
इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे न कि अल्पीकरण में।
इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही समुचित सरकार या समुचित सरकार के किसी अधिकारी या मुख्य आयुक्त या राज्य आयुक्त के किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी।
(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी या ऐसे निदेश दे सकेगी जो कठिनाई दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो:
परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ होने की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, इसके किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।
(1) समुचित सरकार द्वारा की गई सिफारिशों पर या अन्यथा यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, तो वह अधिसूचना द्वारा अनुसूची का संशोधन कर सकेगी और ऐसी अधिसूचना के जारी किए जाने पर अनुसूची तद्नुसार संशोधित की गई समझी जाएगी।
(2) प्रत्येक ऐसी अधिसूचना इसके जारी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
(1) केन्द्रीय सरकार, पूर्व प्रकाशन की शर्त के अध्यधीन अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के क्रियान्वयन के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम, निम्नलिखित विषयों में से सभी या किसी विषय के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्:-
(क) धारा 6 की उपधारा (2) के अधीन दिव्यांगता अनुसंधान समिति के गठन की रीति
(ख) धारा 21 की उपधारा (1) के अधीन समान अवसर नीति अधिसूचित करने की रीति;
(ग) धारा 22 की उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक स्थापन द्वारा अभिलेखों के अनुरक्षण का प्ररूप और रीति;
(घ) धारा 23 की उपधारा (3) के अधीन शिकायत अनुतोष अधिकारी द्वारा शिकायतों के रजिस्टर के अनुरक्षण की रीति;
(ङ) धारा 36 के अधीन विशेष रोजगार कार्यालय के लिए स्थापन द्वारा जानकारी और विवरणी प्रस्तुत करने की रीतिः
(च) धारा 38 की उपधारा (2) के अधीन निर्धारण बोर्ड की संरचना और उपधारा (3) के अधीन निर्धारण बोर्ड द्वारा किए जाने वाले निर्धारण की रीति;
(छ) धारा 40 के अधीन दिव्यांगजनों की पहुंच के लिए मानक अधिकथित करने के लिए नियम;
(ज) धारा 58 की उपधारा (1) के अधीन दिव्यांगता प्रमाणपत्र के जारी किए जाने के लिए आवेदन की रीति और उपधारा (2) के अधीन दिव्यांगता के प्रमाणपत्र का प्ररूप;
(झ) धारा 61 की उपधारा ( 6 ) के अधीन केंद्रीय सलाहकार बोर्ड के नामनिर्दिष्ट सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते;
(ञ) धारा 64 के अधीन केंद्रीय सलाहकार बोर्ड की बैठकों में कारबार के संव्यवहार के लिए प्रक्रिया के नियम;
(ट) धारा 73 की उपधारा (4) के अधीन मुख्य आयुक्त और आयुक्तों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्ते;
(ठ) धारा 74 की उपधारा (7) के अधीन मुख्य आयुक्त के अधिकारियों और कर्मचारिवृंद के वेतन और भत्ते और सेवा की शर्ते
(ड) धारा 74 की उपधारा (8) के अधीन सलाहकार समिति की संरचना और विशेषज्ञों की नियुक्ति की रीति;
(ड) धारा 78 की उपधारा (3) के अधीन मुख्य आयुक्त द्वारा तैयार की जाने वाली और प्रस्तुत की जाने वाली वार्षिक रिपोर्ट का प्ररूप, रीति और अंतर्वस्तु
(ण) धारा 86 की उपधारा (2) के अधीन प्रक्रिया, निधि का उपयोग और प्रबंध की रीति;
(त) धारा 87 की उपधारा (1) के अधीन निधि के लेखाओं की तैयारी के लिए प्ररूप ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा। किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
