
वह संविदा, जिसके द्वारा एक पक्षकार दूसरे पक्षकार को स्वयं वचनदाता के आचरण से या किसी अन्य व्यक्ति के आचरण से उस दूसरे पक्षकार को हुई हानि से बचाने का वचन देता है, " क्षतिपूर्ति को संविदा" कहलाती है।
क ऐसी कार्यवाहियों के परिणामों के लिये जो ग 200 रुपये की अमुक राशि के सम्बन्ध में ख के विरुद्ध चलाये, ख की क्षतिपूर्ति करने की संविदा करता है। यह क्षतिपूर्ति की संविदा है।
क्षतिपूर्ति की संविदा का वचनगृहीता, अपने प्राधिकार के क्षेत्र के भीतर कार्य करता हुआ, वचनदाता से निम्नलिखित वसूल करने का हकदार है-
(1) वह सब नुकसानी, जिसके संदाय के लिये वह ऐसे किसी वाद में विवश किया जाये जो किसी ऐसी बात के बारे में हो; जिसे क्षतिपूरी करने का वह वचन लागू हो;
(2) वे सब खर्चे, जिनको देने के लिये, वह ऐसे किसी बाद में विवश किया जाये; यदि वह वाद लाने या प्रतिरक्षा करने में उसने वचनदाता के आदेशों का उल्लंघन न किया हो और इसप्रकार कार्य किया हो जिस प्रकार कार्य करना क्षतिपूर्ति की किसी संविदा के अभाव में उसके लिये प्रज्ञायुक्त होता; अथवा यदि वचनदाता ने वह वाद लाने या प्रतिरक्षा करने के लिये उसे प्राधिकृत किया हो;
(3) वे सब धनराशियां, जो उसने ऐसे किसी बाद के किसी समझौते के निबन्धनों के अधीन दी हों, यदि वह समझौता वचनदाता के आदेशों के प्रतिकूल न रहा हो और ऐसा रहा हो जैसा समझौता क्षतिपूर्ति की संविदा के सभाव में वचनगृहीता के लिये करना प्रज्ञायुक्त होता अथवा यदि वचनदाता ने उस वाद का समझौता करने के लिये उसे प्राधिकृत किया हो।
" प्रत्याभूति की संविदा" किसी पर व्यक्ति द्वारा व्यतिक्रम की दशा में उसके वचन का पालन या उसके दायित्व का निर्वहन करने की संविदा है। वह व्यक्ति जो प्रत्याभूति देता है "प्रतिभू" कहलाता है, वह व्यक्ति, जिसके व्यतिक्रम के बारे में प्रत्याभूति दी जाती है 'मूलऋणी' कहलाता है, और वह व्यक्ति जिसको प्रत्याभूति दी जाती है, " लेनदार " 'कहलाता है। प्रत्याभूति या तो मौखिक या लिखित हो सकेगी।
मूलऋणी के फायदे के लिये की गयी कोई भी बात या दिया गया कोई वचन प्रतिभू द्वारा प्रत्याभूति दिये जाने का पर्याप्त प्रतिफल हो सकेगा।
(क) क से ख माल उधार बेचने और परिदत्त करने की प्रार्थना करता है क वैसा करने को इस शर्त पर रजामन्द हो जाता है कि ग माल की कीमत के संदाय की प्रत्याभूति दे। के के इस वचन के प्रतिफलस्वरूप कि वह माल परिदान करेगा ग संदाय की प्रत्याभूति देता है। यह ग के वचन के लिये पर्याप्त प्रतिफल है।
(ख) ख को क माल बेचता और परिदत्त करता है। ग तत्पश्चात् क से प्रार्थना करता है कि वह एक वर्ष तक ऋण के लिये ख पर बाद लाने से प्रविरत रहे और वचन देता है कि यदि वह ऐसा करेगा तो ख द्वारा संदाय में व्यतिक्रम होने पर ग उस माल के लिये संदाय करेगा। क यथाप्रार्थित प्रविरत रहने के लिये रजामन्द हो जाता है। यह ग के वचन के लिये पर्याप्त प्रतिफल है।
(ग) ख को क माल बेचता है और परिदत्त करता है। ग तत्पश्चात् प्रतिफल के बिना करार करता है कि ख द्वारा व्यतिक्रम होने पर वह माल के लिये संदाय करेगा। करार शून्य है।
