धारा 10 से 30 अध्याय 2 भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

धारा 10 से 30 अध्याय 2 भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

अध्याय 2

संविदाओं, शून्यकरणीय संविदाओं और शून्य करारों के विषय में

10. कौन से करार संविदायें हैं-

सब करार संविदायें हैं, यदि वे संविदा करने के लिये सक्षम पक्षकारों की स्वतन्त्र सम्मति से किसी विधिपूर्ण प्रतिफल के लिए और किसी विधिपूर्ण उद्देश्य से किये गये हैं और एतद्द्वारा अभिव्यक्तत: शून्य घोषित नहीं किये गये हैं। 

इसमें अन्तर्विष्ट कोई भी बात भारत में प्रवृत्त और एतद्द्वारा अभिव्यक्ततः निरसित न की गई किसी ऐसी विधि पर, जिसके द्वारा किसी संविदा का लिखित रूप में या साक्षियों की उपस्थिति में किया जाना अपेक्षित हो, या किसी ऐसी विधि पर जो दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण से सम्बन्धित हो, प्रभाव न डालेगी।

11. संविदा करने के लिये कौन सक्षम है -

हर ऐसा व्यक्ति संविदा करने के लिये सक्षम है जो उस विधि के अनुसार, जिसके वह अध्यधीन है, प्राप्तवय हो, और जो स्वस्थचित्त हो, और किसी विधि द्वारा जिसके वह अध्यधीन है, संविदा करने से निरर्हित न हो।

12. संविदा करने के प्रयोजनों के लिये स्वस्थचित्त क्या है—

कोई व्यक्ति, संविदा करने के प्रयोजन के लिये स्वस्थचित्त कहा जाता है यदि वह उस समय, जब वह संविदा करता है, उस संविदा को समझने में और अपने हितों पर उसके प्रभाव के बारे में युक्तिसंगत निर्णय लेने में समर्थ है।

जो व्यक्ति प्रायः विकृतचित्त रहता है, किन्तु कभी-कभी स्वस्थचित्त हो जाता है, वह जब स्वस्थचित्त हो तब संविदा कर सकेगा।

जो व्यक्ति प्रायः स्वस्थचित्त रहता है किन्तु कभी-कभी विकृतचित्त हो जाता है, वह जब विकृतचित्त हो, तब संविदा नहीं कर सकेगा।

दृष्टान्त

(क) पागलखाने का एक रोगी, जो कि अन्तरालों में स्वस्थचित्त हो जाता है, उन अन्तरालों के दौरान में संविदा कर सकेगा।

(ख) वह स्वस्थचित मनुष्य, जो ज्वर से चित्तविपर्यस्त है या जो इतना मत्त है कि वह संविदा के निबन्धनों को नहीं समझ सकता या अपने हितों पर उसके प्रभाव के बारे में युक्तिसंगत निर्णय नहीं ले सकता तब तक संविदा नहीं कर सकता जब तक ऐसी चित्तविपर्यस्तता या मंत्तता बनी रहे।

13. " सम्मति" की परिभाषा -

दो या अधिक व्यक्ति सम्मत हुए तब कहे जाते हैं जब कि वे किसी एक बात पर एक ही भाव में सहमत होते हैं ।

14. "स्वतन्त्र सम्मति" की परिभाषा -

सम्मति स्वतन्त्र तब कही जाती है जब कि वह--

(1) न तो धारां 15 में यथापरिभाषित प्रपीड़न द्वारा कारित हो;

(2) न धारा 16 में यथापरिभाषित असम्यक् असर द्वारा कारित हो;

(3) न धारा 17 में यथापरिभाषित कपट द्वारा कारित हो;

(4) न धारा 18 में यथापरिभाषित दुर्व्यपदेशन द्वारा कारित हो;

(5) न भूल द्वारा कारित हो, किन्तु यह बात धाराओं 20, 21 और 22 के उपबन्धों के अध्यधीन है।

सम्मति ऐसे कारित तब कही जाती है जब कि वह ऐसा प्रपीड़न, असम्यक् असर, कपट, दुर्व्यपदेशन या भूल न होती तो न दी जाती।

15. " प्रपीड़न" की परिभाषा -

"प्रपीड़न" इस आशय से कि किसी व्यक्ति से कोई करार कराया जाये, कोई ऐसा कार्य करना या करने की धमकी देना है, जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) द्वारा निषिद्ध है, अथवा किसी व्यक्ति पर, चाहे वह कोई हो, प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिये किसी सम्पत्ति का विधिविरुद्ध निरोध करना या निरोध करने की धमकी देना है।

स्पष्टीकरण –

यह तत्वहीन है कि जिस स्थान पर प्रपीड़न का प्रयोग किया जाता है, वहां भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का 45) प्रवृत्त है या नहीं।

दृष्टान्त

क खुले समुद्र में एक अंग्रेजी पोत पर, ऐसे कार्य द्वारा, जो भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अधीन आपराधिक अभित्रास की कोटि में आता है, ख से क एक करार कराता है।

