
"अभिकर्ता" वह व्यक्ति है जो किसी अन्य की ओर से कोई कार्य करने के लिये या पर व्यक्तियों से व्यवहारों में किसी अन्य का प्रतिनिधित्व करने के लिये नियोजित है। वह व्यक्ति जिसके लिये ऐसा कार्य किया जाता है या जिसका इस प्रकार प्रतिनिधित्व किया जाता है, "मालिक" कहलाता है।
वह व्यक्ति, जो उस विधि के अनुसार जिसके वह अध्यधीन है, प्राप्तवय हो और स्वस्थ-चित्त हो, अभिकर्ता नियोजित कर सकेगा।
जहाँ तक कि मालिक और पर-व्यक्तियों के बीच का सम्बन्ध है कोई भी व्यक्ति अभिकर्ता हो सकेगा, किन्तु कोई भी व्यक्ति, जो प्राप्तवय और स्वस्थचित्त न हो, अभिकर्ता ऐसे न हो सकेगा कि वह अपने मालिक के प्रति तन्निमित्त एतस्मिन् अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अनुसार उत्तरदायी हो।
अभिकरण के सर्जन के लिये कोई प्रतिफल आवश्यक नहीं है।
अभिकर्ता का प्राधिकार अभिव्यक्त या विवक्षित हो सकेगा।
प्राधिकार अभिव्यक्त कहा जाता है जब कि वह मौखिक या लिखित शब्दों द्वारा दिया जाये। प्राधिकार विवक्षित कहा जाता है जब कि उसका अनुमान मामले की परिस्थितियों से करना हो और मौखिक या लिखित बातों या व्यवहार के मामूली अनुक्रम की मामले की परिस्थितियों में गणना की जा सकेगी।
क, जो स्वयं कलकत्ते में रहता है, सीरामपुर में एक दुकान का स्वामी है और उस दुकान पर वह कभी- कभी जाता है। दुकान का प्रबन्ध ख द्वारा किया जाता है और क की जानकारी में वह दुकान के प्रयोजनों के लिये क के मामले में ग से माल आदिष्ट करता रहता है और क के कोष में से उसके लिये संदाय करता रहता है। दुकान के प्रयोजनों के लिये क के नाम से ग से माल आदिष्ट करने का क की ओर से ख को विवक्षित प्राधिकार है।
किसी कार्य को करने का प्राधिकार रखने वाला अभिकर्ता हर ऐसी विधिपूर्ण बात करने का प्राधिकार रखता है जो ऐसा कार्य करने के लिये आवश्यक हो ।
किसी कारबार को चलाने का प्राधिकार रखने वाला अभिकर्ता हर ऐसी विधिपूर्ण बात करने का प्राधिकार रखता है जो ऐसे कारबार के संचालन के प्रयोजन के लिये आवश्यक हो या उसके अनुक्रम में प्राय: की जाती हो ।
(क) ख, जो लन्दन में रहता है, अपने को शोध्य ऋण मुम्बई में वसूल करने के लिये क को नियोजित करता है। क उस ऋण को वसूल करने के प्रयोजनों के लिये आवश्यक कोई भी विधिक प्रक्रिया अपना सकेगा और उसके लिये विधिमान्य उन्मोचन दे सकेगा ।
(ख) क अपना पोत-निर्माता का कारबार चलाने के लिये ख को अपना अभिकर्ता बनाता है। ख उस कारबार को चलाने के प्रयोजन के लिये काष्ठ और अन्य सामग्री खरीद सकेगा और कर्मकारों को भाड़े पर रख सकेगा।
अभिकर्ता को आपात में यह प्राधिकार है कि हानि से अपने मालिक की संरक्षा करने के प्रयोजन से सारे ऐसे कार्य करे जैसे मामूली प्रज्ञावाला व्यक्ति अपने मामले में वैसे ही परिस्थितियों में करता ।
(क) विक्रय-अभिकर्ता माल की मरम्मत करा सकेगा, यदि आवश्यक हो ।
(ख) ख को, जो कलकत्ते में हैं, क इस निदेश के साथ रसद परेषित करता है कि वह उसे तुरन्त ही ग के पास कटक भेज दे। यदि वह रसद कटक की यात्रा में खराब होने से नहीं बच सकती तो ख वह रसद कलकत्ते में बेच सकेगा।
कोई अभिकर्ता उन कार्यों के पालन के लिये, जिनका स्वयं अपने द्वारा पालन किये जाने का भार उसने अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से लिया हो किसी अन्य व्यक्ति का विधिपूर्वक नियोजन तब के सिवाय नहीं कर सकेगा जब कि उपाभिकर्ता का नियोजन व्यापार की मामूली रूढ़ि के अनुसार किया जा सकता हो या अभिकरण की प्रकृति के अनुसार करना आवश्यक हो।
उपाभिकर्ता वह व्यक्ति है जो अभिकरण के कारबार में मूल अभिकर्ता द्वारा नियोजित हो और उनके नियंत्रण के अधीन कार्य करता हो।
जहाँ कि उपाभिकर्ता उचित तौर पर नियुक्त किया गया है वहां, जहां तक पर व्यक्तियों का सम्बन्ध है, मालिक का प्रतिनिधित्व वह उपाभिकर्ता करता है, और मालिक उसके कार्यों से ऐसे ही आबद्ध और उसके लिए ऐसे ही उत्तरदायी है मानो वह मालिक द्वारा मूलत: नियुक्त अभिकर्ता हो ।
अभिकर्ता उपाभिकर्ता के कार्यों के लिये मालिक के प्रति उत्तरदायी है।
उपाभिकर्ता अपने कार्यों के लिये अभिकर्ता के प्रति उत्तरदायी है, किन्तु कपट या जानबूझकर किये गये दोष की दशा को छोड़कर मालिक के प्रति उत्तरदायी नहीं है।
