
(1) समुचित सरकार, यह सुनिश्चित करेगी कि दिव्यांगजन अन्य व्यक्तियों के समान, समता, गरिमा के साथ जीवन के और उसकी सत्यनिष्ठा के लिए सम्मान के अधिकार का उपभोग करे ।
(2) समुचित सरकार, समुचित वातावरण प्रदान करके दिव्यांगजनों की क्षमता का उपयोग करने के लिए उपाय करेगी । (3) किसी दिव्यांगजन के साथ दिव्यांगता के आधार पर तब तक विभेद नहीं किया जाएगा जब तक कि यह दर्शित नहीं कर
दिया जाता है कि अक्षेपित कृत्य या लोप, विधिसंगत उद्देश्य को प्राप्त करने का आनुपातिक साधन है ।
(4) कोई व्यक्ति केवल दिव्यांगता के आधार पर उसकी वैयक्तिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।
(5) समुचित सरकार दिव्यांगजनों के लिए युक्तियुक्त आवासन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय करेगी ।
(1) समुचित सरकार और स्थानीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करने का उपाय करेंगे कि दिव्यांग स्त्री और बालक अन्य लोगों की भांति समान रूप से अपने अधिकारों का उपभोग करें।
(2) समुचित सरकार और स्थानीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि सभी दिव्यांग बालकों को उनको प्रभावित करने वाले सभी विषयों पर अपने दृष्टिकोण व्यक्त करने का किसी समान आधार पर अधिकार होगा और उनकी आयु और दिव्यांगता को दृष्टि में रखते हुए उनको समुचित सहायता प्रदान की जाएगी।
(1) दिव्यांग व्यक्ति को समुदाय में जीने का अधिकार होगा ।
(2) समुचित सरकार यह प्रयास करेगी कि दिव्यांग व्यक्ति को
(क) किसी विशिष्ट जीवन व्यवस्था में जीने के लिए बाध्य नहीं किया जाए; और
(ख) किसी ऐसे गृह, आवास की श्रेणी और अन्य समुदाय सहारा सेवाओं में, जिनमें आयु और लिंग पर सम्यक् ध्यान देते हुए, जीवन को सहारे के लिए आवश्यक व्यक्तिगत सहायता सम्मिलित है, पहुंच प्रदान की गई है।
(1) समुचित सरकार, दिव्यांजन को प्रताड़ना, क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार के होने से संरक्षित करने के लिए उपाय करेगी।
(2) कोई दिव्यांगजन -
(i) संसूचना की पहुंच योग्य पद्धतियों, साधनों और रूपविधानों के माध्यम से अभिप्राप्त उसकी स्वतंत्र और सूचित सम्मति के बिना; और
(ii) समुचित सरकार द्वारा इस प्रयोजन के लिए बिहित रीति से गठित ऐसी दिव्यांगता पर अनुसंधान के लिए समिति की पूर्व अनुमति, जिसमें आधे से अन्यून सदस्य उसमें से या तो दिव्यांगजन या धारा 2 के खंड (यक) के अधीन यथावर्णित रजिस्ट्रीकृत संगठनों के सदस्य होंगे के बिना, किसी अनुसंधान की प्रयोग वस्तु नहीं होगा ।
(1) समचित सरकार दिव्यांगजनों को दुरुपयोग, हिंसा और शोषण के सभी रूपों से संरक्षित करने के लिए उपाय करेगी और उनको रोकने के लिए वह —
(क) दुरुपयोग, हिंसा और शोषण की घटनाओं का संज्ञान लेगी तथा ऐसी घटनाओं के विरुद्ध उपलब्ध विधिक उपचार उपलब्ध कराएगी;
(ख) ऐसी घटनाओं से बचने के लिए उपाय करेगी और उनकी रिपोर्ट किए जाने के लिए प्रक्रिया विहित करेगी;
(ग) ऐसी घटनाओं के पीडितों का बचाव, संरक्षण और पुनर्वास करने के लिए उपाय करेगी; और
(घ) जागृति पैदा करेगी तथा जनता को सूचनाएं उपलब्ध कराएगी।
(2) ऐसा कोई व्यक्ति या रजिस्ट्रीकृत संगठन, जिसके पास वह विश्वास करने का कारण है कि दुरुपयोग, हिंसा वा शोषण का कोई कृत्य किसी दिव्यांगजन के विरुद्ध हुआ है या उसके किए जाने की संभावना है तो वह ऐसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट को, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर ऐसी घटनाएं होती हैं, उनके बारे में सूचना दे सकेगा।