तत्पश्चात् क संविदा-भंग के लिये कलकत्ते में ख पर वाद लाता है।

क ने प्रीपीड़न का प्रयोग किया है यद्यपि उसका कार्य इंग्लैण्ड की विधि के अनुसार अपराध नहीं है, और यद्यपि उस समय जब और उस स्थान पर जहां वह कार्य किया गया था, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 506 प्रवृत्त नहीं थी।

16. " असम्यक् असर" की परिभाषा -

(1) संविदा असम्यक् असर द्वारा उत्प्रेरित कही जाती है जहाँ कि पक्षकारों के बीच विद्यमान सम्बन्ध ऐसे हैं कि उनमें से एक पक्षकार दूसरे पक्षकार की इच्छा को अधिशासित करने की स्थिति में है और उस स्थिति का उपयोग उस दूसरे पक्षकार से अऋजु फायदा अभिप्राप्त करने के लिये करता है।

(2) विशिष्टतया और पूर्ववर्ती सिद्धान्त की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यह है कि कोई व्यक्ति किसी अन्य की इच्छा को अधिशासित करने की स्थिति में समझा जाता है जब कि वह-

(क) उस अन्य पर वास्तविक या दृश्यमान प्राधिकार रखता है, या उस अन्य के साथ वैश्वासिक सम्बन्ध की स्थिति में है; अथवा

(ख) ऐसे व्यक्ति के साथ संविदा करता है जिसकी मानसिक सामर्थ्य पर आयु, रुग्णता या मानसिक या शारीरिक कष्ट के कारण अस्थायी या स्थायी रूप से प्रभाव पड़ा है।

(3) जहाँ कि कोई व्यक्ति, जो किसी अन्य की इच्छा को अधिशासित करने की स्थिति में हो, उसके साथ संविदा करता है; और वह संव्यवहार देखने से ही या दिये गये साक्ष्य के आधार पर लोकात्माविरुद्ध प्रतीत होता है वहां यह साबित करने का भार कि ऐसी संविदा असम्यक् असर से उत्प्रेरित नहीं की गयी थी, उस व्यक्ति पर होगा जो उस अन्य की इच्छा को अधिशासित करने की स्थिति में था।

इस उपधारा की कोई भी बात भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 111 के उपबन्धों पर प्रभाव नहीं डालेगी।

दृष्टान्त

(क) क, जिसने अपने पुत्र ख को उसकी अप्राप्तवयता के दौरान में धन उधार दिया था, ख के प्राप्तवय होने पर अपने पैत्रिक असर के दुरुपयोग द्वारा उससे उस उधार धन की बाबत शोध्य राशि से अधिक रकम के लिये एक बन्धपत्र अभिप्राप्त कर लेता है। क असम्यक् असर का प्रयोग करता है।

(ख) रोग या आयु से क्षीण हुए मनुष्य क पर ख का, जो असर उसके चिकित्सीय परिचारक के नाते है, उस असर से ख को उसकी वृत्तिक सेवाओं के लिये एक अयुक्तियुक्त राशि देने का करार करने के लिये क उत्प्रेरित किया जाता है। ख असम्यक् असर का प्रयोग करता है।

(ग) क अपने ग्राम के साहूकार ख का ऋणी होते हुए एक नई संविदा करके ऐसे निबन्धनों पर धन उधार लेता है जो लोकात्माविरुद्ध प्रतीत होते हैं। यह साबित करने का भार कि संविदा असम्यक् असर से उत्प्रेरित नहीं की गयी थी, ख पर है।

(घ) क एक बैंककार से उधार के लिये ऐसे समय में आवेदन करता है जब धन के बाजार में तंगी है। बैंककार ब्याज की अप्रायिक ऊंची दर पर देने के सिवाय उधार देने से इन्कार कर देता है। क उन निबन्धनों पर उधार प्रतिगृहीत करता है। यह संव्यवहार कारबार के मामूली अनुक्रम में हुआ है, और यह संविदा असम्यक् असर से उत्प्रेरित नहीं है।

17. " कपट " की परिभाषा -

" कपट " से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत आता है निम्नलिखित कार्यों में से कोई भी ऐसा कार्य जो संविदा के एक पक्षकार द्वारा, या उसकी मौनानुकूलता से या उसके अभिकर्ता द्वारा, संविदा के किसी अन्य पक्षकार की या उसके अभिकर्ता की प्रवंचना करने के आशय से या उसे संविदा करने के लिये उत्प्रेरित करने के आशय से किया गया हो—

(1) जो बात सत्य नहीं है; उसका तथ्य के रूप में उस व्यक्ति द्वारा सुझाया जाना जो यह विश्वास नहीं करता कि वह सत्य है;

(2) किसी तथ्य का ज्ञान या विश्वास रखने वाले व्यक्ति द्वारा उस तथ्य का सक्रिय छिपाया जाना;

(3) कोई वचन जो उसका पालन करने के आशय के बिना दिया गया हो;