जहाँ कि किसी अभिकर्ता ने उपाभिकर्ता नियुक्त करने के प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति को उपाभिकर्ता की हैसियत में कार्य करने के लिये नियुक्त किया हो वहां अभिकर्ता की उस व्यक्ति के प्रति हैसियत वैसी है जैसी अभिकर्ता के प्रति मालिक की होती है और वह उसके कार्यों के लिये मालिक और पर व्यक्तियों दोनों के प्रति उत्तरदायी है; ऐसा नियोजित व्यक्ति मालिक का प्रतिनिधित्व नहीं करता और न उसके कार्यों के लिए मालिक उत्तरदायी है और न वह मालिक के प्रति उत्तरदायी है ।
जहाँ तक वह अभिकर्ता, जो अधिकरण के कारबार में मालिक की ओर से कार्य करने के लिये किसी अन्य व्यक्ति को नामित करने का अभिव्यक्त या विवक्षित प्राधिकार रखता है, किसी अन्य व्यक्ति को तदनुसार नामित कर देता है वहां ऐसा व्यक्ति उपाभिकर्ता नहीं है वरन् वह अभिकरण के कारबार के ऐसे भाग के लिये, जो उसे सौंपा गया हो, मालिक का अभिकर्ता है।
(क) क अपने सालिसिटर ख को अपनी सम्पदा नीलाम द्वारा बेचने और उस प्रयोजन के लिए एक नीलामकर्ता नियोजित करने का निदेश देता है। ख विक्रय संचालन के लिए एक नीलामकर्ता ग को नामित करता है। ग उपाभिकर्ता नहीं है वरन् विक्रय संचालन के लिये क का अभिकर्ता है।
(ख) क कलकत्ते के एक वणिक ख को ग एण्ड कम्पनी द्वारा अपने को शोध्य धन वसूल करने के लिये प्राधिकृत करता है। सालिसिटर घ को ख उस धन की वसूली के लिये ग एण्ड कम्पनी के विरुद्ध विधिक कार्यवाही करने का आदेश देता है। घ उपाभिकर्ता नहीं है वरन् क का सालिसिटर है।
अपने मालिक के लिए ऐसा अभिकर्ता चुनने में अभिकर्ता उतना ही विवेक प्रयुक्त करने के लिए आबद्ध है जितना मामूली प्रज्ञावाला व्यक्ति अपने निजी मामले में करता और यदि वह ऐसा करता है तो वह ऐसे चुने गये अभिकर्ता के कार्यों या उपेक्षा के लिये मालिक के प्रति उत्तरदायी नहीं है।
(क) क अपने लिए एक पोत खरीदने के लिये ख को, जो एक वणिक है, अनुदेश देता है। ख अच्छी ख्याति वाले एक पोत-सर्वेक्षक को क के लिये पोत पसन्द करने को नियोजित करता है। वह सर्वेक्षक पसन्द करने में उपेक्षा बरतता है और पोत तरण अयोग्य निकलता है और नष्ट हो जाता है। क के प्रति ख़ नहीं वरन् वह सर्वेक्षक उत्तरदायी है।
(ख) ख को, जो एक वणिक है, क विक्रय के लिये माल परेषित करता है। ख सम्यक् अनुक्रम में अच्छे प्रत्यय वाले एक नीलामकर्ता को क का माल बेचने के लिये नियोजित करता है, और नीलामकर्ता को विक्रय के आगम प्राप्त करने के लिये अनुज्ञात करता है। नीलामकर्ता तत्पश्चात् उन आगमों का लेखा-जोखा दिये बिना दिवालिया हो जाता है। ख उन आगमों के लिये क के प्रति उत्तरदायी नहीं है।
जहाँ कि कार्य एक व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति के निमित्त किन्तु उसके ज्ञान या प्राधिकार के बिना किये जाते हैं वहां वह निर्वाचित कर सकेगा कि ऐसे कार्यों का अनुसमर्थन करे या अनंगीकरण करे। यदि वह उनका अनुसमर्थन करे तो उन कार्यों के वैसे ही परिणाम होंगे मानों वे उसके प्राधिकार से किये गये थे।
अनुसमर्थन अभिव्यक्त या उस व्यक्ति के आचरण से, जिसकी ओर से वे कार्य किये जाते हैं, विवक्षित हो सकेगा।
(क) क प्राधिकार के बिना ख के लिये माल खरीदता है। तत्पश्चात् ख उन्हें ग़ को अपने लेखे बेच देता है। ख के आचरण से विवक्षित है कि उसने क द्वारा उसके लिये किये गये क्रय का अनुसमर्थन किया है।
(ख) ख के प्राधिकार के बिना क ख का धन ग को उधार देता है। तत्पश्चात् ख उस धन पर से ब्याज प्रतिगृहीत करता है। ख के आचरण से विवक्षित है कि उसने उस उधार का अनुसमर्थन किया है।
कोई भी विधिमान्य अनुसमर्थन ऐसे व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता जिसका मामले के तथ्यों का ज्ञान तत्वतः त्रुटियुक्त हो ।
जो व्यक्ति अपनी ओर से किये गये किसी अप्राधिकृत कार्य का अनुसमर्थन करता है, वह उस सम्पूर्ण संव्यवहार का अनुसमर्थन करता है जिसका ऐसा कार्य भाग हो ।
एक व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति की ओर से ऐसे दूसरे व्यक्ति के प्राधिकार के बिना किया गया कोई ऐसा कार्य, जो यदि प्राधिकार से किया जाता तो किसी पर व्यक्ति को नुकसानी के अध्यधीन करने या किसी पर व्यक्ति के किसी अधिकार या हितं का पर्यवसान करने का प्रभाव रखता, अनुसमर्थन के द्वारा ऐसा प्रभाव रखने वाला नहीं बनाया जा सकता ।