(1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा पूर्व प्रकाशन की शर्त के अध्यधीन इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से छह मास से अनधिक की अवधि के अपश्चात् इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी।
(2) विशिष्टया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या किसी विषय के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः -
(क) धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन दिव्यांगता अनुसंधान के लिए समिति के गठन की रीति,
(ख) धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन किसी सीमित संरक्षक की सहायता उपलब्ध कराने की रीति;
(ग) धारा 51 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र के लिए किसी आवेदन को करने का प्ररूप और रीति;
(घ) धारा 51 की उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र की मंजूरी के लिए संस्थान द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं और पूरे किए जाने वाले मानक;
(ङ) धारा 51 की उपधारा (4) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र की विधिमान्यता, रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र से संलग्न प्ररूप और शर्ते
(च) धारा 51 की उपधारा (7) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र के लिए आवेदन के निपटान की अवधि;
(छ) यह अवधि जिसके भीतर धारा 53 की उपधारा (1) के अधीन अपील की जाएगी;
(ज) धारा 59 की उपधारा (1) के अधीन प्रमाणकर्ता प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध अपील का समय और रीति और उपधारा (2) के अधीन ऐसी अपील के निपटान की रीति
(झ) धारा 67 की उपधारा (6) के अधीन राज्य सलाहकार बोर्ड के नामनिर्दिष्ट सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते;
(ञ) धारा 70 के अधीन राज्य सलाहकार बोर्ड की बैठकों में कारवार के संव्यवहार के लिए प्रक्रिया के नियम; (ट) धारा 72 के अधीन जिला स्तर समिति की संरचना और कृत्य;
(ठ) धारा 79 की उपधारा (3) के अधीन राज्य आयुक्त का वेतन, भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें;
(ड) धारा 79 की उपधारा (3) के अधीन राज्य आयुक्त के अधिकारियों और कर्मचारिवृंद के वेतन, भत्ते तथा सेवा की शर्तें:
(ड) धारा 79 की उपधारा (7) के अधीन सलाहकार समिति की संरचना और विशेषज्ञों की नियुक्ति की रीति;
(ण) धारा 83 की उपधारा (3) के अधीन राज्य आयुक्त द्वारा तैयार की जाने वाली और प्रस्तुत की जाने वाली वार्षिक और विशेष रिपोर्टों का प्ररूप, रीति और अंतर्वस्तुः
(त) धारा 85 की उपधारा (2) के अधीन विशेष लोक अभियोजक को संदत्त की जाने वाली फीस या पारिश्रमिक:
(थ) धारा 88 की उपधारा (1) के अधीन दिव्यांगजनों के लिए राज्य निधि के गठन की रीति और उपधारा (2) के अधीन राज्य निधि के उपयोग और प्रबंध की रीतिः
(द) धारा 88 की (3) के अधीन दिव्यांगजनों के लिए राज्य निधि के खातों को तैयार करने के लिए प्ररूप ।
(3) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम इसके बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र राज्य विधान मंडल के समक्ष जहां दो सदन हैं, वहां प्रत्येक सदन के समक्ष और जहां राज्य विधान मंडल का एक सदन है, उस सदन के समक्ष रखा जाएगा।
(1) निःशक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 (1996 का 1) इसके द्वारा निरसित जाता है ।
(2) उक्त अधिनियम के ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अधिनियम के अधीन की गई कोई बात या की गई कोई कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी।
विनिर्दिष्ट दिव्यांगता
1. शारीरिक दिव्यांगता—