प्रतिभू का दायित्व मूलॠणी के दायित्व के समविस्तीर्ण है जब तक कि संविदा द्वारा अन्यथा उपबन्धित न हो।
ख को क एक विनिमय-पत्र के प्रतिग्रहीता ग द्वारा संदाय की प्रत्याभूति देता है। विनिमय-पत्र ग द्वारा अनादृत किया जाता है। क न केवल उस विनिमयपत्र की रकम के लिये, बल्कि उन ब्याज और प्रभारों के लिये भी, जो उस पर शोध्य हो गये हों, दायी है।
वह प्रत्याभूति जिसका विस्तार संव्यवहारों की किसी आवली पर हो ""चलत प्रत्याभूति" कहलाती है।
(क) क इस बात के प्रतिफलस्वरूप कि ख अपनी जमींदारी के भाटकों का संग्रह करने के लिये ग को नौकर रखेगा ग द्वारा उन भाटकों के सम्यक् संग्रह और संदाय के लिये 5,000 रुपये की रकम तक उत्तरदायी होने का ख को वचन देता है। यह चलत प्रत्याभूति है।
(ख) क एक चाय के व्यापारी ख को, उस चाय के लिये, जिसका वह ग को समय-समय पर प्रदाय करे, 100 पौण्ड तक की रकम का संदाय करने की प्रत्याभूति देता है। ग को ख उपर्युक्त 100 पौंड से अधिक मूल्य की चाय का प्रदाय करता है और ग उसके लिये ख को संदाय कर देता है। तत्पश्चात् ग को ख 200 पौंड मूल्य की चाय का प्रदाय करता है ग संदाय करने में असफल रहता है। क द्वारा की गयी प्रत्याभूति चलत प्रत्याभूति थी, और तदनुसार वह ख के प्रति 100 पौंड तक का दायी है।
(ग) ख़ द्वारा ग को परिदत्त किये जाने वाले आटे के पांच बोरों की कीमत के, जो एक मास में दी जानी है, संदाय के लिये ख को क प्रत्याभूति देता है। ग को ख पांच बोरे परिदत्त करता है। ग उनके लिये संदाय कर देता है। ख तत्पश्चात् ग को चार बोरे देता है जिसका संदाय ग नहीं करता है। क द्वारा दी गई प्रत्याभूति चलत प्रत्याभूति नहीं थी और इसलिये वह उन चार बोरों की कीमत के लिए दायी नहीं है।
चलत प्रत्याभूति का भावी संव्यवहारों के बारे में प्रतिसंहरण लेनदार को सूचना द्वारा किसी समय भी प्रतिभू कर सकेगा।
(क) ऐसे विनिमय पत्रों को, जो ग के पक्ष में हो, क की प्रार्थना पर ख द्वारा मितोकाटे पर भुगतान के प्रतिफलस्वरूप ख को क ऐसे सब विनिमयपत्रों पर 5,000 रुपये तक सम्यक् संदाय की प्रत्याभूति बारह मास के लिये देता है। 2,000 रुपये तक के ऐसे विनिमयपत्रों को, जो ग के पक्ष में हैं, ख मितीकाटे पर भुगतान करता है, तत्पश्चात् तीन मास का अन्त होने पर क उस प्रत्याभूति का प्रतिसंहरण कर लेता है। यह प्रतिसंहरण क को ख के प्रति किसी भी पश्चातवर्ती मितीकाटे पर भुगतान के लिये समस्त दायित्व से उन्मोचित कर देता है। किन्तु ग द्वारा व्यतिक्रम होने पर, क उन 2,000 रुपयों के लिये ख के प्रति दायी है।
(ख) ख को क, 1,000 रुपये तक की यह प्रत्याभूति देता है कि ग उन सब विनिमय-पत्रों का, जो ख उसके नाम लिखेगा, संदाय करेगा। ग के नाम ख विनिमयपुत्र लिखता है। ग उस विनिमयपत्र को प्रतिगृहीत करता है । क प्रतिसंहरण की सूचना देता है। ग उस विनिमयपत्र को उसके परिपक्व होने पर अनादृत कर देता है। क अपनी प्रत्याभूति के अनुसार दायी है।
चलत प्रत्याभूति को, जहां तक कि उसका भावी संव्यवहारों से सम्बन्ध है, प्रतिभू की मृत्यु तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में प्रतिसंहृत कर देती है।