(4) प्रवंचना करने योग्य कोई अन्य कार्य;

(5) कोई ऐसा कार्य या लोप जिसका कपटपूर्ण होना विधि विशेषतः घोषित करे।

स्पष्टीकरण -

संविदा करने के लिये किसी व्यक्ति की रजामन्दी पर जिन तथ्यों का प्रभाव पड़ना सम्भाव्य हो, उनके बारे में केवल मौन रहना कपट नहीं है जब तक कि मामले की परिस्थितियां ऐसी न हों जिन्हें ध्यान में रखते हुए मौन रहने वाले व्यक्ति का यह कर्तव्य हो जाता हो कि वह बोले या जब तक कि उसका मौन स्वतः ही बोलने के तुल्य न हो।

दृष्टान्त

(क) क नीलाम द्वारा ख को एक घोड़ा बेचता है जिसके बारे में क जानता है कि वह ऐबदार है। क घोड़े के ऐब के बारे में ख को कुछ नहीं कहता। यह क की ओर से कपट नहीं है।

(ख) क की ख पुत्री है और अभी ही प्राप्तवय हुई है। यहां पक्षकारों के बीच के सम्बन्ध के कारण क का यह कर्तव्य हो जाता है कि यदि घोड़ा ऐबदार है तो ख को वह बात बता दे ।

(ग) क से ख कहता है कि यदि आप इस बात का प्रत्याख्यान न करें तो मै मान लूंगा कि घोड़ा बेऐब है। क कुछ नहीं कहता है। यहां क का मौन बोलने के तुल्य है।

(घ) क और ख, जो व्यापारी हैं, एक संविदा करते हैं। क को कीमतों में ऐसे परिवर्तन की निजी जानकारी है जिससे संविदा करने के लिये अग्रसर होने की ख की रजामन्दी पर प्रभाव पड़ेगा। ख को यह जानकारी देने के लिये क आबद्ध नहीं है।

18. "दुव्यंपदेशन" की परिभाषा -

"दुर्व्यपदेशन" से अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत आते हैं-

(1) इस बात का, जो सत्य नहीं है, ऐसे प्रकार से किया गया निश्चयात्मक प्राख्यान जो उस व्यक्ति की, जो उसे करता है, जानकारी से समर्थित न हो, यद्यपि वह उस बात के सत्य होने का विश्वास करता हो;

(2) कोई ऐसा कर्तव्य भंग, जो प्रवंचना करने के आशय के बिना उस व्यक्ति को, जो उसे करता है, या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाले किसी व्यक्ति को कोई फायदा किसी अन्य को ऐसा भुलावा देकर पहुँचाए, जिससे उस अन्य पर या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाले किसी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े;

(3) चाहे कितने ही सरल भाव से क्यों न हो, करार के किसी पक्षकार से उस बात के पदार्थ के बारे में, जो उस करार का विषय हो, कोई भूल कराना।

19. स्वतन्त्र सम्मति के बिना किये गये करारों की शून्यकरणीयता-

जब कि किसी करार के लिए सम्मति प्रपीड़न, कपट या दुर्व्यपदेशन से कारित हो तब वह करार ऐसी संविदा है जो उस पक्षकार के विकल्प पर शून्यकरणीय है जिसकी सम्मति ऐसे कारित हुई थी।

संविदा का वह पक्षकार जिसकी सम्मति कपट या दुर्व्यपदेशन से कारित हुई थी, यदि वह ठीक समझे तो, आग्रह कर सकेगा कि संविदा का पालन किया जाये, और वह उस स्थिति में रखा जाये कि जिसमें वह होता यदि किये गये व्यपदेशन सत्य होते ।

अपवाद -

यदि ऐसी सम्मति दुर्व्यपदेशन या ऐसे मौन द्वारा जो धारा 17 के अर्थ के अन्तर्गत कपटपूर्ण है, कारित हुई थी तो ऐसा होने पर भी संविदा शून्यकरणीय नहीं है यदि उस पक्षकार के पास, जिसकी सम्मति इस प्रकार कारित हुई थी, सत्य का पता मामूली तत्परता से चला लेने के साधन थे।

स्पष्टीकरण -

वह कपट या दुर्व्यपदेशन, जिसने संविदा के उस पक्षकार की सम्मति कारित नहीं की, जिससे ऐसा कपट या दुव्र्व्यपदेशन किया गया था, संविदा को शून्यकरणीय नहीं कर देता।

दृष्टान्त

(क) ख को प्रवंचित करने के आशय से क मिथ्या व्यपदेशन करता है कि क के कारखाने में पांच सौ मन नील प्रतिवर्ष बनाया जाता है और तद्द्द्वारा ख को वह कारखाना खरीदने के लिये उत्प्रेरित करता है। संविदा ख के विकल्प पर शून्यकरणीय है।

(ख) क दुर्व्यपदेशन द्वारा ख को गलत विश्वास कराता है कि क के कारखाने में पांच सौ मन नील प्रतिवर्ष बनाया जाता है। ख कारखाने के लेखाओं की पड़ताल करता है जो यह दर्शित करते हैं कि केवल चार सौ मन नील बनाया गया है। इसके पश्चात् ख कारखाने को खरीद लेता है। संविदा के के दुर्व्यपदेशन के कारण शून्यकरणीय नहीं है।

(ग) क कपटपूर्वक ख को इत्तिला देता है कि क की सम्पदा-विल्लंगम् मुक्त है। तब ख उस सम्पदा को खरीद लेता है। वह सम्पदा एक बन्धक के अध्यधीन है। ख या तो संविदा को शून्य कर सकेगा या यह आग्रह कर सकेगा कि वह क्रियान्वित की जाये और बन्धक ऋण का मोचन किया जाये।

(घ) क की सम्पदा में ख अयस्क की एक शिला का पता लगाकर क से उस अयस्क के अस्तित्व को छिपाने के साधनों का प्रयोग करता है और छिपा लेता है। क के अज्ञान से ख उस सम्पदा को न्यून मूल्य पर खरीदने में समर्थ हो जाता है। संविदा के के विकल्प पर शून्यकरणीय है।

(ङ) ख की मृत्यु पर एक सम्पदा का उत्तराधिकारी होने का क हकदार हैं। ख की मृत्यु हो जाती है। ख की मृत्यु का समाचार पाने पर ग उस समाचार को क तक नहीं पहुंचने देता और इस तरह क को उत्प्रेरित करता है कि उस सम्पदा में अपना हित उसके हाथ बेच दे। यह विक्रय क के विकल्प पर शून्यकरणीय है।

19- क. असम्यक् असर से उत्प्रेरित संविदा को अपास्त करने की शक्ति-

जब कि किसी करार के लिये सम्मति असम्यक् असर से कारित हो, तब वह करार ऐसी संविदा है जो उस पक्षकार के विकल्प पर शून्यकरणीय है जिसकी सम्मति इस प्रकार कारित हुई।

ऐसी कोई भी संविदा या तो आत्यन्तिकतः अपास्त की जा सकेगी या यदि उस पक्षकार ने, जो उसके शून्यकरण का हकदार हो, तदधीन कोई फायदा प्राप्त किया हो तो ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जो न्यायालय को न्यायसंगत प्रतीत हों।

दृष्टान्त

(क) क के पुत्र ने एक वचनपत्र पर ख के नाम की कूटरचना की है। क के पुत्र का अभियोजन करने की धमकी देकर क से कूटरचित वचनपत्र की रकम के लिये एक बन्धपत्र ख अभिप्राप्त करता है। यदि ख उस बन्धपत्र पर वाद लाये तो न्यायालय उसे अपास्त कर सकेगा।

(ख) एक साहूकार क एक कृषक ख को 100 रुपये उधार देता है और असम्यक् असर से ख को 6 प्रतिशत प्रतिमास ब्याज पर 200 रुपये का एक बन्धपत्र निष्पादित करने को उत्प्रेरित करता है। न्यायालय ऐसे ब्याज सहित जो न्यायसंगत प्रतीत हो, 100 रुपये के प्रति संदाय का आदेश ख को देते हुए बन्धपत्र अपास्त कर सकेगा।

20. जब कि दोनों पक्षकार तथ्य की बात सम्बन्धी भूल में हों तब करार शून्य है -

जहां कि किसी करार के दोनों पक्षकार ऐसी तथ्य की बात के बारे में, जो करार के लिये मर्मभूत है, भूल में हों, वहां करार शून्य है।

स्पष्टीकरण –

जो चीज करार की विषय-वस्तु हो उसके मूल्य के बारे में गलत राय, तथ्य की बात के बारे में भूल नहीं समझी जायेगी।

दृष्टान्त

(क) माल के एक विनिर्दिष्ट स्थोरा को जिसके बारे में यह अनुमान है कि वह इंग्लैण्ड से बम्बई को चल चुका है, ख को बेचने का करार क करता है। पता चलता है कि सौदे के दिन से पूर्व, उस स्थोरा को प्रवहण करने वाला पोत संत्यक्त कर दिया गया था और माल नष्ट हो गया था। दोनों में से किसी भी पक्षकार को इन तथ्यों की जानकारी नहीं थी। करार शून्य है।

(ख) ख से अमुक घोड़ा खरीदने का करार क करता है। यह पता चलता है कि वह घोड़ा सौदे के समय मर चुका था, यद्यपि दोनों में से किसी भी पक्षकार को इस तथ्य की जानकारी नहीं थी। करार शून्य है।

(ग) ख के जीवनपर्यन्त के लिये एक सम्पदा का हकदार होते हुए क उसे ग को बेचने का करार करता है। करार के समय ख मर चुका था किन्तु दोनों पक्षकार इस तथ्य से अनभिज्ञ थे। करार शून्य है