(क) ख द्वारा तदर्थ प्राधिकृत किये गये बिना ख की ओर से ग से क यह मांग करता है कि ख की कोई जंगम वस्तु, जोग के कब्जे में हैं, ग परिदत्त कर दे। वह मांग ख द्वारा ऐसे अनुसमर्थित नहीं की जा सकती कि ग परिदान से अपने इन्कार के लिये नुकसानी का दायी हो जाये।
(ख) तीन मास की सूचना पर पर्यवसेय एक पट्टा ख से क धारण करता है। एक अप्राधिकृत व्यक्ति ग पट्टे के पर्यवसान की सूचना क को देता है। यह सूचना ख द्वारा ऐसे अनुसमर्थित नहीं की जा सकती कि वह क पर आबद्धकर हो जाये।
अभिकरण का पर्यवसान मालिक द्वारा अपने प्राधिकार के प्रतिसंहरण से, अथवा अभिकर्ता द्वारा अभिकरण के कारबार के त्यजन से, अथवा अभिकरण के कारबार के पूरे हो जाने से, अथवा मालिक के या अभिकर्ता के मर जाने या विकृतचित्त हो जाने से, अथवा मालिक किसी ऐसे तत्समय प्रवृत्त अधिनियम के उपबन्धों के अधीन, जो दिवालिया ऋणियों के अनुतोष के लिये हो, दिवालिया न्यायनिर्णीत किये जाने से हो जाता है।
जहाँ कि उस सम्पत्ति में, जो अभिकरण की विषयवस्तु हो, अभिकर्ता का कोई हित हो वहां अभिव्यक्त संविदा के अभाव में अभिकरण का पर्यवसान ऐसे नहीं किया जा सकता कि उस हित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
(क) ख को क यह प्राधिकार देता है कि वह क की भूमि बेच दे और उस विक्रय के आगमों में से उन ऋणों का संदाय कर ले जो उसे क द्वारा शोध्य है। क इस प्राधिकार का प्रतिसंहरण नहीं कर सकता और न क की उन्मत्तता या मृत्यु से उस प्राधिकार का पर्यवसान हो सकता है।
(ख) क रुई की 1,000 गांठें ख को, जिसने उसे ऐसी रुई पर अग्रिम धन दिया है, परेषित करता है और ख से वांछा करता है कि ख उस रुई को बेचे और उसकी कीमत में से अपने अग्रिम धन की रकम का प्रतिसंदाय कर ले। क इस प्राधिकार का प्रतिसंहरण नहीं कर सकता है और न उसकी उन्मत्तता या मृत्यु से उस प्राधिकार का पर्यवसान होता है।
पूर्वगामी अन्तिम धारा द्वारा अन्यथा उपबन्धित दशा को छोड़कर, मालिक अपने अभिकर्ता को दिये गये प्राधिकार का प्रतिसंहरण उसके ऐसे उपयोग किये जाने से पूर्व कि मालिक आबद्ध हो जाये किसी भी समय कर सकेगा।
मालिक अपने अभिकर्ता को दिये गये प्राधिकार का प्रतिसंहरण उस प्राधिकार के भागतः प्रयोग के पश्चात् नहीं कर सकता जहां तक कि उस अभिकरण में पहले ही किये गये कार्यों से उद्भूत कार्यों और बाध्यताओं का सम्बन्ध हो ।
(क) ख को क प्राधिकृत करता है कि वह क के लेखे रुई की 1,000 गांठें खरीद ले और क का जो धन ख के पास बचा हुआ है उसमें से उनके लिये संदाय कर दे। ख रुई की 1,000 गांठें अपने नाम में इस प्रकार खरीद लेता है कि उनकी कीमत के लिये वह स्वयं वैयक्तिक तौर पर दायी हो जाता है। जहां तक कि उस रुई के लिये संदाय करने का सम्बन्ध है ख के प्राधिकार का प्रतिसंहरण क नहीं कर सकता।
(ख) ख को क प्राधिकृत करता है कि वह क के लेखे रुई की 1,000 गांठें खरीद ले और क का जो धन ख के पास बचा हुआ है उसमें से उनके लिये संदाय कर दे। ख रुई की 1,000 गांठें क के नाम में इस प्रकार खरीद लेता है कि उनकी कीमत के लिये वह स्वयं वैयक्तिक तौर पर दायी नहीं होता। क उस रुई के संदाय के लिये ख के प्राधिकार का प्रतिसंहरण कर सकता है।
जहाँ कि यह अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा हो कि अभिकरण को किसी कालावधि के लिये चालू रहना है वहां पर्याप्त कारण के बिना अभिकरण के किसी पूर्वतन प्रतिसंहरण या त्यजन का प्रतिकर यथास्थिति, अभिकर्ता को मालिक या मालिक को अभिकर्ता देगा।
ऐसे प्रतिसंहरण या त्यजन की युक्तियुक्त सूचना देनी होगी, अन्यथा यथास्थिति, मालिक को या अभिकर्ता को तद्द्वारा होने वाले नुकसान की प्रतिपूर्ति एक को दूसरा करेगा।
प्रतिसंहरण और त्यजन अभिव्यक्त हो सकेगा अथवा मालिक या अभिकर्ता के अपने-अपने आचरण द्वारा विवक्षित हो सकेगा।
क अपना गृह भाड़े पर देने के लिये ख को सशक्त करता है। तत्पश्चात् क स्वयं उसे भाड़े पर दे देता है। यह ख के प्राधिकार का विवक्षित प्रतिसंहरण है।
अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान, जहां तक अभिकर्ता से सम्बन्ध है, उसे उसका ज्ञान होने से पूर्व अथवा जहाँ तक पर-व्यक्तियों से सम्बन्ध है उन्हें उसका ज्ञान होने से पूर्व, प्रभावी नहीं होता।