(अ) गतिविषयक् दिव्यांगता (सुनिश्चित गतिविधियों को करने में किसी व्यक्ति की असमर्थता जो स्वयं और वस्तुओं की गतिशीलता से सहबद्ध है जिसका परिणाम पेशीकंकाल और तंत्रिका प्रणाली या दोनों में पीड़ा है), जिसके अंतर्गत—
(क) “कुष्ठ रोगमुक्त व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो कुष्ठ से रोगमुक्त हो गया है किंतु निम्नलिखित से पीड़ित है—
(i) हाथ या पैरों में सुग्राहीकरण का ह्रास के साथ-साथ आंख और पलक में सुग्राहीकरण का ह्रास और आंशिक घात किंतु व्यक्त विरूपता नहीं है;
(ii) व्यक्त विरूपता और आंशिक घात किंतु उसके हाथों और पैरों में पर्याप्त गतिशीलता है जिससे वह सामान्य व्यावसायिक क्रियाकलापों में लगे रहने के लिए सक्षम है;
(iii) अत्यंत शारीरिक विरूपता के साथ-साथ वृद्ध जो उसे लाभप्रद व्यवसाय करने से निवारित करती है और “कृष्ठ रोगमुक्त व्यक्ति" पद का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा;
(ख) “प्रमस्तिष्क घात” से कोई गैर प्रगामी तन्त्रिका स्थिति का समूह अभिप्रेत है जो शरीर के संचलन को और पेशियों के समन्वयन को प्रभावित करती है, जो मस्तिष्क के एक या अधिक विनिर्दिष्ट क्षेत्रों में क्षति के कारण उत्पन्न होता है जो साधारणतः जन्म से पूर्व, जन्म के दौरान वा जन्म के तुरंत पश्चात् होता है;
(ग) “बौनापन” से कोई चिकित्सय या आनुवांशिक दशा अभिप्रेत है जिसके परिणामस्वरूप किसी वयस्क व्यक्ति की लंबाई चार फीट दस इंच (147 से० मी०) या उससे कम रह जाती है;
(घ) “पेशीयदुपोषण से वंशानुगत, आनुवांशिक पेशी रोग का समूह अभिप्रेत है जो मानव शरीर को संचलित करने वाली पेशियों को कमजोर कर देता है और बहुदुष्पोषण के रोगी व्यक्तियों के जीन में वह सूचना अशुद्ध होती है या नहीं होती है जो उन्हें उस प्रोटीन को बनाने से निवारित करती है जिसकी उन्हें स्वस्थ पेशियों के लिए आवश्यकता होती है, इसकी विशेषता प्रगामी कंकाल पेशी की कमजोरी, पेशी प्रोटीनों में त्रुटि और पेशी कोशिकाओं और टिशुओं की मृत्यु है;
(ङ) “तेजाबी आक्रमण पीड़ित" से तेजाब या समान संक्षारित पदार्थ को फेंककर किए गए हिंसक हमले के कारण विद्रूपित कोई व्यक्ति अभिप्रेत है;
(आ) दृष्टिगत ह्रास—
(क) “अंधता” से ऐसी दशा अभिप्रेत है जिसमें सर्वोत्तम सुधार के पश्चात् व्यक्ति में निम्नलिखित स्थितियों में से कोई एक स्थिति विद्यमान होती है,
(i) दृष्टि का पूर्णतया अभाव; या
(ii) सर्वाधिक संभव सुधार के साथ बेहतर आंख में दृष्टि सुतीक्षणता 3/60 से कम या 10/200 (स्नेलन) से कम, या
(iii) 10 डिग्री से कम के किसी कोण पर कक्षांतरित दृश्य क्षेत्र की परिसीमा;
(ख) ) "निम्न दृष्टि" से ऐसी स्थिति अभिप्रेत है जिसमें व्यक्ति की निम्नलिखित में से कोई एक स्थिति होती है, अर्थात्ः–
(i) बेहतर आंख में सर्वाधिक संभव सुधार के साथ 6/ 18 से अनधिक वा 20/60 से कम से 3/60 तक या 10/200 (स्नेलन) तक दृश्य सुतीक्षणता; या
(ii) 40 डिग्री से कम से 10 डिग्री तक की कक्षांतरित दृष्टि की क्षेत्र परिसीमा;
(इ) श्रवण शक्ति का ह्रास" -
(क) “बधिर” से दोनों कानों में संवाद आवृत्तियों में 70 डेसिबिल धव्य हास वाले व्यक्ति अभिप्रेत हैं;
(ख) “ऊंचा सुनने वाला व्यक्ति" से दोनों कानों से संवाद आवृत्तियों में 60 डेसिबिल से 70 डेसिबल अन्य हास वाला व्यक्ति अभिप्रेत है;
(ई) “वाक् और भाषा दिव्यांगता" से लेराइनजेक्टोमी या अफेलिया जैसी स्थितियों से उद्भूत स्थायी दिव्यांगता अभिप्रेत है जो कार्बनिक या तंत्रिका संबंधी कारणों के कारण वाक् और भाषा के एक या अधिक संघटकों को प्रभावित करती है