21. विधि के बारे की भूलों का प्रभाव -

कोई संविदा इस कारण ही शून्यकरणीय नहीं है कि वह भारत में प्रवृत्त विधि के बारे की किसी भूल के कारण की गई थी, किन्तु किसी ऐसी विधि के बारे की, जो भारत में प्रवृत्त नहीं है, किसी भूल का वही प्रभाव है जो तथ्य की भूल का है।

दृष्टान्त

 

क और ख इस गलत विश्वास पर संविदा करते हैं कि एक विशिष्ट ऋण भारतीय परिसीमा विधि द्वारा वर्जित है। संविदा शून्यकरणीय नहीं है।

22. एक पक्षकार की तथ्य की बात के बारे की भूल से कारित संविदा-

कोई संविदा इस कारण ही शून्यकरणीय नहीं है कि उसके पक्षकारों में से एक के किसी तथ्य की बात के बारे की भूल में होने से वह कारित हुई थी।

23. कौन से प्रतिफल और उद्देश्य विधिपूर्ण हैं और कौन से नहीं-

करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिपूर्ण है, सिवाय जबकि -

वह विधि द्वारा निषिद्ध हो; अथवा

वह ऐसी प्रकृति का हो कि यदि वह अनुज्ञात किया जाये तो वह किसी विधि के उपबन्धों को विफल कर देगा; अथवा वह कपटपूर्ण हो; अथवा

उसमें किसी अन्य के शरीर या सम्पत्ति को क्षति अन्तर्वलित या विवक्षित हो; अथवा

न्यायालय उसे अनैतिक या लोकनीति के विरुद्ध माने ।

इन दशाओं में से हर एक में करार का प्रतिफल या उद्देश्य विधिविरुद्ध कहलाता है। हर एक करार, जिसका उद्देश्य या प्रतिफल विधिविरुद्ध हो, शून्य है।

दृष्टान्त

(क) क अपना गृह 10,000 रुपये में ख को बेचने का करार करता है। यहाँ 10,000 रुपये देने का ख का वचन गृह बेचने के क के वचन के लिए प्रतिफल है, और गृह बेचने का क का वचन 10,000 रुपये देने के ख के वचन के लिये प्रतिफल है। ये विधिपूर्ण प्रतिफल हैं।

(ख) क यह वचन देता है कि यदि ग, जिसे ख को 1,000 रुपये देना है, उसे देने में असफल रहा तो वह ख को छः मास के बीतते ही 1,000 रुपये देगा। ख तदनुसार ग को समय देने का वचन देता है। यहाँ हर एक पक्षकार का वचन दूसरे पक्षकार के वचन के लिए प्रतिफल है और ये विधिपूर्ण प्रतिफल हैं।

(ग) ख द्वारा उसे दी गई किसी राशि के बदले क यह वचन देता है कि यदि ख का पोत अमुक समुद्र-यात्रा में नष्ट हो जाये तो क उसके पोत के मूल्य की प्रतिपूर्ति करेगा। यहाँ क का वचन ख के संदाय के लिये प्रतिफल है, और ख का संदाय क के वचन के लिये प्रतिफल है; और ये विधिपूर्ण प्रतिफल हैं।

(घ) ख के बच्चे का भरण-पोषण करने का क वचन देता है और ख उस प्रयोजन के लिए क को 1,000 रुपये वार्षिक देने का वचन देता है। यहाँ हर एक पक्षकार का वचन दूसरे पक्षकार के वचन के लिए प्रतिफल है। ये विधिपूर्ण प्रतिफल हैं।

(ङ) क, ख और ग अपने द्वारा कपट से अर्जित किये गये या किये जाने वाले अभिलाभों के आपस में विभाजन के लिए करार करते हैं। करार शून्य है क्योंकि उसका उद्देश्य विधिविरुद्ध है।

(च) ख के लिए लोक-सेवा में नियोजन अभिप्राप्त करने का वचन क देता है और क को ख 1,000 रुपये देने का वचन देता है। करार शून्य है क्योंकि उसके लिए प्रतिफल विधिविरुद्ध है।

(छ) क, जो एक भू-स्वामी के लिये अभिकर्ता है, अपने मालिक के ज्ञान के बिना, अपने मालिक की भूमि का एक पट्टा ख के लिए अभिप्राप्त करने का करार धन के लिये करता है। क और ख के बीच का करार शून्य है, क्योंकि उससे यह विवक्षित है कि क ने अपने मालिक से छिपाव द्वारा कपट किया है।

(ज) क उस अभियोजन को, जो उसने लूट के बारे में ख के विरुद्ध संस्थित किया है, छोड़ देने का ख को वचन देता है और ख दी गई चीजों का मूल्य लौटा देने का वचन देता है करार शून्य है क्योंकि उसका उद्देश्य विधिविरुद्ध है।