(क) ख को क अपनी ओर से माल बेचने का निर्देश देता है और माल की जो कीमत मिले उस पर ख को पांच प्रतिशत कमीशन देने का करार करता है। तत्पश्चात् क पत्र द्वारा ख के प्राधिकार का प्रतिसंहरण करता है। ख उस पत्र के भेजे जाने के पश्चात् किन्तु उसकी प्राप्ति से पूर्व माल को 100 रुपये में बेच देता है। क इस विक्रय से आबद्ध है और ख पांच रुपये कमीशन का हकदार है।
(ख) क, जो मद्रास में है, पत्र द्वारा अपनी ओर से ख को मुम्बई में एक भाण्डागार में रखी हुई कुछ रुई बेचने का निदेश देता है और तत्पश्चात् पत्र द्वारा उसके विक्रय प्राधिकार का प्रतिसंहरण करता है और ख को उस रुई को मद्रास भेजने का निदेश देता है। ख, दूसरा पत्र पाने के पश्चात् ग के साथ, जिसे पहले पत्र का तो ज्ञान है किन्तु दूसरे का नहीं, उस रुई को उसे बेचने की संविदा करता है। ख को ग उसकी कीमत संदत्त कर देता है और ख उसे लेकर फरार हो जाता है। क के विरुद्ध ग का संदाय प्रभावी है।
(ग) क अपने अभिकर्ता ख को अमुक धनराशि ग को देने का निर्देश देता है। क मर जाता है और घ उसकी बिल का प्रोबेट लेता है। क की मृत्यु के पश्चात् किन्तु मृत्यु की खबर सुनने से पूर्व ग को ख रुपये संदत्त कर देता है। निष्पादक घ के विरुद्ध यह संदाय प्रभावी है।
जबकि मालिक की मृत्यु हो जाने या उसके विकृतचित्त हो जाने से अभिकरण का पर्यवसान हो जाये तब अभिकर्ता अपने को न्यस्त हितों के संरक्षण और परिरक्षण के लिये अपने भूतपूर्व मालिक के प्रतिनिधियों की ओर से सभी युक्तियुक्त कदम उठाने के लिये आबद्ध है।
अभिकर्ता के प्राधिकार का पर्यवसान उन सब उपाभिकर्ताओं के, जो उसने नियुक्त किये हों, प्राधिकार का ( उन नियमों के अध्यधीन, जो अभिकर्ता के प्राधिकार के पर्यवसान के बारे में एतस्मिन् अन्तर्विष्ट है) पर्यवसान कारित कर देता है।
अभिकर्ता अपने मालिक के | कारबार का संचालन मालिक द्वारा दिये गये निदेशों के अनुसार, या ऐसे निदेशों के अभाव में, उस रूढ़ि के अनुसार, करने के लिये आबद्ध है जो उस स्थान पर, जहां अभिकर्ता ऐसे कारबार का संचालन करता है, उसी किस्म का कारबार करने में प्रचलित हो। जबकि अभिकर्ता अन्यथा कार्य करे तब यदि कोई हानि हो तो उसे उसके लिये अपने मालिक की प्रतिपूर्ति करनी होगी और यदि कोई लाभ हो तो उसे उसका लेखा देना होगा।
(क) क एक अभिकर्ता, जो ख की ओर से ऐसा कारबार करने में लगा है, जिसमें यह रूढ़ि है कि | समय-समय पर जो रुपये हाथ में आएं उसे ब्याज पर विनिहित कर दिया जाये, उसका वैसा विनिधान करने का लोप करता है। ख के प्रति उस ब्याज की प्रतिपूर्ति, जो इस प्रकार के विनिधानों से प्रायः अभिप्राप्त होता है, क को करनी होगी।
(ख) एक दलाल, ख, जिसके कारबार में उधार बेचने की रूढ़ि नहीं है, क का माल ग को जिसका प्रत्यय उस समय बहुत ऊंचा है, उधार बेचता है ग संदाय करने से पूर्व दिवालिया हो जाता है। क की इस हानि की प्रतिपूर्ति ख को करनी होगी।
अभिकर्ता अभिकरण के कारबार का संचालन उतने कौशल से करने के लिये आबद्ध है जितना वैसे कारबार में लगे हुए व्यक्तियों में साधारणत: होता है, जब तक कि मालिक को उसके कौशल के अभाव की सूचना न हो। अभिकर्ता सदा ही युक्तियुक्त तत्परता से कार्य करने के लिये और उसका जितना कौशल है उसे उपयोग में लाने के लिये और अपनी स्वयं की उपेक्षा, कौशल के अभाव या अवचार के प्रत्यक्ष परिणामों की बाबत अपने मालिक को प्रतिकर देने के लिये आबद्ध है, किन्तु ऐसी हानि या नुकसान की बाबत नहीं जो ऐसी उपेक्षा, कौशल के अभाव या अवचार में अप्रत्यक्षतः या दूरस्थतः कारित हो ।
(क) कलकत्ते के एक वणिक क का एक अभिकर्ता ख लन्दन में है जिसे ख के लेखे में कुछ धन इस आदेश के साथ दिया जाता है कि वह उसे भेज दे। ख उस धन को बहुत समय तक रखे रखता है। उस धन के न मिलने के फलस्वरूप क दिवालिया हो जाता है। ख उस धन के लिये और जिस तारीख को वह दे दिया जाना चाहिये था उस तारीख से प्रायिक दर पर ब्याज के लिये और किसी प्रत्यक्ष हानि के लिये, उदाहरणार्थ विनिमय दर में फेरफार के लिये दायी है; किन्तु इससे अतिरिक्त के लिये नहीं ।
(ख) माल के विक्रय के लिये एक अभिकर्ता क, जिसे उधार बेचने का प्राधिकार है, ख की शोधनक्षमता के बारे में उचित और प्रायिक जांच किये बिना ख को उधार माल बेचता है। इस विक्रय के समय ख दिवालिया है। उससे हुई हानि के लिये क अपने मालिक को प्रतिकर देगा।