2. "बौद्धिक दिव्यांगता" से ऐसी स्थिति, जिसकी विशेषता बौद्धिक कार्य (तार्किक, शिक्षण, समस्या समाधान) और अनुकूलित दोनों में महत्वपूर्ण कमी होना है, जिसके अंतर्गत दैनिक सामाजिक और व्यवहार्य कोशलों की रेंज है, जिसके अंतर्गत—
(क) “विनिर्दिष्ट विद्या दिव्यांगताओं" से स्थितियों का एक ऐसा विजातीय समूह अभिप्रेत है जिसमें भाषा को बोलने या लिखने की प्रक्रिया द्वारा आलेखन करने की कमी विद्यमान होती है जो समझने, बोलने, पढ़ने, लिखने, अर्थ निकालने या गणितीय गणना करने में कमी के रूप में सामने आती है और इसके अंतर्गत बोधक दिव्यांगता डायसेलेक्सिया, डायसग्राफिया, डायसकेलकुलिया, डायसप्रेसिया और विकासात्मक अफेसिया जैसी स्थितियां भी हैं;
(ख) "स्वपरायणता स्पैक्ट्स विकार" से एक ऐसी तंत्रिका विकास की स्थिति अभिप्रेत है जो विशिष्टतः जीवन के पहले तीन वर्ष में उत्पन्न होती है, जो व्यक्ति की संपर्क करने की, संबंधों को समझने की और दूसरों से संबंधित होने की क्षमता को अत्यधिक प्रभावित करती है और आमतौर पर यह अप्रायिक या घिसे-पिटे कर्मकांडों या व्यवहार से सहबद्ध होता है ।
3. मानसिक व्यवहार -
“मानसिक रुग्णता” से चिंतन, मनोदशा, बोध, अभिसंस्करण या स्मरणशक्ति का अत्यधिक विकार अभिप्रेत है जो जीवन की साधारण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समग्र रूप से निर्णय, व्यवहार, वास्तविकता की पहचान करने की क्षमता या योग्यता को प्रभावित करता है किंतु जिसके अंतर्गत मानसिक मंदता नहीं है जो किसी व्यक्ति के मस्तिष्क का विकास रुकने या अपूर्ण होने की स्थिति है, विशेषकर जिसकी विशिष्टता बुद्धिमता का सामान्य से कम होना है।
4. निम्नलिखित के कारण दिव्यांगता—
(क) चिरकारी तंत्रिका दशाएं, जैसे-
(i) “बहु-स्केलेरोसिक" से प्रवाहक, तंत्रिका प्रणाली रोग अभिप्रेत है जिसमें मस्तिष्क की तंत्रिक कोशिकाओं के अक्ष तंतुओं के चारों ओर रीढ़ की हड्डी की मायलिन सीथ क्षतिग्रस्त हो जाती है जिससे डिमायीलिनेशन होता है और मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाओं और रीढ़ की हड्डी की कोशिकाओं की एक-दूसरे के साथ संपर्क करने की क्षमता प्रभावित होती है;
(ii) “पार्किंसन रोग" से कोई तंत्रिका प्रणाली का प्रगामी रोग अभिप्रेत है, जो कम्प, पेशी कठोरता और धीमा, कठिन संचलन द्वारा चिह्नाकिंत होता है जो मुख्यतया मस्तिष्क के आधारीय गंडिका के अद्यपतन तथा तंत्रिका संचलन डोपामई के हास से संबद्ध मध्य आयु और वृद्ध व्यक्तियों को प्रभावित करता है;
(ख) रक्त विकृति–
(i) “हेमोफीलिया” से एक आनुवंशकीय रोग अभिप्रेत है जो प्रायः पुरुषों को ही प्रभावित करता है किंतु इसे महिला द्वारा अपने नर बालकों को संचारित किया जाता है, इसकी विशेषता रक्त के थक्का जमने की साधारण क्षमता का नुकसान होना है जिससे छोटे से घाव का परिणाम भी घातक रक्तस्राव हो सकता है;
(ii) “थेलेसीमिया” से वंशानुगत विकृतियों का एक समूह अभिप्रेत है जिसकी विशेषता हिमोग्लोबिन की कमी या अभाव है;
(iii) "सिक्कल कोशिका रोग" से होमोलेटिक विकृति अभिप्रेत है जो रक्त की अत्यंत कमी, पीड़ादायक घटनाओं और जो सहबद्ध टिशुओं और अंगों को नुकसान से विभिन्न जटिलताओं में परिलक्षित होता है, “हेमोलेटिक” लाल रक्त कोशिकाओं की कोशिका झिल्ली के नुकसान को निर्दिष्ट करता है जिसका परिणाम हिमोग्लोबिन का निकलना होता है।
5. बहुदिव्यांगता (उपर्युक्त एक या एक से अधिक विनिर्दिष्ट दिव्यांगताएं) जिसके अंतर्गत बधिरता, अंधता, जिससे कोई ऐसी दशा जिसमें किसी व्यक्ति के श्रव्य और दृश्य के सम्मिलित हास के कारण गंभीर संप्रेषण, विकास और शिक्षण संबंधी गंभीर दशाएं अभिप्रेत हैं।
6. कोई अन्य प्रवर्ग जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाएं।