त विक्रेता, जिसका कब्जा माल पर है, उस पर निम्नलिखित दशाओं में तब तक कब्जा प्रतिधारित रखने का हकदार है जब तक कीमत संदत्त या निविदत नहीं कर दी जाती, अर्थात् -

() जहाँ कि माल का विक्रय उधार के बारे में किसी अनुबंध के बिना किया गया है;

() जहाँ कि माल का विक्रय उधार पर किया गया है, किन्तु उधार की अवधि का अवसान हो गया है।

() जहाँ कि क्रेता दिवालिया हो जाता है।

(2) विक्रेता अपने धारणाधिकार का प्रयोग इस बात के होते हुए भी कर सकेगा कि उस पर उसका कब्जा क्रेता के अभिकर्ता या उपनिहिती के रूप में है।

48. भागिक परिदान-

जहाँ कि असंदत्त विक्रेता ने माल का भागिक परिदान कर दिया है वहाँ वह अपने धारणाधिकार का प्रयोग शेष पर कर सकेगा, जब तक कि ऐसा भागिक परिदान ऐसी परिस्थितियों में किया गया हो, जो 'धारणाधिकार के अधित्यजन का करार दर्शित करती हो।

49. धारणाधिकार का पर्यवसान

(1) माल का असंदत्त विक्रेता माल पर अपना धारणाधिकार खो देता है-

() जब वह क्रेता के पास पारेषित किये जाने के प्रयोजन से माल को, उसके व्ययन का अधिकार आरक्षित किये बिना वाहक या अन्य उपनिहितों को परिदत्त कर देता है।

() जब क्रेता या उसका अभिकर्ता माल पर कब्जा विधिपूर्वक अभिप्राप्त कर लेता है।

() उसके अधित्यजन द्वारा।

(2) माल का असंदत्त विक्रेता, जिसका उस पर धारणाधिकार है, अपना धारणाधिकार केवल इस कारण नहीं खो देता कि उस माल की कीमत के लिए उसने डिक्री अभिप्राप्त कर ली है।

अभिवहन में रोकना

50. अभिवहन में रोकने का अधिकार-

इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन यह है कि जब कि माल का क्रेता दिवालिया हो जाय तब असंदत्त विक्रेता, जिसने माल अपने कब्जे से अलग कर दिये हैं, माल का अभिवहन में रोक देने का अधिकार रखता है, अर्थात् जब तक माल अभिवहन में रहे वह उस पर फिर कब्जा कर सकेगा और उसे तब तक प्रतिधारित कर सकेगा जब तक कि कीमत संदत्त या निविदत कर ली जाए।

51. अभिवहन की कालावधि

(1) उस समय से, जब विक्रेता के पास पारेषित किये जाने के प्रयोजन से माल गहक को या अन्य उपनिहितों को परिदत्त किया जाता है, उस समय तक, जब क्रेता या उसका तत्रिमित अभिकर्ता उसका परिदान ऐसे वाहक या अन्य उपनिहिती से लेता है, माल अभिवहन के अनुक्रम में समझा जाता है।

(2) यदि क्रेता या उसका तन्निमित अभिकर्ता उस माल का परिदान उसके नियत गन्तव्य स्थान पर पहुँचने के पूर्व अभिप्राप्त कर लेता है तो अभिवहन का अन्त हो जाता है।

(3) यदि नियत गंतव्य स्थान पर माल के पहुंचने के पश्चात् वाहक या अन्य उपनिहिती यह बात क्रेता मे या उसके अभिकर्ता से अभिस्वीकृत कर ले कि वह माल को क्रेता एवं उसके अभिकर्ता की ओर से धारण ये है और क्रेता या उसके अभिकर्ता को ओर से उपनिहितों के रूप में उस पर कब्जा बनाये रखे तो अभिवहन का अन्त हो जाता है और यह तत्वहीन है कि क्रेता द्वारा माल के लिए आगे का गन्तव्य स्थान उपदर्शित किया गया हो।

(4) यदि क्रेता ने माल को प्रतिक्षेपित कर दिया हो, और वाहक या अन्य उपनिहिती उस पर अपना कब्जा बनाये रखे तो यद्यपि विक्रेता ने उसे वापस लेने से इन्कार कर दिया हो, यह नहीं समझा जाता कि अभिवहन का अन्त हो गया है।

(5) जब कि माल का परिदान क्रेता द्वारा भाड़े पर लिये गये पोत को किया जाता है तब यह बात कि माल मास्टर के कब्जे में वाहक के रूप में या क्रेता के अभिकर्ता के रूप में, एक ऐसा प्रश्न है, जो उस विशिष्ट मामले को परिस्थितियों पर अवलम्बित रहता है।

(6) जहाँ कि वाहक या अन्य उपनिहितों माल का परिदान क्रेता को या उसके तन्निमित अभिकर्ता को करने से सदोष इन्कार करता है, वहाँ अभिवहन का अन्त हुआ समझा जाता है।

(7) जहाँ कि क्रेता को या उसके तन्निमित अभिकर्ता को माल का भागिक परिदान कर दिया जाता है, वहाँ शेष माल अभिवहन में रोका जा सकेगा; जब तक कि ऐसा भागिक परिदान ऐसी परिस्थितियों में किया गया हो, जिससे यह दर्शित कोता हो कि सारे माल पर कब्जा छोड़ देने का करार है।