(ग) पोत का बीमा करने के लिये ख द्वारा नियोजित एक बीमा दलाल क इस बात का ध्यान रखने का लोप करता है कि बीमे की पालिसी में वे उपबन्ध रखे जायें, जो प्रायः रखे जाते हैं, तत्पश्चात् पोत नष्ट हो जाता है। उन उपबन्धों के न होने के परिणामस्वरूप निम्नांककों से कुछ वसूल नहीं किया जा सकता। ख की उस हानि की प्रतिपूर्ति करने के लिये क आबद्ध है।
(घ) इंग्लैण्ड का एक वणिक क, मुम्बई के अपने अभिकर्ता ख को, जिसने अभिकरण प्रतिगृहीत किया है, रुई की 100 गांठें अमुक पोत में अपने को भेजने का निदेश देता है। ख की शक्ति में यह बात थी कि वह रुई भेज दे किन्तु वह ऐसा करने का लोप करता है। वह पोत सकुशल इंग्लैण्ड पहुंच जाता है। उसके पहुंचने के तुरन्त पश्चात् रुई की कीमत चढ़ जाती है। ख लाभ की प्रतिपूर्ति क के प्रति करने को आबद्ध है जो क रुई की उन 100 गांठों में से उस समय कमाता जिस समय पोत पहुंचा किन्तु इस लाभ की पूर्ति के लिये नहीं जो पश्चात्वर्ती बढ़ोत्तरी के कारण होता।
अभिकर्ता अपने मालिक की मांग पर उचित लेखा देने के लिये आबद्ध है।
अभिकर्ता का यह कर्तव्य है कि कठिनाई की दशाओं में अपने मालिक से सम्पर्क रखने और उसके अनुदेश अभिप्राप्त करने में समस्त युक्तियुक्त तत्परता बरते।
यदि कोई अभिकर्ता अपने मालिक की सम्मति पहले से अभिप्राप्त किये बिना और उसको उन सब तात्विक परिस्थितियों से, जो उस विषय पर उसके अपने ज्ञान में आई हों, परिचित कराये बिना, अभिकरण के कारबार में अपने ही लेखे व्यवहार करे तो, यदि मामले से यह दर्शित हो कि या तो कोई तात्विक तथ्य अभिकर्ता द्वारा बेईमानी से मालिक से छिपाया गया है या अभिकर्ता के व्यवहार मालिक के लिए अहितकर रहे हैं, तो मालिक उस व्यवहार का निराकरण कर सकेगा।
दृष्टान्त
(क) क अपनी सम्पदा बेचने का निदेश ख को देता है ख उस सम्पदा को ग के नाम में अपने लिये खरीद लेता है। यह पता लगने पर कि ख ने सम्पदा अपने लिये खरीदी है क उस विक्रय का निराकरण कर सकेगा यदि वह यह दर्शित कर सके कि ख ने बेईमानी से कोई तात्विक तथ्य छिपाया है या वह विक्रय उसके लिये अहितकर रहा है।
(ख) क अपनी सम्पदा बेचने का निदेश ख को देता है। ख बेचने से पूर्व उस सम्पदा को देखने पर यह जान जाता है कि सम्पदा में एक खान है जो क को ज्ञात नहीं है। क को ख सूचित करता है कि वह सम्पदा अपने लिये खरीदना चाहता है किन्तु खान की बात छिपा लेता है। क खान के अस्तित्व को न जानते हुए ख को खरीदने देता है। क यह जानने पर कि ख सम्पदा को खरीदने के समय खान के बारे में जानता था, उस विक्रय को अपने विकल्प पर निराकृत या अंगीकृत कर सकेगा।
यदि कोई अभिकर्ता अपने मालिक के ज्ञान के बिना अभिकरण के कारबार में अपने मालिक के लेखे व्यवहार करने के बजाय अपने ही लेखे व्यवहार करता है तो मालिक अभिकर्ता से उस फायदे का दावा करने का हकदार है जो अभिकर्ता को उस संव्यवहार से हुआ हो।
क अपने लिये अमुक गृह खरीदने का निदेश अपने अभिकर्ता ख को देता है। क से ख कहता है कि वह खरीदा नहीं जा सकता और उसे अपने लिये खरीद लेता है। यह जांचने पर कि ख ने गृह खरीद लिया है क उसे वह घर अपने को उस कीमत पर जो ख ने दी हो, बेचने के लिये विवश कर सकेगा।
अभिकर्ता अधिकरण के कारबार में मालिक के लेखे प्राप्त राशियों में से उन सब धनों का, जो उसे कारबार के संचालन में उसके द्वारा दिये गये अग्रिमों या उचित रूप से उपगत व्ययों के लिये उसको शोध्य हो, और ऐसे पारिश्रमिक का भी, जो ऐसे अभिकर्ता के तौर पर कार्य करने के लिये उसे देय हो, प्रतिधारण कर सकेगा।
ऐसी कटौतियों के अध्यधीन अभिकर्ता मालिक की उन सब राशियों को संदाय करने के लिये आबद्ध है जो मालिक के लेखे उसे प्राप्त हुई हों।
किसी विशेष संविदा के अभाव में, किसी कार्य के पालन के लिये संदाय अभिकर्ता को तब तक शोध्य नहीं होता जब तक वह कार्य पूरा न हो जाये, किन्तु अभिकर्ता बेचे गये माल के लेखे उसे प्राप्त धनराशियों को प्रतिधृत कर सकेगा यद्यपि विक्रय के लिये उसे परेषित माल सारे का सारा बेचा न जा सका हो, या विक्रय वस्तुतः पूर्ण न हुआ हो।
वह अभिकर्ता, जो अभिकरण के कारबार में अवचार का दोषी है, कारबार के उस भाग के बारे में, जिसे उसने अवचारित किया है, किसी पारिश्रमिक का हकदार नहीं है।