जब कि दो व्यक्ति किसी दायित्व को अपने ऊपर लेने की किसी तृतीय व्यक्ति से संविदा करते हैं और वे दोनों एक-दूसरे के साथ भी यह संविदा करते हैं कि एक के व्यतिक्रम पर ही दूसरा दायी होगा, जिस संविदा का वह तृतीय व्यक्ति पक्षकार नहीं है, तब ऐसे दोनों व्यक्तियों में से हर एक के उस तृतीय व्यक्ति के प्रति प्रथम संविदा के अधीन दायित्व पर उस दूसरी संविदा के अस्तित्व का प्रभाव नहीं पड़ता, यद्यपि उस तृतीय व्यक्ति को उसके अस्तित्व की जानकारी रही हो।
क और ख संयुक्त और पृथक् दायित्व वाला एक वचनपत्र ग के पक्ष में लिख देते हैं। क उसे वास्तव में ख के प्रतिभू रूप में लिखता है और जिस समय वह वचनपत्र लिखा जाता है ग यह बात जानता है। यह तथ्य कि क ने यह वचनपत्र ख के प्रतिभू के रूप में ग की जानकारी में लिखा था वचनपत्र के आधार पर क के विरुद्ध ग द्वारा किये गये वाद का कोई उत्तर नहीं है।
जो भी फेरफार मूल ऋणी और लेनदार के बीच की संविदा के निबन्धनों में प्रतिभू की सम्मति के बिना किया जाये, वह उस फेरफार के पश्चात्वर्ती संव्यवहारों के बारे में प्रतिभू का उन्मोचन कर देता है।
(क) ग के बैंक में प्रबन्धक के तौर पर ख के आचरण के लिये ग के प्रति क प्रतिभू होता है। तत्पश्चात् क की सम्मति के बिना ख और ग संविदा करते हैं कि ख का संबलम् बढ़ा दिया जायेगा और ओवरड्राफ्टों से हुई हानि की एक चौथाई का ख दायी होगा। ख एक ग्राहक को ओवरड्राफ्ट करने देता है और बैंक को कुछ धन की हानि होती है। क उसकी सम्मति के बिना किये गये फेरफार के कारण अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित हो जाता है, और इस हानि को पूरा करने का दायी नहीं है।
(ख) क एक ऐसे पद पर ख के रहते हुए उसके अवचार के विरुद्ध ग को प्रत्याभूति देता है जिस पद पर ग द्वारा ख नियुक्त किया जाता है और जिसके कर्तव्य विधानमण्डल के एक अधिनियम द्वारा परिभाषित हैं। एक पश्चातवर्ती अधिनियम द्वारा उस पद की प्रकृति तात्विक रूप से बदल दी जाती है। तत्पश्चात् ख अवचार करता है। इस तब्दीली के कारण क अपनी प्रत्याभूति के अधीन भावी दायित्व से उन्मोचित हो जाता है, यद्यपि ख का वह अवचार ऐसे कर्तव्य के सम्बन्ध में है जिस पर पश्चातवर्ती अधिनियम का प्रभाव नहीं पड़ता ।
(ग) ग अपना माल बेचने के लिये वार्षिक सम्बलम् पर ख को अपना लिनिक नियुक्त करने का करार इस बात पर करता है कि ऐसे लिपिक के नाते ख द्वारा प्राप्त धन का उसके द्वारा सम्यक् हिसाब किये जाने के लिये ग के प्रति क प्रतिभू हो जाये। तत्पश्चात् क के ज्ञान या सम्मति के बिना ग और ख करार करते हैं कि ख को पारिश्रमिक उसके द्वारा बेचे गये माल पर कमीशन के रूप में न कि नियत सम्बलम् के रूप में, दिया जायेगा। ख के पश्चातवर्ती अवचार के लिये क दायी नहीं है।
(घ) ग द्वारा ख को उधार प्रदाय किये जाने वाले तेल के लिये क 3,000 रुपये तक की चलत प्रत्याभूति ग को देता है। तत्पश्चात् ख संकट में पड़ जाता है और क के ज्ञान के बिना ख और ग संविदा करते हैं कि ख को ग नकद धन पर तेल प्रदाय करता रहेगा और वे संदाय, जो किये जायें, ख और ग के उस समय वर्तमान ऋणों के लिये उपयोजित किये जायेंगे। क इस नये ठहराव के पश्चात् दिये गये किसी भी माल के लिये अपनी प्रत्याभूति के अधीन संदाय का दायी नहीं है।