52. अभिवहन में रोका कैसे जाता है?-

(1) असंदत्त विक्रेता अभिवहन में रोकने के अपने अधिकार का प्रयोग या तो माल पर वास्तविक कब्जा करके या जिसे वाहक या अन्य उपनिहित्ती के कब्जे में माल है, उसे अपने दावे की सूचना देकर कर सकेगा। ऐसी सूचना या तो उस व्यक्ति को, जिसका उस माल पर वास्तविक कब्जा है या उसके मालिक को दी सकेगी। पश्चात्‌कथित दशा में सूचना प्रभावी होने के लिए ऐसे समय पर और परिस्थितियों में दी जायेगी कि मालिक युक्तियुक्त तत्परता के प्रयोग द्वारा उसे अपने सेवक या अभिकर्ता को ना समय रहते संसूचित कर सके कि क्रेता का भरिदान किया जा सके।

(2) जब कि माल को अभिवहन में रोकने की सूचना माल के वाहक या उस पर कब्जा रखने वाले अन्य उपनिहितो को विक्रेता द्वारा दी जाती है तब वह माल का प्रतिपरिदान विक्रेता को या उसके निदेशानुसार करेगा। ऐसे प्रतिपरिदान के यय विक्रेता द्वारा उठाये जायेंगे।

क्रेता और विक्रेता द्वारा अन्तरण

53. क्रेता द्वारा अनुविक्रय या गिरवी का प्रभाव

(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन यह है कि माल का कोई भी विक्रय या अन्य व्ययन, जो क्रेता ने किया हो, असंदत विक्रेता के धारणाधिकार या अभिवहन में रोकने के अधिकार पर प्रभाव नहीं डालता, जब तक कि विक्रेता ने उसके लिए अपनी अनुमति दे दी हो:

परन्तु जहाँ कि माल पर हक की दस्तावेज किसी व्यक्ति को उस माल का क्रेता या स्वामी होने के नाते दी गई है या विधिपूर्वक अन्तरित की गई है और वह व्यक्ति उस दस्तावेज को किसी ऐसे व्यक्ति को अन्तरित कर देता है, जो उस दस्तावेज को सद्भावपूर्वक और प्रतिफलेन लेता है, वहाँ यदि ऐसा अन्तिम वर्णित अन्तरण विक्रय के रूप में था ती असंदत विक्रेता का धारणाधिकार या अभिवहन में रोकने का अधिकार विफल हो जाता है और यदि ऐसा अन्तिम वर्णित अन्तरण गिरवी या अन्य मूत्त्वार्थ व्ययन के रूप में था तो असंदत्त विक्रेता के धारणाधिकार या अभिवहन में रोकने के अधिकार का प्रयोग उस अन्तरिती के अधिकारों के अध्यधीन ही किया जा सकता है।

(2) जहाँ कि अन्तरण गिरवी रूप में है, वहाँ असंदन विक्रेता गिरवीदार से यह अपेक्षा कर सकेगा कि यावत्सम्भव वह गिरवी द्वारा प्रतिभूत रकम की तुष्टि प्रथमतः क्रेता के ऐसे किसी अन्य माल या प्रतिभूतियों से कराये, जो गिरवीदार के हाथों में हो और क्रेता के विरुद्ध काम में लायी जा सकती हो।

54. धारणाधिकार से या अभिवहन में रोकने से विक्रय का विखण्डन साधारणतः नहीं होता

(1) इस धारा के उपबंधों के अध्यधीन यह है कि असंदत्त विक्रेता के अपने धारणाधिकार या अभिवहन में रोकने के अधिकार के प्रयोग-मात्र से विक्रय संविदा का विखण्डन नहीं होता।

(2) जहाँ कि माल विनश्वर प्रकृति का है या जहाँ कि असंदत विक्रेता, जिसने अपने धारणाधिकार या अभिवहन में रोकने के अधिकार का प्रयोग किया है, पुनर्विक्रय करने के अपने आशय की सूचना क्रेता को देता है, वहाँ यदि क्रेता युक्तियुक्त समय के अन्दर कीमत संदत्त या निविदत्त नहीं कर देता तो असंदत्त विक्रेता युक्तियुक्त समय के अन्दर माल का पुनर्विक्रय कर सकेगा और उसके संविदा भंग से कारित हानि के लिए मूल विक्रेता से नुकसानी वसूल कर सकेगा। किन्तु क्रेता उस लाभ का हकदार होगा, जो पुनर्विक्रय से हो; यदि ऐसी सूचना नहीं दी जाती है तो असंदत्त विक्रेता ऐसी नुकसानी करने का हकदार होगा और क्रेता पुनर्विक्रय पर हुए लाभ का, यदि कोई हो, हकदार होगा।

(3) जहाँ कि असंदत्त विक्रेता, जिसने अपने धारणाधिकार का अभिवहन में रोकने के अधिकार का प्रयोग किया है, माल का पुनर्विक्रय करता है वहाँ क्रेता उस पर मूल क्रेता के विरुद्ध अच्छा हक इस बात के होते हुए भी अर्जित कर लेता है कि मूल क्रेता की पुनर्विक्रय की कोई सूचना नहीं दी गयी है।

(4) जहाँ कि विक्रेता, यह अधिकार अभिव्यक्ततः आरक्षित कर लेता है कि यदि क्रेता व्यतिक्रम करे तो पुनर्विक्रय किया जा सकेगा और क्रेता के व्यतिक्रम करने पर माल का पुनर्विक्रय कर देता है, वहाँ मूल विक्रय संविदा का एतद्वारा विखण्डन हो जाता है किन्तु उससे विक्रेता के किसी ऐसे दावे पर, जो वह नुकसानी के लिए रखता हो, प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

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