(क) ग से 1,00,000 रुपये वसूल करने और उन्हें अच्छी प्रतिभूति पर लगाने के लिये ख को क नियोजित करता है। ख उन 1,00,000 रुपयों को वसूल करता है और 90,000 रुपये अच्छी प्रतिभूति पर लगाता है किन्तु 10,000 रुपये ऐसी प्रतिभूति पर लगाता है जिसका बुरा होना उसे ज्ञात होना चाहिये था। इसके फलस्वरूप क को 2,000 रुपये की हानि होती है। ख 1,00,000 रुपये वसूल करने के लिये और 90,000 रुपये विनिहित करने के लिये पारिश्रमिक पाने का हकदार है। वह 10,000 रुपये विनिहित करने के लिये किसी पारिश्रमिक का हकदार नहीं है और उसे क को 2,000 रुपये की प्रतिपूर्ति करनी होगी।
(ख) ग से 1,000 रुपये वसूल करने के लिये ख को क नियोजित करता है। ख के अवचार से वह धन वसूल नहीं होता । ख अपनी सेवाओं के लिये किसी भी पारिश्रमिक का हकदार नहीं है और उसे हानि की प्रतिपूर्ति करनी होगी।
तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में अभिकर्ता को यह हक है कि उसे प्राप्त मालिक का माल, कागज पत्र और अन्य सम्पत्ति, चाहे वह जंगम हो या स्थावर, तब तक प्रतिधारित किये रहे जब तक उसे तत्सम्बन्धी कमीशन संवितरणों और सेवाओं की बाबत शोध्य रकम दे न दी जाये या उसका लेखा समझा न दिया जाये।
अभिकर्ता का नियोजक उन सब विधिपूर्ण कार्यों के परिणामों के लिये अभिकर्ता की क्षतिपूर्ति करने के लिये आबद्ध है जो उस अभिकर्ता ने उसे प्रदत्त प्राधिकार के प्रयोग में किये हों।
दृष्टान्त
(क) कलकत्ते क के अनुदेशों के अधीन ग को कुछ माल परिदान करने के लिये ग से ख सिंगापुर में संविदा करता है। ख को क माल नहीं भेजता और ग संविदा भंग के लिये ख पर बाद लाता है। क को ख वाद की इत्तिला देता है और क उसे वाद में प्रतिरक्षा करने के लिये प्राधिकृत करता है। ख वाद में प्रतिरक्षा करता है और नुकसानी तथा खर्च देने के लिये विवश किया जाता है और वह व्यय उपगत करता है क ऐसी नुकसानी, खर्ची और व्ययों के लिये ख के प्रति दायी है।
(ख) कलकत्ते का एक दलाल ख वहां के एक वणिक् कके आदेशों के अनुसार ग से क के लिये दस पीपे तेल खरीदने की संविदा करता है। तत्पश्चात् क वह तेल लेने से इन्कार कर देता है और ख पर ग वाद लाता है। क को ख इत्तिला देता है। क संविदा का पूर्णतः निराकरण कर देता है। ख प्रतिरक्षा करता है किन्तु असफल रहता है और उसे नुकसानी और खर्चे देने पड़ते हैं और व्यय उठाने पड़ते हैं; क ऐसी नुकसानी, खर्चों और व्ययों के लिये ख के प्रति दायी है।
जहाँ कि एक व्यक्ति किसी दूसरे को कोई कार्य करने के लिये नियोजित करता है और वह अभिकर्ता उस कार्य को सद्भाव से करता है वहां वह नियोजक उस कार्य के परिणामों के लिये अभिकर्ता की क्षतिपूर्ति करने का दायी है यद्यपि वह कार्य पर व्यक्तियों के अधिकारों को क्षति करता हो।
(क) क, एक डिक्रीदार, जो ख के माल के विरुद्ध उस डिक्री का निष्पादन कराने का हकदार है, कुछ माल को ख का माल व्यपदिष्ट करके न्यायालय के ऑफीसर से अपेक्षा करता है कि वह उस माल को अभिगृहीत कर ले। ऑफीसर उस माल का अभिग्रहण करता है और उस माल के वास्तविक स्वामी ग द्वारा वाद लाया जाता है। क उस राशि के लिये उस ऑफीसर की क्षतिपूर्ति करने का दायी है जिसे वह क के निदेशों के पालन के परिणामस्वरूप ग को देने के लिये विवश किया जाता है।
(ख) क की प्रार्थना पर ख उस माल को बेचता है जो क के कब्जे में तो है किन्तु जिसके व्ययन का क को कोई अधिकार नहीं था। ख यह बात नहीं जानता और विक्रय के आगम क को दे देता है। तत्पश्चात् ख पर उस माल का वास्तविक स्वामी ग बाद लाता है और माल का मूल्य और खर्चा वसूल कर लेता है। ग को जो कुछ देने के लिये ख विवश किया गया है उसकी और ख के अपने व्ययों की क्षतिपूर्ति करने के लिये ख के प्रति के दायी है।
जहाँ कि एक व्यक्ति किसी दूसरे को ऐसा कार्य करने के लिये नियोजित करता है, जो आपराधिक हो, वहां नियोजक उस कार्य के परिणामों के लिये अभिकर्ता की क्षतिपूर्ति न तो अभिव्यक्त और न विवक्षित वचन के आधार पर करने का दायी है।
(क) ग को पीटने के लिये ख को क नियोजित करता है और उस कार्य के सब परिणामों के लिये उसकी क्षतिपूर्ति करने का करार करता है। ख तदुपरि ग को पीटता है और वैसा करने के लिये उसे ग को नुकसानी देनी पड़ती है। क उस नुकसानी के लिये ख की क्षतिपूर्ति करने का दायी नहीं है।.