(झ) क की सम्पदा का राजस्व की बकाया के लिये विक्रय विधान-मण्डल के एक ऐसे अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किया जाता है, जो व्यतिक्रम करने वाले को वह भू-सम्पदा खरीदने से प्रतिषिद्ध करता है। क के साथ बात तय करके ख क्रेता बन जाता है और यह करार करता है कि वह क से वह कीमत मिलने पर, जो ख ने दी है, वह सम्पदा क को हस्तान्तरित कर देगा। करार शून्य है क्योंकि उसका यह प्रभाव है कि वह संव्यवहार व्यतिक्रम करने वाले द्वारा किया गया क्रय बन जाता है और इस प्रकार उससे विधि का उद्देश्य विफल हो जायेगा।

(ञ) क, जो ख का मुख्तार है, उस असर को जो उस हैसियत में उसका ख पर है, ग के पक्ष मै  प्रयुक्त करने का वचन देता है और क को 1,000 रुपये देने का वचन ग देता है करार शून्य है, क्योंकि यह अनैतिक है ।

(ट) क अपनी पुत्री को उपपत्नी के रूप में रखे जाने के लिए ख को भाड़े पर देने के लिये करार करता है। करार शून्य है क्योंकि वह अनैतिक है, यद्यपि इस प्रकार भाड़े पर दिया जाना भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45 ) के अधीन दण्डनीय न हो।

शून्य करार

24. यदि प्रतिफल और उद्देश्य भागतः विधि-विरुद्ध हों तो करार शून्य होंगे -

यदि एक या अधिक उद्देश्यों के लिए किसी एकल प्रतिफल का कोई भाग, या किसी एक उद्देश्य के लिये कई प्रतिफलों में से कोई एक या किसी एक का कोई भाग विधिविरुद्ध हो तो करार शून्य है।

दृष्टान्त

क नील के वैध विनिर्माण का, और अन्य वस्तुओं में अवैध दुर्व्यापार का ख की ओर से अधीक्षण करने का वचन देता है। ख 10,000 रुपये वार्षिक संबलम् क को देने का वचन देता है। यह करार इस कारण शून्य है कि क के वचन का उद्देश्य और ख के वचन के लिये प्रतिफल भागत: विधिविरुद्ध है।

25. प्रतिफल के बिना करार शून्य है सिवाय जबकि वह लिखित तथा रजिस्ट्रीकृत हो, या की किसी बात के लिए प्रतिकर देने का वचन हो, या परिसीमा विधि द्वारा वारित किसी ऋण के संदाय का वचन हो –

प्रतिफल के बिना किया गया करार शून्य हैं, सिवाय जबकि वह-

(1) लिखित रूप में अभिव्यक्त और दस्तावेजों के रजिस्ट्रीकरण के लिये तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत और एक दूसरे के साथ निकट सम्बन्ध वाले पक्षकारों के बीच नैसर्गिक प्रेम और स्नेह के कारण किया गया हो; अथवा

(2) किसी ऐसे व्यक्ति को पूर्णत: या भागतः प्रतिकर देने के लिये वचन हो, जिसने वचनदाता के लिये स्वेच्छया पहले ही कोई बात कर दी हो अथवा ऐसी कोई बात कर दी हो जिसे करने के लिये वचनदाता वैध रूप से विवश किये जाने का दायी था; अथवा

(3) जिस ऋण का संदाय वादों की परिसीमा विषयक विधि द्वारा वारित न होने की दशा में लेनदार करा लेता, उसके पूर्णतः या भागतः संदाय के लिये उस व्यक्ति द्वारा जिसे उस वचन से भारित किया जाना है या तन्निमित्त साधारण या विशेष रूप से प्राधिकृत उसके अधिकर्ता द्वारा किया गया लिखित और हस्ताक्षरित वचन हो ।

इनमें से किसी भी दशा में ऐसा करार संविदा है।

स्पष्टीकरण 1 -

इस धारा की कोई भी बात वस्तुत: दिये गए किसी दान की विधिमान्यता पर, जहां तक कि दाता और आदाता के बीच का सम्बन्ध है, प्रभाव नहीं डालेगी।

स्पष्टीकरण 2 –

कोई करार, जिसके लिए वचनदाता की सम्मति स्वतंत्रता से दी गयी है, केवल इस कारण शून्य नहीं है कि प्रतिफल अपर्याप्त है, किन्तु इस प्रश्न को अवधारित करने में कि वचनदाता की सम्मति स्वतंत्रता से दी गयी थी या नहीं, प्रतिफल की अपर्याप्तता न्यायालय द्वारा गणना में भी ली जा सकेगी।

दृष्टान्त

(क) ख को किसी प्रतिफल के बिना 1,000 रुपये देने का क वचन देता है, यह करार शून्य है।

(ख) क नैसर्गिक प्रेम और स्नेह से अपने पुत्र ख को 1,000 रुपये देने का वचन देता है। ख के प्रति अपने वचन को क लेखबद्ध करता है और उसे रजिस्ट्रीकृत करता है। यह संविदा है।

(ग) ख की थैली क पड़ी पाता है और उसे उसको दे देता है। क को ख 50 रुपये देने का वचन देता है। यह संविदा है।

(घ) ख के शिशु पुत्र का पालन क करता है। वैसा करने में हुए क के व्ययों के संदाय का ख वचन देता है। यह संविदा है।

