धारा 31 से 36 अध्याय 3 भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

धारा 31 से 36 अध्याय 3 भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

अध्याय 3

समाश्रित संविदाओं के विषय में

31. समाश्रित संविदा" की परिभाषा -

"समाश्रित संविदा" वह संविदा है जो ऐसी संविदा से साम्पाश्विक किसी घटना के घटित होने या न होने पर ही किसी बात को करने या न करने के लिये हो।

दृष्टान्त

ख से क संविदा करता है कि यदि ख का गृह जल जाए तो वह ख को 10,000 रुपये देगा। यह समाश्रित संविदा है।

32. ऐसी संविदाओं का प्रवर्तन जो किसी घटना के घटित होने पर समाश्रित हो-  

उन समाश्रित संविदाओं का प्रवर्तन, जो किसी अनिश्चित भावी घटना के घटित होने पर किसी बात को करने या न करने के लिये हों, विधि द्वारा नहीं कराया जा सकता, यदि और जब तक वह घटना घटित न हो गई हो।

यदि वह घटना असम्भव हो जाये तो ऐसी संविदायें शून्य हो जाती हैं।

दृष्टान्त

(क) ख से क संविदा करता है कि यदि ग के मरने के पश्चात् क जीवित रहा तो वह ख का घोड़ा खरीद लेगा। इस संविदा का प्रवर्तन विधि द्वारा नहीं कराया जा सकता यदि और जब तक क के जीवन-काल मेंग मर न जाये।

(ख) ख से क संविदा करता है कि यदि ग ने, जिससे घोड़ा बेचने की प्रस्थापना की गई है, उसे खरीदने से इन्कार कर दिया तो वह ख को वह घोड़ा विनिर्दिष्ट कीमत पर बेच देगा; इस संविदा का प्रवर्तन विधि द्वारा नहीं कराया जा सकता यदि और जब तक ग घोड़े को खरीदने से इन्कार न कर दे।

(ग) क यह संविदा करता है कि जब ग से ख विवाह कर लेगा तो ख को क एक नियत धनराशि देगा। ख से विवाह हुए बिना ग मर जाती है। संविदा शून्य हो जाती है।

33. उन संविदाओं का प्रवर्तन जो किसी घटना के घटित न होने पर समाश्रित हों-

उन समाश्रित संविदाओं का प्रवर्तन, जो किसी अनिश्चित भावी घटना के घटित न होने पर किसी बात को करने या न करने के लिये हों, तब कराया जा सकता है जब उस घटना का घटित होना असम्भव हो जाये उससे पूर्व नहीं ।

दृष्टान्त

क करार करता है कि यदि अमुक पोत वापस न आए तो वह ख को एक धनराशि देगा। वह पोत डूब जाता है। संविदा का प्रवर्धन पोत के डूब जाने पर कराया जा सकता है।

 

34. जिस घटना पर संविदा समाश्रित है, यदि वह किसी जीवित व्यक्ति का भावी आचरण हो तो वह घटना कब असम्भव समझी जायेगी -

यदि वह भावी घटना, जिस पर कोई संविदा समाश्रित है, इस प्रकार हो जिस प्रकार से कोई व्यक्ति किसी अविनिर्दिष्ट समय पर कार्य करेगा, तो वह घटना असम्भव हुई तब समझी जाएगी जब ऐसा व्यक्ति कोई ऐसी बात करे जो किसी भी परिमित समय के भीतर या उत्तरभावी आकस्मिकताओं के बिना उस व्यक्ति द्वारा वैसा किया जाना असम्भव कर दे।

दृष्टान्त

 

क करार करता है कि यदि ग से ख विवाह करे तो वह ख को एक धनराशि देगा। घ से ग विवाह कर लेती है। अब ग से ख का विवाह असम्भव समझा जाना चाहिये यद्यपि यह सम्भव है कि घ की मृत्यु हो जाये और तत्पश्चात् ख से ग विवाह कर ले।

35. सविदाएँ जो नियत समय के भीतर विनिर्दिष्ट घटना के होने पर समाश्रित हों, कब शून्य हो जाती है-

समाश्रित संविदाएँ जो किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के किसी नियत समय के भीतर घटित होने पर किसी बात को करने या न करने के लिए हो शून्य हो जाती हैं यदि उस नियत समय के अवसान पर ऐसी घटना न घटित हुई हो या यदि उस नियत समय से पूर्व ऐसी घटना असंभव हो जाए।

विनिर्दिष्ट घटना के नियत समय के भीतर घटित न होने पर समाश्रित संविदाओं का प्रवर्तन कब कराया जा सकेगा-

समाश्रित संविदाएँ जो किसी विनिर्दिष्ट अनिश्चित घटना के किसी नियत समय के भीतर घटित न होने पर किसी बात को करने या न करने के लिए हो विधि द्वारा तब प्रवर्तित कराई जा सकेंगी जब उस नियत समय का अवसान हो गया हो और ऐसी घटना घटित न हुई हो या उस नियत समय के अवसान से पूर्व यह निश्चित हो जाए कि ऐसी घटना घटित नहीं होगी।

दृष्टान्त

(क) क वचन देता है कि यदि अमुक पोत एक वर्ष के भीतर वापस आ जाये तो वह ख को एक धनराशि देगा। यदि पोत उस वर्ष के भीतर वापस आ जाये तो संविदा का प्रवर्तन कराया जा सकेगा और यदि पोत उस वर्ष के भीतर जल जाये तो संविदा शून्य जायेगी।

(ख) क वचन देता है कि यदि अमुक पोत एक वर्ष के भीतर न लौटे तो वह ख को एक धनराशि देगा। यदि पोत उस वर्ष के भीतर न लौटे या उस वर्ष के भीतर जल जाए तो संविदा का प्रवर्तन कराया जा सकेगा।

36. असम्भव घटनाओं पर समाश्रित करार शून्य हैं—

समाश्रित करार, जो किसी असम्भव घटना के घटित होने पर ही कोई बात करने या न करने के लिये हों, शून्य हैं, चाहे घटना की असम्भवता करार के पक्षकारों को उस समय ज्ञात थी या नहीं जब करार किया गया था।

दृष्टान्त

(क) क करार करता है कि यदि दो सरल रेखाएँ किसी स्थान को घेर लें तो वह ख को 1,000 रुपये देगा। करार शून्य है।

(ख) क करार करता है कि यदि क की पुत्री ग से ख विवाह कर ले तो वह ख को 1,000 रुपये देगा। करार के समय ग मर चुकी थी। करार शून्य है।

 

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