(ख) ख, एक समाचारपत्र का स्वत्वधारी, क की प्रार्थना पर उस पत्र में ग के विरुद्ध एक अपमान-लेख प्रकाशित करता है और क उस प्रकाशन के परिणामों और उसके सम्बन्ध में जो भी अनुयोजन हो उसके सब खर्ची और नुकसानी के लिये ख की क्षतिपूर्ति करने का करार करता है। ख पर ग द्वारा वाद लाया जाता है और उसे नुकसानी देनी पड़ती है और व्यय भी उठाना पड़ता है। उक्त क्षतिपूर्ति वचन के आधार पर ख के प्रति क दायी नहीं है।
मालिक की उपेक्षा से या कौशल के अभाव से उसके अभिकर्ता को कारित क्षति के लिये मालिक अभिकर्ता को प्रतिकर देगा।
क एक गृह बनाने के लिये ख को राज के तौर पर नियोजित करता है और पाड़ स्वयं ही लगाता है। पाड़ कौशलहीनता से लगाई गई है और परिणामतः ख उपहत होता है। ख को क प्रतिकर देगा।
अभिकर्ता के माध्यम से की गई संविदाओं और अभिकर्ता द्वारा किये गये कार्यों से उद्भूत बाध्यतायें उसी प्रकार प्रवर्तित कराई जा सकेंगी और उनके वे ही विधिक परिणाम होंगे मानों वे संविदायें और कार्य मालिक द्वारा किये गये हों ।
(क) ख से माल क यह जानते हुए कि ख उनके विक्रय के लिये अभिकर्ता है, किन्तु यह न जानते हुए कि मालिक कौन है, खरीदता है। ख का मालिक क से उस माल की कीमत का दावा करने का हकदार है, और मालिक द्वारा लाये गये बाद में मालिक के दावे के विरुद्ध क वह ऋण जो उसे ख से शोध्य हो, मुजरा नहीं करा सकता।
(ख) ख का अभिकर्ता क, जिसे उसकी ओर से धन प्राप्त करने का प्राधिकार है, ग से ख को शोध्य कुछ धनराशि प्राप्त करता है। उक्त धन ख को देने की बाध्यता से ग उन्मोचित हो जाता है।
जबकि कोई अभिकर्ता उससे अधिक करता है जितना करने के लिये वह प्राधिकृत है और जब कि जो कुछ वह करता है उसका वह भाग जो उसके प्राधिकार के भीतर है, उस भाग से, जो उसके प्राधिकार के परे है, पृथक् किया जा सकता है तो जो कुछ वह करता है उसका केवल उतना ही भाग, जितना उसके प्राधिकार के भीतर है, उसके और उसके मालिक के बीच आबद्धकर है।
क, जो एक पोत और स्थोरा का स्वामी है, ख को उस पोत का 4,000 रुपये का बीमा उपाप्त करने के लिये प्राधिकृत करता है ख पोत का 4,000 रुपये का एक बीमा और स्थोरा का समान राशि का दूसरा बीमा उपास करता है। क पोत के बीमे के लिये प्रीमियम देने को आबद्ध है, किन्तु स्थोरा के बीमे के लिये प्रीमियम देने को नहीं।
जहाँ कि अभिकर्ता उससे अधिक करता है जितना करने के लिये वह प्राधिकृत है और अपने प्राधिकार के विस्तार के परे जो कुछ वह करता है वह उससे पृथक् नहीं किया जा सकता जो उसके राधिकार के भीतर है, वहां मालिक उस संव्यवहार को मान्यता देने के लिये आबद्ध नहीं है।
क, अपने लिये 500 भेड़ें खरीदने के लिये ख को प्राधिकृत करता है। ख 6,000 रुपये की एक राशि में 500 भेड़ें और 200 मेमने खरीद लेता है क सम्पूर्ण संव्यवहार का निराकरण कर सकेगा।
अभिकर्ता को दी गयी किसी सूचना या उसके द्वारा अभिप्राप्त किसी जानकारी का, जहां तक कि मालिक और पर व्यक्तियों का सम्बन्ध है, वही विधिक परिणाम होगा मानो वह मालिक को दी गयी या उसके द्वारा अभिप्राप्त की गयी हो, परन्तु यह तब जब कि वह अभिकर्ता द्वारा मालिक के लिये संव्यवहृत कारबार के अनुक्रम में दी या अभिप्राप्त की गयी हो।
(क) ग से वह माल जिसका ग दृश्यमान स्वामी है खरीदने के लिये ख द्वारा क नियोजित किया जाता है और वह तदनुसार उसे खरीदता है। विक्रय की बातचीत के अनुक्रम में क को पता चलता है कि वह माल वास्तव में घ का है किन्तु ख को यह तथ्य ज्ञात नहीं है ग से अपने को शोध्य एक ऋण उस माल की कीमत के विरुद्ध मुजरा करने का ख हकदार नहीं है।
(ख) ग से वह माल जिसका ग दृश्यमान स्वामी है खरीदने के लिये ख द्वारा क नियोजित किया जाता है। क इस प्रकार नियोजित होने से पूर्व ग का सेवक था और तब उसे मालूम हुआ था कि वह माल वास्तव में घ का है, किन्तु ख को यह तथ्य ज्ञात नहीं है। अपने अभिकर्ता को यह ज्ञात होते हुए भी ग से अपने को शोध्य ऋण ख उस माल की कीमत के विरुद्ध मुजरा कर सकेगा।
किसी तत्प्रभावी संविदा के अभाव में कोई भी अभिकर्ता अपने मालिक की ओर से अपने द्वारा की गयी संविदाओं का प्रवर्तन वैयक्तिक रूप से नहीं करा सकता और न वैयक्तिक रूप से उनसे आबद्ध होता है।
ऐसी संविदा के अस्तित्व की उपधारणा निम्नलिखित दशाओं में की जायेगी-
(1) जहाँ कि संविदा किसी अभिकर्ता द्वारा किसी विदेश निवासी वणिक की ओर से माल के विक्रय या क्रय के लिये की गई हो ।
(2) जहाँ कि अभिकर्ता अपने मालिक का नाम प्रकट नहीं करता।
(3) जहाँ कि मालिक पर, यद्यपि उसका नाम प्रकट कर दिया गया हो, वाद नहीं लाया जा सकता।