(ङ) ख को पहली मार्च को 5,000 रुपये उधार देने की संविदा ग करता है। क उस ऋण के प्रतिसंदाय की प्रत्याभूति करता है। ग 5,000 रुपये ख को पहली जनवरी को दे देता है। क अपने दायित्व से उन्मोचित हो जाता है, क्योंकि संविदा में यह फेरफार हो गयी है कि ग रुपयों के लिये ख पर पहली मार्च से पूर्व वाद ला सकता है।
लेनदार और मूलऋणी के बीच किसी ऐसी संविदा से, जिसके द्वारा मूल ऋणी निर्मुक्त हो जाये या लेनदार के किसी ऐसे कार्य या लोप से, जिसका विधिक परिणाम मूलऋणी का उन्मोचन हो, प्रतिभू उन्मोचित हो जाता है।
(क) ग द्वारा ख को प्रदाय किये जाने वाले माल के लिये ग को क प्रत्याभूति देता है। ख को गं माल प्रदाय करता है और तत्पश्चात् ख संकट में पड़ जाता है और अपने लेनदारों से (जिनके अन्तर्गत ग भी है) उनकी मांगों से अपने को निर्मुक्त किये जाने के प्रतिफलस्वरूप उनको अपनी सम्पत्ति समनुदेशित करने की संविदा करता है। यहां ग के साथ की गयी इस संविदा द्वारा ख अपने ऋण से निर्मुक्त हो जाता है और क अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित हो जाता है।
(ख) क अपनी भूमि पर नील की फसल उगाने और उसे नियत दर पर ख को परिदत्त करने की संविदा ख से करता है और ग इस संविदा के के द्वारा पालन किये जाने की प्रत्याभूति देता है। ख एक जलधारा को जो क की भूमि की सिंचाई के लिये आवश्यक है, मोड़ देता है और तद्द्द्वारा उसे नील उगाने से निवारित कर देता है। ग अब अपनी प्रत्याभूति पर दायी नहीं रहा।
(ग) ख के लिए एक गृह अनुबद्ध समय के भीतर और नियत कीमत पर बनाने की संविदा ख से क करता है, जिसके लिये आवश्यक काष्ठ ख द्वारा दिया जायेगा। ग इस संविदा के के द्वारा पालन किये जाने की प्रत्याभूति देता है। ख काष्ठ देने का लोप करता है ग अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित हो जाता है।
लेनदार और मूलऋणी के बीच ऐसी संविदा जिससे लेनदार मूलऋणी के साथ समझौता कर लेता है या उसे समय देने या उस पर वाद न लाने का वचन देता है, प्रतिभू को तब के सिवाय उन्मोचित कर देती है जबकि प्रतिभू ऐसी संविदा के लिए अनुमति दे देता है।
जहाँ कि मूल ऋणी को समय देने की संविदा लेनदार द्वारा किसी पर व्यक्ति से, न कि मूलऋणी से की जाती है, वहां प्रतिभू उन्मोचित नहीं होता।
दृष्टान्त
ग एक ऐसे अतिशोध्य विनिमयपत्र का धारक है, जिसे क ने ख के प्रतिभू के रूप में लिखा और ख ने प्रतिगृहीत किया है। ख को समय देने की संविदा ङ से ग करता है। क उन्मोचित नहीं होता।
मूल ऋणी पर वाद लाने से या उसके विरुद्ध किसी अन्य उपचार को प्रवर्तित करने से लेनदार का प्रविरत रहना मात्र, प्रत्याभूति में तत्प्रतिकूल उपबन्ध के अभाव में, प्रतिभू को उन्मोचित नहीं करता।
ख एक ऋण का, जिसकी प्रत्याभूति क ने दी है, ग को देनदार है। ऋण देय हो जाता है। ऋण के देय हो जाने के पश्चात् एक वर्ष तक ख पर ग वाद नहीं लाता क अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित नहीं होता।