(ङ) ख के 1,000 रुपये क द्वारा देय हैं किन्तु वह ऋण परिसीमा अधिनियम द्वारा वारित है। क उस ऋण मद्धे ख को 500 रुपये देने का लिखित वचन हस्ताक्षरित करता है। यह संविदा है।

(च) क 1,000 रुपये के मूल्य के घोड़े को 10 रुपये में बेचने का करार करता है। इस करार के लिये क की सम्मति स्वतंत्रता से दी गयी थी। प्रतिफल अपर्याप्त होते हुए भी यह करार संविदा है।

(छ) क 1,000 रुपये के मूल्य के घोड़े को 10 रुपये में बेचने के लिए करार करता है। क इससे इन्कार करता है कि इस करार के लिये उसकी सम्मति स्वतंत्रता से दी गई थी।

प्रतिफल की अपर्याप्तता ऐसा तथ्य है जिसे न्यायालय को यह विचार करने में गणना में लेना चाहिये कि क की सम्मति स्वतंत्रता से दी गई थी या नहीं।

26. विवाह का अवरोधक करार शून्य है-

ऐसा हर करार शून्य है जो अप्राप्तवय से भिन्न किसी व्यक्ति के विवाह के अवरोधार्थ हो।

27. व्यापार का अवरोधक करार शून्य है-

हर करार जिसमें कोई व्यक्ति किसी प्रकार की विधिपूर्ण वृत्ति, व्यापार या कारबार करने से अवरुद्ध किया जाता हो, उस विस्तार तक शून्य है।

अपवाद 1- जिस कारबार की गुडविल बेच दी गई है उस कारबार को चलाने के करार की व्यावृत्ति -

वह व्यक्ति जो किसी कारबार की गुडविल का विक्रय करे, क्रेता से यह करार कर सकेगा कि वह विनिर्दिष्ट स्थानीय सीमाओं के अन्दर तब तक तत्सदृश कारबार चलाने से विरत रहेगा जब तक क्रेता या कोई ऐसा व्यक्ति जिसे उससे गुडविल का हक व्युत्पन्न हुआ हो, उन सीमाओं में तत्सदृश कारबार चलाता रहे; परन्तु यह तब जबकि उस कारबार की प्रकृति की दृष्टि से ऐसी सीमाएँ न्यायालय को युक्तियुक्त प्रतीत हों।

28. विधिक कार्यवाहियों के अवरोधक करार शून्य हैं-

हर करार-

(क) जिससे उसका कोई पक्षकार किसी संविदा के अधीन या बारे में अपने अधिकारों को मामूली अधिकरणों में प्रायिक विधिक कार्यवाहियों द्वारा प्रवर्तित कराने से आत्यन्तिकतः अवरुद्ध किया जाता है या जो उस समय को, जिसके भीतर वह अपने अधिकारों को इस प्रकार प्रवृत्त करा सकता है, परिसीमित कर देता हो; या

(ख) जो उसके किसी पक्षकार के अधिकारों को समाप्त कर देता है अथवा किसी संविदा के अधीन या बारे में किसी विनिर्दिष्ट समय तक किसी पक्षकार को अपने दायित्व के निर्वहन से उन्मोचित - कर देता है ताकि उसे अपने अधिकारों के प्रवर्तन से प्रतिबंधित किया जा सके;

उस विस्तार तक शून्य है ।

अपवाद 1- जो विवाद पैदा हो उसको माध्यस्थम् के लिये निर्देशित करने वाली संविदा की व्यावृत्ति -

यह धारा उस संविदा को अवैध नहीं कर देगी जिसके द्वारा दो या अधिक व्यक्ति, करार करें कि किसी विषय के या विषयों के किसी वर्ग के बारे में, जो विवाद उनके बीच पैदा हो, वह माध्यस्थम् के लिये निर्देशित किया जायेगा और कि ऐसे निर्दिष्ट विवाद के बारे में केवल यह रकम वसूलीय होगी जो ऐसे माध्यस्थम् में अधिनिर्णीत हो ।

अपवाद 2 - जो प्रश्न पहले ही पैदा हो चुके हैं उन्हें निर्देशित करने की संविदा की व्यावृत्ति-

और न यह धारा किसी ऐसी लिखित संविदा को अवैध कर देगी जिससे दो या अधिक व्यक्ति किसी प्रश्न को, जो उनके बीच पहले ही पैदा हो चुके हों, माध्यस्थम् के लिये निर्देशित करने का करार करे या माध्यस्थम् विषयक निर्देशों के बारे में किसी तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबन्ध पर प्रभाव डालेगी।

