
"उपनिधान" एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को किसी प्रयोजन के लिये इस संविदा पर माल का परिदान करना है कि जब वह प्रयोजन पूरा हो जाये तब वह लौटा दिया जायेगा; या उसे परिदान करने वाले व्यक्ति के निदेशों के अनुसार अन्यथा व्ययनित कर दिया जायेगा। माल का परिदान करने वाला व्यक्ति " उपनिधाता" कहलाता है। वह व्यक्ति, जिसको वह परिदत्त किया जाता है " उपनिहिती" कहलाता है।
यदि वह व्यक्ति, जो किसी अन्य माल पर पहले से ही कब्जा रखता है, उसका धारण उपनिहिती के रूप में करने की संविदा करता है तो वह तद्द्द्वारा उपनिहिती हो जाता है और माल का स्वामी उसका उपनिधाता हो जाता है यद्यपि वह माल उपनिधान के तौर पर परिदत्त न किया गया हो।
उपनिहिती को परिदान ऐसा कुछ करने द्वारा, किया जा सकेगा जिसका प्रभाव उस माल को आशयित उपनिहिती के या उसकी ओर से उसे धारण करने के लिये प्राधिकृत किसी व्यक्ति के कब्जे में रख देना हो ।
उपनिधाता, उपनिहित माल की उन त्रुटियों को उपनिहिती से प्रकट करने के लिये आबद्ध है जिनकी जानकारी उपनिधाता को हो और जो उसके उपयोग में तत्वतः विघ्न डालती हो या उपनिहिती को साधारण जोखिम में डालती हो और यदि वह ऐसा प्रकटीकरण नहीं करता है तो वह उपनिहिती को ऐसी त्रुटियों से प्रत्यक्षतः उद्भूत नुकसान के लिये उत्तरदायी है।
यदि माल भाड़े पर उपनिहित किया गया है तो उपनिधाता ऐसे नुकसान के लिये उत्तरदायी है चाहे उपनिहित माल की ऐसी त्रुटियों के अस्तित्व से वह परिचित था या नहीं।
(क) क एक घोड़ा ख को उधार देता है जिसका दुष्ट होना वह जानता है। वह यह तथ्य प्रकट नहीं करता कि घोड़ा दुष्ट है। घोड़ा भाग खड़ा होता है, ख को गिरा देता है और ख क्षत हो जाता है। हुये नुकसान के लिये ख के प्रति क उत्तरदायी है।
(ख) ख की एक गाड़ी क भाड़े पर लेता है। गाड़ी अक्षेमकर है, यद्यपि ख को यह मालूम नहीं है और कक्षत हो जाता है। क्षति के लिये के के प्रति ख उत्तरदायी है।
उपनिधान की सभी दशाओं में उपनिहिती आबद्ध है कि वह अपने को उपेनिहित माल के प्रति वैसी ही सतर्कता बरते जैसी मामूली प्रज्ञा वाला मनुष्य वैसी ही परिस्थितियों में अपने ऐसे माल के प्रति बरतता जो उसी परिमाण, क्वालिटी और मूल्य का हो जैसा उपनिहित माल है।
उपनिहिती विशेष संविदा के अभाव में उपनिहित चीज की हानि, नाश या क्षय के लिये उत्तरदायी नहीं है, यदि उसने धारा 151 में वर्णित परिमाण में उसकी देखरेख की हो ।
उपनिधान की संविदा उपनिधाता के विकल्प पर शून्यकरणीय है यदि उपनिहिती उपनिहित माल के सम्बन्ध में कोई ऐसा कार्य करे जो उपनिधान की शर्तों से असंगत हो ।
ख को एक घोड़ा उसकी अपनी सवारी के लिये क भाड़े पर देता है। ख उस घोड़े को अपनी गाड़ी में चलाता है। यह क के विकल्प पर उपनिधान का पर्यवसान है।
यदि उपनिहिती उपनिहित माल का कोई ऐसा उपयोग करे जो उपनिधान की शर्तों के अनुसार न हो तो वह उसके ऐसे उपयोग से या ऐसे उपयोग के दौरान में माल को हुए नुकसान के लिये उपनिधाता को प्रतिकर देने का दायी है ।