जहाँ कि सह-प्रतिभू हो वहाँ लेनदार द्वारा उनमें से एक की निर्मुक्ति अन्यों को उन्मोचित नहीं करती और न यह ऐसे निर्मुक्त-प्रतिभू को अन्य प्रतिभुओं के प्रति अपने उत्तरदायित्व से मुक्त करती है।
यदि लेनदार कोई ऐसा कार्य करे जो प्रतिभू के अधिकारों से असंगत हो या किसी ऐसे कार्य को करने का लोप करे जिसके किये जाने की प्रतिभू के प्रति उसका कर्तव्य अपेक्षा करता हो और मूलऋणी के विरुद्ध प्रतिभू के अपने पारिणामिक उपचार का तद्द्द्वारा ह्रास हो तो प्रतिभू उन्मोचित हो जायेगा।
(क) ग के लिये ख निश्चित धनराशि के बदले एक पोत निर्माण करने की संविदा करता है, जो धनराशि, काम के जैसे-जैसे अमुक प्रक्रमों तक पहुंचे, वैसे-वैसे किस्तों में दी जानी है। ख द्वारा संविदा के सम्यक् पालन के लिये ग के प्रति क प्रतिभू हो जाता है क के ज्ञान के बिना ख को अन्तिम दो किस्तों का पूर्व संदाय ग कर देता है। इस पूर्व संदाय के कारण क उन्मोचित हो जाता है।
(ख) ख के फर्नीचर के ऐसे विक्रयाधिकारपत्र के साथ, जो ग को यह शक्ति देता है कि वह फर्नीचर बेच दे और उसके आगमों को वचनपत्र के उन्मोचन में उपयोजित कर ले ग के पक्ष में ख द्वारा और ख के प्रतिभू के रूप में क द्वारा लिखे गये संयुक्त एवं पृथक् वचनपत्र की प्रतिभूति पर ख को ग धन उधार देता है। तत्पश्चात् ग उस फर्नीचर को बेच देता है, किन्तु उस उपचार और उसके द्वारा जानबूझकर की गयी उपेक्षा के कारण केवल थोड़ी कीमत प्राप्त होती है। क उस वचनपत्र के दायित्व से उन्मोचित हो जाता है।
(ग) ङ को ख के पास शिक्षु के रूप में क रखता है और ख को ङकी विश्वस्तता की प्रत्याभूति देता है। ख अपनी ओर से वचन देता है कि वह प्रति मास कम से कम एक बार देख लेगा कि ङने रोकड़ का मिलान कर लिया है। ख ऐसा करने का लोप करता है और ङगबन कर लेता है। ख के प्रति क अपनी प्रत्याभूति पर दायी नहीं है।
जहाँ कि कोई प्रत्याभूत ॠण शोध्य हो गया हो, या प्रत्याभूत कर्तव्य के पालन में मूल ऋणी से व्यतिक्रम हो गया हो वहाँ वे सब अधिकार, जो लेनदार को मूलऋणी के विरुद्ध प्राप्त हों, प्रतिभू द्वारा उस सब के, जिसके लिये वह दायी हो, संदाय या पालन पर प्रतिभू में विनिहित हो जाते हैं।
प्रतिभू हर ऐसी प्रतिभूति के फायदे का हकदार है जो उस समय, जब प्रतिभूत्व की संविदा की जाये, लेनदार को मूल ऋणी के विरुद्ध प्राप्त हो, चाहे प्रतिभू उस प्रतिभूति के अस्तित्व को जानता हो या नहीं, और यदि लेनदार उस प्रतिभूति को खो दे या प्रतिभू की सम्मति के बिना उस प्रतिभूति को विलग कर दे तो प्रतिभू उस प्रतिभूति के मूल्य के परिमाण तक उन्मोचित हो जायेगा।
(क) क की प्रत्याभूति पर ग अपने अभिधारी ख को 2,000 रुपये उधार देता है ग के पास उन 2,000 रुपयों के लिए ख के फर्नीचर के बन्धक के रूप में एक और प्रतिभूति है। ग उस बन्धक को रद्द कर देता है। ख दिवालिया हो जाता है और ख की प्रत्याभूति के आधार पर क के विरुद्ध ग बाद लाता है। क उस फर्नीचर के मूल्य की रकम तक दायित्व से उन्मोचित हो गया है।
(ख) एक लेनदार ग को, जिसका ख को दिया हुआ उधार डिक्री द्वारा प्रतिभूत है, उस उधार के लिये क से भी प्रत्याभूति मिलती है। तत्पश्चात् ग उस डिक्री के निष्पादन में ख के माल को कुर्क करा लेता है, और तब क को जानकारी के बिना उस निष्पादन का प्रत्याहरण कर लेता है। क उन्मोचित हो जाता है।