(3) कार्यपालक मजिस्ट्रेट, ऐसा सूचना की प्राप्ति पर यथास्थिति, उसके होने को रोकने या उसको निवारित करने के लिए तुरंत उपाय करेगा या ऐसे दिव्यांगजन के संरक्षण के लिए ऐसा आदेश पारित करेगा, जो वह ठीक समझे, जिसके अंतर्गत—
(क) यथास्थिति, पुलिस या दिव्यांगजनों के लिए कार्य कर रहे किसी संगठन को ऐसे व्यक्ति की यथास्थिति, सुरक्षित अभिरक्षा या उनके पुनर्वास, या दोनों की व्यवस्था करने के लिए प्राधिकृत करते हुए ऐसे कार्य से पीड़ित का बचाव करने;
(ख) यदि ऐसा व्यक्ति ऐसी बांझा करे तो दिव्यांगजन के लिए संरक्षित अभिरक्षा उपलब्ध कराने; (ग) ऐसे दिव्यांगजनों को भरणपोषण उपलब्ध कराने, संबंधी कोई आदेश भी है।
(4) कोई पुलिस अधिकारी, दिव्यांगजन के दुरुपयोग, हिंसा या अत्याचार की कोई शिकायत प्राप्त करता है या अन्यथा जानकारी प्राप्त करता है, तो, व्यधित व्यक्ति को निम्नलिखित की जानकारी देगा,-
(क) उपधारा (2) के अधीन संरक्षण के लिए आवेदन करने के उसके अधिकार की और सहायता प्रदान करने की अधिकारिता रखने वाले कार्यपालक मजिस्ट्रेट की विशिष्टियों की
(ख) दिव्यांगजनों के पुनर्वास के लिए कार्य कर रहे निकटतम संगठन या संस्था की विशिष्टियों की
(ग) निःशुल्क विधिक सहायता के अधिकार की और
(घ) इस अधिनियम के उपबंधो के अधीन या ऐसे अपराध से निपटने वाली किसी अन्य विधि के अधीन शिकायत फाइल करने के अधिकार की:
परंतु इस धारा की किसी बात का अर्थ किसी भी रीति में पुलिस अधिकारी को किसी संज्ञेय अपराध के कारित होने पर सूचना की प्राप्ति पर विधि के अनुसार कार्यवाही करने के कर्तव्य से मुक्त करने के लिए नहीं लगाया जाएगा ।
(5) यदि कार्यपालक मजिस्ट्रेट यह पाता है कि अभिकथित कृत्य या व्यवहार भारतीय दंड संहिता (1860 का 45 ) के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन कोई अपराध गठित करता है तो वह इस प्रभाव की शिकायत को, उस विषय में अधिकारिता रखने वाले, यथास्थति, न्यायिक या महानगर मजिस्ट्रेट को अग्रेषित करेगा ।
(1) दिव्यांगजनों को जोखिम, सशस्त्र संघर्ष, मानवीय आपात स्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं की दशाओं में समान संरक्षण और सुरक्षा प्राप्त होगी।
(2) राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण अपने आपदा प्रबंधन कार्यकलाप, जैसा कि आपदा प्रबंध अधिनियम, 2005 (2005 का 53) की धारा 2 के खंड (ङ) के अधीन परिभाषित है, में दिव्यांगजनों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए दिव्यांगजनों को सम्मिलित किया जाना सुनिश्चित करने के लिए समुचित उपाय करेंगे।
(3) आपदा प्रबंध अधिनियम, 2005 (2005 का 53 ) की धारा 25 के अधीन गठित जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जिले में दिव्यांगजनों के ब्यौरों का अभिलेख रखेगा और ऐसे व्यक्तियों को जोखिम की किन्हीं स्थितियों से सूचित करने के लिए समुचित उपाय करेगा जिससे आपदा तैयारियों को बढ़ाया जा सके।
(4) जोखिम, सशस्त्र संघर्ष या प्राकृतिक आपदाओं की स्थितियों के पश्चात् पुनः निर्माण कार्यकलापों में लगे हुए प्राधिकरण दिव्यांगजनों की पहुंच अपेक्षाओं के अनुसार संबंधित राज्य आयुक्त के परामर्श से ऐसे कार्यकलापों का जिम्मा लेंगे ।
(1) किसी दिव्यांग बालक को दिव्यांगता के आधार पर, सिवाय किसी सक्षम न्यायालय के आदेश के, यदि बालक के सर्वोत्तम हित में अपेक्षित हो, उसके अभिभावकों से पृथक् नहीं किया जाएगा।
(2) जहां अभिभावक दिव्यांग बालक की देखभाल करने में असमर्थ हैं, तो सक्षम न्यायालय ऐसे बालक को उसके नजदीकी नातेदारों के पास रखेगा और ऐसा न हो पाने पर कौटुम्बिक परिवेश में, समुदाय में या आपवादिक दशाओं में, यथापेक्षित, समुचित सरकार या गैर-सरकारी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे आश्रय स्थलों में रखेगा।
(1) समुचित सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि दिव्यांगजन की प्रजनन और परिवार नियोजन के बारे में समुचित जानकारी तक पहुंच हो।
(2) किसी दिव्यांगजन को ऐसी चिकित्सा प्रक्रिया के अधीन नहीं किया जाएगा जिसका परिणाम उसकी संसूचित सहमति के बिना बांझपन होता है।
भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग यह सुनिश्चित करेंगे कि सभी मतदान केन्द्र दिव्यांगजनों की पहुंच में हों और निर्वाचन प्रक्रिया से संबंधित सभी सामग्री उनके लिए सहजता से समझने योग्य और उनकी पहुंच में हो।
(1) समुचित सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि दिव्यांगता के आधार पर विभेद के बिना किसी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकरण, आयोग या कोई अन्य न्यायिक या अर्धन्यायिक या अन्वेषण शक्तियां रखने वाले निकाय तक दिव्यांगजन अपनी पहुंच के अधिकार का प्रयोग करने के लिए समर्थ हों
(2) समुचित सरकार दिव्यांगजनों के लिए विशेषतया जो कुटुंब से बाहर रहते है और ऐसे दिव्यांगजन जिन्हें विधिक अधिकारों के प्रयोग के लिए अधिक सहायता की अपेक्षा है, समुचित सहायता उपायों को करने के लिए कदम उठाएगी ।
(3) विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (1987 का 39) के अधीन गठित राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण यह सुनिश्चित करने के लिए कि दिव्यांगजन की अन्य व्यक्तियों के समान ही प्रस्तावित किसी स्कीम, कार्यक्रम, सुविधा या सेवा तक पहुंच हो, जिसके अन्तर्गत युक्तियुक्त आवासन भी है, उपबंध करेंगे।
(4) समुचित सरकार निम्नलिखित उपाय करेगी—
(क) यह सुनिश्चित करेगी कि उनके सभी लोक दस्तावेज सुगम रूप विधान में हैं;
(ख) यह सुनिश्चित करेगी कि फाइल करने वाले विभागों, रजिस्ट्री या किसी अन्य अभिलेख कार्यालय में, सुगम रूप विधान में, दस्तावेजों और साक्ष्य को फाइल करने, भंडार में रखने और निर्दिष्ट करने में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक उपस्कर की पूर्ति कर दी गई है और
(ग) दिव्यांगजनों द्वारा उनकी अधिमानी भाषा और उनकी संसूचना के माध्यमों में दिए गए परिसाक्ष्य, बहस या मत के अभिलेखीकरण को सुकर बनाने के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं और उपस्कर उपलब्ध कराएगी।
(1) समुचित सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि दिव्यांगजन अन्य व्यक्तियों के समान रूप से स्थावर या जंगम संपत्ति का स्वामित्व या विरासत, उनके वित्तीय मामलों के नियंत्रण का अधिकार रखेंगे और बैंक ऋण, बंधक और वित्तीय प्रत्यय के अन्य रूपों तक पहुंच रखेंगे ।
(2) समुचित सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि दिव्यांगजन, जीवन के सभी पहलुओं में अन्य व्यक्तियों के समान आधार पर विधिक सामर्थ्य का उपभोग करे और विधि के समक्ष अन्य व्यक्तियों के रूप में समान मान्यता का अधिकार रखें ।
(3) जब सहायता प्रदान करने वाले किसी व्यक्ति और किसी दिव्यांगजन के मध्य विशिष्टतया वित्तीय, सांपत्तिक या किसी अन्य आर्थिक संव्यवहार को लेकर हितों का कोई विरोध उत्पन्न हो जाता है, तब ऐसी सहायता प्रदान करने वाला व्यक्ति उक्त संव्यवहार में दिव्यांगजन को सहायता प्रदान करने से प्रविरत रहेगा:
परंतु हितों के बिरोध की कोई उपधारणा इस आधार पर ही नहीं होगी कि सहायता देने वाला व्यक्ति, दिव्यांगजन का रक्त, विवाह संबंध या दत्तक ग्रहण से नातेदार है ।
(4) कोई दिव्यांगजन किसी सहायता संबंधी ठहराव को परिवर्तित उपांतरित या समाप्त कर सकेगा और किसी दूसरे की सहायता प्राप्त कर सकेगा:
परंतु ऐसा परिवर्तन, उपांतरण वा समाप्ति भविष्यलक्षी प्रकृति की होगी और उपर्युक्त सहायता संबंधी ठहराव में दिव्यांगजन द्वारा किए गए किसी तीसरे पक्षकार के संव्यवहार को अकृत नहीं करेंगे।
(5) दिव्यांगजन को सहायता प्रदान करने वाला कोई व्यक्ति असम्यक् असर का प्रयोग नहीं करेगा और उसकी स्वायत्तता, गरिमा और निजता का सम्मान करेगा।
(1) इस अधिनियम के आरंभ होने की तारीख से ही तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई जिला न्यायालय या राज्य सरकार द्वारा यथा अधिसूचित कोई अभिहित प्राधिकारी पाता है कि कोई दिव्यांगजन जिसे पर्याप्त और समुचित सहायता प्रदान की गई थी किंतु वह विधिक रूप से आबद्धकर विनिश्चयों को लेने में असमर्थ है तो ऐसे व्यक्ति के परामर्श से ऐसी रीति में जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए, उसकी ओर से विधिक रूप से आबद्धकर विनिश्चय लेने के लिए सीमित संरक्षक की और सहायता प्रदान की जा सकेगी:
परंतु, यथास्थिति, जिला न्यायालय या अभिहित प्राधिकरी ऐसी सहायता की अपेक्षा रखने वाले दिव्यांगजन के लिए पूर्ण सहायता प्रदान कर सकेंगे या जहां सीमित संरक्षकता बार-बार प्रदान की जानी है उस दशा में दी जाने वाली सहायता की प्रकृति और रीति का अवधारण करने के लिए दी जाने वाली सहायता की बाबत विनिश्चय का, यथास्थिति, न्यायालय या अभिहित प्राधिकारी द्वारा पुनर्विलोकन किया जाएगा।
इस धारा के प्रयोजनों के लिए “ सीमित संरक्षकता" से संयुक्त विनिश्चय की एक प्रणाली अभिप्रेत है जो संरक्षक और दिव्यांगजन के मध्य पारस्परिक समझदारी और भरोसे पर प्रचालित है जो विनिर्दिष्ट अवधि और विनिर्दिष्ट विनिश्चय तथा स्थिति तक सीमित होगी और दिव्यांगजन की इच्छानुसार कार्य करेगी।
(2) इस अधिनियम के आरंभ होने की तारीख से ही दिव्यांगजन के लिए तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के किसी उपबंध के अधीन नियुक्त प्रत्येक संरक्षक को, सीमित संरक्षक के रूप में कार्य करने के लिए समझा जाएगा ।
(3) किसी विधिक संरक्षक की नियुक्ति करने के, अभिहित प्राधिकारी के विनिश्चय द्वारा व्यक्ति कोई दिव्यांगजन ऐसे अपीलीय प्राधिकारी को अपील कर सकेगा जिसे इस प्रयोजन के लिए राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए।
(1) समुचित सरकार दिव्यांगजनों के विधिक सामर्थ्य के प्रयोग करने में उनकी सहायता करने के लिए समुदाय को गतिशील करने और सामाजिक जागरुकता सृजित करने के लिए एक या अधिक प्राधिकारियों को अभिहित करेगी।
(2) उपधारा (1) के अधीन अभिहित प्राधिकारी संस्थान में रहने वाले और जिन्हें अधिक सहायता की आवश्यकता है। दिव्यांगजनों द्वारा विधिक सामर्थ्य के प्रयोग के लिए उपयुक्त सहायता संबंधी ठहरावों की स्थापना करने के लिए उपाय करेगा और कोई अन्य उपाय, जो अपेक्षित हो, करेगा।