अपवाद 3 - बैंक या वित्तीय संस्थान के प्रत्याभूति करार की व्यावृत्ति -

यह धारा ऐसी किसी लिखित संविदा को अवैध नहीं बनाएगी जिसके द्वारा कोई बैंक अथवा वित्तीय संस्था अधिकारों के निर्वापन के लिये या ऐसी प्रत्याभूति या करार के अधीन था की बाबत किसी दायित्व से उसके किसी पक्षकार के उन्मोचन के लिये, किसी विनिर्दिष्ट कालावधि के पर्यवसान पर जो उक्त दायित्व से ऐसे पक्षकार के निर्वापन या उन्मोचन के लिये किसी विनिर्दिष्ट घटना के घटित होने या घटत न होने की तारीख से एक वर्ष से अन्यून हो किसी प्रत्याभूति या प्रत्याभूति के लिये प्रावधान करने वाले किसी करार में कोई निबंधन अनुबद्ध करे।

स्पष्टीकरण-

(i) अपवाद 3 में, पद "बैंक" से अभिप्रेत है-

(क) कोई 'बैंककार कम्पनी", जैसा कि बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (ग) में परिभाषित है;

(ख) कोई 'तत्समान नया बैंक", जैसा कि बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (घक) में परिभाषित है;

(ग) भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) की धारा 3 के अधीन गठित “भारतीय स्टेट बैंक”;

(घ) 'कोई सहायक बैंक" जैसा कि भारतीय स्टेट बैंक (सहायक बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) की धारा 2 के खण्ड (ट) में परिभाषित है;

(ङ) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (1976 का 21) की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक";

(च) कोई "सहकारी बैंक" जैसा कि बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (गगi) में यथा परिभाषित है;

(छ) "बहुराज्य सहकारी बैंक", जैसा कि बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (गग iii) में यथा परिभाषित किया गया है; और

(ii) अपवाद तीन में, अभिव्यक्ति "वित्तीय संस्थान" से कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क के अर्थान्तर्गत कोई सार्वजनिक वित्तीय संस्था से अभिप्रेत है।

29. करार अनिश्चितता के कारण शून्य है-

वे करार, जिनका अर्थ निश्चित नहीं है या निश्चित किया जाना शक्य नहीं है, शून्य हैं।

दृष्टान्त

(क) ख को क " एक सौ टन तेल" बेचने का करार करता है। उसमें यह दर्शित करने के लिये कुछ नहीं है कि किस तरह का तेल आशयित था। करार अनिश्चितता के कारण शून्य है।

(ख) ख को क, विनिर्दिष्ट वर्णन का एक सौ टन ऐसा तेल बेचने का करार करता है जो एक वाणिज्यिक वस्तु के रूप में ज्ञात है। यहां कोई अनिश्चितता नहीं है जिससे करार शून्य हो जाये

(ग) क, जो केवल नारियल के तेल का व्यवसायी है, ख को "एक सौ टन तेल" बेचने का करार करता है क के व्यापार की प्रकृति इन शब्दों का अर्थ उपदर्शित करती है और क ने एक सौ टम नारियल के तेल के विक्रय के लिये संविदा की है।

(घ) क "रामनगर में मेरे धान्य भण्डार में का सारा धान्य' ख को बेचने का करार करता है। यहां कोई अनिश्चितता नहीं है जिससे करार शून्य हो जाये।

(ङ) ख को "ग द्वारा नियत की जाने वाली कीमत पर एक हजार मन चावल" बेचने का करार क करता है। कीमत निश्चित की जा सकती है, इसलिये यहां कोई अनिश्चितता नहीं है जिससे करार शून्य हो जाये।

(च) ख को क" मेरा सफेद घोड़ा पांच सौ रुपये या एक हजार रुपये के लिये " बेचने का करार करता है। यह दर्शित करने के लिए कुछ नहीं है कि इन दो कीमतों में से कौन-सी दी जानी है। करार शून्य है ।

30. पंद्यम् के तौर के करार शून्य हैं-

पंद्यम् के तौर के करार शून्य हैं, और किसी ऐसी चीज की वसूली के लिये कोई वाद न लाया जायेगा, जो पंद्यम् पर जीती गयी अभिकथित हो, या जो किसी व्यक्ति को किसी ऐसे खेल या अन्य अनिश्चित घटना के, जिसके बारे में कोई पंद्यम् किया गया हो, परिणाम के अनुसार व्ययनित की जाने को न्यस्त की गई हो।

घुड़दौड़ के लिये कतिपय पारितोषिकों के पक्ष में अपवाद -

यह धारा ऐसे चन्दे या अभिदाय को, या चन्दा देने या अभिदाय करने के ऐसे करार को विधिविरुद्ध बना देने वाली न समझी जायेगी जो किसी घुड़दौड़ के विजेता या विजेताओं को प्रदेय किसी ऐसे प्लेट, पारितोषिक या धनराशि के लिये या मद्धे दिया या किया जाये, जिसका मूल्य या रकम पांच सौ रुपये या उससे अधिक हो।

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 294क पर प्रभाव न पड़ेगा- 

इस धारा की कोई भी बात घुड़दौड़ से सम्बन्धित किसी ऐसे संव्यवहार को, जिसे भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45 ) की धारा 294क लागू है, वैध बना देने वाली नहीं समझी जायेगी।

 

 

 

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