(ग) ग से ख के लिये उधार प्राप्त करने को ख के साथ संयुक्ततः क एक बन्धपत्र ख के प्रतिभू के तौर पर ग को लिख देता है। तत्पश्चात् गं उसी ऋण के लिये ख से एक अतिरिक्त प्रतिभूति अभिप्राप्त करता है। तत्पश्चात् ग उस अतिरिक्त प्रतिभूति को छोड़ देता है। क उन्मोचित नहीं होता है।
कोई भी प्रत्याभूति, जो लेनदार द्वारा या उसके ज्ञान और अनुमति से संव्यवहार के तात्विक भाग के बारे में दुर्व्यपदेशन से अभिप्राप्त की गई है, अविधिमान्य है।
कोई भी प्रत्याभूति जो लेनदार ने तात्विक परिस्थिति के बारे में मौन धारण से अभिप्राप्त की है, अविधिमान्य है।
(क) क अपने लिये रुपये का संग्रहण करने के लिये ख को लिपिक के तौर पर रखता है। ख़ अपनी कुल प्रासियों का सम्यक् लेखा देने में असफल रहता है और परिणामस्वरूप क उससे यह अपेक्षा करता है कि वह अपने द्वारा सम्यक् रूप से लेखा दिये जाने के लिये प्रतिभूति दे। ख द्वारा सम्यक् रूप से लेखा दिये जाने की प्रत्याभूति ग दे देता है। ग को ख के पिछले आचरण से क अवर्गत नहीं करता है। तत्पश्चात् ख लेखा देने में व्यतिक्रम करता है। प्रत्याभूति अविधिमान्य है।
(ख) ग द्वारा ख को 2,000 टन परिमाण तक प्रदाय किये जाने वाले लोहे के लिये संदाय की प्रत्याभूति ग को क देता है। ख और ग ने प्राइवेट तौर पर करार कर लिया है कि ख बाजार दाम से पांच रुपया प्रति टन अधिक देगा जो अधिक रकम एक पुराने ऋण के समापन में उपयोजित की जायेगी। यह करार क से छिपाया गया है। क प्रतिभू के तौर पर दायी नहीं है।
जहाँ कि कोई व्यक्ति इस संविदा पर प्रत्याभूति देता है कि लेनदार उस पर तब तक कार्य नहीं करेगा जब तक कि कोई अन्य व्यक्ति सह प्रतिभू के रूप में उसमें सम्मिलित नहीं हो जाता, वहां यदि वह अन्य व्यक्ति सम्मिलित नहीं होता तो वह प्रत्याभूति विधिमान्य नहीं है।
प्रत्याभूति की हर संविदा में प्रतिभू की क्षतिपूर्ति किये जाने का मूल ऋणी का विवक्षित वचन रहता है, और प्रतिभू किसी भी धनराशि को, जो उसने प्रत्याभूति के अधीन अधिकारपूर्वक दी हो; मूलऋणी से वसूल करने का हकदार है, किन्तु उन धनराशियों को नहीं जो उसने अनधिकारपूर्वक दी हो।
(क) ग का ख ऋणी है और क उस ऋण के लिये प्रतिभू है ग संदाय की मांग क से करता है और उसके इन्कार करने पर उस रकम के लिये उस पर वाद लाता है। प्रतिरक्षा के लिये युक्तियुक्त आधार होने से क बाद में प्रतिरक्षा करता है, किन्तु वह ऋण की रकम को खर्च समेत संदत्त करने के लिये विवश किया जाता है। वह मूल ऋण तथा अपने द्वारा दी गयी खर्चे की रकम को भी ख से वसूल कर सकता है।
(ख) ख को ग कुछ धन उधार देता है, और ख की प्रार्थना पर क, उस रकम को प्रतिभूत करने के लिये खद्वारा क के ऊपर लिखे गये विनिमयपत्र को प्रतिगृहीत करता है। विनिमयपत्र का धारक ग उसके संदाय की मांग कसे करता है और क के इन्कार करने पर उसके विरुद्ध उस विनिमयपत्र पर बाद लाता है। क प्रतिरक्षा करने के लिये युक्तियुक्त आधार न रखते हुए बाद में प्रतिरक्षा करता है और उसे विनिमयपत्र की रकम और खर्चा देना पड़ता है। वह विनिमयपत्र की रकम ख से वसूल कर सकता है किन्तु खर्च के लिये दी गयी राशि वसूल नहीं कर सकता, क्योंकि उस अनुयोग में प्रतिरक्षा करने के लिये कोई वास्तविक आधार नहीं था।