(क) ख को एक घोड़ा केवल उसकी अपनी सवारी के लिये क उधार देता है। ख अपने कुटुम्ब के एक सदस्य ग को उस घोड़े पर सवारी करने देता है। ग सावधानी से सवारी करता है किन्तु अकस्मात् घोड़ा गिर पड़ता है और क्षत हो जाता है। ख घोड़े को हुई क्षति के लिये क को प्रतिकर देने का दायी है।
(ख) क कलकत्ते में ख से एक घोड़ा यह कहकर भाड़े पर लेता है कि वह वाराणसी जायेगा। क सम्यक् सावधानी से सवारी करता है किन्तु वाराणसी न जाकर कटक जाता है। अकस्मात् घोड़ा गिर पड़ता है और क्षत हो जाता है। क घोड़े को हुई क्षति के लिये ख को प्रतिकर देने का दायी है।
यदि उपनिहिती उपनिधाता की सम्मति से उपनिधाता के माल को अपने माल के साथ मिश्रित कर दे तो उपनिधाता और उपनिहिती इस प्रकार उत्पादित मिश्रण में अपने-अपने अंश के अनुपात से हित रखेंगे।
यदि उपनिहिती उपनिधाता की सम्मति के बिना उपनिधाता के माल को अपने माल के साथ मिश्रित कर दे और माल पृथक् या विभाजित किये जा सकते हों तो माल में सम्पत्ति पक्षकारों की अपनी- अपनी रहती है किन्तु उपनिहिती पृथक्करण या विभाजन के व्यय को और मिश्रण से हुये किसी भी नुकसान को सहन करने के लिये आबद्ध है।
क एक विशिष्ट चिह्न से चिह्नित रुई की 100 गांठें ख के पास उपनिहित करता है। क की सम्मति के बिना ख उन 100 गांठों को एक अलग चिह्न धारण करने वाली अपनी अन्य गांठों से मिश्रित करता है। क को हक है कि वह अपनी 100 गांठों को वापस करा ले, और गांठों के पृथक् करने में हुआ सारा व्यय और अन्य आनुषंगिक नुकसान सहन करने के लिये ख आबद्ध है।
यदि उपनिहिती उपनिधाता की सम्मति के बिना उपनिधाता के माल को अपने माल के साथ ऐसे प्रकार से मिश्रित कर दे कि उपनिहित माल को अन्य माल से पृथक् करना और उसे वापस परिदत्त करना असम्भव हो तो उपनिधाता उस माल की हानि के लिये उपनिहिती से प्रतिकर पाने का हकदार है।
क 45 रुपये कीमत के केप के आटे का बैरल ख के पास उपनिहित करता है। क की सम्मति के बिना ख उंस आटे को केवल 25 रुपये प्रति बैरल के अपने देशी आटे के साथ मिश्रित करता है। क को उसके आटे की हानि के लिये ख प्रतिकर देगा।
जहाँ कि उपनिधान की शर्तों के अनुसार उपनिहिती द्वारा उपनिधाता के लिये माल रखा जाना या प्रवहण किया जाना हो अथवा उस पर काम करवाया जाना हो और उपनिहिती को कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता हो वहां उपनिधाता उपनिहिती को उपनिहिती द्वारा उपनिधान के प्रयोजन के लिये उपगत आवश्यक व्ययों का प्रतिसंदाय करेगा।