यदि कोई अभिकर्ता ऐसे व्यक्ति से संविदा करे, जो न तो वह जानता हो और न यह सन्देह करने का कारण रखता हो कि वह अभिकर्ता है, तो अभिकर्ता का मालिक यह अपेक्षा कर सकेगा कि संविदा का पालन किया जाये, किन्तु संविदा करने वाला दूसरा पक्षकार उस मालिक के विरुद्ध वे ही अधिकार रखता है जो वह उस अभिकर्ता के विरुद्ध रखता यदि वह अभिकर्ता मालिक होता।
यदि मालिक संविदा पूर्ण होने के पूर्व अपने आपको प्रकट कर दे तो संविदा करने वाला दूसरा पक्षकार उस संविदा का पालन करने से इन्कार कर सकेगा यदि वह यह दर्शित कर सके कि यदि उसे यह ज्ञात होता कि संविदा में मालिक कौन है या यदि उसे यह ज्ञात होता कि वह अभिकर्ता मालिक नहीं है तो उसने वह संविदा न की होती।
जहाँ कि एक. व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के साथ, यह न जानते हुए और यह सन्देह करने का युक्तियुक्त आधार न रखते हुए कि वह दूसरा व्यक्ति एक अभिकर्ता है, संविदा करता है वहां यदि मालिक उस संविदा के पालन की अपेक्षा करे तो वह ऐसा पालन, अभिकर्ता और संविदा के दूसरे पक्षकार के बीच विद्यमान अधिकारों और बाध्यताओं के अध्यधीन ही अभिप्राप्त कर सकता है।
क जो ख को 500 रुपये का देनदार है, ख को 1,000 रुपये का चावल बेचता है। क इस संव्यवहार में ग के लिये अभिकर्ता के रूप में कार्य कर रहा है, किन्तु ख न तो जानता ही है और न यह सन्देह करने का युक्तियुक्त आधार ही रखता है कि बात ऐसी है। ख को क का ऋण मुजरा देने की अनुज्ञा दिये बिना ख को चावल लेने के लिये ग विवश नहीं कर सकता।
उन मामलों में जिनमें कि अभिकर्ता वैयक्तिक रूप से दायी हो, उससे व्यवहार करने वाला व्यक्ति या तो उसको या उसके मालिक को या उन दोनों को दायी ठहरा सकेगा।
रुई की 100 गांठ ख को बेचने की संविदा उससे क करता है और तत्पश्चात् उसे पता चलता है कि ग की ओर से ख अभिकर्ता के रूप में कार्य कर रहा था। क उस रुई की कीमत के लिये या तो ख पर या ग पर या दोनों पर बाद ला सकेगा।
जबकि कोई व्यक्ति, जिसने किसी अभिकर्ता से संविदा की हो, उस अभिकर्ता को इस विश्वास पर कार्य करने के लिये उत्प्रेरित करे कि केवल मालिक ही दायी ठहराया जायेगा या मालिक को इस विश्वास पर कार्य करने के लिये उत्प्रेरित करे कि केवल अभिकर्ता ही दायी ठहराया जायेगा तब वह यथास्थिति, अभिकर्ता या मालिक को तत्पश्चात् दायी नहीं ठहरा सकता।
जो व्यक्ति अपने को किसी दूसरे का प्राधिकृत अभिकर्ता होना असत्यतः व्यपदिष्ट करता है और तद्द्वारा किसी पर व्यक्ति को उत्प्रेरित करता है कि वह उसे अभिकर्ता मानकर उसके साथ व्यवहार करे, यदि उसका अभिकथित नियोजक उसके कार्यों का अनुसमर्थन न करे तो, वह उस पर व्यक्ति की उस हानि या नुकसान के बारे में जो उस पर व्यक्ति ने ऐसे व्यवहार करने द्वारा उठाया है, प्रतिकर देने का दायी होगा।
वह व्यक्ति, जिससे अभिकर्ता की हैसियत में संविदा की गयी है, उसके पालन की अपेक्षा करने का हकदार नहीं है, यदि वह वास्तव में अभिकर्ता के तौर पर नहीं, वरन् स्वयं अपने लेखे कार्य कर रहा था।
जब कि अभिकर्ता ने प्राधिकार के बिना अपने मालिक की ओर से कार्य किये हों या पर- व्यक्तियों के प्रति बाध्यतायें उपगत की हों तब मालिक ऐसे कार्यों या बाध्यताओं से आबद्ध होगा, यदि मालिक ने अपने शब्दों या आचरण से ऐसे पर व्यक्तियों को यह विश्वास करने के लिये उत्प्रेरित किया हो कि ऐसे कार्य और बाध्यतायें उस अभिकर्ता के प्राधिकार के विस्तार के भीतर थीं।
(क) क विक्रय के लिये माल ख को प्रेषित करता है और उसे अनुदेश देता है कि वह उसे नियत कीमत से कम पर न बेचे। ख को दिये गये अनुदेशों को न जानते हुये ग आरक्षित कीमत से कम कीमत पर उस माल को खरीदने की ख से संविदा करता है। क उस संविदा से आबद्ध है।
(ख) क ऐसी परक्राम्य लिखत, जिन पर निरंक पृष्ठांकन है, ख के पास न्यस्त करता है। क के प्राइवेट आदेशों का अतिक्रमण कर ख उन्हें ग को बेच देता है। विक्रय ठीक है।
अपने कारबार के अनुक्रम में अपने मालिकों की ओर से कार्य करते हुए अभिकर्ताओं द्वारा किये गये दुर्व्यपदेशन या कपट ऐसे अभिकर्ताओं द्वारा किये गये करारों पर वे ही प्रभाव रखते हैं मानों ऐसे दुर्व्यपदेशन या कपट उन मालिकों द्वारा किये गये हों, किन्तु अभिकर्ताओं द्वारा ऐसे विषयों में, जो उनके प्राधिकार के भीतर नहीं आते, किये गये दुर्व्यपदेशन या कपट का उनके मालिकों पर प्रभाव नहीं पड़ता।
(क) क, जो माल के विक्रय के लिये ख का अभिकर्ता है, एक दुर्व्यपदेशन द्वारा, जिसे करने के लिये वह ख द्वारा प्राधिकृत नहीं था, ग को उसे खरीदने के लिये उत्प्रेरित करता है। जहां तक कि ख और ग के बीच का सम्बन्ध है, संविदा ग के विकल्प पर शून्यकरणीय है।
(ख) ख के पोत का कप्तान क, वहनपत्रों पर उनमें वर्णित माल को पोत पर प्राप्त किये बिना ही, हस्ताक्षर करता है। जहां तक ख और अपदेशी परेषक का सम्बन्ध है, वहनपत्र शून्य हैं।