(ग) ग द्वारा ख को प्रदाय किये जाने वाले चावल के लिये, क 2,000 रुपये तक का संदाय प्रत्याभूत करता है। ख को ग 2,000 रुपये से कम की रकम का चावल प्रदाय करता है किन्तु प्रदाय किये गये चावल के लिये क से 2,000 रुपये की राशि का संदाय अभिप्राप्त कर लेता है क वास्तव में प्रदाय किये गये चावल की कीमत से अधिक ख से वसूल नहीं कर सकता।
जहाँ कि दो या अधिक व्यक्ति उसी ऋण या कर्तव्य के लिये, या तो संयुक्ततः या पृथकत और चाहे एक ही चाहे विभिन्न संविदाओं के अधीन, और चाहे एक-दूसरे के ज्ञान में चाहे ज्ञान के बिना, सह-प्रतिभू हों, वहीं उन सह प्रतिभुओं में से हर एक, तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में वहां तक जहां तक उनके बीच का सम्बन्ध है, सम्पूर्ण ऋण का या उसके उस भाग का, जो मूल ऋणी द्वारा असंदत्त रह गया हो, समान अंश समानत देने के दायी हैं।
(क) ङ को उधार दिये गये 3,000 रुपये के लिये घ के क, ख और ग प्रतिभू हैं। ङ संदाय में व्यतिक्रम करता है। क, ख और ग जहां तक उनके बीच का सम्बन्ध है, हर एक 1,000 रुपये संदत्त करने का दायी है।
(ख) ङ को उधार दिये गये 1,000 रुपये के लिये घ के क, ख और ग प्रतिभू हैं, और क, ख और ग के बीच यह संविदा है कि क एक-चौथाई तक के लिये, ख एक चौथाई तक के लिये और ग आधे तक के लिये उत्तरदायी है। ङ संदाय में व्यतिक्रम करता है। जहाँ तक कि प्रतिभुओं के बीच का सम्बन्ध है, क 250 रुपये, ख 250 रुपये और ग 500 रुपये संदत्त करने का दायी है।
सह प्रतिभू, जो विभिन्न राशियों के लिये आबद्ध हैं, अपनी-अपनी बाध्यताओं की परिसीमाओं तक समानतः संदाय करने के दायी हैं।
(क) घ के प्रतिभुओं के रूप में क, ख और ग इस शर्त पर आश्रित हैं कि ङको घ सम्यक् रूप में लेखा देगा, पृथक्-पृथक् तीन बन्धपत्र लिख देते हैं, जिनमें से हर एक भिन्न शास्ति वाला है अर्थात् क का 10,000 रुपये की, ख का 20,000 रुपये की, ग का 40,000 रुपये की शास्ति वाला है ग 30,000 रुपये का लेखा नहीं देता। क, ख और ग हर एक 10,000 रुपये संदाय करने के दायी हैं।
(ख) घ के प्रतिभुओं की हैसियत में क, ख और ग इस शर्त पर आश्रित हैं कि ङको घ सम्यक् रूप से लेखा देगा, पृथक् पृथक् तीन बन्धपत्र लिख देते हैं, जिनमें से हर एक भिन्न शास्ति वाला है अर्थात् क का 10,000 रुपये की, ख का 20,000 रुपये की, ग का 40,000 रुपये की शास्ति वाला है। घ 40,000 रुपये का लेखा नहीं देता । क 10,000 रुपये का और ख और गं हर एक 15,000 रुपये का संदाय करने के दायी हैं।
(ग) घ के प्रतिभुओं के रूप में क, ख और ग इस शर्त पर आश्रित हैं कि ङको घ सम्यक् रूप में लेखा देगा, पृथक् पृथक् तीन बन्धपत्र लिख देते हैं, जिनमें से हर एक भिन्न शास्ति वाला है अर्थात् क का 10,000 रुपये की, ख का 20,000 रुपये की, ग का 40,000 रुपये की शास्ति वाला है। घ 70,000 रुपये का लेखा नहीं देता। क, ख और ग हर एक को अपने बन्धपत्र की पूरी शास्ति देनी होगी।