किसी चीज को उपयोगार्थ उधार देने वाला, यदि वह उधार आनुग्रहिक रूप से दिया गया हो, किसी भी समय उसकी वापसी अपेक्षित कर सकेगा यद्यपि उसने उसे एक विनिर्दिष्ट समय या प्रयोजन के लिये उधार दिया हो। किन्तु यदि उधार लेने वाले ने विनिर्दिष्ट समय या प्रयोजन के लिये दिये गये उधार के भरोसे ऐसे प्रकार से कार्य किया है कि उधार दी गयी चीज की ठहराये गये समय से पूर्व वापसी से उसे उस फायदे से अधिक हानि होगी जो उसे उधार से वास्तव में व्युत्पन्न हुआ हो तो, यदि उधारदाता उधार लेने वाले को उसे वापस करने के लिये विवश करे तो उसको उधार लेने वाले की उतनी मात्रा में क्षतिपूर्ति करनी होगी जितनी वैसे हुई हानि वैसे व्युत्पन्न फायदे से अधिक है ।
उपनिहिती का यह कर्तव्य है कि ज्यों ही उस समय का, जिसके लिये माल उपनिहित किया गया था, अवसान हो जाये या वह प्रयोजन, जिसके लिये वह माल उपनिहित किया गया था, पूरा हो जाये, उपनिहित माल को मांग के बिना वापस कर दे या उपनिधाता के निदेशों के अनुसार परिदत्त कर दे।
यदि उपनिहिती के दोष से माल उचित समय पर वापस या परिदत्त या निविदत्तं न किया जाये तो उस समय से माल की किसी भी हानि, नाश या क्षय के लिये वह उपनिधाता के प्रति उत्तरदायी है।
आनुग्रहिक उपनिधान उपनिधाता या उपनिहिती की मृत्यु से पर्यवसित हो जाता है।
तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में उपनिहिती वह वृद्धि या लाभ, जो उपनिहित माल से प्रोद्भूत हुआ हो, उपनिधाता को या उसके निदेशों के अनुसार, परिदत्त करने के लिये आबद्ध है।
दृष्टान्त
क एक गौ को देखभाल के लिये ख की अभिरक्षा में छोड़ता है। गौ के बछड़ा पैदा होता है। ख वह गौ और बछड़ा क को परिदत्त करने के लिये आबद्ध है।
उपनिधाता उपनिहिती की ऐसी किसी भी हानि के लिये उत्तरदायी है जो उपनिहिती इस कारण उठाये कि उपनिधाता उपनिधान करने या माल को वापस लेने या उसके सम्बन्ध में निदेश देने का हकदार नहीं था।
यदि माल के कई संयुक्त स्वामी उसे उपनिहित करें तो, किसी तत्प्रतिकूल करार के अभाव में, उपनिहिती सभी स्वामियों की सम्मति के बिना भी एक संयुक्त स्वामी को या उसके निदेशों के अनुसार माल वापस परिदत्त कर सकेगा।
यदि उपनिधाता का माल पर कोई हक न हो और उपनिहिती उसका उपनिधाता को या उसके निदेशों के अनुसार सद्भावपूर्वक प्रतिपरिदान कर दे तो उपनिहिती ऐसे परिदान के बारे में उसके स्वामी के प्रति उत्तरदायी नहीं है।
यदि उपनिधाता से भिन्न कोई व्यक्ति उपनिहित माल का दावा करे तो वह न्यायालय से आवेदन कर सकेगा कि उपनिधाता को माल का परिदान रोक दिया जाये और यह विनिश्चय किया जाये कि माल पर हक किसका है।
माल पड़ा पाने वाले को माल का परिरक्षण करने और स्वामी का पता लगाने में अपने द्वारा स्वेच्छया उठाये गये कष्ट और व्यय के प्रतिकर के लिये स्वामी पर बाद लाने का कोई अधिकार नहीं है, किन्तु वह उस माल को स्वामी के विरुद्ध तब तक प्रतिधृत रख सकेगा जब तक उसे ऐसा प्रतिकर न मिल जाये, और यदि स्वामी ने खोये माल की वापसी के लिये विनिर्दिष्ट पुरस्कार देने की प्रस्थापना की हो, तो पड़ा पाने वाला ऐसे पुरस्कार के लिये बाद ला सकेगा और माल को तब तक प्रतिधृत रख सकेगा जब तक उसे वह पुरस्कार न मिल जाये।
जबकि कोई चीज, जो सामान्यतया विक्रय का विषय हो, खो जाये तब यदि स्वामी का युक्तियुक्त तत्परता से पता नहीं लगाया जा सके या यदि वह पड़ा पाने वाले के विधिपूर्ण प्रभारों का मांगे जाने पर संदाय करने से इन्कार करे तो पड़ा पाने वाला उसको बेच सकेगा-
(1) जबकि उस चीज के नष्ट हो जाने या उसके मूल्य का अधिकांश जाते रहने का खतरा हो, अथवा
(2) जबकि पाई गई चीज के बारे में पड़े पाने वाले के विधिपूर्ण प्रभार उसके मूल्य की दो-तिहाई तक पहुंच जाये।
जहाँ कि उपनिहिती ने, उपनिहित माल के बारे में उपनिधान के प्रयोजन के अनुसार कोई ऐसी सेवा की हो, जिसमें श्रम या कौशल का प्रयोग अन्तर्वलित हो, वहां तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में, उसे ऐसे माल के तब तक प्रतिधारण का अधिकार है जब तक वह उन सेवाओं के लिए जो उसने उसके बारे में की हों, सम्यक् पारिश्रमिक नहीं पा लेता ।
(क) क एक जौहरी ख को अनगढ़ हीरा काटने और पालिश किये जाने के लिये परिदत्त करता है। तदनुसार वैसा कर दिया जाता है। ख उस हीरे के तब तक प्रतिधारण का हकदार है जब तक उसे उन सेवाओं के लिये, जो उसने की हैं, संदाय न कर दिया जाये ।
(ख) क एक दर्जी ख को कोट बनाने के लिये कपड़ा देता है। ख यह वचन देता है कि कोट ज्यों ही पूरा हो जायेगा वह उसे क को परिदत्त कर देगा और पारिश्रमिक के लिये तीन मास का प्रत्यय देगा। कोट के लिये संदाय किये जाने तक ख उसे प्रतिधृत रखने का हकदार नहीं है।
बैंकर, फैक्टर, घाटवाले, उच्च न्यायालय के अटर्नी और बीमा दलाल अपने को उपनिहित किसी माल को, तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में समस्त लेखाओं की बाकी के लिये प्रतिभूति के रूप में प्रतिधृत रख सकेंगे, किन्तु अन्य किन्हीं भी व्यक्तियों को यह अधिकार नहीं है कि वे अपने को उपनिहित माल ऐसी बाकी के लिये प्रतिभूति के रूप में प्रतिधृत रखें जब तक कि उस प्रभाव की कोई अभिव्यक्त संविदा न हो।
किसी ऋण के संदाय के लिये या किसी वचन के पालन के लिये प्रतिभूति के तौर पर माल का उपनिधान 'गिरवी' कहलाता है। उस दशा में उपनिधाता 'पणयमकार' कहलाता है। उपनिहिती 'पणयमदार' कहलाता है।
पणयमदार गिरवी माल का प्रतिधारण न केवल ऋण के संदाय के लिये या वचन के पालन के लिये कर सकेगा वरन् ऋण के ब्याज और गिरवी माल के कब्जे के बारे में या परीक्षण के लिये अपने द्वारा उपगत सारे आवश्यक व्ययों के लिए भी कर सकेगा।
पणयमदार उसे ऋण या वचन से भिन्न किसी ऋण या वचन के लिये, जिसके लिए माल गिरवी रखा गया है, उस माल का प्रतिधारण उस प्रभाव की संविदा के अभाव में न करेगा, किन्तु तत्प्रतिकूल किसी बात के अभाव में ऐसी संविदा की उपधारणा पणयमदार द्वारा दिये गये पश्चातवर्ती उधारों के बारे में कर ली जायेगी।
पणयमदार गिरवी माल के परीक्षण के लिये अपने द्वारा उपगत गैर-मामूली व्ययों को पणयमदार से प्राप्त करने का हकदार है।
यदि पणयमकार उस ऋण के संदाय में या अनुबद्ध समय पर उस वचन का पालन करने में, जिसके लिये माल गिरवी रखा गया था, व्यतिक्रम करता है तो पणयमदार उस ऋण या वचन पर पणयमकार के विरुद्ध वाद ला सकेगा और गिरवी माल का साम्पाश्विक प्रतिभूति के रूप में प्रतिधारण कर सकेगा, या गिरवी चीज को बेचने की युक्तियुक्त सूचना पणयमकार को देकर उस चीज को बेच सकेगा।
यदि ऐसे विक्रय के आगम उस रकम से कम हों, जो ऋण या वचन के बारे में शोध्य है, तो पणयमकार बाकी के संदाय के लिये तब भी दायी रहता है। यदि विक्रय के आगम उस रकम से अधिक हों जो ऐसे शोध्य है तो पणयमदार वह अधिशेषं पणयमकार को देगा।
यदि उस ऋण के संदाय या उस वचन के पालन के लिये, जिसके लिए गिरवी की गई है, कोई समय अनुबद्ध हो, और पणयमकार ऋण का संदाय या वचन का पालन अनुबद्ध समय पर करने में व्यतिक्रम करे तो वह किसी भी पश्चात्वर्ती समय में इसके पूर्व कि गिरवी माल का वस्तुत: विक्रय हो, उसका मोचन करा सकेगा, किन्तु ऐसी दशा में उसे ऐसे अतिरिक्त व्ययों का, जो उसके व्यतिक्रम से हुए हों, संदाय करना होगा।
जहाँ कि कोई वाणिज्यिक अभिकर्ता स्वामी की सम्मति से माल पर या माल के हक की दस्तावेजों पर कब्जा रखता है वहां वाणिज्यिक अभिकर्ता के कारबार के मामूली अनुक्रम में कार्य करते हुए उसके द्वारा की गयी गिरवी उतनी ही विधिमान्य होगी मानो वह माल के स्वामी द्वारा उसे करने के लिये अभिव्यक्त रूप से प्राधिकृत हो, परन्तु यह तब जब कि पणयमदार सद्भावपूर्वक कार्य करे और गिरवी के समय उसे वह सूचना न हो कि पणयमकार गिरवी करने का प्राधिकार नहीं रखता।
इस धारा में " वाणिज्यिक अभिकर्ता" और "हक की दस्तावेजों" पदों के वे ही अर्थ होंगे जो उन्हें भारतीय माल विक्रय अधिनियम, 1930 (1930 का 3) में समनुदिष्ट हैं।
जबकि पणयमकार ने अपने द्वारा गिरवीकृत माल का कब्जा धारा 19 या 19- क के अधीन शून्यकरणीय किसी संविदा के अधीन अभिप्राप्त किया हो, किन्तु संविदा गिरवी के समय विखंडित न हो चुकी हो, तो पणयमदार उस माल पर अच्छा हक अर्जित कर लेता है, परन्तु यह तब जबकि वह सद्भावपूर्वक और पणयमकार के हक की त्रुटि की सूचना के बिना कार्य करे।
जहाँ कि कोई व्यक्ति ऐसे माल को गिरवी रखता है जिसमें वह केवल परिसीमित हित रखता है वहाँ गिरवी उस हित के विस्तार तक विधिमान्य है।
यदि कोई पर व्यक्ति उपनिहिती को उपनिहित माल के उपयोग या उस पर कब्जे से दोषपूर्वक वंचित करे या माल को कोई क्षति करे तो उपनिहिती ऐसे उपचारों का उपयोग करने का हकदार है जिनका वैसी दशा में स्वामी उपयोग कर सकता यदि उपनिधान नहीं किया गया होता, और या तो उपनिधाता या उपनिहिती ऐसे वंचित किये जाने या ऐसी क्षति के लिये पर व्यक्ति के विरुद्ध बाद ला सकेगा।
ऐसे किसी वाद में अनुतोष या प्रतिकर के तौर पर जो कुछ भी अभिप्राप्त किया जाये, वह, जहां पर कि उपनिधाता और उपनिहिती के बीच का सम्बन्ध है, उनके अपने-अपने हितों के अनुसार बरता जायेगा।